हरि [संगीत] ओम हरी ओम हरे ओ [संगीत] हरि [संगीत] [हंसी] [संगीत] ओम हरे ओम हरि [संगीत] ओम हरी [संगीत] ओम हरि [संगीत] ओम हरि ओम हरी [संगीत] ओम हरि ओम [संगीत] ओ हरि [संगीत] ओ भय नास दुरमति हरण भय नास दुरमति हरण कली में हरि को नाम कली में हरि को नाम निस दिन साधक जो जपे निस दिन साधक जो जपे सफल वही सब काम पर सबका हरि ओम हरी कलयुग केवल नाम आधारा कलयुग केवल नाम आधारा जपत नर उतरे सिंधु पारा जपत नर उतरे सिंधु पारा ह ओम [संगीत] हरी हमारे इस खोपड़े में दो
मस्तिष्क है एक का संचालन और बल सूर्य नाड़ी देती तो दूसरे को चंद्र नाड़ी देती 10 अरब न्यूरॉन्स है हमारे मस्तक में एक एक व्यक्ति के मस्तक में लगभग 10 अरब विज्ञानियों ने अभी खोज कर जाहिर किया है लेकिन शास्त्रों ने अपने महापुरुषों ने तो हजारों लाखों वर्ष पहले कहा सूक्ष्म कोष वो लोग न्यूरोस बोलते हैं शास्त्र का ने कोश कहा तो एक एक कोश एक एक ग्रह नक्षत्र का प्रतिनिधित्व रखने की करने की योग्यता अपने में संजोया है जैसे एक वटवृक्ष का बीज पूरे वटवृक्ष को संजोया है अपने में ऐसे एक एक न्यूरॉन से
एक एक ग्रह नक्षत्र आदि की शक्तिया आपने में संज है तो सूर्य नाड़ी से संचालित विशेष मस्तक विचार प्रधान होता है और चंद्र नाड़ी से संचालित भाव प्रधान होता है तो विचार और भाव जिसके बराबर संतुलित है अति भावुक व्यक्ति आत्म विचार नहीं कर सकता विचार वन सोहम सोहम सोहम करके अहंकारी हो जाएगा अरे तू सोहम सोहम है तो बेटा तू अकेला सोहम नहीं है सोहम तो फिर तेरे में सद्गुण आना चाहिने सो हम का तो विचार से के साथ अगर सद्भाव नहीं है तो अहम ब्रह्मास्मि तो अह पर जोर है कि ब्रह्म पर है
सोहम सोहम तो सो वह चैतन्य तो चैतन्य मैं हूं तो बाकी के कौन है तो विचार प्रधान व्यक्ति उसमें त्याग और प्रेम और प्रेम प्रधान व्यक्ति में विचार और त्याग तो जीवन जैसे पक्षी दो आंखों से उड़ान भरता है व्यक्ति दो पैरों से चलता है संसार का सृष्टि का वि क्रम है द्वंद ऐसे ही क्रिया शक्ति और भाव शक्ति उत्पत्ति और परिवर्तन तो यह दोनों मस्तकों के बीच जो खाई है उस खाई को करने का काम उस समय होता है जब सूक्ष्म का द्वार चलता है इंडा और पिंगला दाए नथुने से शवास लेते समय ले
रहे चल रहा उस समय भोजन करें तो भोजन पच जाएगा लेकिन उस समय पानी वानी पीते या कोई पे पदार्थ पीते तो धातु पतला होगा और बाथरूम के द्वारा कमजोरी रहेगी ऐसे ही चंद्र नाड़ी चलती उस समय पानी पिएंगे तो अमृत का काम करेगा शरीर पुष्ट जैसे सुबह का धोया हुआ दूध रात को पिएगा तो वायु खूब कर लेगा रात का दूध सुबह लेगा तो दूध तो अमृत है लेकिन उसके लिए विष हो जाएगा ऐसे सूर्य नाड़ी चंद्र नाड़ी तो कुछ चल कर्म होते सूर्य नाड़ी में किए जाते हैं और कुछ स्थाई और समझौते के
कर्म है चंद्र नाड़ी में कि जाते लेकिन यह करने से दोनों नाड़ियों के स्वासो स्वास बीच की नाड़ी उसको सुष मना बोलते हैं तो सशम नाड़ी जैसे रानी मक्खी जहां जाती है वहीं और मक्खियां जाती है मक्खियों में छत्ता होता है ना तो उसमें एक रानी मक्खी होती उसको दूसरी मक्खियां फॉलो करती तो सक्षम नाड़ी का जितना विकास होगा उतना ही जीवन में और नाड़ियों में स्वास्थ्य और ताल बता आएगी यह प्रयोग करने से सक्षम नारी नाड़ी खुलने में सुविधा रहती और वैसे ही चार बार सुषमा नाड़ी 24 घंटे में चार बार उसका द्वार खुलता
है सुबह सूर्योदय वक्त उस उस सुबह की संध्या का महत्व है मध्यान काल 12 बजे राम जी 12 बजे प्राणायाम करने के बाद ही भोजन करते थे शाम को सूर्यास्त के समय और रात को मध्य रात्र तो हिंदू लोग चार टाइम संध्या करते थे जैसे मुसलमान पांच बार नमाज पढ़ते हैं तो हिंदू चार बार संध्या करते जो चार बार नहीं तीन बार भी संध्या करेगा उसको रोजी रोटी के लिए कभी मोहताज नहीं होना पड़ेगा हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा किसी की खुशामद नहीं करनी पड़ेगी उसकी प्राण बध ताल बद्ध और मनोबल भाव बल पुण्य बल इतना
बढ़िया रहेगा कि रोजी रोटी की उसको फिकर नहीं रहे मुर्दे को प्रभु देता है कपड़ा लकड़ा आग दीपक जलता है तो ऑक्सीजन की फिक्र नहीं करता ऑक्सीजन खींच के आ जाता है अगनि जलती है तो ऑक्सीजन अपने आप आ जाता उसके पास ऐसे ही जठरा है तो आहार अपने आप आ जाएगा हम तो कई बार सब कुछ फेंक के बैठ जाते थे पकड़ हो के नर्मदा किनारे एक बार बेईमानी रखी ग चलो भूखे मरेंगे तो क्या खाएंगे एक पपीता और भुने हुए चने रखे तु नर्मदा किनारे ऐसे ही बैठ गए नर्मदा जी प्रकट हो इस
भाव से फिर जब भूख लगी तो चने भुने हुए चने धो धा के और पपीता खाने की तैयारी की तो बचार है कि इतना सब छोड़ा अभी पपीता भने हुए चने और थोड़े से पैसों में आ सकती कान पकड़ा और अपने को दो चार तमाचे ठोक दि और सब नरमदा जीी में फेंक दिया चाणोद करनाली बड़ोदा के पास तीर्थ माना जाता नरबदा में तो ढेर तीर्थ है एक से एक बढ़िया ती तप करवे को नरबदा रवे को सुर रात के 10 बजे हम सोचा कि नर्मदा माता आएगी खिलाएगी 11 बजे कितने कैसे तो देर रात
को मछु पसार होते थे तो देखते सद तो ना नज लाते कौन है आप बोलते हैं तो पता चल जाएगा नहीं बोलते तो कौन है चोर है डाकू है गूंगा है कुछ तो बोल तो हम कुछ नहीं बोलते थे मौन रखते थे तो फिर वह सुना के चले जाते थे तो कोई कुछ सोचता था कोई कुछ बोलता था माछी लोग जैसा बोल सकते हैं वैसे वो कृपा बरसा के चले जाते थे गालियों की ऐसे वैसे कु सुना के हम बैठे फिर थोड़ी देर में अंधेरी रात सन्नाटा तो नरबदा जी के पानी में खलबली हुई तो
मैं सावधान हो गया कि नरबदा माता आई है कुछ थाल लेके क्या इधर उधर देखता तो कोई नहीं फिर आंखें मद के बैठ जाता जो कुछ करना था करता था फिर पानी में खलबली होती थी फिर व खुलता था देखता कोई नर्मदा जीी तो आही नहीं भीभी ऐसे कई बार ऐसा हुआ पता चला कि जो चने फेंक दिए थे ना तो वहां गहरा पानी था तो बड़ी-बड़ी मछलियां वो चने खाने के लिए कूदती थी लेकिन भैया फिर इंद्रदेव ने सोचा कि अच्छा अब यह परीक्षा नहीं तो नर्मदा जा आए उसके पहले तो मेघ ने भी
खूब लीला की ऐसे आधी तूफान बारिश के नाले आए के अब गए उठ के माछ के बस्ती में पता नहीं था माछ की बस्ती वो जहां बरामदा था वहां जाक सुकड़ के बैठे तो कोई पेशाब करने को निकला तो जाकर गांव वालो को बोला कोई तुम्हारे घर में सद डाल र है लपेट के बैठा तो तो हथियार लेके आ गए दारिया भारिया वो बहुत सारे आए गाव उनको तो पता नहीं था जब उनका शोर शरावत हम खड़े हुए तो मारने का तो विचार उनका बदल गया हथ्यार और भोजन छाजन की व्यवस्था तो इस प्रकार ना
जाने कैसे कैसे होती रही तो यह व्यष्टि प्राण है हमारे जठ और बाहर समष्टि है तो व्यष्टि दिया है बाहर सूर्यनारायण समष्टि तो व्यष्टि सम आपस में अभिन्न है इसलिए जो लोग मेरा क्या होगा भविष्य क्या होगा हम क्या खाएंगे यह बिल्कुल मूर्खता है मुर्दे को प्रभु देता है कपड़ा लकड़ा आग जिंदा नर चिंता करे उसके बड़े अभग प्रोफेसर राम तीर्थ को लगने लगे और चल दिए पत्नी ने कहा मैं भी चलू मैं भी भजन करूंगी बोले चल लेकिन हम तो साधु हो रहे हैं कुछ साथ में नहीं ले चलना बोले नहीं तो सब लुटा
दिया और चलते बने जाकर पहाड़ी पर बैठ गए भूख तो लगी लेकिन खिलाने वाला कोई आया नहीं पत्नी से पूछा सच बता कुछ लाई तो नहीं है साथ में ईश्वर के आश्रय में बैठे हैं तो प्रकृति हमारे को व्यवस्था करेगी ईश्वर प्रणा करेगा तो ईश्वर का आश्रय छोड़कर कोई आश्रय रखा तो नहीं बोले एक अंगूठी ले आई थी छुपा के कि कहीं बुखा मरी होगी तो अंगूठी बेच देंगे ले तेरे की गंगा जी में अंगूठी फेंक दी फिर बैठ गया ओम ओम ओम अपना ईश्वर के भजन एक आदमी आया बोले महाराज आप इधर बैठे हैं
आपका भोजन मोजन का कैसा भोजन करोगे तो राम तीर्थ ने पूछा तीर्थ राम ने कौन कराएगा बोले मैं करवाऊंगी बोले नहीं करते नहीं कर रहे बैठे रहे हो तो फिर कोई आज के भी आदमी को प्रेरणा हुई महाराज आप यहां बैठे हैं आपका खाने पीने का कैसे आप भोजन स्वीकार करें बोले कौन कराएगा बोले महाराज कौन कराता है आप ही का भोजन आप करेंगे सबको जो कराता वही कराएगा बो तुम करागे बोले मैं कौन होता हूं कराने वाला हम बोले अच्छा ले आ जो बोलता है मैं खिलाता हूं वो मूर्ख है जो सोचता है मैंने
इसको कुछ दिया वह मूर्ख है यह शुक्र कर के वह तेरे दर पर अपना भाग्य खाते हल्कान तो वह होता है कि जो जो कामना से दिया जाता है उड़िया बाबा के साथ 10 साधु थे नौ दूसरे थे द उड़िया बाबा किसी ग्रहस्ती ने उनको राया और बराबर खीर बीर खिलाई दूसरे दिन सुबह साधु एक दूसरे को बोलने लगे यार मेरी तो लंगोटी गंदी हो गई मतलब सपन दोष हो गया उसने बोला मेरा भी य हाल हुआ मेरा भी हाल हुआ मेरा भी हाल तो उड़िया बाबा के पास बात गई बोले जरूर इसने कामना से
खिलाया होगा गृहस्ती से पूछा सच बता किस कामना से साधुओं को खीर खिलाई बोले महाराज मेरे को बेटा हो जाए बोले तेरा बेटा हो जाए जा हो जाए साधुओ की लंगोटी खराब कर दी वासना से खिलाई तो तो जो पुत्र की वासना से खिलाते ना तो फिर साधु को विकार य चेष्टा हो जाती ऐसा इस प्रसंग से मान सकते तो जो तुच्छ वासना से खिलाते हैं उसकी अपेक्षा जो सद्भाव से खिलाते हैं अच्छा है चलो हम खिलाते हमारा कर्त और मैं खिलाता हूं चल लेकिन जो बोलते भाई हां देने वाला वही खाने वाला वही वह
तो भोजन अमृत है तो किसी को देते समय यह बचार है अपन दे दो ऐसा हल्का भाव नहीं रखना चाहिए भक्ता यज्ञ तप साम सर्व लोक का महेश्वर हमारे यज्ञ का हमारे वस्तु का भोक्ता परमेश्वर है चाहे माता पिता साधु संत त्याग के अंदर ईश्वर ही तो भोक्ता है भक्ता यज्ञ तप साम सर्व लोक महेश्वर सुदम सर्व भूता नाम जवा माम शांति मृति मैं सभी के हृदय में यज्ञ तप और फल का भोगता हूं और सभी का मैं सहत हूं ऐसा जो जानता है वह शांति पाता है तो यह प्राण शक्ति की बात चली तो
जो तीन टाइम संध्या करता है उसको फिर रोजी रोटी के लिए चिंता नहीं करनी पड़ती मुर्दे को प्रभु देता है कपड़ा लकड़ा आग जिंदा नर चिंता करे ति इसके बड़े अभग गीता में यह भी आया है सात्विक तप राजस् तप तामस तप और जो शरीर को ज्यादा कष्ट देते हैं गीता का कृष्ण इस बात पर सहमत नहीं होते मुझ अंतर आत्मा को जानते नहीं और शरीर को सताते तो ये शरीर को अति क्लेश देना यह सात्विक तप नहीं है सात्विक तप में युक्ता हार विहारस्य युक्ता चट कर्मसु युक्ता स्वप्न बोध से योगो भवति दुख आचार्य
विनोबा भावे बोलते थे कि हमने पढ़ा था कि भाई नंगे पैर चलना चाहिए तो हम नंगे पैर चलते थे लेकिन वह जमाना पहले का नहीं अब हमको तेजा गर्मी हो गई आख खराब हो गई गर्मी चढ गई अब हम पछताते हैं अब हम जूता पहनते न पहले के जमाने में नंगे पैर चलते थे लेकिन अब तो सड़कें बन गई और लंबे सफर हो गए और सूर्य का तापमान भी बदल गया और हमारे शरीर की क्षमताएं भी बदल गई इसीलिए फिर वो नंगे पैर जो रह लिए थे उसका उन्होंने प्रश्चित जैसा वर्णन किया कि हमने गलती
फिर हमको समझ में आई तो हम जो ध्यान भजन करते हैं उससे एक प्रकार की रा बनती है ऊर्जा बनती जब हम नंगे पैर घूमते तो अर्थिंग से वो रा ऊर्जा धरती में चली जाती इसलिए महापुरुष लोग काष्ट की खड़ाऊ पहनते थे ताकि अर्थिंग ना मिले और ध्यान भजन करते थे तो मृग चर्म रखते थे अथवा तो कुसा रखते थे गीता में भी वर्णन आता है चैला न कुश तरम तत्र एकाग्र मना कृत्वा ऐसे ही फर्श पर बैठक धरती पर बैठ के नहीं चलाज न कुश होत अर्थात आपकी भजन की ऊर्जा को धरती खींच ना
ले इसलिए आप चैला जिन कुतम कुष आदि का उपयोग करो अब कुशा नहीं तो कंबल है कंता है वो बिछा के भजन करे तो ठीक फिर भजन किया व और फिर खुले में बैठे फर्श में तो आपके जीवन में भजन से जो बिजली बनती है ऊर्जा वो जीवन में चमक नहीं आएगी एक तरफ घड़ा भरा और दूसरी तरफ सुराख से पानी निकल गया तो ईश्वर प्राप्ति का रास्ता युक्ति से है युक्ति से मुक्ति है मजदूरी से मुक्ति नहीं होती