सुखी होना हो तो मैं चैतन्य हूं आत्मा हूं नित्य हूं मेरा जन्म नहीं है मेरी मृत्यु नहीं जन्म मृत्यु शरीर का है मैं उसका साक्षी चैतन्य हूं आनंदू तो तुम्हारा जन्मोत्सव लाखों लोग मनाकर अपना भाग्य बनाएंगे तुमको अपने जन्मोत्सव के मनाने की फिक्र नहीं जन्म तो शरीर का होता है मेरा जन्म है ही नहीं शरीर के पहले भी मैं था शरीर के बाद भी मैं रहूंगा शरीर का जन्म तोती पौने दो करोड़ लोगों का रोज होता है शरीर के जन्म का गर्व क्या और शरीर के जन्म की गिनती क्या जन्म मृत्यु मेरा धर्म नहीं है
पुण्य पाप कछु कर्म नहीं है मैं अज निर्लेप रूप कोई कोई जाने रे मैं अजन्मा हूं निर्लेप हूं नारायण स्वरूप हूं ओम ओम आनंद ओम ओम माधुर्य ओम ओम प्रभु जी ओम ओम प्यारे जी ओम ओम मेरे जी बस मौज हो जाएगी ओम ओम ओम प्रभु जी भगवान के और गुरु के साथ एक तांता हो जाए तो भगवान का अनुभव गुरु का अनुभव एक ही होता है ब्रह्म परमात्मा तटस्थ है गुरु और भगवान पक्षपाती ब्रह्म परमात्मा तटस्थ है प्रकाश देते हैं चेतना देते हैं कोई कुछ भी करो लेकिन भक्त भगवान और गुरु भक्त का पक्ष
लेके भक्त अच्छा करेगा तो उत्साहित करेंगे बुरा करेगा तो डाट मदद करेंगे भक्त की रक्षा करें चतुर्भुजी नारायण भगवान नन्हे हो जाओ तो वा वहां राम जी बन गए कृष्ण बन गए उखली से बनने लग जाए भक्त के पक्ष में वरहा अवतार ले लेते मत अवतार ले लेते हैं अंतर्यामी अवतार ले लेते हैं प्रेरक अवतार ले लेते हैं उसी ब्रह्म में से ईश्वर गुरु जीव जगत सब हो जाता जो सत चित आनंद ज्ञान स्वभाव से अनंत ब्रह्मांड रूप बना है वह ब्रह्म है उसी ब्रह्म की सत्ता से अपने को वही जान कर जो वस्था संभालते
वो ईश्वर है और जो व्यवस्था के आधीन चलते हैं वे जीव है जो व्यवस्था में उथल पाथल कर सकते संकल्प से तो ईश्वर में जीव में क्या फर्क है ईश्वर को शरीर से जीव को शरीर से करना पड़ता है ईश्वर को शरीर से नहीं करना पड़ता है संकल्प कर लिया वैसा हो जाएगा शरीर से करते हुए भी दिखेंगे लेकिन उनके संकल्प से सब तो जीव ईश्वर कैसे बने जीव जब नि संकल्प होता है तो ईश्वर बन जाता है निर्वासन हो जाए नि संकल्प हो [संगीत] जाए झूठ कपट धोखेबाजी संसार की वासना छोड़ दे तो हो
जाएगा एक कीड़ी ईश्वर बन सकती कीड़ी एक प्रणाली का कीड़ा सड़क के दोनों तरफ नालिया थी सड़क तो नहीं थी कच्चे रास्ते थे पहले के जमाने तो रेंगता हुआ कीड़ा गटर में कीड़े होते ना सफेद हड्डिया वडिया नहीं होती ऐसे ही चलते समझ गए सफेद की रास्ता पार कर रहा था लेकिन बड़ा तेजी से चल पड़ा तो व्यास जी ने कहा कि तेरे को तो कौन सी नौकरी पर जाना है अथवा कौन सा जप तप करने जाना है इस तरफ की नाली से हटकर उस तरफ की नाली में जाएगा रहंगे इतनी जल्दी क्या है तेरे
को योग शक्ति देकर पूछा बोले महाराज बैलगाड़ी का आवाज आ रहा है रास्ता पार आराम से करूंगा तो बैलगाड़ी कुचल देगी अरे कुचल देगी तो कुचल देगी नाली के कीड़े की क्या जिंदगी महाराज जो जिस शरीर में आता है उसको उसी शरीर में रहने की वासना भी कुदरत दे देती आप तो जानते हैं आप ही की कृपा से मैं बोल रहा हूं भी पूछ कटी है कान कटा है घाव है और सफेद कीड़े रंग रहे बैया काट रही है फिर भी बग को मार के खा जाएगा कीड़ों को चाट के चट करेगा जीना चाहता है
क्योंकि आत्मा अमर है तो जिस शरीर में आता है तो उस शरीर में भी अपनी अमरता की आदत दिखाता है मरना कोई पसंद नहीं करता ब्रह्मा परमात्मा अमर है ना तो उसी का स्वभाव मरना कोई पसंद नहीं करेगा और तुम तुच्छ हो तुम हीन हो तुम मल मूत्र के थले हो यह बात कोई पसंद नहीं करेगा वास्तव में तो है वही सब हाड मास मल मूत्र विषा वात पीत क आओ प्रभु प्रभु जी भगवान हो तुम तो खुश हो जाएंगे आओ हड्डिया मास मूत्र काम क्रोध लोभ मोह के थैले चमड़े से ढके हुए आइए अच्छा
नहीं लगेगा क्योंकि असलियत नहीं है तुम्हारी यह तो प्रकृति का शरीर का है भले इसको मैं मानते हो लेकिन इसकी बात गले नहीं उतरेगी जिसको तुम मैं मानते हो शरीर को मैं मानते हो तो शरीर में क्या है हडिया है मल मूत्र मास थूक नीट बाल मवाद मन में कपट छल धोखेबाजी य है तो यह सब नाम लेकर बुलावे तो किसी को अच्छा नहीं लगेगा किसी को भी तो मानना पड़ेगा कि यह तुम नहीं हो तो कीड़े को बोला देख मैं वे मैंने तेरे को सूझबूझ दी अब तू मेरी बात मान मैं हर जन्म में
तेरे को सहायता करूंगा और तुझे महापुरुष बनाऊंगा जो आज्ञा महाराज पड़ा रहे व कुचल गया लगेगा आज्ञा मानी तो बिचारे की जान गई प्रगति हुई खरगोश बना खरगोश कोष मृत्यु हुई खरगोश हिरणों के बीच इधर उधर देखता है हिरण बना फिर हिरण को बिक ने निशाने पर लिया तो बदक मतलब शिकारी तो शिकारी को देखते हुए मरा और फिर हिरण शिकारियों ने खाया तो हिरण शिकारी बन गया बदक बन गया अब कहां कीड़ा और कहां बद देखता है कि मर गया बिचारा मरा मरा लेकिन प्र प्रगति की व बध के बेटे को व्यास जी मिले
चलते फिरते राम राम हरि नारायण क्या कर साधु संतों के पास भी जाया कर व मरने के बाद कुशार ऋषि के चिंतन में रहा ऋषि के चिंतन में प्रभाव में रहा ऋषि के घर जन्मा मित्रा उसकी माता और कुशार ऋषि उसके पिता चार पाच साल में वेदव्यास जी जा पहुंचे अगले जन्म में ऋषि का आकर्षण था तो भी आकर्षित हुआ वेदव्यास जी ने मंत्र दिया प्राणायाम ध्यान की विधि बनाए आत्मिक उन्नति की जो भी गुरु दीक्षा में जो बताया जाता है ना ऐसे प्राणायाम य अपन बताते हैं महत्व लोग नहीं समझते लेकिन बड़ा प्रभावशाली है
ऐसा करने से बुद्धि तीव्र होती है ऐसा करने से स्मृति भरती है थल बस्ती करने से रोकता रहती है स्वासो शवास से आत्मा के साथ जुड़ता है दीक्षा एकदम पेटेंट चीज इसलिए अपने साधक बहुत तेज निकल जाते हैं अगर करते दीक्षा लेकर कईया भागे नियम नहीं करते तो फिर भटकते रहते हैं नियम जो पकड़ लेगा प्रगति फास्ट है अपने साधक जो भी दीक्षा लेते और नियम पकड़ लेवे चाहे छोटी छोटी बच्चियां हो ईश्वर के सिवा कुछ भी मिलेगा तो सोने की लंका मिलेगी तो भी रोना पड़ेगा क ऐसे बच्चे भी है साक्षात्कार हो जाए अब
साक्षात्कार उनके बाप दादे पर परदा ने भी नहीं सुना होगा यहां के बच्चे साक्षात्कार सुख दुख में सम मैं आत्मा हूं उसका अनुभव हो जाए संसार में नहीं फसना है ऐसे अपने बच्चों के संस्कार तो रंग लाएंगे तो मित्रा माता कुशार ऋषि के घर वो कीड़ा जन्मा और नाम पड़ा मैत्री 10 साल का हुआ तो वेदव्यास ने कहा कि नंद भद्र ब्राह्मण है 80 साल के पापी आदमी मौज मारते हैं और धर्मात्मा दुखी है इसको जानने के लिए तपस्या कर रहा है जाओ उसको व्यर्थ की तपस्या से निवृत करो उसको उपदेश दो बुद्धि विलक्षण हो
गई थी और 10 साल का मैत्री लड़का 80 साल का तपस्वी नंद भद्र ब्राह्मण के पास कि ब्राह्मण देव इतना तप करके अपने को क्यों तपा रहे हो क्यों सुखा रहे हो तो बोले मैं ईश्वर से यह पूछना चाहता हूं कि हम सीधे हैं अच्छे हैं सच बोलते हैं तो हमारी यह दुर्दशा है आज जो झूठ कपट करते हैं वह मोज मार तो लड़के की बुद्धि जब ध्यान से व्यास भगवान का गुरु का ध्यान करने से बुद्धि खुल गई थी बोले ब्राह्मण देवता ऐसी बात नहीं है अब बच्चा 10 साल का 80 साल के ब्राह्मण
को बुरा कर्म करने से कोई सुखी है नहीं पूर्व का उसका सुखद प्रारब्ध जब शुरू होता है तो उसको सुख मिलता है दुखद प्रारब्ध होता है तो दुख मिलता है अवश्य मेव भोक्ति तम कृतम कर्म शुभाशुभ बालक ने कहा कि जो जिसमें उद्योग करते हैं और तत्परता होती है तो ईश्वर तो सत्ता देते हैं ईश्वर भय कृत है भ नाशक भी है भय भी पैदा करा देते शेर के द्वारा ईश्वर भय पैदा करा देते और हिरण के हृदय में भयभीत भी हो जाते हैं य ईश्वर की लीला है और अच्छा काम करने से कोई दुखी
होता है यह बात नहीं है लापरवाही से अथवा तो सुख की वासना और फिर व वासना पूर्ति नहीं होती तो दुखी होता है अभाव से दुखी नहीं होते ना समझी से दुखी होते चीज वस्तु नहीं है अभाव है इसलिए दुखी हैं तो तो सुखदेव जी के पास अभाव है त्यागियो के पास अभाव है लेकिन वह तो बड़े प्रसन्न रहते हैं कई लोग है तो राज पाठ छोड़कर अभाव वाले होकर सुखी होते हैं और कईयों के पास चीज वस्तु का बाहुल्य होता तभी भी तनाव में दुख में होते हैं तो जिसको विशाल तृष्णा होती है वह
दुखी होता है अच्छा काम करते हुए भी तृष्णा दुख देती है और बुरा काम करते हुए भी तृष्णा के अनुरूप होता है तो सुख होता है तो इस प्रकार की ऐसी तात्विक बातें बताए कि नंद भद्र ब्राह्मण ने आप साक्षात परमात्मा है बालक रूप में आए हैं प्रभु जी मुझे आरती करने दो क्योंकि भगवान वेदव्यास का ओज था ऐसे करते-करते वो कीड़े में से बना हुआ खरगोश हिरण बधक और फिर कुशार ऋषि का पुत्र मैत्रे ऋषि हो गए और मैत्री ऋषि का इतना प्रभाव बाप रे भाव उनका शास्त्र है मैत्री ऋषि का शास्त्र नाली में
से पसार होने वाला कीड़ा और मैत्री ऋषि बन गया खरगोश की इंद्र से पसार हुआ खरगोश का जन्म हुआ कीड़े की गंदी इंद्री से पसार हुआ कीड़ा हुआ लेकिन उसका असली स्वरूप ईश्वर अंशय कहां जाएगा वह तो शरीर बदले चैतन्य उनका इतना महान है कि जितना भी महान करो उसको ब्रह्मा जी बनना है तो बन सकता है अपने आप का आदमी शत्रु है अगर दुष्कर्म में लगता है तो और अपने आप का वह मित्र है अगर सत कर्म में और सत का पक्षधर है तो जानते य असत हो रहा है लेकिन वासना गंदी आदत झूठ
में लग जाते धोखे में लग जाते दगाबाजी में लग जाते चालबाजी में लग जाते तो अपने आप का विनाश होता है अपना अंतःकरण मलिन होता है कहां तो कीड़ा और कहां मैत्रे ऋषि मनुष्य का जहां संकल्प होता है घूम फिर के वहां पहुंच जाते संकल्प जहां से उठता है वह चैतन्य परमात्मा है अगर उसमें विकल्प ना हो संकल्प पूरा हो नहीं मुझे उठना है तो उठ सकता हूं लेकिन अभी चलो थोड़ी देर के बाद तो विकल्प हुआ ना बैठा ह पानी पीना है तुरंत का संकल्प होगा तो तुरंत पिंगा नहीं तो बोले तो विकल्प से
देर सवेर होती है लेकिन संकल्प फलता है और जितना सतो गुण होता है उतना तुरंत संकल्प फल जाता है जरूरी फलता है जितना जिसका अंतःकरण एकाग्र है शुद्ध है उतना संकल्प का प्रभाव संकल्पम प्रभव कामां रजोगुण तमोगुण के भी संकल्प है लेकिन कामना वाले संकल्प फलते तो जवारी का जुआ का संकल्प जिसका जैसा संकल्प देर सर इसीलिए नीच संकल्प से बचे और ऊंच संकल्प में फसे नहीं ऊंच संकल्प करके डटा रहे तो नीच संकल्प का महत्व भी नहीं रहेगा मुझे तो ईश्वर पाना है कुछ भी मिल जाए मुझे तो साक्षात्कार करना मुझ कुछ भी हो
जाए मुझे तो सुख दुख से पार होना है उस संकल्प को जितना महत्व देगा उतना नीच संकल्पों के तरफ समय कम जाएगा नीच संकल्पों की महता नहीं रहेगी सृष्टि में क्या क्या हुआ पुण्य करो तो नरक में जाओ और पाप करो तो स्वर्ग में जाओ ऐसी व्यवस्था थी कि स्वर्ग पापियों के हवाले था तो पापी पापी स्वर्ग में जिसका जो वि भाग आ गया पंजे वालों का आ गया तो अपने वाले सब मौज करें कमल वालों का आ गया तो कमल वाले मौज करें हाथी वालों का आ गया था हाथ वाले मौज करे उनके लिए
स्वर्ग हो गया ऐसे भी होता है लेकिन फिर समय पाकर अपने अपने जैसे पार्टी वाले हारते हैं पद उतार चढ़ाव उतार चढ़ाव का अनुभव करा के भगवान देर सवेर अपने आत्मा परमात्मा तक ले जाना चाहते य ईश्वर का ही महिमा कृपा है जैसे बच्चे को मां कैसे भी परिस्थितियों से नला के धुला के पुचका के अच्छा नेक बनाने में लगती है ना तो मां में ईश्वर का गुण है पिता भला चाहते तो ईश्वर का गुण है गुरु भला चाहते तो ईश्वर का गुण है जो भी भलाई के काम है यह ईश्वर की गुण है बुराई
के काम में तो जीव की वासना है तो साधु ते हुए न कारज हानी संत से हमारे कार्य की हानि नहीं होती ब्रह्मज्ञानी ते कछु बुरा ना भया क्योंकि ब्रह्मज्ञानी तो ई सबसे एकाकार है तो भी जो भी करते हैं हम बुरा नहीं करते जो भी करें आत्म साक्षात्कारा गुरु और भगवान उनकी लीला को कोई मनुष्य बुद्धि से तो लेगा तो चकरा आ जाएगा परेशान हो जाएगा तुम्हारी गत मिति तुम ही जानो तुम नान कदा से सदा कुर्बान जिसकी कोई वासना नहीं है अहम नहीं है व उसकी वाणी भगवत वाणी उसका दर्शन भगवत दर्शन उसका
ज्ञान भगवत ज्ञान मेरे गुरु जी का ज्ञान भगवत ज्ञान था मेरे गुरु जी का दर्शन भगवत दर्शन था बिल्कुल पक्का बोलता हूं मैं तो मेरे गुरु की कृपा भगवत कृपा थी मेरे गुरु जी का गुरु तत्व भगवत तत्व था ब्रह्म तत्व था तुम्हारे जो भगवान है उनको पहले में मानता था जब गुरु जी मिल गए तो वह तुम्हारे भगवान हो गए मेरे भगवान तो गुरु जी गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वरा गुरु साक्षात परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नम अभी श्री कृष्ण आ जाए राम जी आ जाए शिव जी आ जाए और गुरु जी आ
आ जाए तो मैंने मैं किसके चरणों में दौड़ के गिरंगा गुरु महाराज बाकी भगवान कैसे हालचाल है बाकी भगवान तो दोस्त हो गए हैं गुरु जी दोस्त नहीं होते गुरु जी गुरु जी है या पर्यंत जीवे त्रयो बंद्य ईश्वर का आदर करना चाहिए वेदांत का भी आदर करना चाहिए गुरु का तो महा आदर बड़ी भारी महिमा है भगवन नाम में क्या महिमा है भगवान को भी पता नहीं महाराज आपके नाम की महिमा क्या है आपको को ई पता नहीं भगवान नाराज नहीं होंगे भगवान की सृष्टि कितनी है भगवान को ई पता नहीं तुम्हारे शरीर में
बैक्टीरिया कितना है तुम्हारे को पता है क्या लेकिन है तुम्हारे शरीर में ऐसे ही भगवान में सृष्टि जीव है तुम्हारे शरीर के बैक्टीरिया तुमको पता है कितने हैं नहीं है ऐसे ही में भगवान का भी वही हाल है जो तुम्हारा है बोले भगवान तो सब जानते हैं अरे तत्व रूप से सब जानते हैं डिटेल में नहीं जानते सब प्रधानमंत्री के अंडर में है लेकिन चपरासी का ज्ञान प्रधानमंत्री के पास नहीं है है क्या प्लंबर का ज्ञान प्लंबर बलबर सब प्रधानमंत्री के बस ईश्वर अपने तत्व रूप से ईश्वर को सब का ज्ञान है हा ईश्वर ठान
ले तो फिर उसमें आ जाएगा एक बड़ा आया बड़ा तेज तरार युव तीरंदाज तीर चलाए तो ऐसा चलाए कि उनकी बराबरी का कोई नहीं गुरु गोविंद सिंह के दर्शन करने आया अब महाराज आपका ऐसा है सच्चे पादशाह मैं तीर ऐसा लादा हूं कि मेरी बराबरी का किथे कोई बंदा नहीं मिल महाराज ने देखा कि इसको तो आ घुस गया क्या करें बोले अच्छा भाई तेरा नाम तो सुनिया है तीर बड़ा तेज चलाता है बोले आओ सच्चे पातशाह में चला के खा और तीर चलाए तो दो माइल तक तीर चला जाए सवा तीन किलोमीटर तक सब
प्रशंसा करने लगे वाह भाई वाह वाह भाई वाह गोविंद सिंह ने देखा कि का ऑपरेशन तो करना पड़ेगा बेचारा आया आए थे बोलते ला जरा असी भी चला के देखा आ गोविंद सिंह ने तो अनुसंधान कि ऐसा तीन मील दूर चला गया उसके हवा निकल गई गुबारे की और चरणों में पड़ा मेरे को तो अहंकार होया सी सच्चे पाशा मारी बराबरी द कोई नहीं बनदा लेकिन अरे बोले ये तो अभ्यास है वो भैंसे को उठा के जब भैसा पैदा हुआ था उठा के उठ बैठ करते तो वो छोटा भैस का बच्चा भैसा बन गया तभी
भी उठ बैठ करते हैं अभ्यास की बात इसमें की बड़ी बहादुरी हुई सच्ची बहादुरी तो रब न जानो अपना अहम छो तीरंदाजी में अच्छा हूं इसमें अच्छा हूं उसमें अच्छा हूं यह मन का अ है अपनी अच्छाई मानना बुराई मानना यह अहम अपने को ईश्वर का ईश्वर को अपना जानना यह असली बात है ईश्वर के साथ एक हो जाना यह असली बात है गुरु तत्व के साथ गुरु के शरीर के साथ एक होने का तो चिपक चिपक के मर जाओगे गुरु जीी गुरुजी फोटो लेके गुरुजी गुरु जीी हम एक हो रहे हैं चुबे का फोटो
गुरु जी के अनुभव से च एक हो जाओ ओम हरि श्री हरि सच्चिदानंद हरि अपना चैतन्य आत्मा जहा आनंद है य महाभारत का श्लोक बहुत कुछ कह जाता है सर्व जीव मृत्यु पदम आर्वम ब्रह्मण पदम ता वान ज्ञानम विषय तान ज्ञान विषय प्रलाप किम कर कुटिलता जितनी है वह मृत्यु का निवास स्थान है और सरलता ऋतु जा ब्रह्म का निवास है बहुत बकवास में क्या रखा है सारे ज्ञान का सार इतना ही है क्या व्यास जी की मति है सरलता रितु जा आरज ये सारे सहजता जो है ना जीवन है कड़ कपट य है वो
है तूही जो दिखता तो तेरे अंदर बैठा है दुष्ट दिखता है तो तेरे अंदर दुष्ट बैठा है ब्रह्म दिखता तो तेरे अंदर ब्रह्म जग है विकास किससे होता है विकास का मूल मंत्र क्या है ममता का त्याग विकास का मूल है आसक्ति का त्याग विकास का मूल है आपाधापी का त्याग विकास का मूल है सच्चा विकास उसम विकास विकास हमने यह मकान करा है व अरे सोने की लंका वाला भी विकास को नहीं समझा तो तू क्या समझ रहा है सोने की लंका बनाना भी वास्तविक विकास नहीं हुआ तो तेरा यह बनाना वो बनाना क्या
विकास है विनाश की चीजों को कट्ठा करके विकास का जामा पहरा के परेशान होए चरित्र निर्माण ही विकास है भगवान में विश्रांति विकास है फिर जो हुआ ठीक है सुविधा शिष्य राजा को कहा कि मैंने तुम्हारे यहां चंद्रगुप्त मैंने अपनी अमानत जमा कराई थी मैं आया था तब मुझे मेरी अमानत लौटा दो अमानत क्या थी एक कंबल और एक लोटा लिया चंद्रगुप्त कहते हैं गुरु जी क्या बोले बस हम जहां से आए वहां जाएंगे सेवा का फल त्याग होता है राज महल में अब क्या करना है वहां कोई एक मील तक कोई फर्क नहीं य
तुम्हारी जिम्मेदारी र तुम आ सकते हो केवल मार्गदर्शन ईश्वर के संबंध जो आज्ञा चंद्रगुप्त ऐसे महापुरुष के मार्गदर्शन में भारत का शान मान बढ़ाने में सफल हो गया सेवा का फल त्याग लोटर कंबल लेकर चले कैसी सेवा का फल कुछ सेवा का फल अत आत्मा का संतोष कुछ चाहिए वा भाही तो सेवा क्या किया है तो दुकानदारी किया मैंने यह सेवा की बापू यह सेवा की अच्छा ठीक है वाह वाह जाओ सेवा को अहंकार सजाने में सेवा थोड़ी खर्ची जाती [संगीत] है शाबाशी पाने के लिए सेवा करना तो क्या हो सेवा सेवा है अपने आप
में सेवा पर्याप्त है शाबास मिले चाहे नाल मिले सेवा इतनी कमजोर है इतनी कंग है कि शाबाशी की आवश्यकता उसको सुबह नींद नींद खुल जाए लेकिन आंख ना खुले ओम शांति ओम प्रभ यही भगवान रहते हैं विश्रांति के मूल में भगवान ही है सुख मिल रहा है अंदर से भगवान का ही सुख है ना देखे बिना खाए बिना सुंगे बिना मस्ता बिना आलस्य बिना जो सुख है वही भगवान चैतन्य इससे बुद्धि प्रखर हो जाती वि विकारों में गिरने से भी बचा देती हे हरि हे हरि हे हरि बोलने का भाव जहां से आता है मूल
में वही है जब भगवान को याद करने तो भगवान हमको याद करते हमको तभी हम भगवान का नाम ले पाते हैं प्रभु जी हमसे नाम लेवा रहे वाह प्रभु प्रभु का नाम स्वाभाविक आ है तो समझ लेना कि प्रभु हमें अपना नाम जपाक शुद्ध कर रहे हैं अपने में मिला रहे हैं अपने साथ एकाकार कर रहे हैं मैं प्रभु का प्रभु मेरा ओम ओम आनंद वही तो है समझ गए एड्रेस हे हरि हे प्रभु हे गोविंद हे गोपाल निर् विकारी सुखाता है वो कहां से इसी का तो ईश्वर का ये श्लोक तो मुझे बहुत अच्छा
लगा सर्व जहा मृत्यु पदम आर्जव ब्रह्मण पदम ता वान ज्ञानम विषय प्रलाप किम करिश प्रलाप किम करति कुटिलता जितनी है वह मृत्यु का निवास स्थान है और सरलता ऋतुजा ब्रह्म का निवास स्थान है बहुत बगवा में क्या रखा है सारे ज्ञान का सार इतना ही तो है लो महाभारत का एक श्लोक भी रत्न है रत्न रत्न भी क्या होता है इसके आगे रतन बोलने से अपनी बुद्धि का छोटापन है तो ये तो य लोक तो क्या करें कुछ ना कुछ उपमा देने की आदत है तो बोलते बाकी रतन इसके आगे क्या हो हीरे क्या होते
हैं सरलता सच्चाई ईश्वर तोव है और लाया होगा किया होगा एक कपट मौत के तरफ ले जाता है आ और सरलता ईश्वर में स्थित कर देती है और ज्यादा बोलने की क्या जरूरत है ज्यादा विलाप की क्या जरूरत है विषय विकारों में बुद्धि भ्रष्ट हो जाती भगवत शांति में बुद्धि पुष्ट होती है