सो संगति जल जाए जिसमें कथा नहीं राम की बिन खेती के बार किस काम की वे नूर बेनूर भले जिस दिल जिस नूर में पिया की प्यास नहीं वो दिल बेदिल भला जिसमें हरि का वास नहीं हरि का हेत नहीं ज कर मिले तो राम मिले यो सब मिल तोत छा थयो दुनिया में दिल जो मतलब पूरो थयो तो छा थयो गीता तुमसे धंधा रो रोजगार घर बार नहीं छुड़ा गीता तुमसे आसक्ति छुड़ा है गीता तुमसे बेवकूफी छुड़ा है गीता तुमसे अज्ञान छुड़ा है गीता तुमसे अशांति छुड़ा है गीता तुमसे मोहिनी आसुरी और दैत्य की
वृत्तियां छुड़ाकर सुख शांति और दैवी वृति भरके तुमको परम देव के साथ अभिन्न कराने का संदेश देती है गीता या श्लोक पाठे न गीता श्लोक पाठे ना गोविंद स्मृति कीर्तना गोविंद स्मृति कीर्तना साधु दर्शन मात्रण साधु दर्शन मात्रण तीर्थ कोटि फलम लभ तीर्थ कोटि फलम लभ [संगीत] लीन होकर उस परमेश्वर के गुणगान करो अपने अहंकार को मत पोसो अपने आसुरी स्वभाव को कभी उभरने ना दो कितने भी अच्छे अच्छे बड़े बड़े काम करो लेकिन अंतर्यामी ईश्वर के आधीन होकर कर्म करना तो वह कर्म तुम्हारा सत्कर्म हो जाएगा तुम ईश्वर के विषय में सोचना और सारी
खलकत ईश्वर की संतान है इससे तुम्हारा चिंतन सात्विक हो जाएगा जिन पर ईश्वर पूर्ण कृपालु होता है उन्हें दैविक स्वभाव अच्छा लगता नदी जैसी दानशी ता सूर्य जैसी उदारता और पृथ्वी जैसी सहनशीलता समता अगर हृदय में उदय हो तो समझ लो वह परम संत है चाहे संत के वेश में हो चाहे गृहस्थ के वेश में हो उस ब्रह्म वेता को हमारा प्रणाम है उस पुरुष की जहां चरण रज पड़ती है वहां तीर्थ पवित्र होने को आते हैं नदी सी दान शलता सूर्य सी उदारता और पृथ्वी जैसी सहनशीलता और [संगीत] समता लौकिक वासनाओं में अंधा मन
अंतर्यामी ईश्वर की आवाज नहीं सुनता है प्रभात को और रात को सोते समय उस अंतर्यामी को प्रार्थना करो कि हम तुम्हारी आवाज सुने ईश्वर की आवाज सुनकर निर्णय करोगे तो इस संसार तुम्हारे लिए नंदन वन हो जाएगा यह संसार तुम्हारे लिए दुखाल नहीं हो जाएगा मोक्षा य हो जाएगा बंधन नहीं संसार सागर नहीं गोपद की नाई तुम्हारे लिए संसार हो [संगीत] जाएगा भन बुद्ध कहा करते थे के पांच बाता सबको याद रखनी चाहिए और उन पांच बातों से हम कभी नहीं बच सकेंगे यह सुमर रखेगा तो बुरे स्वभाव से बच निकलेगा वृद्ध अवस्था कभी भी
शुरू हो सकती है इस बात को याद रखें यवन का मद दूर हो जाएगा रोग कभी भी आक्रमण कर सकता है स्वास्थ्य का मद दूर हो जाएगा बुद्ध कहते हैं मृत्यु कभी भी आक्रमण कर सकती है और उससे बचना असंभव है जीने का मध और संग्रह की लालसा कम हो जाएगी वस्तु नाशवान और परिवर्तनशील है और वियोग जरूर होगा ऐसा स्मरण करने से अधिकार की लालसा मिटती जाएगी मेरा इस संस्था में भी प्रेसिडेंट पद है और मेरी फलानी संस्था में भी आप बूढ़े हो रहे हो फलानी संस्था में भी हाथ पसार रहे हैं ढंगी संस्था
में भी अध्यक्ष हो रहे हैं न जाने कितना कितना अधिकार जमाने की लालस वाला जीव कानपुर से खबर आई कि फलाना सेठ अमुक अमुक संस्था का यह बनने वाला था जब बनाने के लिए कोई आदमी गया तो बोले सेठ प्रेसिडेंट तो बनने वाले थे लेकिन आधा घंटा पहले ही वह मर गए हार्ट अटैक हो गया है मरण धर्मा मनुष्य कितनी किनी जगहों का अधिपति बनना चाहता है कितनी किनी वस्तुओं का मालिक बनना चाहता है बुद्ध कहते हैं वस्तु नाशवान और परिवर्तनशील है वियोग जरूर होगा ऐसा याद रखने से अधिकार की लालसा मिटने लगती है और
चित्त में शांति आएगी [संगीत] कर्मों का प्रतिफल मैं हूं बुद्ध कहते हैं जो भी कर्म है उसका प्रतिफल करता ही है विचार करने से विचार वाणी क्रिया कि अशुद्धि से आप बचने में सफल होंगे कर्मों का फल मुझे भोगना पड़ेगा इस बात का विचार करने से आपकी वाणी आपकी क्रिया और आपकी विचार दूषित विचार दूर होकर अच्छे विचार होने लगेंगे अर्थात यह पांच बातें बार-बार स्मरण करने योग्य है वृद्ध अवस्था कभी भी आएगी रोग कभी भी आ सकता है मृत्यु का आक्रमण जरूर होगा वस्तु नाशवान और परिवर्तनशील है और कर्मों का फल जरूर मिलता है
इन पांच बातों को जो ठीक से जानता है उसका आसुरी स्वभाव होगा तो दूर हो जा नहीं है तो देवी स्वभाव और खिलेगा चमकेगा हरि [संगीत] [संगीत] ओम मन की मलिन से रहित है दुनिया के जंजाल से अपने को मुक्त रूप में जानता है और जो तृष्णा से मुख है वह संत है ऐसे संत के दर्शन [संगीत] से जन समाज का उद्धार होता है संत शरण जो जन पड़े सो जन उद्धरण हार संत की निंदा नान का बहुर बहुर अवतार जो अपनी वस्तुओं में ममता भूलता है और अपने शरीर में अहं भूलता है तो उसके
अंतः कम में भगवान भगवान पना भूलकर उसको एक कर लेता है जीव ब्रह्म एक बन जाता है ऐसा ही चिंतन करिए जिससे जीव ब्रह्मा की एकता का पवित्र संस्कृति का सौंदर्य आपके हृदय में प्रकट [संगीत] हो विवेकानंद लिखते हैं कि बुद्ध ने बहुत अच्छा किया संस्कृत भाषा में जो गुड ज्ञान था उसका जन साधारण तक प्रचार प्रसार किया लेकिन एक गलती बुद्ध से हो गई कि उन्होंने संस्कृति संस्कृत शब्दों का पाली भाषा में प्रचार तो किया लेकिन संस्कृत का प्रचार नहीं कर पाए संस्कार दृढ़ नहीं हुए काम अधूरा रह गया संस्कृत भाषा देव भाषा है
इसके उच्चारण मात्र से देव दैवी गुण विकसित होते हैं और यह सारे मंत्र संस्कृत भाषा से ही उ अभी भी जहां दैवी स्वभाव है उनके जीवन में गुरु मंत्र का आदर जरूर होगा गुरु दीक्षा का आदर जरूर होगा गुरु दीक्षा विहीन जो जप तप करते हैं जैसे राख में वन अथवा शीला पर बीज बोना गीता में कृष्ण कहते हैं उत्तिष्ठ जाग्रत प्राप्य वरान बोध उपदेश ते ज्ञानम ज्ञानी न तत्व दर्शना उठ जाग उन ज्ञानवान को प्रसन्न कर तत्व विद्धि प्रण पाते न परि प्रश्न सेवया विधि सहित जा धन का योगन का सौंदर्य का सत्ता का
[संगीत] गर्व छोड़कर मध छोड़कर अपने दिल में दिल भर छुपाए उसका ज्ञान पाने के लिए ज्ञानवान की शरण जा धन बल जन बल आयु बल विद्या बल येन बड़ा पा देत नारायण सोई बड़ा जिनका प्रभु से हेत जिनका हरि से हेत जोधपुर का सम्राट छेने की थपड़ी बेचकर गुजारा करने वाले फली बाई की झोपड़ी पर जाता है यह है भारतीय संस्कृति के सम्राटों की समझ फली बाई के वस्त्रों पर तो बड़े-बड़े थड़े हैं लेकिन दिल पर कोई ठगड़ा नहीं है दिल कोई खंडित नहीं है ज्ञान में कोई खंडित पना नहीं है जो अपनी खंडित है
आय खंडित है कपड़े खंडित है चेहरा थोड़ा खंडित है टूटे हुए हैं बखी का की लेकिन हृदय अखंड के आनंद से भरा है और वीर दुर्गा दास उनका वफादार सैनिक उसने भी गजब करके दिखाया जोधपुर नरेश जब स्वर्गवास हो गया तो उसका नन्हा कुमार पृथ्वी से प्रजा यश वंसी को चाहती है तो उसके वंश को भी चाहती है देर सवेरी राजकुमार राजा बनेगा औरंगजेब ने चरस खेला दुर्गादास को कहा यशवंत सि का पुत्र दल्ली भेज दो हम उसको पढ़ाएंगे लिखाए योग्य बनेगा तब जोधपुर का राज्य उनके हवाले कर देंगे दुर्गादास जानते थे कि औरंगजेब कितना
कितना दुष्ट है कितना नालायक है कितना कपटी है बोला हुआ वचन ना पालने की उसकी आदत भी है जरा जरा बात में झूठ बोलना ये क्या जो अपने जिबान की नहीं रखता है तो अपने दिल की नहीं रखता है तो उसकी फिर भगवान क्या रखेगा समाज क्या रखेगा जरा सोचो वचन देने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए और पालने में देर नहीं करनी चाहिए आपके वचन की कीमत होगी आपके हृदय की कीमत होगी आपकी वाणी की कीमत होगी आप अपनी नजरों में नहीं गिरोगे नहीं तो अपनी नजरों में जो गिरा है वह लोगों की नजर में
कितना दिन चढ़ा रहेगा वीर दुर्गादास अपनी नजरों में नहीं गिरता है औरंगजेब ने कई बार उसको बुलावे भेजे प्रलोभन भेजे कि तुम्हें इतनी अशरफ दूंगा राजकुमार मेरे हवाले कर दे राजकुमार को छुपाते रहे पढ़ाते रहे तैयार करते रहे औरंगजेब की एक भी ना मानी वीर दुर्गा दास ने कहां तो पूरा शासन और कहां एक जोधपुर का नरेश का नौकर लेकिन अपना कर्तव्य जो करता है उसको आपके पास जो योग्यता है उस योग्यता को जितना जितना आप परहित में लगाते प्रकृति आपकी उतनी ही तेजी से योग्यता और मनोबल बढ़ाती है और आप अपनी योग्यता को जितना
संकीर्ण करते हैं उतनी ही कुंठित रह जाती है दुर्गादास की अकल बढ़ती गई निस्वार्थ होते गए उसके सारे सारे ख्वाब औरंगजेब के सारी की सारी कुट नीतियां और षडयंत्र धूल में मिलाता गया वो दिन आया पृथ्वी सिंह को राज तिलक हुआ राज अच्छे ढंग से चलने लगा राज दरबार में दुर्गादास के साथ मंत्रियों के साथ पृथ्वी सिंह बैठा था पृथ्वी सिंह ने कड़ी नजर डालते दुर्गादास को डांटते हुए कहा कि दुर्गादास तुम्हें पता था कि मैं यशवंत सिह का पुत्र पृथ्वी सिंह कुमार हूं देर सवेर में सम्राट बनूंगा यह तुम्हें पता था फिर भी तुमने
मेरा बड़ा कड़ा शासन मुझे कभी-कभी तुम थप्पड़ ठोक देते थे आप मेरे दिन आए समझे कान खोल के सुन लो तुम्हें राज दंड मिलना चाहिए राजा की तुम पिटाई करते थे उन हर राजा को तुम कभी-कभी कान से घसीटते थे और कभी कठोर आंखें दिखाते तो कभी चपत लगा देते थे अब तुम्हें मैं दंड सुनाता हूं ध्यान सुनो उस वफादार दुर्गादास ने कहा कि राजन आप राजा है आपको अधिकार है मैं आपका एक सैनिक हूं आप जो भी दंड देंगे स्वामी है मैं सेवक हूं मुझे स्वीकार है संकोच ना कीजिए इधर उधर ना देखिए सुना
दीजिए दंड फरमाइए पृथ्वी सिह ने कहा कि दंड यही है कि अभी अभी तुम्हें राज्य के पद से नौकरी के पद से चुप्त कर देता हूं और तुम रहोगे इसी राज्य में लेकिन भिक्षा ठीक रे का पात्र लेकर भिक्षा मांगकर अपना जीवन यापन करोगे और कोई आदेश है महाराज नहीं बस क्षत्रिय के लिए भीख मांगना यह मृत्यु दंड से कम नहीं जाओ ऐसा ही करो मृत्यु दंड तो है लेकिन कर्तव्य पालने का एक अपना भी तो फल है दुर्गादास एक झोपड़ी बनाकर भिक्षा कटोरा लेकर अपने शरीर को जिला है कुछ लोग बोलते धर्म के नाम
पर मर मिटना अच्छा है मैं इस बात पर राजी नहीं हूं मर मिटने की अपेक्षा जीते जीते जूझते रहना अच्छा है जय राम जी के स्वधर्म निधन श्रेयम यह लिखा है स्वधर्म में मर जाना अच्छा ही लिखा है लेकिन मरने के लिए स्वधर्म नहीं पालना है अथवा मौत आ रही है चलो स्वधर्म में मर जाएंगे ऐसे बुद्धों की नहीं मौत के गले नहीं लगना है जितना हो सके जूझते रहो जूते रहो जूझते जूते मर गए तो कोई फिकर नहीं लेकिन जूझते रहना अच्छा है दुर्गा दास भिक्षा मांग रहे एक कोठी में एक बड़े महल के
[संगीत] बाहर राज दरबार में जाने वाला सैनिकों से अंग रक्षकों से चाटुकार से घिरा हुआ सम्राट पृथ्वी सिंह देखता है खुले बाल फटे कपड़े दाढ़ी लंबी हो गई है घोड़े पर खड़े खड़े पूछता है क्यों दुर्गादास खुश तो हो ना दुर्गादास ने कहा बहुत खुश हूं राजन बाहर से तो फटे कपड़े हैं झोपड़ी में रहता हूं मिट्टी तेल केरोसिन कभी होता है लाल टन में कभी तो चांदनी से काम चला लेता हूं द्वार पर खड़ा रहता हूं कोई हिम्मत वाले तो भिक्षा दे देते हैं और राज दंड मिला है इसलिए कोई कायर लोग तो दरवाजा
ही बंद कर देते फिर फ भी मुझे संतोष है कभी खाता हूं कभी फाका फिर भी मुझे संतोष है मैं सुखी हूं [संगीत] राजन लोग बड़ी बड़ी अटार में जी रहे चांदी के बर्तनों में खाते किसी किसी के घर सोने के बर्तन है और निश्चिंत जी रहे अपने सम्राट की कुशलता के कारण औरंगजेब की दाल नहीं गलने देते हो तुम समराट मैं संतुष्ट हूं मैंने अपना कर्तव्य पाला है अगर तुम्हारा अनुशासन नहीं करता तुमसे मैं कड़क नहीं रहता तो मेरे जोधपुर वासियों को ऐसा सुयोग्य सम्राट नहीं दे सकता था अब मुझे अकेले को दुख भोगना
पड़ता है लेकिन पूरा मेरा राज्य तो सुखी है मेरा देश तो सुखी [प्रशंसा] है मुझे अपनी कर्तव्य निष्ठा का सुख है आनंद है माधुर्य है हृदय में आंखों में चमक है चेहरे पर भले थोड़ा सा कमजोरी दिखती है कुमार लेकिन मेरा आत्मा कमजोर नहीं हुआ लोग चेहरे को पुष्ट करके आत्मा कमजोर करते लेकिन राजन मैं अपनी आत्मा का घात नहीं करता हूं मुझे हजारों हजारों 700 फिर हजार दोज सात सा हजार असर पियों की लालच मिली थी मैंने उसको ठुकराया और स्वामी के पुत्र को एक दिन स्वामी बनाऊंगा वो स्वपना मेरा साकार देखता हूं मुझे
उस बात का संतोष है राजन भगवान की कथा के साथ मैं वीर दुर्गा दास की कथा करने में जरा भी संकोच अनुभव नहीं करता हूं भागवी गुण है वो फिर तो क्या होना था पृथ्वी सिंह का हृदय ऐसा तो फस रा जंप मारकर घोड़े से उतरा पैर पकड़ लिए मैं तो आपको जानता था किसी चढ़ाने वालों के चक्कर में आकर और आपकी स्वामी भक्ति देखने के भाव से मैंने आपसे कठोर व्यवहार किया मेरे पिता शरीर के पिता तो चले गए लेकिन आप मेरे पालक पिता है आप मुझे माफ करें तो आपकी मर्जी है और दंड
दे तो ये पृथ्वी से आपका हुकुम शिरोधार्य करता है दोनों का सतोगुण खिला है सतोगुण में दंड नहीं है जलसी नहीं है क्षमा है उदारता है पृथ्वी सिंह उनके चरणों पर गिरा है दुर्गादास के पृथ्वी सिंह ये नहीं सोचता कि मेरा नौकर है मैं इसके पैर कैसे पकडा मैं सम्राट हू और दुर्गादास जी नहीं सोचते कि मुझे इसने दंड दिया है मेरा शत्रु है दोनों का दैवी स्वभाव तो था और विकसित हुआ दोनों गले लगे हैं फिर तो क्या गंगा और यम बहती है देखने वालों का हृदय पसर गया रोमांचित हुए दोनों चलते चलते राजमहल
में गए और उसके राज्य के स्वास प्रजा देखकर प्रजा में भी दैविक गुण आने लगे जो संसार व्यवहार में पड़े हैं तो संसारी व्यवहार करते हुए राज काज का भार संभालते हुए हम लोगों को ईश्वर प्राप्ति कैसे हो हम लोग मुक्ति का अनुभव क करें मनुष्य जन्म का लक्ष्य तो मुक्ति है अगर मुक्ति का लक्ष्य नहीं तो मनुष्य पशु से भी बदतर है जिसने अपना गोल मुक्ति नहीं बनाया मरना पड़ेगा यह तो पक्की बात है और मरकर मुसलिम कीना प्रेत हो के भटके अथवा मरकर राजा अज की नाही अजगर बन जाए या कछुआ बन जाए
ये मनुष्य की बुद्धिमता का फल नहीं है बेवकूफी का फल है तो मनुष्य पैदा हुआ तो मरेगा य पक्की बात है और जो मिला है वह छूटेगा यह भी पक्की बात है तो फिर हमें अछूत आत्मा का परमात्मा का अनुभव कैसे हो मुक्ति कैसे मिले मृत्यु का झटका लगा शरीर यहां पड़ा रहा सूक्ष्म शरीर चंद्रमा के लोगों तक पहुंचता लोक लोक अंतर में फिर चंद्रमा के किरणों के द्वारा अथवा वृष्टि के द्वारा सूक्ष्म शरीर अन्न में फल में स्थित हुआ और अन्न फल मनुष्य ने खाया और पुरुष के द्वारा स्त्री के गर्भ में जाने को
पसार हुआ लेकिन हर प्राणी को तुरंत गर्भ नहीं मिलता है कई बार वह गर्भ में जाते गर्भ नहीं मिलता और नाली में बह जाता है गटर में बह जाता है और फिर वो नहीं कहते किय भूतपूर्व सम्राट था या भूतपूर्व अमुक था या अमुक था तो युधिस्टर बुद्धिमान है संतों का संग मूर्ख आदमी को अथवा पापी आदमी को होता ही नहीं मिले तो उसका फायदा भी नहीं ले सकता है धन मिलना बड़ी बात नहीं है सत्ता मिलना बड़ी बात नहीं है लेकिन जिसके जीवन में सत्संग और हरि कथा मिल गई वो बहुत बड़ी बात [प्रशंसा]
है तीन चीजें तो पापियों को दुष्टों को धर्मात्मा को भी होती है दो चीजें बड़े भाग्य से मिलती है सुत दरा और संपत्ति पापी को भी होए मुसलिम जैसे शोषक के पास हिटलर और सिकंदर रावण और कंस जैसे के पास भी है संपत्ति संपत्ति मिल गई कोई बड़ी बात नहीं और अपने को बड़ा भाग्यशाली मत मानिए संपत्ति के साथ सतम है और सतम के साथ सत्संग है तो तू भाग्यशाली है नहीं तो भी भाग्यशाली बनने में कसरत [प्रशंसा] करो 100 काम छोड़कर भोजन कर लो हजार काम छोड़कर टाइम से नहा लो नहीं तो इतवार का
टाइम इतवार का स्नान भटक जाता है ऐसे स्नान भटक जाता है 100 काम छोड़कर भोजन कर लो हजार काम छोड़कर स्नान कर लो लाख काम छोड़कर दान पुण कर लो नहीं तो बेईमान हो जाएगा लेकिन करोड़ काम छोड़कर हरि का ज्ञान और हरि का ध्यान धर लो तो इसी में कल्याण शतम ब्याह भक्तवत्सल है वे अपने साथ कितने बेवफा है अपने साथ कितना अन्याय करते हैं तुलसीदास जी ऐसे लोगों को सावधान करते हैं सर धुनि धुनि पछ ताव मृत्यु जब गला दबोचे गी सर धुन धुन कर जीव पछता कर जाएगा इतनी मील इतने कारखाने इतने
आश्रम इतने उद्योग इतने फलाना है सब पराय हो जाते मृत्यु के एक झटके में राजस्थान में सिरोही डिस्ट्रिक्ट है सिरोही डिस्ट्रिक्ट में सिरोही डिस्ट्रिक्ट आए आ बोलो सिरोई डिस्ट्रिक्ट में नाना भीमाना एक छोटा सा गांव इलाका है वहां एक कुंभार रहता था कुंभार का लड़का 181 साल का था व गधे पर मिट्टी लाद लाद के लाता था यह तुम्हारी कथा बता रहा हूं ध्यान से सुनना तुम्हारी कथा बता रहा हूं व मिट्टी ला के लाता था एक दिन नगर में कोई उच्च कोटि के संत केवल कथाकार नहीं संत भी थे और जोगी भी थे उनके
सत्संग से वह लड़का प्रभावित हुआ दीक्षा लिया और दीक्षा ईश्वर प्राप्ति तो जब होगी तब होगी में अगले जन्म में कौन था मुझे वह टेक्निक बताई इस ध्यान की गुरु जी गुरु जी ने रिवर्स ध्यान सिखा दिया आज से 10 साल पहले कैसा था यह भावना करते करते पहले एकाग्र हो फिर भावना करके वह देख तो 18 साल वाला अपने को 8 साल का देखेगा और वही मॉडल पता तो चलेगा तो समझ लेना सही ध्यान हो रहा है फिर सात साल का साल का दो साल का एक साल का फिर कल्पना कर मां के गर्भ
में कैसा था बुद्ध और महावीर ऐसा ध्यान सिखाते थे जब मां के गर्भ वास का दर्शन होता था तो फिर लोगों को वैराग्य हो जाता था महावीर के पास 4 हजार भिक्षुक साधना में लगते और बुद्ध के पास 100 हज लोग अच्छे अच्छे लोग रिवर्स ध्यान सिखा दिया उस कुमार के बेटे को और अगले जन्म में मैं क्या था यह भी देख ले अगले जन्म में मैं क्या था दिखा के मैं तो करोड़ी मल कलकाता का दो फैक्ट्रियों का मालिक और यहां गधे पर मिट्टी लाद रहा हूं तेरे की 22 रप अपना और दूसरा इधर
उधर से पैसा लेकर व हावड़ा स्टेशन पर पहुंच गया कलकाते पहुंच गया और जाकर दरवाजा खटखटाया अंदर से आवाज आया कौन है तो यह समझ गया कि मेरे बड़े बेटे का आवाज है उसने बोला मैं तेरा अगले जन्म का बाप हूं जरा दरवाजा खोल लड़के ने भूतपूर्व बाप को तो नहीं पहचाना बड़ी-बड़ी आंखें दिखाई वो कुंभर का बेटा बोलता है गुस्से मत हो मैं तेरा अगले जन्म का बाप हूं तुम्हारा और हमारा जो सीक्रेट बात था अमुक पैसे अमुक ढंग से रखना और अमुक जगह सोने की असर पिया गाड़ना यह तू और मैं ही जानता
था और मैं तेरे को बता रहा हूं तिजोरी में जो चोर खाना है उस खाने में हम लोग कैसे कैसे रखते थे और किसी के घर हम लोग कागजात कैसे रखते थे यह तू और मैं ही जानता हूं बेटे ने फील किया महसूस किया कि मानो ना मानो ही वाज द करोड़ी मल मानो ना मानो अगले जन्म का पिता है दूसरे भाई को बुलाया मां को बुलाया तब वह लड़का कहता है कि देख अगले जन्म में मैं करोड़ी मल था और तेरा मेरा जब शादी हुआ था तो फेरे फिरते समय मैंने हाथ खिस काया था
तो तुमने पकड़ा फिर मैंने चुंडी मारी थी तुमने इतनी चुंडी मारी थी मैंने इतनी चुंडी मारी थी वो तो बेटे भी नहीं जानते और तेरे मां-बाप भी नहीं जानते तेरा मेरा सीक्रेट बात है बोल याद रख मैं था कि नहीं तेरा पति डोकरी ने सोचा कि बात तो सच्ची है फिर सबने एक साथ पूछा अब तुम्हारी मर्जी क्या है उसने बोला मर्जी क्या तुम मेरे परिवार हो मैं अगले जन्म का करोड़ीमल सेठ हूं अब मैं यहीं रहता हूं तुम्हारे साथ उन्होंने कहा चाहिए तो 00 ले जाओ एक दो गधा बढ़ा दो और वहीं मरो अब
तुम यहां नहीं रह सकते [प्रशंसा] हो जब तक तुम्हारा यह शरीर है तब तक इधर की चीजें तुम्हारी दिखती है मृत्यु का झटका होते ही सब एक साथ पराई हो जाती है सब एक साथ पराई हो जाए इसके पहले जिसका सब कुछ है वोह तुम्हारा हो जाए इसलिए तुम्हें सत्संग करना [प्रशंसा] चाहिए अब वोह तो करोड़ मल की बात है आप बंबई के फ्लैट में आ जाओ एक बार मरकर फिर अहमदाबाद जन्म और फिर आ जाओ कि मैंने दो करोड़ रुपए में फ्लैट लिया था और इतने आन दिए थे और इतना ऑफिशल था सब बताओ
क्या आपको रहने देंगे क्या फ्लैट में गो गई नहीं तो मेंटल हॉस्पिटल में भर्ती करा दूंगा मेरा फ्लैट है बेटा बोलेगा मेरा है बोले भाई मैं तेरा बाप हूं मैंने पैसे कर 30 लाख का तो ऑफिशियल स्टम पेपर हुआ था और एक एक करोड़ और 70 लाखन दिए थे ऐसे ऐसे दिए थे बोले वो सब बात ठीक है चाहिए तो 200 500 ले जाओ अहमदाबाद में या फलानी जगह जो करते हो करो लेकिन अब फ्लैट में नहीं आ सकते है कि नहीं बात सच्ची सच्ची ना लगे तो फिर आप ट्राई करके देख लेना नहीं तो
मान लो जय राम जी बोलना पड़ेगा जो लोग बोलते हैं हमें टाइम नहीं मिलता है सत्संग के लिए उन पर दया आती कुछ लोग ऐसा बोलते हैं हमने क्या पाप किया कि सत्संग सुने जिसने पाप किया है तो पाप मिटाने के लिए सत्संग सुने नहीं सत्संग से केवल पाप नहीं मिटते हैं सत्संग से पाप तो मिटते हैं लेकिन ज्ञान मिलता है प्रेम मिलता है माधुर्य मिलता है भगवान शिव ने क्या पाप किया था शिवजी पार्वती को ले जाकर अगस्त ऋषि के आश्रम में सत्संग सुनते भगवान राम ने ऐसे क्या पाप किए थे सीता को ले
जाकर वशिष्ठ के चरणों में सत्संग सुनते हैं तो तुम तुम्हारी सीता को लाकर सत्संग सुनते हो तो क्या बड़ी बात हो गई जय राम जी करोड़ काम छोड़कर भी सत्संग सुनना चाहिए बिनु सत्संग विवेक न होवई सत्संग के बिना आपको असली चीज का विवेक नहीं होगा नकली जो शरीर मरने वाला है उसी के पीछे आप पूरी जिंदगी खपा देंगे अपने लिए आप टाइम नहीं निकाल सकेंगे बिना सत्संग के विवेक नहीं होगा बिन सत्संग विवेक न हो राम कृपा बिन सुलभ न सोई तुमने जरूर गरीबों की सेवा की होगी किसी संत का देवी कार्य जरा सा
कुछ न कुछ किया होगा इसलिए परमात्मा तुम्हारे अंतःकरण में प्रसन्न हुआ है और तब आपको सत्संग में आ रुचि ई ईश्वर की कृपा के बिना सत्संग में आने की रुचि नहीं होती और आपके कोई ना कोई निष्काम कर्म ईश्वर को स्वीकार हो गए हैं चाहे फिर मां-बाप के आंसू पहुंचे हो चाहे आपने नॉनवेज को दूर ही रखा हो चाहे आपने और कोई सिद्धांत को पकड़ रखा हो दैविक सिद्धांत को कुछ ना कुछ आपके द्वारा बढ़िया काम हुआ है चाहे संतों की सेवा की हो अपना हाउस संतों की सेवा में धर दिया हो इस बहाने तुमको
सत्संग में रुचि होती अपना कुछ ना कुछ तुमने समय शक्ति योग्यता निष्काम भाव से ईश्वर प्रीति अर्थ तुमने खर्ची है और अंतर्यामी ईश्वर ने तुम्हारी सेवा स्वीकार कर ली है तभी आपको सत्संग में जाने की रुचि होगी नहीं तो पापी आदमी को रुचि भी नहीं होती है अति कामी अति क्रोधी अति लोभी अति मोही इते भक्ति न होए जो अति लोभी है अति कामी है अति क्रोधी है अति मोही है उनसे यह भक्ति नहीं हो सकती भक्ति करे कोई सूरमा जाति वर्ण कुल खोई तो भगवान युद्ध के मैदान में अपने प्रिय अर्जुन के लिए सत्संग
से बढ़कर कोई चीज नहीं मानते जानते तना बिजी समय होगा दोनों तरफ की सेनाएं मार काटने के लिए तैयार है और वहां सत्संग की जरूरत देखी हम भी तो दो सेनाओं के बीच जी रहे हैं हमारे वि सले कीटाणु और स्वास्थ्य की रक्षा करने वाले कीटाणु वे भी सले कीटाणु की हमको तब तक परवाह नहीं है जब तक हमारा विल पावर हमारी रोग प्रतिकारक शक्ति मजबूत है तब तक भी इसलिए कीटाणु की हमको चिंता ही नहीं पता ही नहीं कौन से कोने में पड़े जब हमारी शक्ति क्षीण हो जाती है तब वह हमारा गला दबोच
दे हैं और रोग रोगों में आ क्रस्त कते ऐसे ही हमारे बुरे विचार और अच्छे विचार इससे भी तो यह भी तो एक प्रकार का युद्ध है एक तरफ पांडव एकत कौरव तो अच्छे विचार पुष्ट होंगे तो बुरे विचार दबे रहेंगे सुकड़ जाएंगे नष्ट होते जाएंगे अगर अच्छे विचार सत्संग से नहीं मिले तो बुरे विचार हावी हो जाए जाएंगे जरा सा यह कर लो जरा सा वो कर लो ऐसे करते करते बुरे विचारों का हिस्सा प्रकट होगा तो सुख के साधनों में भी आदमी देर सवेर दुख की खाई में गिर जाता है और अच्छे विचार
मजबूत है तो दुख की खाई में पड़ा हुआ आदमी भी देर सवेर सुख के शिखर सर कर देता है इसलिए कहते हैं स काम छोड़कर भोजन कर लो हजार काम छोड़कर स्नान कर लो लाख काम छोड़कर दान पुण कर लो लेकिन करोड़ काम छोड़कर हरि का ज्ञान और हरि का ध्यान धर लो इसी में तुम्हारा मंगल है इसी में तुम्हारा कल्याण [प्रशंसा] है भगवान कहते हैं तुम कर्म करते करते कैसे मुझे पा सकते हो और नारद जी कहते हैं युधिस्टर को हे राजन ग्रस्त जीवन में परमात्मा प्राप्ति का उपाय यह है कि गृहस्ती को चाहिए
कि अपना समय का दसवा हिस्सा परमात्मा के चिंतन ध्यान में लगाए अपनी कमाई का दसवा हिस्सा परमात्मा की प्रीति अर्थ सत्कर्म में लगाए और ग्रहस्ती को चाहिए कि कभी कभार वर्ष में महीना दो महीना विरक्त परमात्मा प्राप्त महापुरुषों के चरणों में निर्दोष बालक की नहीं जाकर रहे मैं बड़ा सेठ हूं मैं बड़ा नेता हूं मैं बड़ा ऑफिसर हूं यह बड़पन को किनारे छोड़कर निर्दोष हृदय से महापुरुषों का संग करें तो उसके चित्त का जो छुपा हुआ निर्दोष सुख है निर्दोष आनंद है निर्दोष माधुर्य है वह प्रकट होगा अगर उसके पास धन वैभव है तो अपने
धन अकल और वैभव से गरीब गुरुओं की तो सेवा करें वो होता है दया और श्रेष्ठ पुरुषों की सेवा में जो धन लगता है उसको बोलते हैं दान तो दान और धर्म करें दया धर्म करे दया दान धर्म करें लेकिन दया दन धर्म का फल अगर वह स्वर्ग चाहता है तो उसे स्वर्ग मिलेगा यश चाहता है तो उसे यश मिलेगा लेकिन ये छोटी चीजें हैं उसका फल परमात्मा की भक्ति चाहे तो उसके हृदय में परमात्मा प्रकट होगा देव स अना शिता कर्म फलम कार्यम कर्म करो तिय स सन्यासी च योगी च न निरा अग्नि चक्रिया
जो आसक्ति रहित होकर करने योग्य सत्कर्म करता है और उसको ईश्वर प्रीति अर्थ अर्पण कर देता है वह सन्यासी है वह योगी है केवल कपड़ा बदलने से या क्रिया छोड़ने से संन्यास नहीं होता कर्म करते हुए भी वह सन्यास और योग के फल को पा सकता है यह बात कृष्ण ने कही जहां जहां आपको कर्म में उबान या थकान आती है वहां आपका कर्म आपके लिए बोजा बन जाता है लेकिन कर्म में जब योग मिल जाता है कर्म में जब अनासक्ति योग मिल जाता है तो वह कर्म आपको बंधनों से मुक्त करने का सामर्थ्य रखता
है आप बैंक चलाते खूब चलाई एक बैंक चलाते नहीं 10 बनाइए कोई मना नहीं ईसाई धर्म और हिंदू धर्म में एक बात का बड़ा फासला है ध्यान से समझ ले ईसाई धर्म कहता है कि सुई की नोक से ऊंट पसार हो सकता है लेकिन सेठ लोग भगवान के दरबार से पसार नहीं हो सकते पास नहीं हो सकते हिंदू धर्म कहता है के जो सेठ लोक है और जिनमें पवित्रता और सत्कर्म है वे तो भगवान के खास प्यारे हैं इसलिए भगवान अपने प्यारे योगियों को सेठ और धर्मात्मा के घर जन्म देता है हिंदू धर्म कहता है
जो सेठों के अंदर सत्संग या सत्कर्म है वेसे लोग भगवान के विशेष प्यारे हैं सुचि नाम श्री मताम गेहे योग भ्रष्ट होप जायते अथवा योगी नामे व कुले भवति धीमता मेरा भजन करते करते यात्रा अधूरी है वह मर गया है तो उसको स्वर्ग का सुख मुफत में मिलेगा उसका पुण्य मुण्य नष्ट नहीं होता है अधिक भजन है तो ब्रह्मलोक का वैभव भोगे फिर सूच नाम श्री मताम गे है पवित्र श्रीमान के घर मेरे भक्त को जन्म देता हूं अगर भगवान को धनवान से एलर्जी होती तो अपने प्यारे भक्त को धनवान के घर क्यों जन्म देते
बुद्ध को कैसे जन्म देते सम्राट के घर और मेरे को भगवान नगर सेठ के घर क्यों भेजते अगर ईश्वर को एलर्जी होती तो हमारा जन्म हुआ उसके पहले हमारे पिता के पास एक सौदागर बड़ा झूला देने आया बोले आप स्वीकार करो मेरे पिताजी ने कहा हमारे पास कमी नहीं है हम क्षत्रिय हैं दान लेना हमारा अधिकार बोले दान नहीं है हमको रात को गजब की प्रेरणा हुई है आपके घर कोई बालक का जन्म होने वाला है पिताजी ने कहा तुमको कैसे पता चला बो स्वपना आया है हम जन्म उसके प पहले जो सौदागर के द्वारा
झूला झूलने को दे जाता है पहुंच देता है उसको कितना प्यार होगा अपने भक्त के लिए और श्रीमान भक्त के [प्रशंसा] लिए हम लोग माता के गोद में है उसके पहले माता के शरीर में दूध बना बनाने वाले ने कितना हमारा ख्याल किया होगा जितना पियो जब पियो मुंह घुमा दो झूठा नहीं माना जाता है अशुद्ध नहीं माना जाता है बिगड़ नहीं जाता है अपवित्र नहीं माना जाता है फ्रिज हो बोतल हो थैली हो थैली का बाप हो एक बार खोला फिर बिगड़ जाता है 10 दिन 15 दिन महीना नहीं रहता लेकिन यहां तो मां
के शरीर में कैसा दूध जब चाहिए पियो मुंह घुमा दिया तो बस शुद्ध का शुद्ध कैसी सुंदर व्यवस्था है ऐसे ईश्वर के लिए जिनके पास समय नहीं है उनके भाग्य को शास्त्र धिक काता है मनुष्य रूपे मृगा चरती वे मनुष्य रूप में मृग है जैसे मृग हरा हरा घास खाने में मशगूल हो जाता है ऐसे वह संसार की हिक चीजों में मशगूल हो जाते हैं मृग को व चिंता शिकारी बाण मारता और मर जाता है ऐसे लोग को व चिंता काल पकड़ता और सब यहां छोड़कर चले जाते हैं एक सम्राट था उसकी आदत थी जोकर
को बुलाता कुछ जोक्स करें मजाक करें और इनाम में नाम दे और चले जाए एक मश्क को राजा ने एक छड़ी दे दी चांदी के हाथे वाली बोले तेरे से ज्यादा कोई बेवकूफ हो तो उसको दे देना बूढ़ा राजा बीमार पड़ा हकीम डॉक्टरों ने हाथ ऊपर कर दिए जो तुम्हारे निकटवर्ती उनसे मिल लो नहीं तो फिर मरने के बाद प्रेत होकर भटकना पड़ेगा राजा ने मिलने वालों की छूट छाट रख दी वह मस्करा भी मिलने को आया मस्करा ने कहा राजा अब तो तुम्हारी यात्रा ऐसी होने वाली है कि जहां फिर आप आएंगे नहीं ऐसी
दूर की यात्रा पर निकल के जा रहे हो तो वहां के लिए कुछ तैयारी की है बोले क्या तया बोले आदमी एक गांव से दूसरे गांव जाता है एक कंट्री से दूसरी कंट्री जाता है तभी कुछ नान कुछ सामान बैगेज कुछ ना कुछ लगेज ले जाता है तो आप तो ऐसी जगह जा रहे कि वापस लौटेंगे नहीं तो आपने कोई पुण्याई साथ में ली है कोई मंत्र दिक्षा का धन है कोई सत्पुरुष के ज्ञान का धन है कोई सत्संग का धन है कोई सेवा का धन है कोई पुण्य का धन है जो आपको वहां काम
आए रक्षा करे राजा बोलता है यह तो कुछ नहीं किया मस्करा ने उठाकर वो छड़ी हाथ में दे दी बोले लीजिए आप इनाम बोले मैंने तो कहा था किसी तेरे से ज्यादा मूर्ख को देना बोले मुझसे ज्यादा मूर्ख मैंने आपको पाया इसलिए मैं आपको ही दिए जा रहा हूं छोटी मोटी यात्रा के लिए इतनी तैयारी करते हो इतनी महान यात्रा के लिए तुमने कोई कमाई नहीं की इससे ज्यादा बेवकूफी कहां मिलेगी मुझे ये आप संभालिए आप इसके अधिकारी इनाम के अपने जीवन में वह प्रसाद की आवश्यकता है जो प्रसाद मृत्यु की चोटों से हमारी रक्षा
करें जो प्रसाद जन्म मरण के रकों से हमारी रक्षा करें जो प्रसाद अशांति से हमारी रक्षा करें जो प्रसाद माता के गर्भ में जाते जाते फिर नालियों में भटकने से हमारी रक्षा करें ऐसे प्रसाद की मनुष्य जीवन को त आवश्यकता है कृष्ण कहते हैं प्रसादे सर्व दुखा नाम हानि रसोप जायते प्रसन्न चेत सोयास बुद्धि पर्य बति प्रसाद से सारे दुख दूर होते हैं और बुद्धि उस प्रसाद स्वरूप परमात्मा में स्थित होती है कर्म करते हुए कैसे स्थित हो यह सवाल है संसार में रहते हुए कैसे स्थित हो मिल चलाते हुए कैसे स्थित और घर गांठ
चलाते हुए कैसे हमारी बुद्धि उस परमात्मा के सुख में स्थित हो उसका उपाय खुले आम बताने वाला अगर कोई ग्रंथ है युद्ध के मैदान में बताने वाला अगर कोई ग्रंथ है तो वह गीता [प्रशंसा] है कनाडा का प्राइम मिनिस्टर ट्रूडो लिखता है कि मैंने अंजलि पढ़ा और ग्रंथ पढ़े बाइबल आदि पढ़े लेकिन गीता ने तो कमाल कर दिया मरने के बाद मुक्ति देने वाला ग्रंथ नहीं तो जीते जी मुक्ति देने वाला ग्रंथ है कर्म के व्यवहार जगत में कर्म क्षेत्र में भी मुक्ति देने वाला ग्रंथ है कनेडा का प्राइम मिनिस्टर मिस्टर ट्रूडो कहता है गीता
इज नॉट द बाइबल ऑफ द हिंदू इजम बट इट इज द बाइबल ऑफ द म्युनिटी यह मनुष्य मात्र का धर्म ग्रंथ है जब एकांत में गया तो दूध के लिए गाय और आध्यात्मिक रा के लिए उपनिषद और गीता लेकर गया ठू गीता का श्लोक है अना शिता कर्म फलम अना शिता कर्म फलम कार्यम कर्म करोति अ कार्य कर्म करोति स सन्यासी च योगी च स सन्यासी च गयो न निराग निर चा क्रय न निराग निक कर्म फल का आश्रय ना लेकर जो कर्तव्य कर्म करता है वही सन्यासी तथा योगी है और केवल अग्नि का त्याग
करके करने वाला केवल अग्नि का त्याग करने वाला सन्यासी नहीं होता तथा केवल क्रियाओं का त्याग करने वाला योग नहीं होता है आप कर्म तो करो लेकिन कर्म में अपना प्राण डाल दो कर्म में अपना रस भर दो तो आपके लिए कर्म व कर्म योग बन जाएगा बच्चे को खेलने में कितनी सारी मेहनत होती है फिर भी उसको वह मेहनत नहीं दिखती है लेकिन उस बच्चे को कहो कि लो जाओ आधा किलोमीटर फलानी जगह से वो इतनी बोतल उठा के आओ दो दूध की तो उस थक जाएगा ना बोलेगा बच्ची को बोला ले दूध दूध
दूध वालो आयो एक लीटर दूध लेया चौथा मारा थी दूध नीचे मारा थी नहीं उऊ पड़ वो मुन्नी को थोड़ी देर के बाद अपना मुन्ना भाई के लिए प्यार है वो आठ में मार ले गई उसको एक लीटर दूध तुझे चौथे मार ले जाने में कठिनाई लग रही थी और भाई को आठ में माड़े ले रही तू थकी नहीं बोले नहीं नहीं इसमें तो वजन नहीं है बड़ा हल्का फुल्का है जहां रस आता है वहां बोजे का अनुभव नहीं होता वहां दुख और कष्ट का अनुभव नहीं होता तो आप कर्म में रस पैदा कीजिए जब
रसोई घर में जाए तो यह ना सोचे कि हाय रे रस कर पड़े नहीं पति के रूप में पुत्र के रूप में परिवार के रूप में मेरे ठाकुर जी के लिए भोजन बनाती अगर कोई प्रिय व्यक्ति आता है आपके य भोजन करने तो आपके हाथों में और पैरों में पायल बजने लगती है कितना रसोड़ा साफ सुथरा हो जाता है और झरी झवा कम कि तो थे अगर अत्यंत प्रिय मित्र आता है प्रिय सहेली आती है प्रिय ते से आता है और उसको आपने आमंत्रण दे रखे दे रखे और आपका आमंत्रण स्वीकार करके वह आ रहा
है तो आप घर को कितना साफ सुथरा करते क्या थकान लगती है उस समय बोजा लगता है नौकरी जैसा लगता है न जिसके प्रति प्रेम नहीं है और आ रहा है इनकम टैक्स का ऑफिसर ऑडिट करने के लिए आप साफ सुथरा तो करेंगे लेकिन अंदर से करेंगे कि मरे मुआ जल्दी जाए तो अच्छा साहब चाय पीजिए साहब यह कीजिए साहब आइसक्रीम खाइए अंदर से मरे जल्दी जाए क्योंकि उसके लिए आपको प्रेम नहीं उसके लिए आप फॉर्मेलिटी करते और जिसके लिए आपको प्रेम है इसके उसके लिए आपका उसम प्राण जुड़ जाता है आपका हृदय उसमें सींचा
जाता है वह आपको कर्म थकाने वाला नहीं होता है वह कर्म रस देने वाला होता है बापू जी हमारा अंगड़ मकान साफ करो बापू जी हमारे यह साफ करो व साफ करो व आपका कर्म योग बन जाता है सुख देने वाला दे हो जाता है आसक्ति को मिटाने वाला हो जाता है परमात्मा से मिलाने वाला तुम्हारा कर्म हो जाता [प्रशंसा] है जब राज्यपाल आता है या मुख्यमंत्री आता है तो नगरपालिका की नींद उड़ जाती है और काम में लग जाती रास्ते साफ होने लगते हैं गटर के ढक्कन खुलने लगते हैं आसपास की कचरा पेटिया क्लियर
होने लगती है तो क्या एक व्यक्ति में भगवान है लाखों लाखों नगर जन भगवान के रूप में दिखेंगे तब नगरपाल की सेवा नगरपालिका की सेवा भगवान की सेवा हो जाएगी चह और गंदगी और बदबू चाह और मकान तो दो दो करोड़ रुपए के लेकिन अंदर आसपास में देखो तो तोबा तोबा केरलेससवीडियो [संगीत] हुआ कर्म तत्परता से करे जो अपना कर्तव्य तत्परता से नहीं करता वह भक्ति क्या तत्परता से करेगा वह ईश्वर को क्या पाएगा तत्परता से और मुक्ति क्या पाएगा तत्परता से राम कृष्ण परमहंस समाधि से उतरे शिष्य बैंगन ले आया है कितने का लाया
बोले दो आने का मूर्ख है नालायक है बेवकूफ है ये छह पैसे शेर मिलने चाहिए और कल के हैं बैंगन ताजे नहीं है जिस संत ने अशरफिया तक नदी में फवा दी वोह दो पैसा चेला फालतू खर्च के आया है और बैंगन बासी लाया उसको डांटने में संकोच नहीं करते कर्म करो तो तत्परता से करो बुहारी लगाते कहीं कचरा रह जाता है राम कृष्ण कड़क ढंग से डांटते हैं आप कर्म में अपना मन लगाइए कर्म में अपना प्राण लगाइए कर्म में अपने कर्मेश परमेश्वर को देखिए तो आपका कर्म आपको बंधन से मुक्त कर देगा जन्ना
भाई आटा पिसती है आटा पिसते पिसते उसको समय तक नहीं मिलता लेकिन वह सोचती है कि नामदेव के यहां आएंगे संत भगवान नारायण हरि नारायण हरि स्वधर्म निधन श्रेय पर धर्म भयावह अपने धर्म में मर जाना अच्छा पर्या धर्म भयावह है अगर तुम वाणिज्य व्यापार करते हो तो व्यापार में इतना प्रेम से तत्परता से व्यापार करो कि आने वाले ग्राहक के रूप में मेरा ठाकुर जी है उसको वस्तु अच्छी मिले और मेरी आजीविका हो ऐसा नहीं कि उसका गला कटे और मैं ऐश करता रहूं नहीं इस प्रकार का आप वाणिज्य करते हैं तो वह वाणिज्य
आपको मुक्ति दई हो जाएगा लेकिन आपने तो बड़ा बड़ा मेला और बड़ा बड़ा खड़ा कर दिया आजा फसा जा केवल यश के लिए धन के लिए वाहवाही के लिए आप अगर उपदेश या लेक्चर करते हैं तो आपका लेक्चर बंधन कारी होगा श्रोताओं के रूप में मेरा नारायण है उसे आनंद मिले उसे ज्ञान मिले उसे माधुर्य मिले और उन्हें मुक्ति मिले इस भाव से अगर आप सत्संग करते हैं तो आपका यह सत्संग भी कर्म योग है मुक्ति दई है जाति भेद जाति विग्रह की आग लगाकर कुर्सी चाहते तो आपके लिए बंधन है लेकिन सच्चाई के साम
जूठा के सामने आवाज उठाते और समाज के शोषण के आगे आप बुलंद आवाज उठाते हैं तो वह आपका भाषण कर्म योग हो जाएगा जय राम जी की कर्म तो आप करो लेकिन कर्म को बंधन करने वाला कर्म मत बनाओ कर्म को मुक्ति देने वाला बनाओ कर्मों से कर्म आसक्ति काटो कर्म आसक्ति फल आसक्ति करने की आ शक्ति न करने की आसक्ति यह सब बंधन है तुम तो कर्म को धर्म बना लो तुम्हारा कर्म धर्म हो जाए कर्म योग बन जाए अना शिता कर्म फलम जो फल की आकांक्षा आशा आशा से कर्म करते हैं उनको कर्म
करने की योग्यता जो निखरने चाहिए वह नहीं निखरती वासना और आशा आशा में वे संकीर्ण हो जाती है उनकी योग्यता लेकिन जितनी आपकी योग्यता निष्काम भाव से आप कर्म करते जाते हैं तो आपकी वो योग्यता है अनंत गुनी विकसित हो जाती तुच्छ आत्मा में और महात्मा में यह फर्क है जो तुच्छ फल की इच्छा को केंद्रित करके कर्म करते हैं उनका विकास तुच्छ होता है थोड़ा होता है लेकिन जो ईश्वर की प्रीति के लिए समाज रूपी प्रभु की सेवा के लिए कर्म करते हैं वे महात्मा बन जाते हैं उनकी योग्यता निखर आती [प्रशंसा] है हम
यह करें लेकिन हमें क्या फायदा अरे मूर्खा नंदन खाली रुपए पैसे ही फायदा होता है कर्म करते समय अगर निस्वार्थ है तो हृदय में रस आता है आनंद आता है माधुर्य आता है आपकी योग्यता निखरती है लेकिन हमको यह नहीं मिले तो हम जिएंगे कैसे अरे मोपेड काम में आती तो उसको पेट्रोल मिलता है ट्रैक्टर काम में आता है तो उसको डीजल मिलता है यहां तक कि कूड़ा रखने का डिब्बा काम में आता है तो उसको भी रहने की जगह मिलती है तो तू अगर ईश्वर और समाज के काम में आएगा तो तुझे रहने और
खाने की जगह नहीं मिलेगी इस बात में तू क्यों उलझता है यार तुम जितना जितना काम में आते हो उतना उतना तुम्हारे लिए तुम्हारी सेवा के लिए प्रकृति की वस्तुएं खींच के तुम्हारे पास आ जाएगी तुम जितने उपयोगी बनते हो तुम चपरासी की रैंक के उपयोगी हो तो तुम्हारे लिए एक छोटा क्वार्टर लेकिन तुम डायरेक्टर के उपयोग की सेवा करते हो तो तुम्हारे लिए हाउस और चपरासी और ी और पेट्रोल की व्यवस्था हो जाती है ना ऐसे जब विश्व नीयता की फैक्ट्री के लिए तुम संसार को सजाने के लिए काम करते हो तो रिद्धि सिद्धियां
भी तुम्हारे चरणों में हाजिर हो जाती है यसा विधि का विधान है दिया जलता है तो उसको ऑक्सीजन लेने के लिए भागना नहीं पड़ता उसको यहीं से मिलता है और खाली जगह पर हवाएं दौड़कर व जगह भर लेती ऐसे आप कर्म करते जाइए फल के पीछे मुड़ मुड़ के मत देखिए शास्त्र सम्मत हो आपके आपको उस कर्म में रुचि हो और परिणाम में मुक्ति देने वाले कर्म हो ऐसे कर्म करने से आपकी योग्यता निखती है जिस काम में आप दिल लगाते हैं वह काम करते करते कितना समय बीत गया चाहे मजदूरी का काम जहां जहाज
खाली होते हैं पानी के जहाज वहां ठेके पर काम मिलता और मजदूर सीते जाते बोरिया सीते जाते मस्ती में करते जाते कभी कभार तो उनके खाने की रिसेस भी उनको पता नहीं चलता घंट बजता है वो भी भूल जाते हैं फिर दूसरा कोई कहता है कि अरे घंटी बज गई छुट्टी का समय है अच्छा चलो काम करते-करते उनको ऐसा रस मिलता है कि भूख का समय भी वो भूल जाते हैं काम में वो रस आता है जब याद दिलाते हैं कि इतना देर हुआ तुमने रोटी नहीं खाया तब उसको देह अध्यास आता है वो कर्म
योग से हटकर देह के साथ योग करता है तब उसको भूख सताती है नहीं तो कर्म का रस उसको मजूरी करते समय भी मिल जाता है ऑफिसर को ऑफिस में भी अगर मन भावन काम करता है तो उसको मजा आता है मन भावन काम तो कुत्ता भी कर लेता है जय राम जी की मैं कभी कुत्ते को ऐसा नहीं बताया कि हमारी कार सड़क पर दौड़े और तुम हमारे साथ भोको और रेस करो या दौड़ो आपकी कार को भी कुत्ते भोंकते होंगे थोड़ी देर करते होंगे मन भावन काम तो व भी कर लेता है लेकिन
ईश्वर भावन हो संत भावन हो शास्त्र भावन कम काम आपको भावन हो जाए आपका कर्म योग बन जाएगा आपकी मुक्ति हो जाएगी कर्म आपको मानने वाले नहीं होंगे