राजकुमारी मंदाकिनी अपने पिता की इकलौती संतान थी वह इतनी सुंदर थी कि उसकी सुंदरता के चर्चे अन्य राज्यों में भी थे उसमें सौंदर्य के साथ-साथ सदाचार प्रतिभा आदि और भी सद्गुण थे परंतु सब सद्गुणों तथा पिता के स्नेह ने उसे अभिमानी बना दिया उसका अहंकार इतना बढ़ गया था कि वह किसी दूसरे को अपने सामने कुछ समझती ही नहीं थी अनेक राजकुमारों ने उससे विवाह करना चाहा किंतु किसी को वह अपने योग्य माने तब तो राजकुमार की अवस्था दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी महाराज को लोक निंदा का भय था लोग काना फूसी करने भी लगे
थे किंतु राजकुमारी अपने अहंकार में चूर थी वह किसी भी राजकुमार को देखने तक को भी प्रस्तुत नहीं होती थी अंत में महाराज ने पड़ोस के युवक राजा रंग मोहन के साथ एक योजना बनाई और घोषणा कर दी कि राजकुमारी के आगामी जन्मदिन पर प्रातः काल जो पुरुष नगर द्वार में पहले प्रवेश करेगा उसके साथ राजकुमारी का विवाह कर दिया जाएगा फिर वह कोई भी हो राजकुमारी का जन्मदिन का दिन आ गया प्रातः काल नगर द्वार में सबसे पहले आने वाले पुरुष को राजसेवक पकड़ लाए वह था फटे चिथड़े लपेटे एक भिक्षुक परंतु वह जवान
था सुंदर था और पूरा अलमस्त था उसके मुख पर एक अलग ही तेज नजर आ रहा था महाराज ने राज पुरोहित को बुलवाया और बिना किसी धूमधाम के भिक्षुक के साथ राजकन्या का विवाह कर दिया राजकुमारी चिल्लाई और रोते-रोते उसने अपने सुंदर नेत्र लाल बना लिए किंतु आज उसके पिता निष्ठुर बन गए थे उन्होंने पुत्री के रोने चिल्लाने पर ध्यान ही नहीं दिया भिक्षुक को केवल पांच स्वर्ण मुद्रा देकर उन्होंने कहा तू अपनी पत्नी को लेकर मेरे राज्य से शीघ्र निकल जा और याद रखना यदि फिर तू या तेरी पत्नी मेरे राज्य में आए तो
प्राण दंड दिया जाएगा चलो मंदाकिनी भिक्षुक ने राजकन्या को पकड़ा और चल पड़ा रोती बिलखती राजकुमारी उसके साथ जाने को विवश थी परंतु ी ज्यों का त्यों प्रसन्न था वह पत्नी के रोने पर ध्यान दिए बिना गीत गाता चल रहा था राजकन्या को पैदल ही पिता के राज्य से बाहर जाना पड़ा भिखारी उससे मधुर भाषा में बोलता उसे प्रसन्न करने का प्रयत्न करता पर्याप्त दूर जाने पर जंगल में नदी किनारे एक फूस की झोपड़ी में दोनों पहुंचे भिखारी ने कहा अब यही तुम्हारा घर है तुम्हें स्वयं अब जंगल के पत्ते और लकड़िया लानी पड़ेगी कंदमूल
जो कुछ मिलेगा उसे उबाल कर खाना पड़ेगा पास के गांव में लकड़ियां बेचने जाना होगा मैं भी जितना बन सकेगा तुम्हारी सहायता करूंगा राजकन्या के लिए यह जीवन बहुत दुखत था किंतु व्यवस्था सब करा लेती है उसे एक ही सुख था कि भिखारी उसके साथ बहुत प्रेम पूर्ण व्यवहार करता था कुछ दिन ऐसे ही बीत गए फिर एक दिन भिखारी ने झोपड़ी छोड़ दी और मंदाकिनी को लेकर वह एक गांव में आया वहां वे दोनों एक खंडहर जैसे घर में रहने लगे भिखारी कहीं से कुछ पैसे ले आ आया और उससे उसने मिट्टी के बर्तन
खरीदे पत्नी से कहा इन बर्तनों को बाजार में ले जाकर बेच आओ किसी समय जो राजकन्या थी उसके लिए सिर पर बर्तन उठाकर बाजार में जाना बड़ा कठिन काम था किंतु मरती क्या करती उसे जाना पड़ा भिखारी ने उसे स्पष्ट कह दिया कि यदि उसकी आज्ञा का पालन ना करना हो तो वह मंदाकिनी को छोड़कर चला जाएगा बेचारी मंदाकिनी बर्तन सिर पर उठाकर बाजार गई उसे बर्तन बेचना तो आता नहीं था दूसरों से नम्र व्यवहार करना भी नहीं आता था बाजार में बर्तन रखकर वह उनके पास खड़ी रही क्योंकि जमीन पर बैठना उसे बहुत बुरा
लग रहा था उसे कुछ ही देर वहां खड़े हुए हुई थी कि एक घुड़सवार युवक बाजार में आया उसने मंदाकिनी से बर्तनों के दाम पूछे मंदाकिनी ने रूखे स्वर में दाम बताए तो घुड़सवार लौट पड़ा मोड़ते समय उसका घोड़ा भड़क उठा फलत घोड़े के पैरों की ठोकर से सब बर्तन फूट गए घुड़सवार बिना कोई ध्यान दिए वहां से चला गया अब मंदाकिनी को टो तो खून नहीं बेचारी रोती हुई घर लौटी भिखारी आते ही क्रोधित होगा यह बात सोच सोच कर उसके प्राण सूखे जा रहे थे भिखारी आया तो देखा रो रोकर मंदाकिनी की आंखें
सूझ गई थी वह कुछ नहीं बोला परंतु दूसरे दिन कहा मंदाकिनी तुम्हें कुछ नहीं आता मिट्टी के सभी बर्तन टूट गए अब हम दोनों का निर्वाह कैसे होगा एक उपाय है नगर में चलते हैं सुना है राजा रंग मोहन बहुत दयालु है उसकी पाकशाला में तुम्हें कोई नौकरी दि लवाने का प्रयत्न करूंगा तुम्हें काम मिल जाए तो तुम्हारी ओर से निश्चिंत होकर मैं भी कहीं अच्छे पैसे वाला ढंग का काम ढूंढ लूंगा कुछ धन एकत्र हो जाने पर कोई व्यापार कर लूंगा और तब तुम्हें भी अपने पास बुला लूंगा राजा रंग मोहन का नाम सुनकर
मंदाकिनी ने लंबी सांस ली एक समय इस नरेश ने उससे विवाह करने का प्रस्ताव किया था आज वह राजरानी होती किंतु हाय रे यह घमंड आज उसी राज भवन में वह दासी बनने जा रही है जाने के अतिरिक्त कोई द दूसरा रास्ता नहीं था मंदाकिनी नगर में गई और राजा की पाकशाला में उसे नौकरी मिल गई भिखारी उससे विदा होकर कहीं चला गया मंदाकिनी का गर्व नष्ट हो गया था उसका स्वभाव बदल गया था अब वह अत्यंत विनम्र परिश्रमी और सावधान सेविका बन गई थी रसोई घर की अध्यक्षा रंभा कुमारी उसके कार्य से अत्यंत संतुष्ट
थी बसंत पंचमी आई राजा रंग मोहन का जन्मदिन था सभी सेवकों को इस दिन नरेश अपने हाथ से पुरस्कृत करते थे दूसरी सेविका के साथ मंदाकिनी को भी राजसभा में जाना पड़ा जब सब सेवक पुरस्कृत हो चुके और सब सेविका एं भी पुरस्कार पा चुकी तब उसे पुकारा गया वह हाथ जोड़े मस्तक झुकाए राज सिंहासन के सामने खड़ी हो गई नरेश ने कहा मंदाकिनी मैं तुमसे प्रसन्न हूं तुम्हें तो मैं अपनी रानी बनाना चाहता हूं मंदाकिनी चौक पड़ी महाराज आपको ऐसी अधर्म पूर्ण बात नहीं करनी चाहिए मैं परस्त्री हूं क्या हुआ जो मेरा पति भिक्षुक
है मेरा तो वही सर्वस्व है उसे छोड़कर मैं दूसरे किसी की सोच भी नहीं सकती वही मेरा स्वामी है आपकी मुझ पर बहुत कृपा है तो इतना अनुग्रह करें कि मेरे पति का पता लगवा करर उसे बुला दें मैं पाकशाला में सेवा करके प्रसन्न हूं महाराज रंग मोहन चले गए और थोड़ी देर में वह भिखारी राज महल से निकला मंदाकिनी उसे देखते ही दौड़कर उसके पैरों पर गिर पड़ी भिखारी मुस्कुराया और बोला मंदाकिनी मुझे ध्यान से देखो तो तुम्हें मुझ में और रंग मोहन में कुछ सादृश्य नहीं मिलता भेद खुल चुका था भिखारी के वेश
में उसको ग्रहण करने वाले स्वयं राजा रंग मोहन ही थे और वह थी उनकी महारानी राजा ने कहा मंदाकिनी क्षमा करना तुम्हारे अभिमान की मुझे कोई दूसरी औषधि मिली ही नहीं इसलिए तुम्हारे पिता के साथ मिलकर मुझे यह रास्ता अपनाना पड़ा निष्कर्ष जीवन में अभिमान और घमंड का कोई स्थान नहीं है कठिन परिस्थितियां हमारे अहंकार को मिटाने और हमें विनम्र बनाने के लिए आती हैं जीवन की सच्ची समझ कठिनाइयों से ही मिलती है और सच्चे प्रेम और समर्पण के बिना जीवन में वास्तविक खुशी और संतोष संभव नहीं है इसके साथ ही कहानी यह भी बताती
है कि परिस्थितियां चाहे जितनी भी कठिन क्यों ना हो सच्चा प्रेम सहनशीलता और विवेक ही जीवन को सही दिशा में आगे बढ़ाते हैं