नानक सत वो सतगुरु मोए भावे हसिया खलदिया खा वंदिया पहन दिया विच हसते खेलते खाते पहनते मुक्ति द अनुभव करावे गोरखनाथ जी कहते हैं हसी बो खेली बो धरी बो ध्यान ह ते खेलते भगवान का ध्यान चिंतन होता है भगवान का वास्तविक स्वरूप है सत्य चेतन और आनंद और उस सच्चिदानंद का वास्तविक स्वरूप सत्य है तो मरने से डरो नहीं डराओ नहीं आप अज्ञानी रहो नहीं और दूसरों को अज्ञानी बनाओ नहीं आप बेवकूफ रहो नहीं दूसरों को बनाओ नहीं आप मैं दुखी हूं मैं परेशान हूं ऐसा नकारात्मक हलकट चिंतन करो नहीं और दूसरों को ऐसा
चिंतन करने में उसाओ नहीं भागवत का श्लोक है आप बोलना सच्चिदानंद रूपाय सच्चिदानंद रूपाय विश्व उत्पत्ति आदि हे तवे विश्व उत्पत्ति आदि हेतु ताप त्रय विनाशाय ताप विनाशाय श्री कृष्णाय वयम नमः श्री कृष्णाय जो सत है जो चेतन है जो आनंद स्वरूप है जो सृष्टि की उत्पत्ति करता है स्थिति करता है संहार करता है उस परमात्मा को हम प्रणाम करते हैं क्यों प्रणाम करते हो लाला बिना मतलब के प्रणाम करते क्या नहीं प्रणाम करते हैं आदि देविक आदि भौतिक और आध्यात्मिक तीन ताप को मिटाकर अपनी भक्ति दे इसलिए प्रणाम करते धन कितना भी मिल जाए
लेकिन यह तीन ताप नहीं मिटते सत्ता कितनी भी मिल जाए तीन ताप नहीं मिटते लेकिन यह सच्चिदानंद का सत्संग मिल जाए तो तीन ताप तो क्या आधा ताप भी नहीं रहता दुनिया का सारा धन सारी सत्ता सारी विद्या मिल जाए दुखों का अंत नहीं होता लेकिन ब्रह्म ज्ञान की विद्या मिल जाए तो दुख टिक नहीं सकता और सुख मिट नहीं सकता है है बोलो है बापू है य रे है बापू य है य है भले भले मधुरा मधुरा [संगीत] नाम जय सियाराम जय जय सियाराम जय सियाराम जय जय सियाराम जय सियाराम जय जय सियाराम हरि
हरि हरि ओम ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम मुनि मनोरंजन भव भय भंजन हरि हरि ओम ओम कलि मलरण भव जगतारण हरि हरि ओम मोह निवारक सब सुख कारक हरि ह हरि ओम ओ जो कोई गाए भक्ति पाए हरि हरि ओम जो कोई गाए मुक्ति पाए हरि हरि ओम ओ मेवाड़ में मीरा गाए हरि हरि ओम ओ पंजाब में नानक गाए हरि हरि ओम महाराष्ट्र में नामदेव बोले हरि हरि ओम बंगाल में गौरंग गाए हरि हरि ओम राजा गार्डन तुम हम गावे हरि हरि ओम भारत भर में गूंजा नाम हरि हरि ओम ओम विश्व
भर में साधक गाए हरि हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम आसिया खेल दिया खाया पनया विच होए मुक्ति नानक वो मोरे सतगुरु पावे जय हो जय हो अरे जाम पर जाम पीने से क्या फायदा तुम्हारी शादी हो रही है भेंडे बन [प्रशंसा] रहीद आबाद हो रहे हम हरि के साथ हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि [प्रशंसा] ओम हरि [प्रशंसा] ओम प्रभु तेरी जय हो सच्चिदानंद तुम्हारी जय हो सुख रूपा ज्ञान रूपा आनंद रूपा मम आत्म रूपा [प्रशंसा] प्रभु वासुदेवा प्रीति देवा मुक्ति देवा माधुर्य देवा [संगीत] ज [संगीत] [प्रशंसा]
[संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] कौन कहता है कि रंग नहीं चढ़ता ओ भक्तों का बेड़ा तदा ख [संगीत] ले हरि ओम हरि ओम हरि ओम ह हरि ओ हरि ओम हरि ओम ह [प्रशंसा] [संगीत] मधुर [संगीत] शांति सच्चिदानंद में शांति रूप नरेन रंग कछु प्रभु त्रे गुणा भिन्न [संगीत] अपनी अपनी भावना से भगवान की आकृति बनाना ये आरंभिक साधना है आखरी तो यह है कि भगवान की आकृतियां जिससे बनती है वह अकाल पुरुष सारी अकं का आकृतियों का अधिष्ठान एक [संगीत] रस रूपा कीत गुनातीत देशातील दत और कभी हमारा साथ ना छोड़ने
वाला व रब ही रह जाता है सत्य सत्य मान जो उसकी सता स रहे जो आद में सत हो युगों से सत्य हो अभी भी सत्य और प्रलय होने के बाद भी जो रहे उसको बोलते सत जो सत्य है वही चेतन है और जो चेतन है वही आनंद स्वरूप है ज्ञान स्वरूप है दो वस्तु के मिश्रण का नाम संसार है एक सच्चिदानंद और दूसरा माया इन दोनों का परस्पर अध्यास अध्या रूप इसी का नाम दुनिया है एक हम और एक हमारा इसी का नाम संसार हम और हमारा तो तुम और तुम्हारा चल पड़ा संसार हर
रोज संसार में आपाधापी भागा करते करते फिर जख मार के उस एक अकाल पुरुष में सभी को आना पड़ता है वहां सेठ की सेठ सेखी बगड़ने की क्षण नहीं होती गहरी नींद में दुखी अपना दुख भूल जाता है धनी अपना धन भूल जाता है सब एक शांत अवस्था में आ जाते कुछ ना करने की अवस्था में आते हैं उसी से पुष्ट होकर सब कुछ करने की योग्यता सुबह उभरते हैं फिर वह खर्च करते करते थक जाते हैं फिर ढल जाते हैं उस सत में उस चेतन में उस आनंद में और सुबह ताजे होकर फिर लग
जाते एक है सत दूसरा है असत एक है चेतन दूसरा है जड़ एक है दुख रूप दूसरा है आनंद रूप दोनों का आपस में अध्यास हो गया शरीर है असत और तुम हो सत शरीर है जड़ हाथ को पता नहीं मैं हाथ घुटने को पता नहीं मैं घुटना तुम हो चेतन शरीर है दुख रूप कितना भी खिलाओ पिलाओ संभालो फिर भी कभी कोई शिकायत कभी कोई शिकायत और बुढ़ापे में तो शिकायतों का घर अंत में मृत्यु का ग्रास शरीर असत जड़ दुख रूप और चेतन है सत्य चित और आनंद रूप जैसे बच्चा अपने को आईने
में देखता है आने वाले बच्चे से मिलना चाहता है स्वयं नहीं हो तो आने वाला बच्चा जिंदा नहीं रह सकता ऐसे आप सच्चिदानंद नहीं हो तो यह माया के आईने में दिखने वाला शरीर जिंदा नहीं रह सकता आने वाले बच्चे के बिना भी बच्चा है लेकिन बच्चे के बिना आने वाला बच्चा नहीं है ऐसे ही तुम चित्त के आयने में आते हो तो यह शरीर और संसार देखता है तुम शरीर को भूलकर चित्त में आ जाते हो और चित्त को भूलकर अपने में आ जाते हो तो यह फिर दिखता नहीं फिर भी तुम्हारे होने से
इसकी रक्त धारा चल रही शवास चल रहा है बाल बड़े हो रहे तुम्हारे बिना शरीर नहीं है शरीर के बिना तुम हो शरीर मर जाने के बाद भी तुम नहीं मरते हो सत नहीं मरता है चेतन नहीं मरता है आनंद नहीं मरता असत जड़ और दुख रूप शरीर मरता है बेवकूफी यह हो गई कि जो हम नहीं है उसको हम मैं मानते हैं जो हमारा नहीं उसको हम अपना मानते और उसको बढ़ाते संभालते हैं बढ़ता है तो बोलते हम बड़े सेठ बड़े जिमीदार बड़े मकान वाले बड़ी कुर्सी वाले चली गई तो दुखी होते यह बेवकूफी
के लक्षण श्री राम अपने को सच्चिदानंद जानते राज्य अभिषेक होने वाला है खबर मिली सनाया बज रही है कौशल्या महारानी मंगल गीतकार सीता देवी शुभ व्रत रख रही राज्य गद्दी पर आने वाले प्रभु जी ब्राह्मण लोग वैदिक मंत्र उच्चारण कर रहे सारे राज्य में आनंद और सुख माधुरी और खुशी के लहर दौड़ गई और फिर हादसा हुआ दुर्घटना घटी राम राज्य के बदले राम 14 वर्ष बन जाएंगे राज्य की बात सुनकर राम हर्षित नहीं हुए थे मनवासनई वो जानते हैं सच्चिदानंद जो का दे है माया में उथल पाथल खेल है रचा हुआ जैसा अमृत तैसी
विस जैसा मान तैसा अप माना हर्ष शोक जा के नहीं वैरी मित समान कह नानक सुन रे मना मुक्तता ते जान आपको महान आत्मा का सुख पाना है तो एक महाव्रत रख लो सुबह निंद में से उठो जिसमें रात भर शांति पाई सच्चिदानंद प्रभु को प्रणाम बस चुप हो जाओ गुरु मंत्र मिला है तो गुरु मंत्र जप लो नहीं तो चुप हो जाओ सुबह का दो मिनट जागृत में चुप होना बड़ी माना रखता है बहुत बड़ी माना रखता है कोई काम काज करो थोड़ी देर गुरु मंत्र जप करके चुप हो जाओ कामकाज में लगेंगे और
फायदा होगा तो घमंड नहीं होगा फायदा हुआ और घमंड हुआ तो नुकसान हो गया आपका बाहर से फायदा हुआ अंदर से नुकसान हो गया आप सचिदानंद से गिर गए नुकसान हो जाए और दुख ना हो तो आपको नुकसान नहीं हुआ लोग तो नुकसान हो चाहे ना हो दुखी सुखी होते रहते मैच में कोई जीते खुश हो गए कोई हारे दुखी हो रहे मुफत प आश्रित तुम्हारा सुख दुख प आश्रित ना हो तुम्हारा सुख दुख शरीर आश्रित ना हो तुम्हारा सुख दुख मन और बुद्धि आश्रित ना हो तुम्हारा सुख दुख द्वंद ना हो ध्यान देना बहुत
ऊंची बात सुन रहे हो ब्रह्म ज्ञान की अगर तीन मिनट भी ब्रह्म ज्ञान को एकाकार होकर सुनता है तो उसने सारे तीर्थ नहा लिए सारे यज्ञ कर लि और सारे पितरों को तर्पण कर दिया स्नातन तेन सर्व तीर्थम तम तेन सर्व दनम कृतम तेन सर्व यज्ञम य ण मन ब्रह्म विचारे स्थिरम कृत्वा आप वो ब्रह्म ज्ञान सुन रहे हैं संसार के दो विभाग कर लो एक तो वोह है जो आपका अपना नहीं है सारे मकान अपने नहीं है सारी कोठियां अपनी नहीं है सारे दुकान अपने नहीं है दो पांच मकान एकद दुकान अपनी है तो
दो विभाग हो गए एक वो है जो अपना नहीं है वो तो बहुत कुछ अपना नहीं सड़ी सारी गाड़िया अपनी नहीं जहाज अपने नहीं है एक भी तो जो अपना नहीं है एक विभाग हो गया और जिसको हम अपना मानते हैं व थड़ा थोड़ा सा है दुनिया के अथवा हिंदुस्तान के नजर में अपना नहीं है वह बहुत है और अपना है वह थोड़ा है ठीक है जो अपना नहीं है वो तो नहीं है लेकिन जो अपना है वह भी रहेगा क्या छोड़ना नहीं पड़ेगा क्या जो अपना है वह दूसरा अपना बढ़े कि ना बड़े उसमें
शंका है लेकिन जो अपना है वह छूटेगा कि नहीं छूटेगा शरीर भी छोड़ना पड़ेगा पत्नी भी छोड़नी पड़ेगी तो मकान साथ में ले जाएगा पैसे साथ में ले जाएगा जिन जो अपना हम सदा रख नहीं सकते उसके लिए हेराफेरी करना बेईमानी करना अधर्म करना बड़ा भरी भारी में भारी हानि है अपने पसीने का भी आदमी खा नहीं सकता दाता ने इतना दिया है लेकिन हा हाय हाय खपे खपे खपे खपे असत जड़ और दुख रूप शरीर और संसार से इतना अपने को प्रभावित कर दिया कि सत्य चित और आनंद ईश्वर ढका सा रह गया सब
कुछ होने के बाद भी परेशानिया नहीं मिटी दुख नहीं मिटे भय नहीं मिटा और नहीं मिला जिसको छोड़ नहीं सकते वह मिला नहीं और जिसको रख नहीं सकते उसके लिए कोड़ कपट और बेईमानी करके नर कों का रास्ता बना रहे राजा अज अजगर बन गया राजा नृग क्रिकट बन गया राजा भरत हिरण बन गया मिलने से आदमी सुखी होता है यह बात में मेरा विश्वास नहीं है यह बात सच्ची नहीं है यूरोप के विद्वान ने पुस्तक लिखी और पिछले 100 साल के राजाओं का इतिहास लिखा कि फलाना राजा था यूरोप का किंग नाक बहती थी
और दस्त आते र और आखिर उसी में मर गया फलानी रानी थी उसको कभी किधर कभी किधर फलाना राजा हो गया उनके नाम लेकर में समय और वाणी क्यों खराब करो शॉर्ट में समझो फलाना राजा हो गया उसको मलेरिया पकड़े रहता था फलाने फलाने धनी हो गए उनको डायबिटीज ने घेर रखा था फलाने को अनिद्रा धी अगर असत जड़ दुख रूप संसार में सत बुद्धि किया तो अशांति आथ लगेगी भोग की वासना बढ़ेगी संग्रह के आग खपे खपे खपे धन तो वही पड़ा रह जाएगा अनिद्रा और डायबिटीज पकड़ लेगी हार्ट अटैक और हाई बीपी लो
बीपी के शिकार हो जाएगी साई ते इतना मांगिए नव कोटि सुख समय में भी भूखा ना र हू साधु भी भूखा ना जाए बहुत पसारा मत करो कर थोड़े की आश बहुत पसारा जिन कियावे भी गए निराश जो छोड़ के मरना जो अपना नहीं होने वाला है उसके पीछे लगे जा रहे गहने और चाहिए साड़िया और चाहिए मकान और चाहिए पैसा और चाहिए इससे सच्चा सु ढक जाएगा और नकली सुख की लालच में जीवन खत्म हो जाएगा घर में जो भोजन मिले खा ले जो कपड़ा मिले अंग ढक लो जहां नींद आए सो जाओ अभ्यास
करो अपने सत स्वभाव का चेतन स्वभाव का आनंद स्वभाव का आप खुशहाल हो जाएंगे निहाल हो जाएंगे आपकी सात पीढ़ियां तर जाएगी आपका अकल मता ऐसा उपजे कि इंद्र का वैभव भी तुच्छ हो जाएगा सारी धरती धरती के राजाओं का वैभव इंद्र के आगे तुच्छ है लेकिन आपको सच्चिदानंद का वह वैभव मिलेगा कि इंद्र का वैभव भी तुच्छ हो जाएगा इंद्र भी आपको नमस्कार करके अपना भाग्य बनाएगा तीन टूक कोपन की तीन टूक कोपन की भाजी बिना लू भाजी बिना लू तुलसी हृदय रघुवीर बसे तुलसी हृदय रघुवीर बसे तो इंद्र बापड़ी बापड़ी हो जाते ऐसा
इंद्र तुम्हारे आगे बोना हो जाए ऐसा सच्चिदानंद का सुख पाने की ताकत तुम्हारे में है और उस ताकत का उपयोग नहीं करते फिर भी वह तुम्हारा साथ नहीं छोड़ती शरीर साथ देगा नहीं और परमात्मा साथ छोड़ेगा नहीं मरने के बाद शरीर और संपदा जिसको अपनी माना वो नहीं चलेगा लेकिन सच्चिदानंद साथ छोड़ेगा नहीं जो कभी साथ ना छोड़े उसे बोलते हैं परमात्मा और जो सदा साथ ना रहे उसे कहते हैं संसार जो अपना नहीं है वो तो नहीं है जिसको अपना मानते वो भी साथ में नहीं रहेगा शरीर साथ नहीं रहेगा तो क्या रुपय साथ
चलेंगे हां उसके लिए की हुई बेईमानी नर कों में ले जाएगी नीच योनियों में ले जाएगी गीद बनेंगे चूहे बनेंगे खटमल बनेंगे लोगों का खून पिया तो खटमल बनो फिर खून पियो गाय भैसों के शरीर में चिपके रहेंगे फिर कवे आकर नोच लेंगे बगई बन जाएंगे जो हमारा नहीं रहना है उसके लिए हम दूसरों का खून चूसे क्या फायदा है बहुत पसारा मत करो कर थोड़े की आस बहुत पसारा जिन क्या आवे भी गए निराश पड़ा रहेगा माल खजाना छोड़ सुट जाना है कर सत्संग अभी से प्यारे नहीं तो फिर पछताना है खिला पिला के
दे बढ़ाई वह भी अग्नि में जलाना है जि शरीर को जला देना है उसका अभिमान क्या करें मत कर रे गर्व गुमान गुलाबी रंग उड़ी जावे ग काई रे लायो भाया काई ल जावे गो धन दौलत थारा जोर जवानी अठे मेली जावे ग माटी में मली जावे को पाछो नहीं [संगीत] आवे सत्संग से जो विवेक जगता है सत्संग से जो सच्चे सुख के द्वार खुलते हैं वह दुनिया की किसी संपदा और किसी विद्या से नहीं खुल सकते बड़ी भारी तपस्या से भी सत्संग का पुण्य और ज्ञान और विवेक ऊंचा माना गया है जो सत्संग में
पहुंचता है एक एक कदम उसको यज्ञ करने का फल होता है गाड़ी मोटर कहीं भी रखेगा चल के तो होना पड़ेगा बैठता है तो भक्ति योग फलित होने लगता है सुनेगा ज्ञान योग कीर्तन करेगा जप योग चार चार योग एक साथ सहज में हो इसे बोलते हैं सत्संग आठ प्रकार का दान होता है अन्न दान भूमि दान सुमन दान गौ दान गौ रस दान विद्या दान लेकिन सबसे बड़ा है सत्संग दान अभय दान सत चित आनंद जो कभी साथ नहीं छोड़ता जो सदा सत्य है सत्य का विरोधी है असत चेतन का विरोधी है जड़ आनंद
का विरोधी है दुख तो असत जड़ दुख रूप शरीर और संसार सत चित आनंद रूप का मिश्रण इसी का नाम दुनिया है अब क्या करें अपनी अकल बढ़ाओ और सत चित आनंद को प्रकट हो छुपाए मिट नहीं सकता आत सुख कितना भी मिल जाए फिर भी आधिक सुख की इच्छा रहेगी जड़ वैभव कितना भी मिल जाए फिर भी अंदर में असंतोष रहेगा सेक्सी और विकारी सुख कितना भी मिल जाए फिर भी थकान रहेगी उबान रहेगी क्योंकि तुम्हारा असली स्वभाव सत्य है सत्य माना सत्ता सत्ता जो कभी ना मिटे व सत्ता दो प्रकार की ईश्वर की
सत्ता और जीव की सत्ता ईश्वर का अस्तित्व प्रलय होने के बाद भी ईश्वर नहीं मिटता ऐसे ही शरीर मरने के बाद भी जीव नहीं मिटता है क्या ख्याल है अगर जीव मिटता है तो दूसरे जन में कौन जाएगा तो सतता चेनता और आनंद जीवात्मा की और परमात्मा की मिलती है असत जड़ता और दुख रूप शरीर और संसार का मिलता है तो शरीर संसार का हिस्सा है और जीवात्मा परमात्मा का अंग है अंग अंगी से जुड़ा रहना चाहता है मिट्टी का ढेला पृथ्वी का अंग है जोर से फेंको फिर भी पृथ्वी पर आएगा पानी समुद्र का
अंग है कहीं भी बर से नीचे बहते बहते नदियों में नालों में समुद्र के तरफ चलेगा अग्नि सूर्य का अंग है दिया सलाई जलाओ सीधी जलाओ तो भी ऊपर जाएगी उसकी लो उल्टी कर दो तो भी ला ऊपर ऐसे जीवात्मा सत्य चित आनंद का अंग है इसलिए व सदा रहना चाहता है सब कुछ जानना चाहता है और आनंद चाहता है लेकिन असत जड़ दुख रूप से आनंद चाहता है इसलिए मार खाता है और फिर सब छोड़ के मर जाता है अगर सत्संग मिल जाए थोड़ा साधन मिल जाए गुरु मंत्र मिल जाए और ध्यान की रीत
मिल जाए और सत्य का सद उपयोग और सत्य का साक्षात्कार दोनों हाथ में लड्डू शरीर का धन का मन का सदुपयोग बहुजन हित है बहुजन सुख है और आत्मा के सुख की प्राप्ति एक होता है सामान्य विवेक पशु पक्षी जीव जंतुओ में कीड़े मकोड़ों में भी है सभी योनियों में विवेक होता है खानपान का लेकिन मनुष्य की एक एक मनुष्य का चोला ऐसा है कि जिसमें ईश्वर प्राप्ति तक का दिव्य विवेक होता है भैंस को भी पता है क्या खाना है क्या नहीं खाना कीड़ी को भी पता है यह सामान्य विवेक संतान उत्पत्ति करना बच्चों
को पालना पोछना अनुकूल जगह पर टिकना प्रतिकूलता से भागना ये सामान्य विवेक तो सभी जीवों में लेकिन मनुष्य में एक खास विवेक वो क्या कि सत्य क्या है असत्य क्या है नित्य क्या है अनित्य क्या है शाश्वत सुख क्या है और धोखे का सुख क्या है यह विवेक मनुष्य जगा सकता है और विवेक का नौवा हिस्सा बुद्धि बनती है बुद्धि से विवेक नहीं होता अगर बुद्धि से विवेक होता तो बुद्धि मानव को ईश्वर प्राप्ति हो जाती नहीं बड़े बड़े बुद्धि मानों को दुख सुख होता है ईश्वर प्राप्ति से बचारे रह जाते हैं अगर सत्संग मिले
और ईश्वर प्राप्ति की भूख लगे तो विवेक जगेगा बिनु सत्संग विवेक न होई राम कृपा बिनु सुलभ न सोई तो विवेक होगा तो स्वल्प में आदमी तुच्छ चीजों में आदमी बहल नहीं जाएगा जो छोड़कर मरना है उसको कट्ठा करने में समय शक्ति बर्बाद नहीं करेगा जो पहले नहीं था बाद में नहीं रहेगा उसके पीछे दीवाने की दौड़ दौड़ेगा नहीं गीता में इसको शरीर को तीन नामों से कहा है इसको देह कहा है इसके अंदर जो चैतन्य है उसको देही कहा है इसको क्षेत्र कहा है और सच्चिदानंद को क्षेत्र ज्ञ का है इसको असत्य कहा है
और परमात्मा को सत्य कहा है शरीर असत आत्मा सत शरीर देह और परमात्मा देही शरीर क्षेत्र परमात्मा क्षेत्र ज्ञा य तीन नामों से गीता में इसका वर्णन [संगीत] आया सत माना शरीर को सत्ता देने वाला क्षेत्र जञा क्षेत्र को मैं मानने से वस्तुओ को मेरी मानने से स्वभाव में जड़ता आती है वासना आती है यश की वाहवाही पकड़ती है नाम की वाहवाही की वासना बढ़ती है और अशांति अ तृप्ति और खपे खपे खपे में आदमी खप जाता है अगर शरीर को मैं माना क्षेत्र को मैं माना देह को मैं माना तो देह के नाम में
मेरा नाम है देह के यश में मेरा यश है देह के सुख में मैं सुखी हूं देह के दुख में मैं दुखी यह जड़ता बढ़ जाएगी बुद्धि मोटी हो जाएगी तो रावण के रास्ते चल पड़ा इतने लोग समझाते फिर भी रावण समझता नहीं बोल अपनी ढपली अपना राग अगर क्षेत्र यज्ञ को सत मानते हैं जो पहले नहीं था बाद में नहीं रहेगा अभी भी नहीं हो रहा है वो शरीर है लेकिन जो पहले था अी है बाद में भी रहेगा वह क्षेत्र ज्ञ आत्मा सत्य है वह चेतन है वह आनंद स्वरूप है और वास्तविक में
मैं वह हूं इस प्रकार माने फिर धीरे धीरे जानने के रास्ते चले एकदम सरल हो जाएगा संसार का व्यवहार भी बढ़िया चलेगा और ईश्वर सहज में मिल जाएंगे वास्तव में मिलते तो ईश्वर ही मिलते बाकी धोखा मिलता है मुझे मकान मिल गया अभी दिखा है रहेगा नहीं तेरे पास पत्नी मिल गई दिखती है सदा साथ में नहीं रहेगी पति साथ में नहीं रहेगा साथ में तो भगवान ही रहते हैं मिलता तो भगवान ही है बाकी धोखा मिलता है स्वपने में यह मिल गया वो मिल गया वो मिल गया वो मिल गया खुली तो कुछ नहीं
याय आंख मंद हुई तो कुछ नहीं जागो लोगो मत सुओ जागलो को मत सुओ ना करो नींद से प्यार ना करो नींद से प्यार जैसा स्वपना रन का जैसा स्वपना रहन का तैसा ये संसार तैसा ये संसार ओ और म के बीच ओमकार है वह सच्चिदानंद में मन स्वभाविक टिकता है 15 मिनट जप करो शांत होते जाओ अपने सत स्वभाव को चेतन स्वभाव को आनंद स्वभाव को प्रकट करो खाओ लेकिन मजा लेने के लिए नहीं स्वास्थ्य के लिए पति पत्नी होकर जियो काम विकार के कीड़े होकर नहीं संयमी सदाचारी सद ग्रस्त होकर तेजस्वी संतान को
जन्म दो आपका जीवन विवेक की प्रधानता वाला होना चाहिए बिन सत्संग विवेक न होई राम कृपा बिन सुलभ न सोई वे नेता बड़भागी होते हैं उनके द्वारा कोई सत्कर्म किया हुआ होता है वह सत्कर्म उने सत्संग में ले आता है सत्संग में आना यह अपना समाज का का और मानवता का मंगल करना है सत्संग से जो फायदा होता है वो दुनिया भर की संपदा से नहीं होता है दुनिया भर की संपदा और राज्य इंद्र के आगे बोना हो जाता है लेकिन सच्चिदानंद का अनुभव किए हुए महापुरुष के सुख के आगे इंद्र का सुख भी तुच्छ
हो जाता है तीन टूक को पीन की टूक को पन की भाजी बिना लूण भाजी तुलसी रद रघुवीर बसे रघुबीर बसे तो इंद्र बापने सच्चिदानंद स्वभाव का भैया अनुभव कर ले तो इंद्र का सुख अप्सरा नाचे तब होता है देव यशोगान करे तब होता है युद्ध में सफलता मिले सुख होता है लेकिन सच्चिदानंद का स्वभाव जिसने जान लिया उसका सुख तो सदा झुरमुट झुरमुट दिल के झरोखे में जगमगाता रहता है इसलिए इंद्र का पदवी भैया आत्म सुख के आगे बोना हो जाता है सदा दिवाली संत कीवा संत की अब क्या करो सदा दिवाली संत की
आठों परहर आनंद आठों पर आनंद अकल मता कोई उपजा अकल मता कोई उपज गिने इंद्र को रंक गने इंद्र को रं यह विवेक मनुष्य शरीर में ही अपने आत्मा की सतता का चेतन का आनंद का अनुभव करने वाला विवेक मनुष्य शरीर में है इसलिए मनुष्य शरीर 84 लाख योनियों में श्रेष्ठ माना गया है मनुष्य जीवन का फल यह नहीं कि धन का ढेर लगाकर मोरा पिया कटे है चिंता करते करते इसलिए मनुष्य जीवन नहीं राजा अज मिथिला नरेश अजगर और सांप की योनि में भटक रहा है राजा अ किरकेट होकर भटक रहा बुद्धि तो थी
लेकिन आत्म विवेक नहीं था मुसोलिनी अभी तक झील के किनारे प्रेत हो के भटक रहा 1942 में कम्युनिस्टों ने धावा बोला था और बुरी तरह उसकी हार हुई थी टाली का मुसली बुद्धिमान तो था लेकिन सत्संग के बिना आत्मा परमात्मा की प्राप्ति का विवेक नहीं जगता है दुख आता है लेकिन उस दुख के आप भोक्ता बनेंगे तो कमजोर हो जाएंगे दुख का उपयोग करने की कला सीख सुख आता है सुख का उपयोग करोगे तो आपके जीवन में विवेक जग जाएगा ईश्वर प्राप्ति का प्रसाद जग जाएगा प्रसादे सर्व दुखा नाम हानि रस प जायते प्रसन्न चेत
सोया सु बुद्धि पर दुख के भोगी ना बनो धैर्य से रास्ता खोजो सुख के भोगी ना बनो बांटो दुख के भोगी ना बनो विवेक जगाओ सुख में दुख में क्या फर्क होता है सुख से दुख दबता है और आनंद से दुख सदा के लिए मिटता है तो सत्संग से परमात्मा का आनंद जगाओ सच्चिदानंद रूपाय सच्चिदानंद रूपाय विश्व उत्पत्ति आदि हेत विश्व उत्पत्ति आदि हे तवे ताप विनाशाय ताप प्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयम नम श्री कृष्णाय वयम नमः यह मार्ग कठिन नहीं है लेकिन इसकी भूख और जिनको कठिन नहीं लगता ऐसे महापुरुषों की मुलाकात मिल जाए
और इस सच्चिदानंद के सुख को पाने की भूख जग जाए तो सौदा सस्ता है परीक्षित की भूख और सुखदेव जी का मिलना सात दिन में काम हो गया आसु मल की भूख हर लीला सा बापू का मिलना 40 दिन में काम हो गया मैं तो कहूं सात साल में भी काम हो जाए सच्चिदानंद स्वभाव को पाने का तो सौदा सस्ता है गोमाना इंद्रिया गोविंद मना इंद्रियों के द्वारा जो देखने सुनने सोचने की सत्ता देता है वह सच्चिदानंद गोविंद हरे गोपाल हरे जय जय प्रभु दीन दयाल हरे सुखधाम हरे आत्म राम हरे जय जय प्रभु दीन
दयाल हरे रात्रि को शयन खंड में जाएं वहां के माहौल को आध्यात्मिक बना दे सोते समय चिंता लेकर सोओगे तो जल्दी बुढे बन जाओगे रुग्ण बन जाओगे भय चिंता और शोख सन खंड के बार झाड़ दो जैसे पुजारी भगवान से मिलने के लिए मंदिर में नहा धो के जाता है ऐसे तुम सन खंड में मन से नहा धोकर पहुंचो मन से रात्रि का स्नान स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं होता शरीर का स्नान ना हो मन का स्नान हो जाए बिस्तर पर बैठो भगवान का थोड़ा चिंतन करो और फिर सीधे लेट जाओ और अपने चित्त में
न जाने कितनी किनी वासना हैं कितने कितने दोष हैं कितनी कितनी आपदा आपी है उन सबको मिटाने का एक सुंदर महामंत्र मिला है मेरे को इस उम्र में मिला है 68 साल की उम्र में शास्त्रों से वह आप लिखोगे अथवा कैसेट के द्वारा पक्का करोगे गजब का लाभ होगा [संगीत] आप 12 15 25 साल से जो कुछ करते हैं और चित्त अभी मन वश हुआ दुख मिटा नहीं चिंता हटी नहीं यह करने से दुख पीड़ा रोग और [संगीत] चिंता हटाना आपके पुरुषार्थ नहीं वह परम सत्ता का हाथ आ जाएगा उसमें जैसे बच्चा अपने बल से
चले तो नपा तुला लेकिन पिताजी की उंगली पकड़ लि अथवा पिता ने हाथ पकड़ लिया तो सहज हो जाता है ऐसे एक मंत्र है उसमें छह बीज मंत्र मिले हुए हैं अगर वह आप लिख सके तो लिखें पक्का कर ले रात को सोत समय वह मंत्र पढ़ते पढ़ते सो जाए आपका चित्त के दोष बुराइयां ऐसी भागेगी जैसे सूरज आने से निशाचर और अंधकार भगता है मंत्र है ओम चित्ता आत्मिका महा चिति चित्त स्वरूपिणी आराध्या चित्त जान रो गान शया शमाया ठम ठम ठम स्वाहा ठम ठम ठम स्वाहा ये छह बीज मंत्र ये मंत्र का अर्थ
है के सारे ब्रह्मांड को और सारे शरीरों को चलाने वाली चितामुंडा चि स्वरूपिणी आत्म सत्ता मेरे चित्त के रोगों का शमन कर शमन कर ठम ठम ठम स्वा ठम ठम ठम स्वा ऐसा बोलते बोलते अगर सो जाते हो तो आपको 25 50 साल से भक्ति करने वाले दिखेंगे उनसे आप अपने को आगे अनुभव कर लोगे अथवा तो सेन खंड में जाकर जहां भी सोते हैं दिन के अच्छे काम के ईश्वर शरण गलती हुई समा याचना फिर हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओ हरि ओम हरि ओम
हरि ओम हरि ओम ओ ओम ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओम ओम ओम ओम ओ ओ ओ ओ जपते जाओ बोलते जाओ कमरा वाइब्रेट हो जाएगा ब नाड़ियों पावन होगी हरि ओम ओम ओम ओम ओ ओओओ ओओ आपका स्वास्थ्य और स्वभाव दोनों भगवत कृपा से पावन होगा लेट गए स्वास अंदर जाता है शांति बाहर आता है गिनती स्वास अंदर जाता है ओम बाहर आता है गिनती जैसे बच्चा मां की गोद में निश्चिंत होता है बालक मां की गोद में निश्चिंत नहीं होगा तो कहां होगा ऐसे जीवात्मा परमात्मा में निश्चिंत नहीं होगा तो कहां होगा
प्रभु मैं तुम्हारे में निश्चिंत हो रहा हूं निर् दंद हो रहा ऐसा सोचते सोचते सो जाना सुबह नींद में से उठो तनिक शांत होकर बैठो जो सत्य है वह मेरा आत्मा है जो चेतन है व मेरा आत्मा है जो आनंद स्वरूप है व मेरा आत्मा परमात्मा है असत शरीर है जड़ शरीर है दुख रूप शरीर है सत चित आनंद स्वरूप प्रभु मैं प्रभु का प्रभु मेरे ओम आनंद ओम शांति आज दिन भर के कार्यकलापों में जड़ता दुख रूपता असत को महत्व नहीं दूंगा आनंद में रहूंगा मेरा व्यवहार बंदगी भक्ति हो जाएगा हरि ओम ओम प्रभु
होगा ना भक्ति ओम ओम ओम होगा ना होगा ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम [प्रशंसा] ओम आपका प्रभात काल सुबह का जागरण देवी जागरण हो जाए कई लोग अलाराम की घंटी से जागते हैं मशीन के बल से जागते नहीं नहीं कईयों को कुटुंब भी जगाते हैं जागो 6 बज गए सा बज गए पा बज गए जागो हे जाग रे हे बेटी बेटा नहीं नहीं घर का कोई बड़ा तो जल्दी जगता है मेरे पिताजी नगर सेठ थे लेकिन मेरी मां अपने हाथ से आटा पीस थी और चांदनी में उस
आटे को पुष्प करती थी आटा आठ दिन के बाद तो एक्सपायर होने लगता है मीलों का आटा खाते खाते शरीर फेटी और डबल रोटी हो जाता है ताजा आटा खाना चाहिए मेरी मां आटा पिसती और भजन गाती आप आटा ना पीसो तो ना पीसो लेकिन कम से कम घर के लोगों को जगाते समय जागो मोहन प्यारे जागो हरि के दुलारे हो जागो लाला प्यारे जागो रे लाली दुलारी जागो रे प्रभु के प्यारे जा [संगीत] शिव के दुलारे शिव को माने तो शिव के दुलारे राम को माने तो राम के दुलारे गुरु को माने तो गुरु
के दुलारे अल्लाह को माने तो अल्लाह के दुलारे आपका दिल पावर जिसको जगाओ ग उसका दिन बढ़िया होगा हरि [संगीत] ओम हरि [संगीत] ओम गोविंद हरे गोपाल हरे गोविंद हरे गोपाल हरे जय जय प्रभु दीन दयाल सुख धाम हरे आत्म राम हरे सुखम हरे आत्म राम हरे जय जय प्रभु दीन द दयाल हरे गोविंद हरे गोपाल हरे गोविंद हरे गोपाल हरे जय जय प्रभु दीन दयाल हरे जय जय प्रभु दीन दयाल हरि ओम [संगीत] हरि [संगीत] ओम भगवान के नाम का कीर्तन भगवान की गुण लीला महिमा स्मरण से भक्ति योग की सिद्धि होती है किसी
का बुरा ना चाहना बुरा ना सोचना बुरा ना करना जितना हो सके भलाई करना इससे कर्म योग बनता है और भगवान सत है चित् है आनंद स्वरूप है शरीर असत जड़ दुख रूप है इससे ममता हटाकर अपने आत्मा में ममता प्रीति करना यह ज्ञान योग है जिसको जिसमें स्वाभाविक लगे सहजता लगे उनके लिए वही अच्छा है तीनों को साथ में करें दो को करें एक को करें लेकिन अपना कल्याण कर ले