आप अपने से अभिन्न जो परब्रह्म परमात्मा है आप जो चाहते हैं वह पा लीजिए ऊंची बात य है तो बाबा जी हम तो चाहते हैं बेटे की शादी गलत बात है हम प्रमोशन चाहते हैं गलत बात है आप यह नहीं चाहते प्रमोशन से शादी से त्याग से वैराग से राग से आप दो ही चीज चाहते हैं एक तो चाहते आनंद और दूसरा चाहते शांति अर्थात रस और शांति चाहते हम यह नहीं कहते कि भगवान को पालो मनुष्य की मांग का नाम है परमात्मा मनुष्य की मांग है शांति और आनंद वो शांति और आनंद जा है
वही परमात्मा है परमानंद है इसलिए थोड़ा-थोड़ा आनंद के लिए भटक भटक के माया में हमारी जिंदगियां बीत गई नानक ने कहा पूरा प्रभु आराध पूरा जा का नाम नानक पूरा पाइए पूरे के गुण तो कबीर जी कहते हैं कबीरा मांगे मांगना प्रभु दीजे मोहे दो संत समागम संत मतलब जिसके जन्म मरण का अंत करने वाली मति जागृत हो गई जिसकी वासनाओं का अंता ममता का अंत हो गया जिसको अंतक और शरीर से मैं मानने का अंत हो गया वह संत समागम हरि कथा संत का समागम और हरि की कथा यह दो चीज प्रभु मुझे दीजिए
तोम आदमी भले इतनी ऊंचाई त्याग की इतनी ईश्वर प्राप्ति की ललक ना हो फिर भी कम से कम भगवन नाम जपे और भगवत प्रीति के लिए जपे तो भगवन नाम से जो रस आएगा वह बुद्धि को शुद्ध करता जाएगा नाम जपत मंगल दि सदस नाम प्रस शभु अविनाशी तो नाम जपने की भी रीत शुरू शुरू में वखरी से जपे फिर धीरे धीरे मध्यमा से जप फिर पसंती से फिर परा से नाम के अर्थ में विश्रांति तो भगवत रसने लगेगा भगवत सामर्थ्य जगेगा और भगवत प्रसाद की प्राप्ति होगी गीता ने कहा प्रसादे सर्व दुखा नाम हानि
रस पज प्रसन्न चेत सोयास बुद्धि पर विष फिर वो बुद्धि उसमें बैठेगी परब्रह्म फिर आपकी बुद्धि बुद्धि नहीं रहेगी रितम भरा प्रज्ञा हो जाएगी रित माना वो सत्य सत्य से भरी हुई मति हो जाएगी जैसे लोहे की पुतली जंग लग गई नाली में आपने उठाकर साफ करके अलमारी में रख दी लेकिन वहां भी समय पाकर जंग लगने का भय है उसी लोहे की पुतली को आपने रस से स्पर्श करा दिया अब आप गटर में भी डाल दे तो सोने को जंग नहीं लगेगी ऐसे ही मति को कितना भी आप स्वच्छ करो कितना भी शुद्ध करो
फिर भी उसको अशुद्धि की जंग लगेगी एक बार अपने परब्रह्म परमात्मा तत्व के साथ उसका जरा सा साक्षात्कार करा दो मिलन करा दो फिर आपकी मति संसार व्यवहार करे कोई फर्क नहीं पड़ता राजा जनक राज्य करते थे कबीर जी ताना बुते और जीवन भर करते रहे रहत माया में फिरत उदासी कत कबीरा में उसका दासी य सत्संग की बलिहारी है उपनिषदों का ज्ञान अति उत्तम साधक के लिए तो उपनिषदों का ज्ञान हंसते खेलते उसे परमात्मा प्राप्ति करा दे आम आदमी के लिए तो संयम नियम त्याग कठिन है लेकिन जिनके जीवन में त्याग है व उपनिषद
के ज्ञान से छलांग मार के ज्ञात ज्ञ हो सकते हैं जिसको जानना चाहिए जान लेते जिसको पाना चाहिए पा यत पदम प्रेप सबो दीना शक्रादय सर्व देवता आहु तत्र स्थ तो योगी हर्ष नप गच्छति जिस पद को पाए बिना इंद्रा आदि देव अपने को कंगाल मानते उस आत्म पद को पाकर वह महापुरुष अहंकार नहीं करता यह भी आश्चर्य है ऐसा शास्त्रों में जड़ भरत जा रहे हैं रहु गण को कहते हैं रहु गण कहता है बाबा मेरे पालखी उठा पालखी उठा ली सिंध स्वरूप देश का मैं राजा हूं ठीक से चल तो तीन का चार
का हर्थ एक बीमार पड़ गया दस्त हो गया तो जड़ भरत महापुरुष ऐसे फक्क थे कोपन धार शरीर टकट जंगल में वि चरते थे मोन रहते थे मोन से शक्ति का संचय होता है लेकिन सत्संग मिले तो मौन से भी ऊंची बात है मौन भी चार प्रकार का होता है वशिष्ठ जीने इसका सुंदर वर्णन किया है जो सदा मौन स्वरूप है आत्म ज्ञान में पहुंच गए तो फिर सदा मौन है बोलते हुए आप मौन से ही जुड़े हैं नहीं तो वाणी कास्ट मोन अमुक मोन आदि होता है तो कहार की जगह पर जड़ भरत लगे
जड़ भरत कोई साधारण व्यक्ति नहीं थे जिनके नाम से तुम्हारे सिंध से जिसके नाम से अजनाभ खंड य अपना देश का नाम था अजनाभ खंड और ऋषभ देव के पुत्र भरत ने जब संभाला और ऐसी सुंदर व्यवस्था की कि गायों के लिए चारा पानी और रहन सहन पक्षियों के लिए दाना पानी पड़े ऐसी व्यवस्था और सके और लोग धर्म युक्त जीए ऐसी सुंदर ऐसी सुंदर व्यवस्था की तो अजनाभ खंड का नाम भारतवर्ष पड़ा भरत के नाम से उस भरत ने देखा कि यहां तो लोगों के लिए शरीर के लिए व्यवस्था हो गई लेकिन शरीर तो
इनका भी मरेगा मेरा भी मरेगा अंत में क्या मिला इतने बुद्धिमान भरत राज त्याग करके एकांत में गंडकी नदी के किनारे चले गए कुटिया बनाकर रहते त्रिकाल संध्या करते सूर्य को अर्ग देते समय दोपहर को गर्भिणी हिरणी पानी पीने आई तो शेर ने ड़ लिया शिकार के लिए तो गर्भिणी हरिणी घबराहट के कारण गंडकी नदी के उस छोर छलांग मारी तो भयभीत हिरणी गर्भिणी थी तो उसका बच्चा पानी में गिर गया और वह उस किनारे जा गिरी अपने लोत को घसीटते हुई किसी गुफा में जाकर दम तोड़ा उसने राजा भरत को अब महात्मा भरत कहेंगे
अपन महात्मा भरत जी को दया आ गई कि इसका बिचारी का कोई नहीं तो उस बच्चे को अपने आश्रम में लाए उसको चारा वारा खिलाते दूध बूत पिलाते हिरणी का बच्चा वैसे ही हिरना हिरण प्यारा लगता है वो बच्चा उनके कभी पीठ टता कभी खुजलाता अरे तू बैठ गायत्री कर तू बैठ ध्यान करब मनुष्य का बच्चा भी ध्यान में नहीं बैठता तो हिरण का बच्चा कहां बैठेगा धीरे धीरे उनसे ममता हो गई कुछ बड़ा उछला कूदा और कहीं जंगल में चला गया और इनके प्रारब्ध का [संगीत] वहां शरीर छूटने का तो हिरणी का चिंतन करते
करते शरीर छूटा के उसको बगड़ा तो नहीं खा गया उसका तो कोई नहीं था माई बाप भी मैं ही था उसका मित्र भी मैं ही था अरे बेचारे हिरणी का उस हिरण का बच्चे का क्या होगा तोय भरत जी भूल गए कि जो अनंत काल से सबका साथी है वो अभी भी हिरण का है आपका है हमारा है लेकिन उसका थोड़ा चिंतन हो गया तो दूसरे जन्म में हिरण बन गए हिरण तो बन गए कहां तो अजनाभ खंड के सम्राट और कहां चिंतन सत्संग के बदले हिरण संग का चिंतन हो गया आत्म चिंतन सोहम स्वरूप
के चिंतन के बदले वो हिरण का चिंतन हो गया तो दूसरा शरीर हिरण का मिला लेकिन की हुई साधना व्यर्थ नहीं जाती हिरण के शरीर में भी उनको एकादशी की स्मृति हो जाती कि आज 11 से है तो पत्ता तक नहीं खाते थे यह तो भागवत के आधार से मैं सुना रहा हूं लेकिन बरेली के पास है उजनी वहां मेरा सत्संग था तो उस कुछ लोग लाते ना प्रसाद वसाद तो इकट्ठा हो गया था थोड़ा व गरीब किसान के जो मजदूर थे पाच द उनकी झोपड़िया थी मैं वहां बांटने ले गया तो तीन कुत्ते थे
दो कुत्ते तो खा लेते थे जो कुछ खाने की चीज होती थी मिठाई मिठाई थोड़ी देते लेकिन तीसरा कुत्ता तो बस मेरी दी ही चीज को जरा सा सिर झुका के पूछ देता धन्यवाद कर देता तो उसकी उस मीठी चाल और आंखों में बड़ा प्रेम तो उस कुत्ते के प्रति मेरा भी थोड़ा ध्यान गया अरे भाई साहब यह नहीं लो तो लो हजूर यह खा लो वो नहीं खाए तो दूसरा तो कुत्ता बस मानो ले लिया आपका ऐसा करके पूछ ला देता आखिर मेरी हैरानी बढ़ गई मैंने कहा यह खाता क्यों नहीं सब दो कुत्ते
तो ल ले लेते और य बस आदर दिखा देता है पूछ हिला देता प्यार से देखता है क्या बोले बाबा आज मंगल का दिन तो नहीं है मैं क्या मंगल का दिन तो है आज अब कौन सा कैलेंडर देखता होगा कौन सी तारीख देखता होगा तो मानना पड़ेगा कि शरीर में साधना की और शरीर मर गया फिर भी आपका जीव तो वही का वही है उसमें संस्कार वही के वही है चलो यह तो बरेली की बात है आपके राजस्थान की बात डीसा से भी आगे एक संग चला रामदेव राजने को जोधपुर से आ गए रामदेवरा
तो आप जानते हैं रामापीर समाधि कुत्ता भी उनके साथ हो चला कुत्ते को दे तो कुछ ना खाए व 810 किलोमीटर का रणन पैदल की यात्रा जो संग चला था जब वहां पहुंचे तो कुत्ते की हालत अब मरू अब मरू तो संघ का जो आगे बान था वह जाकर राम देवरा के जो ट्रस्टी उनको कहा कि भाई साहब हम तो भले रात हो गई है कल दर्शन करेंगे लेकिन एक भगत राज है अगर उसने अभी दर्शन नहीं किया तो व भगत राज रात को दम तोड़ देगा पाप लगेगा तो उन्होंने दरवाजा खोला चलो भाई कर
लो राम भगत राज कहां है तो ले आए भगत राज बोले यह भगत राज कुत्ता बोले वही इसने हमारे साथ एक दिन भी अन्न नहीं लिया और वो रामदेव राज जी का दर्शन करके फिर बड़ा प्यार से ऊ करके बाद में कुछ उसने खाया तो मानना पड़ेगा कि जैसे अ भी इस युग में हम देख रहे हैं तो भागवत की बात में तो संदेह करना अपराध है तो वो भरत हिरण बन गए हिरण के शरीर में एकादशी का व्रत करते थे तीन साल उस शरीर में जिए बाद में उनका हिरण का शरीर अंत हुआ किसी
ब्राह्मण के घर उनका जन्म हुआ और ब्राह्मण ने उनका नाम भरतरी रख दिया अब उनको अगले जन्म की स्मृति थी के मैंने दोस्ती की और चित्त लगाया हिरण में तो हिरण का शरीर में भटकना पड़ा तो अब चित्त तो अपने अंतर आत्मा में सोहम स्वरूप में लगाए तो वो जड़ जैसा व्यवहार करते इसको में कोई पढ़ा है तो बोले पढ़ना क्या है जिससे सारा पढ़ा जाता है उसी को तो पढ़ना है विवेकानंद ने बहुत ऊंची बात कही विवेकानंद कहते थे मुझे अगर अभी संसार में कुछ फिर से पढ़ाई करनी पड़े तो मैं दो विषय पढ़ूंगा
एक तो अनासक्ति और दूसरा एकाग्रता दो चीज पढ़ ली सब पढ़ लिया संसार में आसक्ति जीव को बांधती आसक्ति नहीं तो आप राज कर लीजिए कोई फर्क नहीं पड़ता और आसक्ति है तो महाराज एक चदरिया भी फसा देती एक हिरण भी फसा देता है तो अनासक्ति और एकाग्रता यह दो विषय महाराज व महापुरुष जड़ जैसा व्यवहार करने लगे चलो पड़ता नहीं छोड़ तो खेत में जोत दो तो जहां बोले यहां पानी मोड़ना है वहां पानी तोड़ दे जहां से पानी तोड़ना है वहां मोड़ दे जहां बोले खोदना है वहां टेक कर दे घर वालों ने
कहा तो एकदम बुद्धू है बुद्धू अंदर से खूब समझदार बाहर से महामूर्ख जैसे तो घर वालों ने भरत नहीं जड़ भरत नाम दे दिया बोले अब तोत बाबा जी बन जाए चा घर में रहे रोटिया तोड़ता है तो खुश हो गए कि चलो बाबा बनने की इजाजत मिल गई तो चल दिए चल दिए तो कुछ दिन जंगलों में विचरण करते और वो जमाने में फल फूल की व्यवस्था थी जंगलात वालों का इतना य नहीं था लद थे फलों से पेड़ तो सिंध स्वरूप देश का राजा रहु गण कपिल आश्रम में शांति पाने के लिए जा
रहा था तो रास्ते में का हर की तकलीफ के कारण उनको बुलाकर जोत दिया अब व चलते चलते मकोड़े या कीड़े दिखे तो वह महापुरुष का हृदय है सियाराम में सब जग जाने तो कैसे उनको दबा देगा तो फजी तो नहीं कि बॉर्डर पर फौजी भी घर में चलेगा तो मकोड़े से तो बचेगा मकोड़े को थोड़ी मारेगा वो फोजी उसका भी तो दिल होता है तो वो तो महापुरुष थे वो तो खोजी थे फौजियों के भी आगे खोजी थे अपने सोहम को खोजने वाले तो गड़ी मकड़ी आए तो अपने को बचा उनको बचाने के लिए
जरा छलांग मार लेते तो राजा की खोपड़ी जो उसम बैठ था डोली में वहा टकराती तो राजा उनको डांटता कि अट्टा कट्टा है कि मानो दुबला है उठा नहीं सकता मैं नीचे उतरूंगा तेरा बैतो से चमड़ा उतार दूंगा तो क्या समझता है तो मेरे देश का फल फूल खाता है मेरे में रहता है मैं बगर कराने का मुझे अधिकार फिर भी इस महापुरुष के चित्त में शोभ नहीं होता था कैसी ऊंची समझ के धनी थे कोई कितना भी विकृत डांटे और चित्त में शोभ ना होना ये उपासना की पराकाष्ठा है सुंदर साधना का फल शोभ
तो नहीं हुआ फिर भी कुछ हुआ क्या हुआ महापुरुष के अंतःकरण में हुआ कि ये वही बेटा है जिसको मैंने कोमल कोमल घास खिलाया था और दूध पिलाया था वो हिरण का बच्चा है हालांकि शास्त्रीय रीत से तो हिरण के बच्चे को 100 100 जन्मों की यात्रा के बाद गांव का बच्चा आदि होकर फिर मनुष्य का बच्चा होने के बाद ही ज्ञान का ईश्वर प्राप्ति का भाग्य खुलता है लेकिन ये महापुरुष के हाथ का प्रसाद खाया इसलिए सीधा 100 जन्मों की यात्रा एक ही जन्म में हो गई और राज्य मिला रहु गण राजा सिंध स्वरूप
देश का राज्य होने के बाद भी सत्संग में रुचि बनी रही यह कोई पुण्य का प्रताप है शांति पाने के लिए आत्म शांति पाने के लिए वो जा रहा था तो यह महापुरुष उसको पहचान गए तो जैसे बेटा बाप के कंधे पर बैठता और कभी दाढ़ी खींचता और कभी मुछ खींचता तो कभी कान में फूंक मारता है तो बच्चे का बुरा नहीं माना जाता है ऐसे ही रगुण राजा चलो मेरे कंधे पर बैठा है बेटा तो है अपना हिरण बच्चा है वही चलो जो बोलना है बोलते हैं उस महापुरुष को शोभ नहीं हुआ लेकिन फिर
भी कुछ हुआ क्या हुआ कि दया का किरण हुआ दया उपजी वो महापुरुष बोले के राजन कौन किसको मारेगा एक मिट्टी का पुतला उस पर रखा हुआ डोली का भार और डोली में बैठा हुआ दूसरा पुतला एक पुतला दूसरे पुतले को तोड़ देया मार दे इसमें आकाश का क्या बिगड़ेगा मैं तो चदा काश अमर चद घन चि स्वरूप आत्मा तो आकाश को जैसे घड़ा फूटने से आकाश का कुछ नहीं बिगड़ता है सि राजन मेरा क्या बिगड़ेगा बाप रे यह तो एकदम तत्व ज्ञ महापुरुष है जिसको चमड़ा उधेड़ देने की धमकी दे रहे थे अभी उतरूंगा
मार डालूंगा वो जंप मार के उनके चरणों में गिर पड़े के बहु बहु साधो क्षमता आप मुझे माफ करिए आपने मेरे लिए अवतार धारण किया है प्रभु आप दिखते हैं एक साधारण अकिंचन फकीर साधु लंगोटी धारी लेकिन आप साक्षात शिव स्वरूप है आपने मेरे उद्धार के लिए लीला की महात्मा को महात्मा बोला तो क्या बड़ी बात है सेठ को सेठ बोल दिया तो क्या बड़ी बात है अरे ये सेठ तो राजा है तब आपने उसका स्वागत किया अरे महात्मा तो भगवत स्वरूप है तब आपने उसका स्वागत किया फोजी को फोजी बोल दिया तो क्या बड़ी
बात है भजी को जब खोजी बोलो तब उसका स्वागत हो गया वो खोजी है ईश्वर का खोजी है तो बहुत ऊंची बात हो गई ये तो फौजी है फौजी ऑफिसर है तो क्या हो गया ये तो सब बोलते हैं फौजी को फौजी बोलना कोई बड़ी बात नहीं है फौजी को खोजी तो कोई कोई बाबा बोलेगा और किसका दम है वैसी प्रकार महाराज जड़ भरत के चरणों में गिर पड़ा महाराज मैं सिंध सौप देश का राजा हूं लेकिन देखता हूं कि सोने की थाली में भोजन कर लिया घूम लिया खा लिया आखिरी शरीर खाक में मिल
जाएगा महाराज मैं बड़ा सुखी हूं बाहर से लेकिन अंत में क्या तो उस जड़ भरत ने दया कर के कहा कि राजन अहम पूर्वा भरत नामो राजा तेरा तो सिंध सौर एक प्रांत है बबलू मैं तो पूरे अजनाभ खंड का राजा था तो वो मेरा राज्य नहीं टिका और मैं हिरण के शरीर में झक मार के आया तो तू बोलता है मैं सुखी हूं और वैसे तो सब ठीक ठाक है तो तेरा ठीक ठाक कब तक टगा रिटायरमेंट हो जाती तो ऑफिसर का हाल क्या होता है तो बाहर की सुविधा का मजा भारी पड़ता है
अंतर आत्मा का सुख फिर महाराज ने उपदेश दिया और जो उपदेश दिया रघ गढ़ राजा को वाह वाह जड़ भरत महाराज रघ गण राजा का प्रकाश मैं जो अपना मैं था जागृत नहीं तो रहु गण राजा 10 जन्म और भी कसरत करता तो कुछ नहीं मिलता संत समागम हरि कथा तुलसी दुर्लभ नारायण नारायण नारायण भगवान करे कि भगवान में प्रीति हो जाए भगवान करे कि भगवत चर्चा तत कथन तत श्रवण अन्योन्य तत बोधन उसी परमेश्वर का कथन उसी का श्रवण हो जब बात चले तो उसी का एक दूसरे के बीच वार्तालाप हो तो दृढ़ होता
है ज्ञान भक्ति रस आता है वशिष्ठ महाराज इतने महापुरुष फिर भी संतों के साथ सत्संगति कर मेरे गुरुदेव 93 साल के थे छोटी उम्र में ईश्वर प्राप्ति तो हो गई उसके पहले घर में थे तो बाव प्रे भा मेरे गुरुदेव के मां-बाप बचपन में चले गए थे और फिर सबंध के घर में ही पले पूछे तो उसका करियानी का धंधा था तो दो बैल गाड़िया भरवा के सामान ले आ रहे थे रास्ते में अकाल ग्रस्त लोगों को देखकर उनका हृदय द्रवित हो गया कि मानव तो है बेचारे भूखे प्यास आ जाओ भाई थोड़ा ले लो
आटा गुड़ बु अब अकाल ग्रस्त थोड़ा क्या लेंगे दोनों बैल गाड़िया खाली कर दी बार दन वो पूरा बार दन गोदाम में डाल के घबराते हुए कि अब तो मार डालेंगे मां तो नहीं है बाप तो नहीं है ये बुआ जी तो खबर ले ले बुखार का बहाना करके घर लेट गए एक दिन हुआ दो दिन हुआ प्रार्थना कर रहे भगवान तू मेरी लाज रखना बार दन खाली घी के डिब्बे भी खाली शक्कर के भी खाली आटा भी खाली चावल के खाली बारन प्रार्थना करते करते अनजाने में जहां से सारी सृष्टि चलती और शरीर को
उस परमेश्वर में खो गए वहां दूसरे नहीं तो तीसरे दिन गोदाम जाकर खोलता है तो सार बारने भरे हुए माल एंट्री किया बोले बेटा इतना बढ़िया सौदा लाया है पैसे खोटे तो नहीं तो लीलाराम घबराए बोले पैसे भी पूरे हो गए माल भी पूरा हो गया बोले बेटा तेरे को मगज का बुखार छड़ गया मगज का बुखार चढ गया बोले नहीं अकाल ग्रस्त लोग इसलिए हमने दे दि बोले बेटा क्या बोलता है काल ग्रस्त लोगों को दे दिया क्या ये सारे तो चावल भी फर्स्ट क्लास है वो भी है मूंग की दाल तो देख के
चम दुकान गए गए तो देखा कि वई रदान भरे भरे अरे जिसने खाली रदान भरे हैं मैं उसी को खोजू बस चल दिए घर से 17 18 साल की उम्र में फिर तो योग साधना देखिए एक बार एकांत ज्यादा प्रिय था मेरे गुरु जी को जैसे ज्ञानेश्वर ने चबूतरा चला दिया ऐसे एक बार कुछ विवाद था सिंधी लोग बोलते थे कि भाई आपने रातो रात हमारी जमीन झुले लाल साई के हड़ के आपने उसमें लगा दीय ठीक नहीं तो मुग दमा चलता था पिछले 400 साल से अंग्रेज तो चाहते थे कि हिंदू और ला वाले
मिटते रहे आखिर मुसलमानों ने और हिंदुओं ने फैसला किया कि हिंदू अपना संत ले आए मुसलमान अपना पीर फकीर ले दोनों करामत दिखा दे जिसकी जीत होगी वह जगा उसकी तो अला बांध बला बांध भूत बांध प्रेत बांध डाकी नहीं बांध शाकी नहीं बांध य टने टूटके वाले चपरासी हजार भी जोर मारे लेकिन राष्ट्रपति का एक सिगने हजार चपरासियों से ज्यादा माना रखता है तोव तो बहुत सारे टीने टोटके किए उन्होंने और हमारे गुरु जी का थोड़ा ना छोटे शिष्य में बैठे बैठे जब पहलवान मार खा खाक जब उठता है तो पटक देता है ऐसे
उन्होंने मखोल बाजी करते ले लेकिन चित्त में शोभ नहीं शांत भाव से फ आंख खोल के सामने पेड़ था पेड़ को बोला जा जहां सच्ची जगह है वहीं ठहर तो पेड़ चल पड़ा पेड़ चल पड़ा तो मुसलमान घबरा ला तो तो कोई फकीर अला आप लीला राम नहीं आप आज से लीलाशाह हमारे भी गुरु है पीर है तब से हमारे लीलाराम साई का नाम लीलाशाह जी पड़ तो ऐसे गुरुदेव के संपर्क से जो मिलता है उसका हम 10 जन्म तक भी साधना करें तो नहीं पा सकते थे हालांकि बचपन में हमने बहुत पापड़ बले बहुत
चमत्कार भी दिखे लेकिन सतगुरु के ज्ञान के बिना उस समय लगता था कि बहुत जानते थे बहुत अच्छा है बहुत आ 10 साल की उम्र में कुछ ऐसी चमत्कार ऐसा कुछ हो जाता था ईश्वर की लीला ईश्वर जाने लगता था कि अपने लेकिन जब गुरुदेव के चरणों में गया था पता चला कि अरे अभी तो कुछ नहीं जानते तो लगता था बहुत जानते हम जब थोड़ा थोड़ा जाना तो लगता है कि कुछ नहीं जानते य सत्संग के बिना गलती नहीं निकलती सत्संग के बिना गलती नहीं निकलती इसलिए कबीर जी के वचन को तो हम बहुत
आदर से बोलते हैं कई बार बोलते हैं कबीरा मांगे मांगना कबीरा मांगे मांगना प्रभु मोहे दोय प्रभु दीजो मोहे दो संत समागम हरि कथा संत समागम हरि कथा मो उर निश दिन होय मोर निश दिन हो मो घर निश दिन होए मो घर निश दिन हो अपने घर में अपने हृदय में रोज सत्संगति होती रहे सत्संग नहीं होगा तो कु संग जरूर होगा सारा दिन समाधि नहीं लग सकती सारा दिन माला नहीं घुमा सकते सारा दिन ध्यान नहीं होगा सत्संग के बिना ध्यान में मनोरा होने की संभावना है समाधि में कल्पना होने की संभावना जब
सत्संग में बैठेंगे तो व्यवहार काल में भी सत्संग की बातें बड़ी मदद करती है तो एकांत में भी सत्संग की बातें बड़ी मदद कर इसलिए वशिष्ठ जी ने कहा राम जी सत्संग करता सबसे ऊंचा है बड़े कितना जति जोगी तप हो लेकिन सत परमात्मा तत्व सत्संग करने वाले के आगे वे आदर्श से आगे बैठते ले उनमें हीन भाव नहीं होता और सत्संग करने वाले में अहम भाव नहीं आता यह भी तो सत्संग का प्रभाव जो जाने सत्संग प्रभाव लोक न भेद न आन उ पाऊ सत्संग का प्रभाव बड़ा भारी सत्संगति किम न करोति पुन मनुष्य
का क्या हित नहीं कर सकती सत्संगति सुलभा को सत्संगी ने कहां पहुंचा दिया मीरा कती 68 तीर्थ गुरु जी ना चरण गुरु जी रे चरण रज उडी उडी लागे मोहे अंग बेनरी मने भाग्य मयो सत्संग वशिष्ठ जी कहते राम जी चांडाल के घर की भिक्षा ठीक में खाने को मिले एक टाइम और सत्संग मिले तो उस स्थान का त्याग नहीं करना चाहिए अन्य ऐश्वर्य भोग को लात मार देनी चाहिए क्योंकि ऐश्वर्य भोग तो अंत में नर कों में ले जाएगा और सत्संग सत्य स्वरूप ईश्वर से अभिन्न कर देगा डाल के घर के आपका समझो वहां
कोई अप्रोच नहीं है कोई व्यवस्था नहीं और मरुभूमि में कोई महापुरुष है और सत्संग मिल रहा है आपको तो पेट को आहुति देने के लिए फूटे ठक में चंडाल के घर की भी भिक्षा मिले तो खा लीजिए सत्संग का त्याग मत करे सत्संग की ऐसी बलिहारी ऐसी महिमा नारायण नारायण हम एकांतवास के दिनों में भी शाम को देखो थोड़ा बहुत सत्संग होही जाता है मुझे तो ऐसा कभी नहीं लगा कि मेरे गुरुदेव 93 साल तक की उम्र थी एक दिन भी बिना सत्संग के रहे हो लोग संपर्क में रहते तो हजारों लोग के बीच सत्संग
सुनाते लेकिन अकेले में रहते हम रहते एक उनका सेवक रहता एक द तो हम सत्संग करते और गुरु जी सुनते थे हम शास्त्र पढ़ते हैं गुरुजी सुनते थे अभी भी राम सुख दास जी महाराज है 100 साल की उम्र सुबह पा 5 बजे भी उनको देखो तो स्वाध्याय 8 बजे 20 स्वाध्याय सत्संग फिर शाम को 4 बजे तीन टाइम सत्संग 100 साल की उम्र है तब भी और बड़े हसते खेलते प्रसन्न चित सत्संग से जो चित्त में रस आता है आनंद आता है उससे तो कई आरोग्य के कण बन जाते हैं स्वास्थ्य भी अच्छा होता
है भगवन नाम जपने से जैसे हमारे रक्त बहिनिया में चि में इसका सात्विक प्रभाव पड़ता है से सत्संग के विचारों से भी बहुत लाभ होता है जो सत्संगी नहीं है उसे आरोग्य के लिए कैप्सूल खाने पड़ेंगे इंजेक्शन लेने पड़ेंगे सत्संगी है तो आरोग्य का रस ऐसे ही बनता रहे जो सत्संगी नहीं है उसे ज्ञान के लिए पोथे थोथे खोपड़े में रटने पड़ेंगे और जो संत पुरुष है उनका ज्ञान का दरिया ऐसे ही छलकता रहेगा जो सत्संगी नहीं है उसे खुशी के लिए क्लबों में शराब में कबाब में नाच गानों में जाकर सुख खोजना पड़ेगा और
जो सत्संग से तृप्त है वो अपने आप में गोता मार के आनंदित हो जाते हैं कितनी स्वतंत्रता है ओम नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण