भारतीय संस्कृति की एक विशेषता है कि इस संस्कृति का धर्म स्थापन किसी पैगंबर ने या ईश्वर के पुत्र ने नहीं किया अथवा किसी ऋषि मुनि ने नहीं किया भारत में विश्व में चार धर्म बड़े प्रसिद्ध हैं उसको मानने वाले करोड़ों करोड़ों लोग है ईसाई धर्म को मानने वाले करोड़ों करोड़ लोग इस्लाम को मानने वाले करोड़ों भाई लोग है बौद्ध धर्म आदि को मानने वाले करोड़ों लोग है हिंदू धर्म को मानने वाले सनातन धर्म को मानने वाले करोड़ों लोग है जीसस के बाद ईसाइयत चली मोहम्मद के बाद इस्लाम बुद्ध के बाद बुद्धि जम चला लेकिन दूसरा
बुद्ध दूसरा मोहम्मद दूसरा जीसस हमने आपने आज तक देखा सुना नहीं किन सनातन धर्म किसी पैगंबर ने स्थापित किया है ना किसी ईश्वर के बेटे जीसस जैसे भारत के संत ने स्थापित किया ना भगवान कृष्ण ने सनातन धर्म चलाया नहीं भगवान राम ने सनातन धर्म चलाया नहीं अपितु भगवान राम और कृष्ण भी सनातन धर्म की रीति से साधन करने वाले के यहां बालक रूप में प्रकट हुए हैं [प्रशंसा] इस सनातन संस्कृति की स्थापना किसी ऋषि ने नहीं की है कृष्ण ने नहीं की राम ने नहीं की किसी ऋषि मुनि ने नहीं की और यह मंत्र
ऋषि मुनियों ने नहीं बनाए ऋषि मुनियों ने भारतीय संस्कृति के रहस्यों के मंत्रों के सार तत्त्वों को मंत्रों को ऋषियों ने देखा ऋषि तू मंत्र दृष्ट ार न करतार ऋषि मंत्र दृष्टा है जैसे गायत्री मंत्र के दृष्टा विश्वामित्र ऋषि है अमुक मंत्र के दृष्टा फलाने ऋषि है अभी विज्ञानी लोग दंग रह गए कि भारत का मंत्र विज्ञान गजब का है हरि शब्द उच्चारण करने से लीवर पर इफेक्ट पड़ती है गर भाष पर अच्छी इफेक्ट पड़ती है राम नाम शब्द उच्चारण करने से ज्ञान तंतु में झनकार उत्पन्न होती है और आंतों का विष दूर हो जाता
है सरप्राइज लेकिन उन बेचारे बच्चों को पता ही नहीं कि मंत्र दृष्टा ऋषियों ने केवल तुम्हारी लीवर या गर्भाशय आते अथवा ज्ञान तंतु ठीक करने के लिए ही मंत्र नहीं खोचे हैं 84 लाख जन्मों की यात्रा का अंत करके अपने ईश्वर को यहीं प्रकट करने के लिए मंत्रों को खोजा है जैसे भारत सरकार तो एक है लेकिन उसके विभाग डिपार्टमेंट अलग-अलग है आपको तार टेलीग्राम आदि पोस्टल काम करना हो तो आप अटल जी के पास मत जाइए टेलीफोन विभाग पोस्ट विभाग के पास आपको अगर मेडिसिन का कुछ लाभ उठाना या भर्ती होना या प्रमोशन होना
है या कुछ पीडब्ल्यूडी से लेना है तो उस विभाग का द्वार खटखटा तो भारत सरकार तो एक उसके विभाग अभिन्न भिन्न है अगर आपका उत्तर प्रदेश का विभाग है तब भी आप दिल्ली में मत दौड़ है महामहिम तक आप अपना फइल ले जा तो अलग-अलग विभाग के अलग-अलग अधिष्ठाता मुख्या है ऐसे ही भारतीय संस्कृति में आपको ईश्वर को पाना है तो उसका यह उपाय है लेकिन आपको घर में दिव्य संतान लाना है तो आप पितरों का तर्पण करिए और पितरों का तर्पण करके ऊंचे हाथ उठाकर सूर्यनारायण को साक्षी करके कहिए कि हे पितरों मेरे तर्पण
से मेरे श्राद से आप प्रसन्न हुए हो तो मेरे घर में ऐसा ऐसा संतान आए ब्राह्मण ने प्रार्थना की कि मेरे घर में ऐसा संतान आए कि जो अंग्रेजों के शोषण से भारत को बचाने में भागीदार हो और ब्राह्मण के घर वह बालक आया जिसका नाम पड़ा मदन मोहन मालवे कांग्रेस बुरी तरह टूट रही थी अंग्रेजों का षड्यंत्र सफल हो रहा था अधिवेशन अधिवेशन उनका विफल हो रहा था और मदन मोहन मालवे कमरे में चले गए थोड़े शांत हुए मेरे लिए नहीं अपने फल की इच्छा नहीं है ममता नहीं है आसक्ति नहीं है लेकिन कर्म
कर रहे हैं मालवी जी क्या कर्म कर रहे हैं कि भारत को आजाद कराने का कर्म कर रहे हैं बहुजन हिताय बहुजन सुखाय कर्म तो कर रहे लेकिन उस कर्म में योग मिला रहे हैं ध्यान योग में चले गए और भीतर से प्रेरणा हुई और मालवे जी ने गजेंद्र स्तोत्र का पाठ किया और बाद में जरा सा बोले और सारे टूटे साथियों के दिल जुड़ गए और एक जूट होकर अंग्रेजों को भगाने के काम में लग गए गांधी जी अपने कर्मों में दिव्यता लाते तो रोज प्रार्थना करते और कर्म ईश्वर अर्पण करते अंग्रेजों ने उनको
झासा दिया कि अभी तुम यह हलचल को जरा स्थगित करो हम तुम्हारी सारी बातें मानेंगे लेकिन अभी आप का ये आंदोलन आप वापस खींच लो सच्चे इंसान गांधी जी ने आंदोलन वापस खींच लिया तारीख रखी गई और अंग्रेजों ने अपने वायदे से नन्ना पुकार दिया एकदम झांसा दिया बुरा धोखा दिया गांधी जी के अंतेवासी और वो नायडू कार्यकर्ता ने देखा कि अब गांधी जी जरूर आत्महत्या करने जाएंगे या तो फिर शराब बराब पीकर कोई गोली खाकर सो जाएंगे उनके अंतेवासी उनका पीछा करते-करते पहुंचे तो गांधी जी मुख्य रसोड़ा संवारने लगे और वहां गप सप करते
हुए हंसते हुए काम में लग गए तो सुशीला नायडू ने पूछा कि बापू जी आपको इतना बड़ा धोखा मिला हम सोच रहे कि आप क्या पता फांसा खाकर सुसाइड करेंगे या कुछ जहरी दवा खाएंगे या रेलगाड़ी के पटरियों पर आत्महत्या करेंगे या और कुछ करेंगे आप तो सीधे इस रसोड़ा गए और हस्ते खेलते आप लोकी सवारने और सब्जी काटने की काम में लग गांधी जी ने कहा मैं गीता का पुजारी हूं कर्म करना मेरा कर्तव्य है और फल ईश्वर की इच्छा पर छोड़ता हूं इसलिए मुझे चोट नहीं लगती है यह कर्म दिव्य हो गए जन्म
कर्म चमे दिव्यम यो वेति माम तत्व महापुरुषों का जन्मदिवस मनाते हैं तो महापुरुष बड़े हो जाते हैं भगवान का जन्मदिवस मनाते तो क्या भगवान बड़े हो जाएंगे नहीं हम उनके बड़पन के गुणों को अपने में लाने का अवसर खोज लेते हैं कि महापुरुष अथवा भगवान किस ढंग से कर्म करते हैं बोलते तो कैसे बोलते हैं सोचते तो कैसे सोचते हैं कितना सोचते हैं और सोच में सोचने वाला उनका बचता है कि सोचने वाला उन उनका योग में एकाकार होकर शुद्ध बुद्धि से उनके निर्णय होते हैं यह दिव्यता उनके संपर्क से उनके सत्संग से उनके सानिध्य
से उनके उत्सव और जन्माष्टमी और रामनवमी आदि उत्सव मनाने से हम लोगों में यह दिव्यता आती है इससे हम भाग्यशाली बनते हैं क्योंकि सनातन सत्य की परंपरा है व्यक्तियों का स्थापित धर्म ठीक है अच्छा है लेकिन वो मत हो जाते मति से स्थापित और मति में परिवर्तन होता रहता है इसलिए मत मता होते हैं और सनातन धर्म में भी मत पंथ है लेकिन सनातन सत्य की स्थापना किसी व्यक्ति ने नहीं की किसी ऋषि ने नहीं की किसी अवतार ने नहीं की सनातन सत्य जो सृष्टि के पहले था अब भी है और बाद में रहेगा उस
सनातन सत्य को जानने के लिए जो व्यवस्था की गई वह किसी व्यक्ति ऋषि मुनि के द्वारा नहीं है जैसे सृष्टिकर्ता ने सनातन सत्य की सत्ता से सृष्टि उत्पन्न की ऐसे सृष्टि में पार होने की अपने ईश्वर तत्व को जानने की व्यवस्था भी उत्पन्न हुई इसी को बोलते हैं सनातन धर्म हिंदू धर्म इसमें अभी भी कई अवतार हो चुके हैं कई होते रहते हैं और कई होते रहेंगे एक होते हैं नमिता जैसे कंस का निमित्त लेकर श्री कृष्ण का अवतरण हुआ राम जी का रावण का निमित्त लेकर राम जी का अवतरण हुआ रणा कश्यप का निमित्त
लेकर भगवान नरसिंह का अवतरण हुआ इसे नैमत अवतार कहते हैं और दूसरे होते हैं नित्य अवतार नित्य जैसे सृष्टि चली आ रही है तो इसमें बुराइयां भी चली आ रही है तो अच्छाइयों की भी परंपरा चली आ रहे इसलिए भगवान संतों के हृदय में नित्य अवतरित होते रहते हैं इसीलिए संतों का नित्य अवतरण माना जाता है कभी वल्लभाचार्य आए तो कभी रामानुजाचार्य आए कभी कबीर आए तो कभी नानक आए तो कभी कोई महापुरुष आए तो कभी मीरा आए तो कभी गारगी तो कई मदालसा कहीं सुलभा तो कई स्वयं प्रभा हनुमान जी खोजने गए सीता को
भूख और प्यास से व्याकुल के लिए पानी के लिए इधर उधर निहारते हनुमान जी दूर दूर पेड़ देखे और पक्षियों का आग आना जाना देखा बुद्धिमान हनुमान जी ने साथियों को कहा वहां पानी होगा पहुंचे तो पानी का तो झरना है सुंदर आश्रम है आश्रम के अधिष्ठात्री देवी स्वयं प्रभा ध्यान में बैठी हनुमान जी वहां गए और स्वयं प्रभा ने आंख खोलकर पैला ही सवाल किया कि तुम हनुमान हो क्या राम जी के दूत हनुमान हो ना सीता को खोजते खोजते भूख और प्यास से थककर यहां पानी पीने को आए हो तो हनुमान जी टकर
टकर देख रहे हैं उस जमाने में तुम्हारे टेलीफोन टेलीविजन नहीं थे तब की बात है अच्छा जामत हनुमान अंगत तुम फल आदि ले लो पानी पी लो बाद में बात करते हैं ले लिया आए तो भारत की उस जन्म कर्म दिव्य की यात्रा कर चुकी उस स्वयं प्रभा ने देखो नाम कैसा है स्वयं प्रभा उधारी प्रभा नहीं रट रट कर सर्टिफिकेट के द्वारा लाई हुई प्रभा अलग बात है लेकिन योग करके आत्मा परमात्मा सनातन सत्य में विश्रांति पाकर लाई हुई प्रभा दिव्य होती है उस दिव्य प्रभा की धनी भारत की कन्या ने पूछा कि हनुमान
अंगत जामन तुम सीता को खोते खोते थके सीता जी का पता नहीं चला तुम सीता को आंखें खोल खोल कर खोज रहे हो कि आंखें बंद करके अंगत राजवी आदमी बोलता है कि हम कोई आंखें बंद करके खोजें क्या हम तो आंखें फाड़ फाड़ के खोजते हैं लेकिन अभी तक सीता नहीं मिली हम थक गए और प्रभु जी को एक महीने में सीता की खबर देनी है तीन हफ्ते पूर्ण हो चुके अब हम बड़े लाचार हम आंखें बंद करके कैसे खोजें तब भारत की कन्या कहती है कि अंगत सीता य भगवान की अर्धांगिनी है भगवान
की माया विशिष्ट चेतना है सीता को खोजना है नहीं तो तुम्हें योग करना पड़ेगा तुच्छ कर्मों से सीता को नहीं खोज सकते तुम कर्मों को दिव्य बनाओ अर्थात अंतर्मुखी पड़ेगा मैं योग करके तुम्हें बताती हूं सीता कहां है स्वयं प्रभा ने तनिक विश्रांति पाई और कहा कि सीता तुम इधर खोजते हो तो दरिया के पार है अशोक वाटिका में है और त्रिजटा उसकी सेवा में है है तो नौकरानी वण की लेकिन सीता के प्रभाव से वह सीता की चली हो गई है ओ हो समुद्र पार समुद्र तक पहुंचते पहुंचते तो सप्ताह यहीं पूरा हो जाएगा
फिर भी समुद्र तक हम नहीं जा पाएंगे अब क्या करें भारत की वह योगिनी कन्या कहती तुम फिक्र ना करो हनुमान अंगत जामन मैं अपनी योग शक्ति से तुमको चुटकी भर देर में वहां पहुंचा देती हू आप आंख बंद करिए आंख बंद किया और योग धारणा के बल से चुटकी भर देर में उनको समुद्र के तट पर पहुंचा दिया रामायण में वर्णन आता है ठंडे सकल सिंधु के रा रामायण की सीरियल जिन्होने देखी होगी उनको भी यह दृश्य दिखा होगा तो आपके अंदर जो ईश्वर तत्व है उसको आप नहीं जानते पार्श्वी वासनाओं को सहमति देते
हैं जड़ शरीर को मैं मानते हैं और जड़ शरीर के साथ संबंधित वस्तुओं को और व्यक्तियों मेरा मानते हैं तो आपके कर्म और आपका जीवन साधारण हो जाता है लेकिन श्री कृष्ण अपने चैतन्य वपु को मैं मानते हैं और अपने व्यापक पपू को ही सारे ब्रह्मांड को मेरा मानते हैं ऐसे आप श्री कृष्ण और कृष्ण तत्व को जाने हुए महापुरुष के जन्म और कर्म का अनुसंधान करके अपने जन्म और कर्म को दिव्य बनाकर मुक्त आत्मा हो जाए तात्मा प्रशांत स्य परमात्मा समाहित शीतोषण सुख दुखे स तथा मान अपमान आपके जड़ शरीर की मैं हटेगी पार्श्वी
वासनाओं के साथ तादात में हटेगा तो आपका अपना जन्म और कर्म दिव्यता का स्वभाव छलके का आप अभी हैं तो आप कहीं न कहीं कल थे कल थे तो साल भर पहले थे और 10 साल पहले थे आप मां के गोद में थे तभी आप यहां हो जय राम जी की मां के गोद के प पहले आप मां के गर्भ में थे तभी मां के गोद में आए और मां के गर्भ में आने के पहले आप कहीं थे और जहां थे उसके पहले कहीं थे उसके पहले उसके पहले उसके पहले चलते चलते जाओ तो सनातन
सत्य जो सृष्टि के पहले था तब आप थे और मरने के बाद कहीं ना कहीं रहोगे रहोगे रहोगे उसके बाद उसके बाद तो कहीं ना कहीं अंत में आप रहोगे तो आपका ईश्वरी तत्व सनातन सत्य है दिव्य है और आपका शरीर जड़ है और पार्श्वी वासना है इन पार्श्वी वासना और जड़ शरीर और आत्मा की दिव्यता इन तीनों का मेल से जीव बिचारा साधारण जन्म मरण के चक्कर में चला आता है मनुष्य देह में उसको दाता ऐसी बुद्धि देता है कि सत्संग का आश्रय करके अपना ईश्वर स्वभाव जागृत करें अपना ईश्वरीय सुख जागृत करें अपना
ईश्वरीय आनंद जागृत करें और जब शरीर मरने को हो तो याद रखें कि मर रहा है वह शरीर है जब बीमारी आए तो याद रखें कि बीमार हुआ है शरीर मेरे पैर में दर्द है पेट में दर्द है या पीठ में दर्द है सिर में दर्द है मैं इससे न्यारा हूं मन में चिंता है मैं इससे न्यारा हूं शरीर में पीड़ा है इससे मैं न्यारा हूं मन में वासना है इससे मैं न्यारा हूं तो वासना और पीड़ा आपको दबाए गी नहीं लेकिन आपकी दिव्यता आपके कर्मों में और जन्मों में चमकेगी और आपका भी मोक्ष आपके
हाथ का खेल हो जाएगा भगवान कहते हैं मेरे जन्म और कर्म को जो जानता है वह उसकी सद्गति हो जाती तो महापुरुष लोग भगवान के जन्म और कर्म की दिव्यता जानते हैं और महापुरुषों के द्वारा अपन लोग जानते हैं तो अपना भी जन्म और कर्म दिव्य होने लगता है जो पहले दुख की चोट लगती थी सत्संग के बाद वह चोट नहीं लगती है पहले जो सुख का अहं का आता था अब यह महामहिम की जगह पर जो विराजमान है सूरज भान जी अगर सत्संगी नहीं होते तो यह पद कितना ऊंचा है बड़ा आडंबर होता लेकिन
इनको तो बाबा आए तो वहां ही बैठ गए श्रोताओं के बीच में जय राम जी की हमने आकर इनको कहा सेवा आधार के भाई कुर्सी प कुर्सी कुर्सी प बैठा दे पूरे हैं वे मर्द जो हर हाल में खुश है मिला अगर माल तो उस माल में खुश है हो गए बेहाल तो उस हाल में खुश है कभी ओढे टाट तो कभी बाट में खुश है कभी चबा वे चना चबीना तो कभी लपटा ले खीरा वारे मौज फकीर दी ये फाकी कर लेते हैं संदे हों की ये फाकी कर लेते हैं वासनाओं की ये फाकी
कर लेते बंधनों की यह फाकी कर लेते हैं अहंकार की यह फाकी कर लेते हैं लोग क्या कहेंगे मैं ऐसा मैं बड़ा मैं छोटा अंग्रेजी शासन में राज्यपालों का कितना आडंबर होता था और भारतीय संस्कृति के राज्यपाल में क्या आपके अभी के वर्तमान प्राइम मिनिस्टर अटल जी इसी लखनऊ में मेरे निवास पर चले आए जय राम जी मैं कहा चलो सत्संग में चले और य इसी आपके लखनऊ में हमारे साथ कीर्तन में नाचे थे मैं अर मोर तोर की माया बस कर दनी जीवन काया जीवन सहज भी तो होना चाहिए स्वाभाविक भी तो होना चाहिए
व्यवहार को छाती पर इतना मत रखो कुर्सी को अपने कुछ लोग बोलते हैं कि नेता तो कुर्सी पर क्या बैठता है नेता के सिर पर कुर्सी बैठ जाती है लेकिन जो सत्संगी नेता है उनके सिर पर कुर्सी नहीं बैठती वह सचमुच में कुर्सी पर बैठते हैं जय राम जी जिनके कर्म सत्संग के द्वारा दिव्य हो जाते उनका साधारण व्यक्तियों जैसा जीवन दिखते हुए भी अंदर से असाधारण आत्मिक शांति से संपन्न होते हैं कहो तो है नहीं ना कहो तो है कहो कि यह है तो दिखेगा नहीं वह ईश्वर तत्व कहो तो है नहीं नाही ही
कहो तो है नाही ही के बीच में जो कुछ है सो है जहां बोले तहां जहां बोले तहां और जहां ना बोले तहां तो बोलने को भी जो देखता है और ना बोलने को भी देखता है सुख को भी जो देखता है दुख को भी देखता तंदुरुस्ती को भी देखता है और बीमारी को भी जो देखता है उसको तू देख इसी का नाम है तेरा ईश्वर को तू जागृत कर तो तेरा जन्म और तेरे कर्म दिव्य हो जाएंगे भैया अच्छे काम करने से आदमी अच्छा नहीं हो जाता है राजपाल जी ध्यान से सुन रहे हैं
बातों को अच्छे काम करने से आदमी अच्छा नहीं हो जाता है कई ठग अच्छे काम करते हैं क तीन पत्ती वाले भी शुरू शुरू में अच्छे काम करके पैसे जीत के आपको दे देते लो भाई साहब लो भाई साहब बाद में आपकी जेब खाली कर देते कई ठग अच्छे काम कर लेते हैं अच्छे काम करने से आदमी अच्छा नहीं होता बुराई छोड़ने से आदमी अच्छा होता है जय राम जी की बुराई छोड़ने से आदमी अच्छा होता है और जब आदमी अच्छा होता है तो जो कुछ करता है अच्छा हो जाता है कर्ता की जहां अंता
होती है अ ममता होती है कर्म उसके ऐसे होने लगते हैं कई ऐसे लोगों के दृष्टांत आपने अपने जीवन में देखे होंगे और अभी भी देख सकते हैं बड़े अच्छे काम करते हुए दिखते हैं लेकिन फिर गहराई में देखो तो हो हो तौबा तौबा तबा बुराई छोड़ने से आदमी अच्छा होता है और अपनी बुराई अपन लोग जितनी जानते हैं उतना अपना पड़ोसी नहीं जानता है अपनी बुराई अपन जानते उतना अपना कुटुंब भी शायद नहीं जानता और अपनी बुराई निकाल ने का सुंदर उपाय है कि जो बुराई आपके हौसले को दबा रखी है जो बुराई आपके
व्यक्तित्व को निखरने नहीं देती है जो बुराई कोई सब लोग आपकी वाहवाही करें और सहरा ना हो जाए थोड़ी देर के लिए हर्ष मिलेगा लेकिन बुराई आपका हृदय रोकेगी रोकेगी लेकिन आप कभी कोई कर्म करते हो और सभी लोग उसकी प्रशंसा नहीं करते निंदा भी करते हैं लेकिन आपने अच्छाई से संपन्न होकर कर्म किया है तो चाहे रावण के आगे जाने में अंगत को अहंकार दिखाने का कर्म प करना पड़ा और रावण को अशोक वाटिका जलाने लंका जलाने का और हनुमान को लंका जलाने का कर्म करना पड़ा फिर भी हनुमान जी के अंतर आत्मा में
शोभ नहीं होता अंगत के अंतर आत्मा में अहंकार नहीं होता उनके कर्म दिव्य माने जाएंगे क्योंकि फल इच्छा नहीं है कर्तव्य बुद्धि नहीं है और अंदर में कर्ता तुच्छ नहीं है कर्ता को दिव्य बनाओ तो आपके कर्म दिव्य होंगे कर्ता को दिव्य बनाओ तो आपका यही जन्म दिव्य हो जाएगा तो कर्ता को दिव्य कैसे बनाए बाबा आप सुबह उठो नादो के पूर्व अभिमुख बैठो लंबे श्वास लो मंत्र दीक्षा देते समय यह प्रयोग कराए जाते हैं लंबे श्वास लो जिसे आत्मिक शक्ति विल पावर का विकास हो ऐसा एकाद मंत्र जपो मंत्र जपते दो चार मिनट के
बाद अपना जो हीन स्वभाव है अपनी जो गलती है उस गलती को मन के सामने लाओ और आज से इतने दिन तक यह गलती मैं नहीं करूंगा की हुई गलती फिर से ना दोहराना यह उत्तम प्रायश्चित है जैसे पैर का एक-एक कांटा निकाल देने से आपका पैर स्वस्थ हो जाता है ऐसे आपके अंतःकरण से एक-एक गलती एक एक दुष्ट विचार को निकाल कर फेंक देने से आपका अंतःकरण निर्मल हो जाएगा निर्मल मन जन सो मोहि पावा फिर परमात्मा को खोजने नहीं जाना पड़ता है परमात्मा तुम्हारे हृदय में ईश्वर तत्व जो छुपा है वह प्रकट हो
जाता है सो जाने जास देहु जना ही जानत तुम ही तुम ही हो जाए ये गुरु परंपरा के द्वारा जब ईश्वर तत्व जगाने की दीक्षा शिक्षा मिलती है तो साधक के जीवन में दिव्य अनुभव होने लगते हैं एक यह स्थूल सृष्टि है जो हमारे तुम्हारे अनुभव में आती है इंद्रिय के द्वारा दूसरी दिव्य सृष्टि होती है जो ध्यान के द्वारा योग के द्वारा उसमें प्रवेश होता है और तीसरी सात्विक तात्विक सृष्टि होती है जैसे तीन मुख्य चीज जड़ शरीर पाश भी वासना और ईश्वरीय चेतना तो जड़ शरीर यहां मर जाता है पार्श्वी वासना और सुक्ष्म
शरीर और ईश्वरीय चेतना के साथ जीव भटकता है एक बार श्री कृष्ण ने वन विचरण का कार्यक्रम बनाया ऑक्सीजन के फुल वातावरण में दिन भर रहेंगे वहीं भोजन आदि करेंगे सामूहिक जीवन जीकर अपनी संकीर्णता हमारे ग्वाल मित्र भूल जाए और व्यापक समाज रूपी ईश्वर के साथ तदा का हो इन टीवी हों ने एक बड़ा खतरा पैदा कर दिया कि बच्चा अकेला एक दो व्यक्ति टीवी देखते हैं जो सामूहिक खेलकूद में शरीर की मांसपेशियां बनती थी सामूहिक खेलकूद में एक दूसरे के साथ मिल घुलने की जो योग्यताएं थी बच्चों की कुंठित हो जाती और बच्चे माफिया
या सेक्सी या और कोई बद्दी चाल के दृश्य देखते देखते ऐसी घिनौनी हरकतें करने लगते हैं विदेशों की अखबारों ने और टीवी के द्वारा तुम जानते होंगे कि फलाने बच्चे ने 9 साल के बच्चे ने रिवॉल्वर ले जाकर सात वर्ष की अपनी सह पाठिया को शूट कर दिया वो बच्चा इस घर में तो नहीं सीखा था कि किसी कन्या का मर्डर कर देना चाहिए स्कूल में भी नहीं सीखा था तो कहां से सीखा कि ऐसे हिंसक दृश्यों से 12 साल का लड़का और 11 साल की लड़की संभोग क्या और मां बाप बन गए तो यह
नोने दृश्य देखने से आने वाली पीढ़ियों का सत्यानाश हो रहा है [संगीत]