दोस्तों इतिहास में एक ऐसा व्यक्ति हुआ जिसकी ताकत और क्रूरता ने पूरी दुनिया की तस्वीर बदल दी। यह एक ऐसा शासक था जिसने अपने जीवन में जितनी जमीन जीती उतनी किसी और ने नहीं जीती। सिकंदर तक ने नहीं। अपनी मौत के पहले तक शासक ने जापान सागर से लेकर कैस्पियन सागर तक की जमीन के ऊपर कब्जा कर लिया। और ऐसा माना जाता है कि उसके युद्ध अभियानों में 4 करोड़ लोगों की जान तक गई। इसकी गाथाएं तो यह तक कहती हैं कि खारिज्म साम्राज्य के खिलाफ युद्ध में तो विरोधी साम्राज्य की 34 आबादी ही मिटा
दी गई थी और इतना ही नहीं यह शासक इतना रहस्यमई था कि इसने जीते जी कभी किसी को अपनी तस्वीर या मूर्ति बनाने की इजाजत नहीं दी थी और जब इसकी मौत हुई तो उसके जनाजे में शामिल लोगों तक को मार डाला गया था ताकि दुनिया यह ना जान सके कि इसकी कब्र कहां है। कहा तो यह भी जाता है कि अगर उसकी कब्र मिल गई तो वही दिन दुनिया का आखिरी दिन होगा। यह वही व्यक्ति था जिसके सामने क्रूरता खुद सिर झुका कर खड़ी होती थी। जिसने खुद को भगवान का अभिशाप कहा था और
जिसे इतिहास कहता है खानों का खान चंगेज़ खान। लेकिन इतना क्रूर होने के बाद भी आखिर क्या कारण था कि इसने सिंधु नदी के किनारे पहुंचकर भी भारत पर आक्रमण नहीं किया। आखिर क्या था रहस्य इसका? आपको बता दें कि चंगेज खान के शुरुआती जीवन के बारे में हमें ज्यादातर जानकारी मुगलों के गुप्त इतिहास से मिलती है। यह मंगोल साहित्य और इतिहास का सबसे पुराना दस्तावेज है जिसे इसकी मौत के बाद लिखा गया था। तो चलिए करते हैं शुरुआत। [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] दोस्तों चंगेज खान की दास्तान शुरू होती है उस समय से जब दुनिया उसे
खानों का खान नहीं बल्कि सिर्फ तैमुजिन के नाम से जानती थी। साल 1162 यह वो समय था जब उसके आसपास के आधुनिक मंगोलिया और साइबेरिया की सीमा पर छोटे से कबीले में उसका जन्म हुआ था। यह कबीला बहती ओमान नदी के किनारे पर था। कहते हैं यह वही इलाका था जो आज मंगोलिया के उत्तरी पूर्व में पवित्र पर्वत बुखरान खालदून के पास स्थित है। उस जमाने में मंगोल समाज टुकड़ों में बटा हुआ था। हर जनजाति खानाबदोश थी। कहीं स्थाई कोई घर नहीं हुए करते थे। यहां जिंदगी जीने के लिए संघर्ष नहीं किया जाता था बल्कि
जिंदगी खुद सबसे बड़ा संघर्ष बन चुकी थी। दर्जनों खानाबदोश कबीले आपस में भिड़ते रहते कभी खाने की तलाश में कभी सत्ता की भूंख में। तैमुजिन का बचपन भी इन्हीं क्रूर हालातों में बीता था। जब वह सिर्फ 9 साल का था तब उसके पिता को तातार कबीले के लोगों ने जहर देकर मार डाला था। पिता की मौत के बाद हालात और भी ज्यादा बेरहम हो गए। उसने अपने कबीले में उसकी मां और छह भाइयों को कबीले से बाहर निकाल दिया गया ताकि उन पर पालने पोसने का बोझ ना पड़ सके। अब परिवार की पूरी जिम्मेदारी नन्हे
तेमुजिन के कंधों पर आ गई थी। शिकार करना, खाना जुटाना और जीने की जद्दोजहद ही उसका बचपन बन गया था। कहते हैं यहीं से उसकी क्रूरता की पहली झलक देखने को मिलती है। एक मामूली खाने के झगड़े में उसने अपने ही सौतेले भाई की क्रूरता पूर्वक हत्या कर दी थी। यह वही तेमुज़िन था जो आने वाले समय में करोड़ों लोगों की किस्मत तय करने वाला था। वक्त गुजरा और 1178 में तेमुज़िन ने बोरते नाम की लड़की से शादी कर ली। उसके चार बेटे हुए लेकिन बेटियों की गिनती का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं मिलता। सब कुछ
ठीक चल रहा था कि अचानक उसकी जिंदगी पलट गई। बोरते का अपहरण कर लिया गया। उस वक्त शायद यही मोड़ था जिसने तेमुसिन को योद्धा बनने की ओर धकेल दिया था। उसने साहस दिखाया। अपनी पत्नी को छुड़ाने के लिए युद्ध छेड़ा और धीरे-धीरे अलग-अलग कबीलों के साथ गठबंधन बनाना शुरू कर दिया। हर लड़ाई के साथ तेमुज़िन की ताकत बढ़ती चली गई। एक-एक करके कबीले उसके झंडे के तले आते गए और उसका नाम मैदानों में गूंजने लगा। अब वह सिर्फ एक खानाबदोश लड़का नहीं रहा बल्कि एक उभरता हुआ कमांडर बन चुका था। लेकिन उस वक्त तक
तैमोज़िन की असली पहचान बननी बाकी थी। दोस्तों शायद हर महान शासक वो नहीं होता जो पुरानी राहों पर चलता जाए बल्कि वो होता है जो जरूरत पड़ने पर परंपराओं को तोड़कर अपने लिए नई रास्ता बना ले। तेमुज़िन ने भी यही किया। मंगोल समाज में उस दौर की सबसे गहरी जड़े जमाए परंपरा हुआ करती थी जिसको कहते थे नेपोटिज्म। यहां सत्ता और सेना में बड़े पद सिर्फ रिश्तेदारों और खानदान के लोगों के हिस्सों में आते थे। लेकिन तैमुजिन ने इस परंपरा को चकनाचूर कर दिया। उसने अपने अधिकारियों को चुनने के लिए खून के रिश्तों की बजाय
काबिलियत को पैमाना बनाया। चाहे कोई भी आम योद्धा हो या कोई दुश्मन। अगर उसमें हुनर है तो तेमुज़िन उसे अपनी सेना में जगह देने से हिचकिचाता नहीं था। उसके लिए ना जाति मायने रखती थी और ना ही खानदान और ना ही सिर्फ अंधी वफादारी। अगली कसौटी थी कौशल, अनुभव और हिम्मत। यही वजह थी कि उसके कुछ भरोसेमंद कमांडर वही निकले जो कभी उसके खिलाफ लड़ चुके थे। तैमुजिन की इस सोच का सबसे शानदार किस्सा साल 1201 की लड़ाई से जुड़ा है। यह युद्ध ताइजुट जनजाति के खिलाफ लड़ा जा रहा था। तभी एक तीर सीधा तेमुजिन
की ओर छोड़ा गया। मकसद था उसे वहीं खत्म कर देना। लेकिन किस्मत का खेल देखिए। वो तीर उसके घोड़े में धंस गया और तेमुज़िन बच निकला। लड़ाई जीतने के बाद तेमुजिन ने ताइजुट कैदियों को बुलवाया और पूछा कि मेरे घोड़े को मारने वाला कौन था? मेरी तरफ तीर छोड़ने वाला कौन था? माहौल सन्नाटे से भर गया। तभी एक सैनिक निर्भीकता से आगे बढ़ा और बोला तीर मैंने जलाया था। सबको लगा कि अब इसकी मौत तय है लेकिन हुआ उसका उल्टा। तेमुजिन उस तीरंदाज की तीरंदाजी से बहादुरी से निशानेबाजी से इतना प्रभावित हुआ कि उसने सेना
में उसे अपना अधिकारी बना लिया और इतना ही नहीं उसने उस योद्धा को एक नया नाम दिया जेबे जिसका अर्थ था तीर और यही जेबे आगे चलकर तेमुजिन के सबसे घातक जनरलों में से एक बन गया था। दोस्तों तेमुज़िन सिर्फ ताकतवर योद्धा नहीं था बल्कि उसकी सोच भी बाकी कबीलों से अलग हुआ करती थी। यहां बाकी सरदार युद्ध के लिए बीच-बीच में लूट में लगे रहते थे। वहीं ये अपनी सेना को सख्त आदेश दिए था कि जब तक जीत पूरी ना हो जाए कोई लूटपाट नहीं करेगा। ये अनुशासन ही उसकी सबसे बड़ी ताकत थी। इसी
अनुशासन की बदौलत 1205 तक तैमुजेन ने अपने तमाम दुश्मनों को परास्त कर दिया और मंगोलिया के मैदानों पर उसकी सत्ता मजबूत हो गई। अगले ही साल 1206 में उसने एक ऐतिहासिक कदम उठाया। उसने पूरे क्षेत्र से प्रतिनिधियों को बुलाकर एक विशाल सभा का आयोजन किया जिसे इतिहास में कुरुलताई कहा जाता है। इस सभा ने ना सिर्फ एक नए राष्ट्र की नींव रख दी जो आकार में आज के मंगोलिया जैसा था बल्कि यहीं पर तेमुज़िन को पूरे मंगोलों का सर्वोच्च शासक घोषित किया गया। इसी क्षण तेमुजिन ने अपना पुराना नाम छोड़ दिया और इतिहास के पन्नों
में दर्ज हुआ एक नया नाम। यह नाम था चंगेज़ खान। दोस्तों खान उपाधि पहले से प्रचलित थी जिसका अर्थ था नेता या शासक मगर चंगेज शब्द का रहस्य अब तक इतिहासकारों को उलझाए हुए हैं। कुछ मानते हैं कि इसका मतलब महासागर से है तो कुछ इसे न्यायप्रियता से जोड़ते हैं। लेकिन तैमुजिन के संदर्भ में इसका सही अर्थ था सर्वोच्च शासक यानी एक ऐसा शासक जिसकी सत्ता को पूरी दुनिया मान्यता दे सके। लेकिन इसकी आंखों में एक और आग जल रही थी। अब उसे चाहिए थी दुनिया की बादशाहत। अब उसकी तलवार को सिर्फ मंगोलिया के नहीं
बल्कि दुनिया भर के दुश्मनों के खून को पीना था और इसकी शुरुआत होनी थी चीन से। दोस्तों, चंगेज़ खान का पहला बड़ा विदेशी अभियान उत्तरी पश्चिमी चीन के शीजिया साम्राज्य के खिलाफ था। शुरुआती छोटे-छोटे हमलों के बाद मंगोल 1209 में शीजिया की राजधानी थियानचुआ तक पहुंच गए। शीजिया का शासक इतनी ताकतवर मंगोल सेना के सामने टिक नहीं पाया और उसने जल्द ही आत्मसमर्पण कर दिया। इसके बाद मंगोलों ने अपनी बढ़ती शक्ति उत्तरी चीन के जिन राजवंश पर हमला करके बढ़ाने की कोशिश की। जिन साम्राज्य उस समय बहुत संपन्न था लेकिन चंगेज़ खान की रणनीतियों के
आगे उसकी स्थिति कमजोर होती चली गई। फिर 1219 में चंगेज़ खान ने एक निर्णायक मोड़ लिया और खारिज्म साम्राज्य पर हमला किया जो आज के तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान, अफगानिस्तान और ईरान तक फैला हुआ था। यह युद्ध बहुत ही महत्वपूर्ण था क्योंकि खारिज्म उस समय मध्य एशिया का एक बड़ा व्यापारिक और राजनीतिक केंद्र था। यही युद्ध आगे चलकर चंगेज खान और भारत को भी जोड़ता है। कैसे जोड़ता है यह आपको आगे पता चलेगा। तो कहते हैं कि कभी-कभी एक मामूली चिंगारी भी दावनल बन जाती है और यही हुआ। मंगोल साम्राज्य के पश्चिम में बसा था एक समृद्ध
मुस्लिम साम्राज्य खारिज्म। उसका शासक था शाह अलाउद्दीन मोहम्मद द्वितीय। अगर आज आप नक्शा खोलें तो खारिज में ईरान, तुर्कमेनिस्तान, उज़्बेकिस्तान और अफगानिस्तान तक का विशाल भूभाग शामिल हो जाता है। एक दौलतमंद साम्राज्य लेकिन बेहद अहंकारी शासक समय था 1218। चंगेज़ खान ने सोचा कि दुश्मनी क्यों? चलो व्यापार करते हैं। उसने अपने सैकड़ों मुस्लिम व्यापारी कारवा को ओतरार भेज दिया। ओतरार था सिल्क रूट का एक चमकता हुआ हीरा। वो सिल्क रूट जिस पर चीन का रेशम, भारत का मसाला, अरब के घोड़े और यूरोप का सोना बहता था। लेकिन जब कारवा ओतरार पहुंचा तो वहां एक गवर्नर
इनाल चुक हुआ करता था और वह एक सनकी हिंसक और शाह का चाचा था। उसने व्यापारियों पर इल्जाम लगाया कि यह व्यापारी नहीं है। मंगोलों के जासूस हैं और फिर हुआ वो जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। सभी व्यापारियों का कत्लेआम कर दिया गया सिर्फ एक को छोड़कर। बाकी सबकी गर्दनें उड़ा दी गई। यह खबर जब चंगेज खान तक पहुंची तो उसकी आंखों में आग भड़क गई। फिर भी उसने सब्र किया। उसने शाह को दूत भेजे और उसने कहा कि इनालचुक को सजा दो और नुकसान की भरपाई करो। लेकिन शाह शाह तो खुद पागलपन
का प्रतीक था। उसने एक दूत का सिर कटवा दिया। बाकी दूतों की दाढ़ियां मुड़वा दी। और ध्यान रहे दोस्तों मंगोल संस्कृति में दाढ़ी मर्दानगी और ताकत का प्रतीक हुआ करती थी। और शाह ने वही गलती कर दी। तोड़ दिया चंगेज खान का आत्मसम्मान। उस दिन शाह ने दरअसल अपनी बर्बादी का ऐलान कर दिया था। अब चंगेज ने दूत नहीं बल्कि सेना भेजी। 1219 में मंगोलों का समुद्र खारिज्म की ओर बढ़ा। पहला निशाना बना ओतर। कुछ ही दिनों में शहर राख में बदल गया और इनियालचुक कैद कर लिया गया। कहते हैं चंगेज़ खान ने उसके कान,
नाक और आंखें पिघलती हुई चांदी से भर दी। इतिहासकार मानते हैं कि यह बात अतिशयोक्ति हो सकती है, लेकिन यह मंगोलों की क्रूरता का प्रतीक बन चुकी थी। इसके बाद बुखारा की बारी आई। मंगोल सेना मस्जिद पर चढ़ गई और वहीं से चंगेज ने ऐलान किया कि मैं ईश्वर का दंड हूं। अगर तुमने पाप ना किए होते तो ईश्वर मुझे तुम्हारे पास ही नहीं भेजता। फिर शहर में आग और खून का खेल शुरू हो गया। बुखारा जल उठा। समरकंद की दीवारें जैसे ढह गई। लाखों लोग मौत की नींद सो गए। ख्वार्म साम्राज्य का हर एक
किला हर शहर ताश के पत्ते की तरह गिरता चला गया। इतिहासकार लिखते हैं कि सिर्फ तीन सालों में 10 से 60 लाख तक इंसान मौत के घाट उतार दिए गए थे। दोस्तों असल संख्या तो विवादित है लेकिन तबाही अविश्वसनीय थी। इस बात पर लगभग सभी की सहमति है। अब चंगेज़ खान की नजर शाह पर थी लेकिन सुल्तान मोहम्मद शाह भागता रहा। अपनी जान बचाने के लिए हर तरफ भागा। खुरासन से बगदाद के बीच वह भागता छुपता दौड़ता रहा लेकिन मंगोलों ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। अंत में वह थक कर हारकर कैस्पियन सागर में एक द्वीप
में जाकर छिप गया। यहीं मंगोलों के घोड़े के पैर ठिटक गए क्योंकि मंगोल कभी समंदर में दाखिल नहीं होते थे। हालांकि एक साल बाद इसी द्वीप पर रहते-रहते साल 1220 में एक बीमारी से सुल्तान की मौत हो गई। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। शाह का बेटा था जलालुद्दीन मंगबरानी। अपने पिता की मौत के बाद यही मंगबरानी गद्दी संभालता है। वह अपने पिता जितना कमजोर नहीं बल्कि एक जुझारू योद्धा साबित हुआ। उसने 1219 से 1221 के बीच उसने मंगोलों से कई छोटे-छोटे युद्ध लड़े। वो चंगेज़ खान के सामने आखिरी ढाल बन करके खड़ा रहा। मंगबरानी
के पास लगभग 90,000 की फौज थी और इनके बल पर उसने मंगोल फौज को एक लड़ाई में हरा दिया था। लेकिन इससे एक गलती हो गई थी। इस लड़ाई में चंगेज़ खान का दामाद मारा गया था। अब चंगेज खान मंगबरानी के पीछे पड़ गया। मानो समूचे खानदान को मिटाने की उसने कसम खा ली थी। मंगबरानी ने भाग के गजनी को अपना ठिकाना बनाया। गजनी यानी 21वीं सदी के अफगानिस्तान का एक इलाका। चंगेज़ खान ने अपनी फौज गजनी तक भेज दी। लेकिन उन्हें पहुंचने में 15 दिन की देरी हो गई। मंगबरानी और उसके साथी सिंधु नदी
की तरफ भाग निकले और 1221 में चंगेज़ खान की सेनाओं ने जलालुद्दीन मंगबरानी को सिंधु नदी के किनारे घेर लिया। जब जलालुद्दीन हार के करीब था तो उसने अपने परिवार और साथियों को पानी में धकेल दिया ताकि वे मंगोलों की कैद में ना पड़े। फिर वह खुद घोड़े पर सवार होकर तेजी से सिंधु नदी में कूद पड़ा। इस तरह जलालुद्दीन नदी पार करके भारत की धरती में प्रवेश कर गया और यही वह पल था जब चंगेज़ खान की आंधी पहली बार भारत के दरवाजे पर आ पहुंची थी। दोस्तों आपने कभी सोचा है कि वो इंसान
जिसने चीन की महान दीवार को चुनौती दी। जिसने ख्वारिज्म में जैसे ताकतवर साम्राज्य को मिट्टी में मिला दिया, जिसका नाम सुनकर यूरोप तक कांप उठा था, और यही चंगेज़ खान जब सिंधु नदी के किनारे पहुंचा, तो उसने नदी को पार क्यों नहीं किया? क्यों वो भारत जिसकी जमीन जिसके घोड़ों की टापों के नीचे आ सकती थी, उसके साम्राज्य के नक्शे पर कभी शामिल ही नहीं हुई। दोस्तों, यह साल था 1221 दिल्ली की गद्दी पर गुलाम वंश का सुल्तान इल्तुतमिश बैठा हुआ था। ठीक इसी समय खारिज्म का भगोड़ा राजकुमार जलालुद्दीन मंगबरानी सिंधु नदी पार करके भारत
की ओर भाग आया था और मुल्तान में छिप गया था। उसने दिल्ली सल्तनत से पनाह मांगी थी लेकिन उसके साथ ही चंगेज़ खान का संदेश भी इल्तुतमिश तक पहुंचा था। संदेश साफ था अगर उसे शरण दी तो दिल्ली का नामोनिशान मिटा दूंगा। इल्तुतमिश असमंजस में था। एक तरफ फारिज्म की दोस्ती, दूसरी तरफ चंगेज का क्रोध, ऐसे में तीसरी राह निकाली गई, और उसने सीधे इंकार नहीं किया, बल्कि धीरे-धीरे उसे टालना शुरू किया। कभी मौसम का बहाना बनाया और कभी ठहरने की जगह का। इस तरह उसने जलालुद्दीन को शरण देने से बचते-बचते दिल्ली को बचा लिया।
हालांकि कुछ इतिहासकारों ने चंगेज के भारत ना आने की और भी कई तार्किक वजह बताई हैं। जैसे एक इतिहासकार ने बताया है कि जब चंगेज़ खान बाहर युद्ध कर रहा था तो पीछे उसके साम्राज्य में बगावतें उठ खड़ी हुई थी। उसे डर था कि कहीं लौटने तक उसका विशाल साम्राज्य बिखर ना जाए और दूसरी वजह भारत की जलवायु थी। यह वजह भी काफी ज्यादा तार्किक लगती है क्योंकि मंगोल ठंडी जलवायु के आदि थे। जबकि भारत की नमी, उमस और चिपचिपी गर्मी उनकी देह को पिघला देती थी। यही वजह है कि मंगोलों ने मुल्तान और सिंध
में छापेमारी की थी, लेकिन मौसम से तंग आकर वे जल्द लौट गए। तीसरी वजह उसकी उम्र मानी जाती है और उस समय चंगेज़ खान लगभग 60 साल का हो चुका था। अब इतनी उम्र और वैसे भी मंगोल की दिल्ली सल्तनत में से कोई सीधी दुश्मनी नहीं थी। इसलिए बिना किसी रणनीति के आक्रमण करना उसे समझदारी समझ नहीं आई। बहरहाल इसके बाद चंगेज ने अपना ध्यान शीजिया साम्राज्य की ओर मोड़ा जिसने उसके अभियान के समय मदद भेजने से इंकार कर दिया था। 1227 की शुरुआत में अभियान के दौरान एक घोड़े ने उसे गिरा दिया जिससे उसे
भीतरानी चोटें लग गई। वह लड़ता रहा अभियान जारी रखा लेकिन उसका शरीर अब साथ नहीं दे रहा था और 18 अगस्त 1227 को शीजिया साम्राज्य के पूरी तरह कुचलने के ठीक पहले मौत ने चंगेज़ खान को रोक दिया। हालांकि उसकी मौत अपने आप में एक रहस्य बनी है। कुछ कहते हैं कि घोड़े के गिरने की वजह से, कुछ कहते हैं कि बीमारी की वजह से और कुछ मानते हैं कि उसकी मौत को गुप्त रखा गया ताकि सेना का मनोबल ना टूटे। लेकिन एक बात साफ है कि भारत का इतिहास इसलिए अलग राह ले सका क्योंकि
चंगेज ने उस दिन सिंधु नदी को पार नहीं किया था। अगर उसने पार किया होता तो शायद आज हमारी किताबों में दिल्ली सल्तनत का नाम ही ना होता और भारत मंगोल साम्राज्य का हिस्सा बन चुका होता। मगर इतिहास वही है जो हुआ ना कि जो हो सकता था। दोस्तों आगे बढ़े इससे पहले यह जान लीजिए कि आखिर 1 मिलियन लोगों पर शासन करने वाले चंगेज़ खान ने अपने साम्राज्य को बिखरने से कैसे बचा लिया। इसका साम्राज्य प्रशांत महासागर से लेकर कैस्पियन सागर तक फैला हुआ था। चंगेज़ के साम्राज्य का आकार पूरे मानव इतिहास में किसी
भी शासक से बहुत बड़ा था और इसको संभालने के लिए चंगेज़ खान ने इसका भी एक तरीका ढूंढा था। चंगेज खान ने एक ऐसा नेटवर्क बनाया था जिसने समय को मात दे दी थी। नाम था यम यानी घुड़सवार कूरियर सर्विस। पूरे साम्राज्य में फैले पोस्ट हाउस और स्टेशन जहां हर सवार कुछ मील पर घोड़ा बदल सकता था और खुद को आराम दे सकता था। नतीजा यह कि अगर एक अकेला सवार एक दिन में 200 मील तक दौड़ जाता है तो सोचिए वो दौर जब दूसरी जगहों पर खबरें पहुंचते-पहुंचते महीनों लग जाते थे। वहीं मंगोल साम्राज्य
में सूचना पलक झपकते सरहदें पार कर जाती थी। यह सिस्टम सिर्फ संदेश नहीं पहुंचाता था। यह तो चंगेज खान की आंखों और कान की तरह काम करता था। उनके सिंहासन तक साम्राज्य की सबसे छोटी हलचल भी पहुंच जाती थी। कोई बगावत हो, कोई साजिश हो, कोई युद्ध की आहट हो, खान को सब खबर रहती थी। यही नहीं यम विदेशी व्यापारियों और मेहमानों की सुरक्षा में भी ढाल बन गया था। यही वजह है कि सदियों तक मार्कोपोलो और जॉन ऑफ प्लेनो कॉर्पनी जैसे लोग भी इसी नेटवर्क की छाया में सुरक्षित घूम पाए थे। यह सुधार अपने
समय के सदियों में सबसे आगे था। लेकिन दोस्तों, यह अजीब बात है कि इस इतिहास के सबसे ताकतवर सम्राटों में गिने जाने के बावजूद हम यह तक पक्के तौर पर नहीं जानते कि वह आखिर दिखता कैसा था। कहा जाता है कि खान ने कभी किसी को अपनी तस्वीर बनाने, मूर्ति गढ़ने या सिक्के पर चेहरा उकेरने की इजाजत ही नहीं दी थी। नतीजा यह हुआ कि उसकी पहली छवियां उसकी मौत के बाद ही सामने आई। समकालीन कोई चित्र या मूर्ति बची ही नहीं थी। मगर चंगेज की आखिरी इच्छा भी रहस्यमई थी। उसने आदेश दिया था कि
उसका दफन स्थल हमेशा के लिए गुप्त रखा जाए। लोक कथाओं के अनुसार उसके अंतिम संस्कार जुलूस में शामिल हर शख्स को मौत के घाट उतार दिया गया था। फिर उसकी कब्र पर घोड़े बार-बार दौड़ाए गए ताकि जमीन पर कोई निशान ही ना बचे और फिर आती है इसकी डरावनी मान्यता। माना जाता है कि इसकी कब्र मंगोलिया के बुखरान खालदून पर्वत के आसपास कहीं है। लेकिन 800 साल गुजरने के बाद भी किसी ने उसे नहीं खोजा। क्योंकि कहा जाता है कि अगर कभी कहीं चंगेज़ खान की असली कब्र मिल गई तो दुनिया का अंत हो जाएगा।
हालांकि यह किम बदंती है पर शायद इसी डर की वजह से आज तक इस रहस्य को छेड़ने से रोके रखा गया है। तो कैसा लगा आज का एपिसोड जरूर बताइएगा और अगले एपिसोड में आप किस खास शख्सियत को देखना चाहेंगे यह भी कमेंट सेक्शन में कमेंट करके जरूर बताइएगा। शुक्रिया। अगर आप देश सेवा आईएएस, आईपीएस बनकर करना चाहते हैं तो यह वक्त है उठ खड़े होने का, खुद को साबित करने का और अपनी यूपीएससी सीएससी की तैयारी को एक नए मुकाम पर पहुंचाने का। क्योंकि अब स्टडी आईक्यू आईएस हिंदी लेकर आया है यूपीएससी आईएएस की
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