तुलसीदास ने कहा जीहा सा पिनी वदन बिल जीहा सा पिनी वदन बिल जेन जपई हरि नाम हरिदास को कोड़े पड़ते फिर भी हरि नाम नहीं छोड़ता तुलसीदास ने कहा जीवा साप नहीं वदन बिलय शरीर रूपी बिल में जीवा रूपी साप नहीं है अगर भगवत चर्चा नहीं सुनती तो फिर चिल्लाता रहेगा अशांत होता रहेगा दुख बनाएगा दुख की मन मैन्युफैक्चरिंग हमारा मन करता है अगर भगवत भाव अंदर नहीं है तो अगर अपने मन में भगवत कथा है या भगवत भाव है भगवत रस का ज्ञान है और भगवान का प्रसाद पाने वाले संतों का सानिध्य है तो
फिर अपना चित्त उस परमात्मा रस से पावन होने में देर नहीं लगती है मन की दो धाराएं हैं एक जो हमारे सामने आता है उस जगत को मन देखता है दूसरा देखे हुए के विषय में जो हमारी वृत्ति भीतर प्रतिक्रिया करती है या निर्णय करती है उसको मति कहते हैं तो इस मति में और मन में जब तक मेल होता है तो वह जीवन उसका उन्नत होता है कभी-कभी मन के विचार कुछ और मति का निर्णय कुछ उसका जीवन खिंचाव तनाव में और अशांति में बह जाता है मन और मति एक हो उसके लिए एक
ही उपाय है कि मन और मति को जहां से पोषण मिलता है उस एक का ज्ञान एक की प्रीति एक में विश्रांति पाने का अभ्यास मन कुछ कहता मति का निर्णय कुछ होता है और कुटुंब में भी मति मति भिन्न होती है तो कुटुंब अशांति होती है मन की वृतिया वृतिया भिन्न होती है तो कुटुंब में कल होता है मन की वृत्तियां भिन्न-भिन्न हो लेकिन मति में समझ बढ़िया हो तो भिन्न-भिन्न वृतिया जैसे भिन्न-भिन्न हमारे दृश्य देखने सुनना भिन्न है खाना चखना भिन्न है फिर भी वृत्ति एक है इसी प्रकार मति में अगर ज्ञान आ
जाए तो मन की वृत्तियां भिन्न होने के बावजूद भी कभी-कभी निर्णय भी होने के बावजूद भी घर में अशांति का कोई कारण नहीं है जब ज्ञान से हम दूर होते हैं और मन को मन की पकड़ में आ जाते अथवा तो कोई मति की पकड़ में आता है तो घर में कलह पैदा होता है समाज में अशांति और दुख पैदा होता है तो जिसके मति में भगवत ज्ञान नहीं है जिसके गत मति में मूल ज्ञान नहीं है वे ऊपर ऊपर की तरंगों में अटक जाते हैं अखरण में जे अड़ से चाड़ी चढ्या की न की
जन्म जन्म भर मत फेरियो मिटन मन को त्रास मन त्रास देता गया कभी मन कुछ कहता है कभी मन कुछ कहता है मति कभी कुछ कहती कभी कुछ कहती है नानक जी कहते जन्म जन्म भटकत फिर मिटन मन को त्रास कह नानक हरि भज मना निर्भय पावे वास हरि को भज उस चैतन्य स्वरूप का स्मरण कर उसका ज्ञान पा तो निर्भय जगह प तेरे को वास मिलेगा तू स्थित होगा जगत की ऐसी कोई पदवी नहीं है जो भय से आक्रांत ना हो परिवर्तन परिवर्तित से आक्रांत ना हो और वियोग से आक्रांत ना हो निर्भय वास
करो निर्भय एक तुम्हारा चैतन्य आत्मा है परब्रह्म परमात्मा है वही मराठा का गजानंद स्वामी है झूले लाल वाले सिंधी साइयों का वही झूले लाल है रामानुज का राम है वल्लभाचार्य का वल्लभ है मोहम्मद का अल्लाह है कबीर का अव्यक्त है और नानक का अकाल है आद सत जगात सत्य है भी सत्य नानक हो से भी सत्य तुम्हारा मन की वृत्ति पहले नहीं थी बाद में नहीं रहते है बुद्धि का निर्णय पहले नहीं था और बाद में वैसा नहीं रहेगा लेकिन उसकी गहराई में जो तुम्हारा परमेश्वर है वोह पहले था अभी है और बाद में भी
रहेगा उसका थोड़ा ख्याल करो तो कल्याण हो जाएगा मंगल हो जाएगा आंखों में तू है जिसके दिल में ख्याल तेरा जिसके आंखों में तू है परमेश्वर भिन्न भिन्न देखता है लेकिन भिन्न भिन्न की गहराई में तू जिसकी आंखों में है आंखों में तू है जिसकी दिल में ख्याल तेरा मुश्किल नहीं है उसको होना विशाल तेरा परमात्मा विशाल है अनंत अनंत ब्रह्मांड उस परमेश्वर में है हमारा जो सूर्य है वह पृथ्वी से 13 लाख गुना बड़ा है पृथ्वी उसके आगे 13 लाख हिस्सा है और वो सूर्य आकाश गंगा में सबसे छोटा है ऐसी कई आकाश गंगा
आकाश में है और यह आकाश गंगा जिस आकाश में है वो आकाश पांच भूतों का एक भूत है यह पांचों भूत प्रकृति के एक कोने में पड़े हैं और प्रकृति उस परमात्मा के कोने में पड़ी और वह परमात्मा तुम्हारा आत्मा होकर बैठा है सोचो तुम्हारा परमेश्वर कितना विशाल है लेकिन मेरे मन में जो आई वही हो गया तो मैं बड़ा हो गया मेरे मन की नहीं हुई तो हाय रे हाय कभी तेरे मन की होगी तो कभी पत्नी के मन की होगी तो कभी पड़ोसी के मन की होगी और जब किसी के मन की नहीं
होती तो समझ ले कि तेरा भाना मीठा लागे जो ति भावे सो भली कार अपने चित्त को ज्ञान संयुक्त सब इच्छाएं किसी की पूरी नहीं होती और सब इच्छाएं किसी की अधूरी नहीं रहती कुछ पूरी होती है कुछ पूरी होती है और कुछ नहीं पूरी होती सब इच्छाएं अगर पूरी होने लाग मनुष्य जात की अथवा मनुष्य जात की सब इच्छा पूरी होने लगे तो संसार में नरक हो जाएगा कोई नहीं चाहता है कि हम मर जाए जराम जी जब मरेंगे नहीं तो दूसरे जन्मे कहां से मृत्यु भी एक पड़ाव है जैसे रात को आराम करते
शरीर पड़ता है बस्त पर सुबह फ्रेश होता है ऐसे माता तुम्हारे को जो तन दिया और जो खिलौने दिए तुम खेलते खेलते उब जाओगे इस खिलौने से खेलते खेलते बच्चा खेलता है मां उठा लेती है उस समय बच्चा रोता है लेकिन मां जब खिलाती पिलाती सुलाती और फ्रेश करके फिर भेजती है नए नए खिलौने देती है तो बच्चे का नित्य नवीन रस प्रकट होता है ऐसे संसार में से प्रकृति जब जब उठा लेती है तो इस शरीर रूपी बच्चे को मन रूपी बच्चे को अच्छा नहीं लगता है लेकिन प्रकृति माता जब नया तन देकर भेज
है फिर ही सुभ नहीं सुहावनी खबरे आ जाती है जो हरा मादा है थका है उसके लिए तो सूर्य पुराण पुरुषोत्तम 200 करोड़ वर्ष पुराना है अब क्या रखा है सूरज में बहुत पुराना है स लेकिन जिसके जीवन में नित्य नवीन उत्साह है उसके लिए सूर्य हर रोज सुबह सूर्य नया है नई उमंग है नया आनंद है ऐसे सूर्य का सूर्य जो तुम्हारा ज्ञान स्वरूप परमात्मा है उसके में तुम्ह अगर प्रेम है आनंद है तो तुम्हारे लिए हर वृति हर स्वास हर कदम तुम्हारे अंदर नया आनंद नया माधुर्य नया सुख हर रोज बहारी बहारी बाग
से बांगुर रहे दिलशाद तो ज्ञानी रही दुनिया में दुनिया खा रहे आजाद थ ज्ञानी ना दिल में द्वेष धारे थ ना कहे सारी सा उन जी ना कहे दुनिया जी हालत जो करे फरियाद तो ज जिसको उस परमेश्वर तत्त्व का अपने वास्तविक मैं का ज्ञान हो गया उसका दिल हमेशा सुखमय रहता है आनंदमय रहता है माधुर्य से स रहता है ब्रह्म ज्ञानी का भोजन ज्ञान ब्रह्म ज्ञानी का ब्रह्म ध्यान ब्रह्म ज्ञानी की मत कोन बखान नानक ब्रह्म ज्ञानी की गत ब्रह्म ज्ञानी जाने ब्रह्म ज्ञानी ब्रह्म का वेता ब्रह्म ज्ञानी का एक संग हेता उस एक
के साथ हेत है और अनेक वृत्तियों का उपयोग है हम लोगों का अनेक वृत्तियों के साथ एक हेत है तो अनेक वृतिया एक जैसी तो नहीं रहेगी वृतिया तो बदलती रहेगी परिस्थितियां बदलती रहेगी इस दुनिया में ऐसा कौन सा शरीर है जो नहीं बदला ऐसा कौन सा मन है जो नहीं बदला ऐसा कौन सा त्र है जो नहीं बदला ऐसी कौन सी परिस्थिति जो नहीं बदली जो बदलने वाली चीजों को अब बदल करके सुखी रखना चाहते हैं व अपने को संघर्ष और तनाव और दुखों में ही झकते रहते गैलीलियो ने आविष्कार किया कि सूर्य खड़ा
है पृथ्वी घूमती है लोगों ने विरुद्ध उनके मुकदमा कर दिया य तक उस जमाने के पोप ने भी गले के खिलाफ मुकदमा जारी करवाया न्यायाधीश ने कहा पप जैसा व्यक्ति भी तुम्हारे खिलाफ है लियो तुम अपना बयान वापस ले लो नहीं तो कोरट को आदेश करना पड़ेगा तुम्हारी खाल खिंचवाई जाए गलियो ब्रह्म ज्ञानी तो था नहीं सूली पर चढ़ने के लिए तैयार तो था नहीं ने कहा अच्छा कोट कहती पप भी दुराग्रह करता है तो मैं कह देता हूं कि पृथ्वी नहीं घूमती पृथ्वी घूमती घूमती नहीं है पृथ्वी खड़ी और सूर्य घूमता है लेकिन सच
कुछ हो तो जो घूमती है स घूमती रहेगी और जो खड़ा है सो खड़ा ही रहेगा ऐसे प्रकृति घूमती है और प्रकृति से बना हुआ पंच भौतिक शरीर भी घूमता है इस पंच भौतिक शरीर में रक्त भी घूमता है और रक्त के अंदर की टान भी चुप नहीं बैठते जय राम जी बोलना पड़ेगा तो जो घूमती है सो घूमती है लेकिन उसको जो खड़ा देखता है साक्षी सो देखता है तुम खड़े के साथ जुड़ जाओ तुम अखंड के साथ जुड़ जाओ तो तुम्हारा अखंड आनंद अखंड ज्ञान और अखंड जीवन का साक्षात्कार हो जाएगा फिर खंड
खंड का तो खेल होगा और अखंड में विश्रांति होगी भरोसा कर तू उस अखंड पर तुझे बुलंद हौसला मिलेगा यह जीवन बीत जाएगा तुझे रोज नित्य नया आनंद आएगा कहीं सुख है कहीं दुख है यह जीवन धूप छाया है कहीं सुख है कहीं दुख है यह जीवन धूप छाया है ऐसी में ही बिता डालो हसी में ही बिता डालो बितानी ही यह माया है जो सुख आए तो हस देना और दुख आए तो हस देना क्योंकि दोनों अतिथि है आए हैं जो घर में आता है तो हसके मिलना चाहिए वे लोग कंग हैं अतिथि आ
जा और मु चढ़ के बैठ जाए मेहमान घर आवे मो बग ब नहीं नहीं भले पधार भले पधार नामदेव के सामने अंधेरी रात में भूत प्रकट हो गया नामदेव की बुद्धि देखो कितनी शुद्ध नामदेव कहते भले पधारो नाथ भले पधारो लंबक नाथ लंबा लंबा भूत खड़ा हो धरती पर चरण आकाश लो माथ योजन भर के लंबे हाथ भले पधारो लंबक नाथ भले पधारो लंबक नाथ सुर संका दी गीत तुम्हारे गाए नाथ आज नामदेव को करो सनाथन बक नाथ अंतर्यामी ईश्वर ने देखा कि तो भूतड़े में मेरे को देखता है भगवान वहां प्रकट हो गए नामदेव
को दीदार हो गया और भूत का कल्याण हो गया भूत में भी भगवान देखने वाले लोग जिस धरती पर उसी धरती के लोग मां में भगवान नहीं देख पाते बाप में भगवान नहीं देख पाते मित्र में भगवान नहीं देख पाते संत में भगवान नहीं देख पाते वशिष्ठ जी महाराज कहते हैं कि राम जी मैं बाजार से गुजरता हूं तो मेरे लिए दुष्ट लोग क्या क्या अफवा उड़ा क्या क्या आरोप लेकिन मेरा दयालु स्वभाव मनुष्य को चाहिए कि संत का दुर्गुण ना ढूंढे और उस पर आरोप ना करे एक भी संत में सद्गुण है तो लेकर
अपना कल्याण करें आज हिंदू धर्म के प्रचारकों में या कुछ कुछ ब्लैकमेल करने वाले मैगजीन में तो एक ऐसा होड़ लगी है कि जहां लोगों को शांति मिलती है माधुर्य मिलता है जीवन की उलझी गुया सुलझ है ऐसे संत और समाज के बीच पुलिया बनने के बजाय वे लोग संत और समाज के बीच खाई बनकर समाज को कौन सी खाई में फेंकना चाहते हैं वो भी पता नहीं चलता है लेकिन हिम्मत वाले सज्जन लोग है ऐसे मेग जनों को और ऐसा कु प्रचार करने वालों को उठाकर धराई कर देते हैं और सत्संग की यात्रा तो
होती रहती है माधुर्य का रस तो बरसता रहता है भगवान बुद्ध तवन में रहते थे उनका यश कीर्ती सज्जनों को तो मालूम था लेकिन दुर्जन चलते थे उन्होंने प्लानिंग किया एक वैशा को खरीद लिया वैशा रात को जाती जेतन इलाके में जाकर ठहरती और सुबह आती सावश नगरी में वैशा से जानबूझकर वे लोग बाजार में पूछते तू रात भर कहां गई जैसे बांदरा एक इलाका है पारले एक इलाका है रेवली एक इलाका है ऐसे जवन का इलाका था तो जेत वन में बुद्ध भी रहते थे तो वो बोलती थी मैं तो जेत वन थी और
जिसको लोग बहुत मानते उसके पास में थी अब तुम समझ गए तो क्या बुद्ध के पास थी क्या हा जब बड़ा ग राक मिले तो फुटकर धंधा कौन करे हमें तो सारी रात उधर बहुत ठीक लेता है और मन माना इनाम भी मिलता रहता है इसलिए मैं रोज शाम को चली जाती हूं उनको खुश करती हूं रात भर उनके बिस्तर पर होती हूं और सुबह चली आती धीरे धीरे कु प्रचार ने जोर पकड़ा महाराज जो कान के कच्चे और मती के कच्चे थे ऐसे लोग बुद्ध से टूटने लगे आनंद ने कहा भंते लोग टूट रहे
हैं बोले जो टूटने चाहिए उनको टूटने दो जो पन खर आती है तो कच्चे कच्चे पत्ते जो लगने के काबिल नहीं वो तो टूट जाते लेकिन जो मजबूत होते लगे रहते लेकिन व मजबूत भी टूटने के करीब करीब हुए आखिर समाज असम में पड़ गया उन्हीं लोगों ने प्लानिंग की और राजा से मांग की कि बुद्ध के विषय में इतना प्रचार हो रहा है जांच की जाए जांच का आदेश मिला जांच करने वाली कमेटी पुलिस पुलिस सीआईडी वाले आए जिस दिन आने वाले उसकी रात को कल सुबह आने वाले तो आज रात को उसी वैशा
को खूब शराब पिलाया चार पांच आदमी उसके साथ गए और जेतन में उसके साथ पांचों आदमियों ने संसार सेक्सी काम करके उसका गला दबा के बुद्ध के बगीचे में रातो रात उस वैशा को गाड़ दि और सुबह कमीशन जांच करता करता बुद्ध के आम के बगीचे में गए उन लोगों में से कोई अच्छा दिखाने वाले भी घुस गए साहब हमें इधर कुछ डाउट पड़ता है वैशा रोज सुबह तो आ जाती थी लेकिन आज तवन से लौटी भी नहीं हो बुद्ध के बगीचे में होगी बुद्ध के कुटी में तो नहीं दिखी तो बगीचा छान मारा जहां
खोद काम किया था रात को गाड़ी थी लोफर में वही इशारा किया गया और खोद के दिखाया निकला उस वैशा का शब्द आज तक तो वैशा कहती थी मैं बुद्ध के पास जाती हूं लेकिन बुद्ध का कु प्रचार होने से बुद्ध ने अपना पाप दबाने के लिए उसकी हत्या करके उसको बगीचे में गाट दिया आनंद कहता है हद हो गई पाप की महापुरुष के ऊपर कीचड़ उछालने की हद हो गई बनते कुछ करो ऐसों को श्राप दो मंत कहता है वक्त बीत जाएगा अपने अचल में रहो देखो क्या होता है जिन्होंने आरोप लगाए हुए कौन
से नरक में पड़े होंगे मुझे पता नहीं लेकिन बुद्ध को तो अभी भी हम लाखों करोड़ों लोग आदर से देखते हैं मानते हैं स्वामी विवेकानंद के प्रति भी वै शाओं को भेजा जाता था और ईसाई मिशन रिया उनका खुलकर कु प्रचार कर दी थी राम तीर्थ का विवेकानंद का फिर भी विवेकानंद और राम तीर्थ को हम लोग लाखों लाखों हृदय से स्नेह करते हैं जिसने अचल में स्थिति कर ली है उसके जीवन में भी आंधी तूफान और आरोप आते हैं सुख दुख आता है मान अपमान आता है लेकिन वे पुरुष अचल तत्व में [संगीत] टिके
भगवान वेदव्यास को नारद जी ने कहा कि महाराज आपने शास्त्र तो लिखे फिर भी लोग दुखी और अशांत हो रहे हैं आपके शास्त्रों का फायदा नहीं लेते उसका कारण है कि आपने यह तो लिखा कि पत्नी को क्या करना चाहिए पति को क्या करना चाहिए पुत्र कैसा होना चाहिए और पति-पत्नी को आपस में कैसा व्यवहार करना चाहिए एक दूसरे की उन्नति कैसी करनी चाहिए यह तो आपने लिखा और जो अति शराबी कबाबी है उनको भी मोड़ने के लिए कभी कभार भोग लगाकर इन चीजों का उपयोग करने की आपने छूट छाट दी वो छूट छाट की
बात को पकड़ लेंगे लेकिन जब तक मनुष्य को भीतर का सुख नहीं मिलेगा तब तक दी हुई छूट छाट के दुरुपयोग में ही अपने को गिराए महाराज आप लोगों के पतन को देखकर चिंतित हो कि मेरे इतने सारे शास्त्र होने पर भी दिया होने पर भी लोग कुए में गिर रहे दुखी हो रहे हैं महाराज उनके दुख का कारण है तो उनको सुख की मांग है और विषय विकारों का सुख जितना भोगते हैं दादर की खुजली जैसा है कबीरा कुत्ते की दोस्ती दो बाजू जंजाल रीझे तो मुह चाटे और खीझ तो पैर टे इनको संसारी
व्यक्तियों को सुख जिसमें देखता है व इच्छाएं इच्छित वस्तु मिलने पर भी वो इच्छाएं पूरी नहीं होती इच्छाएं और बढ़ती है जैसे अग्नि में घी डालो तो और भब और इच्छाएं पूरी नहीं होती तो अभी भी अपने को दुखी मानते हैं वस्तु मिल जाती है तो आसक्ति के कारण दुखी होते और नहीं मिलती है तो गलानी के कारण दुखी होते हैं महाराज इनको सुख चाहिए और इन्हें भगवत सुख मिले ऐसा ग्रंथ आप लिखो और भगवत सुख तो भगवान ब्रह्मा जी ने मुझे जो चार श्लोक बताए सृष्टि का कारण क्या है जीव की मुक्ति कैसे हो
जीव ब्रह्म क्या वास्तविक सनातन संबंध कैसा सृष्टि का मूल कारण क्या है और सुख वास्तविक सुख का है इस प्रकार का श्रीमद् भागवत का चार श्लोकों का ज्ञान ब्रह्मा जी से सुना था व्यास जी को बताओ व्यास जी ने समाधि करके श्री कृष्ण के चरित्रों को देखा श्री कृष्ण के चरित्र देखते गए और श्लोक बध करते गए श्लोक बद्ध श्लोक तो करे चरित्र देखकर लिखे कौन भगवान गणपति का आवाहन किया गजानंद महाराज को प्रार्थना किया कि मैं श्री कृष्ण की लीलाएं देखू श्लोक बध करके बोलता जाऊंगा आख आप उसको लिखते जाइए महाराज गजानंद महाराज लिखने
बैठे गणपति भगवान गणपति ने कहा कि तुम लीलाएं देखते श्लोक बनाते बोलते मैं तो लिख डालता हूं लेकिन दूसरा श्लोक आने में बीच में मेरा समय व्यर्थ जाता है अब व्यास जी ने कहा कि जो श्लोक में बोलता हूं उसको आप लिख तो लेते हैं लेकिन उसमें कोई अपूर्णता या कमी हो तो है रिद्धि सि देख स्वामी आप उसम पूर्ति कर दीजिए व्यास जी ने 18 हज श्लोक बोल दिए गणपति महाराज ने पूरा भागवत ग्रंथ लिख दिया व्यास जी ने पूछा कि मैं तो बोलता ही रहा लेकिन आप तो चुप ही चुप थे आपने तो
कभी एक शब्द तक नहीं बोला प्रभु ऐसा क्यों त भगवान गणपति कहते हैं कि मुनि शारद हर दिए में ज जलते हुए दिए में उसके जलने का कारण उसकी रोशनी फैलाने का कारण है तेल किसी दि में कम होता है किसी में ज्यादा होता है और जो जो दिया ज्यादा तेल खर्च करता है वह जल्दी बुझ जाता है और जिसकी लोग कम तेल खर्च करती व लंबा समय तक रहता है ऐसे मनुष्य जीवन का दिया है स्वास का जो ज्यादा व्यर्थ की बातें करता है उसके व्यर्थ के स्वास भी खर्च होते व्यर्थ का भी पैदा
होता है हे व्यास जी मैंने संयम का प्रथम सौपान बच्चो गुप्ति संयम का प्रथम सौपान है बचो गुप्ति अर्थात वाक का संयम बिन जरूरी क्यों बोलना आप तो बोलते जाते थे मुझे लिखना था फिर बीच में मैं व्यर्थ का क्यों बोल अपनी वाणी का वय क्यों करू जो वाणी का व्यार नहीं करते उनकी वाणी का बड़ा प्रभाव पड़ता है जो वाणी का नहीं करते व्यर्थ उनके जीवन में फालतू कलह नहीं होता जो वाणी का व्यय नहीं करते वो फालतू झूठ भी नहीं बोलते एक आदमी आया बोले स्वामी जी य य बड़ा सज्जन आदमी बड़ा सच्चा
है और बहुत बोलता है जो बहुत बोलता है वह सच्चा कैसे होगा सत्संग तो करता नहीं बहुत बोलता है तो संसार का बोलता है तो झूठ बोले बिना कैसे बोले सेठ है बड़ा ईमानदार है बड़ा सेठ है जब बड़ा सेठ है तो बड़ा ईमानदार कैसे होगा कुछ ना कुछ बेईमानी किया होगा तभी तो बड़ा से बना होगा जय राम जी बोले ये बड़ा लंग लाइफ और बड़ा संयमी है संयमी है तो लंग लाइफ है लेकिन संयम छोड़ा तो मन भी चंचल मति भी चंचल और जीवन भी व्यर्थ हो जाता है इसलिए अपने जीवन में 10
घंटे नहीं तो पांच पांच नहीं तो दो घंटे मौन का अभ्यास कर एक आध घंटा मन को देखने का अभ करो के मन क्या क्या सोचता है तुम कागज पेंसिल लेकर बैठो मन से पूछो तुम क्या क्या चाहते हो जो चाहता है व भी बोलता जा मन बोलता जाए तुम लिखते जाओ लिखते जाओ लिखते जाओ एक घंटा आधा घंटा लिखो फिर देखो मन जैसा पागल खाना दूसरी जगह कहीं नहीं मैंने सुना था कि एक शराबी दारू पी के जा रहा था कार पंचर हो गई ल स्पर लगाने के लिए लगे हुए ल के बोल्ट खोलता
गया उलता उता में नशे नशे में रखते गया अ पीछे एक नाली बह रही थी गटर ली नाली लुड़कते गए बोल्ट दूसरा वल जब लगाने को बैठा तो देखा के सारे नट बोल्ट तो चले गए और नगर परिषद को ध्या देने लगा के पैसे खा जाते चुनाव के टाइम में तो मीठी मीठी बातें करते एक तो मिलते भी नहीं और गटर खुले गंदगी और हिंदुस्तान में तो हद से ज्यादा गंदगी सड़कों पर धूल और डस्ट प्रदूषण निवारण प्रदूषण निवारण चिल्लाते तो है लेकिन कोई साफ सफाई नहीं रखते और इतना बड़ा गटर खुला है ऐसा वैसा
उसको गालियां देने लगा नगर परिषद के आदमियों को मुसिपालिटी के कॉरपोरेटर इतने में सामने एक पागलखाना था मेंटल हॉस्पिटल उसके चबूतरे प एक पागल बैठा था आराम पुर से वो सब देख रहा था वो आया नज बोले अब तुम कॉरपोरेट को गालियो देते होग व तो आइसक्रीम खाते होंगे या गपशप लड़ाते होंगे और तुम गालिया देकर अपनी अशांति क्यों बढ़ा रहे तुमको घर जाना है ना बोले घर कैसे जा सकता हूं मैं बड़ी प्रॉब्लम में हूं खुदा की कसम में मुसीबत में पड़ गया बोले तीन लों का एक एक नट बोल्ट खोल के चौथे ल
में लगा दे और घर पहुंच जा बोलता है सुभान अल्लाह तुम्हारी इतनी बढ़िया आईडिया मिस्टर आप कौन है उसने कहा मैं सामने मेंटल हॉस्पिटल का पेशेंट पागल खाने में इलाज कराने आए बोले तुम पागल होते हु भी इतनी आईडिया रखते बोले मैं पागल तो जरूर हूं लेकिन तेरे जैसा शराबी तो नहीं हूं भाई भागवत सुनने वाला निर्भय हो जाता है बत समझने वाला निशंक हो जाता है उसको धर्म के विषय में ईश्वर के विषय में कर्तव्य के विषय में कोई शंका नहीं रहती भागवत को सुनने वाला निश्चिंत हो जाता है वह चिंता के चक्कर में
भागवत की कथा से निर्भयता निशंक निश्चिंत तो आती है चित्त में परमात्मा प्रसन्नता प्रकट होती है भागवत को हजम करने वाला मृत्यु के भय से पार हो जाता है जिसकी मृत्यु होती है वह मैं नहीं और जो मैं है उसकी कभी मौत नहीं वो अपनी ली मैं को मिथ्या मैं को भी जान लेता है और सत्यम को मैं के रूप में पहचान लेता [संगीत] है यह भागवत धर्म है जैसे पिता की वस्तु में सारे पुत्र पुत्रियों का हक होता है ऐसे भागवत भगवान की वस्तु है जैसे कुटुंब का बड़ा पूरे परिवार की भलाई सोचता है
कुटुंब के बड़े की चीज अगर देने में आए तो पूरे परिवार के हित में दी जाती कुटुम के बड़े में तो मोह या पक्षपात हो सकता है लेकिन ईश्वर के बड़पन में ना मोह है ना पक्षपात है भागवत ईश्वर की प्रसादी है उसमें केवल साधु संत या भक्त या ऋषि मुनि का ही अधिकार नहीं केवल हिंदू भाइयों का ही अधिकार नहीं अ मनुष्य मात्र का अधिकार है ना ना भागवत धर्म में तो पशु पक्षी का भी अधिकार माना गया है अश्वमेघ सहस्त्र अश्वमेघ सहस्त्र बाजपे सतानी बापे सता सुख शास्त्र कथाया सु कथाया कलाना हति शोरम
कला रह शो अश्वमेघ सहस्त्र माने हजार बाज पे सैकड़ों करे फिर भी शुक्र शास्त्र के आगे सलमा हिसा भी नहीं शुक्र शास्त्र के ज्ञान का इतना बड़ा भारी महात्म है भागवत के चार नाम इसको भागवत बोलते भगवत ज की कथाए और वृति भगवता का होती है रागा का द्वेषा का अस्मिता का भाव मिटकर भगवता आकार भाव बन जाते हैं दूसरा इसका नाम है भागवत महापुराण और सब पुराण है इसमें तो महान तत्व की बात है जीव ब्रह्म की एकता की बात है इसको महापुराण कहा तीसरा नाम है इसका परमहंस संहिता जो सुखदेव जी महाराज विरक्त
होकर एकांत में जा रहे थे पिता व्यास पीछे पीछे जा रहे पुत्र सुनो सुनो अद्वित निष्ठा के कारण वृक्षों ने उत्तर दिया ऐसे सुखदेव जी परमहंस महापुरुष जो गृहस्थ के घर केवल गाय दोलो उतनी देर खड़ा रहते हैं दूध ले लेते हैं उनका पुण्य बढ़ जाता है गृहस्थ का खुद चल जाते हैं ऐसे सुखदेव जी महाराज निराकार के उपासक भी इस भागवत की कथा से अपने चित्त को और रसीला बनाते इसलिए इस ग्रंथ का नाम परमहंस संहिता है चौथा नाम है कल्प भ्रम इस भागवत की कथा से जिस भावना से बैठे जैसे धुंधकारी इस कल्पना
से बैठा कि मेरी प्रेत योनि से सद्गति हो भागवत की कथा से उसकी प्रेत योनि से सौनक ऋषि यज्ञ की पूर्ति में भागवत सुनते हैं उनका यज्ञ संपन्न हुआ कोई भक्ति के लिए सुनता है कोई ज्ञान वृद्धि के लिए सुनता है तो कोई चित्त की विश्रांति पाकर सामर्थ्य बढ़ाने के लिए सुनता है जैसे जैसे भाव से सुनते हैं ऐसा ऐसा फल प्राप्त होता है इसलिए इसको कल्प नाम दिया श्रीमद् भागवत की कथा मनुष्य मात्र के लिए हितकारी है गांधी जी ने जब भागवत कथा सुनी तो बोलने लगे कि भागवत की कथा में इतना रस और
इतना ज्ञान भरा है मुझे पहले पता ही नहीं था मालवे जी महाराज कहते हैं कि भागवत को सुनने वाला रसमय जीवन बिताने की कला सीख लेता है और विपताऊ से डरता नहीं दबता नहीं और संपता पाकर फूलता नहीं और अपने को परमेश्वर को दूर या लोक लोका में नहीं मानता उसका परमात्मा अपना आत्मा ही हो जाता है दिलने तस्वीर है यार जबक गर्दन झुका ली और मुलाकात कर ली यह भागवत की कथा का महात्मा कृपी के पास केवल एक लंगड़ी गाय थी उसी के दूध से अपना घर चलाती थ दुरा ऋषि पहुंचे कृपी ने उनका
स्वागत किया दूध दही आदि से कृपी उदास क्यों है बोले द्रोणाचार्य इतने बड़े धनुर विद्या के जता है लेकिन हमारे घर में तो गाय के लिए दूध के लिए लंगड़ी गाय मात्र है इसी से गुजारा चलाना पड़ता है विधाता ने गरीबी लिख ली हमारे लेख में दुरा जी ने कहा नहीं नहीं मनुष्य अपने भाग्य का विधाता कल का अजीर आज के उपवास से मिटता है कल का लड़ाई झगड़ा आज के से मिटता है कल का कर्ज आज की भरपाई से मिटता है कल का प्रारब्ध आज के सुकृत से बदला दिया दिया जा सकता है कृप
त ऐसा कर अभी सूर्य ग्रहण आ रहा है तो जिस गाय के दूध से घर का गुजारा चलाती एक दिन उपवास कर देना और इसी गाय के दूध से जो उपज हो व सत पुरुषों की सेवा में लगा देना तो तेरा अनंत गुणा दन तेरे को दरिद्रता से छुड़ा देगा यह दान करने के बाद हुआ भी ऐसा धृतराष्ट्र के मन में हुआ कि इनके यहां बहुत सारी गाय भेजते और फिर धन धान्य से पूर्ण हो गए इसको स्मार्थ कर्म बोलते देवे दस पावे एक देवे स पावे एक देवे हजार पावे उसकी लिमिट होती है स्मार्थ
क भगवती कर्म की कोई लिमिट नहीं होती जैसे राजा मंदिर की सीढ़िया चढ़ रहा है मालि ने कहा राजन हार ले जाओ चार सीढ़ी और ऊपर गया दूसरी मालि ने कहा अंता ये हार स्वीकार करो ले जाओ भगवान के लिए दोनों मालिन से हार लेकर भगवान को चढ़ाकर राजा नीचे उतरा पहली मालिन से पूछा कितने पैसे मालिन ने समझा 25 पैसे का है चारा ने कहा राजा से दो रुपए मांग दो रुपए दे दिए उस जमाने के दो रुपए बड़े थे फिर नीचे उतरा पहले मालिन को पूछा कितने पैसे बोले वो पैसे आपसे ना ना
ना आपने मेरा हार स्वीकार कर लिया मुझे आनंद है आप तो नगरपति है सम्राट है और मुझ गरीब का हार आपकी सेवा में पहुंचा इसका मुझे बहुत आनंद है राजन मैं तो चाहती हूं कि रोज आपकी सेवा में मेरा हार स्वीकार हो जाए राजा से उसने एक पाई भी नहीं ली पहली मालन देखती है कि कितनी बेवकूफ है मैंने तो चराने के बदले दो रुपए ले लिए 25 पैसे के और इसने पाई भी नहीं राजा ने मंत्री को कहा इस मालिन का एड्रेस ले लेना समय पाकर मालिन के पुत्र को बुलाया गया उसको ठीक जगह
पर ऊंची नौकरी दे दी क्योंकि देश की वफादार महिला है उसका पुत्र भी मां के संस्कार से सींचा हुआ चित वाला मालिन को चाहिए तो 10 20 25 एकड़ दे दो जमीन अब वो हार के बदले में नहीं दे रहे हार की कीमत गिन करर नहीं दे रहे अपनी और से दे रहा है ऐसे राजाओं का राजा जो भगवान है भगवान के नाते सत्पुरुष की अगर सेवा की जाती भगवान के नाते ही भगवान का भजन किया जाता है भगवान के नाते ही शुभ कर्म कर दिए जाते हैं तो भगवान जब अपनी और से देता है
तो व भागवती फल होता है उसके लिए द गुना 100 गुना हजार गुना की कोई वैल्यू नहीं है करोड़ों करोड़ों जन्म के कर्म है लेकिन भगवत कथा सुनते सुनते आत्मा अपने मन को भगवान को देने लग जाता है अपने शुभ कर्मों को भगवान के अर्पित करने लग जाता है फल क्या होता है के बदले में भगवान अपना आप उसके अंतःकरण में प्रकट कर देता है अंतःकरण में भगवान अपना आप प्रकट कर देता है अपने स्वरूप का ज्ञान प्रकट कर देता है वह साधक ब्रह्म ज्ञानी हो जाता है सिद्ध बन जाता है ब्रम यानी की दृष्टि
अमृत वर्षी उसकी आंखों से आध्यात्मिक अमृत आध्यात्मिक तरंग आध्यात्मिक वस बरसते हैं जो थके मांधे अशांत दुखी चित्तों को शीतलता शांति प्रदान करने का सामर्थ्य रखते वह आंखों के द्वारा एक हंसी मात्र डाल देता है तो समाज में महफिल में रोनक आ जाती है ऐसे पुरुष को पाकर बुद्धिमान साधक कहते गुरुजी तुम तसल्ली ना दो सर बैठे ही रहो महफिल का रंग बदल जाएगा गिरता हुआ दिल भी संभल जाएगा संभल जाएगा काम में क्रोध में लोभ में मोह में मद में मासरे में चिंता में तनाव में टेंशन में जो हमारा दिल गिर रहा है वह
ऐसे पुरुषों की हाजरी मात्रा से हमारा दिल संभलने लगता है भगवान जब देते हैं तो इतना सारा देते व साधक स्वयं तो सिद्ध हो जाता है वो तो उतर जाता है लेकिन उसके संपर्क में आने वाले भी करने लगते सति लोकान तारती सततो भवती व तो तृप्त रहता है औरों को तृप्त कर देता है अपनी वाणी से अपने दर्शन से अपनी अमी दृष्टि से निगा से तीन प्रकार की हसी होती है एक तो आम लोग हसते ठका मार के अच्छा है हसना चाहिए जरूरी है आपकी सूक्ष्म तम नाड़ना साबुन से होती है ना टनो पोल
के टच से स्वच्छ हो गई ना और कोई क्रिया से स्वच्छ होती है केवल निर्दोष जोड़ों की हंसी से ब आपकी नाया स्वच्छ होती है आपको हसना चाहिए एक होती है आम हसी जन साधारण हसते दूसरी होती है बुद्धि मानों की हसी मुह में हसते गालों में हसते चित्त प्रसन्न होता है लेकिन स्माइल दे देते तीसरी तो आधुनिक हसी है जो एयरपोर्ट पर सर्विस करने वाले लोगों को सिखाई जाती होठ चौड़े करने के हम पहली बार अमेरिका गए हमने सोचा कि य सब इतने लोग प्रसन्न सबसे हंस के बात करते फिर धीरे से गौर करके
देखा तो इनको ट्रेनिंग मिली होती है होठ चौड़े होते लेकिन दिल तो वैसे का वैसा रहता है मैंने मार्ग किया दूर से केवल हमको आदर देने के लिए लोग ऐसे नहीं व सब पैसेंजर के साथ ट्रेनिंग होती है उनको यह हसी तो सेल्समैन हसी है इसकी बात में नहीं करता तीन हसं की बात करता हूं एक होती है आम हसी दूसरी होती है बुद्धिमान की हसी तीसरी होती है योगेश्वर की हसी योगेश्वर की हंसी जैसे कृष्ण हसते हैं तो कैसा हसते गा की हसी बड़ी सात्विक बड़ी कल्याणकारी और बड़ी पावरफुल होती जहां तक निगाह पड़
जाए और आपकी हसी को झेलने वाला मिल जाए उसका दिल पावन हुए बिना नहीं रहेगा वह कृष्ण की किसी किसी महापुरुष के पास वह चीज होती है निगाहों से वे निहाल हो जाते हैं जो संतों की निगाहों में आ जाते ब्रह्म ज्ञानी की दृष्टि अमृत वर्षी ब्रह्म ज्ञानी का दर्शन वड भागी पावई ब्रह्म ज्ञानी को बल बल जावई ब्रह्म ज्ञानी की मत कोन बखान नानक ब्रह्म ज्ञानी की गत ब्रह्म ज्ञानी जाने तुकाराम महाराज ने कहा जगत में सर्व प्रका सुखी कौन आए मना तुम शोधु नहीं पाहे खोजते खोजते फिर उस महापुरुष को उत्तर मिला दृष्टि
ज्ञानम कृत्वा पित हरि रेव जगत दृष्टि ज्ञानम करो और हरिम जगत देखे वो पूर्ण रूप से जगत में सुखी आए सिंधी संत बोधराज जी ने कहा न दिल में द्वेष धारे थन कैसा रीस आ उन जी न कहे दुनिया जी हालत तो जो करे फरियाद तो ज्ञानी बहारी बाग ज बांगुर रहे दिलशाद तो ज्ञानी रही लोडन में लोडन खा रहे आजाद तो ज्ञानी इलम उनो अमल कायम इलम तो उसका बहुत गहरा है और अमल करता उसका चित कायम फिर भी उसको अहंकार नहीं आता इस बात को अष्टावक्र मुनि ने जनक को कहा अष्टावक्र संहिता में
यत पदम प्रेत सो दना शक्रादय सर्व देवता अहो तत्र स्थि योगी हर्ष उपग जिस पद को पाए बिना देवताओं का राजा इंद्र भी अपने को कंगाल मानता है वह आत्म पद व ब्रह्म पद पाकर योगी गर्व नहीं करता है घमंड नहीं आता यह भी एक आश्चर्य है कंग आदमी को 10 20 हजार मिल जाते तो फूल फटता है अथवा 10 20 हजार की कैपेसिटी वाली को 10 20 लाख मिल जाता है तो उसकी चाल निराली हो जाती है किसी की 10 20 करोड़ में तो किसी की हजार दोज 5000 करोड़ में चाल बदल जा लेकिन
अनंत ब्रह्मांड का स्वामी जिसको मिल जाता है फिर भी उसे अहंकार नहीं होता है यह भागवती फल नहीं तो और क्या है तीन टूक कोपन की भाजी बिना लूण तुलसी रदय रघुवीर बसे तो इंद्र बापड़ी को बापड़ी चित् में गर्व पवा ब्रह्म रस योगिन भूतवा उन्मत इंद्रो मप कंक वत भाष्य अन्य से का वार्ता और उ की क्या बात कहे आप श्रीमद् भागवत के आरंभ में यह नहीं कहा गया कि कृष्णम परम धीमहि शिवम परम धीमहि विष्णु परम धीमहि नहीं सत्यम परम धीमहि जो सत्य स्वरूप है वही कृष्ण है वही शिव है वही अंबा है
वही अल्लाह है वही राम है वही विट्ठल है हम उसका ध्यान करते हैं अगर कृष्ण परम धीमही कह देते तो जो शिव को मानने वाले हैं और किसी देवी देवता को मानने वाले उनको संकोच हो सकता है लेकिन ऐसा कोई देवी देवता या अल्लाह नहीं है जो असत्य हो इसलिए व्यास जी ने मंगलाचरण में कहा सत्यम परम धीमहि हम उस सत्य स्वरूप का ध्यान कर देखो कोई मत पंथ या मजहब की उलझन में ना उलझे इसलिए सबको अधिकार के लिए यह प्रार्थना रख दी गई प्रारंभ में मंगलाचरण रख दिया गया सत्यम परम धम नहीं तो
व्यास जी लिख सकते थे कृष्णम परम धीमही रामम परम धीमहि शिवम परम धीमहि सत्यम परम धीमहि और सत्य उसे कहते हैं जो तीनों काल में एक रस है सृष्टि के पहले सृष्टि के समय प्रलय के बाद भी जो रहता है उसको सत्य बोलते हैं आद सत जगात सत्य है भी सत्य नानक हो से भी सत्य उस सत्य स्वरूप परमात्मा का हम ध्यान करते हैं श्रीमद् भागवत सुनने के लिए सूत जी के चरणों में शौनक ने प्रार्थना की कि महाराज अब कलयुग का प्रभाव दिख रहा है हमने इसके दुष्परिणामों से बचने के लिए सत्र वष यज्ञ
का आयोजन किया यज्ञ के बीच में जो दोपहर को समय मिलता है उस समय आप हमें भागवत की कथा सुनाए आप ज्ञान के सूर्य है आपका चित्त भगवत प्रसाद से पावन है महाराज लोक विकारों से अहंकार से और हीन मति से आक्रांत मंदा सु मंद मत अल्पायु वाले लोग मति मंद भाग्य मंद और कलह प्रिय युग जो कलयुग इस कलयुग के दोषों से बचने के लिए आप हमें श्रीमद् भागवत का अमृत पान कराई सोनक जी का प्रार्थना सुनकर सूत जी ने ध्यान किया भगवान व्यास का भगवान सुखदेव जी का मुझे जो सुखदेव जी ने एकांत
में ज्ञान सुना मैं तुमको सुनाता हूं एक कंजूस सेठ मर रहा था नौकर ने देखा कि कितनी 15 दिवाली बिताई कभी बोनस तक नहीं दिया सेठ मर रहा है सब छोड़ के जा रहा है नौकर नजदीक आया रसोया बोले मैं आपका पर्सनल सेवक चंपी भी कर लेता हूं और आपकी बीमारी में भी मैंने सेवा की सेठ जी अब आप दुनिया से जा रहे हैं बीमारी में तो कई रुपए तुम्हारे चले गए सेठ जी आप दुनिया से जा रहे हैं जाते जाते मुझ गरीब का तो कुछ तो कर जाओ मेरे लिए भी तो कुछ दे जाओ
मेरे लिए कुछ तो छोड़ जाना सेठ ने कहा बेवकूफ मूर्ख मैं तो सारी दुनिया छोड़े जा रहा हूं फिर तेरे लिए क्या छोड़ के जाऊ जय राम जी सारी दुनिया छोड़ के जा रहा हूं अब तेरे लिए क्या [संगीत] छोड़ू जिसका मेन कारण गलत होता है उसका परिणाम भी गलत आता है साधन गलत तो साध्य भी गलत बन जाता है हम चाहते कि कर्म चाहे हम गलत करें और फल मिले बढ़िया नहीं नहीं जो हक की कमाई है सच्चाई की कमाई है पसीने की कमाई है उसका जो आनंद आता है वोह दो नंबर की कमाई
के ऐश में उतना आनंद नहीं आता जय राम जी की जो सहज स्वभाव मित्रों से मिलने का आनंद आता है वो अपना आडंबर दिखा के मित्र को इंप्रेस करने में आनंद नहीं आता रामतीर्थ कहा करते थे कि हे मानव तुम अपना समय शक्ति बड़े-बड़े भवन और फर्नीचर सजाने में व्यर्थ मत करो सज भवनों को और फर्नीचर को सजा सजा कर आने वाले अतिथि और मित्रों को प्रभावित कर कर के आप अपने और मित्र के शत्रु मत बनो आप अपना सहज जीवन जि मित्र को बड़े बड़े वैभव और मेहमान को बड़ी बड़ी चीजें दे देकर उसको
प्रभावित करने के बजा आप सहज में निर्दोष प्रेम उसको दो और एक प्याला पानी भी दोगे तो तुम्हारा मित्र सचमुच में उन्नत होगा और तुम भी उन्नत होगे लेकिन आडंबर से मित्रों को प्रभावित करते रहोगे तो आपकी सच्चाई दती रहेगी और मित्र के अंतःकरण में आपके लिए रहेगा कि इसके इस मेरे बेटे के पास माल तो बहुत है ईर्षा की आग उसके चित्त में पैदा होगी इसलिए आप अपने धन का वैभव का प्रदर्शन करके मित्रों को प्रभावित मत करो अपनी सरलता और मित्र में परम मित्र है उसका प्रदर्शन करके उसका और अपना कल्याण करने के
रास्ते लगो बहुत बढ़िया बात है और आपको जगती इसलिए ताली बजाई तो अब अमल मिलाने की कृपा कीजिए जय राम जी की आज तो होर लगी है एक दूसरे को इंप्रेस करने की किसी संत से भी मिलने जाते तो मेरे पास यह है मेरे पास ड़ है फलाना है ट एक दूसरे को इंप्रेस करने के सिवा और कोई बात ही नहीं होती मन क्रम वचन छल जब लग जनन तुम्हार तब लग स्वपने सुख नहीं करे कोटि उपचार हर्ष तो हो जाएगा थोड़ी देर के लिए किसी को इंप्रेस करा वो प्रभावित हो गया आपको थोड़ा हर्ष
होगा लेकिन अंदर का सुख अलग बात है हर्ष दूसरी बात है नानक जी कहते हैं हर्ष शोक जाके नहीं वैरी मित समान कह नानक सुन रे मना मुक्त ताही ते जान जिसको हर्ष और शोक बांध नहीं सकता प्रभावित नहीं कर सकता है वह मुक्त आत्मा है आप मुक्त आत्मा होने के लिए जन्मे हैं बं मरने के लिए आपका जन्म नहीं हुआ है हस मरने के लिए जन्म नहीं हुआ है बड़े-बड़े भवनों में अथवा बड़े-बड़े फर्नीचर में अथवा बड़े-बड़े धन के ढेरों के नीचे दब मरने के लिए तुम्हारा जन्म नहीं हुआ है इनका सदुपयोग करके सत्य
स्वरूप परमात्मा के शिखर पर आपको पहुंचने के लिए धरती पर भेजा गया है इस बात को कभी मत भूलना जोधपुर में यशवंत सि का राज्य था तब की बात है जोधपुर के पास छोटा सा गांव था और फूली बाई नाम की एक विधवा बाई अपना थे पड़िया थेप के गुजारा करती उसके विषय में तो बहुत सारी बातें हैं उसको सिधाई मिली थी गुरु मंत्र जपते जपते मंत्र को सूक्ष्म सूक्ष्म तर सूक्ष्म तम अवस्था में पहुंचा दिया एक दिन यशवंत सिंह उनके दर्शन करने गए यशवंत सिंह को बड़ी शांति मिली भाई की तो झोपड़ी थी गुवार
की रोटी गुवार की सब्जी बाजरी की रोटी बनाई खाई कोई सैनिक आए पसार हुए पानी मांगा बेटे दौड़ते दौड़ते पानी खून गर्म है फिर पानी पीना ठीक नहीं रोटी का टुकड़ा खा बोले माता जी मैं अकेला नहीं मेरे साथ तीन बटालियन चिंता ना करो ढक दिया कपड़ा और अपने मंत्र शक्ति का उपयोग करते सबको टुकड़ा टुकड़ा देती गई फज ने जाकर यं स को बताया कि माई में इतनी सारी सिद्ध यश स ने थोड़ी बहुत प्रशंसा सुनी थी यशवंत स दर्शन करने आया बड़ा प्रभावित हुआ यशवंत स ने अपनी व्यथा रखी उस माई के चरणों
में ये राणि हों को जो मांगती वो चीज सब देता हूं फिर भी आपस में लड़ती रहती है ग्रह कला हमारा बहुत है माता जी आप चलो जरा चरण रजप की पड़ेगी आपकी चरण रज से मेरा रवास पावन होगा आपके दो वचन सुनेंगे तो प्राणियों के कान पावन होंगे आपकी दृष्टि पड़ेगी तो हमारा वह भवन पवित्र होगा पवित्र पुरुषों की वस पवित्र होते माता जी आप हमारे मकान में जरा चरण रज घुमाने को पधारो हां ना करते हुए यशवंत सिंह ने माता जी को राजी कर लिया और माता जी पहुंची रवास में अब वो फली
बाई के साथ राजा कैसे आए रानियों और माता के बीच पुरुष का होना अच्छा नहीं लगता ऐसा समझ के राजा तो राज दरबार में गए और दास को बता दिया कि माता जी के पैर घुमाओ और रानियों को जरा सत्संग मिल जाए रानियों ने देखा कि इतना मोटा थड़ा लगा हुआ और यह बुधिया रवास में कैसे घुस ग रानिया तो हार सिंगार कर रही थी अपने को कुछ विशेष मान रही थ फली बाई को देखकर रानिया ठका मार के हसने लगी कि यह कौन सा प्राणी आ गया अर फिर भी फली बाई को दुख नहीं
हुआ करुणा उपजी की इनका भला हो पुली बाई ने कहा देखो बहना यह गहने गांठे जो पहर रही हो इससे तुम्हारी शोभा नहीं तो तुम्हारे शरीर की शोभा है जिसको जला देना है उस शरीर की शोभा के लिए हार शिकार करो मैं मना नहीं करती लेकिन तुम्हारी शोभा के लिए भी तुम कुछ करो पली बाई की भाषा में मैं सुना दूं आपको ली बाई ने रानियों को बताया कि गहन ठो तन री शोभा काया काच भांड कुली कहेते राम भजो लड़ो क्यों हो रांडो आपस में लड़ती क्यों हो जोधपुर राजस्थान में राजस्थान का सम्राट जिसके
चरण छूता है और भली भाई रानियों को इतना नगद सुनाती है करुणा से भरकर कि सत्संग भागवत की कथा में भारत की उस गरीब महिला की कथा जोड़ने में मुझे आनंद आता और आपको भी मजा आता है सत्य सत्य सत्य है लोग बोलते सत्य कटू होता है ना ना सत्य तो अमृतम है सुखमय है मधुरम है सत जी महाराज सनक को सुनाते कि एक समय देवऋषि नारद घूमते घाते विशाला पुरी में पहुंचे जहा सनक सनन सनत सनत कुमार चारों भाई बैठे चारों भाईयों की उम्र तो पूर्वजों के पूर्वज थे लेकिन योग बल से सदा पा
साल के लगते थे ज्ञान के पारमी और अपने परब्रह्म परमात्मा का उनको साक्षात था उन मुनीश्वर ने देखा कि नारद जी इस विशाला नगरी में आ रहे नारद जी को देखकर मुनीश्वर ने पूछा कि नारद जी आज आप अतृप्त पुरुष की नहीं दिखाई दे रहे जैसे किसी का कोई कल कारखाना बंद हो गया हो अथवा किसी को इनकम टैक्स की रेड पड़ी हो या अथवा और कोई मुसीबत आई तो जो आदमी जितना जैसा हताश और दौड़ा सा जाता है उस प्रकार नारद की दशा देखकर मुनीश्वर ने पूछा कि अतृप्त आदमी की ना वासना में उलझे
हुए जीव कीना नारद जी आप कहां कहा जल्दी जल्दी जा रहे नारद जी कहते मुनीश्वर कलयुग का प्रभाव ऐसा तो फैल गया है कि कलयुग का मित्र अधर्म जहां त अपने पैर पसार चुका है शांति सुता और माधुर्य मानो धरती से सूख रहा है मैं पृथ्वी के प्रयाग काशी रंग क्षेत्र पुष्कर हरिद्वार और बड़े-बड़े तीर्थों में गया वहां भी देखा कि मनुष्य को शांति मिलने की कोई व्यवस्था नहीं वहा भी है धमाधम और पाखंड हों ने वहां वास किया मंदिरों का सत्व यवनों ने नष्ट कर दिया और तीर्थों का सत्व पाखंड ने नष्ट कर दिया
कथा का स स्वार्थ ने नष्ट कर दिया और शांति की कोई कीमत समझने वाला व्यक्ति शांति पाने के लिए भटके तो कोई जगह ही नहीं पूरी धरती मैंने छान मारी कहीं सुख और शांति नहीं शांति धन से बड़ी है शांति सत्ता से बड़ी है शांति सौंदर्य से बड़ी है खूब सुंदर हो अंदर में अशांत की आग हो तो क्या सौंदर्य किस काम का शांति सौंदर्य से बड़ी है शांति सत्ता से बड़ी है सत्ता दीश और अशांत है तो किस काम का उसका जीवन शांति धन से बड़ी है शांति स्वर्ग से बड़ी है स्वर्ग में रहते
और अशांति की आग में जले तो ऐसे स्वर्ग को आग लगाओ शांति स्वर्ग से बड़ी है शांति रिद्धि सिद्धियों से बड़ी है यहां तक की शांति भगवान से भी बड़ी है बोले महाराज कैसे जब तुम्हारा मन शांत होता है तो भगवान प्रकट हो जाता है शांति के बल से भगवान आता है जय राम जी की चि शांत होगा तब भगवान प्रकट होता है शांति भगवान को प्रकट करने वाली है आध्यात्मिक सामर्थ्य प्रकट करने वाली है ऐसी शांति महाराज इस कलयुग में देखने को नहीं मिलती लोग पेट पालू द्वि पाद पशु जैसे हो गए आटा निमक
दाल रोजी रोटी और कपड़ा लत्ता की चिंता में भवन के चक्कर में ही पूरे जिसको छोड़ जाना है उन चीजों के लिए तो मरमिट रहे दिन रात और जो सदा साथ में रहता है उस परमेश्वर शांति के लिए लोगों को समय नहीं और जिस किसी को थोड़ी बु समय है तो जहां जाओ वहां महाराज कलयुग के मित्र अधर्म ने अपने पैर पसारे