क्या आपने कभी सोचा है कि अघोरी साधु अपने भोजन में मुर्दों का कच्चा मांस क्यों खाते हैं और मुर्दों के साथ शारीरिक संबंध बनाने से उनको क्या मिलता है और सबसे रहस्यमय बात है कि अघोरी महिला के पीरियड्स के दौरान ही उनके साथ शारीरिक संबंध बनाते हैं अघोरी साधु स्मशान में रहकर ही साधना क्यों करते हैं जहां बाकी लोग जाने से भी डरते हैं अघोरी की मृत्य के बाद उनका अंतिम संस्कार कैसे किया जाता है और महिला अघोरी अपना जीवन कैसे जीती है आज हम आपको सच्चे अघोरी की पहचान से लेकर उनके इस रहस्यमय जीवन
के सभी पहलुओं पर ले चलेंगे जिसे जानकर आप हैरान रह जाएंगे यह डॉक्यूमेंट्री आपकी सोच को पूरी तरह बदल देगी [प्रशंसा] [संगीत] स्मशान की राख से ढके शरीर हाथों में मानव खोपड़ी और जीवन और मृत्यु के बीच का गहरा संबंध अघोरी साधु जिनका जीवन सामान्य साधुओं से बिल्कुल अलग भयावह और रहस्यमय होता [संगीत] है स्मशान जहां आम लोग जाने से भी डरते हैं वहां यह साधु अपनी साधनाएं करते हैं मृत्यु और आत्मा के गढ़ रहस्यों को जानने के लिए लेकिन क्या आप जानते हैं कि अघोरियों का जीवन सिर्फ साधना और ध्यान तक ही सीमित नहीं
है उनके अनुष्ठानों में शव भक्षण तंत्र मंत्र और अजीबोगरीब शारीरिक क्रियाएं शामिल होती हैं जो हमारी सोच से परे हैं सदियों से इन साधुओं का जीवन उनकी साधनाएं और उनकी चमत्कारी शक्तियों का रहस्य और भय से घिरी रही है आज हम आपको अघोरी साधुओं की इस रहस्यमई और गढ़ दुनिया की गहराई तक लेकर चलेंगे जहां जीवन और मृत्यु की सीमाएं धुंधली हो जाती हैं और मोक्ष प्राप्ति का मार्ग साधना की इस दुनिया में छिपा [प्रशंसा] [संगीत] है आगे बढ़ने से पहले आपसे एक छोटी सी रिक्वेस्ट है इस वीडियो को बनाने में हम बहुत समय और
मेहनत लगाते हैं ताकि आपको बेहतरीन डॉक्यूमेंट्री देखने को मिले अगर आपको हमारा कंटेंट पसंद आ रहा है तो कृपया हमारे चैनल को सब्सक्राइब करके हमें सपोर्ट करें आपका एक सब्सक्रिप्शन हमें और भी बेहतर कंटेंट बनाने के लिए प्रेरित [संगीत] करेगा अघोरी साधु एक ऐसा नाम जो अपने आप में ही रहस्य और विचित्र को समेटे हुए हैं इनके जीवन का हर पहलू समाज की परंपराओं और नियमों से एकदम अलग और विपरीत होता है स्मशान की राख से लिपटा हुआ शरीर गले में हड्डियों की माला हाथों में मानव खोपड़ी और उनकी आंखों में वह तेज जिसे देखकर
कोई भी कांप उठे और काले चोंगे में लिपटे यह साधु किसी रहस्यमई दुनिया के प्रतीक प्रतीत होते हैं अघोरी साधु अपने जीवन को साधारण मानव की धारणाओं से परे समझते हैं जहां हम भोजन को पवित्र मानते हैं वहीं अघोरी साधु शवों का मांस खाते हैं और मानव खोपड़ी जिसे वे कपाल कहते हैं उसमें भोजन करते हैं यह उनके लिए कोई घृणास्पद कार्य नहीं है बल्कि यह शिव के कपाल धारी रूप का अनुसरण है वे मानते हैं कि शिव का हर रूप पवित्र है चाहे वह शव हो या मल कुछ भी उनके लिए अपवित्र नहीं होता
यह अपने शरीर पर स्मशान की राख इसलिए लगाते हैं क्योंकि यह भगवान शिव का प्रतीक मानी जाती है और इसके पीछे एक वैज्ञानिक पहलू भी है राख में कैल्शियम फास्फोरस और अन्य खनिज होते हैं जो त्वचा की बीमारियों से शरीर की सुरक्षा कर सकते हैं उनके लिए माता काली और भगवान शिव का भैरव रूप ही उनके गुरु होते हैं और जिस तरह भगवान शिव और माता काली मुंडो की माला पहनते हैं अघोरी साधु भी मुर्दों की खोपड़ हों का हार पहनते हैं अघोरी साधुओं का सबसे विवादास्पद पहलू है उनका यौन संबंधों को लेकर दृष्टिकोण अघोरी
साधु अन्य साधुओं की तरह ब्रह्मचर्य का पालन नहीं करते हैं इनके अनुसार जीवन के हर पहलू को स्वीकार करना आवश्यक है चाहे वह यौन संबंध हो या अन्य वर्जित कृत्य जितना हम अघोरियों की रहस्यमई दुनिया में गहराई से उतरते हैं उतना ही हमें रहस्य और रोमांच का अनुभव होता है राख से लिपटे हुए यह अघोरी साधु स्मशान घाट में मिले अध झल शवों का मांस खाते हैं तो कभी शव के साथ यौन संबंध बनाते हैं और यह सब वहीं नहीं रुकता वे मासिक धर्म के दौरान जीवित महिलाओं के साथ भी शारीरिक संबंध बनाते हैं यह
जानकर आपके मन में सवाल जरूर उठेगा आखिर यह साधु कैसे हो सकते हैं समाज में साधुओं का ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य माना जाता है और अघोरी ना तो ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं और ना ही इनका खानपान साधु संतों जैसा होता है मांस और मदिरा का भोग लगाने वाले यह अघोरी शिव के पुजारी होने का दावा फिर क्यों करते हैं श्वेता स्वत रोप उपनिषद में भगवान शिव को अघोरनाथ कहा गया है और अघोरी बाबा भी शिव के इसी रूप की उपासना करते हैं बाबा भैरवनाथ भी इनके आराध्य माने जाते हैं शव के साथ यौन
संबंध बनाने और मांस खाने के पीछे भी इनका तर्क अघोर पंथ की ही तरह शाश्वत है तो शव के साथ यौन संबंध क्यों अघोरी इस प्रचलित धारणा को स्वीकार करते हैं कि शव के साथ शारीरिक संबंध बनाना शिव और शक्ति की उपासना का एक तरीका है उनका मानना है कि यदि इस क्रिया के दौरान उनका मन ईश्वर की भक्ति में लगा रहे तो यह साधना का सबसे ऊंचा स्तर होता है मासिक धर्म में महिलाओं के साथ संबंध बनाने के पीछे भी एक मान्यता है घोरी ब्रह्मचर्य का पालन नहीं करते क्योंकि यह अपनी शक्तियों को जागृत
करने के लिए कुछ विशेष परीक्षाओं से गुजरते हैं ऐसी महिलाओं के साथ जिनका मासिक धर्म चल रहा हो शारीरिक संबंध बनाना उनके लिए शक्ति प्राप्त करने का तरीका है उनका मानना है कि अगर इस दौरान वे भगवान शिव में लीन रह जाते हैं तो उन्हें विशेष शक्ति की प्राप्ति होती है कहा जाता है कि जब अघोरी साधु ढोल मंजीरे और नगाड़ों के बीच शारीरिक संबंध बनाते हैं तब यह उनकी सबसे कठिन शक्ति परीक्षा होती है अगर इस दौरान वे अपने ध्यान को शिव में स्थिर रख पाते हैं तो वे संपूर्ण रूप से अघोरी माने जाते
हैं यह उनके लिए एक प्रकार से ब्रह्मचर्य का पालन करने जैसा ही होता है जहां शारीरिक क्रियाओं के बावजूद उनका ध्यान केवल भगवान शिव में केंद्रित रहता है अघोरी साधु उन चीजों का प्रयोग करते हैं जिन्हें समाज अपवित्र या वर्जित मानता है उनके लिए मल मूत्र शव और अपशिष्ट सामग्री भी साधना के हिस्से हैं उनका मानना है कि शिव हर चीज में विद्यमान है चाहे वह कितनी भी घृणित क्यों ना हो यह अभ्यास उन्हें घृणा और सामाजिक धारणाओं से ऊपर उठने में मदद करता है क्या आप अघोरी साधुओं के बारे में कुछ नया जानते हैं
तो कमेंट करके जरूर लिखें जिसका कमेंट सबसे अच्छा और रोचक होगा उसकी कमेंट पिन की जाएगी अब अगले चैप्टर में हम विस्तार से बात करेंगे कि अघोरी बनने की यात्रा कहां से शुरू होती है और सच्चे अघोरी की पहचान क्या होती [संगीत] है तो आपके मन में यह सवाल जरूर उठ रहा होगा कि आखिर एक सामान्य इंसान कैसे अघोरी साधु बनता है क्या यह सिर्फ साधना का रास्ता है या इसके पीछे कोई गहरा रहस्य छुपा है आइए आज हम इस बारे में विस्तार से बात करते हैं अघोरी साधु बनने की प्रक्रिया इतनी सरल नहीं है
जितनी दिखती है यह एक साधारण व्यक्ति की जीवन शैली से पूरी तरह अलग होती है सबसे पहले अगर कोई अघोरी बनना चाहता है तो उसे अपने जीवन से जुड़े हर मोह माया रिश्ते नाते और यहां तक कि अपनी पहचान को भी छोड़ना पड़ता है हमारे सनातन धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक 16 संस्कार बताए गए हैं जो भी इस संसार में जन्म लेता है उसे एक दिन इस दुनिया से जाना ही पड़ता है और अघोरियों के साथ भी शुरुआत में यही होता है अगर कोई अघोरी बनना चाहता है तो सबसे पहले उसे जीते जी
अपना श्राद्ध या फिर पिंड दान करवाना पड़ता है इसका मतलब यह कि पूरी दुनिया को यह संदेश देना होगा कि वह जिंदा है पर अब से उसने हर मोह माया को त्याग दिया है अब ना उसका कोई परिवार है ना कोई घर और ना ही अब उसका इस दुनिया में कोई अस्तित्व यहीं से शुरू होती है एक साधारण इंसान की यात्रा खुद को अघोरी साधु में बदलने की अघोरी बनने के लिए कोई उम्र की सीमा नहीं होती आप 10 साल के हो या 50 साल के उम्र कोई मायने नहीं रखती ना ही जाति धर्म कोई
भी पुरुष या महिला अघोरी बन सकता है और हां आप बिल्कुल सही सुन रहे हैं महिला भी अघोरी बन सकती हैं यह साधना किसी विशेष वर्ग के लिए नहीं बल्कि उन सभी के लिए है जो संसार के हर बंधन से मुक्त होकर एक नई राह पर चलने के लिए तैयार होते हैं अघोरी बनने की राह पर सबसे पहला कदम है अपने गुरु की तलाश यह साधना का सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा है लेकिन अगर आपको कोई मानव गुरु नहीं मिलता तो आप बाबा काल भैरव को अपना गुरु बना सकते हैं जो काशी के कोतवाल माने जाते हैं
बाबा काल भैरव भगवान शिव के रौद्र रूप वही आपके मार्गदर्शक और गुरु बन जाते हैं उनकी साधना करके आपको उन्हें गुरु रूप में स्वीकार करना होता है और इसके बाद आता है सबसे बड़ा कदम पिंडदान यानी खुद को इस संसार से पूरी तरह से मुक्त कर देना इसका मतलब है कि इस दुनिया में अब आपका कोई अस्तित्व नहीं रहेगा कोई परिवार नहीं कोई मोह माया नहीं अब से आप केवल शिव के साधक हैं शिष्य का चयन होने के बाद उसे एक गुप्त मंत्र दिया जाता है यह कोई साधारण मंत्र नहीं होता इस मंत्र को बिना
एक भी दिन छोड़े लगातार 12 साल तक जपना पड़ता है हां 12 साल तक जो शिष्य इस म साधना को पूरी तरह निभा पाता है वही इस कठिन मार्ग पर आगे बढ़ने का हकदार बनता है अघोरी तीन तरह की साधनाएं करते हैं स्मशान साधना शिव साधना और शव साधना और खास बात यह है कि यह तीनों साधनाएं स्मशान घाट के भीतर ही की जाती हैं साधना शुरू करने से पहले अघोरी अपने शरीर पर स्मशान की भस्म लपेट हैं काला चोंगा धारण करते हैं और फिर शुरू होती है यह रहस्य मई साधना पहली है शव साधना
अघोरी तंत्र विद्या के धनी होते हैं और यह साधना रात के अंधेरे में की जाती है शव को मांस और मदिरा का भोग लगाया जाता है और साधना के चरम पर पहुंचने पर कहा जाता है कि मुर्दा बोल उठता है यह साधना कामाख्या पीठ त्रियंबकेश्वर उज्जैन और तारापीठ के स्मशान में की जाती है जहां केवल अघोरी ही उपस्थित हो सकते हैं दूसरी साधना है शिव साधना इसमें अघोरी शव के पास बैठकर मांस और मदिरा का भोग लगाते हैं और फिर शिव की तरह शव पर एक पैर से खड़े हो जाते हैं जैसे शिव की छाती
पर माता पार्वती का पांव रखा गया था घंटों तक इस साधना के दौरान अघोरी अपनी शक्तियों को बढ़ाते हैं तीसरी साधना है स्मशान साधना यह साधना शव और शिव साधना से अलग होती है इसमें अघोरी मृतक के परिवार को भी शामिल करते हैं शव की जगह शव पीठ की पूजा की जाती है प्रसाद के रूप में मांस और शराब की जगह दूध से बना मावा चढ़ाया जाता है अब जानते हैं असली अघोरी साधु की पहचान कैसे करें असली अघोरी साधु की पहचान करना इतना आसान नहीं होता वे साधारण साधुओं की तरह दिख सकते हैं लेकिन
उनकी जीवन शैली और साधनाएं बहुत गहरी और रहस्यमय होती हैं अघोर विद्या के जानकार मानते हैं कि असली अघोरी कभी आम दुनिया में सक्रिय नहीं होते अगर वे समाज में रहते भी हैं तो दिखावा नहीं करते वे सिर्फ अपनी साधना में लीन रहते हैं अगर कोई अघोरी आपसे पैसे मांगता है तो समझिए वह सच्चा अघोरी नहीं हो सकता क्योंकि असली अघोरी कभी किसी से कुछ मांगते नहीं हैं कलयुग में कोई भी राख लगाकर काले कपड़े पहनकर और खोपड़ी लेकर अघोरी जैसा दिख सकता है लेकिन असली पहचान उनके साधना में होती है जहां पैसे का खेल
हो वहां से दूर रहना ही बेहतर है पैसा इंसानों ने बनाया है भगवान को इसकी जरूरत नहीं होती अघोरियों के बारे में कहा जाता है कि वे बाहर से रूखे दिख सकते हैं लेकिन भीतर उनके जन कल्याण की भावना छुपी होती है अगर किसी पर उनकी कृपा हो जाए तो वे अपनी सिद्धियों का फल देने में भी पीछे नहीं हटते और अगर कोई उन्हें पसंद आ जाए तो वे उसे अपनी तंत्र विद्या सिखाने को भी तैयार हो जाते हैं लेकिन ध्यान रहे उनका क्रोध बेहद प्रचंड होता है मनोज ठक्कर जिन्होंने अघोरी अ बायोग्राफिकल नोवल लिखी
है बताते हैं कि अघोरी बेहद सरल स्वभाव के होते हैं और प्रकृति के साथ रहना पसंद करते हैं वे किसी से कोई मांग नहीं करते ना ही वे किसी से पैसे लेते हैं उनका जीवन हर किसी के कल्याण के लिए प्रार्थना करने में समर्पित होता होता है अघोरी हर चीज को ईश्वर के अंश के रूप में देखते हैं वह ना तो किसी से नफरत करते हैं और ना ही किसी चीज को अस्वीकार करते हैं इसी कारण वे इंसानी और जानवरों के मांस में कोई भेदभाव नहीं करते जानवरों की बलि उनकी पूजा पद्धति का एक महत्त्वपूर्ण
हिस्सा है और हां वे गांजा पीते हैं लेकिन नशे में भी उन्हें अपने बारे में पूरी तरह से होश रहता है उनकी साधना और उनका जीवन हर पहलू में शिव से जुड़ा होता है आपसे एक सवाल है क्या आप कभी जीवन में ऐसे संत महात्मा या अघोरी साधु से मिले हैं जिसने आपको प्रभावित किया हो तो अपने अनुभव और उस जगह का नाम कमेंट में लिखें जिसका कमेंट सबसे अच्छा होगा उन पांच लोगों की कमेंट अगली वीडियो में दिखाई जाएगी अब जानते हैं कि अघोरी साधु का अंतिम संस्कार कैसे किया जाता है और उनके शव
के साथ क्या होता है अघोरियों का अंतिम संस्कार हिंदू धर्म की पारंपरिक विधियों से कुछ हद तक मेल खाता है लेकिन इसमें कई अनूठी बातें भी शामिल होती हैं जब कोई अघोरी मृत्यु को प्राप्त करता है तो उसका शरीर साधारण तरीकों से नहीं जलाया जाता अधिकतर मामलों में अघोरी का अंतिम संस्कार स्मशान भूमि में गंगा या किसी पवित्र नदी के किनारे किया जाता है मृत अघोरी के साथ ही उसके शव को या तो जला देते हैं दफना देते हैं या उसे पवित्र नदी में प्रवाहित कर देते हैं अघोरी कभी अपने साथी अघोरी के शव को
नहीं खाते कुछ अघोरी साधु अपनी अंतिम इच्छा के अनुसार अपने शरीर को गंगा में प्रवाहित करने या स्मशान भूमि में छोड़ने की बात कहते हैं तो दोस्तों इस तरह किया जाता है अघोरी साधुओं का अंतिम संस्कार उनके जीवन की तरह ही उनका अंतिम संस्कार भी अनोखा और रहस्यमई होता है अगले चैप्टर में हम जानेंगे कि अघोरी का मूल इतिहास कहां से है भारत का प्रथम अघोरी कौन था और अघोरी का असली मतलब क्या होता [संगीत] है संस्कृत में अघोरी का मतलब है उजाले की ओर जाने वाला यह शब्द इतना पवित्र और शक्तिशाली माना जाता है
कि यह इंसान को हर बुराई से मुक्त करने की क्षमता रखता है अघोरी साधुओं का इतिहास और उनकी उत्पत्ति एक ऐसा रहस्य है जो समय के साथ गहराई में डूबा हुआ है इनका संबंध उन प्राचीन तांत्रिक परंपराओं से है जो सदियों से अपने आप में अद्वितीय और रहस्यमय मानी जाती हैं कहा जाता है कि सातवीं और आठवीं शताब्दी में अघोरी साधुओं की जड़े कापालिक और काला मुख जैसे उग्र तांत्रिक संप्रदाय में समाई हुई हैं यह वह साधु थे जो मानव खोपड़ी से भोजन करते थे और तांत्रिक अनुष्ठानों में मांस और मदिरा का भोग लगाना शवों
की पूजा करना और मानव की बलि देना इन्हीं परंपराओं से अघोरी साधुओं की उत्पत्ति मानी जाती है जिन्होंने जीवन और मृत्यु के भेद को मिटाने की साधना की शुरुआत की अघोरी शिव के अद्वितीय भक्त होते हैं यह साधु शिव के भैरव रूप की पूजा करते हैं और अपने जीवन को मोक्ष की प्राप्ति के लिए समर्पित कर देते हैं अघोर साधना की यह यात्रा बेहद कठिन और रहस्यमय मानी जाती है अघोरी साधु मानते हैं कि हर आत्मा परम शिव है और जीवन के अष्ट महा पाश काम क्रोध लालच नशा भय और घृणा से परे होते हैं
वे अंधकार से शुरू करते हैं फिर प्रकाश की ओर बढ़ते हैं और अंत में आत्म बोध को प्राप्त करते हैं और इस साधना में अवधूत भगवान दत्तात्रेय को अघोर पंथ का मार्गदर्शक माना जाता है तो हमारे मन में प्रश्न उठता है कि अघोर पंथ के प्रणेता कौन थे अघोर साधना की उत्पत्ति का श्रेय स्वयं भगवान शिव को दिया जाता है परंतु अघोरी परंपरा के पहले महान संत जिन्हें हम जानते हैं वह थे बाबा कीनाराम अघोरी परंपरा को संगठित रूप देने का श्रेय जाता है बाबा कीनाराम को जो जो अघोरी साधुओं के आदि गुरु माने जाते
हैं कहते हैं बाबा कीनाराम का जन्म 1688 में उत्तर प्रदेश के रामगढ़ गांव में एक क्षत्रिय परिवार में हुआ था उनका जन्म भाद्रपद के चंद्र महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन हुआ था जिसे शिव पूजा के लिए शुभ माना जाता है वे दांतों के पूरे सेठ के साथ पैदा हुए थे जो एक दुर्लभ घटना और आध्यात्मिक शक्ति का संकेत है 17वीं शताब्दी में जन्मे बाबा कीनाराम को एक चमत्कारी संत के रूप में देखा जाता है जिनका जीवन असाधारण घटनाओं से भरा हुआ था कहा जाता है कि जन्म के तीन दिन बाद तक वे
ना रोए ना ही उन्होंने अपनी मां का दूध पिया तीन दिव्य साधु जिन्हें ब्रह्मा विष्णु और महेश का अवतार माना गया उनके पास आए और उनके कान में कुछ मंत्र फूंक दिए तभी उन्होंने पहली बार रोना शुरू किया और अपनी मां का दूध पिया यह घटना उनके दिव्य जीवन की शुरुआत मानी जाती है बाबा कीनाराम का जीवन असाधारण था कहते हैं वह 150 साल तक जीवित रहे और अघोर पंथ को मजबूत किया बाबा कीनाराम जिनमें कम उम्र से ही आध्यात्मिक झुकाव के गहरे लक्षण दिखाई दिए मात्र 11 साल की उम्र में गुरु की तलाश में
अपना घर छोड़कर निकल पड़े अपनी खोज के दौरान बाबा कीनाराम भगवान दत्तात्रेय के शिष्य बाबा कालूराम से मिले जिन्होंने उन्हें अघोर मार्ग में दीक्षित किया बाबा कालूराम ने उन्हें अघोर शास्त्र के गहरे और रहस्यमय सिद्धांतों से परिचित कराया बाबा कीनाराम को जल्द ही इस साधना की गहराइयों का बोध हुआ और वे एक कुशल अघोरी साधक बन गए बाबा कीनाराम की साधना तब और विशेष हो गई जब उन्हें अघोर साधना की देवी हिंगलाज माता का आशीर्वाद प्राप्त हुआ बलूचिस्तान की एक गुफा में देवी हिंगलाज उनके सामने प्रकट हुई और बाबा कीनाराम को एक दिव्य मंत्र और
एक खोपड़ी भेंट की यह खोपड़ी अघोर साधना का प्रमुख प्रतीक बन गई और बाबा कीनाराम की साधना और भी शक्तिशाली हो गई वाराणसी के क्रीम कुंड आश्रम की स्थापना कर उन्होंने इस परंपरा को संरक्षित किया आज भी इस आश्रम में अघोरी साधु उनकी शिक्षाओं का पालन करते हैं और मान्यता है कि यहां की साधना से अलौकिक शक्तियां प्राप्त होती हैं अगले चैप्टर में हम अघोरी साधुओं की शक्ति और सिद्धि के बारे में जानेंगे उनके पास ऐसी अलौकिक शक्ति और मंत्र होते हैं जिनसे वे सामान्य लोगों की इच्छाएं पूरी कर सकते हैं जिन्हें जानकर आप भी
सोचने पर मजबूर हो [संगीत] जाएंगे अघोरी साधुओं की साधनाएं और तंत्र मंत्र उन्हें कई प्रकार की अलौकिक शक्तियां प्रदान करती हैं यह शक्तियां जिन्हें सिद्धियां कहा जाता है अघोरी साधुओं को अद्वितीय बनाती हैं इन सिद्धियों के माध्यम से वे अपनी इंद्रियों मानसिक शक्तियों और चेतना पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त करते हैं आइए जानते हैं इन छह प्रमुख शक्तियों के बारे में सबसे पहले है इच्छित अवत शक्ति यह शक्ति अघोरी साधु को दूसरों की इच्छाओं को पूर्ण करने की क्षमता देती है यह वरदान देने की शक्ति उन्हें अद्वितीय बनाती है चाहे वह धन की इच्छा हो या
शांति की इस शक्ति से वे दूसरों की मनोकामनाएं पूरी कर सकते हैं दूसरी है याच शक्ति यह शक्ति अघोरी साधु को अपनी खुद की इच्छाओं को पूरा करने में सक्षम बनाती है इसके माध्यम से वे अपनी भौतिक और आध्यात्मिक इच्छाओं की पूर्ति कर सकते हैं चाहे वह किसी भी वस्तु या स्थिति से संबंधित हो तीसरी शक्ति है श्रवण शक्ति यह शक्ति साधु को सूक्ष्म और अदृश्य ध्वनियों को सुनने की क्षमता देती है इस शक्ति से वे देवताओं आत्माओं और अदृश्य शक्तियों से संवाद कर सकते हैं और इनसे निर्देश प्राप्त कर सकते हैं अघोरी साधुओं की
चौथी शक्ति है शक्ति यह उन्हें निरंतर सक्रिय और साधना रथ बनाए रखती है इस शक्ति से साधक शारीरिक और मानसिक रूप से तंत्र क्रियाओं में लीन रहते हैं और बिना थके अपनी साधनाएं को पूरा कर सकते हैं पांचवी शक्ति है प्रवेश अवती शक्ति यह शक्ति अघोरी साधु को त्रिकाल दर्शी बना देती है जिससे वे भूत वर्तमान और भविष्य की घटनाओं को देख सकते हैं यह उन्हें दिव्य ज्ञान और भविष्यवाणी करने की क्षमता प्रदान करती है अंत में स्वाम्य शक्ति यह शक्ति अघोरी साधु को अपने मन शरीर और इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण देती है इस शक्ति
से वे अपने मन को किसी भी स्थिति में स्थिर रख सकते हैं और सभी प्रकार की इच्छाओं पर विजय प्राप्त कर सकते हैं यह छह शक्तियां अघोरी साधुओं को साधारण मानव से पर ले जाती हैं और इन्हीं शक्तियों के माध्यम से वे जीवन और मृत्यु के भेद से ऊपर उठ जाते हैं अगले चैप्टर में हम जानेंगे कि अघोरी साधु अपनी साधना हों के लिए भारत में किन स्थानों को सबसे अधिक महत्व देते हैं कौन से तांत्रिक पीठ उनके लिए सबसे पवित्र माने जाते हैं और किन स्थलों पर अघोरी साधु अपनी गहन साधनाएं करते हैं [संगीत]
बनारस का मणिकर्णिका घाट जिसे महा स्मशान कहा जाता है यहां दिन-रात अंतिम संस्कार का सिलसिला चलता रहता है मणिकर्णिका घाट को अघोरियों का विशेष स्थान माना जाता है इसके पीछे प्रमुख कारण है बाबा विश्वनाथ का मंदिर और गंगा के 84 घाट जहां अघोरी तांत्रिक गुप्त साधनाएं करते हैं यह घाट सदियों से तंत्र साधनाएं का प्रमुख केंद्र रहा है लेकिन बनारस के अलावा भारत और अन्य स्थानों पर भी अघोरी साधना के कई प्रमुख स्थल हैं आइए जानते हैं उन कुछ प्रसिद्ध स्थानों के बारे में जहां अघोरी तंत्र साधना की गहरी जड़े हैं सबसे पहले बात करते
हैं तारापीठ की पश्चिम बंगाल में स्थित यह स्थान तांत्रिक साधनाएं के लिए प्रसिद्ध है तारापीठ को तंत्र साधना के सबसे प्रमुख केंद्रों में से एक माना जाता है यहां सती पार्वती की आंखें भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से कटकर गिरी थी दूसरा महत्त्वपूर्ण स्थान है हिंगलाज धाम जो वर्तमान में पाकिस्तान के बलूचिस्तान राज्य में स्थित है हिंगलाज देवी का यह शक्तिपीठ हिंदू धर्म में अति पवित्र माना जाता है जहां सती का सिरो भाग गिरा था हिंगलाज माता को अघोरियों की कुलदेवी कहा जाता है असम का कामाख्या देवी मंदिर भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक
है यह स्थान तंत्र साधना के लिए प्रसिद्ध है जहां देवी सती का अंग गिरा था यहां अघोरी तांत्रिक गुप्त सिद्धियां प्राप्त करने के लिए साधना करते हैं यह स्थल अघोरियों के लिए अत्यधिक महत्व रखता है इसके अलावा भारत में अघोरी साधनाएं के कई प्रमुख केंद्र हैं जैसे चित्रकूट जगन्नाथ पुरी काली मठ और कोलकाता का काली मंदिर नेपाल के काठमांडू में अघोर कुटी और त्रियंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग भी अघोरी साधकों के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण स्थान माने जाते हैं क्या आपके गांव या शहर में ऐसा कोई स्थान है जहां तांत्रिक साधना की जाती हो अगर हां तो कमेंट करके
जरूर बताएं ताकि दूसरे लोग भी इसके बारे में जान सके अगले अध्याय में हम जानेंगे कि अघोरी बाबा और नागा साधु के बीच क्या अंतर होता है दोनों की साधना और जीवन शैली भले ही अलग हो लेकिन उनके बीच के अंतर को समझना बेहद दिलचस्प [संगीत] है अघोरी साधु और नागा साधु दोनों ही भगवान शिव के अनुयाई होते हैं लेकिन इनकी साधनाएं और जीवन शैली बिल्कुल अलग होती है आइए जानते हैं कैसे पहली बात करते हैं गुरु की अघोरी साधुओं के गुरु स्वयं भगवान शिव माने जाते हैं और यह भगवान शिव के पांचवें अवतार के
रूप में जाने जाते हैं वहीं नागा साधुओं के लिए उनके अखाड़े के प्रमुख ही उनके गुरु होते हैं जो उन्हें दीक्षा देते हैं और साधना का मार्ग दिखाते हैं अब बात करते हैं प्रमुख स्थान की अघोरी साधु ज्यादातर स्मशान घाटों पर साधना करते हैं जबकि नागा साधु हिमालय काशी गुजरात और उत्तराखंड की गुफाओं में रहते हैं उनकी जगह गुप्त होती हैं और वे अपनी साधना हों के लिए एक गुफा से दूसरी गुफा में जाते रहते हैं साधना स्थल पर भी बड़ा अंतर होता है अघोरी साधु स्मशान घाटों पर शवों के बीच साधना करते हैं जबकि
नागा साधु गुफाओं और गुप्त स्थानों पर तपस्या करते हैं दोनों की दीक्षा प्रक्रिया भी अलग होती है अघोरी साधु बनने के लिए साधक को कई साल स्मशान में कठिन साधनाएं करनी होती हैं जबकि नागा साधु बनने के लिए अखाड़े में दीक्षा लेनी पड़ती है और करीब 12 साल की कठिन साधना करनी होती है अब बात करते हैं भोजन की अघोरी साधु केवल मांसाहारी होते हैं और वे शवों का मांस भी खाते हैं वहीं नागा साधु मांसाहारी और शाकाहारी दोनों हो सकते हैं लेकिन कुछ नागा साधु शाकाहार का पालन भी करते हैं वस्त्र की बात करें
तो अघोरी साधु अपने शरीर को जानवरों की खाल से ढकते हैं जबकि नागा साधु वस्त्र के बिना नंगे रहते हैं यह भी उनकी साधना का एक हिस्सा होता है ब्रह्मचर्य के पालन में भी अंतर है नागा साधु ब्रह्मचर्य का कढ़ाई से पालन करते हैं जबकि अघोरी साधु शवों के साथ शारीरिक संबंध भी बनाते हैं यह उनके त साधना का हिस्सा होता है और वे इसे शिव और शक्ति की उपासना का तरीका मानते हैं आध्यात्मिक दृष्टि से अघोरी साधु जीवन और मृत्यु के भेद को मिटाकर मोक्ष प्राप्त करना चाहते हैं वहीं नागा साधु धर्म और समाज
की रक्षा के लिए अपनी तपस्या करते हैं धार्मिक अनुष्ठान भी अलग होते हैं अघोरी साधु तंत्र मंत्र शव साधना और स्मशान साधना करते हैं जब कि नागा साधु अग्नि यज्ञ और ध्यान के माध्यम से अपनी साधना को पूरा करते हैं अंत में धार्मिक स्थान की बात करें तो अघोरी साधु शिव के उग्र रूप भैरव और शक्ति की साधना करते हैं वहीं नागा साधु भगवान शिव के शांत और ध्यान मग्न रूप की पूजा करते हैं इन सभी अंतर के बावजूद दोनों ही साधु अपने अपने मार्ग पर भगवान शिव की भक्ति करते हैं और उनकी साधना ना
हिंदू धर्म में एक विशेष स्थान रखती है तो दोस्तों यह थी अघोरी साधुओं की रहस्यमई दुनिया अब आपको अघोरी साधुओं के बारे में क्या लगता है उनके जीवन और साधनाएं पर आपका क्या पक्ष है हमें कमेंट में जरूर लिखें हम आपकी हर एक कमेंट पढ़ते हैं और एक बात दोस्तों अगली डॉक्यूमेंट्री आप किस विषय पर देखना चाहते हैं यह भी बताना ना भूले तब तक के लिए धन्यवाद जय हिंद जय भारत [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत]