स्वास ताल बध होने से स्वास कम खर्च होते हैं एक मिनट में 13 से 14 स्वास खर्च हो जाते हैं लेकिन जो स्वासो स्वास को देखने की साधना करेंगे तो उनका 25 परट स्वास कम खर्च होगा तो समझो 60 साल आयुष है तो 75 साल तक जी लेगा समझो स्वासो स्वास 50 साल का है तो 62 साल जी लेगा और जो जरा जरा बात में इधर देखेगा उधर देखेगा चंचल होगा चलते चलते बातें करेगा बे मौसम के खाएगा खड़े-खड़े पानी पिएगा खड़े खड़े पेशाब करेगा खड़े खड़े खाएगा उसके स्वास्थ की शक्ति ज्यादा ख वो चिड़चिड़ी
हो जाएगा गुस्से बाज हो जाएगा जिसकी दुर्गति होने वाली है वह विपरीत खोराक करता है जैसे कार्तिक में देही खाना चाहिए भादों में दही नहीं खाना चाहिए तो व भादों में देही खाएगा फिर दिन को सोएगा तो त्रिदोष बढ़ेंगे कार्तिक में करेला खाएगा करेला कार्तिक में खाए तो मरे नहीं तो बीमार तो हो जाए तो विपरीत आहार करेगा रात का उजागर करेगा दिन को [संगीत] सोएगा अमावस्या है पूर्णम है अष्टमी है संसार व्यवहार करेगा जल्दी बूढ़ा होगा जल्दी बीमार होगा जल्दी मरेगा जिनको सत्संग नहीं है वह विपरीत खोराक विपरीत कर्म करके अशांति लेते जिनको सत्संग
है फिर व नहीं करते कपट का स्वभाव भी धीरे-धीरे छोड़ देते सत्संग की बलिहारी सत्संगति किम न करोति पुन साम मनुष्य का क्या मंगल नहीं करती सत्संगत तो सत्संग बहुत पुण्य जोर करते तब सत्संग मिलता है या तो भगवान की कृपा होती तब सत्संग मिलता है बिनु हरि कृपा मिले नहीं संता बिनु पुण्य पुंज मिले नहीं संत और जिस जा सुज पर सत्य स्नेह हो जिसका जिस चीज के लिए सत्य स्नेह है वह उसे मिल जाता है तो अति अंदर में उत्कंठा होगी तो भी सत्संग मिलेगा पुण्य जोर होगा तो भी सत्संग मिलेगा भगवान की
कृपा होगी तो भी सत्संग मिलेगा अपना पुरुषार्थ पुण्य जोर और भगवान की कृपा तीनों में से कुछ होगा तभी आदमी सत्संग में जा सकता है बैठ सकता है और सत्संग में जब यह साधना होती है जप होता है तो रक्त के कण पवित्र होते मन पवित्र होता है फिर स्वासो शवास की साधना करें 20 टका 25 टका 15 टका जितना स्वस्ता बंद होगा उतना टका शवास कम खर्च होगा समझो एक मिनट में 13 शवास खर्च रहे थे तो शवास गिनते जाओगे तो आदत पड़ जाएगी थोड़ी तो फिर स्वास ताल बद चलेंगे तो 10 स्वास में
काम हो जाएगा तो जहा 130 स्वास खर्च होते थे वहां 100 होंगे 13 की जगह पर 10 हो गया न हो गया 12 हो गया तो जितना ताल बध होगा उतना मन भी चंचल कम होगा उतना दूसरे के मन के भाव को भी समझ सकेंगे कि हमको पटाता है हमको घुमाता है द्वेष वाला क्या करता है सब पता चल जाएगा सहज में तो इंद्रियों का स्वामी मन है और मन का स्वामी प्राण है प्राण कई लोग ऐसे स्वास खर्च कर लेते हैं ऐसा नहीं कि 60 साल लिख के आता है नहीं 10 करोड़ या 10
अरब 6 करोड़ 13 लाख 12 दो 12 स्वास है आपके तो आप 13 नहीं ले सकते एक स्वास भी आप ज्यादा नहीं ले सकते फिर चाहे धीरे-धीरे स्वास खर्च करें समझो इतने पैसे आप धीरे-धीरे खर्च करें या होटल में जल्दी खर्च करें होटल खाली करना पड़ेगा ऐसे शरीर छोड़ना पड़ेगा इसी कारण चांग देव ने स्वासो की उपासना धारणा किया और 1300 साल तक जी वशिष्ठ महाराज 6 हज वर्ष तक जी चौन ऋषि भी काफी जी दूसरे भी कई महापुरुष काया कल्प करके शरीर के कणों को बदल के स्वास की उपासना करके फिर से लंबा समय
लेकिन अंत में शरीर तो मरने वाला है लंबा समय जीने के बाद भी शरीर तो मरता है शरीर मरने पर भी जो नहीं मरता है उस सोहम की साधना वो मैं ही हूं सब में अनेक रूपों में मैं ही हूं वासुदेव मैं ही माना सब में बस रहा है वह आत्मा वासुदेव सब वासुदेव है बंदर में भी वासुदेव है तो बंदर को क्यों मारते हैं क्यों बंदर से मजाक करते हैं यह करते हैं सब वासुदेव की लीला है एक ही वासुदेव अनेक रूप में लीला करता जैसे आप ही चैतन्य आत्मा है फिर स्वपने में कोई
मारने वाला कोई मरने वाला कोई देखने वाला कोई हंसने वाला कोई रोने वाला ये स्वपने की लीला उस समय बड़ा दुख सुख देती है लेकिन सब आत्मा की सत्ता सेही होता है ऐसे यह सब आत्म सत्ता का विलास है स हम स्वरूप की उपासना करके समझ जाता स्वास ले फिर आकाश की तरफ एक टक देखे देखे देखे अपने को आकाश रूप चिंतन करने से भी हृदय आकाश चित्ता आकाश और चैतन्य आकाश की एकता हो जाती है प्राण पान को सम करते हैं शवास लिया का धीरे धीरे छोड़ा धीरे धीरे प्राण पान की गति सम करने
से सक्षम का द्वार चल पड़ता है स्वभाव में बड़ा आनंद आता है और बाह्य सुख की गुलामी कम हो जाती शरीर को साफ सुथरा पवित्र रखे जिस किसी को छुए नहीं तो फिर और शरीरों से घृणा होने लगेगी काम विकार आदि से बेटा अच्छा चलता है तो इतना फ नहीं जितना बेटा या पत्नी या परिवार वाले अपने से गलत चलते हैं अच्छा चलेंगे तो मोह ममता में समय बीत जाएगा बुरा चलेंगे तो वैराग होगा इसलिए भगवान की कृपा है राजे लोग देखते थे कि हमारा बेटा हमारा कहना नहीं मानता है ऐसा है वैसा है दुखी
होते थे फिर जब सत्संग मिलता था तो समझते कि भगवान की कृपा है कना मानता तो हम ममता में मर जाते नहीं मानता तो ठीक है बैरा हो गया आजकल का जमाना तो बच्चों का बच्चियों का स्वभाव ऐसा बना दिया टीवी हों ने और अखबारों ने और वातावर ने कि मां-बाप का कहना ही नहीं मानो उल्टा चले तो मां-बाप को भी वैराग आवे पहले तो सत्संग से विवेक से वैराग आता था कि लोग एकांत में चले जाते थे अब तो इतना विवेक वैराग नहीं रहा तो गड़बड़ से वैराग दिलाते भगवान कि चलो बेटे गड़बड़ करो
बेटियां गड़बड़ करो भाई गड़बड़ करो संसार से वैराग महाभारत में लिखा है दो शब्दों से बंधन है और तीन शब्दों से मुक्ति ममा यह मेरा है बेटा मेरा है पत्नी मेरा है धन मेरा है ममता ममा ममा से बंधन है ना ममा ये मेरा नहीं है मुक्त हो गए हमको मुक्ति चाहिए तो मुक्ति कोई आकाश पाताल में नहीं है ममता का त्याग हो गया तो आसक्ति का त्याग हो गया मुक्त है शरीर तो ऐसे ही समय पाकर मुक्त हो ही जाएगा मर ही जाएगा और मन में आसक्ति नहीं तो दोबारा जन्मना नहीं है भगवान का
ध्यान भजन आनंद लिया तो उस आनंद में लीन होना है तीन चीजें बहुत दुर्लभ है एक तो [संगीत] मनुष्यवकाशा [संगीत] महापुरुष का सत्संग तो मिल जाता है लेकिन लोग मेरा सिर दर्द है मेरा छोकरा मैं कहना नहीं मानता मेरा धंधा नहीं चलता तो महापुरुष का संपर्क का फायदा नहीं लिया मोक्ष की इच्छा नहीं है मनुष्यवकाशा जैसे भोजन में सावधानी रखने से आदमी तंदुरुस्त रहता है ऐसे विचारों में और संग में सावधानी रखने से मन तंदुरुस्त रहता है और उद्देश्य की सावधानी से बुद्धि तंदुरुस्त रहती है तंदुरुस्त बुद्धि बुद्धि दाता में लगेगी तंदुरुस्त मन प्रसन्न रहेगा
तंदुरुस्त तन निरोग रहेगा तो आपके हाथ की बात है पुरुषार्थ करके बा जान लेनी चाहिए 10 से 15 मिनट सूर्य के धूप में शरीर स्नान करें 10 से 15 प्राणायाम रोज करें और भोजन देर रात को ना खाए पहले वाला पचा ना पचा दूसरा ना खाए दुख आए तो दुख में डूब ना जाए सुख आए तो सुख में चिपक ना जाए सुख और दुख को बीतने वाला समझे आखिर कब तक संसार बड़े-बड़े राजे ऐसा बनू वैसा बनू लेकिन जो बने उनका क्या है मैं ऐसा बन जाऊं मैं ऐसा बन जाऊं लेकिन तू बन जाए उसके
पहले जो बन गए वो कहां गए कुछ बनने की इच्छा आवे उसके पहले विवेक लगाओ कि वो बन गए ऐसे बन गए फिर क्या हो जाएगा मैं नेता बन जाऊंगा मिनिस्टर बन जाऊंगा तो आज तक के मिनिस्टर ने क्या ले लिया मैं बड़ा सेठ बन जा तो क्या झक मार लेगा अरे मैं कौन हूं अपने आत्मा को जान लो अपने परमात्मा को पालो मैं डॉक्टर बन जाऊं मैं वकील बन जाऊं मैं फलाना बन जाऊं मैं फलानी बन जाऊ तो क्या झक मार लेगा बनेगा वह बिगड़ेगा जानेगा वह तरे का अपने आत्मा को जानो कुछ थयो
ने रानी बैठी आ ते से फलानी जख हमारी ने ज कर मिले त राम मिले अगर मिले तो प्रभु मिले रानी मिली राजा मिला बेटा मिला बेटी मिली आखिर क्या झक मारा इतने दिन मिले तो अभी पेट नहीं भरा क्या दुनिया ज कर मिले त राम मिले सब मिल तो छा थयो दुनिया में दिल जो मतलब पूरो थयो तो थ मन की वासना पूरी हो गई तो इच्छाएं पूरी हुई तो क्या बड़ी बात ई मिले भगवान का ज्ञान मिले भगवत शांति मिले भगवत सुख मिले ऐसा मिले कि बिछड़े नहीं पत्नी भी बिछड़ जाएगी पति भी
बिछड़ जाएगा पद भी बिछड़ जाएगा जो नहीं बिछड़े व है अपना आत्मा उस आत्मा में शांति उस आत्मा को सोहम स्वरूप जाने वही हूं मैं जो इन आंखों से देखता हूं वह सभी की आंखों से मैं ही देखता हूं मन अलग अलग है शरीर के मॉडल अलग अलग है लेकिन मैं एक ही हूं सब ओम ओम ओ इस प्रकार का दृढ़ ज्ञान करें प्रीति पूर्वक भक्ति करें सत्संग का तो आदर करें सेवा भाव से काम करने से मन में आनंद रहता है काम में लापरवाही नहीं करना चाहिए काम में चोरी नहीं करना चाहिए काम करे
तो ईमानदारी से करे तत्परता से करे और द्वेष नहीं रखना चाहिए कपट रखने से अंतःकरण मलिन होता है कपट गांठ मन में नहीं सबसे सहज स्वभाव नारायण ता दास की लगी किनारे ना हो कपट गांठ मन में नहीं द्वेष कपट मन में नहीं सबसे सहज स्वभाव जो अंदर वही बाहर कपट गांठ मन में नहीं सबसे सहज स्वभाव नारायण वा दास की लगी किनारे ना व जन्म मरण के किनारे लग जाएगा संसार के दुखों से किनारे हो जाएगा सुबह नींद में से उठकर शवास गिनो और शांत हो मथा टेक कार्यक्रम में पड़े रहो नींद में से
उठ दो पा मिनट तो जरूर है बड़ी शांति मिलेगी और फिर बैठ के स्वासो शवास गिनो ध्यान करते वक्त देखने में तो तुम चुप बैठे हो लेकिन भीतर बहुत कुछ यात्रा कर रहे हो बाहर से नासमझ लोग बोलेंगे कि यह कुछ नहीं कर रहा है लेकिन आपके द्वारा वास्तव में बहुत कुछ बढ़िया हो रहा है वर्षों तक मजदूरी करके बाहर का अथक परिश्रम करके जो ना कमा सके हो वह इन ध्यान के क्षणों में कमा लेते हो युगों तक जन्मते मरते आए हो लेकिन उस सत्य स्वरूप परमात्मा के करीब नहीं जा पाए हो वहां अब
बैठे बैठे मौन और ध्यान के क्षणों में जा रहे हो श्वर दुनिया की चीजों की क्या इच्छा करना अपने परमात्मा आत्मा में खुश र की करना है मरे तो पिया याद करे मारा पिया क है व थारा बाप पढ़िया है कि कर लेयो थे कौन ले गयो आया मरा पिया कटे है मरा सरा कटे है अरे मैं अमर आत्मा हूं शरीर मरे र मैं तो अपने आप में मस् मने मारे वो कोई तलवार नहीं कोई मौत नहीं मौत री मौत हो जाए मरा हात मार ह तो मैं तोर आत्मा ओ हरी ओम ओ हमारा आत्मा
रो विचार करे तो हमारा आत्मा रे पा में चकला चौ विचार कर तो चौ सख सख विचार कर तो सार याद आवे तो ही मरे कबीर जी कहा कि भाई तुम आया करो कथा में बोला हां महाराज मेरा छोकरा की सगाई हो गई है शादी हो जाए फिर आऊंगा चोकरे की शादी हो गई बोले अब तो आओ बोले वो जरा मेहमान आता जाता है परणा महाराज थोड़ा दिन के बाद आऊंगा ऐसे दो साल बीत गए बोले अब तो आओ बोलो वो छोकरा की महाराज व बह है ना बह मेरी वो मां होने वाली छोकरा मेरा
बाप होने वाला है मैं दादा होने वाला हूं घरे टाबरा टाबरा रे टाबरा है वो जरा भाले फिर कथा में आे तो टाबरा का टाबरा हुआ पोटो थयो अब तो कथा में आओ अरे बोले महाराज आप मेरे पीछे क्यों पड़े दूसरे नहीं मिलते क्या कबीर ने हाथ जोड़ लिए फ दो पाच साल सात साल गुजर गए कबीर फिर गए देखा कि वो कहां गया खेत वाला दुकाने भी थी खेत भी था बोले वो तो मर गया कबीर बोला मर गया क्या कि मरते मरते वह सोचता था कि मेरा खेत का क्या होगा दुकान का क्या
होगा कबीर ने ध्यान लगाकर देखा कि दुकान में चूहा बनाए के खेत में बैल बना है ध्यान करके देखा तो आरट में बंधा है बैल बन गया उसके पहले बोले हल में जूता था फिर गाड़ी में जूता अब बूढ़ा हो गया कभी देखा कि थोड़े-थोड़े दिन में आते जाते रहे फिर वो बुे बेल को बेच दिया आपके काम नहीं करता तो तेली के पास बेच दिया 50 में तेली ने भी थोड़ा तेल निकाला उसमें से फिर तेली ने भी बेच दिया कसाई को और कसाई ने बिस्मिल्लाह अल्लाह अकबर चुरा फिरा दिया चमड़ा उतार के नगार
वाले को बेच दिया और टुकड़ा टुकड़ा करके मास बेच लिया कबीर जी ने साखी बनाई कथा में तो आए नहीं मर करर बैल बने हल में जूते ले गाड़ी में दन फिर गाड़ी में दिया हल नहीं खींच सका तो छकड़ा में दिया बेल बने हल में जूते ले गाड़ी में दीन तेली के कोलू बने फिर कसाई घर लीन मास बिका बोटी कटी मास बिका बोटी कटी मास बिका चमन मढ़ी नगार कुछ कर्म बाकी रहे तिस पर पड़ र मा [संगीत] धम व डंडे पड़ रहे से नगार प डंडे पड़ रहे हैं कर्म बाकी है तो
डंडे पड़ रहे पु के रानी के राजा के डंडे पड़ेंगे फिर मेरा परमात्मा कहां है हमारा आत्मा कहां है यह तो मरने वाला शरीर मर रहा है सपने जैसा बेटे बेटी का सपना संसार सपना हो गया लेकिन वह बचपन में जो मेरे साथ था शादी में साथ था बुढ़ापा में साथ है मरने के बाद भी जो साथ नहीं छोड़ेगा व मेरा प्रभु आत्मा कैसा है ओ मानंद ओम शांति ऐसे करके उस आत्मा को जाने तो मुक्त हो जावे छोरा का क्या होगा खेती का क्या होगा तो बैल बनो बेटा जा फिर बैल बन के भी
तो खेती तो संभाले नहीं बुढा हो गया तेली का कुल बना फिर कसाई घर बिका इसलिए मन को संसार में नहीं लगाना नाव पानी में रहे लेकिन पानी नाव में नहीं रहे शरीर संसार में रहे लेकिन अपने दिमाग में संसार नहीं उसे अपने दिमाग में तो ओम आनंद ओम शांति माधुर संसार स्वपना परमात्मा अपना मन तो ज्योति स्वरूप अपना मूल पछा अपने आत्मा मूल को जाने की कर मरे मरा पिया कटे है और लक्ष्मी चंद सेठ कलकता मरवा पयो तो स्वास निकले कोई नहीं स्वास प्र अटक की मरा पिया कटे पिया क ब्राह्मण ने देखा
कि इसका तो मन पिया में लगा है कंठ में स्वास है डोकरा मरता नहीं तो छोरों ने 10 रुप का पाच रुपए का बंडल दो चार रखे तो बोले त पया मैं तो करोड़ों बेड़ा की भी अरेरे जी तो ले नहीं कप भ कंजूस रही औलाद कंजूस नोटरी थापी काडी क्या डोक लेन मरेग के दान करना पड़ेगा कना के छाती प धरो तो फिर अन्य क्षेत्र में देना पड़ेगा आश्रम में देना पड़ेगा क तो फिर व नोट की गड्डी खोली 50 50 की और छूटा किया छूटा करके इतना ऐसा छाती पे रखा क्या अरा भया
पया तोरि थे तो गया मराया क थारा बाप थारी छाती है की कर ले जाए तो अरे भगवान में मन लगा भाया पिया में मन लगावे बेईमानी में कपट में मन लगावे सेवा करे तो आनंद आवे भगवान तो देखे र कोई नहीं देखे तो भी कर्म ने तो भगवान तो देखे अन वो भगवान मारो आत्मा है हरि ओम हरि ओम ओम ओम [संगीत] शांति शिव जी कहते हैं उमा कह में अनुभव अपना सत्य हरि भजन जगत सब स्वपना भगवान का सुख भगवान का शांति आनंद सच्चा है जगत सारा सपना है जब पोषक तुम हो तो
फिर काहे डरना तेरी मार में भी प्यार है तेरे दुख और विघ्न बाधाओं में भी हमारा विकास छुपा है हम गलती करते थे कि सोचते थे कि हम परेशान है जो सोचता है परेशान हू परेशान हू उसको परेशानी घरती रहेगी जो सोचता है मैं दुखी हूं दुखी हूं उसको दुख छोड़ेंगे नहीं लेकिन जो सोचता है कि मैं चैतन्य हूं प्रभु का हूं आनंद स्वरूप का हूं उसके आगे दुख और शोक और परेशानिया टिक नहीं सकती ओम ओम ओम जो बीत गई सो बीत गई तकदीर का शिकवा कौन करे मैं दुखी हो गया इसने ऐसा कहा
उसने ऐसा कहा किसी के दोषों को विचारो नहीं और अपने दुखों की आवृति मत करो दुख बढ़ जाएंगे चिंता की आवृति मत करो दुखों की आवृति मत करो भोगों की आवृति मत भगवन नाम की आवृति करो भगवत ध्यान की आवृति करो भगवत ज्ञान की आवृति करो भगवत प्रेम की आवृति करो आपके सारे दुख छ सारी परेशानी छ सारे कष्ट छ सारे पाप ईश्वर में सुख बुद्धि होनी चाहिए संसार से सुख लेने की हमारी जो आदत है वह हमें बुरी तरह दुख में डाल देती है संसार से सुखी होने में जो फसे हैं वो अपने लिए
दुख का कुआ खोद रहे हैं वह पागल है संसार में और सुखी रहना शादी करके सुखी हो जाऊंगा बेटा करके सुखी हो जाऊंगा बहु लाकर सुखी हो जाऊंगा पैसे इकट्ठे करके सुखी हो जाऊंगा तो जिन्होंने कर लिया कौन से जख मार ली देख लो तुम्हारे सामने है चुनाव लड़कर सुखी हो जाऊंगा जीतकर सुखी हो जाऊंगा क्या आज तक जीते हुए में कितना सुख टिका है पूछ के देखो गुजराल से नरसिंहराव से देवे घोड़ा से बीपी सिंह से और भी जो है हमसे कोई पूछे तो हम तो कहेंगे ढेर सुख है मेरे पास और व सुख
सबके पास छुपा है प्रधानमंत्री बनने में सुख नहीं छुपा परमात्मा में अपनी मैं मिलाने में सुख छुपा है कंगाल बनने में भी सुख नहीं अमीर बनने में भी सुख नहीं विद्वान बनने में भी सुख नहीं और अनपढ बनने में भी सुख नहीं स्वर्ग में भी शाश्वत सुख नहीं अतल में भी सुख नहीं वितल में भी सुख नहीं स्त्री होने में भी सुख नहीं पुरुष होने में भी सुख नहीं नान्य तर होने में भी सुख नहीं कि को जाओ ढोल बजाए जाति नंबर थर्ड में भी सुख नहीं पशु होने में भी सुख नहीं पक्षी होने में
भी सुख नहीं गंधर्व होने में भी सुख नहीं किन्नर होने में भी सुख नहीं हे राम जी मैं 14 लोकों में घूमा कहीं भी शाश्वत सुख नहीं एक जगह दिखा जहां संत का मन ठहरता है उस अंतर्यामी ईश्वर में सुख है बाही क तालियां तो बजा ली मतलब आप सहमत हो तो फिर इरादा पक्का कर लो कि हम अंतर्यामी में गोता मारा करे पक्की बात है श्री कृष्ण ऐसी भाषाएं भाषाए 64 कलाए जानते थे पशु पक्षियों की भाषा जानते थे बोलते थे लेकिन सारी कलाओं का आधार तुम्हारा अंतर्यामी आत्मा है कोई छह कला जानो कोई
10 जानो कोई 20 जानो कोई 25 जानो कोई 30 जानता बस 64 जानने वाला देख लो वह क्या कहता है वह कहता है मम वान सो जीव लोके जीव भूत सनातन तुम मेरे वंश जो सनातन चाहे भाषाए जानो चाहे ना जानो लेकिन तुम्हारा आत्मा मेरा एक है उष्ट जागृत इस बात को जानने के लिए खड़े हो जाओ जागो उपदेश तिते ज्ञानम ज्ञानी ना तत्व दर्शना जो मुझे तत्व रूप से जानते ऐसे ज्ञानी महापुरुषों की शरण जाओ वे उपदेश देंगे उसी प्रकार तुम मुझसे ऐसे मिलो जैसे लहर सागर से मिल जाती है जैसे घड़े का आकाश
महाकाश से मिल जाता है तू तारा मन रिकर्ड ले भाया तुम जब संसार से सुख लेने की इच्छा करते हो तब दो पैसे के हो जाते हो दो कोड़ी के हो जाते हो संसार से सुख लेने की इच्छा करते हो ना जितनी इच्छाएं ज्यादा उतना आदमी छोटा जितनी इच्छाएं कम उतना आदमी बढ़ा और इच्छा नहीं तो भगवान है कुछ चाहिए बहुत चाहिए तो गदाई कुछ चाहिए तो खुदाई कम चाहिए तो खुदाई कुछ नहीं चाहिए तोहा शशाई तुर्क दुनिया तुर्क को बा तुर्क मौला तुर्क तुर्क अब तो ईश्वर भी नहीं चाहिए लो स्वर्ग तो नहीं चाहिए
चलो तो ईश्वर के लिए स्वर्ग को बलि क दिया लेकिन जब गुरु कृपा हो गई समझ गए तो ईश्वर तो हमारा आत्मा है जाओ अब ईश्वर भी नहीं चाहिए ओ हो शशा हो गए कबीरा मन निर्मल भयो जैसे गंगा नीर पीछे पीछे हरी फिरे कहत कबीर कबीर य है कितनी ऊंचाई तक जा सकते हो अरे आटा दाल की चिंता फेंको बेटी का क्या होगा बेटे का क्या होगा मेरा क्या होगा फिकर फेंको अब भी जो है उसमें वर्तमान ईश्वर में आ जाओ बस कहे मरो कहे डरो ओम ओम ओम मैं 72 साल का हूं मैं
75 साल का हूं बिल्कुल झूठी बात है यह तो शरीर 72 साल का तू उसके पहले भी था और बाद में भी रहेगा बोल कितनी उम्र है मैं 60 साल का हूं ये तो शरीर को मैं बालता है तू तो इतने साल का है कि आज तक कोई गणित पैदा नहीं हुआ जो तेरी उम्र बता दे