तो प्रशांत आत्मा भगवान कहते हैं जिसका जिसका ठीक से शांत हो गया मन संयम म चित्तो मन का संयम हो गया और मेरे में चित्त शांत मैं जहां से होता है उसी में चित्त शांत हो इसीलिए अच्छा लग रहा है मैं बोलता हूं तुम बोलना गुरु जी तुम तसल्ली ना दो सिर्फ बैठे ही रहो महफिल का रंग बदल जाएगा गिरता हुआ दिल भी संभल जाएगा काम में क्रोध में भय में चिंता में पाप में जो दिल गिर रहा है गुरु के समक्ष बैठने से वो दिल संभलने लगता है मारी नाव दरिया मा डोले गुरुजी भव
तार एमा ममता ना मगर से मोटा हो नथ पड़ता मुझ थ खुटा मने पकड़यो छ जबरा जोरे गुरुजी भव सागर थी तार पड़ गाबू ने नीर त्या भराय देखी ने मन मारू गबराय मारी नाव चड़ी चग डोले गुरुजी भवसागर तार जोरे बापा तो अभी मां सरस्वती की पूजा करती थ कौन लीलावती लीलावती को हुआ कि हम इतने सुखी है और इतना पवित्र पति जो मानो संयम की मूर्ति हमारा इतना स्नेह होते हुए भी शारीरिक विकार में ना पति स्वयं गिरते ना मुझे गिराते तो ऐसे पति को पाकर में तो धन्य हुई ऐसा पति जो काम
विकार में स्वयं गिरते नहीं और मुझे गिरने देते नहीं तो ऐसे पति को पाकर मैं धन्य हु मां सरस्वती की उपासना करूं और मेरा पति सदा मेरे साथ है कभी जाए नहीं ऊपर तो सरस्वती मां की आराधना की सदा सुहागन बने र मेरे प्रति की म कभी ना स्त्रिया सुहाग की रक्षा के लिए सावन की तीज का उपवास करती लीलावती ने ऐसा व्रत किया कि ते महीने तक मां सरस्वती आए एक दिन दूध ले दूसरा दिन पूरा ऐसा फका का पति को बताए नहीं गुप्त रूप से अपनी साधना चालू उसका अनुष्ठान से वृति एकाकार हुई
और मां सरस्वती के मंत्र की संख्या भी हुई तो जितनी संख्या जिस देव के लिए उतनी होती है और श्रद्धा से तो व देव प्रकट होते हैं जैसे 10 करोड़ जप करने से सीताराम प्रकट हो गए समर्थ रामदास के आगे तुकाराम बाबा के आगे राधा कृष्ण प्रकट हो गए तो मंत्र की संख्या बनती उतनी तो फिर देव प्र हो [संगीत] जा महाराज क्या बताए आपको कि मां सरस्वती प्रसन्न हुई प्रकाश प्रकाश कमरे में और सरस्वती की अपनी आभा है अपना प्रसन्नता है अप आध्यात्मिक रा है वाइब्रेशन जैसे ऊंची होरा और ऊंचे वाइब्रेशन वाले संत आ
जाते तो वातावरण कितना उलसत हो जाता है आनंदित हो जाता हमारे गुरु जी आते तो वातावरण ऊंचा हो जाता तो जितना आध्यात्मिक पुरुष होता है उतना उसके आने से वातावरण में दूर दूर उसकी रा फैलती उत्साह आ जाता है पुण्याई आ जाती सात्विकता आ जाती तो सरस्वती माता का तो कितना महापुरुष होगा कि नहीं होगा तो मां सरस्वति प्रकट हुई तो बस गदगद हो गई लीला और बड़े प प्यार से श्रद्धा भक्ति से और भाव से मां का पूजन किया ना की मां सरस्वती ने कहा वरम बया वरदान मांगो तो लीलावती ने कहा कि मैया
तुम प्रसन्न हो तो मैं और कुछ नहीं मा केवल मेरे पति जो है ना कभी मेरा साथ ना छोड़ मेरे पति कभी स् वासना हो तो सरस्वती ने कहा जो जन्म आया उसको तो मरना पड़ेगा सदा अमर तो कोई नहीं होता दूसरा कोई वरदान मांगो बोले मां अगर कभी उनका समझ शरीर चला भी जाए तो इसी ब्रह्मांड में रहे एव अस्तु मां खुश क्या अपना जिद्द नहीं करता ना भक्त अगर जिद्द करता है तो भगवान को गुरु को अच्छा नहीं ल जैसे आपकी तो सरस्वती प्रसन्न होकर वरदान दे दिया कि लीले जब तुम मुझे याद
करोगी कोई कठिनाई होगी मुझे याद करोगी तो मैं तुम्हें मिलने आऊ दर्शन ऐसा करते जैसे पानी में तरंग उत्पन्न हुआ पानी में लीन हो गया ऐसे ब्रह्म में उत्पन्न हुई उनको ऐसा नहीं ज करके कहीं से आए करके जहाज में उड़ जाए नहीं यूं प्रकट हुए अतन भगवान चाहे तो अभी यह कमरा बंद हो और यहां प्रकट हो बातचीत करे और फिर अंतर्धान जैसे स्वपने में भगवान प्रकट होते तो जहां प्रकट होते फिर अंतर्धान नहीं हो जाते क्या स्वपने में कितनी दुनिया प्रकट होती तो महाराज सरस्वती मां तो अंतर्धान हो गई और समय काल चक्र
चलता रहा दिन दिन आयुष्य नाश होती रही एक दिन पड़ोसी राजा ने राजा पदम पर चढ़ाई कर दी राजा युद्ध में गए और पड़ोसी राजा का सैन्य बल और राजा की वासना और उत् सा तीव्र था ण भेरी बजी खूब लड़ाई हुई कई कटे [संगीत] कई रक्त का प्रवाह बहा खूब घमासान युद्ध हुआ और यहां तक युद्ध बढ़ गया कि राजा तक राजा का शत्रु पहुंच गया राजा मर गए छाती में बाढ लगा य लगा हाहाकार मच गया राजा मरे तो फिर सेना का बल क्या फिर भी मजबूत सेनापति ने लोहा लिया राज्य में नहीं
घुसे कुछ सीमा वो लोग ले गए राजा का शब आया लीलावती पति चले गए जिसम ज्यादा प्रीति होती उसके वियोग से उतना ही दुख होता प्रियम ताम रोधस जो तेरा जितना ज्यादा प्रिय है वह तुझे ज्यादा रुलाएगा भगवान संत पुण्य इसको छोड़ो संसार की बात प्रेम ताम रोज सस जो तेरा प्रिय है वह तुझे रुलाएगा ईश्वर के सिवाय कहीं भी प्रीति हुई तो तुझे रुलाएगा बेटा हो चाहे पति हो चाहे पत्नी हो चाहे धन हो चाहे कुछ भी हो ईश्वर के सिवाय कोई भी प्रिय लगता है वो तुझे रुलाएगा क्योंकि ईश्वर ही सदा रहता है
बाकी सब बदल जाता है आत्मा सदा रहता है तो लीलावती बहु रोई पटी के वियोग में मा मा मा गाय का घी नाभी प शरीर प नाक में रुई के कुमड़े कान में रुई के कुमड़े ताकि सब जल्दी खराब ना हो पैरों में शरीर में सारा घी भी का लेप करके उस जमाने की जो औषधिया थी मतलब कोटेड कर दिया कवर कर दिया लेप का शरीर ज का त रहे मां सरस्वती के आगे दिया जला कर एक टक बैठ मां सरस्वती आए उस संकल्प से में बैठती ओम सरस्वत एकाकार हुई और शांत हुई नि संकल्प
हुई तो नि संकल्प होने से आत्मा का स आत्मा वि शांति होती है तो व्याप जाता है संकल्प फिर कोई कितना भी दूर हो तो उसको पता चलता है कि मुझे याद जैसे प्रार्थना करते करते शांत हो जाते तो चाहे गुरुजी हो चाहे इष्ट देव हो उनको पता चल जाए जितना आप शांत होते उतना विभ इतना चंचल होते तो आंखों में होते थोड़े शांत होते तो मन में होते और थोड़े शांत होते तो गहरे मन और शांत तो बुद्धि में और शांत तो जीव में और शांत तो ब्रह्म उस समय का संकल्प कोई नहीं काट
सकता यदि व संकल्प चलाए तुलसीदास ने ऐसा करके सिर पर हाथ रख दिया तो मुर्दा जिंदा हो गया ऐसा सुना है कहानी में कथा तुलसी मुआ मंगाए के सिर प मिलो हाथ हम तो कुछ जानत नहीं जीव है या मैं हूं तब तक कुछ नहीं तुम जानो रघुनाथ अर्थात ईश्वर में खो जाए तब कुछ ईश्वर की लीला तो उसमें सात्विक पुरुष होते दारू य मास खा याय हरामखोर किन्ना खोर व्यक्ति का काम नहीं है शुभ आशीर्वाद देना तुलसीदास महावीर बुद्ध है कबीर जी है लीला साबा कु एकनाथ है ऐसे पुरुषों के संकल्प में बल होता
है महाराज क्या बताए सरस्वती आ गई लीले लीले रो मत में आ ग मां का मां मेरे पति चले गए बोले नहीं गए मैंने तुझे वरदान दिया था कुछ भी होगा तो इसी मंडल में रहे अर्थात इसी वायु मंडल में रहे इस आकाश से इस ब्रह्मांड से बाहर नहीं जाए चल मैं तुझे तेरे पति से मिलाती हू बैठी और अपने योग बल से उसका सूक्ष्म शरीर आ गया आगे सरस्वती और पीछे लीला कुछ ऊपर गई तो देखा कि राजा तो राजपाट प बैठे यह मंत्री है यह टहल है मां मैं क्या देखती हूं बोले जीव
का जैसा संकल्प होता है अंत वाहक शरीर से फिर उस स्थित होकर उसी संकल्प के अनुसार उसका माहौल बन जाता है तो मंत्रियों को भी राजा का सानिध्य की इा थी और राजा को भी राज्य करने की वासना थी इसीलिए अपने संकल्प से यहां उसी कल्पना में जैसे जैसी वासना होती है उसी प्रकार का स्वपना आता है ना ऐसे ही इनकी जैसी जैसी इच्छा थी ऐसे ऐसे यहां भी अपना राज दरबार भर के बैठे लेकिन लीले अपन इनको देखते य अपने को नहीं देखते इनका अपना संवित और हमारी अपनी संवित है जैसे 10 आदमी सोए
हैं और दसों को संकल्प दसों को स्वपना आता है तो एक का स्वपना दूसरा नहीं जानता मैं रेलगाड़ी में बैठा हूं ऐसा स्वपना मुझे दिखा और दूसरे को लगेगा कि रेलगाड़ी मेरे ऊपर से चल पड़ में कट गया तीसरा ऐसा देखेगा कि मैं कार में जा रहा हूं दुकान पर चौथा यह देखेगा कि मैं तो पिक्चर देख रहा हूं तो जिसका जैसा संवित होता है स्वपने में ऐसा नहीं दिखता है क्या ऐसे जीव की अपनी अपनी सृष्टि भी बहुत है उन का अपना अपना माहौल है जैसे कोई पीपल में बड़ में किसी जगह पर बैठा
है तो उसका अपना माल सूक्ष्म शरीर वाले कहीं किसी घर में रहते तो उनका अपना माहौल होता है अपना होता गिरनार में कई जोगी रहते हैं अपन आंखों से नहीं देख सकते लेकिन हमने सुना है हमने देखे नहीं फिर अंदर उनकी अपनी दुनिया होती तो जीव जीव की अपनी भावना अपना संक अपना माहौल चल ले आगे चलते तो ऊपर जाते जाते जाते जाते जाते कई हजारों लाखों माइल लागते लांते यह जो दिख रहा है इस ब्रह्मांड से दूसरे ब्रह्मांड में प्रवेश किया कई ब्रह्मांड विज्ञान इस ब्रह्मांड के बाहर नहीं जा सकता क्योंकि विज्ञान में इनके
पास स्थूल साध लेकिन सूक्ष्म साधन वाले इस ब्रह्मांड को लांग करर दूसरे ब्रह्मांड में भी जा सकते तो सरस्वती की कृपा से लीलावती दूसरे ब्रह्मा और वहां देखती की क्या सृष्टि है क्या सुंदर है क्या सा क्या प्रभाव तो दूसरे ब्रह्मांड में विचरण करते करते क्या देखती है से राजा विदुर और लीलावती से राजा पदम और लीलाव लीलावती वहां देखती है तो यह बच्चे तो मेरे रो रहे हैं अरे और यहां तो मैंने तुलसी का पौधा लगाया था यह पौधा भी बड़ा भी हुआ थोड़ा य तो मैं क्या देखती हूं यह तो मेरा घर है
अरे तुलसी का पौधा मैंने लगाया मेरे बच्चे रो रहे हैं मां मर गई बाप मर गए अभी तो यहां लीला लीले अभी तो यहां पातक भी पूरा नहीं हुआ 12 दिन भी नहीं हुए और वहां देखो राजा विदुर और लीलावती राजा पदम और लीलावती बनकर तुमने कितने वर्ष भोगा यहां तुम वशिष्ठ ब्राह्मण की पत्नी अरुंधति के नाम और यह तुम्हारे बच्चे हैं तो यहां वर्षों की कतार बीती है मनुष्य लोक की उस ब्रह्मांड की तब इधर एक दिन होता है इधर अभी आठ दिन भी नहीं हु और मृत्यु लोक में तुम्हें वर्षों की कतार जैसे
तुम्हारा तुम्हारा एक महीना और मक्खी की कई पीढ़ियां बीत मक्खी का एक जन्म बैक्टीरिया की कई पीढ़ियां बत मक्खी तो बैक्टीरिया के लिए बड़ी आयुष्य वाली है और मेडक मक्खी के आगे बड़ी आयुष्य वाला है लेकिन तुम्हारी आयुष्य के आगे मेडक की आयुष्य क्या मच्छरों की आयुष्य क्या है तो मच्छर की आयुष्य तो ऐसी है कि जैसे तुम तो ब्रह्मा जी और मच्छर पैदा होकर मर ग ऐसे ब्रह्मा जी की आयुष्य क्या अपन भी मच्छर जैसे बात समझ में आ गई ना जैसे तुम्हारे हमारे आगे बैक्टीरिया और मच्छर पैदा होकर मर जाते हैं अपनी जिंदगी
में कई बार मच्छर पैदा हो हो के मर गए ऐसे ब्रह्मा जी के आयुष्य में हम लोग कई बार जन्मते कई ब्रह्मांड में जन्मते मरते जन्मते आप ब्रह्मा जी का एक दिन मिता ऐसी सृष्टि है ऐसा ज्ञान जल्दी नहीं मिलता ऐसा दिवी ज्ञान मिलता है क्या सब जग तो वहां वशिष्ठ ब्राह्मण थे और अरुंधति तुम थे एक तो अरुंधति वशिष्ठ जी थे राम जी के गुरु और गुरु पत्नी वो नहीं तुम यहां वशिष्ठ ब्राह्मण और उनकी पत्नी राजा तामझाम से जा रहे उसका जन्म दिन था लोग यश गान कर रहे तो तुम लोगों की सात्विक
भावना थी सात्विक कर्म था जिसके सात्विक कर्म सात्विक भावना एकाग्रता होती है उसका संकल्प जल्दी फलता है तो तुम्हारी इच्छा हुई कि हम भी राज्य सुख हो तो तुम अपनी साधना से एकाग्रता से नीचे आए नीचे के ब्रह्मांड में तुम राजा पद्मा और लीलावती बनेय दूसरी बार बने राजा विदुर और लीलावती तो लीला इस संसार में कोई किसी को सदा एक जैसा एक स्थान पर नहीं रहता लेकिन सदा सब में जो भरपूर जैसे आकाश है ऐसे चदा काश परमात्मा सदा सब के साथ एक रस रहता है लीला तो अब ज्ञान का सहारा ले बाहर का
पति मिलेगा बिछड़े का बाहर की पत्नी मिलेगी बिछड़े गी बाहर का शरीर मिलेगा बिछड़े लेकिन जिससे मिलता और बिछड़ता है वह परमात्मा अपना आत्मा है वह कभी नहीं बिछड़ता उस अपने म को शुद्ध रूप से जान अब मैं को जीव रूप से माना ब्राह्मण रूप से माना तो यह क्षत्रिय रूप से माना पापी रूप से माना यह सब अशुद्ध मान्यता है मैं को ब्रह्म रूप से मान दो मैं को शुद्ध रूप से जान तो तुम्हारे सारे दुख सदा के लिए मिट जाएंगे मैं कौन हूं दुख को जानने वाला मैं कौन हू सुख को जानने वाला
कौन इस प्रकार और ओमकार का जप करें गुरु जनों की सेवा करें धर्म का प्रसाद मिला है तो बांटे इस प्रकार सत्कर्म साधन गुरु कृपा सब मिलाकर देर सवेर आवरण भंग हो जाता और मैं आलत रूप में प्रकट हो जाता है से पर्दे हटते गए ना समझी के बादल हटते गए तो ज्ञान रूपी सूर्योदय हो जाता है उसी को बोलते साक्षात का समझो थोड़े संस्कार है बाकी की अपनी मेहनत अच्छी है तो गुरु जी के लिए श्रद्धा है तड़प है और साक्षात्कार की तड़प बढ़ती तो समझो बाकी के संस्कार हट जाते तो थोड़े से हैं
तो फिर गुरु की कृपा से जैसे हवा का झोका लगा और बादल हट ग और सूरज दिखता है ऐसे थोड़ा गुरु कृपा का धक्का मिलते ही ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर रहे ना शेष गुरुवर का रहे ना शेष मोह कभी ना टग सके इच्छा [संगीत] ले आप लोगों का का कितना पुण्य है कितना सौभाग्य है कितनी उन्नति हो रही है इधर बैठना इतना चुप और फिर इतना सूक्ष्म सूक्ष्म तर सूक्ष्म तम ज्ञान तक आपकी गति हो गई ऐसा ज्ञान [संगीत] हमको अहमदाबाद में इधर उधर कहीं नहीं बहुत वर्षों के बाद इस ज्ञान [संगीत] प य अध्यात्मिकता
में बहुत आखरी ज्ञान भगवान के दर्शन हो जाए फिर भी जय विजय को गिरना पड़ता है और यह ज्ञान समझ लिया तो गिरना चढ़ना उसे पार हो ब्राहमम स्थिति प्राप्त कार्य रहे ना शेष कभी ना ठग सके मैं शरीर हूं और यह संसार सच्चा है इसका नाम मोह और मैं अपने आत्मा को ठीक से जान लिया तो फर बाहर से ऐसे ही लगेगा व्यवहार लेन अंदर से उठ बैठ तो वही उठने कभीर अध्या अपवाद य उपासना शुरुआत वाले के लिए ठीक है शुरू में केजी में गया तो ठीक है पा साल का लड़का केजी में
है तो ठीक है और 80 साल का बूढ़ है केजी में जाता है तो मूर्ख है पीएचडी कर रहा है और फिर केजी में जाता है तो दिमाग कम है कि ज्यादा है दिमाग एक बार तो मेरे को गुरुजी ने ऐसा चुंडी मार दी कि मैं सतर्क हो गया लेटा में गुरुजी रहते थे खेत में किसी ने भोयरा बनाया था भोरा इसलिए बनाते कि बाहर का आवाज ना हो और मन जल्दी एकाग्र व गुरुजी उस मरे में रहते थे हम भी नहीं घुसते थे साधना की जगह पर जो कोई नहीं घुसता गुरुजी कुछ दिन वहां
ज्यादा रहे तो हम दिशा से गए थे दर्शन करने को तो उपलेटा में बैठे बैठे वो जूनागढ़ का पहाड़ दिखे तो मैंने सुन रखा था कि जूनागढ़ में बड़े सिद्ध जोगी रहते हैं अंतर्धान होने वाले होते हैं शेर बन जाए कोई जोगी और फिर वो रेंजर को बोलते थे कि भाई देखना कभी हम घूमे फिरे शेर रूप में तो कहीं हम पर गोली ना चला देना तो बोले बाबा हमको कैसे पता चले बोले जिस शेर के पैर में कड़ा लगाओ देखिए मेरा हाथ में कड़ा है ना तो फिर शेर बनने के बाद भी वो कड़ा
निशानी होता है ये बात मैंने वो जोगी को देखा नहीं है सुनी है दंत कथा कह तो कोई शेर बन जाता था ऐसे ऐसे जोगी रहते थे जूनागढ़ में तो मेरे को वक चलो यहां दिखता है 20 किलोमीटर होगा क्या तो मैं जाने दिशा जाने की आज्ञा लिया तो मैं तो गुरु जी के आगे जल्दी मर्यादा रखनी प तो गुरु जी के सेवक को बोला मेरे को आज्ञा ले देना कि मैं जाते जाते डीसा नहीं जाऊंगा जूनागढ़ का संतों को जरा गिरनार के गिरनार पहाड़ दि उ गिरनार के संतों से दर्शन प्रसन करके जा उसने
जाकर बापू जी को कहा आज्ञा लेनी ी के साई वह तो एंटी था मेरा साई यह तो बोलता है कि मैं दिशा नहीं जाऊंगा बोले क्यों बोले व बोलता है कि मैं तो अभी गिरनार के साधु संतों के पास जाऊंगा फिर डिसा जाऊंगा साई ने कहा [संगीत] अच्छा व मेरी गै राजरी में जो हो गया होगा हो गया ये मैं कल्पना करता हूं अच्छा अच्छा मैंने मिलाकर बोला को उसने बोल दिया सुबह को सुबह सुबह प्रभात को सत्संग हुआने सत्संग सुना एक पढ़े दो सुने और उनको बता रहे बोलते बोलते बोले गुरु जी बोले एक
राजकुमार था और मेरी तरफ देखा तो मैं हो गया सावधान एक राजकुमार था उसको राजा साहब ने तिलक करके राज गदी पर बिठा दिया सुनता है तुम लोग करते हो ना ऐसा मैं करता था जी स जी स और राज तिलक कर दिया राजगदी पर बैठाया फिर वह राज गति छोड़कर [संगीत] और राज के कर्मचारी थे उनके लड़कों के साथ खेलने लग जाए अरे कहां तो राजा भीरा और कहां तो इन बच्चों के साथ खेलने जाता व राजकुमार है कि मूर्ख है एक बार सूरज भागता भागता जा रहा किसी ने पूछा सूरज नारायण इतना दौड़
क्यों लगा रहे हो बोले व खद है ना खद आ उससे जरा रोशनी लेने जाता मैं कहा सई मैं ही व अरे बोले वही तो है आप आत्म ज्ञान छोड़कर वो गिरनार के जोगियों से इधर से उधर से क्या लेने जाएगा क्या मिलेगा मैं फिर नहीं गया तो नहीं सुपात्र मिले तो कु पात्र को ज्ञान दिया न दिया सु शिष्य मिले तो कु शिष्य पर रहम कियान कहे कवि गंग सुन शाह अकबर सूरज उगे तो और दिया किया ना किया पूर्ण सतगुरु मिले तो और को नमस्कार किया ना किया ब्रह्म ज्ञानी गुरु मिले ब्राह्मी स्थिति
प्राप्त कर फिर मैं नहीं गया तो नहीं अब तो मैं जाऊं तो कोई गुरु जी तो टोक नहीं डांट नहीं छुट्टी लेनी नहीं पड़ेगी लेकिन आपने कभी सुना कि बापू जी गिरनार के जोगियों से मिलने गए खोजने एक आ बार ऐसे गया था लेकिन थोड़ा बहुत घूम के अपना आश्रम भी है गिरना [संगीत] आत्म ज्ञान मिल गया फिर इधर उधर काहे को बटके सीधा ब्रह्म ज्ञान मिल रहा है इधर फिर भटकते भटकते भटकते जहां आना है उधर तो है फिर नीचे जाके भटकते भटकते फिर वहीं आना एक देव सर्व भूतेषु गुड़ा केशव एकही देव जैसे
एकही चैतन्य स्वपने में अनेक रूप होता है ऐसे एकही देव अनेक रू शांत आत्मा हो गए गणपति जी महान कैसे बने शांत आत्मा हुए तभी नहीं संकल्प हुए तभी ना गणे सात परो वसी गणपति ने इंद्रियों को मन में लगाया मन को बुद्धि में लगाया बुद्धि को जीव में लगाया जीव को अपने ब्रह्म तोव में स्थित कर दिया समाधि गणपते नम भगवान हो गए आसुमल में आशाराम हो गए लीलाराम में से लीला श जी हो गए तो शांत आत्मा होना है कि फिर विसर्जन और स्थापना कितना बुद्धि छोटा है बड़ा तरस आता है जहाज मिल
गया बैठने को फ ठहरो बाद में आता हूं पहले टांगे में बैठूंगा फिर ऑटो में बैठूंगा फिर बस में बैठूंगा हां भटक भटक के फिर जहाज में आऊंगा ए मूर्ख जहाज चल जाएगा तो टांगे में चार रास्ते नहीं पहुंचेगा तब तक जहाज तो मुंबई पहुंच जाएगा जहाज तैयार हो और कोई बोले ठहरो हाथों में जरा बैठ के इधर घूमू उधर घूमू बंबई के तरफ आटो ले जाएगी फिर कहीं आगे मिलेगा जात बैठो ओ हो कैसी बुद्धि है लेकिन यह गलती भी सत्संग में से मिटती व स्थापना और विसर्जन से नहीं मिटती स्थापना और विसर्जन से
अज्ञान नहीं मिटता भावना सा अच्छी होती है बस भावना अच्छी है तब तो पहुंच गए फिर क्या है मेरे गुरु जी बोलते थे कि तुम साइकिल से जाओ ऑटो से जाओ टैक्सी से जाओ एयरपोर्ट पर चले गए तो फिर जहाज मेंही बैठना है फिर टो ऑटो रिक्शा टैक्सी य वो टैक्सी छोड़ेगा नहीं तो जहाज में बैठेगा नहीं क्यों एक बाबा भई था बाबा भाई एन को छक लो बाबा मुखी नोदी करो सुना मेन क्या नाम था उसका छक तो बचपन मेंही शादी होती थी वो जमाने छक बालक था छोटी सी छक के साथ फेरे फिरने
थे छक छक नहीं छक छकना लगन होता तो ब्राह्मण ने तिलक बिलक किया चकली को भी बिठाए मंगलम भगवान विष्णु मंगलम मंगलम पक्ष सर्व मंगलायतन हरीला नाम सछ ककला भाई बाबा भाई फला ककली ककली बहन बापन नाम बो भाई अच्छा मान नाम मान नाम पकोड़ी बाई [संगीत] इतने में तो बाहर डुगडुग गया बजा बंदरी वाला आया था दो तीन बंदरिया लेकर नचाने वाला माकड़ा माकड़ा बांदरा वा डग ु ु अरे बंदर आए बंदर बहुत बंदर आए नचाने वाले बंदर वाले आए तो जो राजा था ना अभी तो छेड़ा छेड़ी बांधना था थेरा फिरने के लिए
वो तो उठा चकला बाबा भाई के गोद से और दौड़ा बोले क्या जाए बेटा क्या जाए तो छेड़ा छेड़ी बाधवाना छ फेरा फरवाना के बापा त फरी ले जा तो माकड़ा जो जवान अरे फेरे तेरे को फिरने बोले मैं तो बंदरिया देखने जा रहा हू अरे छोरा अभी विधि तो करने अरे बापा त कर ले अरे फेरा फरवा फले जा बा भा तो फेरे फिरे तभी तो छक हुआ अब तो छक को फेरे फिरने है बाबा वही तो फेरे फिर के छक के बाप हो गए अब चकले के ब बदले में बाबा भाई फिरे फिर
सकता है क्या चकले कोही फिरने पड़ेग तो छक बोलता मुझे बंदरिया देखने जाना मार तो माकड़ा जो जवान मेल फिरा छेड़ा बा फिरा फ मार तुम आकड़ा [संगीत] जो मुझे तो बंद जा हजार काम छोड़ने सत्संग सा करोड़ काम छोड़ने स अने क्या ककला था चकला भट भले ककला था आपने नहीं ककला मेरे को भी छक होने से गुरु जी ने रोक दिया क्या गिरनार के जोगियों के हालांकि स्थापना से तो फिर जोगियों का दर्शन आए ज्यादा हितकारी फिर भी गुरु जी ने कहा नहीं जा इधर उधर भटको मत अंदर में जाओ भगवान के नाम
में वो शक्ति है के विकारों से बंधनों से पात कों से मुक्ति दिला देता है भगवन नाम तो मुख में नाम होते ही मुक्ति तो मुट्ठी में है कर्म मल माया मल प्रबोध मल यह तीन प्रकार के मैल है कर्म मल कैसे जैसे कोई भी काम किया तो मैं करता हूं मैंने यह किया मैंने वो किया अब होता प्रकृति में है लेकिन कता पना का अहंकार आ जाता है इसको बोलते कर्म मल जैसे बिच्छू को छुआ और काट लिया उसने ऐसे कोई भी कर्म करते हैं तो कर्तृत्व का डंक लग जाता है इसको बोलते कर्म
मल क्या बोलते हैं कर्मल दूसरा होता है माया मल बोले कर्म मैं नहीं करता हूं कर्म प्रकृति में होता है मैं अकता हूं साक्षी हूं तो इस प्रकार की वृत्ति रखना भी एक प्रकार की माया की वृत्ति है य तात्विक दर्शन शास्त्र की बात तो कर्तृत्व का भाव आया तो कर्म मल हुआ लेकिन साक्षी का भाव आया तो यह माया मलवा साक्ष और साक्षी मैं और मेरा इन दोनों से आगे जाओ तो प्रबोध मल अर्थात अपने आत्मा का ज्ञान तो हो गया लेकिन उसमें थोड़ा रहा कि हमारा प्रारब्ध है यह मेरा कर्तव्य है यह मेरा
अ कर्तव्य है तोय साक्षात्कार से नीचे की अवस्था है इसको बोलते प्रबोध मल प्रत ज्ञान तो हो गया लेकिन अभी थोड़ी हिचकिचाहट है मुक्त आत्मा होने में थोड़ा संशय है तो इन तीनों मलो को निकालने के लिए निर्मल स्वभाव का तात्विक ज्ञान होना चाहिए निर्मल स्वभाव बनाया जो स्वभाव बनता है वह तो अंतःकरण का मन का लेकिन स्व का जो भाव है अंतःकरण बदले अब बदले उससे परे पहले बाद में अरबी उसको बोलते हैं शंकर सहज स्वरूप संभरा स्व के भाव का पता चल जाए तो वहां साक्ष नहीं है साक्षी नहीं है अकता नहीं करता
नहीं ऐसे गहरी नींद में क्या होता है अ करता हूं ऐसा रहता है क्या मैं कर रहा हूं ऐसा होता है क्या मुझे अच्छा लग रहा है ऐसा भी नहीं होता बुरा लग रहा है ऐसा भी नहीं होता लेकिन अज्ञानता रहती है पूर्ण ज्ञान में अज्ञानता भी नहीं रहती तो यह हो गया सत्य प्राप्ति ईश्वर प्राप्ति ब्रह्म प्राप्ति उसमें आनंद रहता है चेतना रहती है ज्ञान रहता है गहरी ंद में चेतना का पता नहीं चेतना तो रहती शरीर में पता नहीं चलता ज्ञान का पता नहीं चलता आनंद का पता नहीं चलता लेकिन सत्य प्राप्ति में
आनंद का ज्ञान का अनुभव [संगीत] होगा कुछ लोग सोचते हैं कि हमारा मन और शांत हो जाए कुछ पता नहीं चले कुछ पता नहीं चले तो क्लोरोफॉर्म काफी है मूर्छा काफी है कुछ पता ना चलना यह कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन पता जिससे चलता है जिससे पता चलता है मन को बुद्धि को इंद्रियों को उसके स्वभाव में अपने को जानना वो आनंद स्वभाव है माधुर्य स्वभाव है सुख स्वभाव है ज्ञान स्वभाव वही आत्मा है परमात्मा है तोय आनंद स्वभाव परमात्मा का है उसका ध्यान में अनुभव होगा और ध्यान होने के बाद ज्ञान की वृति
पैदा होगी तो चम चम चमकेगा चेतन भगवान कृष्ण ने गीता में कहा ज्ञाना ध्यानम विशेषत चार वेदों का ज्ञान दुनिया की [संगीत] सारी टेक्नोलॉजी का ज्ञान सा सारे प्रकार के ज्ञान से भी परमात्मा का ध्यान विशेष है ज्ञान तुमको बाहर बहिरंग प्रकृति में उलझा जाएगा लेकिन उससे ध्यान तुम्हें अंतरात्मा में ले आएगा ज्ञाना ध्यानम विशेषत श्री शिव जी भी कहते हैं पार्वती को नास्ति ध्यानम समम तीर्थम तुमने सुना होगा मेर के सेट में कई बार नास्ति ध्यानम समम यज्ञम नास्ति ध्यानम समम तस्मा ध्यानम समाचर तपस्वी भ अधि को योगी गीता है ज्ञानी भ मतो अधि
का कर्मी अधिक हो योगी तस्मा योगी भवा अर्जुना तो इस प्रकार योग की और ध्यान की बड़ी भारी महिमा भगवान महावीर कैसे ध्यानत और निंदा करने वाले बकने वाले कान में खीले लगाने वाले ऐसे लोग भी उनके जीवन में आए तो क्या महावीर भगवान के चित्त में हो सकता है कि कोई काला जादू वाले को व संत लोग बुद्ध है महावीर है कबीर जी है हमारे गुरु जी एक पौधा था बिच्छू जिसको बोलते उसको छूने से बिच्छू काटे इतनी पीड़ा होती तो गुरु जी आकर बैठते फिर वो उसी जगह पर पास में था यह बात
मैंने पहले भी बताई हुई तो मैंने देखा कि कहीं गुरुजी बात करते करते ऐसा हाथ हिलता और लग जाए तो पीड़ा तो हिमालय में नैनीताल के जंगल में गीला गीला तो होता है बारिश होती रहती बार-बार गर्मियों में तो गीली मिट्टी थी तो मैंने वह युक्ति से बिच्छू का पौधा खींचा और निकाला इतने में गुरु जी ने देख लिया बोले क्यों निकाला क्यों निकाला मैं क सा ये बिच्छू का पौधा है बोले तो उसको पीड़ा होगी क्यों निकाला मैं कहा आपको कहीं ना लग जाए बोले नहीं मैं रोज संभाल के बैठता हूं इसका भी बिचारे
का जीवन है इसको तकलीफ होगी या दूसरी जगह अच्छी तरह से लगा देना पानी मानी पिला देना ऐसे गुरु के हम शिष्य हैं कि पौधे को पीड़ा ना हो और फिर हमको पक्का याद है कि वो बिच्छू का पौधा हमने फिर आश्रम में दूसरी जगह पर लगा दिया मुझे कीड़ा मकड़ा कहीं लोग बोलते हैं फि कोई बात नहीं बैठा फूल का कीड़ा या कुछ होता फिर धीरे से उतारता हूं और किसी को बोलता हूं ले भाई इसको अच्छी जगह पर रख दे फलानी जगह तो प्रारब्ध पहले भयो पीछे भयो शरीर तुलसी चिंता क्यों करे भजले
श्री रघुवीर तुम तो भगवत स्मृति भगवत आकार वृति करो शत्रु आकार वृति होगी तो अंदर में जलन होगा भया का वृति द्वेषा का वृति गा का वृति मोहा का वृति यह सब हम लोगों को फसाने वाली वृतिया है को ऐसा डर आ गया तो हमारी वृत्ति में भय पैदा हो अथवा राग पैदा हो द्वेष पैदा होगा चिंता पैदा होगी इससे हमारी शक्तियों का रास होता है तो क्या करें कि हम भगवान के हैं भगवान हमारे हैं और भगवान हमारे परम हितेश है परम सुत है तत्व स्वरूप से परमात्मा सत्य है तो इससे क्या है कर्म
मल माया मल प्रबोध मल का प्रभाव हट जाएगा और सत्यम ज्ञानम अनंतम ब्रह्म जो सत स्वरूप है ज्ञान स्वरूप है सत ही ज्ञान स्वरूप होता है असत में क्या ज्ञान होता है जड़ में क्या ज्ञान होगा जहां ज्ञान है वहां सत्य का ही प्रभाव है भले ज्ञान तुमको मिथ्या होता है लेकिन प्रभाव तो सत्य का है रस्सी को तुमने सांप माना है तो तुम रसी को सांप मानकर कांप रहे हो तो तुमको सांप का ज्ञान है तो सांप का ज्ञान सत्य ज्ञान नहीं है मिथ्या है लेकिन ज्ञान तो है मिथ्या भी तो ज्ञान है ना
तो होता सत्य के बल से और पर आवरण से मिथ्या हो गया तो सत्य के आधार से मिथ्या ज्ञान चलता है मिथ्या के आधार से सत्य नहीं चलता जैसे सोने के आधार से गहने बनते हैं गहनों के आधार से सोना नहीं बनता समुद्र के आधार से तरंग होते तरंगों के आधार पर समुद्र नहीं होता ऐसे सत स्वरूप परमात्मा के आधार पर मन का फरना होता है जब स् फरना हुआ उस सत्य स्वरूप में तो बोलते मन है निर्णायाम बुद्धि ई वृद्धि हुई तो बोलते बुद्धि है चिंतना आत्मक हुआ तो बोले चित्त है आत्मक हुआ तो
बोले अहंकार है तो वह सत्य स्वरूप ईश्वर से ही उत्पन्न होता तो रस्सी में सांप दिखा अथवा माला देखी अथवा पानी का रेला देखा तो जो यह रेला है ज्ञान तो कोई भी ज्ञान हुआ तो सत्य स्वरूप परमात्मा की चेतना से इन साधनों में गड़बड़ हुई इसलिए मिथ्या हुआ ज्ञान की वृत्ति ज्ञान की चेतना परमात्मा चेतना सत्य है जैसे रस्सी सत्य है लेकिन हमारी कल्पना में सांप है तो हमारी कल्पना मिथ्या ई रस्सी सत्य है लेकिन वो पानी का रेला दिखता है दरार दिखती है जमीन की अथवा लकड़ी टेढ़ी मेढ़ी ऐसी होगी अधेरे में दिखती
है तो यह हमारे मन का भ्रम है लेकिन अंतर आत्मा की चेतना तो वही की वही जैसे दूर से ठूठा दिखा तो दिखने की चेतना हमारी सच्ची है और ठूठा में चोर की कल्पना हमारी अपनी ठूठा में चोर की कल्पना हो जाती तो कांपते हैं और ठूठा में सावकार साधु गिरनार का जोग भी बेचारा तप कर रहा है ओ हो आदर हो जाएगा तो आदर अनादर भय राग द्वेष यह हमारी वृत्तियों का खेल है लेकिन वृत्तियों के गहराई में चैतन्य परमात्मा की सत्ता सत है जो सत है वह चेतन है वह ज्ञान स्वरूप है वह
आत्म रूप है और हमारा परम सुहृद है परमात्मा इस प्रकार का चिंतन करके आप भगवता का वृति बनाओ तो मिथ्या वृत्ति राग की वृत्ति द्वेष की वृत्ति चिंता की वृत्ति भय की वृत्ति इन सब का प्रभाव कम हो जाएगा और आप जीते जी जीवन मुक्त बन जाएंगे जीते जी इन बंधनों से दुखों से मुक्त हो जाए इसलिए भागवत में सुखदेव जी महाराज ने परीक्षित को कहा कि राजन तुम्हारी मति धन्य है तुमने अपने को निमित बनाकर मनुष्य मात्र के लिए बड़ा मंगल कार्य प्रश्न कि प्रश्न था कि मनुष्य को अपने जीवन काल में क्या करना
चाहिए मौत नजी आए तो क्या करना चाहिए तो सुखदेव जी ने कहा तस्मा सर्व आत्मन राजन जो सबका आत्मा बनकर बैठा है सबके हृदय में मैं मैं मैं मैं रूप से जहां से चेतना स्फूर्त है तस्मा सर्वा आत्मन राजन हरि अभि दियत जिसका चिंतन और ज्ञान सत्संग से पाप ताप दुख को जो हर लेता है उस हरि का ज्ञान पा लेना चाहिए हरि के गुणगान करने चाहिए हरि में प्रीति करनी चाहिए त स्मात सर्वा आत्मन राजन हरि अ विधेय श्रोत व्य कीर्ति तव्य स्य स्मृत भगवत निनाम उस भगवान के बारे में सुनो उस भगवान की
गरिमा गीत गाओ कैसा दयालु है मां के शरीर में कैसी व्यवस्था करनी कि हम जन्म ले उसके पहले हमारे लिए दूध तैयार कर मां के अंदर वात्सल्य भार लिया रोटी सब्जी तो रोज खाती थी लेकिन हमारे जन्म होते ही उसी रोटी सब्जी में से दूध बना दिया प्रभु तेरी लीला अपम पार ऐसे कई ऐसी ऐसी घटना घटती है कि लगता है कि भगवान की कृपा और भगवान की लीला कैसी नहीं तो मां के शरीर में एक पानी का बूंद और फिर थोड़ी बड़ी हुई थोड़ी बड़ी थोड़ी बड़ी पांच महीने हुए तो महाराज हाथ निकल आए
पैर निकल आए मुंह निकल आया और सात महीने में तो पूरा शरीर बन गया और अगले जन्मों की स्मृति भी आ गई अब बालक ऋषि है उस समय जन्म जन्मांतर का गया न 10 महीने के अंदर तो व के शरीर से बाहर आया फ बड़ा बना उद्योगपति बन गया एमडी हो गया एलएलबी हो गया क्या क्या हो गया मेरा इतना दुकान है मेरा इतना मंथम मेरा ऐसा एक पानी की बूंद और कहां कहां तक पहुंच जाती है और पानी की बूंद भी पूरी नहीं पानी की बूंद का कितना छोटा ऐसा एक जीव और कैसा कैसा
बन जाते हो तुम हम बैठे तो और फिर तुम हम बैठे तो तुम्हारे हमारे शरीर में इतने बैक्टीरिया है इत अंग्रेजी शब्द बैक्टीरिया है अपना असली शब्द है जीवाणु तुम्हारे हमारे शरीर में इतने जीवाणु है कि धरती पर उतने मनुष्य नहीं होंगे इतने जीवाणु है हमारे तुम्हारे शरीर में एक एक शरीर में जीवाणु है कि धरती में सवा स करोड़ लोग है उससे भी हमारे शरीर में जीवाणु ज्यादा तो ये कैसी लीला है और उन सब जीवों में भी चेतना व्याप्त है प्रभु तुम्हारी माया अपरंपार और उन सभी जीवों को पता है कि यह अच्छा
है यह बुरा है उचित खोराक खाना अपना संग बनाना दूसरे जीवाणु से लड़ना उन अपने वालो से रा दूसरे वालो को दवे तो आपके एक सहत के अनुकूल जीवाणु दूसरे प्रतिकूल प्रतिकूल वाले बढ़ गए तो आपकी रोग प्रतिकारक शक्ति कमजोर हो गई आप बीमारी के शिकार होते जाएंगे और आपके स्वास्थ्य वाले जीवाणु अगर मजबूत है तो आप बलवान है स्फूर्ति वाले तो कैसी रचना एक पानी की मु और उसका थोड़ा सा हिसा उसम से मनुष्य बना और मनुष्य में धरती भर के आदमियों से भी ज्यादा जीवाणु डेवलप हो गए सु विकसित हो गए और उनका
कैसा कैसा लीला और कैसा कैसा तो हे व्यापक विभु परमेश्वर जैसे हमारे शरीर में जीवाणु है ऐसे ब्रह्मदेव अथवा ब्रह्मांड नायक हम तो तुम्हारे व्यापक स्वभाव में तो हम जीवाणु के बराबर भी नहीं फिर भी मैं मैं मैं मैं मैं मैं मुझे आज कल रात को सत्संग पढ रहे थे बच्चे विचार आया कि लोग बकरे की बलि देते हैं कहीं कहीं ये कैसे अंध परंपरा चल पड़ी होगी पूछा होगा कि क्या है अरे बोले मैं को मार मैं मैं और मैं मैं तो अहम है कहा होगा किसी ने मैं को मार अब वो कैसी परंपरा
चल पड़ी हो कल्पना ही करनी रही तो बोले मैं मैं मैं अर्थात सत्संग में सुना था अथवा गुरु का फकीर का आदेश था मैं को मार अर्थात मैं मैं तो बकरे की बली दे बकरा खा मैं मैं मैं मैं मैं को मार तो बकरा खाऊ कोई आया होगा उसने प्रचार कर दिया मैं तो बकरे मैं करते बकरे के बली दो तो भगवान खुश हो जाएंगे अरे सभी जीव भगवान के और उसम जैसे सभी बच्चे मां के हैं तो बिल्कुल जो अनजान और मूर्ख बच्चा है उसका हत्या करने से मां राजी हो जाएगी क्या ऐसे ही
बकरे की बली दे दो फलाना कर दो मुझे यह लगता है कि कैसी परंपरा घुस जाती तो जैसे बुद्ध से पूछा गया कि आखिर क्या है उसके बाद क्या सत्य क्या है तो चुप हो गए चुप हो गए माना कुछ नहीं शून्य अगर शून्य ही सत्य होती तो शून्य को शून्य कौन जानता है कुछ नहीं को जानने वाला तो कोई होगा तो यहां आद्य शंकराचार्य ने कहा कि बुद्ध चुप हो गए तो दूसरों ने सोचा कि आखर स क्या है शून्य कुछ नहीं लेकिन कुछ नहीं सत्य नहीं है कुछ नहीं को जो जानता है वो
शुद्ध चैतन्य परमात्मा कोई पूर्णा नहीं कोई भय नहीं कोई चिंता नहीं कोई शोक नहीं कोई पाना नहीं कुछ खोना नहीं चुप बैठे और आनंद स्वरूप ज्ञान स्वरूप सत्यम ज्ञानम अनंतम ब्रह्मा यहां वेद वचनों की जरूरत पड़ती है यस्य सत्ता त्रिकाला अवचर इति सत्य जिसका अस्तित्व तीनों काल में हटे नहीं मिटे नहीं छूटे नहीं उसको बोलते सत्य तो शरीर पहले नहीं था बाद में नहीं रहेगा इसलिए शरीर मिथ्या है लेकिन मैं पहले था अभी है बचपन में था अभी है जवानी में बुढ़ापे में मरने के बाद भी रहेगा तो उस मैं स्वरूप चैतन्य को सत बोलते
वही ज्ञान स्वरूप है वही आनंद स्वरूप है और वो मेरा आत्मा इस प्रकार का ज्ञान धारण करना चाहिए और उसी परमेश्वर की लीला देखना चाहिए उसको प्रीति करनी चाहिए तो आपके हृदय में राग का भाव द्वेष का भाव चिंता का भाव कट जाएगा दुख का भाव कट जाएगा जब भगवत भाव जगता है एक आस्तिक आदमी सावन का महीना था बिली पत्रा और कुछ ूल लोटा में दूध य चीज वस्तु लेकर मंदिर जा रहा था मंदिर में ठाकुर जी की भगवान की पूजा करने वाले लोगों को देखकर उनकी खिल्ली उड़ाने वाले कुछ को प्रचार भी होता
है अरे क्या यह पत्थरों को पूजने जाते तो भक्त भगवान शिव जी को मिली पत्र चहा के आया दूध आदि तिलक मिलक तो अब भक्त ने ठोली करने वाले ने कहा क्यों सेठ जी हो गई पूजा शिव जी की बोले हां हो गई तो शिव जी ने तुम्हारे मिली पत्र और जल और दूध स्वीकार कर लिया ले लिया शिव जी ने शिव जी को खुशी हुई तुमने दिया तो शिव जी खुश हुए ले लिया शिव जी ने तो सेठ समझ गया कि य नास्तिक टोंट मार रहे अब उस सेठ के अंतःकरण में तुरंत सेठों के
सेठ ने प्रेरणा दे दी बोले भाई शिव जी ने बिली पत्र और जल और दूध लिया कि नहीं लिया वह तो शिवजी जाने लेकिन मैं यह पूजा करके आया तो मुझे प्रसन्नता मिली है मुझे रस मिला है मुझे मेरा भाव विकसित हुआ है ऐसे गणपति दादा मोरिया करेंगे अब तीसरी तारीख से नाचेंगे कूद और पूर्णिमा को विसर्जित कर देंगे तो बोले गणपति महाराज ने पूजा स्वीकार किया बोले गणपति महाराज ने पूजा स्वीकार किया कि नहीं किया वो तू खोपड़ी घुमाता रहे लेकिन हमारे हृदय में भाव जगा प्रेम जगा हम कुकर्म से बचे न गणेशा परो
वशी इंद्रियों को वश करने में गणेश जी से बढ़कर कोई किसी का नाम नहीं आता तो इस चतुर्दशी से पूर्णिमा तक हम गणपति का चिंतन करते तो प्रसन्न रहते हैं विकारों से बचते हैं हाव भाव उत्तम होता है तो हमारी पूजा ठाकुर जी ने स्वीकार करली सारे पूजा सारे कर्म सारे धर्म के पीछे हम अपने अंतःकरण में राग को द्वेष को को चिंता को लेकर जुलस रहे उलझ रहे उसको मिटाकर भगवत भाव जगाना है तो गणेश जी की स्थापना करना भी अच्छा है गणेश जी का विसर्जन भी करना कोई बुरा नहीं है ऐसे झूले लाल
जी के लिए स्थापना करते हैं विसर्जन करते हैं आयो लाल झूले लाल नाचते हैं तो लेडी लेडी नाचे और एक दूसरे के शरीर के प्रति बुरी नजर करे इससे तो अच्छा है आयो लाल झुले लाल झुले गणपति दादा मोरिया अच्छा है अंबाजी घर वो तो मां का चिंतन होता है अथवा नमः शिवाय ओम नमः शिवाय नमः शिवाय ओम नमः शिवाय नमः शिवाय ओम नमः शिवाय नमः शिवाय ओम नमः शिवाय बाम बम बम ओम नमः शिवाय बम बम बम ओम नमः शिवाय बम बम बम ओम नमः शिवाय बम बम बम ओम नमः शिवाय नमः शिवाय ओम
नमः शिवाय नम शिवाय ओम नमः शिवाय हे शिव शिव शिव ओम नम शिवाय बम बम बम ओम नमः शिवाय बम नमवा अब ध्यान देना शिव जी का नाम है ववन सात्विक होगा ओमकार का उच्चारण फिर बीच में बम बम आता है शिव जी की विशेष पूजा सावन महीने में होती सावन महीने में अजीर और वायु प्रकोप होता है और बम बम बीज मंत्र से अजीर और वायु प्रकोप को शांति मिलती है और बली पत्र से भी वायु प्रकोप शांत होता है तब शिव जी ने पूजा स्वीकार किया कि नहीं किया वो तू गिनता रहे लेकिन
हमारा तो आयु आरोग्य पुष्टि प्रसन्नता हुई हम हमारा काम तो हो गया तो शिव जी ने शि पूजा स्वीकार कर ली हम मान लेते हैं बाकी का खोपड़ी तू चलाता रहे