क्यों आज तक पूरी दुनिया खालिद बिन वलीद [संगीत] को याद करती है। वलीद वान ऑफ़ द थ्री ग्रेटेस्ट वॉरियर्स ऑफ़ ग्रेटेस्ट जनरल इन द हिस्ट्री। क्योंकि खालिद बिन वलीद किसी छोटे-मोटे घर में नहीं बल्कि मक्का के सबसे ताकतवर और रिच फैमिली बनू मगजूम में पैदा हुए थे। और उनके वालिद अरब के सबसे रिच आदमी वलीद बिन मुगीरा थे। मतलब खालिद बिन वलीद के वालिद के पास इतना ज्यादा पैसा था कि उनकी दौलत के बारे में कुरान में भी बताया गया है। छोड़ दो मुझे और उस आदमी को जिसे मैंने अकेला पैदा किया [संगीत] उसे मैंने
बहुत बड़ी दौलत दी उसके पास रहने वाले बेटे दिए और उसके लिए लीडरशिप का रास्ता आसान बना दिया। फॉर एग्जांपल काबा को मेंटेन रखने के लिए जितना पैसा पूरा मक्का जमा करता था उतना सिर्फ अकेला वलीद बिन मुगीरा देता था। मतलब खालिद बिन वलीद मक्का में एक शहजादे एक प्रिंस की तरह बड़े हुए। क्योंकि उनके बाप के पास इतना पैसा [संगीत] था कि उन्हें पूरी जिंदगी कोई काम करने की जरूरत नहीं थी सिवाय एक काम के। और उसी एक काम ने आगे जाकर उन्हें दुनिया का सबसे बड़ा जनरल बनाया। और वो काम यह था कि
मक्का के तीन बड़े कबीले थे। बनू हाशिम जो मक्का के रिलीजन को कंट्रोल करते थे। बनू उमया जो मक्का में सिर्फ अपने पैसों के लिए मशहूर थे। और खालिद बिन वलीद का कबीला बनू मगजूम जिसके पास मक्का [संगीत] को प्रोटेक्ट करने की जिम्मेदारी थी। इस कबीले का हर जवान एक खतरनाक वॉरियर था। और इनका सबसे इंपॉर्टेंट काम यह था कि ये लोग जंगली घोड़ों को ट्रेन कर उन्हें जंग के लिए तैयार करते थे। [संगीत] इसीलिए बचपन से कोई भी खालिद बिन वलीद से ज्यादा घोड़ों की ताकत को नहीं जानता था। क्योंकि आगे जाकर खालिद बिन
वलीद ने अपनी जिंदगी की सारी जंग अपनी फौज के घोड़ों [संगीत] को ही यूज़ करके जीती। इसके अलावा खालिद बिन वलीद अपनी जिंदगी में बार-बार रोमन एंपायर की सिटीज की तरफ जाते रहे और हमेशा वहां की बड़ी-बड़ी सिटीज और बिल्डिंग्स को देखकर बिल्कुल हैरान रह जाते थे। लेकिन उन्हें इस बात का पता नहीं था कि एक दिन पूरी रोमन एंपायर सिर्फ खालिद बिन वलीद का नाम सुनकर ही कांपने लगी। [संगीत] अब जब खालिद बिन वलीद अपने बाप के पैसों से एक रिलैक्स जिंदगी गुजार रहे थे। यह एग्जैक्ट वही मोमेंट था जब मक्का के एक छोटे
से गार में अल्लाह ने अपना आखिरी प्रॉफिट चूज़ किया। और यहां से [संगीत] दुनिया में एक बहुत बड़ा चेंज आने लगा। क्योंकि रसूल्लाह सल्ला अलह वसल्लम मक्का में आहिस्ताआहिस्ता इस्लाम फैलाने लगे। जिससे पहले पहले तो मक्का के सबसे गरीब लोग इस्लाम की तरफ आने लगे। लेकिन सिर्फ एक ऐसा आदमी था जो मक्का में सबसे अमीर होने के बाद भी रसूल्लाह सल्ला अलह वसल्लम की बातों से इंप्रेस होने लगा। वलीद बिन मुगीरा जो बार-बार रसूल्लाह सल्ला वसल्लम के पास जाकर उनसे [संगीत] कुरान सुनता था। लेकिन आहिस्ताआहिस्ता मक्का में यह बात फैलने लगी कि वलीद बिन मुगीरा
अरब का सबसे अमीर आदमी मुसलमान होने वाला है। तो अब वलीद बिन मुगीरा ने कुरान [संगीत] को सही जानकर भी सिर्फ और सिर्फ लोगों के डर से इस्लाम से पीछे हटना शुरू किया। और सिर्फ यही नहीं बल्कि इस्लाम का सबसे बड़ा दुश्मन बना और पूरे मक्का में यह बात फैला दी कि मोहम्मद एक जादूगर मैजिशियन है। वलीद [संगीत] की इस हरकत से मुसलमानों को इतना नुकसान हुआ कि अल्लाह ने खुद कुरान में इसे जवाब दिया। फिर वो पलटा और गुरूर से आखिर कहा ये कुछ नहीं। बस पुराने जमाने का एक जादू है और इंसान की
बनाई हुई बातें हैं। बहुत जल्द मैं उसे दोजख में डालूंगा। और [संगीत] तुम्हें क्या पता कि दोज़ख क्या है? इस आयत के कुछ ही अरसे बाद वलीद बिन [संगीत] मुगीरा तो फौत हो गए लेकिन मक्का में मुसलमानों पर जुल्म इतना बढ़ गया कि अब उसे और बर्दाश्त करना इंपॉसिबल था। तो मजबूरन मक्का के सारे मुसलमान हिजरत करके मदीना की तरफ शिफ्ट हुए और यहां पर इस्लाम की पहली रियासत बनाने लगे। अब जब मुसलमान यहां मदीना में थे तो वहां खालिद बिन वलीद पता नहीं किस काम से अरब को छोड़कर कहीं बाहर गए थे और जब
अपने सारे काम पूरे करके वापस मक्का की तरफ आए तो उन्होंने देखा कि यहां तो सब बदल चुका है। मतलब मक्का के हर घर से रोने और चीखने की आवाें आ रही थी। और जब खालिद बिन वलीद ने पूछा तो उन्हें उनके खानदान वालों ने बताया कि आप जब यहां नहीं थे तो यहां मक्का और मदीना वालों की एक बहुत बड़ी जंग हुई है। जंग बदर जिसमें उन्होंने [संगीत] हमारे खानदान के सरदार अबू जहल और तुम्हारे 25 [संगीत] कजिंस को मार डाला है। और सबसे बड़ी बात यह है कि मुसलमान तुम्हारे बड़े भाई वलीद बिन
वलीद को भी [संगीत] गिरफ्तार कर चुके हैं। यह सुनकर खालिद बिन वलीद को इतना गुस्सा आया कि वह सीधा अबू सुफियान के पास गए और वहां पर मक्का के सारे बड़ों ने मिलकर मुसलमानों से बदला लेने की कसम खाई। जिसके बाद खालिद बिन वलीद अपने भाई को आजाद कराने के लिए मदीना की तरफ आए। जहां पर उन्होंने देखा कि मुसलमानों ने कैदियों के लिए एक बहुत ही अजीब सिस्टम बनाया। मतलब जिसके पास जितनी ताकत होगी, उससे उतने ही पैसे [संगीत] लेकर उसे आजाद किया जाएगा। मतलब किसी से 1000 और किसी से 2000 दीनार और जिसके
पास पैसे ही ना हो मुसलमान उसे सिर्फ इस शर्त पर आजाद कर रहे [संगीत] थे कि वो 10 मुसलमान बच्चों को पढ़ना लिखना सिखाए। लेकिन जैसे ही खालिद बिन वलीद वहां पहुंचे तो उन्हें पता चला कि मुसलमानों ने उनके भाई वलीद बिन वलीद की कीमत सारे कैदियों में सबसे ज्यादा लगाई थी। 4000 गोल्ड कॉइंस जो आज करोड़ों रुपए बनते हैं। यह प्राइस वहां बैठे सों के लिए बहुत ही शॉकिंग प्राइस थी। लेकिन खालिद बिन वलीद के लिए यह कुछ भी नहीं थी। उन्होंने यह सारे पैसे मुसलमानों को अदा किए और अपने भाई को आजाद करके
वापस मक्का की तरफ रवाना हुआ और उनका यह ख्याल था कि मक्का पहुंचकर लोग उनको बहुत जबरदस्त तरीके से वेलकम करेंगे। लेकिन मक्का पहुंचने से पहले ही एक रात इन्होंने रास्ते में गुजारी और अगली सुबह खालिद बिन वलीद ने उठकर देखा कि [संगीत] उनके भाई वलीद का बिस्तर बिल्कुल खाली है और उसके बिस्तर पर एक लेटर पड़ा हुआ है जिस पर लिखा था खालिद [संगीत] मैं तुम्हें बताए बगैर इस्लाम कबूल करके वापस मदीना जा चुका हूं। क्योंकि मैंने वो अल्लाह [संगीत] अपनी पूरी जिंदगी में मोहम्मद जैसा इंसान कभी नहीं देखा। और ऐसा मैंने पहले इसलिए
नहीं किया कि लोग यह ना समझे कि मैंने कैद के डर से इस्लाम कबूल [संगीत] किया हो। और अब जब तुमने मुझे आजाद करा लिया है तो मैं वापस जाकर एक आजाद इंसान की तरह अपनी मर्जी से इस्लाम कबूल करना चाहता हूं। इस लेटर के बाद खालिद बिन वलीद के भाई ने तो इस्लाम कबूल कर लिया लेकिन खालिद बिन वलीद के दिल में अभी भी अपने खानदान के खून का बदला लेने की आग जल रही थी। इसीलिए जब अगले साल मक्का वालों ने दोबारा फौज [संगीत] जमा की तो अबू सुफियान ने खालिद बिन वलीद के
गुस्से को यूज़ करके उन्हें पहली बार अपनी फौज का जनरल बनाया और इस तरह मक्का से 3000 लोगों की फौज मुसलमानों से जंग के लिए मदीना की तरफ रवाना हुई। लेकिन मदीना पहुंचने से पहले ही 1000 मुसलमान ओहद के पहाड़ के पास उनका इंतजार कर रहे थे। 1000 वर्सेस 3000 मतलब मुसलमानों को अपने से तीन गुना बड़ी फौज के साथ लड़ना था जो ऑफ कोर्स एक बहुत मुश्किल काम था। लेकिन जंग शुरू होने से पहले ही मुसलमानों की फौज से 300 मुनाफिकन धोखा देकर जंग छोड़कर चले गए। अब रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास सिर्फ
700 लोग थे और सामने मक्का वालों की 3000 की फौज मतलब चार गुना बड़ी फौज जंग शुरू होने से पहले इन 700 लोगों में से भी रसूल्लाह सल्लल्लाहु वसल्लम ने 50 लोगों को निकालकर इस पहाड़ के ऊपर भेजा ताकि पहाड़ के पीछे से मुसलमानों पर कोई हमला ना कर सके और सामने खड़े खालिद बिन वलीद इन [संगीत] 50 लोगों को गौर से देख रहे थे। [संगीत] आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इन 50 आर्चरर्स को क्लियर ऑर्डर्स दिए थे कि अगर तुम देखो कि मुसलमान जंग जीत चुके तुमने पहाड़ से नहीं उतरना और अगर तुम देखो
कि मुसलमान जंग हार गए तब भी तुमने पहाड़ से नहीं उतरना। इसी के साथ जंग ओहद शुरू हुई। जैसे ही जंग शुरू हुई मुसलमानों में इतना जज्बा था कि वो आसानी से मक्का की फौज को पीछे धकेलने लगे और कुछ ही देर के जंग के बाद ऐसे लगने लगा कि मुसलमान आसानी से यह जंग जीत जाएंगे। जिसे देखकर मक्का की फौज आहिस्ता-आहिस्ता जंग से भागने लगी। इवन उनका लीडर अबू सुफियान जान बचाकर भागने लगा। भागते-भागते अबू सुफियान ने खालिद बिन वलीद से कहा कि तुम क्यों अपनी जगह पर खड़े हो? जाओ और हमला करो। लेकिन
खालिद बिन वलीद बिल्कुल अपनी जगह पर खड़े रहे क्योंकि उन्हें पता था कि जब तक यह 50 आर्चरर्स उस पहाड़ पर खड़े हैं यह जंग जीतना इंपॉसिबल है। आखिर मुसलमानों की फौज मक्का वालों को जंग के मैदान से इतना दूर ले आई कि पहाड़ पर खड़े आर्चरर्स को लगा कि अब तो हम जंग जीत चुके तो उनमें से बहुत सारे अपनी पोजीशन को छोड़कर पहाड़ से नीचे उतरे और दुश्मनों का छोड़ा हुआ माल जमा करने लगे। नाउ जैसे ही खालिद बिन वलीद ने इन आर्चरर्स को पहाड़ से नीचे उतरते हुए देखा उन्हें समझ आ गई
कि इट्स नाउ और नेवर। इसी के साथ खालिद बिन वलीद ने अपने घोड़ों को रेडी किया और पहाड़ के पीछे से मुसलमानों पर हमला कर दिया। अब जब मुसलमान इन दोनों फौजों के दरमियान फंस गए। इससे मुसलमानों को बहुत नुकसान हुआ और बड़े-बड़े सहाबा शहीद हो गए। जिनमें सबसे बड़े सहाबी थे। हजरत हमजा इस जंग में मुसलमानों और मक्का वालों दोनों को बहुत नुकसान हुआ। लेकिन यह बात सब जान गए कि खालिद बिन वलीद एक बहुत ही खतरनाक [संगीत] जनरल है। और मक्का वालों ने भी खालिद बिन वलीद को बिल्कुल एक हीरो की तरह वेलकम
किया। लेकिन अब जब खालिद बिन वलीद अपने खानदान के खून का बदला ले चुके थे। तो अब उनके पास मुसलमानों से लड़ने की कोई खास वजह थी ही नहीं। इसीलिए ओहद के बाद खालिद बिन वलीद खंदक की जंग में भी मौजूद थे। लेकिन उनके होते हुए भी मुसलमान वो जंग जीत गए। इस सब के बाद आखिर एक ऐसा टाइम आया जिससे खालिद बिन वलीद को भी समझ आई कि दुनिया का सबसे बड़ा स्ट्रेटजिस्ट वो नहीं बल्कि उस वक्त उनके दुश्मन रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम है। क्योंकि एक दिन जब खालिद बिन वलीद मक्का में थे तो
अचानक [संगीत] मक्का में यह खबर फैली कि हजारों मुसलमान मदीना से उमरा करने के लिए मक्का की तरफ बढ़ रहे हैं। एंड ऑफ कोर्स यह सुनते ही मक्का वालों ने अपने बेस्ट जनरल खालिद बिन वलीद को मुसलमानों को रोकने के लिए भेजा। खालिद बिन वलीद अगेन अपने घुड़सवारों को लेकर फुल स्पीड मुसलमानों की तरफ पहुंचे। लेकिन वहां पहुंचकर उन्होंने देखा कि सिर्फ थोड़े मुसलमानों के सिवा यहां कोई नहीं है। जब उन्होंने पूछा [संगीत] तो उन्हें बताया गया कि आप रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ट्रैप में फंस चुके हैं और वो खुद बाकी मुसलमानों के साथ
पहाड़ों के रास्ते से जाकर बिल्कुल [संगीत] मक्का के दरवाजे के बाहर खड़े हैं। नाउ यह तारीख में पहली और आखिरी दफा था कि किसी ने खालिद बिन वलीद जैसे जनरल को अपने ट्रैप में फंसाया हो। और इस वाक्य के बाद खालिद बिन वलीद रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से अपनी दुश्मनी खत्म करके उनकी पर्सनालिटी से इंस्पायर होने लगे। मतलब सुलेह हुबिया के बाद खालिद बिन वलीद की सोच इस्लाम [संगीत] के बारे में इतनी बदल चुकी थी कि एक दिन मक्का के सारे बड़े लीडर्स के सामने खालिद बिन वलीद ने बैठकर कहा कि तुम लोगों ने जो
कहना है कहो। लेकिन ऐसा हो ही नहीं सकता कि मोहम्मद जैसा जहीर आदमी कोई जादूगर या झूठा हो। यह एक बहुत ही अजीब बात थी। और वहां बैठे सारे लोग भी यह सुनकर शॉक्ड रह गए क्योंकि सबसे पहले आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को [संगीत] एक जादूगर खुद खालिद बिन वलीद के वालिद वलीद बिन मुगीरा ने कहा था और आज उनके मरने के बाद उनका बेटा खालिद बिन वलीद खुद अपने बाप की कही हुई सारी बातों को सबके सामने डिनाई कर रहा था। इसी तरह आहिस्ता-आहिस्ता खालिद बिन वलीद इस्लाम की तरफ अट्रैक्ट होने लगे और ऊपर
से उनके भाई [संगीत] वलीद भी बार-बार मदीना से उनकी तरफ लेटर्स भेजते रहते थे और उन्हें मदीना की जबरदस्त रियासत के बारे में बताते रहते थे। यहां तक कि आखिर एक दिन मदीना में रसूल्लाह सल्लल्लाहु वसल्लम ने खुद खालिद बिन वलीद [संगीत] के भाई से पूछा कि खालिद किधर है? खालिद बिन वलीद जैसे जहीन इंसान को अब तक इस्लाम की तरफ आ जाना चाहिए था। यह सुनते ही खालिद बिन वलीद के भाई वलीद ने फुल स्पीड भागकर अपने भाई की तरफ लेटर भेजा और लिखा कि खालिद अब तो अपनी आंखें खोलो। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
से तुम्हारी तारीफ सुनी तो अब और देर मत करो और इस्लाम कबूल कर लो। अपने भाई का यह लेटर पढ़कर खालिद बिन वलीद सोचने लगे कि मैंने ओहद की जंग में मुसलमानों पर कितना जुल्म किया और फिर भी आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम वो सब माफ करके मुझे इस्लाम की तरफ बुला रहे हैं। तो अब खालिद बिन वलीद मदीना की तरफ जाने की तैयारी करने [संगीत] लगे। तो मक्का के लीडर अबू सुफियान ने आकर खालिद से पूछा कि क्या यह सच है? तुम हमें छोड़कर मोहम्मद की तरफ जा रहे हो? तो ऑफ कोर्स खालिद बिन वलीद
किसी के बाप से डरते तो नहीं थे। तो उन्होंने कहा हां यह सच है। [संगीत] इस पर अबू सुफियान ने अपनी तलवार निकाली लेकिन खालिद बिन वलीद के पावरफुल खानदान बनू मगजूम [संगीत] ने उन्हें बचा लिया और इस तरह खालिद बिन वलीद मक्का में सबको बताकर रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तरफ रवाना हुए। रस्ते में उनकी मुलाकात फ्यूचर आर्मी चीफ अमर बिन आस से हुई। जो खुद भी मक्का के लोगों से तंग आकर इस्लाम कबूल करने जा रहे थे। [संगीत] और इस तरह इन दोनों ने मदीना जाकर इस्लाम कबूल कर लिया। लेकिन खालिद बिन
वलीद के लिए इस्लाम कबूल करने के बाद भी कुरान की इन आयात को एक्सेप्ट करना बहुत मुश्किल था। जिसमें उनके बाप वलीद बिन मुगीरा [संगीत] को जहन्नुम में डालने की बात थी। तो खालिद बिन वलीद एक सबी के पास गए और उन्हें कहा [संगीत] मुझे मेरे बाप के बारे में आयात पढ़कर सुनाओ। और उन्हें सुनने के बाद खालिद बिन वलीद ने कहा दोबारा सुनाओ। और फिर कहा दोबारा सुनाओ दोबारा सुनाओ। और ये आयात बार-बार सुनने के बाद आखिर खालिद बिन वलीद के दिल ने इन आयात को एक्सेप्ट कर लिया। और उस दिन के बाद हमेशा
खालिद बिन वलीद अपने आप को खालिद बिन [संगीत] वलीद नहीं बल्कि अबू सुलेमान कहलाने लगे। नाउ खालिद बिन वलीद के इस्लाम कबूल करने के कुछ ही दिनों बाद रसूल्लाह सल्लल्लाहु वसल्लम 3000 की फौज जमा करके पहली बार रोमन एंपायर से लड़ाई की तैयारी कर रहे थे जिसे जंग मुता कहा जाता है। तो ऑफकोर्स बिल्कुल एक नया मुसलमान होने की वजह से खालिद बिन वलीद एक आम सिपाही की तरह इस फौज में जंग के लिए रवाना हुए। रसूल्लाह सल्ला वसल्लम ने इस फौज का लीडर ज़द बिन हारिसा को बनाया था और यह ऑर्डर दिया था कि
अगर ज़द बिन हारिसा शहीद हो जाए तो उसके बाद मुसलमानों का लीडर जाफर बिन अबी तालिब होगा और अगर जाफर भी शहीद हो जाए मुसलमानों का तीसरा लीडर अब्दुल्ला बिन रवाहा होगा और अगर ये तीनों जनरल्स शहीद हो जाए तो फिर मुसलमानों की मर्जी है खुद अपना लीडर चूज़ करके उसके हाथों में इस्लाम का झंडा दे। जैसे ही मुसलमानों की 3000 की फौज रोमन एंपायर से लड़ने के लिए पहुंची। उन्होंने देखा कि सामने रोमन एंपायर की 2 लाख की फौज [संगीत] खड़ी है। अब कुछ हिस्टोरियंस कहते हैं कि यह 2 लाख नहीं बल्कि 1 लाख
या उससे भी कम थे। लेकिन सब [संगीत] यह बात मानते हैं कि रोमंस की फौज मुसलमानों से बहुत ज्यादा बड़ी थी। रोमंस की इतनी बड़ी फौज देखकर कुछ मुसलमानों ने कहा कि हमें जंग नहीं लड़नी चाहिए। लेकिन मुसलमानों के तीसरे जनरल अब्दुल्ला बिन नवाहा ने कहा कि [संगीत] या तो हम जंग जीतेंगे और या शहीद होंगे। जंग छोड़ के जाने वाला कोई ऑप्शन नहीं। आखिर मुसलमानों ने लड़ने का फैसला किया और जंग के लिए एक ऐसी जगह चुनी जो दो बड़े-बड़े पहाड़ों के दरमियान थी ताकि रोमंस की फौज लंबी लाइंस ना बना सके और एक
दूसरे के पीछे खड़े हो और इसी के साथ जंग शुरू हुई। इस जंग के जनरल ज़द बिन हारिसा थे जो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के गुलाम थे और इन्हें बचपन से आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक बेटे की तरह बड़ा किया और इनसे बहुत मोहब्बत करते थे। लेकिन [संगीत] जैसे ही जंगे बुता शुरू हुई, उसके कुछ ही देर बाद ज़द बिन हारिसा शहीद हो [संगीत] गए। अब यहां से बहुत दूर मदीना में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सारे मुसलमानों को जमा [संगीत] किया और उनके सामने खड़े होकर अपनी आंखों में आंसुओं के साथ कहा कि
ज़द को शहीद कर दिया गया। वहां जंग में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ऑर्डर्स के मुताबिक दूसरे जंग में जाफर बिन अब तालिब जो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के कजिन और हजरत अली के भाई थे। [संगीत] उन्होंने मुसलमानों का झंडा पकड़ कर लड़ना शुरू किया। लेकिन कुछ ही देर बाद जिस हाथ से उन्होंने झंडा पकड़ा था वो लड़ते लड़ते कट गया। तो अब यह झंडा जमीन पर गिरने से पहले जाफर ने इसे अपने दूसरे हाथ से पकड़ा लेकिन वो हाथ भी कट गया और जाफर रज़ अल्लाह ताला अन शहीद हो गए। और मदीना में आप
सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फिर सबको बताया कि जाफर भी शहीद हो चुका है। जिसके बाद तीसरे जनरल अब्दुल्ला ने ये झंडा उठाया लेकिन उसे भी शहीद कर दिया गया। [संगीत] तो अब इस इतनी इंपॉर्टेंट जंग में मुसलमानों का कोई लीडर नहीं था और मुसलमान कंफ्यूज होकर इधर-उधर भागने लगे। अचानक एक [संगीत] सबी ने मुसलमानों का झंडा उठाया और चीख-चीख कर कहा कि मुसलमानों जल्दी अपना नया लीडर चूज़ करो वरना हमारी सारी फौज बिखर जाएगी। तो अब मुसलमान जंग के दौरान ही एक नया लीडर ढूंढने लगे। और अचानक उन्होंने देखा कि एक मुसलमान जंग में बहुत
बहादुरी से लड़ रहा है। खालिद बिन वलीद और उसे देखकर ही मुसलमानों को जंग ओहद की याद आई। जिसमें पूरे अरब ने खालिद बिन वलीद को एक ग्रेट जनरल माना था। तो अब सीधा मुसलमान खालिद बिन वलीद के पास गए और उन्हें मुसलमानों का झंडा पकड़ाने की कोशिश की। लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इंकार कर दिया और कहा कि मैं इस काबिल ही नहीं हूं कि मुसलमानों को लीड कर पाऊं। लेकिन मुसलमानों की फौज ने जबरदस्ती उनके हाथ में झंडा पकड़ा है और कहा अब आप ही हमारे लीडर और जनरल हैं। और इसी के साथ
यहां से बहुत दूर मदीना में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सबके सामने कहा कि तीनों जनरल्स के बाद अब मुसलमानों ने अल्लाह की तलवारों में से एक को अपना जनरल बना दिया है। और यहां से खालिद बिन वलीद को अल्लाह की तलवार का टाइटल मिला। खालिद बिन वलीद की लीडरशिप में मुसलमानों ने रोमंस पर जोर से हमला किया और रोमंस को पीछे धकेल कर मुसलमानों की फौज [संगीत] वापस सही सलामत मदीना आई। जिसके बाद मुसलमानों ने अपनी पुरानी दुश्मनी भुलाकर खालिद बिन वलीद को अपना जनरल माना। जिसके बाद रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने भी खालिद
बिन वलीद को अपना मेन जनरल बनाया और इस्लाम के बड़े-बड़े टास्क पर खालिद बिन वलीद को भेजने लगे। यहां तक कि जब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने आखिर मक्का को फतह किया और 10,000 मुसलमानों के साथ मक्का के अंदर दाखिल हुए तब भी खालिद बिन वलीद मुसलमानों की एक बहुत बड़ी फौज को लीड कर रहे थे। अब जब खालिद बिन वलीद मुसलमानों के बहुत बड़े जनरल बन चुके थे। यहां पर उनकी जिंदगी का सबसे खतरनाक मसला सामने आया। एक दिन आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने खालिद बिन वलीद को एक कबीले की तरफ भेजा कि जाकर
उन्हें मदीना की रियासत के कंट्रोल में लाओ। जैसे ही खालिद बिन वलीद उनके पास पहुंचे, वहां के लोगों ने पता नहीं क्यों एक बहुत ही अजीब सेंटेंस यूज़ किया जिसकी आज भी मुश्किल से समझ आती है। वो लोग खालिद बिन वलीद और उनकी फौज को देखकर चीखने लगे कि हमने दीन छोड़ दिया था और अब हम वापस आ गए हैं। समथिंग लाइक दैट। जिसकी खालिद बिन वलीद को भी सही समझ नहीं आई। और वो समझे कि ये लोग इस्लाम को छोड़ने का ऐलान कर रहे हैं तो उन्होंने हुकुम दिया कि इन सबके सर काट दिए
जाए। जिसके बाद दर्जनों लोग मारे गए। अब जब इस बात का रसूल्लाह सल्ला वसल्लम को पता चला तो उन्हें बहुत दुख हुआ और उन्होंने अल्लाह से कहा कि या अल्लाह खालिद ने जो किया है मेरा उस काम से कोई [संगीत] ताल्लुक नहीं है और फौरन हुक्म दिया कि खालिद बिन वलीद को मेरे पास बुलाया जाए। खालिद बिन वलीद ने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास आकर उन्हें इस सारी [संगीत] कन्फ्यूजन का बताया। लेकिन पीछे खड़े अब्दुल रहमान बिन ऊफ ने कहा कि तुम गलत कह रहे हो। तुमने इस कबीले के लोगों को मारकर सिर्फ अपने
चाचा की मौत का बदला लिया है। क्योंकि इस सब से बहुत साल पहले इसी कबीले के लोगों ने खालिद बिन वलीद के चाचा को कत्ल किया था। खालिद बिन वलीद को अब्दुल रहमान बिन ऊफ रज़ अल्लाह ताला अनहु की इस बात पर गुस्सा आया जिससे इन दोनों सहाबा के दरमियान एक सख्त बहस शुरू हुई। अब जब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने दो सहाबा को बहस करते [संगीत] हुए देखा तो वो खामोश और न्यूट्रल नहीं रहे बल्कि उन्होंने अब्दुल रहमान बिन औफ की साइड ली और खालिद बिन वलीद से कहा कि मेरे [संगीत] सहाबा को
बुरा भला मत कहो अगर कोई ओहद के पहाड़ के बराबर सोना भी अल्लाह की राह में खर्च करे तब भी वो मेरे सहाबा के बराबर नहीं हो सकता। यहां पर पॉइंट यह है कि खालिद बिन वलीद खुद भी एक सहाबी थे। लेकिन उन्होंने इस्लाम बहुत देर बाद उस वक्त कबूल किया था जब इस्लाम के पास थोड़ी पावर आ चुकी थी। लेकिन अब्दुल रहमान बिन औफ ने मक्का में अपना सब कुछ छोड़कर पूरी [संगीत] दुनिया से दुश्मनी लेकर सबसे पहले लोगों में इस्लाम कबूल किया था। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इस बात से खालिद बिन वलीद
समझ चुके थे कि [संगीत] चाहे वो जो भी कर ले उनकी वैल्यू पहले इस्लाम कबूल करने वाले सहाबा से हमेशा कम रहेगी। जिसके बाद आप सल्ला अलह वसल्लम ने हजरत अली रज़ अल्लाह ताला अनू को बुलाया और उन्हें हुकुम दिया कि उस कबीले के पास [संगीत] जाकर उन्हें मनाओ और उन्हें जो भी तकलीफ पहुंचाई गई है उसे इंसाफ [संगीत] के साथ हल करो और कोशिश करना कि कोई भी तुमसे खफा ना रहे। इन तरीकों से रसूल्लाह सल्ल वसल्लम ने खालिद बिन वलीद को समझाया लेकिन फिर भी उन्हें मुसलमानों की फौज से निकाला नहीं और इस्लाम
की अगली जंग जंग हुनैन में उन्हें दोबारा अपना जनरल बनाया। हुनैन ऐसी पहली जंग थी जिसमें आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम लीडर और खालिद बिन वलीद उनके जनरल थे। मुसलमान 12,000 की फौज लेकर अपने दुश्मनों की तरफ रवाना हुए। लेकिन जैसे ही मुसलमानों की फौज इन दो पहाड़ों के दरमियान से गुजर रही थी, अचानक दोनों पहाड़ों से मुसलमानों पर बहुत सारे तीर बरसने लगे। दुश्मनों ने मुसलमानों पर इतने तीर बरसाए कि मुसलमानों की फौज बिल्कुल बिखर गई और वो जंग छोड़कर पीछे हटने लगे। 12,000 की फौज जंग से पीछे हटने लगी और इसी जंग में खालिद
बिन वलीद ने खुद आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सीखा कि असल में एक लीडर होता क्या है? सामने दुश्मनों [संगीत] की फौज ने देखा कि मुसलमानों की फौज तो पीछे जा रही है लेकिन कुछ लोग अब भी ऐसे हैं जो बिल्कुल अपनी जगह पर खड़े हैं और जब उन्होंने गौर से देखा तो वो हैरान रह गए कि मुसलमानों का लीडर रसूल अल्लाह भी अपनी जगह पर खड़े हैं। ये देखकर उनकी पूरी फौज फुल स्पीड रसूल्लाह सल्लल्ला वसल्लम की तरफ बढ़ने लगी। लेकिन आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम भी पीछे हटने की बजाय अकेले दुश्मनों की फौज की
तरफ बढ़ने लगे और जोर-जोर से कहने लगे मैं हूं मोहम्मद। अब्दुल्लाह का बेटा और फिर थोड़ा और आगे बढ़कर कहा मैं अल्लाह का नबी हूं। कोई झूठा नहीं और मैं अब्दुल मुतलिब का बेटा हूं। मुसलमानों की फौज रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इस बहादुरी को देखकर शर्मिंदा हुई जिसके बाद उन्होंने दुश्मन पर ऐसा हमला किया कि कुछ ही देर में ये जंग मुसलमान जीत गए। इस जंग को देखकर क्लियरली पता चलता है कि यस खालिद बिन वलीद एक बहुत बड़े जनरल तो थे लेकिन आप सल्लल्लाहु अलह वसल्लम के सामने वो जिसके बाद अपनी जिंदगी के
आखिरी दिन तक [संगीत] आप सल्लल्लाहु अलह वसल्लम ने खालिद बिन वलीद को मुसलमानों की फौज के जनरल के पोस्ट पर रखा। लेकिन आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के फौत होते ही अरब के बहुत सारे कबीलों ने इस्लाम से बगावत कर दी। जिनमें से कुछ अपने आप को नबी भी कहने लगे और कुछ ने जकात देने से इंकार कर दिया। तो अब इस्लाम के पहले खलीफा हजरत अबू बकर को एक ऐसे आर्मी चीफ की जरूरत थी जो पूरे अरब को इस्लाम के कंट्रोल में ला सके। तो उन्होंने खलीफा बनने के कुछ अरसे बाद खालिद बिन वलीद के
बेस्ट फ्रेंड अमर बिन आस को अपने पास बुलाया और उनसे पूछा कि मुझे खालिद के बारे में बताओ यह कैसा आदमी है? तो अमर बिन आस ने खलीफा से कहा कि खालिद जंगों का मास्टर और मौत का दोस्त है। उसमें शेर की तरह बहादुरी है। और एक बिल्ली की तरह सबर। यह सुनते ही खलीफा अबू बकर ने खालिद बिन वलीद को [संगीत] मुसलमानों की पूरी फौज का पहला आर्मी चीफ बनाया और उन्हें हुकुम दिया कि पूरे अरब को इस्लाम के कंट्रोल में लाओ। खिलाफत दुनिया में सबसे पहले हजरत अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनू को
मिली। मतलब पूरा अरब इस सारे इलाके के हुक्मरान बने। लेकिन जैसे ही अबू बकर रज ताला अनू खलीफा बने वो सारे कबीले जो अब तक मुसलमानों के ताबे थे उन सों ने जब देखा कि अल्लाह के रसूल अब नहीं है तो उन सों में से बहुत सारे कबीलों ने अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनहु की खिलाफत से बगावत का ऐलान कर दिया। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के टाइम पर ये इस्लामिक एंपायर इस सारे इलाके पर फैली हुई थी। लेकिन अरब कबीलों की बगावत के बाद अब इस्लामिक एंपायर सिर्फ इतने इलाके तक महदूद रह गई। और
यह जो निशान है इन सारे इलाकों में बगावतें हुई। यह सारी बगावतें एक जैसी नहीं बल्कि इनकी दो टाइप्स थी। एक जिन्होंने रसूल्लाह सल्लाहु अलैहि वसल्लम के बाद मदीना की खिलाफत को जकात देने से इंकार कर दिया और दूसरे वो जिन्होंने तो हद ही कर दी। उन्होंने रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की अज़ीम कामयाबी देखकर उसे कॉपी करने की कोशिश की और नबूवत का झूठा दावा कर दिया। अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनो ने इन दोनों प्रॉब्लम्स को तो टैकल करना ही था। लेकिन वफात से पहले रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलह वसल्लम ने एक फौज रोमन एंपायर से
लड़ने के लिए तैयार की थी जो आप सल्ला अलह वसल्लम की बीमारी की वजह से रुक गई थी। अबू बकर रज अल्लाह ताला अन के खलीफा बनते ही उस फौज के कमांडर [संगीत] ओसामा बिन ज़द रज अल्लाह ताला अन जिनकी उम्र सिर्फ 18 साल थी। उन्होंने खलीफा को मैसेज भेजा कि हमें इस इतने सख्त टाइम में रोमन एंपायर से लड़ाई रोकनी चाहिए। लेकिन अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनू ने कहा [संगीत] कि जो काम रसूल्लाह सल्ला अलह वसल्लम ने शुरू किया हो मैं उसे कभी भी नहीं [संगीत] रोकूंगा। नाउ एक ही टाइम में मुसलमानों को
तीन बड़े ग्रुप से लड़ना था। [संगीत] जकात ना देने वाले झूठे पैगंबर और सुपर पावर रोमन एंपायर। जिस पर हजरत उमर ने अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनू से कहा [संगीत] कि हमें सलों से एक साथ नहीं लड़ना चाहिए। बिकॉज़ इट्स इंपॉसिबल। एटलीस्ट जकात ना देने वालों को अभी कुछ टाइम तक छोड़ देते और उनसे बाद में निपट लेते हैं। लेकिन [संगीत] अबू बकर रज अल्लाह ताला अनू ने फरमाया कि अगर एक शख्स रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के टाइम पर एक ऊंट और उसके साथ एक रस्सी भी जकात में देता था और अब आप सल्लल्लाहु
अलह वसल्लम के बाद वो सिर्फ ऊंट जकात में दे और उसके साथ रस्सी ना दे तब [संगीत] भी मैं उसके खिलाफ जिहाद करूंगा। अबू बकर रज ताला अनू को इस बात का पता था कि अगर [संगीत] आप सल्ला अलह वसल्लम के बाद मुसलमानों ने आहिस्ता-आहिस्ता चीजों को बदलना शुरू किया तो इससे एक दिन इस्लाम को भी खतरा हो सकता है। तो उन्होंने सबसे बड़ा काम अपनी खिलाफत में ये किया कि जो काम भी रसूल्लाह सल्लाहु अलैहि वसल्लम के टाइम पर जिस तरह होता था उसको [संगीत] एकक्टली उसी तरह जारी रखा तो मुसलमानों ने सबसे नॉर्थ,
साउथ, ईस्ट हर तरफ एक साथ जंग करने की प्लानिंग शुरू की। सबसे पहले उससामा रज अल्लाह ताला अनहु अपनी फौज के साथ रोमन एंपायर पिज़ेंट एंपायर की तरफ रवाना हुए। जाने से पहले अबू बकर रज ताला अनू ने उन्हें वही इंस्ट्रक्शंस [संगीत] दी जो रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जंग से पहले दिया करते थे कि किसी भी औरत बच्चे या बूढ़े पर अंडर एनी सरकमस्ट्ससेस हाथ नहीं उठाना [संगीत] और दरख्तों को भी बगैर किसी वजह के नहीं काटना और इवन जो दूसरे रिलीजंस के प्रीस्ट्स हैं उन्हें [संगीत] भी कुछ नहीं कहना। मतलब सिर्फ उनसे लड़ना है
जो तुमसे लड़े। यह फौज रोमन एंपायर के इलाकों में दाखिल हुई और बहुत तेजी से कामयाब होने लगी और बहुत सारे इलाकों को दोबारा फतह कर लिया। लेकिन जैसे ही यह फौज मदीना से रवाना हुई, [संगीत] अरब के झूठे पैगंबरों में से एक तुलेहा ने सोचा कि यह बेस्ट टाइम है मदीना पर हमला करके इसे खत्म करने का। क्योंकि मदीना से बहुत सारे लोग रोमन एंपायर से लड़ने के लिए गए थे। और मदीना के अंदर मदीना को डिफेंड करने के लिए बहुत कम लोग बचे हैं। तो तुलेहा अपनी फौज लेकर मदीना की तरफ रवाना हो।
लेकिन अबू बकर रज अल्लाह ताला अनू ने बहुत जल्दी से एक नई फौज बनाई और उन्हें इस झूठे नबी तुलेहा से लड़ने के लिए भेजा। इस फौज ने तुलेहा की फौज को रोक दिया और वो मदीना पर हमला नहीं कर सके। तुलेहा की फौज अपनी जगह छोड़कर पीछे चली गई। लेकिन फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। जिसके कुछ ही दिनों बाद ओसामा की फौज रोमन एंपायर से लड़ने के बाद वापस मदीना पहुंच गई। अब मदीना बिल्कुल सिक्योर हो चुका था। क्योंकि मुसलमानों की सारी फौज मदीना पहुंच चुकी थी। तो अबू बकर रज अल्लाह ताला अनूह
ने पूरे अरब को वापस इस्लाम की तरफ लाने के लिए मुसलमानों की फौज को 11 हिस्सों में डिवाइड किया। क्योंकि मुसलमानों ने अब ऑलमोस्ट पूरे अरब से लड़ना था। सिवाय मक्का के। मक्का के लोग इससे पहले हमेशा मुसलमानों के सबसे बड़े दुश्मन होते थे। लेकिन उन्होंने इस इतने सख्त टाइम में अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनू की खिलाफत को फुल सपोर्ट किया। अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनू ने मुसलमानों की फौज के 11 डिवीज़ंस बनाए। जिसमें सबसे बड़ी फौज खालिद बिन वलीद रज़ अल्लाह ताला अनू को दी गई। क्योंकि खालिद बिन वलीद को जकात ना
देने वाले मालिक बिन नुरा और तीन बड़े झूठे पैगंबरों से लड़ना था। तुलहा जो मदीना के सबसे करीब सरजा जो एक फीमेल फॉल्स प्रॉफेट थी। और सबसे आखिर में मुसैलमा। तो इन 11 फौजों में सबसे पहले खालिद बिन वलीद रज़ अल्लाह ताला अनू की फौज रवाना हुई। जिसके बाद अबू जहल के बेटे इकरमा रज़ अल्लाह ताला अनो जो अब मुसलमान हो चुके थे। उन्हें अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनू ने यमामा की तरफ भेजा ताकि वो जाकर मुसलमा की फौज को आगे बढ़ने से रोक सके। और जिससे खालिद बिन वलीद रज़ अज़ ताला अनू को
इतना टाइम मिले कि वो बाकी सारे रेबल्स को खत्म करके मुसलैमा की तरफ आए। जाने से पहले अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनहु ने इकरमा रज़ अल्लाह ताला अनू को क्लियर ऑर्डर्स दे दिए थे कि तुमने सिर्फ मुसलमा की फौज के सामने पड़ाव डालना है। हमला नहीं करना जब तक खालिद बिन वलीद की फौज ना पहुंच जाए। इसके अलावा बाकी सारी फौजों को यमन, ओमान, बहरेन और नॉर्थ में तबूक की तरफ भेजा गया। इन फौजों का मदीना से रवाना होने से पहले अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनो ने इन सारे बागियों को एक बार फिर
वन लास्ट टाइम लेटर्स भेजे कि वो बगावत छोड़कर वापस इस्लाम की तरफ आए। लेकिन कोई रिस्पांस ना आने के बाद अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनहु ने इन फौजों को रवाना किया। खालिद बिन वलीद 6000 की फौज लेकर मदीना से ईस्ट की तरफ रवाना हुए। जहां तुलेहा अपनी फौज लेकर उनका इंतजार कर रहा था जो मुसलमानों की फौज से काफी बड़ी थी। मीनवाइल मदीना में अबू बकर रज ताला अन अरब के लोकल ट्राइब से इस फौज के लिए लोग जमा कर रहे थे। आखिर खालिद बिन वलीद और तुलेहा की फौज आमने-सामने आए। तलेहा अपनी फौज
के बिल्कुल पीछे खड़ा था और अपने लोगों को बार-बार बोल रहा था कि मेरे खुदा ने मुझे कहा है कि आज हम यह जंग जरूर जीतेंगे। जैसे ही जंग शुरू हुई मुसलमानों की फौज खालिद बिन वलीद की लीडरशिप में दुश्मनों की रैंक्स को बहुत आसानी से तोड़कर आगे बढ़ने लगी और उनके सेंटर तक पहुंच गई। दुश्मन की फौज से लोग भागकर तुलया से पूछने लगे कि कहां है तुम्हारे खुदा की मदद? जिस पर वो अपने लोगों से झूठ बोलता रहा। लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता उसके साथ सारे लोगों को उसके झूठ की समझ आने लगी और वह उसे
छोड़कर जंग से भागने लगे। तुलेहा भी यह देखकर जंग छोड़कर शाम की तरफ भाग गए। और इस तरह खालिद बिन वलीद रज अल्लाह ताला अनू ने अरब के पहले झूठे नबी को खत्म कर दिया। लेकिन इस जंग के कुछ ही अरसे बाद तुलेहा ने वापस आकर इस्लाम कबूल कर लिया और अबू बकर रज़ ताला ने उन्हें माफ भी कर दी और फिर कुछ साल बाद उन्होंने इस्लाम के लिए अपनी जान भी दी। तुलया जैसे ताकतवर और रिच बागी को इतने आसानी से हराना अरब के सारे बागियों के लिए पहला बड़ा दजका था। मुसलमानों की यह
कामयाबी देखकर अरब के सारे रेबल्स डरने लगे और अब तक ये सारे बागी जो छोटे-छोटे ग्रुप्स में मुसलमानों से लड़ते थे यूनाइट होने लगे। जैसे सजा जो एक फीमेल फॉल्स प्रॉफ वो खालिद बिन वलीद की फौज से डर कर अपने कबीले के साथ अरब के सबसे बड़े बागी मुसैलमा कजाब के पास आई और उनसे शादी कर ली। शादी के बाद इन दोनों ने अपने कबीले और फौजों को यूनाइट करके एक बहुत बड़ी फौज बनाई। खालिद बिन वलीद रज अल्लाह ताला अन्ह ने जब यह इलाके फतह किए तो आसपास के सारे कबीले वापस इस्लाम की तरफ
आए और खालिद बिन वलीद के सामने सरेंडर कर दिए सिवाय एक कबीले के जिसके लीडर का नाम था मालिक बिन नुरा। जिसे इससे कुछ साल पहले रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने खुद अपने कबीले का टैक्स कलेक्टर बनाया था। लेकिन रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की वफात के फ़ौरन बाद मालिक बिन नुरा ने अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनहु को ज़कात देने से इंकार कर दी और जकात के सारे पैसे मुसलमानों की कैपिटल मदीना पहुंचाने के बजाय अपने कबीले वालों को वापस दे दी। खालिद बिन वलीद मुसलमानों की फौज लेकर गए और इस कबीले के सरदार और
उसके साथियों को सजा-ए-मौत दे दी। और इस तरह यह मसला भी हल हो गया। लेकिन मदीना में मुसलमानों के कुछ लीडर्स स्पेशली उमर रज़ अल्लाह ताला अनू को खालिद बिन वलीद के ये ऑर्डर्स अच्छे नहीं लगे। लायक है। हजरत अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनो ने खालिद बिन वलीद को फुल कॉन्फिडेंस के साथ सपोर्ट किया और उन्हें आगे बढ़ने का हुकुम दिया। इससे पहले अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनो ने मदीना में जब 11 फौजे बनाई थी। उनमें से एक फौज को इकमा बिन अबू जहल की लीडरशिप में मुसैलमा कजाब की तरफ रवाना किया था
और उन्हें क्लियर ऑर्डर्स दिए थे कि खालिद बिन वलीद के पहुंचने से पहले मुसैलमा पर हमला नहीं करना। लेकिन इकरमा रज़ अल्लाह ताला अनू ने खलीफा के ऑर्डर्स के खिलाफ जाकर मुसैलमा की फौज पर हमला कर दिया और बहुत बुरी तरह यह जंग हार गए। मुसलमा अरब के बागियों में सबसे ताकतवर बागी था। उसने इकरमा बिन अबू जहल की फौज को बिल्कुल क्रश कर दिया। जब मदीना में खलीफा अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनू को इसका पता चला। उन्हें बहुत गुस्सा आया और उन्होंने इकरमा रज़ अल्लाह ताला अनहु को यमामा से ओमान की तरफ रवाना
किया और उन 11 फौजों में से एक दूसरी फौज शराबील रज़ अल्लाह ताला अनहु की लीडरशिप में मुसैलमा की तरफ भेजा और उन्हें भी वही ऑर्डर्स दिए कि मुसैलमा की फौज पर हमला नहीं करना लेकिन शराबील रज़ अल्लाह ताला अनू ने भी मुसैलमा की फौज पर हमला कर दे और वो भी जंग हार गए। इससे मुसलमा की फौज की ताकत का अंदाजा लगाया क्योंकि मुसलमानों की दो फौजों को हराना कोई आसान काम नहीं था। नाउ जैसे ही खालिद बिन वलीद इन बाकी इलाकों को फतह करने से फारग हुए अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनू ने
उन्हें मैसेज भेजा कि अब फाइनली इट्स टाइम कि अरब के सबसे बड़े बागी मुसैलमा कजाब से एक फाइनल जंग लड़ी जाए जिसे यह नाम कजाब खुद रसूल्लाह सल्ला अलह वसल्लम ने दिया जिसका मतलब है सबसे बड़ा झूठा मुसलमानों की बाकी 10 फौजों ने यमन ओमान बहरेन और तबूक की छोटी-छोटी बगावतों को खत्म कर दिया और अब सारे यमामा में इस फाइनल जंग की तरफ देख रहे थे क्योंकि इसी इसी जंग ने अब पूरे अरब का एंड नॉट ओनली अरब आने वाली पूरी दुनिया का फ्यूचर डिसाइड करना था। क्योंकि अगर वो जंग मुसलमान हार जाते तो
आज दुनिया की हिस्ट्री बहुत डिफरेंट होती। अबू बकर रज़ ताला अनहु ने मदीना और उसके सराउंडिंग्स से एक और फौज खालिद बिन वलीद की मदद के लिए रवाना की और आखिर मुसलमानों की 13,000 फौज लेकर खालिद बिन वलीद रज़ अल्लाह ताला यमामा के मैदान पहुंचे। जहां सामने मुसैलमा कजाब की 400 की फौज उनका इंतजार कर रही थी। जंग यमामा इस्लाम की तारीख की सबसे बड़ी और सबसे इंपॉर्टेंट जंगों में से एक है। इवन कुरान जो दुनिया की सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली किताब है जो आज एक कंप्लीट किताब बुक की शक्ल में मौजूद है। उसका
क्रेडिट भी इसी जंग जंग यमामा को जाता है। खिलाफत अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अन को मिलने के बाद अरब के बहुत सारे कबीलों ने बगावत का ऐलान कर दिया। कुछ ने जकात देने से इंकार कर दिया और कुछ ने तो नबूवत का झूठा दावा कर दिया। जिनमें सबसे ताकतवर बागी और झूठा नबी मुसैलमा कजाब था। तो अबू बकर रज़ अल्लाह ताला ने अरब के सारे बागियों से लड़ने के लिए मुसलमानों की फौज को 11 हिस्सों में डिवाइड की। जिसके बाद खालिद बिन वलीद रज ताला इन बागियों को क्रश करते गए और आखिर सों को
खत्म करके यमामा मुसलैमा कजाब की फौज के पास पहुंचे। मुसलमानों की बाकी सारी फौजें अरब के सारे बगावतों को खत्म करके अब सिर्फ इसी यमामा की जंग की तरफ देख रहे थे। क्योंकि इसी जंग ने मुसलमानों का फ्यूचर डिसाइड करना था। खालिद बिन वलीद मुसलमानों की 13,000 फौज लेकर यमामा के मैदान पहुंचे। जहां सामने मुसलमा की 400 की फौज उनका इंतजार कर रही थी। जैसे ही जंग शुरू हुई मुसलमानों ने एक मिनट। यह मुसलमा आखिर था कौन? जिसने इतनी तेजी से और इतनी आसानी से अरब की सबसे बड़ी फौज [संगीत] 4000 की फौज जमा कर
ली थी। मुसैलमा का ताल्लुक नजद मतलब ईस्टर्न सऊदी अरेबिया के सबसे रिच खानदान से था और बचपन से ही उसने अपनी सारी एजुकेशन रोमन एंपायर के शहर डमास्कस दमशक के सबसे बड़े स्कॉलर्स के साथ हासिल की [संगीत] जिसके बाद वो वापस अपने कबीले बनू हनीफा आया जो उस वक्त अरब के सबसे स्ट्रांग कबीलों [संगीत] में से था और इवन आज भी यह कबीला अरब का सबसे स्ट्रांग कबीला है क्योंकि सारे सऊदी बादशाह अब्दुल अजीज से लेकर मोहम्मद बिन सलमान तक सबका ताल्लुक इसी बनु हनीफा कबीले से जब मुसलमा शाम से वापस अपने कबीले आया तो
बहुत जल्दी इसके कबीले वालों ने इसे अपने सरदारों में से एक बना दिया। क्योंकि यह ऐसे था कि आज कोई हार्वर्ड या ऑक्सफोर्ड [संगीत] से तालीम हासिल कर कर वापस अपने छोटे से गांव आए। मुसलमा अपने इल्म और टैलेंट्स की वजह से अपने कबीले में बहुत मशहूर हो गया। लेकिन जब मुसलमा नजद में अपने कबीले को लीड कर रहा था। [संगीत] उसी वक्त हिजाज में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मदीना में एक नई रियासत कायम कर चुके थे। और ऑलमोस्ट हर साल उनकी मक्का वालों के साथ जंग होती रहती थी। बदर, ओहद, खंदक। लेकिन आखिर सुलह
हुबिया के बाद मदीना की रियासत आहिस्ता-आहिस्ता बहुत स्ट्रांग होने [संगीत] लगी और कुछ ही साल बाद मुसलमानों ने मक्का को भी फतह कर लिया। जिसके बाद आहिस्ता-आहिस्ता पूरे अरब को समझ आने लगी कि मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ही अल्लाह के रसूल हैं। और अरब कबीले हर तरफ से इस्लाम कबूल करने के लिए मदीना आने लगे। [संगीत] यह सब देखकर बनू हनीफा कबीले के लोगों ने भी अपने सरदारों से डिमांड की कि वो भी जाकर मदीना में आप सल्लाहु अलैहि वसल्लम से मिले। जिसके बाद मुसलमा अपने दो सरदारों के साथ मदीना की तरफ रवाना हुआ। मदीना
पहुंचकर वह रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सामने हाजिर हुए [संगीत] और मुसलमा ने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से कहा कि हम सिर्फ और सिर्फ एक शर्त पर इस्लाम कबूल करेंगे कि आप अपने बाद हमें मतलब मुझे अपना जान नशीन खलीफा [संगीत] बनाएंगे। तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने वहां पड़ी एक खजूर की ठहनी उठाई और मुसलमा से कहा कि अगर तुम मुझसे [संगीत] यह इतनी छोटी चीज भी मांगोगे मैं तुम्हें नहीं दूंगा। मतलब तुम्हें खलीफा बनाने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। यह लोग मदीना से मायूस होकर वहां से रवाना हुए और वापस अपने
कबीले पहुंचकर उन्होंने सों को जमा किया और उन्हें कहा कि अल्लाह के नबी मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने साथ मुसलमा को भी अल्लाह का रसूल बना दिया है। कुछ लोग यह सुनकर बहुत खुश हुए लेकिन कुछ लोग फिर भी कंफ्यूजन में थे। जब मदीना में मुसलमानों को इस बात का पता चला। उन्होंने इसी बनू हनीफा में से एक बंदे [संगीत] को इनकी तरफ रवाना किया ताकि वो जाकर इन्हें हकीकत बता सके। जैसे ही वो शख्स अपने कबीले के दरमियान पहुंचा। उसने कहा कि मुझे अल्लाह के रसूल मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने भेजा है। जिसके
बाद सारे लोग इसके गिर्द जमा हो गए और इसकी बात गौर से सुनने लगे। उसने कहा कि मुझे मदीना से इसलिए भेजा गया ताकि मैं तुम सबको यह बता सकूं कि यह जो मुसलमा है और यह जो कुछ भी कह रहा है बिल्कुल सच कह रहा है और यही मुसलमा अल्लाह के रसूल है। जिस पर इस कबीले के लोगों को यह बात कंफर्म हो गई और वह सारे मुसलमा को अपना पैगंबर मानने लगे। इससे पहले कि लोगों को इनकी हकीकत का पता चले। मुसलमा ने इस्लाम की बहुत इंपॉर्टेंट चीजों को खत्म कर दिया। मतलब शराब
को हलाल कर दिया और फ़हाशी को बिल्कुल जायज़ कर दिया। और फजर और ईशा की नमाज़ खत्म करके नमाज़ें पांच के बजाय तीन कर दी और रमजान के महीने के रोज़ भी खत्म कर दिए और गवाहों के बगैर निकाह को जायज़ कर दिए। एंड नॉट ओनली दैट कुरान की आयात को चेंज करके एक नई किताब बनाना शुरू की। लोगों ने जब मुसलमा के इस आसान रिलजन को देखा और फिर इस्लाम के सात रूल्स देखे तो वो इस्लाम को बिल्कुल छोड़कर मुसलमा की तरफ आने लगे। और आहिस्ता-आहिस्ता मुसलमा का रिलजन हर तरफ फैलने लगा। अब यहां
क्वेश्चन यह है कि रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने तो बहुत मुश्किल से इस्लाम को [संगीत] फैलाया था। तो मुसलमा कैसे इतने आसानी से ग्रो कर रहा था? असल में जब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मक्का में थे तो मक्का के सरदारों ने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को यह ऑप्शन दिया था कि अगर आप हमारे खुदाओं को खुदा माने तो हम भी आपके खुदा को मान लेंगे और आपको अपना लीडर बादशाह [संगीत] बना देंगे। जिस पर आप सल्ला अलह वसल्लम ने फरमाया था कि अगर मेरे एक हाथ पर सूरज और दूसरे हाथ पर चांद भी रख दो
तब भी मैं तुम्हारे खुदाओं को एक्सेप्ट नहीं करूंगा। जिसके बाद मक्का वालों ने मुसलमानों पर बहुत सख्त जुल्म शुरू किए। लेकिन मुसलमा इसके बिल्कुल ऑोजिट गया और अरब के हर कबीले के खुदाओं को एक्सेप्ट करने लगा [संगीत] और अरब के सारे उल्टे-पुलटे रिवाजों को भी एक्सेप्ट करने लगा। जिसकी वजह से यह कबीले भी मुसलमा को बहुत आसानी से कबूल करने लगे। और इस तरह मुसलमा बगैर किसी स्ट्रगल के आगे बढ़ने लगा। और फिर आखिर एक दिन मुसैलमा ने आप सल्लल्लाह वसल्लम की तरफ एक खत भेजा जिसमें उसने कहा मुसैलमा अल्लाह के रसूल की तरफ से
मोहम्मद अल्लाह के रसूल की तरफ अब हम इस काम में एक दूसरे के साथ शरीक हैं। आधी दुनिया आपकी और आधी दुनिया मेरी। जिसके बाद आप सल्ला अलह वसल्लम ने उन्हें जवाब दिया कि मोहम्मद अल्लाह के रसूल की तरफ से मुसलमा कजाब की तरह मतलब मुसलमा बहुत बड़े झूठे की तरफ मुसलमा ने अपने लेटर में कहा था कि आधी दुनिया आपकी और आधी दुनिया मेरी जिस पर आप सल्ला अलैहि वसल्लम ने उन्हें जवाब दिया कि दुनिया ना मेरी है ना तुम्हारी है बल्कि सारी दुनिया सिर्फ अल्लाह की है और वो जिसे चाहे उसे ही देता
है। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की जिंदगी में तो मुसलमा की इतनी जुर्रत कभी भी नहीं हुई कि वो बगावत का ऐलान कर सके। लेकिन आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की वफात के फौरन बाद मुसलमा ने अबू बकर रज़ ताला अनहु की खिलाफत से बगावत का ऐलान कर दिया। जिसके बाद अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनहु ने मुसलमानों की 11 फौजे बनाई। जिनमें से एक को उन्होंने मुसलमा की तरफ भेजा और उन्हें क्लियर ऑर्डर्स दिए कि सिर्फ मुसलमा की फौज को रोकना है। उन पर हमला नहीं करना। लेकिन उस फौज के कमांडर इकरमा रज़ अल्लाह ताला अनू
ने मुसलमा पर हमला कर दी और वो जंग हार गए। जिसके बाद अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनू ने मुसलमा की तरफ एक दूसरी फौज भेजी और उन्हें भी वही ऑर्डर्स दिए कि मुसलमा पर हमला नहीं करना। लेकिन उस फ़ौज ने भी मुसलमा पर हमला कर दिया और वह भी जंग हार गए। तो अब फाइनली अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनू ने खालिद बिन वलीद को हुकुम भेजा कि वो अपनी सारी फौज लेकर मुसलमा कस्जाब से लड़ने के लिए जाए और वंस एंड फॉर ऑल मुसलमा को खत्म कर दे। खालिद बिन वलीद मुसलमानों की 13,000
फौज लेकर मुसलमा कजाब के पास यमामा पहुंचे। जहां उनकी 4ज़ की फौज सामने खड़ी थी। पहले मुसलमा की फौज से लोगों ने सामने आकर मुसलमानों को चैलेंज किया। जिस पर हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनहु के भाई ज़द बिन खत्ताब रज़ अल्लाह ताला अन और बाकी सहाबा ने उन्हें खत्म कर दिया और इसी के साथ दोनों फौजों ने एक दूसरे पर हमला कर दिया। पहले तो दोनों फौजों की लड़ाई बहुत सख्त थी लेकिन मुसलमा की फौज बहुत ज्यादा होने की वजह से आहिस्ता-आहिस्ता बहुत सारे मुसलमान शहीद होने लगे और मुसलमानों की फौज पीछे होने लगी
और आखिर मुसलमानों की फौज को पीछे धकेलते हुए मुसैलमा की फौज इतने आगे आ गई कि वो मुसलमानों के कैंप्स तक पहुंच गए। जहां मुसलमानों की औरतें इवन खालिद बिन वलीद की बीवी भी इन्हीं कैंप्स में थी। ऐसा लग रहा था कि क्लियरली मुसलमान अब जंग छोड़कर भाग जाएंगे और मुसलमा यह जंग जीत जाएगा। खालिद बिन वलीद रज अल्लाह ताला अनू को इस बात का पता था कि अगर आज यह जंग मुसलमान हार गए तो मुसलमा की ये फौज सीधा मदीना पर हमला करेगी। अब जब और कोई भी ऑप्शन नहीं था। खालिद बिन वलीद, ज़द
बिन खताब और कुछ और सहाबा मुसलमानों की फौज को छोड़कर दुश्मनों की तरफ बढ़ने लगे। और आहिस्ता-आहिस्ता बहुत सारे दुश्मनों को क्रश करने लगे। मुसलमानों की फौज ने जब अपने लीडर खालिद बिन वलीद और कुछ बाकी सहाबा की बहादुरी देखी तो उनका हौसला भी बढ़ने लगा और वह आहिस्ता-आहिस्ता जंग में वापस आने लगे और कुछ ही देर में मुसलमानों की सारी फौज ने मुसैलमा की फौज पर इतना सख्त हमला किया कि वो जंग छोड़कर पीछे भागने लगे और भाग-भाग कर आखिर एक बाग पहुंचे जो चारों तरफ से दीवारों में कवर्ड था। वहां मुसैलमा और उसकी
सारी फौज ने दरवाजे बंद करके अपने आप को सिक्योर कर लिया। इस जंग को जंग यमा को लोग हमेशा जंग हुनैन के साथ कंपेयर करते हैं कि जब मुसलमानों की फौज जंग हुनैन में जंग से आहिस्ता-आहिस्ता पीछे हट रही थी तो रसूल्लाह सल्ला वसल्लम मुसलमानों को छोड़कर अकेले दुश्मनों की तरफ बढ़े थे और उस दिन लीडरशिप की अज़ीम मिसाल कायम की थी। हुसैमा की फौज जब अब किले के अंदर सिक्योर थी तो बहुत कोशिश के बाद भी मुसलमान अंदर नहीं घुस सकते थे। तो आखिर एक साहबी बर्रा बिन मालिक ने यह ऑफर दी कि मुझे
किसी तरह मुसलमान दीवार के उस तरफ फेंक दे तो मैं जाकर मुसलमानों के लिए दरवाजा खोल दूंगा। लेकिन खालिद बिन वलीद और बाकी सारे मुसलमानों ने यह करने से बिल्कुल इंकार कर दिया क्योंकि यह बिल्कुल खुदकशी थी। लेकिन बर्रा बिन मालिक के बहुत ज्यादा इसरार करने पर मुसलमानों ने किसी तरह उन्हें दीवार की दूसरी साइड पर पहुंचा दिया और उन्होंने बहुत बहादुरी से आखिर दरवाजा खोल दिया। जिसके बाद मुसलमान अंदर दाखिल हुए और बहुत तेजी से मुसलमा की फौज को क्रश करने लगे। यह सब देखकर मुसलमा भी जंग से भागने लगा। लेकिन मुसलमानों की फौज
में एक सबबी ऐसे था जो इस जंग में सिर्फ इसलिए आया था कि [संगीत] वह किसी तरह मुसलमा को मार सके। हजरत वाशी रज़ अल्लाह ताला क्योंकि इससे बहुत साल पहले जंग ओहद में हजरत अबू सुफियान रज़ अल्लाह ताला अनू की बीवी हिंदा के कहने पर वाशी ने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के चाचा हजरत हमजा को शहीद कर दिया था। [संगीत] लेकिन इस इतने सख्त दुख के बाद भी आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मक्का फतह करने के बाद [संगीत] वाशी को माफ कर दिया। लेकिन उन्हें यह कहा कि कभी मेरे सामने मत आना। तो अब
वाशी अपने ऊपर से इस दाख को खत्म करने के लिए इस्लाम के [संगीत] सबसे बड़े दुश्मन मुसैलमा को खत्म करना चाहता था। तो जब मुसलमानों की बाकी फौज जंग में बिजी थी वाशी सबको छोड़कर सिर्फ और सिर्फ मुसलमा के पीछे जा रहा था। तो जब उन्होंने देखा कि मुसैलमा जंग छोड़कर भाग रहा है तो उन्होंने अपना वही मशहूर नेजा उठाया और दूर से उसे मुसैलमा पर फेंक दिया और इस तरह [संगीत] मुसलमा मर गए और इस तरह नजद का यह सारा इलाका दोबारा फतह हो गया। मुसलमानों की बाकी फौजों ने भी सारी बगावतों को क्रश
कर दिया। मदीना में खलीफा अबू बकर रज ताला अनू एक बार फिर पूरे अरब के खलीफा बन गए और [संगीत] पूरे अरब को समझ आ गई कि आप सल्लल्लाहु अल वसल्लम के बाद इस्लाम खत्म नहीं हुआ। जब मुसलमानों की इस अजीम फतह की खबर मदीना [संगीत] पहुंची तो वहां के लोग बहुत खुश हुए। लेकिन जब हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनू ने देखा कि इस जंग में 700 सहाबी ऐसे शहीद हुए जो हाफिज कुरान थे तो उन्होंने सोचा कि अगर आहिस्ता-आहिस्ता ऐसे ही हाफिज कुरान शहीद होते गए कि एक दिन कहीं ऐसा ना हो कि
मुसलमान [संगीत] कुरान के सीक्वेंस के बारे में भी इख्तलाफ में पड़ जाए और बहुत सारे फिरकों में डिवाइड हो जाए क्योंकि उस वक्त कुरान छोटे-छोटे हिस्सों में [संगीत] कहीं-कहीं पर लिखा हुआ था और ऐसे कंप्लीट जिस तरह आज हम पढ़ते हैं इस तरह मौजूद नहीं था। तो उन्होंने जाकर अबू बकर रज अल्लाह ताला अनो को कन्विंस किया कि हमें कुरान को सही सीक्वेंस के साथ लिखना चाहिए ताकि मुसलमान कुरान की वजह से फिरकों में ना बट सके और इस तरह अबू बकर रज ताला ने कुरान को सही सीक्वेंस के साथ एक किताब की शक्ल में
लिखने का हुक्म दिया। रसूल्लाह सल्ला वसल्लम की वफात के कुछ ही अरसे बाद ऑलमोस्ट पूरे अरब ने पहले खलीफा अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनहु के खिलाफ बगावत का ऐलान कर दिया। लेकिन अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनू ने बहुत तेजी से इन सारी बगावतों को अपने जनरल खालिद बिन वलीद की लीडरशिप में क्रश कर दिया। नाउ एक बार फिर पूरा अरब मदीना की गवर्नमेंट के अंडर बिल्कुल यूनाइट हो चुका था। अब यहां से स्टोरी थोड़ी मुश्किल [संगीत] होने वाली है। इस्लाम सिर्फ अरब का नहीं बल्कि एक ग्लोबल रिलजन बनने की तरफ जा रहा है।
और मुसलमान दुनिया की सबसे बड़ी सुपर पावर बनने वाले हैं। तो अबू बकर रज अल्लाह ताला अनू की सारी बगावतों को क्रश करने के बाद पूरा अरब अब उनके कंट्रोल में था। लेकिन अरब फिर भी एक डेजर्ट था और बहुत ही गरीब इलाका था और पूरा अरब यूनाइट होने के बाद भी एक सुपर पावर नहीं बन सका। असल सुपर पावर अरब से बाहर रोमन और परर्शियन अंपायर थे। ये दोनों एंपायर्स दुनिया की बहुत बड़ी और बहुत पुरानी एंपायर्स थी। इस्लाम के पहले दिनों से जब मुसलमान बहुत कमजोर थे। रसूल्लाह सल्ला वसल्लम बार-बार उन सख्त हालात
में भी फरमाते थे कि एक दिन हम रोमन और परियन एंपायर को फतह करेंगे। जिस पर मक्का के लोग इनका हमेशा बहुत मजाक उड़ाते थे। लेकिन अब सिर्फ कुछ ही साल बाद मदीना की रियासत इन दोनों सुपर पावर्स से टकराने वाली थी। और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इस बात को पूरा करने के लिए अल्लाह ने पहले से प्लानिंग की हुई थी। मतलब जब मुसलमान हिजरत के बाद मदीना में आहिस्ता-आहिस्ता सेटल हो रहे थे। उसी टाइम रोमन और परर्शियन एंपायर आपस में बहुत सख्त लड़ाई चल रही थी। जिसे हम इस वीडियो में एक्सप्लेन कर चुके
हैं। इन दोनों एंपायर्स की आपस में इतनी सख्त लड़ाई हुई थी कि अब ये दोनों एंपायर्स पहले जैसी स्ट्रांग नहीं रही थी और आपस में लड़-लड़ कर दोनों सुपर पावर्स बहुत कमजोर हो चुकी थी। जिसकी वजह से यह मुसलमानों के पास बेस्ट टाइम था कि इन दोनों सुपर पावर्स को वंस एंड फॉर ऑल खत्म कर दिया जाए। क्योंकि ये दोनों एंपायर्स इस्लाम के लिए सबसे बड़ा खतरा थे। फॉर एग्जांपल रोमन एंपायर के बादशाह हरेकलियस उन्होंने जंग मुता और जंग तबूक पे मुसलमानों को खत्म करने की कोशिश भी की। लेकिन फिर भी अबू बकर रज़ अल्लाह
ताला अनू ने पहला हमला रोमन एंपायर पर नहीं बल्कि परर्शियन एंपायर पर किया। इससे कुछ साल पहले रसूल्लाह ससल्लम ने दुनिया के सारे बादशाहओं की तरफ लेटर्स भेजे थे और उन्हें इस्लाम की तरफ आने का हुकुम दिया था। जिसका सबसे बुरा रिस्पांस परशियन बादशाह खुसरो ने दिया था और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के भेजे हुए लेटर को बहुत गुरूर के साथ फाड़ दिया था। जिसके बाद परर्शियन एंपायर और मुसलमानों के दरमियान हमेशा एक कोल्ड वॉर चलती रहती थी। और परर्शियन एंपायर बार-बार मुसलमानों की गवर्नमेंट को थ्रेट्स भी भेजती थी। लेकिन आप सल्लल्लाहु अलह वसल्लम के
लेटर को फाड़ने के बाद उसी पर बादशाह खुसरो के बेटे ने उसे कत्ल करके खुद पूरे ईरान का बादशाह बन गया। लेकिन कुछ ही अरसे बाद उस बेटे के आर्मी चीफ ने उसे तख्त से हटा दिया और खुद बादशाह बन गया। फिर बाकियों ने मिलकर उसे भी तख्त से हटा दिया और एक औरत को मलका बनाया। फिर उसे भी हटा दिया गया और उसकी जगह किसी दूसरे को लाया गया। फिर उसे भी हटा दिया गया। मतलब बिल्कुल थोड़े से अरसे में ईरान के 10 बादशाह बदले गए। इस सब की वजह से ईरान की [संगीत] गवर्नमेंट
बाकी दोनों के मुकाबले में बहुत कमजोर हो चुकी थी। जिस तरह अगर आज हमारे मुल्क को देखा जाए, तो पिछले कुछ ही सालों में पाकिस्तान में सात आठ प्राइम मिनिस्टर्स को थोड़े-थोड़े अरसे के बाद बदला गया है। और इन द सेम टाइम इंडिया और बांग्लादेश में एक ही लीडर रहा है। जिसकी वजह से पाकिस्तान इन दोनों कंट्रीज से बहुत पीछे रह चुका है। उसी तरह पर एंपायर भी अपने लीडर्स के बार-बार चेंज होने की वजह से बहुत कमजोर हो चुका था। और इस बात का मुसलमानों के लीडर अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनू को बहुत
अच्छी तरह पता था। इसीलिए बगैर कोई टाइम वेस्ट किए उन्होंने [संगीत] दो बड़े फैसले किए कि परर्शियन एंपायर पर हमला करने वाली फौज में सिर्फ और सिर्फ वो मुसलमान होंगे [संगीत] जो खुद इस जिहाद के लिए वंटियर करें और जो ना लड़ना चाहे वो ना [संगीत] लड़ें। दूसरा फैसला यह कि उन्होंने अपने बेस्ट जनरल खालिद बिन वलीद को लेटर भेजा कि जंग यमा में मुसैलमा को हराने के बाद [संगीत] वापस मदीना नहीं बल्कि अपनी फौज को लेकर परशियन एंपायर की तरफ जाओ। तो खालिद बिन वलीद 18,000 मुसलमानों को लेकर परशियन एंपायर ईरान की तरफ रवाना
हुए। ईरान उस जमाने में बहुत बड़ा था। खालिद बिन वलीद जिस इलाके को फतह करने के लिए गए उसे आज के जमाने में कुवैत कहा जाता है। जहां बहुत सारे पर्शियंस और अरबी दोनों आबाद थे। जाने से पहले खालिद बिन वलीद ने परर्शियन जनरल को लेटर [संगीत] लिखा कि या तो इस्लाम कबूल कर लो और या जिया देने के लिए तैयार हो जाओ वरना उसके बाद जो होगा उसके जिम्मेदार तुम खुद होगे क्योंकि मैं तुम्हारी तरफ ऐसे मर्दों को [संगीत] लेके आ रहा हूं जो मौत शहादत से इतनी ही मोहब्बत करते हैं [संगीत] जितनी तुम
सारे अपनी जिंदगी से करते हो लेकिन ऑफ कोर्स उन्होंने बात नहीं मानी जिसके बाद खालिद बिन वलीद ईरान के प्रोविंस कुवैत में दाखिल हुए। कुवैत के गवर्नर ने अपने बादशाह परर्शियन एपरर से मदद मांगी। लेकिन ईरान के बादशाह ने सोचा कि अरबों की इतनी औकात नहीं है कि वह द ग्रेट परर्शियन एंपायर से लड़ सके। तो उन्होंने मुसलमानों की फौज को इतनी अहमियत नहीं दी और अपने गवर्नर की एक्स्ट्रा फौज के साथ मदद नहीं की। सुपर पावर परर्शियन एंपायर के बादशाह ने मुसलमानों को उसी तरह लाइटली लिया जिस तरह नाइन 11 के बाद सुपर पावर
अमेरिका ने अफगानिस्तान को लिया था। और 20 साल जंग के बाद भी बहुत बुरी तरह हार गए ईरान कोई छोटी सी अंपायर नहीं थी बल्कि पिछले हजारों साल से दुनिया की सबसे बड़ी सुपर पावर्स में से एक थी जिसकी लड़ाई हमेशा वेस्ट में रोमन अंपायर के साथ होती रहती थी और अरब की पिछले हजारों साल से कभी भी इतनी हिम्मत नहीं हुई थी कि वो परर्शियन अंपायर के सामने सर उठा सके क्योंकि इस्लाम से पहले अरब कभी यूनाइट [संगीत] हुआ ही नहीं था। ईरान के बादशाह की इस गलती से मुसलमानों को बहुत ज्यादा फायदा हुआ
और 18,000 मुसलमान फुल स्पीड कुवैत के पहले शहर कजीमा की [संगीत] तरफ रवाना हुए। यह देखकर कुवैत का गवर्नर भी अपनी 30 या 400 की फौज लेकर उसी शहर की तरफ रवाना हुआ जहां मुसलमान जा रहे थे। लेकिन जैसे ही उनकी सारी फौज वहां पहुंची। उन्होंने देखा कि मुसलमान इस सिटी नहीं बल्कि एक दूसरी सिटी हुफैर पहुंच चुके हैं। तो कुवैत का गवर्नर भी वापस उसी सिटी की तरफ जाने लगा। जैसे ही उनकी फौज वापस हुफैर पहुंची खालिद बिन वलीद मुसलमानों को लेकर वापस पहली सिटी कज़मा की तरफ चले गए और वहां पहुंचकर सारे आराम
करने लगे। तो वो दोबारा अपनी सारी फौज लेकर वापस कज़मा की तरफ चला गया। लेकिन जैसे ही उसकी फौज बिल्कुल थक हार कर कज़मा पहुंची। उन्होंने देखा कि सामने मुसलमानों की सारी फौज बिल्कुल रेडी उनका इंतजार कर रही है। जिसकी वजह से इस फौज को रेस्ट करने का कोई टाइम नहीं मिला। यह सब खालिद बिन वलीद की जबरदस्त प्लानिंग थी कि परर्शियन फौज को जंग से पहले ही इतना थका दिया जाए कि वो जंग के दिन लड़ने के काबिल ही ना रहे। नाउ मुसलमानों की फौज और परर्शियन एंपायर की फौज में बहुत बड़ा [संगीत] डिफरेंस
था। क्योंकि परर्शियन एंपायर एक सुपर पावर थी और उनकी आर्मी को दुनिया की बेस्ट आर्मी समझा जाता था। लेकिन इतनी प्रोफेशनल फौज होने की वजह से इनका बॉडी आर्मर और [संगीत] सामान हमेशा बहुत ज्यादा और बहुत भारी होता था। जिसकी वजह से उनकी फौज को एक जगह से दूसरे जगह जाने में बहुत मुश्किल होती थी। जिसके मुकाबले में अरब फौज कोई फौज नहीं बल्कि बस आम मुसलमान थे और इनका आर्मर और सामान बहुत सिंपल और हल्का होता था। जिसकी वजह से इनकी स्पीड बाकी फौजों से बहुत तेज होती थी। इस बात का खालिद बिन वलीद
को बहुत अच्छी तरह पता था कि अगर हमें परर्शियन एंपायर से जितनात है तो नंबर्स और ताकत से तो हम कभी भी [संगीत] इनका मुकाबला नहीं कर सकते। हमें सिर्फ अपनी स्पीड यूज करनी पड़ेगी और इसी स्पीड को यूज करते हुए उन्होंने बहुत तेजी से रोमन और परर्शियन एंपायर जैसे सुपर पावर्स को गिरा दिया था। जिसे हम पूरा एक्सप्लेन [संगीत] करेंगे तो सब्सक्राइब। आखिर परर्शियन फौज और मुसलमानों की फौज तारीख में पहली दफा आमने-सामने हुई। सबसे पहले ईरान के जनरल अपनी फौज से आगे बढ़े और मुसलमानों के जनरल खालिद बिन वलीद को अकेले लड़ने का
चैलेंज दिया। जिस पर परशिया के आदमी जोर-जोर से नारे लगाने लगे। लेकिन उन सों ने देखा कि मुसलमानों की फौज से ऑलमोस्ट 7 फुट का आदमी तलवार लेकर उनकी तरफ बढ़ रहा है। क्योंकि बॉडी के लिहाज से खालिद बिन वलीद को हजरत उमर का ट्विन समझा जाता है। मतलब कहा जाता है कि जब वो घोड़े पर बैठते थे तो उनके पैर ऑलमोस्ट जमीन को टच कर रहे होते थे और हजारों लोगों के क्राउड अपनी हाइट की वजह से आसानी से दिख जाते थे। खालिद बिन वलीद रज अल्लाह ताला उस परर्शियन जनरल से लड़ने गए। लेकिन
परर्शियन फौज से अचानक दो लोग आकर अपने जनरल के साथ मिल गए। लेकिन फिर भी खालिद बिन वलीद ने सिर्फ एक और मुसलमान की मदद [संगीत] के साथ इन तीनों को खत्म कर दिया। और इसी के साथ दोनों फौजों ने हमला कर दिया। पहले जंग थोड़ी सख्त हुई लेकिन परर्शियन आर्मी बगैर किसी जनरल के लड़ रही थी और सामने मुसलमान इंसानों की तारीख के सबसे बड़े जनरल्स में से एक खालिद बिन वलीद की लीडरशिप में लड़ रहे थे। जिसके बाद मुसलमानों ने उन्हें क्रश कर दिया और यह सारा इलाका फतह कर लिया। परर्शियन बादशाह ने
मुसलमानों की तरफ एक और फौज भी भेजी। खालिद [संगीत] बिन वलीद और मुसलमानों ने उन्हें भी खत्म कर दिया। और इस तरह ईरान का बहुत इंपॉर्टेंट प्रोविंस कुवैत अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनो के कंट्रोल में आया। और पहली बार इस्लाम अरब से निकल कर एक ग्लोबल रिलजन की तरफ जाने लगा। आज दुनिया में 2 बिलियन मुसलमान है और कहा जाता है कि दुनिया में ऐसा [संगीत] एक सेकंड भी नहीं गुजरता कि कहीं ना कहीं दुनिया के किसी कोने में अजान ना दी जा रही हो। लेकिन आखिर इस्लाम इतना बड़ा रिलजन बना कैसे? यह हम
सबके लिए समझना बहुत इंपॉर्टेंट है। खालिद बिन वलीद को दुनिया का सबसे ग्रेटेस्ट जनरल समझा जाता है। नेपोलियन, [संगीत] एलेग्जेंडर द ग्रेट और जूलियस सीज़र। जिंदगी में कभी ना कभी कोई ना कोई जंग जरूर हार चुके हैं। लेकिन खालिद बिन वलीद दुनिया के वाहिद जनरल है जो अपनी पूरी जिंदगी में कोई भी जंग नहीं हारे। और यह सिर्फ मुसलमान नहीं बल्कि पूरी दुनिया मानती है। और जंग के दौरान खालिद बिन वलीद की स्ट्रेटजीस और प्लानिंग को आज भी ऑक्सफोर्ड और हार्व जैसी यूनिवर्सिटीज में पढ़ाया जाता है। लेकिन खालिद बिन वलीद के जंगों में आखिर ऐसी
क्या खास बात कि आज 14400 साल बाद भी पूरी दुनिया उन्हें याद करती है। लेट्स फाइंड आउट। [संगीत] मुसलमानों के खलीफा अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनहु के हुकुम पर खालिद बिन वलीद ने द ग्रेट परर्शियन एंपायर पर हमला कर दिया और सिर्फ 18,000 मुसलमानों के साथ [संगीत] 4000 की परर्शियन फौज को बहुत आसानी से क्रश कर दिया। इस जीत के बाद मुसलमान पहली दफा अरब से बाहर निकल कर एक ग्लोबल पावर बनने की तरफ जाने लगे। [संगीत] क्योंकि अब मुसलमानों ने अरब से बाहर परर्शियन एंपायर के बहुत इंपॉर्टेंट प्रोविंस कुवैत को फतह कर लिया
था। जैसे ही ईरान के बादशाह को पता चला [संगीत] कि मुसलमानों ने उनकी फौज को बहुत आसानी से हरा दिया है तो उन्होंने एक नई [संगीत] 40 हजार की फौज खालिद बिन वलीद की तरफ रवाना की। लेकिन खालिद बिन वलीद ने कुवैत फतह करते ही डायरेक्टली [संगीत] अपने स्पाइस जासूसों को पूरे इलाके में फैला दिया था ताकि हर खतरे का उन्हें [संगीत] पहले से पता चल जाए। यह स्पाइस हर तरफ फैल गए। और बहुत दूर जाकर उन्होंने देखा [संगीत] कि परर्शियन एंपायर की 400 की फौज बहुत तेजी से मुसलमानों की तरफ बढ़ रही है। तो
[संगीत] खालिद बिन वलीद अपनी सारी फौज लेकर उसी फौज की तरफ कुवैत से बाहर उबुल्ला की तरफ जाने लगे। उबुल्ला कुवैत से बाहर एक इलाके में है [संगीत] जिसे आज के जमाने में इराक कहा जाता है। नाउ एक तरफ मुसलमानों की 17,000 [संगीत] की फौज खड़ी थी और दूसरी तरफ परर्शियन एंपायर की 400 की फौज थी। परर्शियन जनरल सामने आया और [संगीत] खालिद बिन वलीद को चैलेंज किया। लेकिन मुसलमानों की फौज से एक आम सिपाही ने जाकर उसे खत्म कर दिया। अगेन [संगीत] एक बार फिर परर्शिया की फौज का जनरल जंग से पहले ही मारा
गया। जिसके बाद दोनों फौजों ने एक दूसरे पर फुल फ्लेज हमला कर दिया और बहुत सख्त जंग शुरू हुई। लेकिन परर्शियन फौज बहुत ज्यादा होने की वजह [संगीत] से आहिस्ता-आहिस्ता बहुत सारे मुसलमान शहीद होने लगे। जिसकी वजह से पहली बार खालिद बिन वलीद ने मजबूरन मुसलमानों को जंग से पीछे हटने का हुकुम दिया [संगीत] और ऐसा लगने लगा कि मुसलमान फाइनली जंग छोड़कर भाग रहे हैं। यह देखकर परशियन फौज जीत की खुशी में बहुत तेजी से मुसलमानों का पीछा करने लगी। परर्शियन फौज मुसलमानों के पीछे इतनी तेजी से आई कि इनके फौज के दो लाइक्स
एक दूसरे से बहुत दूर हो गए। एंड इफ यू लुक क्लोजली मुसलमान बिल्कुल सीधी लाइन में पीछे नहीं आ रहे। बल्कि एक दूसरे से दूर जा रहे हैं। आखिर पर्शियन फौज मुसलमानों का पीछा करते-करते एक दूसरे से इतने दूर हो गए कि उनकी आर्मी एक नहीं बल्कि कई छोटे-छोटे ग्रुप्स में बट गए और उनकी फौज के दरमियान दो बड़े गैप्स बन गए। और इसी टाइम का खालिद बिन वलीद इंतजार कर रहे थे। एंड नाउ अचानक खालिद बिन वलीद अपने घुड़सवारों को लेकर इन दो गैप्स से आगे बढ़े और परर्शियन फौज के सेंटर को घेर लिया
और आहिस्ता-आहिस्ता उन्हें क्रश करने लगे। और फिर इसी तरह बाकी फौज को भी क्रश कर दिया। परर्शियन फौज की पिछली लाइन ने देखा कि वो यह जंग हार चुके हैं तो वह जंग छोड़कर भागने लगे। लेकिन एज वी नो उनका आर्मर हमेशा बहुत भारी होता था। तो ज्यादा दूर जाने से पहले ही मुसलमान उन तक पहुंच गए और उन्हें भी खत्म कर दी। और इस तरह पर एंपायर की एक और बहुत बड़ी [संगीत] फौज खालिद बिन वलीद ने क्रश कर दी। यह जंग कुवैत से बाहर इराक के अंदर हुई। मतलब अब मुसलमान कुवैत को फतह
करने के बाद ईरान के दूसरे बड़े [संगीत] प्रोविंस इराक में एंटर हो चुके थे। अब यहां से आगे बढ़ना थोड़ा मुश्किल था क्योंकि इराक और मदीना एक दूसरे से बहुत दूर थे और इराक में मुसलमानों की फौज को अपने हेड क्वार्टर मदीना से बार-बार कम्युनिकेट करने में बहुत मुश्किल हो रही थी। इसीलिए यहां से आगे बढ़ने से पहले खालिद बिन वलीद ने इसी इलाके को अपना नया हेड क्वार्टर बनाया। क्योंकि इस इलाके में पर्शियंस और अरब दोनों आबाद थे और इन सब का ख्याल था कि मुसलमान इन्हें फतह करने के बाद इनके साथ वही करेंगे
जो अब तक दुनिया की बाकी सारी एंपायर्स करती है। मतलब लूट, प्लंडर, रेप, लेग। खालिद बिन वलीद ने अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनू के हुकुम पर इस इलाके की सारी प्रॉपर्टीज उन्हीं लोगों को वापस कर दी। और किसी से भी जबरदस्ती कोई भी चीज नहीं छीनी। और बहुत तेजी से इस इलाके में बहुत सारी अदालतें, कोर्ट्स बनाए और इन कोर्ट्स में जजेस बड़े-बड़े सहाबा को बनाए। जिसकी वजह से बहुत तेजी से इस इलाके में पहली बार जस्टिस इंसाफ कायम होने लगा। इसके बाद खालिद बिन वलीद उनके मार्केट्स और बिजनेस की तरफ आए और सबसे
कहा कि बिजनेस उसी तरह जारी रखो जिस तरह इससे पहले था। लेकिन आज के बाद यहां सूद कोई भी नहीं लेगा। जंग सिर्फ तलवारों से नहीं बल्कि इकॉनमी से भी लड़ी जाती है। इसीलिए खालिद बिन वलीद ने दोबारा अपनी फौज की इकॉनमी मजबूत करने के लिए इस इलाके के नॉन मुस्लिम्स पर जिजिया टैक्स लगाया। यह कोई नया टैक्स नहीं था बल्कि इससे पहले इसी इलाके से परर्शियन एंपायर भी टैक्स लिया करती थी। लेकिन खालिद बिन वलीद ने जो जिजिया टैक्स लगाया वो उस टैक्स से बहुत कम था जो इससे पहले ईरान लिया करता था। ये
सब देखकर वहां की लोकल आबादी ने सोचा कि ये तो मुसलमान परशियन एंपायर से बहुत अच्छे हैं। इसीलिए बहुत तेजी से इस इलाके के लोग इस्लाम की तरफ आने लगे और खालिद बिन वलीद की फौज में शामिल होने लगे। जिससे मुसलमानों की फौज दोबारा बढ़ने लगी और जिजिया और जकात टैक्स की वजह से मुसलमानों की फौज के पास पैसा भी आने लगा। मतलब आजकल लोगों का ख्याल है कि खालिद बिन वलीद सिर्फ जंग ही लड़ सकते थे। हालांकि खालिद बिन वलीद हमेशा जंग के साथ-साथ इन इलाकों के जस्टिस और इकॉनमी को भी इंप्रूव करते जाते
थे। नाउ मुसलमानों ने कुवैत के साथ-साथ इराक के साउथ को भी फतह कर लिया था जो परर्शियन एंपायर के लिए दूसरा बहुत बड़ा झटका था। जब पर्शियन बादशाह को एक बार फिर खबर मिली कि उनकी एक और फौज मुसलमानों से बुरी तरह हार चुकी है तो उन्होंने दोबारा अपनी एंपायर के नॉर्थ और ईस्ट से दो नई फौजें मुसलमानों की तरफ रवाना की और उन्हें इस जगह वलाजा में एक साथ मिलकर मुसलमानों को खत्म करने का हुक्म दिया। बट परर्जन बादशाह हर तरफ से फौज जमा कर रहे हैं सिवाय अपने वेस्टर्न बॉर्डर से। क्योंकि यह बॉर्डर
रोमन अंपायर के साथ टकराता था। और ईरान के बादशाह को यह टेंशन भी थी कि कहीं [संगीत] रोमन एंपायर इस सब का फायदा उठाकर परर्शियन एंपायर पर हमला ना कर दे। लेकिन रोमन एंपायर ने कभी भी हमला नहीं किया। क्योंकि कुछ ही अरसे बाद मुसलमानों ने रोमन एंपायर पर भी हमला कर दिया। जिसे हम इसी स्टोरी में एक्सप्लेन करेंगे। तो सब्सक्राइब खालिद बिन वलीद ने जिन इलाकों को फतह किया उनमें से बहुत सारे लोगों ने इस्लाम कबूल कर लिया। और अब वह सारे लोग मुसलमानों के लिए स्पाइस और जासूस बन चुके थे। जिसकी वजह से
मुसलमानों की इंटेलिजेंस एजेंसी और भी ज्यादा स्ट्रांग होने लगी। क्योंकि ये नए मुसलमान ईरान को अरबों से बहुत ज्यादा अच्छी तरह समझते थे। जिसकी वजह से खालिद बिन वलीद तक ये खबर बहुत तेजी से पहुंची कि [संगीत] दो बहुत बड़ी फौजे उनकी तरफ तेजी से बढ़ रही है। और खालिद बिन वलीद को इस बात का पता था कि अगर ये दो फौजें एक जगह पर यूनाइट हो [संगीत] गई तो इन्हें हराना इंपॉसिबल हो जाएगा। तो मुसलमानों ने इस सब को रोकने के लिए प्लानिंग शुरू कर दी। [संगीत] मुसलमानों ने देखा कि यह दो फ़ौजें जिस
इलाके से आ रही है वो इलाका बहुत ही ग्रीन और पहाड़ी इलाका है और यह [संगीत] लोग डेजर्ट के बिल्कुल भी आदि नहीं है। इसीलिए मुसलमान अगर डेजर्ट की तरफ से जाएंगे [संगीत] तो वो इनमें से एक फौज तक बहुत तेजी से पहुंच सकते हैं। तो खालिद बिन वलीद अपनी फौज लेकर फुल स्पीड इराक के डेजर्ट को क्रॉस करते हुए पहली फौज [संगीत] के पास वलाजा पहुंचे। मुसलमानों और परर्शियंस की पहली फौज वलाजा में आमने-सामने हुई। परशियन फौज का जनरल यह देखकर हैरान हो गया कि जितना उसे बताया गया था उससे तो मुसलमानों की फौज
बहुत ही कम है। मतलब मुसलमानों में ज्यादा पैदल सोल्जर्स हैं और घोड़े वाले तो बहुत ही कम है। जिसकी वजह से इस फौज में [संगीत] जीतने की काफी होप पैदा हुई। परर्शियन फौज से उनका चैंपियन सामने आया। जिसे उसकी बहुत बड़ी और स्ट्रांग बॉडी की वजह से पर्शियंस ने फारसी में एक बहुत मशहूर नाम दिया था। हजार मर्द जिसका उर्दू और हिंदी में मतलब है हजार मर्द खालिद बिन वलीद उस चैंपियन से लड़ने गए और कुछ ही टाइम में उसे मार दिया जिसके बाद दोनों फौजें जंग के लिए तैयार हुई लेकिन काफी टाइम गुजरने के
बाद भी ईरान की आर्मी अपनी जगह पर ही खड़ी रही क्योंकि वो ज्यादा से ज्यादा टाइम वेस्ट करना चाहते थे ताकि उनकी दूसरी फौज उनकी मदद के लिए पहुंच सके। लेकिन मुसलमानों का प्लान तो यह था कि उन्हें यूनाइट होने से पहले ही खत्म कर दिया जाए। इसीलिए मुसलमानों की फौज बहुत कम होने के बावजूद खालिद बिन वलीद ने उन्हें हमले का हुकुम दिया। मुसलमानों और पर्शियंस की एक बार फिर बहुत सख्त लड़ाई शुरू हुई और बहुत टाइम गुजरने के बाद भी बिल्कुल समझ नहीं आ रही थी कि कौन जंग जीत रहा है। लेकिन अचानक
पर्शियन जनरल ने अपनी फौज के लाइंस को बदला और नए फ्रेश लोगों को सामने कर दिया। अब इनसे दोबारा लड़ने की मुसलमानों के पास बिल्कुल ताकत नहीं थी। जिसकी वजह से दोबारा बहुत सारे मुसलमान आहिस्ता-आहिस्ता शहीद होने लगे। और ये [संगीत] सब देखकर आखिर खालिद बिन वलीद ने मुसलमानों को पीछे हटने का हुकुम दिया जिससे मुसलमान अगेन जंग से आहिस्ता-आहिस्ता पीछे हटने लगे। लेकिन आखिर इतना पीछे चले गए कि ये फौज बिल्कुल पहाड़ तक पहुंच गई। जहां से और पीछे जाना इंपॉसिबल था। और आखिर ईरान की पूरी फौज [संगीत] ने मुसलमानों पर हमला कर दिया।
लेक है। अगर आप गौर से इसे देखें तो मुसलमान अगेन एक स्ट्रेट लाइन में पीछे [संगीत] नहीं हट रहे बल्कि सिर्फ मुसलमानों का सेंटर पीछे हट रहा है और मुसलमानों की लेफ्ट और राइट बिल्कुल मजबूती से अपनी जगह पर खड़े हैं। जिससे आहिस्ता-आहिस्ता इस जंग में [संगीत] एक गोल सर्कल बन रहा है। जिसका अब तक पर्शियंस को बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था। जैसे ही सर्कल कंप्लीट होने लगा और पर्शियंस की सारी फौज इस सर्कल के अंदर एंटर हुई। खालिद बिन वलीद ने इशारा दिया और अचानक पर्शियन फौज के पीछे से 4000 हॉर्स में घुड़सवार फुल
स्पीड पर फौज के पीछे आने लगे। याद है ईरान के जनरल के जासूसों ने जितना उन्हें बताया था उससे मुसलमान बहुत कम थे। जिस पर वो बहुत खुश था। लेकिन असल में मुसलमान कभी कम थे ही नहीं। खालिद बिन वलीद ने जंग से पहले इन सों को परर्शियन फौज के पीछे खड़ा किया हुआ था। और बहुत देर से यह सब खालिद बिन वलीद के सिर्फ एक इशारे का इंतजार कर रहे थे। इसके बाद मुसलमानों ने पर्शियन फौज को हर तरफ से ऐसे घेर लिया कि कहा जाता है कि एक बंदा भी इस जंग से नहीं
भाग सकता। ये कोई पहली दफा नहीं है कि खालिद बिन वलीद ने ये टैक्टिक यूज़ किया। इससे पहले जंग ओहद में इसी तरीके से उन्होंने मुसलमानों को भी हराया था। जिसमें रसूल्लाह सल्ला वसल्लम ने सहाबा को क्लियरली ऑर्डर्स दिए कि इस पहाड़ से नहीं उतरना। लेकिन जीत की खुशी में जब वो पहाड़ से नीचे उतर गए। खालिद बिन वलीद ने पहाड़ के पीछे से हमला कर दिया और [संगीत] पूरे जंग को बिल्कुल बदल दिया और अब वही टैक्टिक उन्होंने परर्शियंस के खिलाफ भी यूज़ की। ईरान की इस फौज को हराने के बाद अब मुसलमान पर्शियन
एंपायर के बॉर्डर से निकल कर उनके सेंटर के करीब होने लगे। और इसके कुछ ही अरसे बाद अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनूह ने ईरान के साथ-साथ रोमन एंपायर पर भी हमले का हुकुम दिया। रोमन और परर्शियन एंपायर में मुसलमान इतनी तेजी से आगे बढ़ रहे थे कि इन दोनों अंपायर्स ने देखा कि अगर ऐसे ही चलता रहा तो बहुत जल्द हम दोनों सुपर पावर्स खत्म हो जाएंगे। तो [संगीत] इसीलिए उन्होंने तारीफ में पहली दफा रोमन और परर्शियन एंपायर अपनी 700 साल पुरानी दुश्मनी [संगीत] खत्म करके मुसलमानों के खिलाफ यूनाइट हो गए। अबू बकर रज़
अल्लाह ताला अनू की खिलाफत में मुसलमानों ने उनके जनरल खालिद बिन वलीद की लीडरशिप में परर्शियन एंपायर के बहुत ही इंपॉर्टेंट प्रोविंसेस को फतह कर लिया था। लेकिन परर्शियन एंपायर का बादशाह अब तक मुसलमानों को एक सीरियस थ्रेड नहीं समझ रहा था। लेकिन ईरान के सूबे कुवैत और इराक के साउथ [संगीत] को फतह करने के बाद अब खालिद बिन वलीद और परर्शियन एंपायर के कैपिटल ठसफोन के दरमियान इतना फासला नहीं था। मुसलमान परर्शियन एंपायर की पहली फौज को वलाजा में हराने के बाद परर्शियन एंपायर के इंपॉर्टेंट प्रोविंस इराक की सेंटर सिटी अलहरा की तरफ बहुत
तेजी से बढ़ने लगे। इसीलिए परशियन बादशाह ने दूसरी फौज को मुसलमानों को रोकने के लिए इसी सिटी की तरफ रवाना किया। और आखिर उलैस के मकाम पर यह दोनों आर्मीज़ एक दूसरे के सामने आए। और यहां जो जंग हुई वो वाहिद जंग है जिसके बारे में खालिद बिन वलीद ने फरमाया था कि मैंने जंग मुता में रोमन एंपायर के खिलाफ नौ तलवारें तोड़ी थी लेकिन मैंने जिंदगी में कभी भी उलैस के फौज जैसी कोई फौज नहीं देखी। खालिद बिन वलीद जंग से ज्यादा अपने दुश्मनों के माइंड और मोराल से लड़ते थे और दुश्मनों के मोराल
को तोड़ने के लिए हमेशा जंग से पहले ही उस फौज के जनरल [संगीत] को अकेले लड़ने का चैलेंज देते थे। और फिर उसे मारकर दुश्मनों की फौज का मोराल बिल्कुल तोड़ देते थे। और इस बात का परर्शियन फौज के जनरल को बहुत अच्छी तरह पता था। इसीलिए उन्होंने जंग से पहले ही रात को 12 लोग जमीन के अंदर मिट्टी में छुपा दिए। अगले दिन ऑफ कोर्स [संगीत] खालिद बिन वलीद ने उस जनरल को लड़ने का चैलेंज दिया। उनका जनरल अकेले फौज से इस साइड से आ गया है। और कहा वहां नहीं यहां लड़ेंगे। खालिद बिन
वलीद भी वहां गए और लड़ाई शुरू हुई। जैसे ही उन्होंने लड़ना शुरू किया अचानक जमीन से वही [संगीत] 12 लोग बाहर आए और खालिद बिन वलीद पर हमला कर दिया। 12 मैन जंप अप नाउ एक तरफ 13 लोग और दूसरी तरफ सिर्फ एक लेकिन सिर्फ एक और मुसलमान की मदद से वही हुआ जो होना था। खालिद बिन वलीद ने इन सों को खत्म कर दिया। एंड द टू मैन मर्डर द 13 [संगीत] पर आर्मी और एक बार फिर परर्शियन फौज का जनरल मारा गया और इसी के साथ दोनों फौजों ने एक दूसरे पर हमला कर
दिया और बहुत सख्त जंग के बाद आखिर परर्शियन फौज जंग छोड़कर भागने लगी और मुसलमानों ने उनकी इस फौज को भी क्रश कर दिया। इस जंग के बाद एक बहुत ही अजीब सा वाकया भी पेश आया कि परर्शियन फौज के एक जनरल जो अरेस्ट हो चुका था। उसने आकर खालिद बिन वलीद को बताया [संगीत] कि हमारे एंपायर परर्शियन एंपायर में यह बात बहुत मशहूर हो गई है कि एक दिन किसी जंग के दौरान आपकी तलवार टूटने के बाद अचानक आसमान [संगीत] से खुदा की तरफ से आपके लिए एक तलवार उतरी। इसीलिए आपको सैफुल्लाह अल्लाह की
तलवार कहा जाता है। जिस पर वहां खड़े सारे मुसलमान बहुत हंसे। लेकिन इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि परर्शियन एंपायर की पब्लिक में खालिद बिन वलीद का खौफ किस हद तक फैल चुका था। इस जंग के बाद अलहरा सिटी के साथ-साथ पर्शियन एंपायर के इस इलाके के बहुत सारी सिटीज में मुसलमानों के सामने सरेंडर करना शुरू किया। पर्शियन एंपायर पर हमला करने से पहले अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अन ने खालिद बिन वलीद को वही इंस्ट्रक्शंस दिए थे जो इससे पहले हमेशा रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दिया करते थे कि किसी भी बच्चे बूढ़े
औरत पर अंडर एनी सरकमस्ट्ससेस [संगीत] हाथ नहीं उठाना और कोई दरख्त भी नहीं काटना और किसी से कोई चीज नहीं छीनना। इन्हीं प्रिंसिपल्स को सामने रखकर खालिद बिन वलीद ने परर्शियन एंपायर्स के इन सारे इलाकों को फतह करने के बाद उस इलाके की सारी प्रॉपर्टीज वहां के लोकल आवाम को वापस कर दी और इंसाफ जस्टिस का एक जबरदस्त निजाम बनाया जिसमें उन्होंने सों के सामने परशियन एंपायर के ताकतवर लोगों को को आम लोगों की तरह सजाएं दी और सूद का निजाम भी खत्म कर दिया। मतलब खालिद बिन वलीद जैसे ही किसी सिटी को फतह करते
उस सिटी की इकॉनमी खराब होने के बजाय और स्ट्रांग होने लगती थी। और खालिद बिन वलीद ने अपनी फौज को [संगीत] स्ट्रांग करने के लिए जो टैक्स जजिया यहां की आवाम पर लगाया वो उस टैक्स से बहुत कम है। जो इससे पहले [संगीत] यहां की आवाम परशियन बादशाह को भेजा करती थी। ये सब देखकर पर्शियन आवाम बहुत हैरान थी। इसीलिए जो सिटीज इससे पहले मुसलमानों से आखिरी दम तक लड़ती थी। आहिस्ता-आहिस्ता सिर्फ थोड़ी सी लड़ाई [संगीत] के बाद मुसलमानों के सामने सरेंडर करने लगी और जिजिया टैक्स खुशी से देने लगी। अब खिलाफत [संगीत] राश्तदा परर्शियन
एंपायर से इस सारे इलाके को फतह कर चुकी थी। यहां तक मुसलमान [संगीत] साल 633 के जुलाई के महीने में पहुंचे थे और जुलाई से लेकर सितंबर तक अगले तीन महीने तक मुसलमानों और पर्शियंस के दरमियान कोई भी लड़ाई नहीं हुई। क्योंकि खालिद बिन वलीद इन नए इलाकों में इस्लामिक लॉज़ कायम करने में [संगीत] बिजी थे। और परर्शियन बादशाह दूरदराज से नई फौज जमा करने में बिजी थे। अब जब यहां पर एंपायर में हालात थोड़े कंट्रोल होने लगे तो मदीना में मुसलमानों के खलीफा अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनू ने सहाबा की एक हाई लेवल
मीटिंग बुलाई जिसमें उमर, अली और उस्मान जैसे बड़े-बड़े सहाबा मौजूद थे। लेकिन इस बार यह मीटिंग परर्शियन एंपायर के बारे में नहीं बल्कि रोमन एंपायर के बारे में थी कि कहीं रोमन एंपायर इन हालात का फायदा उठाकर मुसलमानों पर हमला ना कर दे। इसीलिए इस मीटिंग में अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनू ने एक फैसला किया कि बहुत तेजी से मुसलमानों की एक नई फौज बनाई जाए ताकि इससे पहले कि रोमन एंपायर मुसलमानों पर हमला करें हम उन पर हमला कर देंगे। सहाबा अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनो के इस मिशन को लेकर पूरे अरब
में फैल गए और मुसलमानों के लिए एक नई फौज [संगीत] बनाने लगे। जिसके बाद कुछ ही अरसे में मदीना में वालंटियर्स की एक नई फौज बिल्कुल रेडी हो गए। लेकिन अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनू ने इस फौज को रोमन एंपायर की तरफ जाने से पहले चार ग्रुप्स में डिवाइड कर दिया। जिनके लीडर्स उन्होंने अम्र इब्न आस, अबू उबैदा, शराबील और यज़ीद को बनाया। वह वाला यज़ीद नहीं यज़ीद बिन अबू सुफियान। लेकिन इन फौजों को चार ग्रुप्स में डिवाइड करने की जरूरत क्या थी? यह इसलिए क्योंकि रोमंस की फौज मुसलमानों से बहुत ज्यादा थी और
इनसे एक साथ लड़ना इंपॉसिबल था। तो इन्हें इसलिए डिवाइड किया गया ताकि रोमंस भी अपनी आर्मी को डिवाइड कर दें। मुसलमानों की ये चारों आर्मीज़ रोमन एंपायर में इस तरह दाखिल हुई कि अगर इनमें से एक को भी कोई इमरजेंसी पेश आए तो बाकी सारे उसकी मदद के लिए फुल स्पीड पहुंच सके। इसी तरह ये फौज रोमन एंपायर में आहिस्ता-आहिस्ता आगे बढ़ने लगी। उधर परर्शियन एंपायर में जहां पिछले 3 महीने से कोई लड़ाई नहीं हुई थी। उस टाइम को भी खालिद बिन वलीद ने वेस्ट करने के बजाय वो एक छोटी सी फौज इराक से लेकर
वापस अरब की तरफ गए। जहां अब भी अबू बकर रज अल्लाह ताला अन्ह की खिलाफत के खिलाफ एक छोटा सा ग्रुप लड़ रहा था। तो खालिद बिन वलीद ने जाकर उन्हें खत्म कर दिया और फिर बहुत तेजी से वापस इराक की तरफ आए। जैसे ही पर्शियन बादशाह को पता चला कि खालिद बिन वलीद इराक को छोड़कर वापस अरब की तरफ चले गए तो उन्होंने 25-25,000 की तीन नए आर्मीज़ को तैयार करके मुसलमानों की तरफ रवाना किया और सारे मुसलमानों को पता था कि इन तीनों आर्मीज़ को एक साथ हराना इंपॉसिबल है। तो खालिद बिन वलीद
ने अपने जनरल्स की एक मीटिंग बुलाई और अब जो प्लानिंग खालिद बिन वलीद ने की इसी प्लानिंग की वजह से उन्हें दुनिया के सबसे बड़े जनरल्स में से एक माना जाता है। मीटिंग में मुसलमानों को पता चला कि इन तीनों फौजों को एक-एक करके हराया नहीं जा सकता। क्योंकि जैसे ही मुसलमान उनकी तरफ रवाना होंगे, पर्शियंस की ये तीनों फौजें एक साथ मिलकर 75,000 की एक बहुत बड़ी फौज बना लेंगे। इसीलिए खालिद बिन वलीद और उनके जनरल्स ने अपने जासूसों की मदद से ये कैलकुलेट करना शुरू किया कि आज से दो हफ्ते बाद ईरान की
ये [संगीत] तीनों फौजें एक्जेक्टली कौन सी जगह पर होंगी। जिसके बाद खालिद बिन मलीद ने अपनी आर्मी को तीन ग्रुप्स में डिवाइड किया। जिनमें से एक को अपने पास रखा, दूसरे को काका बिन अम्र के पास और तीसरा अबू लैला के पास। इन तीनों जनरल्स के पास 5000 मुसलमानों की फौज थी। [संगीत] खालिद बिन वलीद ने बाकी दो जनरल्स को आर्डर दिया कि आज से दो हफ्ते बाद हम तीनों फौजे एक्सजेक्टली इस टाइम पर और इस जगह पर इस इलाके में मिलेंगे और फिर एक साथ तीन [संगीत] साइड से हमला करेंगे। ये तीनों फौजे मेन
रोड से तो ईरान की आर्मी की तरफ नहीं जा सकते। इसीलिए टाइम और जगह फिक्स करने के बाद यह तीनों फौजे इराक के मेन रास्तों को छोड़कर जुलाई के महीने में इराक के गर्म डेजर्ट की तरफ गए और हर एक की नजर से बिल्कुल गायब हो गए। जिसके बाद अगले दो हफ्ते तक पूरे इराक में किसी को पता नहीं था कि मुसलमानों की फौज आखिर गए कहां और अचानक दो हफ्ते बाद उसी रात एग्जैक्ट उसी टाइम पर और एग्जैक्ट उसी लोकेशन पर खालिद बिन वलीद अपने 5000 फौज के साथ खड़े थे। तो उन्होंने एक छोटी
सी आग लगाकर सामने वाले पहाड़ की तरफ इशारा किया और दुआ की कि काश वो फौज भी एग्जैक्ट टाइम पर वहां पहुंच चुकी हो क्योंकि अब यहां से वापस जाना [संगीत] इंपॉसिबल था और कुछ देर बाद काका बिन अम्र की दूसरी फौज ने भी आग जलाई और इसी तरह तीसरी फौज ने भी इशारा दिया व्हिच मींस बगैर किसी मोबाइल या किसी राबते के ये तीनों फौजें उसी एक्साक्ट टाइम पर उसी जगह पर मौजूद थी। अब जब सारी आर्मीज़ प्लान के मुताबिक पहुंच चुकी थी तो खालिद बिन वलीद [संगीत] ने हमले का हुकुम दिया। मुसलमानों की
फौजों ने पर्शियंस पर तीन तरफ से हमला करके हजारों लोगों को बिल्कुल क्रश कर दिया और परर्शियंस की यह पहली फौज खत्म हो गई। लेकिन इतनी बड़ी फतह के बाद भी मुसलमानों ने सेलिब्रेट करने की बजाय दोबारा रात को मीटिंग बुलाई और अगेन यह कैलकुलेट करना शुरू किया कि पर्शियंस की दूसरी फौज आज से तीन दिन बाद एग्जैक्टली कौन सी जगह पर होगी? और यह कैलकुलेट करने के बाद मुसलमानों की तीनों फौजे इराक के डेजर्ट में बिल्कुल गायब हो गई। और तीन दिन बाद दोबारा खालिद बिन वलीद ने देखा कि मुसलमानों की तीनों फौजे एग्जैक्ट
उसी टाइम पर उसी लोकेशन पर मौजूद है। जिसके बाद खालिद बिन वलीद ने तीनों फौजों को हमला करने का हुकुम दिया। और फिर इस फौज के साथ भी वही हुआ जो होना था। और इस तरह पर्शियंस की दूसरी फौज भी खत्म हो गई। और अगेन खालिद बिन वलीद ने जनरल्स की दोबारा मीटिंग बुलाई। सों ने फिर से तीसरी फौज की कैलकुलेशन की। और एक बार फिर मुसलमानों की ये तीनों फौजें डेजर्ट में बिल्कुल गायब हो गई। और इस तरह मुसलमानों ने तीसरी फौज को भी खत्म कर दिया। अब यहां पर [संगीत] एक बहुत बड़ा मसला
यह हुआ कि खालिद बिन वलीद जब तीसरी फौज को क्रश कर रहे थे उस फौज के दरमियान कुछ नए मुसलमान भी थे जो इस जंग में सारे मारे गए। इस बात की खबर जब मुसलमानों की कैपिटल [संगीत] मदीना पहुंचे तो हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनू खालिद बिन वलीद पर बहुत गुस्सा हुए। लेकिन हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनहु के खलीफा बनने के बाद इस इंसिडेंट और कुछ और इंसिडेंट की वजह से खालिद बिन वलीद जैसे अज़ीम जनरल को उनकी पोजीशन से हटा दिया। [संगीत] जिसे हम एक्सप्लेन करेंगे तो सब्सक्राइब। इन फौजों को खत्म करने
के बाद मुसलमान सीधा फिरा की तरफ रवाना हुए। ये सिटी बहुत ही इंपॉर्टेंट थी क्योंकि ये दोनों सुपर पावर्स रोमन और पर्शियन एंपायर के बिल्कुल सेंटर में बॉर्डर सिटी थी और मसला ये था कि यहां पर पर्शियंस और रोमंस दोनों की बहुत बड़ी फौज आबाद थी। ये उसी तरह का इलाका था जिस तरह आज पाकिस्तान और इंडिया के दरमियान वाघा बॉर्डर है। जैसे ही मुसलमान इस सिटी के करीब पहुंचे। उन्होंने जिंदगी में पहली बार बल्कि तारीख में पहली बार एक बहुत [संगीत] ही अजीब मंजर देखा कि पर्शियंस और रोमंस की फौज अपनी सारी दुश्मनियां भुलाकर
मुसलमानों के खिलाफ एक हो गए हैं और मुसलमानों से एक साथ लड़ने के लिए बिल्कुल रेडी खड़े हैं। रोमंस और पर्शियंस के दरमियान पिछले 700 साल से बहुत सख्त लड़ाई चल रही थी। और इन पिछले 700 साल में किसी भी तीसरी ताकत ने इन दोनों को चैलेंज नहीं किया था। लेकिन अब जब इन दोनों ने देखा कि मुसलमानों ने एक साथ [संगीत] इन दोनों एंपायर्स पर हमला कर दिया तो वह अपनी सारी दुश्मनी खत्म करके अपनी फौजों को मुसलमानों के खिलाफ यूनाइट करने लगे। दुश्मनों की फौज के फ्रंट में पर्शियंस और उनके पीछे रोमंस खड़े
थे और इन दोनों के पीछे एक दरिया जिसके ऊपर एक ब्रिज थी और मुसलमानों के पास फौज की सिर्फ एक लाइन थी। रोमंस [संगीत] और पर्शियंस ने मिलकर मुसलमानों पर हमला कर दिया और इतना सख्त हमला किया कि कुछ ही देर में मुसलमान जंग से आहिस्ता-आहिस्ता पीछे हटने लगे और बहुत सारे मुसलमान शहीद होने लगे। यह जंग इतनी सख्त थी कि जंग के दरमियान ही खालिद बिन वलीद ने अल्लाह से दुआ की कि ऐ अल्लाह अगर आज तूने मुसलमानों को फतह दे दी तो मैं किसी भी और जंग से पहले मक्का जाकर हज करूंगा। क्योंकि
यह जंग ऐसी हालत तक पहुंच चुकी थी कि यहां से निकलना इंपॉसिबल था। और इसी के साथ जीत की एक आखिरी अटेम्प्ट करने के लिए खालिद बिन वलीद ने अपने साथ वाले घोड़ों को जंग से दूर जाने का हुकुम दिया और कहा कि जंग से पहले बहुत दूर जाकर वापस पलटो और फिर डायरेक्ट हमला मत करना बल्कि पहले दूर जाकर उस ब्रिज तक पहुंचो जो रोमंस के पीछे थी और फिर वहां से दोबारा इस तरीके से रोमंस पर पीछे से हमला करना कि रोमंस और पर्शियंस को लगे कि पीछे से मुसलमानों की एक बहुत बड़ी
फौज पहुंच चुकी है। जैसे ही इस फौज ने पीछे से रोमंस पर हमला किया तो रोमंस जंग छोड़कर हर तरफ भागने लगे। क्योंकि खालिद बिन वलीद ने इससे पहले ही फरमाया था कि पर्शियंस के मुकाबले रोमंस काफी कमजोर लोग हैं। जब रोमंस जंग छोड़कर हर तरफ भागने लगे तो पर्शियंस का भी सारा हौसला टूट गया और वह भी जंग छोड़कर भागने लगे और इस तरह अल्लाह ने खालिद बिन वलीद की दुआ कबूल कर ली और मुसलमान जंग जीत गए। लेकिन अब खालिद बिन वलीद को भी अपना वादा पूरा करना था। इसीलिए उन्होंने अपनी फौज को
इस सिटी से वापस अलहरा सिटी की तरफ जाने का हुकुम दिया और खुद इस फौज के बिल्कुल पीछे चलने लगे। जैसे ही यह फौज थोड़ी आगे चली गई, खालिद बिन वलीद बगैर किसी को बताए सिर्फ कुछ और साथियों के साथ इराक के डेजर्ट की तरफ से फुल स्पीड मक्का की तरफ जाने लगे। क्योंकि यह दिन बिल्कुल [संगीत] हज के दिन थे। रास्ते में खालिद बिन वलीद बहुत ही कम आराम और बहुत ही कम खाने के साथ फुल स्पीड मक्का पहुंचे और मक्का पहुंचते ही अपना चेहरा छुपाकर हज करके वापस घोड़े पर चढ़े और सीधा वापस
इराक की तरफ चलने लगे। जैसे ही वह वापस इराक पहुंचे। उन्होंने देखा कि मुसलमानों की फौज अब उस सिटी पहुंच रही है और इस तरह बगैर किसी को पता चले खालिद बिन वलीद ने अपना वादा भी पूरा कर लिया। लेकिन अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनू की इंटेलिजेंस एजेंसी बहुत ही ज्यादा स्ट्रांग थी और उन्हें कुछ ही दिनों में खालिद बिन वलीद के सीक्रेट [संगीत] हज का पता चल गया और उन्होंने खालिद बिन वलीद को लेटर भेजा कि बगैर पूछे आइंदा ऐसा कभी भी नहीं करना। अब मुसलमानों की इस एंपायर खिलाफत राश्तदा के बॉर्डर्स बहुत
फैल चुके थे और एक साथ मुसलमान दो बड़े सुपर पावर्स के साथ लड़ रहे थे। और यह सारी प्लानिंग मदीना जैसी एक छोटी सी सिटी से हो रही थी। इन सारे जंगों की प्लानिंग मदीना में बैठे बड़े-बड़े सहाबा कर रहे थे। मदीना में अबू बकर रजह ताला अन्ह ने देखा कि परर्शियन एंपायर में तो खालिद बिन वलीद जैसे जनरल की वजह से सब कुछ अंडर [संगीत] कंट्रोल है। लेकिन इससे बहुत दूर रोमन एंपायर मुसलमानों की फौजों को बहुत मुश्किल पेश आ रही। इसीलिए उन्होंने खालिद बिन वलीद की तरफ [संगीत] एक लेटर भेजा जिसमें उन्होंने खालिद
बिन वलीद को आर्डर दिया परर्शियन एंपायर में अपनी सारी एक्टिविटीज खत्म करके अब रोमन अंपायर की तरफ जाओ क्योंकि अब बारी रोमन एंपायर की। अब खालिद बिन वलीद के पास दो ऑप्शंस थे कि या तो इस रास्ते से रोमन अंपायर की तरफ जाए जिसमें बहुत ज्यादा टाइम लगना था और या फिर इस दूसरे रास्ते से जाए जो बिल्कुल इंपॉसिबल रास्ता था। लेकिन उस रास्ते से मुसलमान टाइम बहुत बचा सकते हैं और दरमियान में छ दिन [संगीत] तो बिल्कुल बगैर किसी पानी के गुजारने थे। तो ऑफ कोर्स खालिद बिन वलीद ने टाइम बचाने के लिए यह
दूसरा बहुत ही डेंजरस रास्ता चूज़ किया क्योंकि उन्हें पता था कि रोमन एंपायर में मुसलमानों को उनकी बहुत सख्त जरूरत है जिसके लिए उन्होंने 20 ऊंटों को कई दिनों तक प्यासा रखा और फिर उन्हें डबल पानी पिलाया ताकि ज्यादा पानी उनके पेट में स्टोर हो सके ताकि बाद में मुसलमानों के घोड़े इस पानी को यूज [संगीत] कर सके। लेकिन आज साइंस यह कहती है कि जिस तरह बहुत सारे लोगों का ख्याल है कि ऊंट अपने जिस्म के इस हिस्से में पानी स्टोर करके रखता है तो ये बिल्कुल गलत बात ऐसा कुछ भी नहीं होता जिसकी
वजह से कुछ हिस्टोरियन समझते हैं कि ये जो वाकया इस्लामी तारीख में लिखा हुआ है हो सकता है ये ठीक ना हो और इसे बस लोगों ने [संगीत] बनाया हो जो भी हो यह बात कंफर्म है कि खालिद बिन वलीद अपनी फौज के साथ [संगीत] इस बहुत ही डेंजरस रास्ते पर रवाना हुए जाने से पहले खालिद बिन वलीद ने ईरान से जितना भी जिजिया टैक्स जमा किया था वो सारा उन्होंने मुसलमानों की कैपिटल मदीना की तरफ भेजा और खुद रोमन एंपायर की तरफ रवाना हुए और अपनी जगह परशियन एंपायर में मुसन्ना बिन हारिसा को जनरल
बनाया। बाय द [संगीत] वे मैं ज्यादातर लोगों के नाम नहीं लेता ताकि ज्यादा नामों से कंफ्यूजन पैदा ना हो। लेकिन मुसन्ना बिन हारिसा का नाम लेना बहुत ही इंपॉर्टेंट है। [संगीत] क्योंकि जिस इलाके का उन्हें खालिद बिन वलीद ने जनरल बनाया था। आज 1400 साल बाद उसी इलाके में इराक का एक बहुत बड़ा प्रोविंस जिसका [संगीत] नाम है मुसन्ना प्रोविंस। जो मुसलमानों के इसी जनरल के नाम पर रखा गया है। एनीवेज [संगीत] खालिद बिन वलीद के इस जबरदस्त स्ट्रेटजी की वजह से मुसलमान कुछ ही दिनों में परर्शियन एंपायर के डेजर्ट को क्रॉस करके रोमन एंपायर
पहुंचे। और वहां से कुछ छोटी रोमन फौजों को हराकर सीधा [संगीत] मुसलमानों की मदद के लिए पहुंचे। और देखा कि मुसलमानों की एक फौज को रोमंस ने बिल्कुल घेर लिया है। और वो मुसलमानों की इस फौज [संगीत] को जैसे ही खत्म करने वाले थे खालिद बिन वलीद उस एग्जैक्ट टाइम पर पहुंचे और मुसलमानों की इस फौज को रोमन से बचा लिया। नाउ अगर खालिद बिन वलीद ने वो डेंजरस रास्ता चूज़ ना किया होता तो मुसलमानों की ये सारी फौज जो शुराबील की लीडरशिप में थी बिल्कुल खत्म हो जाती और हजारों मुसलमान शहीद होते। खालिद बिन
वलीद ने इस फौज को बचाकर [संगीत] रोमन एंपायर में मुसलमानों की सारी आर्मीज को यूनाइट किया और उन्हें यूनाइट करके बहुत तेजी से रोमन एंपायर में आगे बढ़ने लगे और कुछ ही अरसे में इस सारे इलाके को फतह कर लिया जिसे आज हम उर्दन जॉर्डन कहते हैं और सीधा रोमन एंपायर में सीरिया शाम के मेन सिटी दमश्क डमस्कस की तरफ बढ़ने लगे लेकिन जैसे ही मुसलमान उस सिटी के करीब पहुंचने लगे तो यहां से बहुत दूर मदीना में मुसलमानों के खलीफा अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनहु की तबीयत अचानक खराब हो गई और जैसे ही
मुसलमानों की फौज ने रोमन एंपायर की मेन सिटी डोमस्कस को हर तरफ से घेर लिया तो उसके सिर्फ दो दिन बाद मुसलमानों के पहले खलीफा अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनो इस दुनिया से चले गए। उमर बिन खत्ताब रज़ अल्लाह ताला अनो बहुत ही क्रूशियल टाइम पर मुसलमानों के दूसरे खलीफा बन गए। [संगीत] क्योंकि एट द सेम टाइम मुसलमान उस वक्त दुनिया के सबसे बड़े सुपर पावर्स रोमन और परर्शियन एंपायर से लड़ रहे थे। इन तीनों एंपायर्स में फर्क ये था कि रोमन एंपायर पिछले 1000 साल से दुनिया की सबसे बड़ी सुपर पावर थी। और
परर्शियन एंपायर भी पिछले 800 साल से दुनिया की दूसरी बड़ी सुपर पावर थी। [संगीत] और इन दोनों से एक ही टाइम पर लड़ कौन रहा था? मदीना की रियासत। जो इस सबसे सिर्फ कुछ ही सालों पहले बनी थी। लेकिन इन सब चीजों से डरने के बजाय हजरत उमर और बाकी सहाबा ने पहले खलीफा हजरत अबू बकर को रसूल्लाह सल्ला वसल्लम के पास दफना दिया। जिसके बाद पहली बार हजरत उमर मुसलमानों के खलीफा बने। नाउ जब मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जिंदा थे तो लोग उन्हें रसूल्लाह के टाइटल से पुकारते थे। लेकिन उनकी वफात के बाद लोग
कंफ्यूज हो गए कि अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनहु के लिए कौन सा टाइटल यूज़ किया जाए। तो हजरत अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनहु ने अपने लिए बादशाह, सीज़र और किसरा जैसे टाइटल्स छोड़कर खलीफा का नाम चूज़ किया। और अब हजरत अबू बकर के बाद हजरत उमर ने अपने लिए अमीरुल मोमिनीन का टाइटल चूज़ किया। जब हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनहु खलीफा बने तो मुसलमानों की एक फौज खालिद बिन वलीद की लीडरशिप में रोमन एंपायर में लड़ रही थी और एक दूसरी छोटी फौज पर्शियन एंपायर में थी। लेकिन हजरत उमर को रोमन एंपायर
की फौज से ज्यादा परर्शियन एंपायर की फौज की फिक्र थी [संगीत] क्योंकि वहां अब खालिद बिन वलीद जैसा जनरल मौजूद नहीं था। खलीफा बनने के बाद जब उन्होंने देखा [संगीत] कि पूरे अरब से लोग उनके हाथ पर बैत करने के लिए मदीना आ रहे हैं तो उन्होंने इस टाइम को यूज़ करके परशियन एंपायर में मुसलमानों की मदद के लिए एक नई फौज जमा करना शुरू कर दी। लेकिन यहां एक बहुत बड़ा मसला हुआ कि हजरत उमर मस्जिद नबवी में बार-बार मुसलमानों को जिहाद की तरफ बुलाते रहे। लेकिन पहली बार उन्होंने देखा कि परर्शियन एंपायर से
लड़ने के लिए मुसलमानों में कोई भी तैयार नहीं था और यह इसलिए नहीं था कि मुसलमान लड़ कर थक चुके थे [संगीत] बल्कि इसलिए क्योंकि उन्हें पता था कि खालिद बिन वलीद परर्शियन एंपायर में नहीं बल्कि रोमन एंपायर में और उनके बगैर कोई भी जंग जीतना इंपॉसिबल है। यह देखकर हजरत उमर समझ गए कि अब जो ये नए मुसलमान हैं इनका यकीन और ट्रस्ट अल्लाह के बजाय खालिद बिन वलीद के साथ ज्यादा अटैच्ड है। जो मुसलमानों की इस एंपायर के लिए बहुत बड़ा मसला था। तीन दिनों के बाद हजरत उमर ने एक दिन बहुत सख्त
गुस्से के साथ स्पीच की तो उनमें से एक मुसलमान अबू उबैद जो सहाबी भी नहीं थे खड़े हुए और कहा मैं जिहाद के लिए तैयार हूं। जिसके बाद आहिस्ता-आहिस्ता और भी लोग आगे आने लगे। तो हजरत उमर रज अल्लाह ताला अनू ने 1000 की फौज बनाई और उसका लीडर अबू उबैद को बनाकर परर्शियन एंपायर की तरफ रवाना किया। लेकिन ये एक बहुत बड़ा रिस्क था। क्योंकि अगर यह फौज परशियन एंपायर से हार जाती, तो उसके बाद खालिद बिन वलीद के बगैर मुसलमान कभी जंग नहीं लड़ते। और ऐसा ही हुआ। यह फौज परशियन एंपायर में बहुत
ही बुरी तरह हार गई। बट वेट ये फौज अभी रास्ते में अभी तक पहुंची नहीं है। जब ये फौज परशियन एंपायर की तरफ आहिस्ता-आहिस्ता जा रही थी। तो उधर रोमन एंपायर में मुसलमानों ने खालिद बिन वलीद की लीडरशिप में उस जमाने के शाम सीरिया की सबसे इंपॉर्टेंट सिटी द मशक। डोमस्कस को हर तरफ से घेर चुके थे। और इस फौज को काफी अरसे तक पता ही नहीं था कि अबू बकर रज अल्लाह ताला अनहु वफात पा चुके हैं और उनके बाद मुसलमानों का नया खलीफा हजरत उमर बने हैं। तो खालिद बिन वलीद की लीडरशिप में
यह फौज कई दिन तक कोशिश करती रही कि किसी तरह इस किले के अंदर घुस सके। लेकिन डोमस्कस कोई आम सिटी नहीं थी। इसे उस जमाने में पैराडाइज ऑफ सीरिया कहा जाता था। मतलब सीरिया की जन्नत और अब तक अरब अपना सबसे बड़ा इंपोर्ट इसी सिटी से किया करता था। मतलब दमशक इस इलाके में सबसे पावरफुल सिटी थी और उस जमाने में यह अरबों के लिए ऐसी ही सिटी थी जिस तरह आज लोगों के लिए न्यूयॉर्क हो। तो मुसलमानों ने उस वक्त की सबसे पावरफुल सिटी द मशक को हर तरफ से घेर लिया था और
खालिद बिन वलीद ने इस सिटी के हर मेन गेट पर अपने सबसे बेस्ट जनरल्स को खड़ा किया था। जिनमें से एक जनरल का नाम अबू उबैदा इबने जर्राह था। आखिर बहुत कोशिश करने के बाद भी दमशक फतह नहीं हो सका। लेकिन फिर एक दिन अचानक दमश से एक आदमी खालिद बिन वलीद के पास आया और उसे बताया कि कुछ ही दिन पहले दमश के लीडर के घर बेटा पैदा हुआ है। जिसे सेलिब्रेट करने के लिए उन्होंने एक बहुत बड़ी पार्टी रखी जिसमें रोमन एंपायर की फौज को भी बुलाया और इस पार्टी में यह सब इतनी
शराब पिएंगे कि कोई भी अपने होशोहवास में नहीं रहेगा। तो खालिद बिन वलीद ने उसी रात मुसलमानों के एक ग्रुप को इस गेट के सामने खड़ा कर दिया और फिर खुद सिर्फ कुछ और मुसलमानों के साथ बिल्कुल खामोशी से दमश की दीवार पर चढ़कर अंदर घुस गए और मुसलमानों के लिए अंदर से गेट खोल दी और इस तरह मुसलमानों की फौज का एक समंदर किले के अंदर घुस गया और बहुत तेजी से मुसलमान ईस्टर्न साइड से इस किले को फतह करने लगे। लेकिन इस किले का जनरल इस सिटी के दूसरे साइड पर बैठा हुआ था।
तो जब उसे पता चला कि अब उसके पास कोई ऑप्शन नहीं है और मुसलमान किले में घुस चुके हैं और कुछ ही देर में मुसलमान इस पूरे सिटी को फतह कर लेंगे तो उसने जल्दी एक लेटर मुसलमानों के दूसरे बड़े जनरल अबू उबैदा की तरफ भेजा कि मैं इस सिटी को मुसलमानों के सामने सरेंडर [संगीत] कर रहा हूं। सिर्फ एक शर्त पर कि मुसलमान कोई माले गनीमत नहीं लेंगे। अब अबू उबैदा इब्न जरा को इस बात का पता नहीं था कि खालिद बिन वलीद और उसके सोल्जर्स दमश को फतह करने वाले हैं। तो उन्होंने उस
रोमन जनरल के सरेंडर को कबूल कर लिया। अब थोड़ी ही देर बाद जब खालिद बिन वलीद को अबू उबैदा रज़ अल्लाह ताला अनहु के डिसीजन का पता चला तो अगर वो चाहते तो अबू उबैदा के इस एग्रीमेंट को फाड़ कर दमशक को तलवार के जोर पर भी फतह कर सकते थे। और यहां से सारा माल गनीमत उठा सकते थे। लेकिन खालिद बिन वलीद ने अबू उबैदा के एग्रीमेंट को मानकर अपनी सारी फौज को पीछे हटने का हुकुम दिया। और इस तरह दमश्क दस्कस उस जमाने की सबसे ताकतवर सिटी हजरत उमर के कंट्रोल में आई। नाउ
यह सब कुछ तो यहां रोमन एंपायर में हो रहा था। लेकिन इस सबसे दूर परर्शियन एंपायर की तरफ जो फौज रवाना की गई थी वो बिल्कुल पहुंचने ही वाली थी और पहुंचने के साथ ही अबू उबैद ने देखा कि परर्शियन एंपायर सामने से बहुत बड़ी फौज तैयार कर चुकी है। जब अबू उबैद मुसलमानों की फौज लेकर परर्शियन एंपायर पहुंचे। अबू उबैद नॉट अबू उबैदा। ये दो डिफरेंट शख्सियत है। अबू उबैद और उनकी फौज ने पर्शियन एंपायर पहुंच कर देखा कि परर्शियन बादशाह ने खालिद बिन वलीद की एब्सेंस में मुसलमानों के खिलाफ तीन बहुत बड़ी फौजें
तैयार की है जो बहुत तेजी से मुसलमानों की तरफ बढ़ रही हैं। आखिर मुसलमानों और परर्शियन फौज इस ब्रिज के सामने एक दूसरे के आमने-सामने हुई। तो परर्शियन जनरल ने मुसलमानों को यह ऑफर दी कि या आप ब्रिज क्रॉस करके इस तरफ आए और या हमें उस तरफ आने दें। अब यहां अबू उबेद से एक बहुत बड़ी गलती हुई। उन्होंने अपने मुसलमान जनरल्स की बात नहीं मानी और खुद मुसलमानों की फौज को ब्रिज क्रॉस करने का हुक्म दिया। अबू उबैद खुद सहाबी नहीं थे और इनकी ऐज भी बहुत कम थी। जब हजरत उमर रज़ अल्लाह
ताला अनू ने इन्हें मुसलमानों की फौज का जनरल बनाया तो सहाबा ने कहा कि आप इसे नहीं बल्कि किसी सहाबी को जनरल बनाए। लेकिन अबू उबैद वो वाहिद इंसान थे जो सबसे पहले जिहाद के लिए खड़े हुए थे। इसीलिए हजरत उमर ने इन्हें एक ऐसी फौज का कमांडर बनाया जिसमें इनके अंडर बहुत सारे सहाबा भी थे। आखिर मुसलमानों की फौज जो ऑलमोस्ट 9000 थी उन्होंने ब्रिज क्रॉस कर ली और जंग शुरू रोमन एंपायर में दम मशक दमास्टस और परर्शियन एंपायर की हीरा सिटी फतह करने के बाद अब दुनिया में हर कोई मुसलमानों को एक सीरियस
थ्रेट समझने लगा था। तो जब अबू उबैक ने अपने घुड़सवारों हॉर्समैन को परर्शियन एंपायर पर हमले का हुक्म दिया तो वह सामने पहली बार परर्शियन एंपायर की फौज में हाथियों को देखकर बिल्कुल डर गए। और आगे बढ़ने के बजाय पीछे भागने लगे। यह देखकर पर्शियन एंपायर ने मुसलमानों पर हमला कर दिया और उनके हाथी बहुत सारे मुसलमानों को शहीद करने लगे। एक हाथी ने तो इवन अबू उबैद को उनके घोड़े से गिरा दिया और फिर उनके सीने पर पांव रख के बिल्कुल क्रश कर दिया। यह हिस्ट्री में पहली दफा था कि किसी जंग में मुसलमानों
के जनरल को शहीद किया गया हो। तो जब मुसलमानों ने अपने जनरल को गिरता हुआ देखा [संगीत] उनका हौसला बिल्कुल टूट गया और वह जंग के मैदान से पीछे हटने लगे। जब मुसलमान भागकर ब्रिज तक पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि ब्रिज को किसी [संगीत] ने तोड़ दिया है। अब या तो इस ब्रिज को मुसलमानों की फौज में से किसी ने तोड़ा था और या इसे अबू उबैद के ऑर्डर्स पर ही तोड़ा गया था ताकि मुसलमानों के लिए जंग छोड़ना [संगीत] इंपॉसिबल हो जाए। तो अब जब और कोई रास्ता भी नहीं था तो बहुत सारे मुसलमान
दरिया में कूदने लगे। यह सब देखकर मुसलमानों के दूसरे जनरल मुसन्ना ने फौज को दोबारा ऑर्गेनाइज किए और पर्जंसंस पर पूरी ताकत के साथ एक आखिरी बार हमला कर दिए और पीछे खड़े मुसलमानों को यह ऑर्डर्स दिए कि जल्दी से ब्रिज को ठीक करो। आखिर मुसन्ना की बहादुरी की वजह से 3000 मुसलमान ब्रिज को क्रॉस करके इस साइड पर आए लेकिन 9000 में से सिर्फ 3000 मुसलमान ब्रिज क्रॉस कर सके। मतलब 6000 मुसलमान इस जंग में शहीद हुए। यह पहली बार हुआ था कि मुसलमान कोई भी जंग इतनी [संगीत] बुरी तरह हार जाए और यह
जंग हजरत उमर की खिलाफत की पहली जंग भी थी जिसमें उन्हें शिकस्त हुई। एक बार फिर मुसलमानों ने देखा कि एक तरफ खालिद बिन वलीद की लीडरशिप में उन्होंने दमशक जैसे अजीम सिटी को फतह कर लिया और दूसरी तरफ मुसलमान परियन एंपायर में एक अहम सी जंग हार गए। जिसके बाद यह बातें पूरी एंपायर में फैलने लगी कि इससे पहले जब खालिद बिन वलीद परर्शियन एंपायर में थे तो वहां मुसलमान हर जंग जीत रहे थे और रोमन एंपायर में मुसलमान हार रहे थे। फिर जब खालिद बिन वलीद पर एंपायर से रोमन एंपायर की तरफ गए
तो रोमन एंपायर में मुसलमान जंग जीतने लगे और परर्शियन एंपायर में हार गए। इन सारे हालात से यंग मुसलमानों का यह माइंडसेट बनने लगा कि जंग में फतह सिर्फ सैफुल्लाह खालिद बिन वलीद की लीडरशिप नहीं मिल सकती और उनके बगैर चाहे जो भी हो जंग नहीं जीत सकते। तो जब खालिद बिन वलीद मुसलमानों की फौज के जनरल होते थे तो उनकी फौज भी फुल मोराल के साथ लड़ती थी। लेकिन जब खालिद बिन वलीद नहीं होते थे तो मुसलमान उस पैशन के साथ जंग नहीं लड़ते थे। इन सारी बातों का मदीना में बैठे मुसलमानों के खलीफा
हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनू को बहुत अच्छी तरह पता था। तो इन सारे हालात को कंट्रोल करने उन्होंने एक बहुत ही सख्त डिसीजन ली कि अब टाइम आ गया है कि मुसलमानों के इस फौज के अज़ीम जनरल खालिद बिन वलीद को उनकी पोजीशन से हटा दिया जाए और उनकी जगह एक नया आर्मी चीफ लगाया [संगीत] जाए। खालिद बिन वलीद इस्लाम के तारीख के सबसे बड़े जनरल जिन्होंने इस्लाम को अरब से निकालकर रोमन और परर्शियन एंपायर जैसी सुपर पावर्स को हराया। अल्लाहू अकबर। लेकिन इस सब के बाद उस वक्त के खलीफा हजरत उमर रज़ अल्लाह
ताला अनू ने उन्हें अपनी पोजीशन मतलब आर्मी [संगीत] चीफ के ओदे से हटा दिया। लेकिन क्यों इतने बड़े जनरल को हटाने की जरूरत क्या थी? खालिद बिन वलीद अब तक दुनिया के सारे जनरल्स वो वाहिद जनरल [संगीत] है जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी में कोई भी जंग नहीं हारी। सबसे पहले उन्होंने अपनी जिंदगी की पहली जंग जंग ओद में मुसलमानों को हराया। फिर इस्लाम कबूल करने के बाद जंग मूता जैसी खतरनाक जंग जीती। जिसमें रसूल्लाह सल्ला वसल्लम ने पहली दफा उन्हें सैफुल्लाह अल्लाह की तलवार का टाइटल दिया। फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बाद पहले खलीफा
हजरत अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनहु ने खालिद बिन वलीद को मुसलमानों की पूरी फौज का पहला आर्मी चीफ बनाया। जिसके बाद वह मदीना से फौज लेकर रवाना हुए और बहुत तेजी से पूरे अरब को फतह कर लिया और जंग यमामा में बहुत बड़ी फतह हासिल की। लेकिन पूरा अरब फतह करने के बाद अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अन्ह ने उन्हें वापस मदीना आने के बजाय परर्शियन एंपायर की तरफ जाने का हुकुम दिया। परर्शियन एंपायर पहुंचने के बाद खालिद बिन वलीद ने अगेन बहुत ही तेजी से परर्शियन एंपायर कि यह सारे इलाके फतह कर लिए।
लेकिन एट द सेम टाइम अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनू ने एक दूसरी फौज रोमन एंपायर की तरफ भी रवाना की। लेकिन यह फौज बहुत बड़ी होने के बावजूद भी उस तरह की कामयाबी हासिल ना कर सकी। इसीलिए रोमन एंपायर के हालात कंट्रोल करने के लिए हजरत अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनू ने खालिद बिन वलीद की तरफ ऑर्डर्स भेजे कि वो परर्शियन एंपायर को छोड़कर रोमन एंपायर की तरफ जाए। फिर जब खालिद बिन वलीद रोमन एंपायर की तरफ गए तो अगेन वहां हर जंग जीतने लगे और आखिर रोमन एंपायर की बहुत ही इंपॉर्टेंट सिटी
डोमास्कस को फतह करके यह सारा इलाका फतह कर लिया। लेकिन अब जब खालिद बिन वलीद रोमन एंपायर की तरफ चले गए थे तो परर्शियन एंपायर में मुसलमान दोबारा हारने लगे। तो जब पूरी दुनिया के लोगों ने यह देखा कि जहां खालिद बिन वलीद जाते हैं वहां मुसलमान जीतते हैं और जहां पर वह नहीं होते वहां मुसलमान हार जाते हैं। जिसके बाद खालिद बिन वलीद एक बहुत बड़ी सेलिब्रिटी बन गए और सिर्फ मुसलमानों में नहीं बल्कि रोमन और पर्शियन एंपायर में भी खालिद बिन वलीद के फतूहात की कहानियां फैलने लगी। यहां तक कि एक दुश्मन जनरल
ने खालिद बिन वलीद के पास आकर यह तक कहा [संगीत] कि हमारे इलाके में यह कहानी मशहूर हुई कि एक दिन आसमान से अल्लाह की तरफ से आपके लिए एक तलवार नाजिल हुई थी। इसीलिए आपको सैफुल्लाह कहा जाता है। इन सारी चीजों के बाद यह बातें नए मुसलमानों की गैदरिंग्स में आम हो चुकी थी कि सिर्फ खालिद ही जंग जीत सकते हैं और उनके अलावा चाहे जो भी हो मुसलमान जंग नहीं जीत सकते। जब हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनू खलीफा बने। उन्हें पता था कि मुसलमानों का खालिद बिन वलीद के बारे में यह माइंडसेट
इस्लाम के लिए बहुत ही खतरनाक हो सकता है। क्योंकि अगर लेट्स से खालिद बिन वलीद किसी जंग में शहीद हो जाते तो फिर मुसलमानों की फौज का सारा मोराल टूट जाता। तो आखिर हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनहु ने इन हालात को कंट्रोल करने के लिए खालिद बिन वलीद को उनकी पोजीशन आर्मी चीफ के ओदे से हटाने का फैसला किया। पर वेट हजरत उमर ने सिर्फ खालिद बिन वलीद को ही नहीं हटाया बल्कि मुसलमानों की स्टेट को हर एंगल से बदलना शुरू किया और मदीना में बैठकर हर इलाके की तरफ ऑर्डर्स भेजे। सबसे पहले उन्होंने
फतह किए गए इलाकों में नए गवर्नर्स लगाए और उनको यह ऑर्डर्स दे दिए कि हर फैसले से पहले मदीना में खलीफा से पूछना लाजमी है और यह अरब के लिए बहुत ही नई बात थी क्योंकि इससे पहले हर कबीला अपने फैसले खुद ही किया करता था लेकिन हजरत उमर कबाइली सिस्टम के खिलाफ थे और एक सेंट्रलाइज्ड मदीना की ताकत चाहते थे। सूबों में गवर्नर्स लगाने के साथ-साथ हजरत उमर ने उन्हें बताए बगैर कुछ जासूस भी बिठाए जो इन गवर्नर्स की अच्छी या बुरी हर खबर हजरत उमर तक पहुंचाते रहते थे। इसके अलावा हजरत उमर ने
हर सुबह में जस्टिस इंसाफ का सिस्टम बनाया जिसमें हर सूबे में इस्लामिक कानून के मुताबिक अदालतें कोर्ट्स बनाए गए और इन सारी अदालतों का हेड क्वार्टर सुप्रीम कोर्ट मदीना में बनाए गए जिसमें बहुत सारे सहाबा जजेस लगाए गए और इन सारे जजेस में एक सबसे रिस्पेक्टेड और बड़े जज थे हजरत [संगीत] अली रज अल्लाह ताला अनू। हजरत उमर रज अल्लाह ताला अनू ने हर सिटी में पहली बार एक पुलिस का सिस्टम भी बनाया और इन सिटीज के बाजारों में प्राइसेस को कंट्रोल में रखने के लिए भी एक डिपार्टमेंट बनाया और स्पेशली मदीना के बाजार को
कंट्रोल करने के लिए एक औरत शिफा बिंते अब्दुल्लाह को इसका लीडर बनाया। ये उस जमाने में बहुत ही अजीब बात थी कि हजरत उमर ने इतनी इंपॉर्टेंट पोस्ट पर एक औरत को कैसे बिठाया। लेकिन हजरत उमर सिर्फ मैरिट को देखकर ही फैसले किया करते थे। ये सब तो वो काम थे जो हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अन्ह ने सिविल एडमिनिस्ट्रेशन में किए थे। लेकिन इस सब के अलावा उन्होंने मुसलमानों की आर्मी को भी चेंज करना शुरू किया। मतलब इससे पहले हजरत अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनू के दौर में मुसलमानों की आर्मी और जनरल्स सारे
फैसले खुद ही किया करती थी। और हजरत अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनू ने ये करने की उन्हें इजाजत भी दी थी। क्योंकि उस जमाने में ना फ़स थे और ना इंटरनेट। तो अगर हर डिसीजन से पहले मदीना से पूछा जाता तो इससे मुसलमानों की फौज की स्पीड बहुत ही स्लो हो जाती। लेकिन हजरत उमर को मुसलमानों की फौज की स्पीड से ज्यादा इस्लाम की फिक्र थी। क्योंकि अगर देखा जाए तो मुसलमानों की इस एंपायर से भी बहुत बड़ी एंपायर चंगेज खान ने बनाई थी। लेकिन वो एंपायर सिर्फ 100 सालों में बिल्कुल खत्म हो गई।
लेकिन हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनू चाहते थे कि इस्लाम इस एंपायर के बाद भी आने वाले हजारों साल तक दुनिया में कायम रहे। तो उन्होंने अपने आर्मी चीफ खालिद बिन वलीद की तरफ एक लेटर भेजा और उन्हें इस एंपायर के नए रूल्स समझाए कि हर डिसीजन से पहले मदीना में खलीफा से पूछना लाजमी है। इसके अलावा हजरत उमर ने मुसलमानों की फौज के अंदर कुछ स्पाइस जासूस भी बिठाए जो इन जनरल्स को बगैर बताए उनकी हर खबर हजरत उमर तक पहुंचाते रहते थे। खालिद बिन वलीद ने जब हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनू का
लेटर पढ़ा के हर डिसीजन से पहले मदीना में खलीफा से पूछना पड़ेगा तो उन्होंने यह हुकुम मानने से इंकार कर दिया। इसलिए नहीं कि वो अपने आप को बहुत बड़ा समझते थे, बल्कि इसलिए क्योंकि ऐसा करने से मुसलमानों की फौज की स्पीड बहुत ही स्लो हो जाती और स्लो स्पीड के साथ आगे बढ़ना खालिद बिन वलीद का स्टाइल नहीं था। हजरत उमर ने दोबारा खालिद बिन वलीद की तरफ एक दूसरा लेटर भेजा कि तुम सिर्फ इसी शर्त पर मुसलमानों के आर्मी चीफ रहोगे। अगर इन ऑर्डर्स को मान लो। लेकिन अगेन खालिद बिन वलीद ने ऐसा
करने से इंकार कर दिया और कहा कि जब पहले खलीफा अबू बकर मुझसे नहीं पूछते थे तो आप मुझसे क्यों पूछ रहे हैं? लेकिन हजरत उमर ने खालिद बिन वलीद को मुसलमानों की फौज से हटाया नहीं बल्कि एक रैंक नीचे कर दिया और इसके बाद भी वह फौज के बहुत बड़े जनरल थे। मतलब फौज के सेकंड [संगीत] एंड कमांड जब अबू उबैदा रज़ अल्लाह ताला अनहु ने खालिद बिन वलीद को हजरत उमर का यह लेटर दिखाया [संगीत] तो चाहिए तो यह था कि खालिद बिन वलीद को बहुत ही सख्त गुस्सा आता कि उनकी सारी मेहनत
मतलब पहले अरब फतह करना उसके बाद परर्शियन एंपायर फतह करना और फिर रोमन एंपायर फतह करने के बाद उनको यह सिला दिया जा रहा है लेकिन यह लेटर पढ़ने के बाद खालिद बिन वलीद ने अबू उबैदा से कहा समय वाताना [संगीत] हमने सुना और हमने इतात की और बगैर किसी गुस्से या नाराजगी दिखाने के उन्होंने अबू उबदा से कहा कि आज से मैं आपका यानी आर्मी चीफ अबू उबैदा इबने जर्राह का राइट हैंड बनकर रहूंगा। इसे आज हम बहुत ही एक नॉर्मल बात समझते हैं क्योंकि वो सहाबी थे। ऑफ कोर्स उन्होंने ऐसा ही करना था।
लेकिन अगर हम दुनिया के सारे बड़े जनरल्स की हिस्ट्री उठाकर देखें तो ऐसा तारीख में कभी भी नहीं हुआ। हिस्ट्री में जब भी किसी लीडर ने अपने इतने ताकतवर जनरल को हटाने की कोशिश की है तो उस जनरल ने हमेशा बगावत की है या बगावत करने की कोशिश की है। फॉर एग्जांपल, इससे पहले परर्शियन बादशाह खुसरो ने जब अपने जनरल को हटाया, तो रुस्तम ने उसी के खिलाफ ही बगावत कर दी। और रोमन एंपायर के जनरल पमपी ने भी बगावत की। और इवन आज मॉडर्न दौर में भी जब पाकिस्तान के प्राइम मिनिस्टर नवाज शरीफ ने
अपने पावरफुल आर्मी चीफ मुशर्रफ को हटाने की कोशिश की। तो मुशर्रफ ने उल्टा उसे ही हटाकर पूरे मुल्क पर कब्जा कर लिया। इन सारे जनरल्स की खालिद बिन वलीद के सामने कोई औकात नहीं क्योंकि खालिद बिन वलीद को आज तक दुनिया के सबसे बड़े जनरल्स में से एक माना जाता है। लेकिन जब हजरत उमर ने उन्हें अपनी पोजीशन आर्मी चीफ के ओदे से हटाया तो उन्होंने बहुत ही पावरफुल होने के बावजूद कुछ नहीं किया और अपने लीडर खलीफा के ऑर्डर्स मान लिए। इस वक्त मुसलमान बहुत ही सख्त सिचुएशन में थे। एक तरफ रोमंस और दूसरी
तरफ पर्शियंस और अगर खालिद बिन वलीद भी बगावत कर देते तो मुसलमानों की एंपायर हमेशा के लिए खत्म होने का खतरा था। नाउ इस मसले पर जितनी मैंने रिसर्च की है उसमें मैंने देखा कि इस वाक्य में हजरत उमर और खालिद के अलावा एक [संगीत] थर्ड भी बहुत ही इंपॉर्टेंट किरदार है। मतलब एक तो हजरत उमर थे जिन्होंने बगैर किसी की परवाह किए मदीना [संगीत] की रियासत को स्ट्रांग करने के लिए इतना बड़ा फैसला लिया। दूसरा खालिद बिन वलीद जिन्होंने इतना पावरफुल जनरल होने के बावजूद कोई ऐसा स्टेप नहीं उठाया जिससे मुसलमानों की एंपायर को
नुकसान पहुंचे। और तीसरा [संगीत] इस एंपायर की आवाम पब्लिक आर्मी चीफ के ओदे से हटाए जाने के बाद एक दिन खालिद बिन वलीद मुसलमानों के एक ग्रुप से खिताब कर रहे थे जिसमें उन्होंने मुसलमानों के सामने खड़े होकर फरमाया कि मुझे शाम सीरिया फतह करने के लिए भेजा गया और जब मैंने पूरा शाम फतह कर लिया तो उमर ने मुझे अपनी पोजीशन से हटा दिया। [संगीत] अब जैसे ही उन्होंने यह बात कही तो मुसलमानों के क्राउड से एक आम सा सोल्जर खड़ा हुआ और उसने कहा कि ए हमारे सरदार ऐसी बातें मत करो क्योंकि इन
बातों से फितना पैदा [संगीत] हो सकता है। मतलब उस जमाने में मुसलमानों की इस एंपायर की आम पब्लिक में भी इतना शूर था कि वो यह बात बहुत ही अच्छी तरह जानते [संगीत] थे कि चाहे जो भी हो जाए लीडर लीडर होता है और जनरल सिर्फ एक जनरल। खालिद बिन वलीद को हटाने से सिर्फ उन्हें [संगीत] ही नहीं बल्कि पूरे इस्लामिक एंपायर में एक कंफ्यूजन फैल गई कि आखिर क्यों हजरत उमर ने इतने सख्त टाइम पर [संगीत] खालिद बिन वलीद को हटा दिया जिससे आहिस्ता-आहिस्ता लोगों में बहुत सारी गलतफहमियां फैलने लगी और लोग [संगीत] अजीब-अजीब
बातें करने लगे। फॉर एग्जांपल कुछ लोगों ने कहा कि हो सकता है खालिद बिन वलीद और हजरत उमर के दरमियान पुरानी कोई पर्सनल लड़ाई हो। इसीलिए हजरत उमर ने उसे हटा दिया। और कुछ और लोगों ने यह तक कहा [संगीत] कि हो सकता है खालिद बिन वलीद ने कोई करप्शन की हो। लेकिन अगेन हजरत उमर का जासूसों का नेटवर्क, स्पाइस का नेटवर्क इतना स्ट्रांग था कि [संगीत] उन्हें आवाम के इस कंफ्यूजन का पहले ही पता चल गया। तो हजरत उमर ने मुसलमानों को मदीना के मस्जिद नबवी में जमा होने का हुक्म दिया और फिर सबके
सामने खड़े होकर उन्होंने क्लियरली बता दिया कि मैंने उमर बिन खत्ताब ने अपने आर्मी चीफ खालिद बिन वलीद को किसी पर्सनल दुश्मनी या करप्शन की वजह से नहीं हटाया। बल्कि सिर्फ इसलिए क्योंकि खालिद बिन वलीद की जबरदस्त फतूहात की वजह से लोग अल्लाह की बजाय खालिद बिन वलीद पर ट्रस्ट करने लगे थे। और मैं सारे मुसलमानों को यह दिखाना चाहता हूं कि किसी भी जंग में जीत सिर्फ और सिर्फ अल्लाह की तरफ से आती है। किसी इंसान की तरफ से नहीं। और फिर यही सारी बातें उन्होंने लेटर्स में भी लिखी। और फिर इन लेटर्स को
हर सूबे के गवर्नर्स तक पहुंचा दिया ताकि खालिद बिन वलीद के कैरेक्टर पर कोई मुसलमान भी उंगली ना उठा सके। और इस वाक्य के बाद उन्होंने खालिद बिन वलीद की बेवा बहन के साथ शादी भी की। जिससे क्लियरली यह पता चलता है कि हजरत उमर और खालिद बिन वलीद के दरमियान [संगीत] इस वाक्य के बाद कोई इशूज़ नहीं थे। लोगों ने हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनू की बात सुनकर मान तो ली लेकिन अब हजरत उमर के सामने बहुत बड़ा चैलेंज था कि अब उन्हें नेक्स्ट हर जंग जीतना लाजमी था। क्योंकि अगर मुसलमान खालिद बिन
वलीद के जाने के बाद जंगे हारने लगते तो लोग हमेशा [संगीत] के लिए हजरत उमर के इस डिसीजन को गलत समझते। नाउ आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की वफात के बाद अबू बकर रजि अल्लाह ताला अन्ह की खिलाफत में अरब के बहुत सारे कबीलों ने मदीना की रियासत से बगावत की थी जिन्हें फिर खत्म तो कर दिया गया था बट इन जंगों में बहुत सारे लोगों को गिरफ्तार करके कैदी बनाया गया था लेकिन जब हजरत उमर रज अल्लाह ताला अनूह खलीफा बने तो उन्होंने इन सारे कैदियों को रिहा करने का हुक्म दिया और सबके लिए एक
आम माफी का ऐलान कर दिया जिससे पूरे अरब में उनकी पॉपुलैरिटी [संगीत] बहुत ही ज्यादा बढ़ गई और लोग हजरत उमर की इस रहमदिली से इतना खुश हुए कि उन्होंने आकर इस्लाम कबूल कर लिया और फिर अपनी मर्जी से मुसलमानों की फौज में शामिल हो गए। इन लोगों में एक शख्स तलेहा भी था और यह वो शख्स था जिसने इससे पहले अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनू के दौर में पैगंबर होने का झूठा दावा भी किया था। लेकिन जब वो हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनहु के पास आए तो हजरत उमर ने उन्हें भी माफ
कर दिया और वो भी मुसलमानों की फौज में शामिल हो गए। हजरत उमर के इन सख्त और जबरदस्त डिसीजंस के बाद अरब के लोग उनसे इतना खुश थे कि वह पुरानी सारी दुश्मनियां छोड़कर मुसलमानों के साथ शामिल हो गए। और पहली बार ऐसा भी हुआ कि क्रिश्चियंस ने भी आकर परर्शियन एंपायर के खिलाफ मुसलमानों का साथ देने की कसम खाई। तो अब हजरत उमर ने मुसलमानों और क्रिश्चियंस को मिलाकर परर्शियन एंपायर के खिलाफ एक नई आर्मी बनाई। इस फौज ने मुसन्ना की लीडरशिप में परर्शियन एंपायर की एक बहुत बड़ी फौज को हरा दिया। और एट
द सेम टाइम अबू उबैदा इबने जर्राह की लीडरशिप में भी मुसलमानों ने रोमन एंपायर की एक फौज को हराकर बहुत बड़ी फतह हासिल की। और इस तरह पूरी दुनिया ने देखा कि मदीना की रियासत मुसलमान खालिद बिन वलीद के बगैर भी जंगे जीत सकती और हजरत उमर रज अल्लाह ताला अनू का प्लान कामयाब हो गया। लेकिन अब मुसलमानों की तारीख की सबसे बड़ी जंग जंग यरमूक और जंग कासिया बहुत ही करीब आ [संगीत] चुकी है। जंग यर्मक मुसलमानों की तारीख की सबसे बड़ी और सबसे फेमस जंग जिसमें एक तरफ रोमन एंपायर अपनी फुल ताकत के
साथ 2 लाख की फौज लेकर खड़ी थी और दूसरी तरफ मुसलमान खालिद बिन वलीद की लीडरशिप में सिर्फ 300 मुसलमानों के साथ खड़े थे। पर वेट खालिद बिन वलीद को तो इस जंग से पहले ही आर्मी चीफ के ओदे से हटा दिया गया था। तो फिर वो इस जंग के लीडर आखिर बने कैसे? इस जंग की स्टोरी जंगे यरमूक की स्टोरी बहुत ही इंटरेस्टिंग होने वाली है। मुसलमानों ने पहले खलीफा अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनहु के दौर में उस वक्त की सुपर पावर्स रोमन और परर्शियन एंपायर से हड्डा ले लिया था। और जब हजरत
उमर रज़ अल्लाह ताला अनहु खलीफा बने तो मुसलमान खालिद बिन वलीद की लीडरशिप में इन दोनों एंपायर से यह सारा इलाका फतह कर चुके थे। लेकिन जैसे ही हजरत उमर खलीफा बने उन्होंने खालिद बिन वलीद को उनकी पोजीशन आर्मी चीफ के ओदे से हटा दिया जिसे हम इस वीडियो में एक्सप्लेन कर चुके और उनकी जगह अबू उबैदा इब्न जर्राह को मुसलमानों का नया आर्मी चीफ बनाया। नाउ खालिद बिन वलीद के जमाने में मुसलमान डोमेस्कस जैसी बड़ी सिटी को फतह कर चुके थे। यह इतनी बड़ी सिटी थी कि यह आज तक सीरिया शाम का कैपिटल है।
तो अबू उबैदा इबने जर्राह की लीडरशिप में मुसलमान इस सिटी से भी आगे बढ़े और रोमन एंपायर की एक दूसरी बहुत ही इंपॉर्टेंट सिटी तक पहुंचे। एंबेसा जिसे आज होम्स कहा जाता है। एंबेसा कोई आम सिटी नहीं थी। इसकी लंबी-लंबी दीवारें थी और इन दीवारों के सामने एक बहुत बड़ी नहर बनाई गई थी ताकि कोई इस सिटी के दीवारों तक ना पहुंच सके। अबू उबैदा की लीडरशिप में मुसलमानों ने इस सिटी को चारों तरफ से घेर लिया। लेकिन अब मसला यह था कि जब मुसलमान इस सिटी तक पहुंचे तो यह दिसंबर के सख्त सर्दी का
मौसम था और यहां बहुत ज्यादा बर्फबारी हो रही थी और मुसलमान तो सारे अरब के गर्म डेजर्ट से आए थे तो वो इस सर्दी को बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। काफी अरसा गुजरने के बाद भी मुसलमान इस सिटी को फतह नहीं कर सके और आखिर एक दिन मुसलमानों ने फैसला किया कि अब हम और थक गए तो वह इस सिटी को छोड़कर वापस जाने लगे। यह तारीख में पहली दफा था कि मुसलमान किसी जंग को छोड़कर वापस जा रहे थे। यह देखकर अमेसा का जनरल और आवाम बहुत खुश हुई और कहने लगे कि हमें पता
था यह अरब इस सर्दी को बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे। तो इस सिटी के जनरल ने अपनी फौज को मुसलमानों पर हमले का हुकुम दिया ताकि मुसलमानों को यहां से जल्दी भगा सके। जिसकी वजह से उसकी फौज किले से बाहर निकल आई और मुसलमानों का पीछा करने लगी। जैसे ही यह फौज अपने किले के तोपों और तीरों की रेंज से बाहर निकली तो मुसलमानों की फौज अचानक रुक गई और इन पर हमला कर दी और एट द सेम टाइम मुसलमानों की इन दो फौजों ने भी आकर इस फौज पर हमला कर दिया और इस तरह यह
सारी फौज खत्म हो गई और इनका जनरल मारा गया। मुसलमानों की आर्मी की इस जबरदस्त प्लानिंग को देखकर यही लगता है कि जरूर यह खालिद बिन वलीद का ही मशवरा होगा। अबू उबैदा मुसलमानों की फौज लेकर वापस सिटी के पास आए। अंबेसा के लोग जो अब तक बहुत खुश थे। यह देखकर उनका सारा हौसला टूट गया और उन्होंने सिटी की गेट्स खोलकर अबू उबैदा के सामने सरेंडर कर दिया। नाउ अब फाइनली टाइम आ चुका था कि मुसलमान शाम सीरिया से निकल कर रोमन एंपायर की कैपिटल तुर्की में कॉन्स्टेंटिनोबल जिसे [संगीत] आज इस्तंबोल कहा जाता है
उसकी तरफ बढ़ते। लेकिन अचानक एक मैसेंजर मुसलमानों की कैपिटल मदीना से खलीफा उमर बिन खत्ताब का एक बहुत ही इंपॉर्टेंट लेटर लेकर फुल स्पीड मदीना से एम्एसा की तरफ पहुंचा और उस मैसेंजर ने सीधा जाकर यह लेटर अबू उबैदा तक पहुंचाया। इस लेटर में बहुत ही एक अजीब बात लिखी थी। इसमें लिखा था कि बस इससे आगे मुसलमानों की फौज को बढ़ने की इजाजत नहीं है। और यह क्लियरली लिखा हुआ था कि एमएसा के बाद कोई भी दूसरा इलाका फतह नहीं करना। एंड ऑफ कोर्स अबू उबैदा और मुसलमानों की सारी फौज ने हजरत उमर के
इन ऑर्डर्स को बगैर किसी क्वेश्चन के मान ली। लेकिन अब हजरत उमर के इस ऑर्डर से एक बहुत बड़ा मसला यह हुआ कि मुसलमानों की फौज की स्पीड जो इससे पहले ही खालिद बिन वलीद के हटाने से बहुत [संगीत] ही स्लो हो चुकी थी। अब ऑलमोस्ट खत्म हो गई। और इतनी स्लो हुई कि आई मीन इस मैप को देखें। हजरत अबू बकर रज अल्लाह ताला अनो ने इससे पहले अपनी सिर्फ दो साल की खिलाफत में मदीना से डमस्कस तक यह इतना बड़ा इलाका फतह किया था। लेकिन अब हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनू के पहले
दो सालों में मुसलमान डोमस्कस से सिर्फ इतना ही आगे जा पाए। लेकिन अब क्वेश्चन ये था कि हजरत उमर आखिर क्यों मुसलमानों को आगे बढ़ने से रोक रहे थे? क्योंकि हजरत उमर रज अल्लाह ताला अनो को लीडरशिप की ट्रेनिंग खुद रसूल्लाह सल्लल्ला अलैहि वसल्लम ने दी थी और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को भी एक जमाने में मक्का वालों ने ऑफर दी थी और वो ऑफर यह थी कि हम आपको मक्का का बादशाह बना देंगे अगर आप अपने खुदा के साथ-साथ हमारे खुदाओं को भी सही कहा लेकिन आप सल्लल्लाहु अलह वसल्लम ने ये आसानी का रास्ता
अपनाने के बजाय इस ऑफर को ठुकरा दिया और कई साल तक मक्का वालों के जुल्मों को बर्दाश्त करते रहे। इसी तरह हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनू को भी पता था कि मुसलमानों के इन हर तरफ हमलों से मुसलमानों की यह एंपायर तो बहुत फैल जाएगी और वह खुद बहुत बड़े बादशाह तो बन जाएंगे। [संगीत] लेकिन इससे इस्लाम को कोई फायदा नहीं होगा। क्योंकि अगर आज देखा जाए तो पूरी दुनिया में ऑलमोस्ट 2 बिलियन मुसलमान है। लेकिन 2 बिलियन होने के बाद भी मुसलमानों की आज कोई हैसियत नहीं है। तो हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला
अनू चाहते थे कि चाहे मुसलमान नंबर्स में कम भी हो लेकिन सच्चे मुसलमान हो। मतलब हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनू को अपनी हुकूमत से ज्यादा इस्लाम की फिक्र थी। तो उन्होंने दोबारा हजरत अबू उबैदा की तरफ एक लेटर भेजा जिसका मफूम यह था कि अब तुम सिर्फ एक आर्मी चीफ नहीं बल्कि [संगीत] पूरे शाम के गवर्नर और पहले इस्लामिक लीडर हो। तो अब सिर्फ जंगों से ज्यादा लोगों को इस्लाम सिखाओ। और यहीं [संगीत] से पहली बार अरब से बाहर लोग इस्लाम के सिस्टम को जानने लगे। इससे पहले हजरत अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनू
के दौर में मुसलमान इतनी टेंस सिचुएशन में थे कि उन्हें इन नए इलाकों में इस्लामिक निजाम कायम करने का टाइम नहीं मिला। तो अब हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनू ने पहली बार दुनिया के सामने एक नया सिस्टम रखा खिलाफत का सिस्टम। और हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनू ने बहुत सोच समझ के हजरत अबू उबैदा को इस काम के लिए चूज़ किया। क्योंकि अबू उबैदा इबने जर्रा रज़ अल्लाह ताला इस्लाम के पहले 10 मुसलमानों में से थे। और इस्लाम लाने के बाद वो रसूल्लाह सल्ला वसल्लम के हर डिसीजन में उनके साथ शामिल थे। और
इस्लाम के साथ [संगीत] इतने लॉयल थे कि जब जंग बदर में मुसलमान और काफिर एक दूसरे के सामने हुए तो अबू उबैदा के वालिद दुश्मनों की फौज में थे। और फिर [संगीत] जब जंग शुरू हुई तो अबू उबैदा के वालिद उन्हीं के हाथों से मारे गए। जिसके बाद इनकी इस्लाम के साथ कमिटमेंट पर किसी को कोई शक नहीं था। इसीलिए हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनू ने खालिद बिन वलीद को हटाकर इन्हें मुसलमानों का नया लीडर बनाया। क्योंकि अब जंग से ज्यादा एक ऐसे लीडर की जरूरत थी जो लोगों को इस्लाम का असल मकसद सिखा
सके। तो हजरत अबू उबैदा रज अल्लाह ताला अनो ने पूरे शाम को छोटे हिस्सों में डिवाइड करके यहां के नए गवर्नर्स लगाए और खुद सबसे फ्रंट वाली सिटी एमएसा में अपना नया हेड क्वार्टर बनाया ताकि अगर मुसलमानों को कोई भी खतरा हो तो सबसे पहले इनको पता चले और अपने राइट हैंड खालिद बिन वलीद को शाम के असल कैपिटल दमश का गवर्नर बनाया और आमिर इबनस को उर्द जॉर्डन का गवर्नर लगाया और इन इलाकों में बिल्कुल इस्लाम के सिस्टम के मुताबिक जकात और जजिए का सिस्टम राइज किया। इस्लामिक कोर्ट्स और अदालतें भी बनाई और इवन
एक [संगीत] पुलिस का सिस्टम भी बनाया और सबके सामने यहां के ताकतवर लोगों को उनकी पोजीशन से हटाकर आम लोगों की तरह उनको [संगीत] सजाएं दी। यह सब जब रोमन एंपायर की आवाम ने देखा तो वो हैरान हुए कि यह लोग तो हमारी पिछली हुकूमत से बहुत बेहतर हैं। आखिर एक साल से भी ज्यादा अरसा गुजर गया और मुसलमानों ने एमएसा के बाद और कोई भी सिटी फतह नहीं बल्कि इस टाइम को यूज़ करके अपने इस एंपायर को मजबूत करने की कोशिश की। लेकिन इस सारे टाइम से ऑलमोस्ट एक साल से रोमन एंपायर के बादशाह
को भी टाइम मिला कि वह मुसलमानों के खिलाफ एक बहुत बड़ी फौज बना सके। लेकिन अब रोमन एंपायर इतनी कमजोर हो चुकी थी कि मजबूरन रोमन एंपायर के बादशाह हरकल रैकलेयस ने एक ऐसा काम किया जो इससे पहले सोचना भी इंपॉसिबल [संगीत] था। हुआ यूं कि रोमन एंपायर के बादशाह हरकल ने परशियन एंपायर के बादशाह की तरफ पहली बार दोस्ती का हाथ बढ़ाया। और सिर्फ यही नहीं बल्कि अपनी पोती की शादी भी परर्शियन एंपायर के बादशाह से कराई। और इस तरह तारीख में पहली बार रोमन और परर्शियन एंपायर सिर्फ दोस्त नहीं बल्कि रिश्तेदार बन गए।
यह बहुत ही इंपॉसिबल बात थी। क्योंकि इससे पहले रोमन और परर्शियन एंपायर पिछले 800 साल से एक दूसरे के बहुत बड़े दुश्मन। लेकिन अब इन दोनों एंपायर्स में मुसलमानों का इतना खौफ बैठ चुका था कि [संगीत] इन्होंने पिछले 800 साल की दुश्मनी बुलाकर एक दूसरे के साथ दोस्ती कर ली। यह ऐसा ही था जैसे आज पाकिस्तान [संगीत] और इंडिया किसी और के खिलाफ एक हो जाए और इवन वर्स फस्तीन और इजराइल किसी दूसरे के खिलाफ एक दूसरे [संगीत] के दोस्त बन जाए जो इंपॉसिबल लेकिन हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनू की खिलाफत मुसलमानों के खौफ
ने इन्हें एक होने पर मजबूर कर दी। तो अब इन दोनों एंपायर्स ने मिलकर मुसलमानों के खिलाफ अपनी-अपनी एंपायर्स में बहुत बड़ी फौज जमा करना शुरू कर दी। जिसके बाद जंग यरमूक और जंग काजिया जैसी अजीम जंग लड़ी। रोमन बादशाह ने अंताकिया में अपने सारे जनरल्स की एक मीटिंग बुलाई जिसमें उसने एक सिंपल सा क्वेश्चन पूछा कि आखिर क्या वजह है कि हम इन मुसलमानों से नंबर्स में ज्यादा होने के बावजूद हर जंग में हार जाते हैं। जिस पर उनके सारे जनरल्स ने एक ही जवाब दिया कि मुसलमानों की फौज का जो आर्मर होता है
वो हमारी फौज से बहुत ही हल्का होता है। इसीलिए उनकी स्पीड हमेशा हमसे बहुत तेज होती है और मुसलमान हमसे कभी एक जंग में नहीं लड़ते बल्कि हमेशा छोटे-छोटे ग्रुप्स में लड़ते हैं। तो रोमन बादशाह यह सब सुनकर अपने तख्त से खड़े [संगीत] हुए और कहा कि अब इन सारी बातों का सिर्फ एक ही हाल है और अगर तुम मेरे जनरल्स हमेशा के लिए अरबों की गुलामी से बचना चाहते हो तो [संगीत] पूरी रोमन फौज को इधर अंताकिया में जमा होने का हुकुम दो और साथ ही उसने अपने सारे सूबों के गवर्नर्स की तरफ लेटर्स
भेजे कि जो भी नौजवान जंग करने के काबिल हो उसे चाहते या ना चाहते हुए रोमन एंपायर की फौज में शामिल करके अंताकिया की तरफ भेजा जाए। जिसकी वजह से अंताकिया में रोमन एंपायर की एक बहुत बड़ी फौज लाखों की फौज जमा होने लगी और इनका प्लान यह था कि अब मुसलमानों की इन छोटी-छोटी ट्रिक्स से निकल कर आमने-सामने होकर एक बहुत बड़ी जंग लड़ी जाए। अब जब यह सब कुछ यहां पे हो रहा था तो वहां एमएस [संगीत] में मुसलमानों के जनरल अबू उबैदा इबने जर्रा को रोमन बादशाह के हर मूव की खबर मिलती
जा रही थी। जिससे वहां पर मुसलमान बहुत ही टेंशन में थे कि अब आखिर हम क्या करेंगे? इतनी बड़ी फौज का मुकाबला कैसे करेंगे? क्योंकि अब हर तरफ से रोमन एंपायर मुसलमानों से बदला लेने के लिए इनकी तरफ बढ़ रही थी। मुसलमानों की इस घबराहट को देखकर अबू उबैदा ने जल्दी से एक दूसरी मीटिंग बुलाई और अपने सारे जनरल्स को बुलाकर पूछा कि अब हमें इतनी बड़ी फौज के सामने क्या करना चाहिए? जिस पर सारे जनरल्स के मशवरे से यह फैसला किया गया कि हमें अंबेसा जिसे आज के जमाने में होम्स कहा जाता है। इस
सिटी को बगैर किसी लड़ाई के छोड़कर यहां से वापस दमशक की तरफ जाना चाहिए। जिधर उस वक्त खालिद बिन वलीद अपनी फौज के साथ मौजूद थे। लेकिन [संगीत] जाने से पहले अबू उबैदा इब्न जरार ने इस सिटी के फाइनेंस मिनिस्टर को बुलाया और उसे ऑर्डर्स दिए कि यहां जितने लोगों से भी जिजिया टैक्स लिया गया था उन सबको [संगीत] वो पैसे वापस कर दिए जाए क्योंकि यह जिजिया टैक्स हमने इनकी हिफाजत के लिए लिया था और अब जब हम इनकी और हिफाजत नहीं कर सकते तो इस टैक्स पर भी अब हमारा कोई हक [संगीत] नहीं
है। तो इधर मुसलमान इस सिटी को छोड़कर जाने की तैयारी कर रहे थे और वहां वह फाइनेंस मिनिस्टर अपनी टीम के [संगीत] साथ एमएसा के हर घर-घर तक जाकर लोगों को उनके टैक्स के पैसे वापस दे रहा था। यह देखकर [संगीत] यहां के लोग अगेन हैरान रह गए कि आखिर यह क्या मखलूक है कि हम तो सिर्फ इस बात पर खुश थे कि इन्होंने हमारे इलाके फतह करने के बाद हमें नहीं मारा और हमारी औरतों को भी कुछ नहीं कहा और हमारी जमीनें भी नहीं छीनी। और अब इस सब के बाद भी यह हमसे लिया
गया टैक्स भी वापस करके जा रहे हैं। इनमें से एक बंदे ने मुसलमानों के जनरल के पास आकर यह तक कहा कि खुदा आप लोगों को हमारे ऊपर दोबारा लाए। तो आखिर मुसलमान इस सिटी होम्स को छोड़कर यहां से दमशक की तरफ रवाना हुए। जहां खालिद बिन वलीद अपनी फौज के साथ इनका इंतजार कर रहे थे। दमश्क पहुंचते ही दोबारा सारे जनरल्स की मीटिंग स्टार्ट हुई कि अब आगे हमें क्या करना चाहिए। अब जब यह मीटिंग चल ही रही थी कि अचानक एक मैसेंजर जॉर्डन उर्दन से अम्र इबने आस का लेटर लेकर अबू उबैदा के
पास पहुंचा और इस लेटर में लिखा था कि रोमन एंपायर की फौज की ताकत को देखकर सिर्फ जॉर्डन में नहीं बल्कि हर तरफ बहुत सारे क्रिश्चियंस बगावत कर रहे हैं। और अब जब उन्होंने यह भी देखा कि मुसलमान उस फौज के डर से अमेसा छोड़कर वापस आ चुके हैं तो उनका कॉन्फिडेंस और भी बढ़ चुका है और हर तरफ इन बगावतों को कंट्रोल करना बहुत मुश्किल हो चुका है। अब मुसलमान दोनों तरफ से फंस चुके थे। मतलब इनके सामने रोमन एंपायर की 2 लाख की फौज इनके तरफ बढ़ रही थी और इनके पीछे हर तरफ
लोग बगावतें कर रहे थे। तो मुसलमान जनरल्स को समझ आ गई थी कि अब यहां दमश्क में रहना भी बहुत ही डेंजरस [संगीत] काम है। लेकिन दमशक इतनी बड़ी सिटी थी। मतलब यह फैसला इन जनरल्स ने नहीं बल्कि मदीना में खलीफा उमर बिन खत्ताब और उनके मिनिस्टर्स अब्दुल रहमान बिन औफ, उस्मान और अली रज़ अल्लाह ताला अन्ह ने करना था। तो सिर्फ कुछ ही दिनों में डायरेक्ट मदीना से उमर बिन खत्ताब का लेटर दमशक पहुंचा [संगीत] जिसमें लिखा था कि फैसला हो चुका है कि दमशक की इस सिटी को छोड़ दिया जाए और सिर्फ दमश
को नहीं बल्कि पूरे शाम को छोड़ दिया जाए और यहां से पीछे हटकर कोई ऐसी जगह जंग के लिए सेलेक्ट कर जिसकी लोकेशन ऐसी हो कि उसके पीठ के पीछे अरब का इलाका हो ताकि पीछे से कोई बगावतें ना हो सके और हमारे सारे दुश्मन हमारी आंखों के सामने हो। तो फौरन हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनहु के इस ऑर्डर पर काम शुरू हो गया और मुसलमान दमश को छोड़कर पीछे हटे और जॉर्डन में अम्र इबने आस की फौज की तरफ रवाना हुए। बट जाने से पहले यहां के सारे लोगों से भी जो टैक्स लिया
गया था अबू उबैदा ने वह टैक्स वापस करने का हुकुम दिया और यहां के लोग भी हैरान हुए कि यह यह कौन लोग हैं आखिर आखिर मुसलमानों की यह फौज और आमिर इब्न आस की फौज यरमूक के दरिया के पास एक दूसरे के साथ मिल गई और साथ ही शाम में मुसलमानों की जितनी भी फौज थी वो सारे भी आकर मुसलमानों की इस फौज के साथ शामिल हो गए और यह सब रोमन एंपायर की फौज का इंतजार करने लगे। वहां मदीना में भी हजरत उमर रज अल्लाह ताला और उनके सारे मिनिस्टर्स बहुत टेंशन में थे
कि अब इतनी बड़ी फौज का मुकाबला कैसे करेंगे क्योंकि ये अब तक इस्लाम की तारीख की सबसे बड़ी जंग थी तो उन्होंने इस फौज की मदद के लिए मदीना में इस फौज के लिए लोग जमा करना शुरू कर दिए तो हजरत उमर रज अल्लाह ताला अनू ने मस्जिद नबवी में सबको बुलाकर एक बहुत ही जबरदस्त पीठ की [संगीत] जिसमें सबसे पहले वो सहाबा भी सामने आए जो इस्लाम की पहली जंग जंग बदर में भी शामिल थे और अब उनकी ऐज भी बहुत ज्यादा लेकिन यह जंग इतनी खतरनाक थी कि जंग बदर के 100 सहाबा इस
जंग में शामिल होने के लिए तैयार हुए। मतलब जंगे बदर के 313 में से 100 सहाबा जो एक बहुत बड़ा नंबर है। तो ये बद्री सहाबा भी बिल्कुल जंग बदर की तरह अब तलवार उठाकर जंग यरमूक की तरफ जाने के लिए तैयार हुए। इन्हीं 100 सहाबा को देखकर 1000 और सहाबा भी इस जंग के लिए तैयार हुए। और इन 1000 सहाबा को देखकर 5000 और मुसलमानों ने भी यरमूक की तरफ जाने का वादा किया। यह देखकर हजरत उमर रज अल्लाह ताला अन ने भी इरादा किया कि वो खुद इस जंग को यरमूक में लीड करेंगे।
लेकिन फिर बाकी सहाबा ने उन्हें समझाया कि यह जंग जीतना बहुत ही मुश्किल काम है और कहीं ऐसा ना हो कि मुसलमान यह जंग हार जाए और खलीफा को भी नुकसान पहुंचे तो इससे इस्लाम को बहुत बड़ा नुकसान होगा। तो आप इस जंग के लिए खुद मर जाएं। अब वहां यरमूक के मैदान में एक तरफ 2 लाख और दूसरी तरफ सिर्फ 30,000 की फौज खड़ी थी। लेकिन काफी दिन गुजरने के बाद भी इन दोनों फौजों में कोई भी एक दूसरे पर हमला नहीं कर रहा था और कई हफ्तों तक रोमन कैंप से रात को शराब
और पार्टीज की आवाजें आती रहती थी और ऐसा लग ही नहीं रहा था कि ये लोग कोई जंग करने के लिए आए। तो यह देखकर खालिद बिन वलीद ने सोचा कि जरूर इसके पीछे कोई ना कोई साजिश चल रही हो। तो अचानक एक दिन रोमन जनरल वाहन का एक बंदा मुसलमानों के कैंप्स की तरफ आया और अबू उबैदा से कहा कि हम आपसे लड़ना नहीं चाहते बल्कि आप लोगों के साथ एक डील करना चाहते हैं। तो आप अपना कोई स्ट्रांग जनरल कल हमारी तरफ भेजें। तो अबू उबैदा रज़ अल्लाह ताला अन ने ऑफ कोर्स खालिद
बिन वलीद को उनकी तरफ भेजा। जैसे ही खालिद बिन वलीद वहां पहुंचे तो रोमन जनरल ने उन्हें डराने के लिए अपनी फौज को फुल सीधी लाइन में खड़ा किया और फुल आर्मर के साथ भर दिया ताकि मुसलमान जनरल के दिल में रोमन एंपायर का खौफ बैठ जाए। बट ये लोग किसको डरा रहे थे? खालिद बिन वलीद को आई डोंट थिंक सो। खालिद बिन वलीद इन सारी चीजों को इग्नोर कर सीधा रोमन जनरल के पास पहुंचे। तो जनरल सारो के सामने खड़े हुए और अपनी स्पीच स्टार्ट की जिसमें उन्होंने जीसस क्राइस्ट की कुछ तारीफ करने के
बाद अपने बादशाह हरकल की तारीफ करना शुरू की और कहा कि हरकल रोमन बादशाह पूरी दुनिया का सबसे ताकतवर बादशाह है। और जब वो इसकी कुछ ज्यादा ही तारीफ करने लगा तो खारिद बिन वलीद ने उसे रोक दी और कहा यस मैं मानता हूं कि तुम्हारा बादशाह सबसे बड़ा बादशाह है। हमारे बादशाह से भी बड़ा बादशाह। लेकिन जिस आदमी को हमने अपना लीडर बनाया वो असल में कोई बादशाह है ही नहीं बल्कि एक खलीफा है। और जिस दिन उसके दिल में बादशाहद की थोड़ी सी भी ख्वाहिश पैदा हुई हम उसको उसकी पोजीशन से हटा देंगे।
[संगीत] और यह बात बिल्कुल सही थी क्योंकि अगर देखा जाए तो यर्मोक के मुसलमानों की इस फौज में खलीफा उमर बिन खत्ताब के अपने बेटे अब्दुल्ला बिन उमर भी शामिल थे। लेकिन किसी जनरल की हैसियत में नहीं बल्कि एक आम सोल्जर की तरह। इसके [संगीत] अलावा पिछले खलीफा हजरत अबू बकर के बेटे अब्दुल रहमान बिन अबू बकर भी इस जंग में एक आम सोल्जर की तरह शामिल और इस फौज के जनरल सारे ऐसे लोग जिनका हजरत उमर रज अल्लाह ताला अनो के कबीले बनो आदी से दूर-दूर तक कोई ताल्लुक नहीं था। खालिद बिन वलीद ने
ऑफ कोर्स इस मीटिंग में रोमंस की सारी ऑफर्स को रिजेक्ट कर दिया और वापस अपने कैंप्स की तरफ आए। बट 1 मिनट यह अजीब बात नहीं है कि रोमंस 2 लाख होने के बाद भी मुसलमानों से जंग नहीं बल्कि डील करना चाहते थे। असल में यह सब कुछ झूठ था। रोमंस मुसलमानों से कोई डील नहीं बल्कि टाइम बाय करना चाहते थे। याद है आपने कहा था कि इस जंग से कुछ ही अरसा पहले रोमन और परर्शियन एंपायर दोस्त ही नहीं बल्कि रिश्तेदार बन चुके थे। और इन दोनों ने मुसलमानों के खिलाफ एक ही टाइम पर
फौजें जमा करना शुरू कर दी। तो रोमन एंपायर मुसलमानों से कोई डील नहीं बल्कि अपने दोस्त परर्जियन एंपायर की फौज का इंतजार कर रही थी ताकि वह जल्दी रेडी हो और हम दोनों एक साथ ही मुसलमानों पर हमला करके इन्हें खत्म कर दें। तो यह डील सिर्फ एक बहाना था जिसका खालिद बिन वलीद को पहले ही अंदाजा हो चुका था। तो उन्होंने सीधा एक लेटर हजरत उमर रज अल्लाह ताला अनो की तरफ भेजा कि यहां पर यह सब कुछ चल रहा है। तो हजरत उमर रज अल्लाह ताला अनू ने परर्शियन एंपायर में मुसलमानों की फौज
की तरफ ऑर्डर्स भेजे कि किसी भी हाल में परर्शियन एंपायर के साथ जंग मत करो बल्कि उनके साथ नेगोशिएशन स्टार्ट करो कि हम आपसे और जंग नहीं करना चाहते और हम अपने इलाकों में वापस जा रहे हैं ताकि इससे परर्शियन एंपायर की फौज स्लो हो जाए। एंड इट वर्क्ड। परर्शियन बादशाह यह सुनकर बहुत ही खुश हुआ और मुसलमानों से इन नेगोशिएशंस में उनका बहुत टाइम वेस्ट होने लगा। तो इस तरह हजरत उमर रज अल्लाह ताला अनू ने जबरदस्त प्लानिंग से परर्शियन एंपायर से जंग का खतरा थोड़ा डिले कर दिया। नाउ रोमन फौज यमुक में अब
भी परर्शियन फौज का इंतजार ही कर रही। लेकिन अचानक उन्होंने देखा कि मदीना से एक नई फौज ने आकर मुसलमानों की फौज को जॉइ कर लिया है। यह वही 6000 की फौज थी जो हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनू ने भेजी थी। लेकिन इस फौज को ऑर्डर्स दिए गए थे कि तुम सों ने एक साथ यरमोक के मैदान में दाखिल नहीं होना बल्कि हर दिन छोटे-छोटे ग्रुप्स 500 या 1000 लोगों ने इस मैदान में दाखिल होना है। जिससे बहुत बड़ा फायदा यह हुआ कि हर दिन रोमन एंपायर सुबह उठती है और देखती है कि सामने
एक नई फौज आकर मुसलमानों के साथ मिल जाती। तो आखिर रोमन जनरल वाहन ने सोचा कि अगर ऐसा ही चलता ना तो मुसलमानों को हराना बहुत ही मुश्किल हो जाएगा। तो आखिर एक दिन फाइनली ऑलमोस्ट एक महीने के बाद रोमन एंपायर की फौज अपने कैंप्स को छोड़कर आगे बढ़ने लगी और बिल्कुल मुसलमानों के सामने आकर खड़ी हो गई। यह देखकर मुसलमानों ने भी अपनी सफे सीधी की और दोनों फौजें जंग के लिए तैयार हो गई। इस एनिमेशन को देखें। यह जंग उस जमाने में एक्जेक्टली इसी तरह लग रही होगी क्योंकि यह है मुसलमानों की 3000
की फौज। और इनके सामने यह खड़ी है रोमन एंपायर की 2 लाख की फौज। इतना बड़ा डिफरेंस आजकल के कुछ मॉडर्न [संगीत] हिस्टोरियंस रोमन एंपायर की इस फौज को 2 लाख से कम 1 लाख के अराउंड कहती है। लेकिन इस्लामिक सोर्सेस में इसे ₹1.5 लाख से 2400 के दरमियान बताया गया है। सो लेट्स जस्ट टेक 2 लाख। अबू उबैदा ने अपनी फौज को ऑर्गेनाइज किया और अपनी फौज के पीछे अपने चार मेन जनरल्स खड़े किए। आमिर बिन आस, शराहबिन, खालिद और यजीद बिन अबी सुफियान। जंग से सिर्फ एक रात पहले अबू उबैदा ने अपने सारे
जनरल्स की एक मीटिंग बुलाई और इन सब ने मिलकर जंग की प्लानिंग करना शुरू की। अब जब यह सारे इस जंग की प्लानिंग कर रहे थे तो अचानक अबू उबैदा रज़ अल्लाह ताला अनू ने कहा कि आप सबका इस बारे में क्या ख्याल है कि हम सिर्फ इस जंग के लिए लीडर को बदल दें। मतलब मेरी जगह खालिद बिन वलीद को इस जंग का लीडर बनाएं। और आर्मी चीफ मैं ही हूं क्योंकि हम खलीफा के ऑर्डर्स के खिलाफ नहीं जा सकते। लेकिन सिर्फ इस जंग के लिए। व्हाट डू यू थिंक? इस पर सारे जनरल्स ने
कहा कि यह क्या बात कही आपने यह तो हम सब भी सोच रहे थे और जंग का असल मजा तो अब आएगा क्योंकि इन सबको पता था कि इस जंग में खालिद बिन वलीद जैसे दिमाग की बहुत सख्त जरूरत पड़ेगी। तो अगले दिन मतलब जंग यरमूक के पहले दिन अबू उबैदा इब्न जर्रा अपनी पोजीशन से नीचे आए और आम जनरल्स की रैंक्स में खड़े हो गए और खालिद बिन वलीद पीछे आकर दोबारा आर्मी चीफ की पोजीशन [संगीत] पर खड़े हो गए और जंग शुरू हुई। इस जंग में वह सारे ही बड़े सहाबा मौजूद थे जिनका
नाम हम हदीस और हिस्ट्री में बार-बार सुनते रहते हैं। फॉर एग्जांपल अबू जजर गफारी, अबू हुरैरा, अब्दुल्लाह बिन उमर, अबू अय्यूब अंसारी और 70 साल की उम्र में अमार बिन यासिर जिनके मां-बाप इस्लाम के पहले शोदा थे। ये सब इस जंग में मौजूद थे। और अबू बकर, उमर और उस्मान रज़ अल्लाह ताला अन्ह के बेटे भी इस जंग में शामिल थे। जंग का पहला दिन 15 अगस्त साल 636 था। मतलब हजरत उमर रज अल्लाह ताला अनू की खिलाफत को 2 साल हो चुके थे। रोमन फौज ने नंबर्स में ज्यादा होने की वजह से पहले मुसलमानों
पर हमला कर दिया और बहुत देर तक लड़ाई हुई। लेकिन इस दिन दोनों फौजों को कोई खास नुकसान नहीं हुआ। क्योंकि दोनों ही फौजे एक दूसरे की ताकत और हिम्मत को टेस्ट कर रहे थे और शाम होते ही दोनों फौजे अपनी-अपनी पोजीशंस पर वापस चली गई। इस जंग में एक रोमन सोल्जर जॉर्ज भी शहीद हुआ, शहीद, क्योंकि जंग से पहले ही जॉर्ज रोमन आर्मी को छोड़कर इस्लाम कबूल करके मुसलमानों के साथ शामिल हो गए और अपने इस्लाम के पहले ही दिन शहीद हो गए। जंग के दूसरे दिन रोमन एंपायर ने मुसलमानों को सरप्राइज़ करने के
लिए फजर के नमाज के डायरेक्ट बाद मुसलमानों पर हमला कर दिया। बट खालिद बिन वलीद को इस सब का पहले ही अंदाजा था। तो उनके पहुंचने से पहले ही मुसलमान जंग के लिए बिल्कुल रैली खड़े थे। इस बार रोमंस ने बिल्कुल जोर से हमला किए और आखिर थोड़ी जंग के बाद मुसलमानों की राइट साइड पर जिसे अम्र बिन आस लीड कर रहे थे। इतना प्रेशर पड़ा कि वो आहिस्ता-आहिस्ता मेन लाइन से पीछे हटने लगे और आखिर इतना पीछे तक आ गए कि बिल्कुल मुसलमानों के कैंप्स तक पहुंच गए। जहां मुसलमानों की औरतें और फैमिलीज मौजूद
थी। क्योंकि मुसलमान पिछले तीन सालों से रोमन एंपायर के अंदर रह रहे थे। तो इनके साथ इनकी फैमिलीज भी अरब को छोड़कर यहीं पर आबाद हो चुकी थी। जब इन औरतों ने देखा कि मुसलमान जंग से आहिस्ता-आहिस्ता पीछे हट रहे तो उन्होंने अपने कैंप्स के सामने बहुत सारे ऊंटों को लाइन में खड़ा करके ऑलमोस्ट एक दीवार बना दी और खुद तलवार उठाकर रोमन एंपायर की फौज के सामने जंग में कूद पड़े जो इससे पहले कभी भी नहीं हुआ था और कुछ औरतें अपने कैंप से मुसलमान मर्दों पर पत्थर फेंकने लगी और कुछ ऐसे अशार पढ़ने
लगी ताकि मुसलमान मर्दों को जंग से पीछे हटने में शर्म आए और वह आगे बढ़े एंड इट वर्क्ड मुसलमानों की फौज और पीछे हटने से रुक गई और अपनी जगह जगह पर मजबूती से खड़ी हो गई और उसी टाइम खालिद बिन वलीद अपनी फौज लेकर मुसलमानों की राइट साइड की हेल्प के लिए पहुंचे और फिर आमिर इब्न आस और खालिद रज़ अल्लाह ताला अनू ने मिलकर रोमन एंपायर की फौज को वापस धकेल दिए और वहीं पर वापस लेके आए जहां से जंग शुरू हुई। अब जब जंग दोबारा नॉर्मल हुई तो अचानक मुसलमानों की लेफ्ट साइड
जिसे यज़ीद बिन अबू सुफियान लीड कर रहे थे और बर्दाश्त ना कर सकी और यह भी बिल्कुल उसी तरह आहिस्ताआहिस्ता अपने कैंप्स तक पहुंच गए। जहां एक बार फिर मुसलमान औरतों ने तलवार उठाकर रोमन एंपायर के खिलाफ जंग में शामिल हो गए और बाकी औरतें फिर इन पर पत्थर फेंकने लगे और कुछ ऐसी पोएट्री करने लगे जिससे मुसलमानों का हौसला बढ़ सके और कहा जाता है कि इन औरतों में से एक हिंदा भी थी जिन्होंने जोर से एक पत्थर अबू सुफियान की तरफ फेंका और कहा कि अब जाकर अपने उन गुनाहों को साफ करो जो
तुमने इस्लाम लाने से पहले किए थे। इस सब के बाद यह फौज भी अपनी जगह पर स्टेबल हो गई। तो यह देखकर खालिद बिन वलीद अगेन राइट साइड से फुल स्पीड लेफ्ट साइड की मदद के लिए अपनी फौज के साथ दोबारा पहुंचे और फिर इस फौज को भी पीछे हटाकर जंग दोबारा वहीं ले गए जहां से शुरू हुई और फिर थोड़ी ही देर शाम होने के बाद रोमन फौज विदाउट गेनी एनीथिंग वापस अपने कैंप्स की तरफ चली गई। यरमूक के तीसरे दिन रोमन एंपायर ने दोबारा मुसलमानों पर हमला किया और अगेन थोड़ी सी जंग के
बाद उसी तरह मुसलमानों की राइट साइड दोबारा पीछे हटने लगी। लेकिन इन्हें इस बार ऑर्डर्स दिए जा चुके थे कि पिछले दफा की तरफ सीधी लाइन में पीछे नहीं हटना बल्कि एक स्पेसिफिक एंगल में हटना है ताकि रोमंस की पूरी फौज दो में डिवाइड हो जाए और खालिद बिन वलीद सेंटर से इन पर हमला कर सके। तो मुसलमान फौज ने भी एग्जैक्टली ऐसा ही किया। इसी तरह मुसलमान और रोमंस शाम तक लड़ते रहे और दोनों साइड से बहुत सारे लोग मारे गए और शाम होते ही रोमन फौज दोबारा अपने कैंप्स की तरफ वापस चली गई।
जंग यरमू का चौथा दिन इस जंग का सबसे खतरनाक दिन था जिसे आज भी द डे ऑफ लॉस्ट आईज कहा जाता है। इस बार रोमन जनरल वाहन ने अपनी स्ट्रेटजी बिल्कुल बदल दी और सुबह होते ही सिर्फ अपनी लेफ्ट साइड की फौज को मुसलमानों पर हमले का हुकुम दिया और दूसरी फौज को आहिस्ता-आहिस्ता लेकर आगे बढ़ने लगा। वाहन का यह प्लान बहुत ही जबरदस्त था क्योंकि कुछ ही देर के बाद अगेन मुसलमानों की राइट साइड जंग से पीछे हटने लगी। खालिद बिन वलीद ने यह देखकर सिचुएशन संभालने के लिए अबू उबैदा और यजीद को हुकुम
दिया कि यहीं खड़े रहने के बजाय तुम रोमन फौज पर हमला कर दो और खुद राइट साइड पर मुसलमानों की मदद के लिए पहुंचे। अबू उबैदा और उसकी फौज ने आगे जाकर रोमन एंपायर को काफी देर तक रोका रखा और काफी देर तक जंग इसी तरह चलती रही। आखिर रोमन जनरल ने अपने आर्चरर्स को आगे किया और उन्होंने अबू उबेदा की फौज पर तीर बरसाना शुरू कर दिया जिससे बहुत सारे मुसलमान शहीद हुए और जो मुसलमान बच गए उनमें से 700 लोगों के आंखों में तीर लगी जिससे वो ऑलमोस्ट ब्लाइंड हो गए [संगीत] जिससे मजबूरन
अबू उबेदा की फौज आहिस्ता-आहिस्ता पीछे हटने लगी। अब चौथे दिन पहली बार मुसलमानों की राइट और लेफ्ट दोनों फौजे इतने पीछे चली गई कि दोनों फौजे अपने कैंप्स तक पहुंच गई और वहां एक बार फिर औरतों ने अपने कैंप से निकल कर तलवार उठाकर रोमन एंपायर के खिलाफ लड़ना शुरू कर दिया और बाकी औरतों ने दोबारा मुसलमानों पर पत्थर फेंकना शुरू कर दिए ताकि उनकी अरब गैरत जाग सके। यरमूक के इस जंग में मुसलमान औरतों के इस रोल से बाद में एक मुसलमान सोल्जर ने यह भी कहा कि उस दिन यर्मक के दिन हमें रोमन
एंपायर की फौज से इतना डर नहीं लगता था जितना इन औरतों की बातों और पत्थरों से लगता था। इसी तरह मुसलमानों की फौज रोमन एंपायर से बहुत छोटी होने के बाद भी अपनी जगह पर मजबूती से खड़ी हो गई। जिस पर रोमन सोल्जर्स भी हैरान थे कि हम इनसे इतना ज्यादा होने के बाद भी इन्हें आखिर क्यों पीछे नहीं हटा पा रहे और आखिर कुछ ही देर बाद शाम हो गई और रोमन फौज 2 लाख होने के बावजूद अब तक कुछ हासिल ना कर सके और मजबूरन उन्हें जंग से पीछे हटना पड़ा। रोमन एंपायर की
फौज और जनरल का ख्याल था कि यह ज्यादा से ज्यादा एक या दो दिन की लड़ाई होगी। लेकिन मुसलमानों के हौसले और जज्बे को देखकर रोमन एंपायर का मोराल बिल्कुल डाउन हो गया। मुसलमानों को भी इस चौथे दिन सबसे ज्यादा नुकसान हुआ। और जब मुसलमान अपने शहीदों को जंग से उठाने के लिए गए तो उन्हें इन्हीं शहीदों में से इकमा बिन अबू जहल भी मिला जो इस जंग में बहुत बहादुरी से लड़े थे और जंग के दरमियान भी शहादत की कसम उठा चुके थे। मतलब कितनी अजीब बात यह इक्रमा अबू जहल का बेटा था जो
इस्लाम का सबसे बड़ा दुश्मन था और अब उसी अबू जहल के बेटे ने इस्लाम के लिए अपनी जान भी कुर्बान कर दी थी। चौथे दिन के बाद रात को वाहन ने अपने सारे जनरल्स की मीटिंग बुलाई और पूछा कि यह आखिर यह क्या हो रहा है? हम क्यों नहीं जीत पा रहे हैं? तो उसे बताया गया कि मुसलमान तो पीछे हटने वाले नहीं है और अब हमारी फौज भी बहुत ज्यादा थक चुकी है और और लड़ाई के काबिल नहीं रही। तो अपने सारे जनरल्स के मशवरे से वाहान ने आखिर एक फैसला लिया। पांचवा दिन शुरू
होते ही मुसलमान बिल्कुल रेडी जंग के लिए खड़े थे। लेकिन उस दिन रोमन एंपायर ने हमला किया ही नहीं बल्कि अपनी तरफ से एक मैसेंजर मुसलमानों की तरफ भेजा जिसने खालिद बिन वलीद को बताया कि रोमन फौज अब और जंग नहीं करना चाहती तो बस हम इस जंग को इधर ही खत्म कर देते किसी और दिन फिर दोबारा लड़ लेंगे मुसलमान इसके बाद भी उसी तरह अपनी लाइंस बनाकर खड़े रहे लेकिन पांचवें दिन कोई लड़ाई नहीं हुई तो खालिद बिन वलीद ने अपने सारे जर्नल्स को मीटिंग के लिए बुलाया और उन्हें रोमंस की इस ऑफर
के बारे में बताया तो कुछ जनरल्स ने बताया कि सिर्फ रोमन्स ही नहीं बल्कि मुसलमान भी काफी थक चुके हैं। तो हमें चाहिए कि हम इस ऑफर को मान लें। लेकिन अबू उबैदा और खालिद बिन वलीद दोनों की राय यह थी कि जंग तो अभी सिर्फ शुरू हुई है। तो सों की बातें सुनने के बाद खालिद बिन वलीद खड़े हुए और उन्हें बताया कि अब तक हमारी स्ट्रेटजी यही थी कि हम इन पर हमला नहीं करेंगे और अपनी जगह पर खड़े रहकर सिर्फ इन्हें थकाएंगे और जब यह लड़ कर थक जाएंगे तब हमारी असल गेम
शुरू होगी। तो खालिद बिन वलीद ने रोमन जनरल की ऑफर रिजेक्ट कर दी और सारी मुसलमानों की फौज को हमले के लिए रेडी रहने का हुक्म भेजा। छठे दिन रोमन फौज के बजाय एक यंग रोमन वॉरियर ग्रेगरी जो बहुत ही पावरफुल सोल्जर था। अपनी फौज से सामने आया और मुसलमानों के जनरल को चैलेंज किया। तो पहली बार अबू उबैदा इबने जरा उससे जंग के लिए आगे बढ़े। लेकिन खालिद बिन वलीद ने एकदम उन्हें रोक दिया कि आपकी उम्र 50 साल के करीब है। आप कैसे इस यंग लड़के से लड़ पाएंगे? तो अबू उबैदा ने जवाब
दिया कि अगर मैं नहीं गया तो लोग कहेंगे कि मुसलमानों का जनरल एक छोटे से लड़के से डर गया और इन केस अगर मैं इस लड़ाई में शहीद हो जाऊं तो मैं तुम्हें खालिद को अपने बाद आर्मी चीफ नॉमिनेट करता हूं। यह कहकर अबू उबेदा मुसलमानों की फौज से आगे बढ़े और लड़ाई शुरू हुई। काफी देर लड़ाई होने के बाद आखिर ग्रेगरी लड़ाई छोड़कर अपनी फौज की तरफ भागने लगा। लेकिन यह सिर्फ एक ट्रिक थी। जैसे ही अबू उबैदा उसके पीछे गए, उसने एकदम पीछे मुड़कर तलवार से फुल स्पीड उनकी तरफ वार की। लेकिन एट
द लास्ट सेकंड अबू उबैदा ने उसे डज करके अपनी तलवार से उसकी गर्दन उड़ा दी। [संगीत] यह देखकर पीछे खड़े खालिद बिन वलीद जोर से अल्लाहू अकबर का नारा लगाया। और उन्हीं के साथ पूरी मुसलमान फौज नारे लगाने लगी। और इसी के साथ खालिद बिन वलीद ने छ दिनों के बाद पहली बार मुसलमानों की फौज को रोमन एंपायर पर हमले का हुकुम दिया। अबू उबैदा अपनी जगह पर ही खड़े रहे और पीछे से मुसलमानों ने उन्हें जॉइ करके रोमन एंपायर पर हमला कर दिया और मुसलमानों की फौज फुल स्पीड आकर रोमन एंपायर की फौज से
टकरा गई। लेकिन मुसलमानों की इस सारी एक्साइटमेंट और जज्बे के बाद भी रोमन एंपायर की फौज मुसलमानों से इतनी ज्यादा थी कि मुसलमान उन्हें ज्यादा कोई नुकसान नहीं पहुंचा पाए। और काफी देर तक जंग इसी तरह चलती रही और बहुत सारे मुसलमान शहीद होने लगे और आहिस्ता-आहिस्ता ऐसा लगने लगा कि खालिद बिन वलीद ने यह हमला करके बहुत बड़ी गलती की है क्योंकि अब यहां से पीछे जाना भी इंपॉसिबल था। रोमन जनरल वाहन भी खालिद बिन वलीद की इस गलत स्ट्रेटजी को देखकर बहुत खुश हुआ और मुसलमानों की तरफ देखकर मुस्कुराने लगा। लेकिन अचानक उसने
देखा कि खालिद बिन वलीद अपने घोड़े पर अकेले मुसलमानों की राइट साइड पर फुल स्पीड भागने लगा। लेकिन उसने सोचा कि अकेले ये एक शख्स हमारा क्या बिगाड़ लेगा। किसी को पता नहीं था कि खालिद बिन वलीद आखिर अपने घोड़े पर कहां जा रहे हैं। जैसे ही खालिद बिन वलीद मुसलमानों को क्रॉस करते हुए पहाड़ के करीब पहुंचे तो अचानक आउट ऑफ नोवे पहाड़ के पीछे से 8000 हॉर्समैन फुल स्पीड खालिद रज अल्लाह ताला अनू के साथ शामिल हो गए और इन 8000 हॉर्समैन ने रोमन एंपायर की फौज पर राइट साइड से हमला कर दिया।
अब इसका किसी को पता नहीं था। जंग से एक रात पहले ही खालिद बिन वलीद ने इन 8000 हॉर्समैन को इस पहाड़ के पीछे भेजा था और इन्हें ऑर्डर्स दिए थे कि जब तुम मुझे अपने [संगीत] घोड़े पर फुल स्पीड भागता हुआ देखो तो यही तुम्हारा हमला करने का सिग्नल है। ये 8000 हॉर्समैन बहुत तेजी से रोमन एंपायर की फौज को क्रश करने लगे। यह देखकर रोमन एंपायर की सारी फौज में खौफ फैल गया। जिससे रोमन एंपायर की फौज आहिस्ता-आहिस्ता जंग छोड़कर हर तरफ भागने लगी और मुसलमान इनका पीछा करने लगे। यह फौज जंग से
फुल स्पीड इस पुल की तरफ भागी जो इनके भागने का मेन रास्ता था। लेकिन जैसे ही यह फौज पुल के करीब पहुंची उन्होंने देखा कि यहां भी पहले से मुसलमान फौज का एक डिवीजन खड़ा है और इन्हें भी एक रात पहले खालिद बिन वलीद ने इस फौज से छुपाकर [संगीत] पीछे ब्रिज के पास खड़ा किया था। मतलब खालिद बिन वलीद की कैलकुलेशंस इतनी पावरफुल थी कि उन्हें पता था कि यह जंग तो मैं जीत जाऊंगा। लेकिन जंग हारने के बाद जब रोमंस भागेंगे तो मैं इन्हें भागने भी नहीं दूंगा। और कहा जाता है कि जब
खालिद बिन वलीद ने यह मंजर देखा तो उन्होंने थोड़ी देर के लिए [संगीत] अपनी आंखें बंद की और अल्लाह का इस असीम फतह पर शुक्रिया अदा किया और फिर अपनी आंखें खोलकर सबसे पहले पूछा कि वाहान किधर है? तो उन्हें बताया गया कि वाहान तो यहां से भाग चुका है। तो खालिद बिन वलीद भी फुल स्पीड उसके पीछे गए और कुछ ही देर में उसे पकड़ कर मार दिया। इस जंग जंग यरमू को बैटल ऑफ द सेंचुरी कहा जाता है। जिसने दुनिया की तारीख को हमेशा के लिए बदल दिया। क्योंकि इस जंग से पहले शाम
और इस सारे इलाके में लोग ग्रीक और एरमेक जबान बोला करते थे। लेकिन इस जंग के बाद अगर आज तक देखा जाए तो यहां के लोग अपनी ज़बाने छोड़कर आज अरबी जबान बोलते हैं। और यह इलाका शाम में जो एक जमाने में क्रिश्चियनिटी का सेंटर हुआ करता था। आज पूरा का पूरा मुसलमान है। आप सिर्फ इमेजिन करें जब इस फतह की खबर मुसलमानों की कैपिटल मदीना पहुंची होगी तो वहां के सारे मुसलमान कितने खुश हुए होंगे। बट एट द सेम टाइम जब इस जंग के हार की खबर रोमन एंपायर के बादशाह हरकल तक पहुंची तो
उसने अंताकिया में आखिरी बार खड़े होकर शाम की तरफ देखा और कहा ए शाम की जमीन मैं तुम्हें सलाम पेश करता हूं। तुम दुनिया की सबसे खूबसूरत जमीनों में से एक हो। लेकिन अफसोस आज के बाद हम दोबारा यहां कभी भी नहीं आ सकेंगे। और यह कहते ही हरकल शाम को हमेशा के लिए छोड़कर अपने कैपिटल इस्तंबोल चला गया। इस जंग के बाद शाम में मुसलमानों को फ्री हैंड मिला कि वह जहां भी जाना चाहे जा सकते थे। लेकिन मुसलमानों ने रोमन एंपायर की कैपिटल तुर्की जाने के बजाय अपनी सारी फौज इस जंग के कुछ
ही दिनों बाद एक दूसरी सिटी की तरफ मोड़ी पैगंबरों की सिटी जेरूसलम जिसे फतह करने का मुसलमान बहुत टाइम से इंतजार कर रहे थे। इसीलिए यरमूक के कुछ ही दिनों बाद मुसलमान फौज यरमूक से सीधा जेरूसलम की तरफ गई और इस सिटी को चारों तरफ से घेर लिया। लेकिन मुसलमानों के इस खिलाफत के सारे मसले यरमूक के साथ खत्म नहीं हुए। क्योंकि जंग यरमू के सिर्फ 2 महीने बाद मुसलमानों की तारीख की [संगीत] दूसरी सबसे बड़ी जंग शुरू होने ही वाली थी जिसे जंग कासिया कहा जाता है। फलस्तीन जेरूसलम दुनिया की सबसे इंपॉर्टेंट सिटी एज
द कैपिटल ऑफ इज क्योंकि जेरूसलम और उसके आसपास अल्लाह ने अपने हजारों पैगंबर भेजे जैसे कि इब्राहिम दाऊद और सुलेमान अलहम सलाम और यहूदियों के मुताबिक इस सिटी यरूशलम का नाम सबसे पहले एक बहुत बड़े पैगंबर नूह अल सलाम के बेटे साम ने रखा था जिसका मतलब है यरूशलम द सिटी ऑफ पीस लेकिन उस टाइम से लेकर आज तक इस सिटी ने कभी पीस नाम की कोई चीज देखी ही नहीं। क्योंकि जेरूसलम दुनिया के तीन बड़े रिलजन, यहूदी, क्रिश्चियनिटी और इस्लाम सबके लिए एक होली सिटी है। क्योंकि जेरूसलम के अंदर यह जो जगह है जिसे
बैतुल मकदस कहा जाता है। इसकी यह साइट वेस्टर्न वॉल है जो आज यहूदियों के लिए सबसे होली जगह है। यहां से थोड़ी दूर एक चर्च है जो आज क्रिश्चियंस के लिए सबसे होली साइट है। क्योंकि क्रिश्चियंस का मानना है कि इस चर्च के नीचे आज तक ईसा अल सलाम की खाली कब्र मौजूद है। और इसी बैतुल मकदस के ऊपर मस्जिद अक्सा भी बनी हुई है। क्योंकि बैतुल मकदस मुसलमानों के लिए भी मक्का और मदीना के बाद दुनिया की सबसे होली जगह है। जब रसूल्लाह सल्ला अलैहि वसल्लम मक्का में थे। उन्होंने कई साल तक मक्का के
लोगों को इस्लाम की तरफ आने की दावत दी। लेकिन उनकी बहुत कोशिश के बाद भी मक्का के सिर्फ कुछ ही लोगों ने उनकी बात पर इस्लाम कबूल किया और यह लोग भी मक्का के कोई पावरफुल लोग नहीं बल्कि इनमें बहुत सारे ऐसे थे जो मक्का के सबसे कमजोर लोगों में से थे जिसकी वजह से मक्का के लोग इन पर बहुत जुल्म किया करते थे। इस सब के बाद भी आप सल्लाह वसल्लम इन सब से कहते रहते कि आज तो मुसलमान कमजोर हैं। लेकिन एक दिन ऐसा जरूर आएगा कि मुसलमान रोमन और परर्जन एंपायर दोनों को
फतह करेंगे। [संगीत] जिस पर मक्का के लोग उनका बहुत मजाक उड़ाते थे और कहते थे कि ये लोग हमारा यहां मक्का में मुकाबला नहीं कर सकते। तो ये रोमन और परर्शियन एंपायर से कैसे लड़े? लेकिन अब रसूल्लाह सल्ल वसल्लम की वफात के कुछ ही साल बाद मुसलमानों ने उमर बिन खत्ताब रज़ अल्लाह ताला अनू की खिलाफत में रोमन और परर्शियन एंपायर दोनों को यमुक और कातसिया जैसी जंगों में पूरी तरह हरा दिया था। और इन दोनों एंपायर्स को हराने के बाद अब मुसलमानों की दोनों बड़ी फौजें मदीना से हजरत उमर रज अल्लाह ताला अनू के
ऑर्डर्स का इंतजार कर रही है कि अब हमें इससे आगे और कहां जाना चाहिए। तो मदीना से सीधा एक लेटर परर्शियन एंपायर को साद बिन अबी वकास की तरफ गया और हजरत उमर ने उन्हें [संगीत] ऑर्डर दिया कि अब तुमने तब तक नहीं हुक्म जब तक परर्शियन एंपायर का कैपिटल बदई फतह ना हो जाए और पूरी परर्शियन एंपायर मुसलमानों के कंट्रोल में ना आ जाए तब तक तुमने पीछे नहीं हटना। तो साद बिन अबी वकास मुसलमानों की फौज के साथ पूरी परशियन एंपायर को फतह करने के लिए रवाना हुए। परर्शियन एंपायर में तो मुसलमानों की
फौज आहिस्ता-आहिस्ता कैपिटल की तरफ बढ़ने लगी। अब वहां रोमन एंपायर में मुसलमानों ने यरमोक की जंग जीतने के बाद बहुत तेजी से उन सारे इलाकों को दोबारा फतह कर लिया था। जिन्हें वो इससे पहले छोड़ चुके थे। और इस सारे इलाके को फतह करने के बाद अब मुसलमान मदीना से हजरत [संगीत] उमर रज़ अल्लाह ताला अनो के ऑर्डर का इंतजार कर रहे थे। तो फौरन मदीना से हजरत अबू उबैदा के लिए एक लेटर पहुंचे कि मुसलमानों की पूरी ताकत को साथ लेकर रोमन एंपायर की सबसे ओली सिटी पैगंबरों की सिटी जेरूसलम की तरफ जाओ और
उसे खिलाफत के कंट्रोल में लाओ। तो अबू उबैदा मुसलमानों की पूरी ताकत लेकर शाम से जेरूसलम की तरफ रवाना हुए और इस तरह मुसलमानों की यह अज़म फौज पहली बार फस्तीन में एंटर हुई। यरमोक जैसी खतरनाक जंग जीतने के बाद अब पूरी रोमन एंपायर में मुसलमानों को रोकने वाला कोई भी नहीं था। तो मुसलमानों ने सीधा जाकर जेरूसलम के शहर को चारों तरफ से घेर लिया। लेकिन मुसलमान यह नहीं चाहते थे कि जेरूसलम को भी बाकी सिटीज की तरह जंगों और तलवारों से फतह किया जाए। क्योंकि मुसलमानों को पता था कि यह पैगंबरों का शहर
है और वो नहीं चाहते थे कि इस सिटी में कोई खून खराबा हो। तो मुसलमानों ने इस शहर के चारों तरफ अपने कैंप्स लगाए और आराम से इस सिटी के सरेंडर का [संगीत] इंतजार करने लगे। लेकिन जेरूसलम के सबसे बड़े प्रीस्ट सफोनियस ने मुसलमानों की इतनी बड़ी फौज देखकर भी आसानी से सरेंडर नहीं किए और बार-बार अपने रोमन बादशाह हरकल की तरफ लेटर्स भेजता रहा कि आप रोमन एंपायर की पूरी फौज के साथ क्रिश्चियंस के सबसे होली शहर जेरूसलम को मुसलमानों के हाथों से बचाएं। लेकिन अगले 4 महीने तक सफ्रोनियस की बहुत कोशिश के बाद
भी पूरी रोमन एंपायर से एक जनरल भी उसकी मदद के लिए नहीं आया। क्योंकि यरमोक के मैदान में खालिद बिन वलीद ने रोमंस की कमर ऐसी तोड़ी कि अब वो मुसलमानों के सामने अपना सर कभी नहीं उठा सकते थे। आखिर 4 महीने के बाद सफ्रोनियस का हौसला टूट गया। और उन्होंने जेरूसलम से मुसलमानों के आर्मी चीफ अबू उबैदा की तरफ सरेंडर करने के लिए एक लेटर भेजा। लेकिन इस लेटर में उसने बहुत ही एक अजीब डिमांड लिखी थी कि मैं इस सिटी को सिर्फ एक शर्त पर मुसलमानों के हवाले करूंगा कि इस इस्लामिक एंपायर के
खलीफा उमर बिन खताब खुद आकर मुझसे मिले। लेकिन आखिर क्यों सफ्रोनियस खालिद बिन वलीद, अबू उबैदा और बाकी सारे जनरल्स के बजाय हजरत उमर के सामने ही क्यों सरेंडर करना चाहते थे? क्योंकि सफ्रोनियस को जेरूसलम की हिस्ट्री के बारे में बहुत अच्छी तरह पता था। और उसे पता था कि पिछले हजारों साल से जब भी किसी बादशाह ने इस सिटी को फतह किया उसने यहां की एक-एक चीज को तबाह किया। क्योंकि सफ्रोनियस के दिल में अब जेरूसलम को बचाने की सिर्फ एक ही उम्मीद थी। खलीफा उमर बिन खत्ताब क्योंकि सफ्रोनियस ने इससे पहले हजरत उमर
के बारे में बार-बार सुना था कि हजरत उमर दुनिया के बाकी सारे बादशाहों से बहुत ही डिफरेंट [संगीत] है। बल्कि वो अपने आप को बादशाह कहलवाना भी पसंद नहीं करते। और दुनिया का सबसे ताकतवर इंसान होने के बाद भी बिल्कुल आम लोगों की तरह जिंदगी गुजारते [संगीत] हैं। हजरत उमर रज अल्लाह ताला अनू की यही सिंपलीसिटी की स्टोरीज पूरी दुनिया में मशहूर हो चुकी थी कि एक बार एक रोमन जनरल मुसलमानों की कैपिटल मदीना [संगीत] है और सहाबा से कहा कि मुझे खलीफा उमर से मिलना है। उस जनरल का ख्याल था कि हजरत उमर जरूर
किसी बहुत बड़े महल या [संगीत] पैलेस में रह रहे होंगे कि मुसलमानों का इतना अजीम खलीफा जिसके नाम से पूरी दुनिया का कामती है। एक दरख्त के नीचे पत्थर पर सर [संगीत] रखकर आराम फरमा रहे हैं। हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनो की इसी सादगी का सफ़रोनियस को बहुत अच्छी तरह पता [संगीत] था और उसे पता था कि जेरूसलम को तबाही से सिर्फ हजरत उमर ही बचा सकते हैं। तो अबू उबैदा ने मजबूरन हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनू की तरफ खत भेजा कि बगैर किसी खून खराबे के अब जेरूसलम को सिर्फ आप ही फतह
कर सकते हैं। ये देखकर हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनू ने सारे बड़े सहाबा को अपने पास जमा किया और उनसे पूछा [संगीत] कि अब मुझे क्या करना चाहिए? जिस पर हजरत उस्मान रज अल्लाह ताला अनहु ने मशवरा दिया कि आपको जेरूसलम की तरफ नहीं जाना चाहिए क्योंकि रोमंस ऑलमोस्ट यह जंग हार चुके हैं और अब उनकी इतनी औकात नहीं है कि खलीफा [संगीत] खुद उनके पास जाए लेकिन वहां पर हजरत अली रज़ अल्लाह ताला अनू की राय यह थी कि हजरत [संगीत] उमर को जेरूसलम की तरफ जरूर जाना चाहिए। उमर रज़ अल्लाह ताला अनहु
को वहां सबसे ज्यादा हजरत अली रज़ अल्लाह ताला अनू की राय पसंद आई। इसी के साथ हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनहु अपनी खिलाफत में पहली बार [संगीत] मदीना को छोड़कर फ़स्तीन की तरफ रवाना हुए। और वहां रोमन एंपायर में भी मुसलमानों की सारी फौज यह सुनकर [संगीत] अपने खलीफा का बेसब्री से इंतजार करने लगी। लेकिन जाने से पहले हजरत उमर ने अली रज़ अल्लाह ताला अनो को अपने पास बुलाया और मदीना के साथ-साथ पूरे अरब का कंट्रोल हजरत अली के हवाले करके वहां से चले गए। पहली बार कोई खलीफा अरब से बाहर निकल रहा
था। इतनी बड़ी इस्लामिक एंपायर का खलीफा हजरत उमर कुछ ही सहाबा के साथ मदीना से जेरूसलम की तरफ रवाना हुए। मदीना और जेरूसलम के दरमियान 1400 कि.मी. का डिफरेंस है और इसे ऊंटों पर कवर करने में ऑलमोस्ट एक महीना लग जाता था। लेकिन इस इतने लंबे सफर के लिए भी हजरत उमर के पास सिर्फ एक ऊंट, कुछ खाने पीने की चीजें और साथ कुछ ही सवाबात थे। जबकि हजरत उमर उस वक्त दुनिया के सबसे ताकतवर लोगों में से एक थे। इसके मुकाबले में अगर आजकल के मुस्लिम लीडर्स को देखा जाए [संगीत] जैसे ही हजरत उमर
वहां एंटर हुए तो वहां खालिद बिन वलीद और यजीद बिन अबी सुफियान उनको वेलकम करने के लिए खड़े थे और इन दोनों ने इस इंपॉर्टेंट दिन की वजह से बहुत ही कीमती और महंगे कपड़े पहने थे। हजरत उमर ने जब इन दोनों के महंगे कपड़े देखे तो उन्हें बहुत सख्त गुस्सा आया और उन्होंने जमीन से कुछ पत्थर उठाकर इन दोनों की तरफ फेंके और कहा [संगीत] कि यह तुम लोगों ने क्या पहना है? इतनी जल्दी तुमने हमारे तरीके छोड़कर रोमंस के तरीके अपना लिए हैं। अब जैसे ही हजरत उमर यहां पहुंचे, तो वहां जेरूसलम के
क्रिश्चियंस को भी खबर मिल गई कि हजरत उमर सिर्फ उनकी रिक्वेस्ट पर मदीना से चलकर यहां पर आए हैं। दोस्तों फफ्रोनियस ने अपना मैसेंजर हजरत उमर रज अल्लाह ताला अनू के पास मुसलमानों के हेडक्वार्टर भेजा और यहीं पर हजरत उमर ने अपनी जिंदगी की सबसे इंपॉर्टेंट एक रिम जिसे आज तक पूरी दुनिया याद करती है साइन की। और यह तारीख में पहली बार था कि किसी बादशाह ने जेरूसलम को इस तरह फतह किया। बिस्मिल्लाहिहिर्रहमानिर्रहीम। यह अमान अल्लाह के बंदे [संगीत] अमीरुल मोमिनीन उमर बिन खत्ताब की तरफ से तमाम क्रिश्चियंस के लिए है कि अगर वह
जेरूसलम को छोड़कर जाना चाहे तो जा सकते हैं और अगर यहीं पर रहना चाहे तो उन्हें यहां कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा। मुसलमान किसी चर्च को नहीं गिराएंगे। मुसलमान किसी से उनका माल नहीं छीनेंगे। किसी को जबरदस्ती इस्लाम लाने पर मजबूर नहीं किया जाएगा। यहां तक कि किसी के साथ बदसलूकी रेसिज्म भी नहीं किया जाएगा। मुसलमान किसी से भी जबरदस्ती उनकी जमीनें नहीं छीनेंगे। बाकी हर सिटी की तरह इन्हें मुसलमानों को डेक्स जिजिया देना पड़ेगा। इस एग्रीमेंट में हजरत उमर और क्रिश्चियंस के दरमियान सिर्फ एक ही चीज पर क्लैश आया। यहूदी क्योंकि क्रिश्चियंस यहूदियों से
इतनी नफरत करते थे कि पिछले 600 साल से रोमंस ने यहूदियों के जेरूसलम [संगीत] आने पर पाबंदी लगा दी थी। हालांकि यह यहूदियों के लिए सबसे इंपॉर्टेंट जगह थी। क्रिश्चियंस ने जेरूसलम सरेंडर करने से पहले यही डिमांड रखी थी कि मुसलमान भी बिल्कुल पहले की तरह यहूदियों के इस सिटी में आने पर पाबंदी [संगीत] लगा दें। लेकिन हजरत उमर को उनकी यह बात पसंद नहीं आई और इस एग्रीमेंट में लिखा कि यहूदी जब भी जेरूसलम आना चाहे आ सकते हैं। लेकिन हजरत उमर को पता था कि अगर 600 साल बाद यहूदी दोबारा आकर जेरूसलम में
आबाद हुए तो यहां के क्रिश्चियंस और यहूदियों के दरमियान बहुत बड़ी लड़ाई शुरू हो गई। क्योंकि ये सिटी सब रिलीजंस के लिए एक होली सिटी थी। तो हजरत उमर ने ऑर्डर दिया कि यहूदी यहां आ तो सकते हैं लेकिन यहां रह नहीं सकते। हजरत उमर रज अल्लाह ताला अनू का यह ऑर्डर इतना ब्रिलियंट था क्योंकि अगर आज देखा जाए जब से यहूदी फस्तीन आकर जबरदस्ती आबाद हुए तब से लेकर आज तक फस्तीन में एक अनएंडिंग [संगीत] वॉर चल रही है जो आज तक जारी है। ये एग्रीमेंट लिखने के बाद हजरत उमर ने रसूल्लाह सल्लल्ला वसल्लम
की अंगूठी से इस एग्रीमेंट पर मोहर लगाई और खालिद बिन वलीद और बाकी सारे जनरल्स इस पर गवाही लिखी। नाउ इस मुएदे से सबसे ज्यादा खुशी यहूदियों को हुई क्योंकि पूरी दुनिया के यहूदियों ने 600 साल गुजरने के बाद पहली बार हजरत उमर रज अल्लाह ताला अनू की वजह से अपनी होलीियस सिटी जेरूसलम को दोबारा देखा। ये वही यहूदी थे जो इससे पहले हमेशा रसूल्लाह सल्लाहु अलैहि वसल्लम और इस्लाम के खिलाफ साजिशें करते रहते थे। लेकिन अब जब मुसलमानों को ताकत मिली तो मुसलमानों ने क्रिश्चियंस के सामने खड़े होकर यहूदियों के लिए आवाज उठाई। सफ्रोनियस
का यह मैसेंजर जब हजरत उमर रज अल्लाह ताला अनूह की एग्रीमेंट लेकर वापस जेरूसलम पहुंचा तो वहां सारे क्रिश्चियंस इसे पढ़कर सेलिब्रेट करने लगे क्योंकि उनका ख्याल था कि पिछले हर बादशाह की तरह हजरत उमर भी इस सिटी को फतह करने के बाद तबाह कर देंगे लेकिन हजरत उमर रज अल्लाह ताला अन्ह ने ऐसा नहीं किया और तारीख में पहली बार बगैर किसी खून खराबे के बिल्कुल अमन के साथ जेरूसलम फतह कर लिया। अब हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अन्ह का नाम यरूशलम के हर क्रिश्चियन की जबान पर था और यहां के सारे लोग इस
अज़ीम बादशाह को पहली बार देखने के लिए इंतज़ार करने लगे। तो हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनू भी मुसलमानों के हेडक्वार्टर को छोड़कर पहली बार जेरूसलम की तरफ रवाना हुए। जैसे ही हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनहु जेरूसलम के बाहर मुसलमानों की फौज के करीब पहुंचे तो वहां अबू उबैदा रज़ अल्लाह ताला अनहु और बाकी मुसलमानों ने उनका वेलकम किया। उन मुसलमान जनरल्स ने जब हजरत उमर रज अल्लाह ताला अनू के सादा और पुराने कपड़े देखे तो उन्होंने हजरत उमर रज़ ताला अनहु से रिक्वेस्ट की कि आप यह पुराने कपड़े चेंज करके कुछ नए और
महंगे कपड़े पहने और हजरत उमर रज अल्लाह ताला अनू की सवारी के लिए एक खूबसूरत घोड़ा भी लेकर आए लेकिन हजरत उमर रज अल्लाह ताला अनू ने उन सब से कहा कि नहीं एक जमाना था कि हम दुनिया के सबसे कमजोर और बैकवर्ड लोगों में से थे और आज जो हमें यह इज्जत मिली है वो हमारे कपड़ों या सवारी की वजह से नहीं बल्कि सिर्फ और सिर्फ इस्लाम की वजह से मिली। यह कहते ही हजरत उमर रज ताला अनू यहां से जेरूसलम की तरफ रवाना हुए। अब यहां पे एक बहुत ही इंटरेस्टिंग स्टोरी और एक
बहुत बड़ी कन्फ्यूजन भी है कि हजरत उमर रज अल्लाह ताला अनू अपने गुलाम के साथ सिर्फ एक ही ऊंट पर जेरूसलम की तरफ गए। रास्ते में ये दोनों बारी-बारी इस ऊंट की सवारी करते थे। और जैसे ही ये दोनों जेरूसलम पहुंचे तो ऊंट पर हजरत उमर ने बल्कि उनके गुलाम बैठे हुए थे। ये स्टोरी हम सब ने बचपन से बार-बार सुनी। लेकिन यह बिल्कुल एक अनऑथेंटिक स्टोरी है जो इस्लामिक हिस्ट्री के किसी भी बड़े बुक में नहीं मिलती। और यह स्टोरी लॉजिकल भी नहीं क्योंकि मुसलमानों की फौज जिसने चारों तरफ से जेरूसलम को घेर रखा
था उनके और जेरूसलम की गेट के दरमियान इतना फासला था ही नहीं कि जिसके लिए ऊंट को बार-बार चेंज किया जाए। इसके अलावा मुसलमानों की फौज में उस वक्त हजारों ऊंट मौजूद थे। उनमें [संगीत] से भी किसी ऊंट को यूज़ किया जा सकता था और अगेन ये स्टोरी किसी भी इस्लामिक ऑथेंटिक बुक में नहीं लिखी हुई। इन सब चीजों को देखकर यही लगता है कि यह स्टोरी बाद में आने वाले लोगों ने अपनी तरफ से बनाई है। और इस्लामिक हिस्ट्री की लेटेस्ट बुक तारीख उम्मते मुस्लिम में भी इस स्टोरी को एक अनऑथेंटिक स्टोरी कहा गया
है। लेकिन आपको मेरी बात सुनने की जरूरत नहीं है। खुद जाकर रिसर्च करें और चैट जीबीटी से मत पूछें। वो आपको गलत बताएं। खुद रिसर्च करें। हजरत उमर रज़ अल्लाह अल्लाह अल्लाह अल्लाह अल्लाह ताला सीधा जेरूसलम के अंदर एंटर हुए और वहां के सारे लोग उनकी सिंप्लिसिटी देखकर बहुत इंप्रेस हुए। जेरूसलम में क्रिश्चियंस के लीडर सफ्रोनियस हजरत उमर को सीधा उस चर्च की तरफ ले गए जो आज तक क्रिश्चियंस के लिए सबसे होली जगह है। हजरत उमर जब चर्च में ही थे तो नमाज का वक्त हुआ। सफ्रोनियस ने वहीं पर हजरत उमर को चर्च के
अंदर ही नमाज पढ़ने की रिक्वेस्ट की। लेकिन हजरत उमर ने वहां नमाज नहीं पढ़ी और कहा कि अगर मैंने यहां पर नमाज़ पढ़ ली तो मुसलमान जरूर इस चर्च को एक दिन मस्जिद में कन्वर्ट करेंगे। और हजरत उमर नहीं चाहते थे कि मुसलमान क्रिश्चियंस की इस होली जगह को बदल दें। और हजरत उमर की बात बिल्कुल सही थी क्योंकि आज इस चर्च के करीब ही उमर बिन खत्ताब के नाम से एक मस्जिद बनाई गई है। हजरत उमर यहां से सीधा बैतुल मकदस की तरफ गए और देखा कि रोमंस ने यहूदियों की नफरत की वजह से
बैतुल मकदस [संगीत] को गंदगी का ढेर बनाया हुआ है। तो हजरत उमर बाकी सहाबा के साथ खुद अपने हाथों से बैतुल मकदस की सफाई करने लगे। हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनू ने बैतुल मकदस की पूरी सफाई के बाद यहां पर सहाबा की एक मीटिंग बुलाई कि हमें यहां पर मस्जिद कौन सी जगह पर बनानी चाहिए? तो काब रज अल्लाह ताला अनू ने मशवरा दिया जो इस्लाम लाने से पहले यहूदी थे कि हमें मस्जिद बैतुल मकदस के इस पत्थर के पीछे बनानी चाहिए ताकि हम बैतुल मकदस और काबा [संगीत] दोनों को सामने रखकर नमाज पढ़
सके। लेकिन इस बात पर हजरत उमर को बहुत सख्त गुस्सा आया और उन्होंने काब से कहा कि तुमसे अभी तक यहूदियों की आदतें नहीं निकली। उसके बाद हजरत उमर रज अल्लाह ताला ने हुकुम दिया कि मस्जिद को बैतुल मकदस के इस पत्थर के आगे बनाई जाए [संगीत] जिसका मुंह काबा की तरफ हो और पीठ यहूदियों के इस पत्थर की तरफ हो क्योंकि अब दुनिया का क़बला बदल चुका है। और यहीं से पहली बार मस्जिद-ए-असा की बुनियाद रखी गई। और आज तक जब भी मुसलमान मस्जिद-ए-असा में नमाज़ पढ़ते हैं, तो बैतुल मकदस का यह पत्थर और
उसके ऊपर यह बिल्डिंग उनके पीठ के [संगीत] पीछे होती है। उमर रज़ अल्लाह ताला अनू के हुकुम से मुसलमानों ने यहां पर एक छोटी सी लकड़ियों की मस्जिद बनाई और मस्जिद बनाने के बाद हजरत उमर ने बिलाल रज़ अल्लाह ताला अनू से रिक्वेस्ट की जो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की वफात के बाद यहीं शाम में आबाद हो चुके थे। और हजरत बिलाल ने यह अहद किया था कि आप सल्लल्ला अल वसल्लम की वफात के बाद वह दोबारा [संगीत] कभी भी अजान नहीं देंगे। लेकिन अब यह इतना अजीम दिन था और खलीफा उमर रज अल्लाह ताला
अनू का ऑर्डर भी था। तो हजरत बिलाल रज़ अल्लाह ताला अनू आगे आए और उन्होंने पहली बार बैतुल मकदस पर खड़े होकर अजान देना शुरू किया। हजरत बिलाल रज अल्लाह ताला अनहु की अजान को सुनकर वहां मौजूद सारे सहाबा रोने लगे क्योंकि यही बिलाल आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जमाने में भी मदीना में अजान दिया करते थे। यह वो जमाना था जब मुसलमानों के पास कुछ भी नहीं था। यहां तक कि कई दिन तक उनके पास खाने पीने की चीजें भी नहीं होती थी। लेकिन इस सब [संगीत] के बाद भी आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मुसलमानों
से कहते रहते थे कि एक दिन ऐसा जरूर आएगा कि मुसलमान रोमन और परर्शियन एंपायर दोनों को हराएंगे। यहां तक कि जेरूसलम को भी फतह करेंगे। और आज मुसलमान इन दोनों एंपायर्स को हराकर दुनिया के सुपर पावर बन चुके थे। और वही बिलाल रज अल्लाह ताला अन दोबारा अजान दे रहे थे। उस दिन से लेकर आज तक पिछले 1400 साल से हर दिन बैतुल मकदस में उसी तरह अजान दी जाती है। और इस तरह इस अज़ीम सिटी पैगंबरों की सिटी जेरूसलम को बगैर कोई खून बहाए हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनू ने फतह कर लिया।
लेकिन जेरूसलम की फतह का तो रसूल्लाह सल्लल्लाहु वसल्लम ने पहले ही बता दिया था। लेकिन इसके साथ ही आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक और भी बहुत शॉकिंग बात कही थी कि एक दिन जंग तबूक के दौरान आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने कैब में बैठे हुए थे तो उन्होंने पास बैठे एक सबी से कहा कि मुझसे कयामत की कुछ निशानियां सुनो। मेरी मौत, जेरूसलम की फतह और इस फतह के बाद एक ऐसी बीमारी जो तुम मुसलमानों को ग्रेट नंबर्स में मारेगी। और जेरूसलम फतह करने के बाद एग्जैक्टली ऐसे ही हुआ। इस बीमारी ने हजारों मुसलमानों
की जान ली और मुसलमानों के बड़े-बड़े जनरल्स अबू उबैदा, यज़ीद और माज़ बिन जबल शहीद हुए और इन्हीं के साथ दुनिया की तारीख के सबसे बड़े जनरल खालिद बिन वलीद भी अपने जिस्म पर जख्मों की वजह से इस दुनिया से चले गए। इन सब बड़े-बड़े जनरल्स की वफात के बाद अब कुछ नए लोगों को चांस मिला कि वो सामने आकर लीडर्स बन सके। जिनमें से एक का नाम था मुआविया बिन अबी सुफियान। एक बहुत ही इंटरेस्टिंग हदीस है कि जब एक जंग के बाद रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम रात के टाइम अपने कैंप में बैठे हुए
थे तो एक सबी आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से मिलने के लिए उनके कैंप के अंदर गए तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उसे अपने पास बिठाया और उसे फ्यूचर के बारे में एक बहुत ही इंपॉर्टेंट बात बताई कि मुझसे कयामत की कुछ निशानियां सुनो मेरी मौत और उसके बाद जेरूसलम की फतह और फिर एक ऐसी वबा एक ऐसी बीमारी [संगीत] जो तुम मुसलमानों को ग्रेट नंबर्स में मारेगी। इस हदीस के बाद यह सब कुछ एकजेक्टली इसी तरह ही है। इस हदीस के कुछ ही अरसे बाद आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इस दुनिया से चले गए और
उनकी वफात के बाद कुछ ही सालों में मुसलमानों ने उमर बिन खत्ताब की लीडरशिप में यह सारे इलाके फतह कर लिए। यरमूक और कासिया जैसी अजीम जंगे जीतने के बाद एक तरफ मुसलमानों ने परर्शियन एंपायर में उनके कैपिटल मदाईन को फतह किया और दूसरी तरफ रोमन एंपायर में मुसलमानों ने पैगंबरों की सिटी जेरूसलम को फतह किया जिसे हम पूरा एक्सप्लेन कर चुके हैं। नाउ यहां से आगे मुसलमान रुके नहीं बल्कि हजरत उमर के ऑर्डर्स पर मुसलमानों ने अपनी फौज को ग्रुप्स में डिवाइड किया। एक ग्रुप अबू उबैदा और खालिद बिन वलीद की लीडरशिप में ऊपर
तुर्की की तरफ रवाना हुआ और दूसरा ग्रुप आम्र बिन आस की लीडरशिप में फस्तीन के इलाके गज्जा को फतह करने के लिए गया। यस वही गज़ जहां पर आज खालिद बिन वलीद और अबू उबैदा फुल स्पीड आगे बढ़ रहे थे। और बहुत सारी छोटी-छोटी जंगों के बाद मुसलमानों ने यह सारा इलाका भी फतह कर लिया। लेकिन इन सारी जंगों में एक जंग को डिस्कस करना बहुत ही इंपॉर्टेंट है। द बैटल ऑफ द आयरन ब्रिज क्योंकि यह जंग बिल्कुल यरमूक और कात्सिया की तरह एक बहुत बड़ी जंग होने वाली थी क्योंकि रोमन एंपायर हजारों की फौज
लेकर इस ब्रिज के पास खड़ी थी और दरिया के दूसरी तरफ अबू उबैदा सिर्फ 15,000 की फौज के साथ खड़े थे और अब एक बार फिर मुसलमानों और रोमंस के दरमियान एक बहुत बड़ी जंग होने वाली थी। लेकिन एक मिनट अगर यह इतनी एक बड़ी जंग तो हमने आज तक इसके बारे में कुछ सुना [संगीत] क्यों नहीं है? क्योंकि यह जंग शुरू होने से पहले ही खत्म हो गई। जैसे ही मुसलमानों की फौज एक दूसरे के सामने आई अचानक रोमन फौज ने देखा कि उनकी एक साइड से कुछ आवाजें आ रही थी। जब रोमन फौज
ने थोड़ा गौर से देखा तो एक दूसरी फौज फुल स्पीड इनकी तरफ बढ़ रही थी। एंड ऑफ कोर्स यह फौज कौन लीड कर रहा था? खालिद बिन वलीद आज तक इस बात का पता नहीं चला कि खालिद बिन वलीद ने कब और कैसे इस दरिया को क्रॉस किया था। लेकिन अचानक जंग से पहले ही खालिद बिन वलीद ने वहां पहुंचकर इस रोमन [संगीत] फौज को क्रश कर दिया और रोमंस एक बार फिर ये जंग छोड़कर भाग गए। और इस तरह ये इतनी बड़ी जंग शुरू होने से पहले ही खत्म हो गई। ये जंग सीरिया में
मुसलमानों की आखिरी जंग थी और इस जंग के बाद मुसलमानों ने हमेशा के लिए पूरे शाम को फतह कर लिया। अब मुसलमानों की खिलाफत का कंट्रोल सीरिया, फस्तीन, जॉर्डन और लेबनान तक फैल चुका था। जिसके बाद मुसलमानों के आर्मी चीफ अबू उबैदा यहीं पर रहे और खालिद बिन वलीद अकेले अपनी फौज के साथ पहली बार रोमन एंपायर के मेन हेड क्वार्टर तुर्की में दाखिल हुए और बहुत तेजी से रोमन एंपायर के कैपिटल कॉन्स्टेंटिनो पर इस्तंबोल की तरफ बढ़ने लगे। बट वेट अगर खालिद बिन वलीद रोमन एंपायर के कैपिटल के इतने क्लोज पहुंच चुके थे तो
फिर उन्होंने इसे फतह क्यों नहीं किया? बल्कि ये सिटी तो इससे 800 साल बाद एक दूसरे बादशाह सुल्तान मोहम्मद फाते ने फतह की थी। क्योंकि जैसे ही खालिद बिन वलीद तुर्की में दाखिल हुए यहां पर एक बहुत बड़ा मसला हुआ। हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनू ने खलीफा बनते ही खालिद बिन वलीद को उनके पोस्ट आर्मी चीफ के ओदे से हटा दिया था। लेकिन अब भी मुसलमान खालिद बिन वलीद को बाकी सारे जनरल्स से बहुत ज्यादा पावरफुल समझते थे। क्योंकि अब भी कुछ नए मुसलमान यह समझते थे कि आज ये खिलाफत राश्ता जहां भी है
सिर्फ खालिद बिन वलीद की वजह से है। और हजरत उमर को यह बात बिल्कुल भी पसंद नहीं थी। और वह सबको यह दिखाना चाहते थे कि यह खिलाफत मेरी या खालिद की वजह से नहीं बल्कि अल्लाह की वजह से कायम है। इसके अलावा एक मसला यह भी था कि इससे कुछ ही अरसा पहले एक दिन खालिद बिन वलीद कहीं बैठे हुए थे और एक शायर ने उनके सामने कुछ अशार पढ़े तो खालिद बिन वलीद ने खुश होकर उस शायर को 10,000 दरहम दिए। लेकिन अब मसला यह था कि हजरत उमर ने मुसलमानों की फौज में
अपने जनरल्स को कंट्रोल में रखने के लिए हर जगह जासूस बिठाए हुए थे। जैसे ही खालिद बिन वलीद ने उस शायर को पैसे दिए, वहां बैठे हजरत उमर के एक जासूस ने फौरन यह खबर मदीना में खलीफा तक पहुंचाई। हजरत उमर को यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आई कि हम यहां मदीना [संगीत] में बिल्कुल एक सादा और आम जिंदगी गुजार रहे हैं। और हमारे जनरल्स वहां अब यह सब कर रहे हैं। और हजरत उमर को इस बात का भी डर था कि कहीं खालिद [संगीत] बिन वलीद ने उस शायर को यह पैसे मुसलमानों की माले
गनीमत से ना दिए हो। तो फौरन हजरत उमर ने मदीना से एक लेटर आर्मी चीफ अबू उबैदा की तरफ भेजा। यह बहुत ही एक खतरनाक लेटर था जिसमें हजरत उमर ने तीन ऑर्डर्स दिए थे। नंबर वन जनरल खालिद बिन वलीद को एमएसा के सारे मुसलमानों के सामने पेश किया जाए और फिर सबके सामने उनसे यह पूछा जाए कि उन्होंने उस शायर को यह 10,000 दरहम अपनी जेब से दिए हैं या मुसलमानों के बैतुल माल से। अगर अपनी जेब से दिए हैं तो यह बिल्कुल फजूल खर्ची है और अगर बैतुलमाल से दिए हैं तो यह इस
एंपायर के साथ खयानत है। दोनों सूरतों में खालिद बिन वलीद को फौज से डिसमिस करना जायज है। नंबर टू खालिद बिन वलीद इस ऊपर वाले क्वेश्चन का जो भी जवाब दे [संगीत] उसे मुसलमानों की फौज से डिसमिस कर दिया जाए। नंबर थ्री और डिसमिस करने के बाद उसे फौरन मुसलमानों के कैपिटल मदीना में मेरे पास भेजा जाए। अब यहां पर प्रॉब्लम यह थी कि खालिद बिन वलीद की पर्सनालिटी से तो रोमन और परर्शियन एंपायर के बादशाह भी कांपते थे। तो अब हजरत उमर को इस काम के [संगीत] लिए एक ऐसे इंसान की जरूरत थी जो
खालिद बिन वलीद जैसे पावरफुल आदमी का भी हिसाब ले सके। और इस काम के लिए हजरत उमर ने एक बहुत बड़ा सहाबी मुअ रसूल बिलाल रज अल्लाह ताला अनू को चूज़ किया। बिलाल रज़ अल्लाह ताला अनू कोई आम सब सहाबी नहीं थे। उन्होंने इस्लाम बहुत ही सख्त टाइम में कबूल किया था। जब वह एक गुलाम थे और उनके मालिक उन पर बहुत सा जुल्म किया करते थे। लेकिन फिर भी वह इस्लाम से पीछे नहीं हटे। तो इसीलिए हजरत उमर ने खालिद बिन वलीद जैसे बड़े जनरल को कंफ्रंट करने के लिए बिलाल रज अल्लाह ताला अनहु
को भेजा। अब खलीफा के ऑर्डर को पूरा करने के लिए आर्मी चीफ अबू उबैदा ने होम सिटी के सारे लोगों को जमा किया और खालिद बिन वलीद को भी यहीं आने का हुक्म दिया। खालिद बिन वलीद ने यहां पहुंचकर यह महसूस किया कि कुछ तो गड़बड़ जरूर है क्योंकि अबू उबैदा अपना सर नीचे करके बिल्कुल खामोश बैठे थे और इस पूरे महफिल में बिल्कुल एक पिन ड्रॉप साइलेंस थी तो खालिद बिन वलीद आकर अपनी जगह पर बैठे और सामने बिलाल रज अल्लाह ताला अनू भी बैठे थे तो हजरत बिलाल रज ताला अनू ने बहुत वेट
किया कि अबू उबैदा कुछ बोलेंगे अब कुछ बोलेंगे लेकिन काफी देर गुजरने के बाद भी अबू उबैदा बिल्कुल खामोश रहे तो हजरत बिलाल रज अल्लाह ताला अनू को समझ आ गई कि अबू उबैदा बहुत ही एक सॉफ्ट इंसान है और उन्होंने खालिद बिन वलीद के साथ बहुत सारी जंग लड़ी थी और दोनों बिल्कुल भाइयों की तरह एक दूसरे के करीब थे। तो आखिर हजरत बिलाल इस महफिल में खड़े हुए और वहां सबके सामने खालिद बिन वलीद से पूछा कि ऐ खालिद हमारे खलीफा उमर बिन खत्ताब यह जानना चाहते हैं कि तुमने जो 10,000 दरहम उस
शायर को दिए थे वो तुमने अपने पैसों से दिए थे या मुसलमानों के बैतुल माल से। यह सुनकर खालिद बिन वलीद और वहां पर सभी बिल्कुल हैरान हो गए। तो बिलाल रज अल्लाह ताला अनू ने दोबारा पूछा कि खालिद यह पैसे अपने जेब से दिए थे या बैतुलमाल से। इस पर खालिद बिन वलीद ने आखिर कहा कि यह मैंने अपने पैसों से दिए थे। नाउ खालिद बिन वलीद इस वाक्य के बाद वापस अपने सोल्जर्स की तरफ चले गए। यहां पे एक बात नोट करना लाजमी है कि उस जमाने की दुनिया में स्लेव्स और स्पेशली ब्लैक
स्लेव्स को बिल्कुल जानवरों की तरह ट्रीट किया जाता था। लेकिन अब जब एमएसा में एक फॉर्मर ब्लैक स्लेव उस वक्त के सबसे ताकतवर जनरल को कंफ्रंट कर रहा था। वहां के लोग यह सब देखकर बहुत ही हैरान थे। लेकिन इस सब से यह क्लियरली पता चलता है कि रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने आखिरी खुदबे में जो बात कही थी कि किसी वाइट को किसी ब्लैक पर और किसी अरबी को किसी अजमी पर कोई फोकियत हासिल नहीं। इस तरह हजरत उमर की इस खिलाफत में रेसिज्म का कांसेप्ट बिल्कुल खत्म हो चुका था। खालिद बिन वलीद
तो वापस अपने सोल्जर्स के पास चले गए लेकिन अबू उबैदा इब्न जर्राह उन्हें यह बात बता ही नहीं सके कि इस लेटर में दो और पॉइंट्स भी हैं कि खालिद बिन वलीद को मुसलमानों की फौज से डिसमिस करके मदीना की तरफ भेजा जाए और वहां मदीना में हजरत उमर खालिद बिन वलीद का इंतजार करते रहे। लेकिन आखिर काफी दिनों बाद उन्हें समझ आ गई कि जरूर अबू उबदा ने उन्हें बताया ही नहीं होगा। तो हजरत उमर ने एक दूसरा खत खालिद बिन वलीद की तरफ डायरेक्ट भेजा कि तुम्हें फौज से डिसमिस कर दिया गया है
और फौरन सारे काम छोड़कर मदीना में आकर मुझसे मिलो। खालिद बिन वलीद हजरत उमर का लेटर पढ़ने के बाद दोबारा अबू उबैदा इब्न जर्राह के पास गए और उनसे कहा कि तुमने मुझे क्यों नहीं बताया कि हजरत उमर ने मुझे फौज से निकाल दिया है। तो अबू उबदा ने उन्हें कहा कि आज ये जो भी हो रहा है इसमें मैं बिल्कुल भी इनवॉल्व नहीं हूं। यह सब खलीफा के ऑर्डर्स हैं। तो आखिर फाइनली खालिद बिन वलीद शाम में अपनी फौज को छोड़कर मदीना की तरफ रवाना हुए। लेकिन मदीना जाने से पहले खालिद बिन वलीद शाम
के उन सिटीज की तरफ गए जिन्हें उन्होंने खुद फतह किया था। और खालिद बिन वलीद को देखकर उन सिटीज के लोग उनके इस्तकबाल के लिए बाहर निकले और वहां के लोगों के सामने आखिरी स्पीच करके उन्हें [संगीत] अलविदा कहा और फिर फाइनली मदीना पहुंचे। जैसे ही खालिद बिन वलीद मदीना पहुंचे और हजरत उमर के घर की तरफ जाने लगे तो रास्ते में ही उनकी मुलाकात खलीफा उमर से हुई। एक तरफ दुनिया का सबसे ताकतवर बादशाह उमर बिन खत्ताब खड़े थे। और दूसरी तरफ दुनिया के सबसे बड़े जनरल खालिद बिन वलीद। तो पहले हजरत उमर ने
फरमाया कि खालिद तुमने जो किया है वो दुनिया में आज तक कोई भी नहीं कर सका। लेकिन याद रखो जो भी होता है वह सिर्फ अल्लाह ही करता है। यह इन दो ग्रेट पर्सनालिटीज के दरमियान एक बहुत ही फ्रैंक डिस्कशन थी जिसमें खालिद बिन वलीद ने हजरत उमर से कहा कि आपने मेरे साथ जो यह किया है अच्छा नहीं किया। तो हजरत उमर ने उसे कहा कि पहले मुझे यह बताओ तुम्हारे पास इतने पैसे कहां से आए कि तुमने एक शायर को 10,000 दरहम दिए। तो खालिद बिन वलीद ने उन्हें कहा कि यह तो मैंने
अपने पैसों से दिए। तो खलीफा उमर ने हुकुम दिया कि खालिद बिन वलीद फॉर्मर आर्मी चीफ के पास जितना भी माल है उस सबका हिसाब लगाया जाए। जिस तरह आज भी यूएस कांग्रेस अमेरिका के सबसे ताकतवर लोगों को सामने बिठाकर उनसे हिसाब लेती है। चाहे वो कोई बिजनेसमैन हो या जनरल इसी मेरिट के सिस्टम की वजह से आज यूएस एक सुपर पावर है। और यही मेरिट का सिस्टम आज से 1400 साल पहले खिलाफत राश्ता में भी था। हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनहु के ऑर्डर्स पर बड़े सहाबा के एक ग्रुप ने खालिद बिन वलीद के
माल का हिसाब लगाया और उन्हें पता चला कि खालिद बिन वलीद का हिसाब किताब बिल्कुल क्लियर है। इस सब के बाद हजरत उमर ने खालिद बिन वलीद से कहा कि खालिद मेरे दिल में तुम्हारे लिए बहुत इज्जत है। लेकिन फिर भी हजरत उमर ने खालिद बिन वलीद को फौज से निकाल दिया और साथ ही अपने सारे गवर्नर्स को यह लेटर्स पहुंचाए कि मैंने खालिद बिन वलीद को किसी खयानत पर नहीं बल्कि इस बात पर फौज से हटाया है। क्योंकि अब भी बहुत सारे मुसलमानों के दिलों में यह बात थी कि मुसलमान सारी जंगे सिर्फ खालिद
बिन वलीद की वजह से जीतते हैं और मैं यह दिखाना चाहता था कि जंगे सिर्फ और सिर्फ अल्लाह की मदद की वजह से जीती जाती है। खालिद बिन वलीद इस सब के बाद वापस शाम की तरफ गए। एज अ जनरल नहीं बल्कि एक आम सब सहाबी की तरह अपनी जिंदगी गुजारने लगे। अब यहां पर बहुत सारे हिस्टोरियंस का ख्याल है कि हजरत उमर ने खालिद बिन वलीद को सिर्फ और सिर्फ अपनी कुछ पर्सनल दुश्मनी की वजह से हटाया था। लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं था। क्योंकि हजरत उमर सिर्फ खालिद बिन वलीद के साथ नहीं बल्कि
अपने हर जनरल को इसी तरह सख्ती से डील करते थे ताकि कभी भी कोई जनरल स्टेट से ज्यादा ताकतवर ना हो। फॉर एग्जांपल एक दिन हजरत उमर रज़ अल्लाह ताला अनहु को खबर मिली कि परर्शियन एंपायर में उनके जनरल साद बिन अबी वकास ने अपने हेड क्वार्टर कूफा की सिटी में लोगों के शोर और रश से बचने के लिए अपने ऑफिस और लोगों के दरमियान एक दरवाजा लगाया था। और जब शोर ज्यादा बढ़ जाता था तो वो कभी-कभी दरवाजा बंद कर दिया करते थे। जो एक बहुत ही नॉर्मल बात है। लेकिन जब मदीना में खलीफा
उमर को इस बात का पता चला तो उन्होंने सोचा कि यह तो हमारा जनरल अपने आप को आवाम से ऊपर समझ रहा है। तो उन्हें बहुत गुस्सा आया क्योंकि खिलाफत का निजाम यह था कि जनरल्स का दरवाजा हमेशा आवाम के लिए खुला रहना चाहिए। तो फौरन हजरत उमर ने अगेन एक बहुत बड़े सहाबी को मदीना से परशियन एंपायर में कूफा की तरफ भेजा और उसे हुकुम दिया कि जाकर जनरल साद बिन अबी वकास के दरवाजे को पहले निकालो। फिर उसके टुकड़े-टुकड़े करो और फिर उसे आग लगा दो। इस सबबी ने जाकर ऐसा ही किया और
इस वाक्य के कुछ ही अरसे बाद हजरत उमर ने साद बिन अबी वकास को भी बगैर किसी वजह के जनरल की पोस्ट से हटा दिया और वजह अगेन वही थी कि कोई भी जनरल मुसलमानों की स्टेट से पावरफुल ना हो जाए। और इसके बाद अगेन हजरत उमर ने एक दूसरे जनरल वगीरा बिन शोबा की तरफ भी लेटर भेजा कि तुम जरा मदीना आओ मेरा तुम्हारे साथ जरूरी काम है। इन शॉर्ट हजरत उमर रज अल्लाह ताला अनहु की खिलाफत में उन्होंने अपने किसी भी जनरल और गवर्नर को अपनी पोस्ट पर ज्यादा अरसा रहने नहीं दिया और
यही हजरत उमर की खिलाफत की सबसे बड़ी क्वालिटी थी। खलीफा उमर बिन खत्ताब की जिंदगी की सबसे बड़ी अचीवमेंट्स में से एक पता है क्या थी? फिरौनों के मुल्क इजिप्ट को फतह करना जो उस जमाने की दुनिया में सबसे ताकतवर और रिच इलाका था और जिसे फतह करने के बाद पूरी खिलाफत को मुसलमान जश्न मना रहे थे। लेकिन जैसे ही मुसलमानों ने इजिप्ट को फतह किया। यह एग्जैक्ट वही टाइम था कि जब यहां से बहुत दूर मुसलमानों के जनरल और अल्लाह की तलवार खालिद बिन वलीद अपने मौत [संगीत] के बिस्तर पर आखिरी सांसे ले रहे
थे। बट वेट लेट्स गो बैक। इस सबसे 4 साल पहले खलीफा उमर ने खालिद बिन वलीद को मुसलमानों की फौज से निकालकर उन्हें खिलाफत की हर पोस्ट से दूर रहने का हुक्म दिया था। जिसके बाद खालिद बिन वलीद आराम से सब कुछ छोड़कर अपने घर चले गए। लेकिन इस टाइम को भी उन्होंने वेस्ट नहीं किया क्योंकि उन्हें पता था कि उनकी सारी जिंदगी इस्लाम के लिए जंगों में गुजरी। तो अब पहली बार उन्हें टाइम मिला कि वो तलवार को छोड़कर कुरान को स्टडी करें। लेकिन अपनी ये जिंदगी में खालिद बिन वलीद सुकून से नहीं गुजार
सके। क्योंकि फौज से निकलने के कुछ ही अरसे बाद एक बहुत बड़ी बीमारी ताऊून की वजह से खालिद बिन वलीद के ऑलमोस्ट सारे बेटे उनकी आंखों के सामने फौत होने लगे। मतलब खालिद बिन वलीद [संगीत] को जिंदगी के आखिरी हिस्से में अपने सारे जवान बेटों के मरने का गम देखना पड़ा और उनके सिर्फ तीन ही बेटे जिंदा रहे। जिनमें से एक बाद में खलीफा अली रज़ अल्लाह ताला अनू की फौज में जंग सिफीन के दौरान शहीद हो गए। खालिद बिन वलीद की वफात से पहले लोग दूर-दूर से आकर उनसे आखिरी बार मिलने लगे। जिनमें से
एक बहुत ही क्लोज फ्रेंड जब खालिद बिन वलीद से आकर मिले तो खालिद बिन वलीद ने उसे अपने जिस्म पर लगे जख्म दिखाए और उससे पूछा कि क्या तुम्हें मेरे जिस्म पर ऐसी कोई [संगीत] भी जगह नजर आ रही है जिस पर तलवार या नेज़े का कोई जख्म ना हो। उस शख्स ने हैरान होकर कहा कि वाकई आपका जिस्म तो पूरा का पूरा जख्मों से भरा हुआ है। जिस पर खालिद बिन वलीद ने अपने इस दोस्त से कहा कि क्या इन जख्मों को देख कर तुम्हें समझ नहीं आ रही कि मैंने हर जंग में शहीद
होने की बहुत कोशिश की है। कि मैं तो अकेले अपने घोड़े के साथ हजारों की फौज के अंदर घुस जाता था। लेकिन फिर भी मुझे कोई ना मार सका और आज मैं यहां एक बीमार ऊंट की तरह अपने बिस्तर पर शर्म के साथ मर रहा हूं। जिस पर उनके दोस्त ने कहा कि क्या मतलब आपको पता नहीं है जब रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने आपको सैफुल्लाह अल्लाह की तलवार का टाइटल दिया था। उसी वक्त यह बात क्लियर हो चुकी थी कि आपको [संगीत] अल्लाह की तलवार खालिद बिन वलीद को कोई भी किसी भी जंग में
तोड़ नहीं सकता। यह सुनकर खालिद बिन वलीद के दिल को आखिर थोड़ा सुकून मिला और वो आराम से अपने बिस्तर पर लेट गए और इसके कुछ ही अरसे बाद इस्लाम के तारीख के सबसे बड़े जन्नत रोमन और परर्शियन एंपायर की ताकत को तोड़ने वाले दमशक और जेरूसलम को फतह करने वाले और यमामा और यरमूक जैसी अजीम जंगे जीतने वाले अल्लाह की तलवार खालिद बिन वलीद अपने [संगीत] छोटे से घर में सिर्फ एक घोड़ा और कुछ तलवें छोड़कर इस दुनिया से चले गए। मे पीस बी अपॉन हिम। खालिद बिन वलीद सीरिया की सिटी होम्स में फौत
हुए थे। जहां पर आज तक उनकी खबर है। खालिद वलीद लेकिन खालिद बिन वलीद के मरने की खबर बिल्कुल एक आग की तरह पूरी खिलाफत में फैल गई। और जैसे ही यह खबर मदीना तक पहुंची, मदीना के हर गली से चीखने की आवाजें आने लगी। और वहां की औरतें इस अजीम जनरल की डेथ पर जोर-जोर से रोने लगी। लेकिन अब मसला यह था कि हजरत उमर ने इससे पहले ही मदीना में इस बात पर पाबंदी लगाई थी कि चाहे जो भी मर जाए कोई भी उसके लिए जोर से नहीं रोएगा। देखिए खालिद बिन वलीद की
मौत पर लोग इस पाबंदी को बिल्कुल भूल गए और मदीना की गलियों में औरतें जोर-जोर से रोने लगी। अब जब हजरत उमर तक इनकी आवाज पहुंची। वो फुल गुस्से में अपने घर से बाहर निकले और पूछा आखिर कौन है? जिसके लिए यह सब रो रहे हैं। तो उन्हें बताया गया कि यह सब आपके जनरल और अल्लाह की तलवार खालिद बिन [संगीत] वलीद की मौत पर रो रहे हैं। यह सुनकर हजरत उमर बिल्कुल अपनी जगह पर खामोशी से खड़े रहे और काफी देर खामोश रहने के बाद हजरत उमर ने पहली बार मदीना के लोगों को अपना
ऑर्डर तोड़ने की इजाजत दी [संगीत] और कहा कि अगर खालिद के लिए आज कोई रो रहा है तो उसे रोने दो। बल्कि कहा जाता है कि हजरत उमर खुद भी रोए। अब हजरत उमर को इस बात का पता नहीं था कि खालिद बिन वलीद ने अपनी वफात [संगीत] से पहले अपना सब कुछ हजरत उमर के हवाले करने का हुक्म दिया था कि उनके बाद हजरत उमर ही उन्हें इंसाफ के साथ डिवाइड करें। लेकिन जब खालिद बिन वलीद की वफात के बाद उनकी जायदाद का हिसाब लगाया गया तो यह देखकर सब हैरान रह गए कि इस्लाम
के सबसे बड़े जनरल खालिद बिन वलीद के पास सिर्फ तलवारें, एक घोड़ा और कुछ ही चीजें थी। मतलब खालिद बिन वलीद इतने बड़े जनरल के पास बेसिकली कुछ भी नहीं था। जिसके मुकाबले में अगर आज के मुसलमान जनरल्स को देखा जाए मिलियन पैलेसेस टू गोल्ड प्लेटेड कार्स एंड प्राइवेट जेट्स। खालिद बिन वलीद की वफात के बाद हजरत उमर सिर्फ दो साल ही जिंदा रहे। लेकिन इन दो सालों में हजरत उमर कभी भी खालिद बिन वलीद को [संगीत] भूल ना सके और बार-बार मुसलमानों की गैदरिंग्स में खालिद बिन वलीद को याद करते रहे। यहां तक कि
एक दिन हजरत उमर के पास अरब [संगीत] का सबसे बड़ा शायर आया ताकि उनके सामने अपनी शायरी पेश करें। तो हजरत उमर ने बाकी सारी चीजें छोड़कर उस शायर से सिर्फ एक ही डिमांड की कि मुझे मेरे जनरल खालिद बिन वलीद की बहादुरी पर शेर पढ़कर सुनाओ। जिसके बाद इस शायर ने अपने फुल जोश में खालिद बिन वलीद की बहादुरी को सबके सामने प्रेजेंट किए। [संगीत] देखिए जैसे ही वो शायर खामोश हुआ। हजरत उमर ने इस अरब के सबसे बड़े शायर से कहा कि तुम्हारे सारे अल्फाज़ ने मिलकर भी खालिद की बहादुरी के साथ इंसाफ
नहीं किया। सब्सक्राइब