वन नेशन वन इलेक्शन कॉन्स्टिट्यूशन को डिस्ट्रॉय करना चाहता है या भारत की डेमोक्रेसी को फिक्स करना चाहता है। क्या सही है और क्या गलत? सिस्टम में सुधार लाना है तो बदलाव की जरूरत होती है। लेकिन अगर बदलाव गलत दिशा में हो तो वो भारत को खोखला बना सकते हैं। आज के वीडियो में हम वन नेशन वन इलेक्शन को तीन हिस्सों में बांटेंगे। रेड फ्लैग, येलो फ्लैग और ग्रीन फ्लैग। और समझेंगे कि वन नेशन वन इलेक्शन का असली सच क्या है। तो प्लीज इस वीडियो को एंड तक देखिए। और अगर आपको लगता है कि हमने कुछ
पॉइंट्स मिस कर दिए तो हमें कमेंट्स में जरूर बताइए। चलिए बिना टाइम वेस्ट किए मुद्दे पर आते हैं। वन नेशन वन इलेक्शन की जरूरत क्यों? भारत दुनिया की लार्जेस्ट डेमोक्रेसी है जो हमेशा ही इलेक्शन मोड में रहती है। जनरल इलेक्शंस खत्म हुए तो अगले साल किसी स्टेट के असेंबली इलेक्शंस होंगे। फिर कभी पंचायत के या फिर म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के इलेक्शन और हर बार पॉलिटिकल पार्टीज रैलियां निकालेंगी और रास्ते जाम कर देंगी। यहां सवाल पैदा होता है कि पुलिस जनता को सुरक्षित रखेगी या वीआईपी मूवमेंट पर नजर रखेगी? गवर्नमेंट एंप्लाइज, स्कूल टीचर्स, पोल ऑफिशियल्स अपना काम
करेंगे या सिर्फ इलेक्शन ड्यूटी करेंगे? मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट की वजह से पिछले 5 सालों में भारत ने 800 डेज ऑफ गवर्नेंस खोए हैं। तो अगर वन नेशन वन इलेक्शन होता है तो एमसीसी 5 साल में एक ही बार लागू होगा या फिर एक साल में ही लागू होगा। तो पॉलिसी पैरालिसिस नहीं आएगा। हर बार जब इलेक्शंस होते हैं मीडिया एक ही हेडलाइन चलाती है डांस ऑफ डेमोक्रेसी। लेकिन क्या यह एक्सरसाइज एफिशिएंट है? क्यों ना पूरे देश में एक साथ इलेक्शन हो और एक ही समय सारी पार्टीज अपना पूरा दम लगाकर इलेक्शन लड़े और उसके
बाद 4 साल सिर्फ काम पर फोकस करें। इसी आईडिया से वन नेशन वन इलेक्शन इस आईडिया का जन्म हुआ। एक्चुअली यह आईडिया कोई नई आईडिया नहीं है। इनफैक्ट भारत में पहले वन नेशन वन इलेक्शन ही था। भारत में भी 1951 से लेकर 1967 तक लोकसभा और स्टेट असेंबली के इलेक्शन एक साथ हो ही रहे थे। लेकिन 1967 के इलेक्शन के बाद स्टेट असेंबलीज़ में और लोकसभा में भी इनस्टेबिलिटी होने लगी। जिसकी वजह से कुछ स्टेट असेंबलीज़ प्रीमेच्योरली डिॉल्व हो गई। यानी उनके 5 साल कंप्लीट ही नहीं हुए। और इस वजह से साइमलटेनियस इलेक्शंस की साइकिल
टूट गई। वन नेशन वन इलेक्शन के सपोर्टर्स कहते हैं कि जो बात 1967 के पहले पॉसिबल थी वो अब क्यों नहीं? दूसरे भी देश हैं जहां एक साथ इलेक्शंस होते हैं। जैसे साउथ अफ्रीका में जहां हर 5 साल बाद साइमलटेनियसली इलेक्शंस होते हैं। जिससे इलेक्शन प्रोसेस सिंपलीफाई होती है और लोगों के लिए भी आसानी होती है। एक्स प्रेसिडेंट रामनाथ कोविंद जी ने एक हाई लेवल कमेटी हेड की थी जिन्हें 21,500 रिस्पांसेस पूरे देश भर से आए और 80% रिस्पांससेस इस डिसीजन के फेवर में थे कि वन नेशन वन इलेक्शन होना चाहिए। वन नेशन वन इलेक्शन
एक अच्छे इंटेंट से इलेक्शन प्रणाली को सिंपलीफाई करना चाहता है। यह एक ग्रीन फ्लैग है। अगला ग्रीन फ्लैग यह है कि वोटर टर्न आउट बेहतर हो सकता है। आज आप जिस कॉन्स्टिट्यूएंसी में हैं वहीं जाकर आपको वोट करना पड़ता है। कई स्टूडेंट्स विदेश में पढ़ाई करते हैं या फिर कई एनआरआई हैं जो भारत में आकर वोट करना चाहते हैं। लेकिन डेट्स की कोई सर्टेनिटी नहीं होती। प्लस कितनी बार वो फ्लाई डाउन करेंगे। एक बार में ही अगर सारा काम हो गया तो बेहतर होगा। यानी हमने अब तक सीखा हिस्टोरिक पॉसिबिलिटी, सिंपलीफाइड प्रोसेस, मोर गवर्नेंस एंड
कन्वीनियंस टू वोटर। यह सारे ग्रीन फ्लैग्स हैं। जब भी वन नेशन वन इलेक्शन की बात होती है तो इकोनॉमिक्स की बात होती है। यानी एक्सपर्ट्स एक्सप्लेन करते हैं कि इससे कितने पैसे बच सकते हैं। लेकिन क्या यह पूरा सच है? वन नेशन वन इलेक्शन का इकोनॉमिक इंपैक्ट एक येलो फ्लैग है। जहां हमें चेतावनी बरतनी होगी। सीएमएस का रिपोर्ट कहता है कि 2019 के जनरल इलेक्शंस के लिए 75 दिनों में 60 हजार करोड़ का खर्चा हुआ था। कहा जाता है कि एक साथ इलेक्शंस होंगे तो भारत की जीडीपी में 1.5% की बढ़त होगी और इसी वजह
से वन नेशन वन इलेक्शन को गेम चेंजर भी कहा जाता है। लेकिन सोचने जैसी बात है कि यह बढ़त कब होगी जब इलेक्शन में बचे हुए पैसे सही काम में यूज़ होंगे। रास्ते बनने के टेंडर्स सही लोगों को मिलेंगे और जिन्हें टेंडर मिल रहे हैं उन्हें उस काम के लिए पूरे पैसे मिलेंगे। कोई रिश्वतखोरी नहीं होगी। इंफ्रास्ट्रक्चर दुगनी स्पीड से डेवलप होगा। आईआईटीस, आईएम्स खुलेंगे। नहीं तो पता चलेगा कि इलेक्शन प्रोसेस में बचने वाले पैसे किसी करप्ट नेता की जेब में जा रहा है। तो इसका फायदा देश को कम और करप्ट नेता को ज्यादा होगा।
यहां हमें यह समझने की जरूरत है कि सरकार और पार्टी दो अलग-अलग बातें होती हैं। सरकार का खर्चा इलेक्शन कंडक्ट करने में होता है। जैसे पोलिंग स्टेशंस खड़े करना, ईवीएम्स लगाना, काउंटिंग करना यह सारा सरकार का खर्चा है और यह सारा खर्चा करने के लिए पैसे कहां से आते हैं? आपके टैक्स पेयर के टैक्स से। लेकिन इस खर्चे के अलावा पार्टीज का कैंपेनिंग के लिए भी खर्चा होता है। रैलीज निकालना, झंडे लगाना, ग्राउंड बुक करके बड़े-बड़े स्पीचेस देना, लोगों को बिरयानी बांटना एटसेटरा। इन सारी बातों में पार्टीज का खर्चा होता है। तो वन नेशन वन
इलेक्शन में कौन से खर्चे की ज्यादा चिंता हो रही है? सरकार के खर्चे की जो हमारे टैक्स पेयर्स के पैसों से आता है या फिर पार्टी के खर्चे की जो कहां से आता है किसी को पता नहीं। यह एक बात हो गई। लेकिन सिर्फ कॉस्ट कम करना एक ही ऑब्जेक्टिव नहीं हो सकता। 2015 में साइमलटेनियस इलेक्शंस पर एक रिपोर्ट निकाली गई थी जिसमें अनुमान लगाया गया था कि एक्स्ट्रा ईवीएम्स और बैलेट पेपर्स भी तो लगेंगे और इसके लिए एडिशनली ₹9200 करोड़ खर्च होंगे। यानी यहां ईसीआई ने एडमिट किया है कि कुछ एडिशनल कॉस्ट भी तो
होंगे। इलेक्शंस कंडक्ट करना, सेफली कंडक्ट करना, क्वालिटी के ईवीएम्स मेंटेन करना, इन सारी बातों के लिए एक्सट्रीम लेवल की प्लानिंग लगती है। एक भूल और पूरी डेमोक्रेसी की नींव हिल सकती है। इसीलिए यह सारे येलो फ्लैग्स हमें याद रखने की जरूरत है। जहां हमने इकोनॉमिक इंपैक्ट, प्रायोरिटीज और अच्छी खासी प्लानिंग की बात की। चलिए अब रेड फ्लैग्स की ओर बढ़ते हैं। एक बड़ा रेड फ्लैग यह है कि सत्ता सेंटर के हाथ कंसंट्रेटेड हो जाएगी। क्रिटिक्स कहते हैं कि आज हमारा जो सिस्टम है वह डिवीजन ऑफ पावर के प्रिंसिपल पर चलता है। यानी म्युनिसिपल कॉरपोरेशंस के
पास कुछ पावर होती है। स्टेट के पास कुछ पावर होती है और सेंटर के पास भी कुछ पावर होती है। जिससे कोई भी एक इंसान डिक्टेटर नहीं बन सकता। एक ही पार्टी अपनी मनमानी नहीं कर सकती। साथ ही साथ समाज के एक वर्ग के इशूज़ इग्नोर नहीं होते। फॉर एग्जांपल अगर आप किसी गांव में रहते हैं और आपके गांव बस आ ही नहीं रही है या फिर वहां पर सड़क नहीं बन रही है तो इसके लिए आप सीधा पीएम को कांटेक्ट नहीं करते। आपको आपकी ग्राम पंचायत में इशू रेज करना पड़ता है। लेकिन अगर पूरा
इलेक्शन ही सेंटर के दम पर होने लगा तो फिर इन छोटे-छोटे लोगों को छोटे-छोटे लीडर्स को कोई इंसेंटिव ही नहीं बचेगा कि वो आपकी बात सुने। आपका इशू दब जाएगा। इसीलिए कुछ लोग मानते हैं कि वन नेशन वन इलेक्शन पावर को एक हाथ में कंसंट्रेटेड करने का एक जरिया है। जिससे अल्टीमेटली कॉमन मैन का नुकसान होगा। अगर नेशनल और स्टेट लेवल के इलेक्शंस एक साथ होंगे तो आपके लोकल इशूज़ प्रचार के शोर में कहां गुम हो जाएंगे पता ही नहीं चलेगा। वैसे ही छोटे लेवल की स्टेट लेवल की पार्टीज इतने बड़े लेवल पर प्रचार कर
ही नहीं पाएंगी। तो उन्हें कोई से ही नहीं होगा और धीरे-धीरे भारत में छोटी पार्टियां सिर्फ नाम के लिए रह जाएंगी। ओके, आई रियली हैव टू से दिस। मुझे लगता है कि कुछ लोग प्रोफेशनल रुडालीस होते हैं जिन्हें हर बात के लिए रोना अच्छा लगता है। यह जो पॉइंट है कि वन नेशन वन इलेक्शन की वजह से सारा पावर सिर्फ कुछ ही पार्टीज के हाथ आएगा। यह प्रॉब्लम आज के दिन भी एग्जिस्ट करता है। पिछले लोकसभा इलेक्शंस में जिस कांस्टीट्यूएंसी में मैं वोट करने गई थी वहां 21 कैंडिडेट्स खड़े हुए थे और उनमें से मेजॉरिटी
वोट्स शायद दो या तीन कैंडिडेट्स को गए होंगे। लेकिन फिर भी 21 लोग खड़े हुए। यह प्रॉब्लम आज भी यही है कि उन 21 लोगों में से टॉप टू थ्री को छोड़ते हुए कोई भी वर्दी कैंडिडेट हो सकता है लेकिन हमें उनके बारे में पता नहीं है। यह रियलिटी बिफोर वन नेशन वन इलेक्शन भी एक्सिस्ट करती है और यह रियलिटी शायद वन नेशन वन इलेक्शन के बाद भी एग्जिस्ट करेगी। क्योंकि हमारे पास एक सिस्टम नहीं है कि हम सारे पॉलिटिकल पार्टीज को अच्छे से सुन पाए। हम सारे कैंडिडेट्स को अच्छे से सुन पाए। जैसे यूएस
में प्रेसिडेंशियल डिबेट्स होते हैं वैसे कोई सिस्टम भारत में है ही नहीं जिससे हम अलग-अलग कैंडिडेट्स को परख पाए। तो हम किस बात पर उन्हें जज करेंगे? द ट्रुथ इज हम आज लोगों को इसी बेसिस पर जज करते हैं कि वो कितना शोर मचाते हैं। दैट मींस द पावर इज ऑलरेडी कंसंट्रेटेड इन द हैंड्स ऑफ पीपल हु कैन मेक द मोस्ट नॉइस। सो आई फील रादर देन क्राइंग अबाउट अ प्रॉब्लम दट ऑलरेडी एक्सिस्ट एंड मेकिंग इट इंटू अ प्रॉब्लम फॉर अ प्रपोज्ड रिफॉर्म। आई फील ऑल दिस प्रोफेशनल रुडालीस शुड थिंक अ लिटिल मोर। आज भी
आप देख सकते हैं कि आपके एरिया से कितने सारे कैंडिडेट्स होते हैं। उनमें से दो-तीन टॉप कैंडिडेट्स को छोड़कर बाकी कैंडिडेट्स के नाम आपने सुने भी नहीं होंगे। हो सकता है कि वो इंडिपेंडेंट कैंडिडेट एक अच्छा इंसान हो। लेकिन जस्ट बिकॉज़ उनके पास प्रचार करने के लिए पैसे नहीं है। हम उन्हें सीरियसली कंसीडर ही नहीं करते। दैट्स द इशू। यही सेम फंडा स्टेट पार्टियों के लिए भी अप्लाई हो सकता है और इसीलिए क्रिटिक्स मानते हैं कि यह एक बड़ा रेड फ्लैग है। हम कहते हैं कि एक वोटर के लिए वन नेशन वन इलेक्शन से फायदा
ही होगा क्योंकि प्रोसेस सिंपलीफाई हो जाएगी। लेकिन क्या वोटर इसके लिए खुद रेडी है? क्या एक वोटर जागरूक है? क्या हमारे वोटर्स को भी पता है कि असेंबली इलेक्शंस और जनरल इलेक्शंस में फर्क क्या होता है? क्या हमें पता भी है कि कितने कैंडिडेट्स हमारे एरिया से खड़े होते हैं? क्या हम वोट देने से पहले रिसर्च करते हैं या सिर्फ कौन सी पार्टी है यह देखकर वोट कर देते हैं या फिर किसी न्यूट्रल यूबर का पेड भाषण सुनकर इन्फ्लुएंस हो जाते हैं। अगर इलेक्शंस एक साथ होंगे तो कंफ्यूजन बढ़ेगा और एक वोटर को पता ही
नहीं होगा कि वोट किसे करना है। नाउ दिस इज अ वेरी स्टूपिड आर्गुमेंट। आई नो क्योंकि आइडियली हर वोटर तो 18 साल का होता ही है। उसे बेसिक सिविक्स पता ही होना चाहिए। लेकिन यह भारत है। यहां लोग कौन सी पार्टी बिरयानी दे रही है, यह देखकर वोट देते हैं। रेवड़ी पॉलिटिक्स इज रियल। कौन किस कास्ट का है, कौन किस रिलीजन का है? यह देखकर लोग वोट देते हैं। तो क्या यह लोग सही कैंडिडेट को वोट देंगे? डिफरेंशिएट करेंगे कि स्टेट के लिए क्या सही है और सेंटर के लिए क्या सही? या सिर्फ पार्टी का
नाम देखकर वोट करेंगे। अक्सर होता यह है कि एक अच्छा कैंडिडेट एक ऐसी पार्टी का होता है जो लोकल लेवल पर अच्छा काम करती हो लेकिन सेंट्रल लेवल पर उतनी स्ट्रांग ना हो। उन कैंडिडेट्स को इससे डिसएडवांटेज होने की संभावना है। यह एक रेड फ्लैग है। हमारे एजुकेशन सिस्टम में सिविक्स यह एक बहुत ही इंपॉर्टेंट सब्जेक्ट होता है। लेकिन अनफॉर्चूनेटली इट इज़ रेलिगेटेड टू द डस्टबिन बोथ इन एजुकेशन एंड इन रियल लाइफ। क्योंकि सिविक्स को एटलीस्ट व्हेन आई वाज़ इन स्कूल हिस्ट्री के साथ क्लब कर देते थे वेयर हिस्ट्री इज़ 75 मार्क्स एंड सिविक्स वास
25 मार्क्स। तो मोस्ट पीपल सिविक्स को ऑप्शन में ही रखते थे। यानी यह सारी बातें कि एक एमपी क्या करता है? एक एमएलए क्या करता है? उनके रोल्स एंड रिस्पांसिबिलिटीज क्या है? डेमोक्रेसी यानी हमारे कंट्री का फंक्शनिंग कैसे होना चाहिए? एग्जीक्यूटिव, लेजिस्लेचर, जुडिशरी इनका काम क्या है? फंडामेंटल राइट्स क्या है? एंड उसी समय फंडामेंटल ड्यूटीज क्या है? इन सारी चीजों का जो नॉलेज था वो सारा ऑप्शन में छोड़ा जाता था। बिकॉज़ इट डिड नॉट हैव द रिक्वायर्डेंस। एंड यह मैं आपको बताती हूं। इस साल हमने एक वीडियो रिलीज किया। व्हाट डस एन एमपी एंड एन
एमएलए डू? क्योंकि कई लोगों को यह पता नहीं होता है कि एमपी मेंबर ऑफ पार्लियामेंट केंद्र सरकार में यानी सेंट्रल पार्लियामेंट में इ होकर आता है और एमएलए विधानसभा में जाकर इ होता है। यानी राज्य सरकार के लेवल पर इक्ट होकर आता है। तो उनके रोल्स और रिस्पांसिबिलिटीज़ क्या हैं? यह अलग-अलग हैं। लेकिन फिर भी लोगों को यही लगता है कि अपने लोकल लेवल पर कचरा ना उठाने की जिम्मेदारी एक एमपी की होनी चाहिए। वेयर एस दैट इज कंप्लीटली रॉन्ग। आपके लोकल लेवल में कचरे की जिम्मेदारी म्यनसिपल कॉरपोरेशन की होती है। प्रॉब्लम यही है कि
उस वीडियो पर कमेंट्स आए कि यह तो आपने बस सिविक्स टेक्स्ट बुक की बात की है। हां, लेकिन अगर लोगों को पता है कि यह आपके सिविक्स टेक्स्ट बुक में है तो उसे रियल लाइफ डिबेट्स में लोग यूज़ क्यों नहीं करते? लेट मी गिव यू एन एग्जांपल टू इलस्ट्रेट दिस। हर बार यूनियन बजट के बाद एक क्रिटिसिज्म यही होता है कि एजुकेशन और हेल्थ पर सेंट्रल गवर्नमेंट अपनी स्पेंडिंग बढ़ा नहीं रहा है। एंड लोग इसी बेसिस पर सोचते हैं कि मेरे गांव में मेरे शहर में हॉस्पिटल्स की फैसिलिटी इंटैक्ट नहीं है। मेरे गांव मेरे शहर
में गवर्नमेंट स्कूल की हालत बहुत बदतर है। बट ट्रुथ बी टोल्ड इफ यू लुक एट एवरीथिंग यू स्टडीड इन योर सिविक्स टेक्स्ट बुक। आपके गांव या आपके शहर में हॉस्पिटल मेंटेन करने की जिम्मेदारी आपके राज्य सरकार पर है। आपके मनसिपल कॉरपोरेशन पर है। गवर्नमेंट स्कूल के अब कीप की जिम्मेदारी उस म्यनसिपल कॉरपोरेशन या राज्य सरकार की है। केंद्र सरकार की नहीं है। केंद्र सरकार जो हॉस्पिटल्स चलाता है उन्हें एम्स कहते हैं। केंद्र सरकार जो स्कूल्स चलाता है, उसे केंद्रीय विद्यालय कहते हैं। दे आर नॉट रिस्पांसिबल फॉर मेंटेनिंग स्कूल्स इन योर लोकल लेवल। एंड दिस इज
नॉट टू डिफेंड अ सेंट्रल गवर्नमेंट बिकॉज़ यह बात जवाहरलाल नेहरू जी के समय से एकिस्ट करती आ रही है। तो 1990 में भी यही बात थी और 2025 में भी यही बात है कि आपके लोकल एरिया के हॉस्पिटल को एक एमपी नहीं सुधार सकता। आपके लोकल एरिया के हॉस्पिटल को एक एमएलए सुधार सकता है। इसका डिफरेंस आपको पता होना चाहिए क्योंकि फिर ही आप सही इंसान को अकाउंटेबल होल्ड कर सकते हैं। एक और रेड फ्लैग ये है कि हम लोकसभा के चुनाव को भी फेजेस में करते हैं क्योंकि 1.4 बिलियन के पपुलेशन के लिए एक
साथ चुनाव करवाना ऑलरेडी एक बहुत बड़ा चैलेंज है। इस बार चुनाव 2 महीने के लिए चले। तो अगर वन नेशन वन इलेक्शन की बात होती है तो सोचिए इसके लिए कितना समय लगेगा? कितने रिसोर्सेज खर्च होंगे और कितना केओस हो सकता है। तो रेड फ्लैग्स क्या हुए? कंसंट्रेशन ऑफ पावर, नेगलेक्टिंग लोकल इशूज़, लैक ऑफ वोटर एजुकेशन और बिग रिस्पांसिबिलिटी फॉर इलेक्शन कमीशन। शायद वन नेशन वन इलेक्शन इंप्लीमेंट हो, शायद वो ना हो। लेकिन एक बात हम अगले इलेक्शन के लिए जरूर कर सकते हैं और वो है कि इलेक्शंस को हमें सिर्फ विंटर के टाइम पे
होल्ड करना चाहिए। इसके कई फायदे हैं। इलेक्शंस को समर में होल्ड करने की वजह से कई लोगों को हीट वेव रिलेटेड स्ट्रोक्स होते हैं। कई लोगों को दिक्कत होती है। गर्मी में लाइंस में रुकना अनकंफर्टेबल होता है। यह सच्चाई है। एंड देयर इज़ आल्सो अ वेरी नाइस बेनिफिट जो हमारे नेशनल कैपिटल दिल्ली को मिलेगा। अगर इलेक्शंस विंटर में शिफ्ट हो गए। क्योंकि अगर इलेक्शन ड्यूटी पर सब लोग बिजी हो गए तो शायद कम लोग स्ट्रबल बर्निंग करेंगे। क्योंकि उस समय जब आपके स्टेट में इलेक्शंस हो रहे हैं तब अगर स्टबल बर्निंग हुई तो आपके स्टेट
की इज्जत जा सकती है। शायद उस समय इलेक्शंस के नाम पर लोग एक्चुअली स्ट्रबल बर्निंग पर कुछ एक्शन लेंगे एंड मे बी देन दिल्ली विल बी एबल टू ब्रीथ क्लीन एयर। रिगार्डलेस ऑफ़ वेदर वन नेशन वन इलेक्शन एक्चुअली कम्स इनटू प्रैक्टिस। आई हैव टू से आई एम अशेम्ड ऑफ़ एव्री सिंगल एमपी दैट इज सिटींग इन पार्लियामेंट टुडे। क्योंकि विंटर सेशन खत्म हो चुका है। एंड रादर देन डिस्कस अबाउट द प्राइसेस इन इंडिया, भारत के इकोनमी के बारे में, भारत के इकोनॉमिक ग्रोथ के बारे में, भारत के टेक चैलेंजेस के बारे में, भारत के सिक्योरिटी के
बारे में, भारत के एक्सटर्नल अफेयर्स के बारे में, भारत के ट्रेड रिलेशंस के बारे में, ऐसे हजारों मुद्दों पर डिबेट करने के बजाय हमारे पार्लियामेंटेरियंस ने पूरा विंटर सेशन बर्बाद कर दिया। यह शर्मनाक बात है कि आज हमारे सिटीज कंप्लीटली ब्रोकन है। पोल्यूशन पर किसी का कंट्रोल नहीं है। लोग सांस नहीं ले पा रहे हैं। महंगाई बढ़ चुकी है। भारत के कई इकोनॉमिक चैलेंजेस हैं। हमारे आसपास के देश हमसे कई मीलों दूर आगे चले गए हैं। हमारा इंफ्रास्ट्रक्चर ब्रोकन है। हमारे रोड्स दुनिया के डेडलीस्ट रोड्स हैं। लेकिन इन सारे मुद्दों पर ना रूलिंग पार्टी को
इंटरेस्ट है और ना ही विपक्ष को इंटरेस्ट है। उन्हें इंटरेस्ट सिर्फ मीम्स बनाने में है और यह दिखावा करने में कि उन्हें एक हिस्टोरिकल पर्सन के बारे में ज्यादा पता है। कितनी शर्मनाक बात है। यू ऑल शुड बी अशेम्ड कि टैक्स पेयर का पैसा इन फालतू की चीजों में वेस्ट हो रहा है। एंड एज अ टैक्स पेयर एंड एज अ वोटर आई डिमांड अकाउंटेबिलिटी। क्योंकि आपका काम यह फालतू चीजों में समय वेस्ट करना नहीं है। ऐसे हजारों मुद्दे हैं जिन्हें आपका अटेंशन और आपका पावर डिजर्व करता है। यूज इट फॉर समथिंग वर्दी। स्टॉप वेस्टिंग दी
एंटायर नेशंस टाइम। बिकॉज़ ऑनेस्टली मुझे यही लगता है कि वन नेशन वन इलेक्शन ये रूल ना आए। लेकिन एक रूल तो जरूर आना चाहिए। अगर आपने पार्लियामेंट का समय बेकार चीजों में फिजूल चीजों में वेस्ट कर दिया तो आपको आपके पैसे नहीं मिलने चाहिए। क्योंकि फिर ही शायद लोग सीखेंगे। फिर ही पार्लियामेंटेरियन सीखेंगे कि जो आम जनता को अफेक्ट करता है वही इंपॉर्टेंट है और बाकी कोई भी मुद्दा इंपॉर्टेंट नहीं है। इन द एंड मैं यही कहना चाहता हूं कि वन नेशन वन इलेक्शन में अगर कॉस्ट सेव करना सरकार की प्रायोरिटी है तो सरकार को
यह अश्योर करना चाहिए कि इलेक्शन के समय को छोड़कर कोई भी नेता प्रचार ना करें। भाषण बाजी में टाइम वेस्ट ना करें। सिर्फ और सिर्फ काम करें। रैलीज कभी भी फिजूल में ना निकालें और ट्रैफिक जाम ना करें। रास्तों को किसी भी वीआईपी के लिए रैंडमली ब्लॉक ना करें। क्योंकि इलेक्शन हो या ना हो इन बातों से कॉमन मैन को फर्क पड़ता है। इन बातों से टाइम वेस्ट होता है। ट्रैफिक जैम्स होते हैं। इलेक्शन के वादे पूरे होने ही चाहिए। वो बस वादे ही नहीं रहने चाहिए और हमारे चुने हुए नेता एक बार वोट मांगकर
4 साल के लिए गुम नहीं होने चाहिए। यह बातें इंपॉर्टेंट हैं। अगर इस बात की गारंटी सारी पॉलिटिकल पार्टीज दे सकती हैं, तो वन नेशन वन इलेक्शन का हमें स्वागत ही करना चाहिए। आपको क्या लगता है? क्या भारत को वन नेशन वन इलेक्शन की जरूरत है? अगर हां, तो कौन सी बातों के बारे में हमें सावधान रहने की जरूरत है? हमें कमेंट्स में जरूर बताइए। क्योंकि भारत मेरी डेमोक्रेसी है। भारत आपकी डेमोक्रेसी है। जहां आपके थॉट्स, आपके ओपिनियंस मायने रखते हैं। और यही इंपॉर्टेंट रिमाइंडर आप तक पहुंचाने से मुझे फर्क पड़ता है। [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत]