नमस्कार आपका अखबार के इस अंक में आपका स्वागत है। मैं हूं प्रदीप सिंह। सच की एक बुरी आदत होती है। वह किसी ना किसी तरह से बाहर आ ही जाता है। भारत और अमेरिका के बीच में ट्रेड डील का मामला काफी समय से लटका हुआ है। तरह-तरह के अंदाजे लगाए जा रहे थे कि इन शर्तों पर भारत नहीं मान रहा है। इस पर अमेरिका नहीं मान रहा है। और इस बीच में अमेरिका ने भारत पर 50% टेरिफ लगा दिया। ब्राजील के अलावा कोई देश नहीं है। और भारत अकेला देश है जिस पर 25% टेरिफ लगाया
गया। पीनल ट्रैफ टेरिफ लगाया गया क्योंकि वो रूस से तेल खरीदता है। रूस से एनर्जी का व्यापार चीन हमसे ज्यादा करता है। यूरोपियन यूनियन हमसे बहुत ज्यादा करता है। ट्रंप को वो दिखाई नहीं देता। इसका मतलब है कि रूस से तेल की खरीद एक बहाना है। असली वजह नहीं है वह 50% टेरिफ लगाने की। असली वजह कुछ और है जिसके बारे में तरह-तरह के अंदाजे लगाए जा रहे थे, कयास लगाए जा रहे थे और वह जो है सच बाहर आ गया। सच कैसे बाहर आया? अमेरिका के जो कॉमर्स सेक्रेटरी है मतलब वाणिज्य मंत्री जो है
लुटनिक हारवर्ड उन्होंने मीडिया से जो बात कही उससे पता चल गया कि ये डील क्यों नहीं हो रही है। उन्होंने कहा जुलाई में सब तय हो गया था। डील के सारे मुद्दे जो है तय हो गए थे। किन शर्तों पर भारत मानेगा, किस पर अमेरिका मानेगा यह सब तय हो गया था। लेकिन इसके बाद एक चीज का इंतजार था। आप अंदाजा लगाइए किस चीज का इंतजार था? यह जो आत्मश्राघा का शिकार है डोनाल्ड ट्रंप इसको इंतजार था कि नरेंद्र मोदी फोन करेंगे। क्यों इंतजार था? यह भी बता दिया लुटनिक ने। उन्होंने कहा कि जब ब्रिटेन
से डील फाइनल हो रही थी, जब फाइनल हो गया, सब कुछ तय हो गया, डेडलाइन आ गई जो है उसकी, उससे एक दिन पहले ब्रिटेन के प्रधानमंत्री स्टारमर ने डोनाल्ड ट्रंप को फोन किया। उसी दिन डील तय हो गई और अगले दिन अनाउंस हो गई। यही भारत के साथ होना था। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगर फोन कर देते तो यह डील हो गई होती। तो रूस से तेल खरीद यह एक बहाना था। यह अमेरिका ने ही इस बात को साबित कर दिया कि डोनाल्ड ट्रंप लगातार झूठ बोल रहे हैं कि भारत रूस से तेल
खरीद रहा है। अब एक और धमकी एक और तलवार लटकाने की कोशिश हो रही है। रिपब्लिकन नेता हैं सांसद हैं। उन्होंने एक बिल मूव किया है संसद में कि जो देश रूस से तेल खरीदते हैं उन पर 500% तक टेरिफ लगाने का अधिकार राष्ट्रपति को होगा। अब यह अभी कुछ स्पष्ट नहीं है कि यह पास हो पाएगा कि नहीं और इसमें जो डेमोक्रेट्स को छोड़िए रिपब्लिकनंस भी सब साथ देंगे या नहीं देंगे यह अभी तय होना बाकी है और अगर यह पास हो भी गया तो क्या अमेरिका और डोनाल्ड ट्रंप ऐसा करेंगे या कर पाएंगे
यह भी देखना है क्योंकि अमेरिका ने यह देख लिया कि 50% टेरिफ लगाने के बाद भारत की इकॉनमी और तेजी से दौड़ने लगी है। भारत का एक्सपोर्ट और ज्यादा बढ़ गया है। तो अमेरिका के 50% टेररिफ जो लग रहा था डोनाल्ड ट्रंप को कि भारत घुटनों पर आ जाएगा और भारत की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा जाएगी। वैसा कुछ नहीं हुआ। उसका ठीक उल्टा हुआ। तो ट्रंप के ईगो को चोट पहुंची है। असली मामला यह है। रूस से तेल खरीद का कोई मामला नहीं है। अगर रूस से तेल खरीद का मामला होता अमेरिका, चीन और यूरोपियन यूनियन पर
भारत से भी शायद ज्यादा टेरिफ लगाता। लेकिन वह मुद्दा ही नहीं है बल्कि रूस पर दबाव डालने का अब कोई इरादा भी नहीं है डोनाल्ड ट्रंप का। उन्होंने मान लिया है कि यूक्रेन पर अगर रूस का कब्जा हो जाए तो उनको कोई ऐतराज नहीं है। अब रूस पर वो किसी तरह का कोई दबाव नहीं डालना चाहते। रूस यूक्रेन युद्ध रुकवाने में भी उनकी रुचि अब खत्म हो गई है। अब उनके सामने दूसरे एजेंडा है। उनके सामने चीन का एजेंडा उनके सामने वेनेजुएला का एजेंडा है। ग्रीनलैंड का एजेंडा है। उनके सामने कोलंबिया का एजेंडा और बाकी
चीजें हैं। जहां से अमेरिका को पैसा मिल सके। प्राकृतिक संसाधन मिल सके। तेल, मिनरल्स ये मिल सके। अमेरिकन इकॉनमी की हालत खराब है। यह बात ट्रंप को अच्छी तरह से मालूम है। और उस इकॉनमी को ठीक करने का उनके पास कोई इकोनॉमिक फंडा नहीं है। यह भी स्पष्ट हो गया। तो एक ही रास्ता बनता है लूट, डकैती और वही काम हो रहा है। वेनेजुएला के साथ जो हुआ उसको लूट और डकैती के अलावा और कोई संज्ञा नहीं दी जा सकती। तो दूसरे देशों के संसाधन पर कब्जा कर लो। उनको बेचो और अपने देश की इकॉनमी
को सुधारो। क्योंकि अपने देश की इकॉनमी को सुधारने का और कोई फार्मूला डोनाल्ड ट्रंप और उनकी सरकार के पास नहीं है। अब आप इसकी क्रोनोलॉजी देखिए। मई में ऑपरेशन सिंदूर हुआ। ऑपरेशन सिंदूर के बाद पहला झूठ बोला डोनाल्ड ट्रंप ने। उन्होंने कहा कि भारतपाकिस्तान के बीच में यह जो युद्ध था इसमें इसको रुकवाने में मेरी भूमिका है। मैंने मध्यस्थता की। भारत ने मना किया। भारत के प्रधानमंत्री ने संसद में कहा कि दुनिया के किसी देश या किसी नेता की इसमें कोई भूमिका नहीं थी और भारत इससे बार-बार इंकार करता रहा लेकिन ट्रंप इसको बार-बार बोलते
रहे। इस झूठ को दोहराते रहे। उनको लगा कि उनके दोहराने से दुनिया इसको सच मान लेगी। और उनको शायद अंदाजा नहीं था कि नरेंद्र मोदी ना तो ब्रिटेन के प्रधानमंत्री हैं ना दूसरे और देशों के प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने ट्रंप के सामने घुटने टेक दिए। नरेंद्र मोदी दूसरी मिट्टी के बने हुए हैं और वह भारत के प्रधानमंत्री हैं। यह जो यहां पर ब्रिगेड है एक ना बेशर्मी के साथ जो अपने प्रधानमंत्री को कहती है नरेंद्र सरेंडर उसको यह बात समझ में नहीं आ सकती क्योंकि यह बात समझने के लिए भारत की संस्कृति को समझना पड़ेगा। भारत
की सभ्यता को समझना पड़ेगा। अगर भारत की सभ्यता और संस्कृति इतने हजारों सालों से सर्वाइव कर रही है, बची हुई है, दुनिया की एकमात्र सबसे बड़ी सभ्यता है जिसे उसके दुश्मन नष्ट नहीं कर पाए तो कुछ तो उसके अंदर होगा और उस कुछ का कुछ नरेंद्र मोदी के अंदर है। कि देश के हित से समझौता नहीं करेंगे। लेकिन जो बात पर सरेंडर करते हैं उनको यह बात समझ में नहीं आती। उनको लगता है यह सामान्य बात है। हमारे परिवार के बड़े लोगों ने सरेंडर किया है। तो नरेंद्र मोदी क्यों नहीं कर सकते? तो यह बात
उनकी तो समझ में नहीं आ सकती। तो जब ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह दावा करना शुरू किया ट्रंप ने। उसी समय एक और अभियान चला था ट्रंप को नोबेल प्राइज दिलाने का। और इसमें चापलूसी में बढ़-चढ़कर कई देशों ने हिस्सा लिया और सबसे आगे इसमें निकला पाकिस्तान। तो पाकिस्तान ने ट्रंप के ईगो का मसाज किया। ट्रंप को खुश कर लिया और बहुत से देशों ने किया। मोदी ने और भारत ने ऐसा करने से परहेज किया। बिल्कुल नहीं किया। एक बार भी नहीं कहा क्योंकि उनको मालूम था कि ये झूठा दावा है कि उन्होंने युद्ध रुकवा
दिया और जितने युद्धों को रुकवाने का उन्होंने दावा किया वह सब भी झूठ थे। तो उसके बाद आपको याद होगा जी7 की बैठक हुई कनाडा में। भारत को उसमें स्पेशल इनवाइट के रूप में बुलाया जाता है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से 2016 के बाद 14 में प्रधानमंत्री बन गए थे। लेकिन 2016 से उनको जी7 की बैठक में स्पेशल इनवाइट के रूप में बुलाया जाता है। कनाडा भी बुलाया गया था। वो गए थे। ट्रंप वहां आए और बहुत जल्दी जो है सम्मेलन से निकल कर चले गए। इससे पहले कि उनका और मोदी का
आमनासामना हो। तो वो वापस अमेरिका लौट गए कि बहुत जरूरी काम है। कोई जरूरी काम नहीं था। वो दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सामना नहीं करना चाहते थे। चले गए और वहां से फोन किया। प्रधानमंत्री को फोन किया कि आप जी7 की बैठक के बाद वाशिंगटन होते हुए भारत जाइए और उनको इनवाइट किया कि आप वाइट हाउस में आइए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पता था कि ट्रंप ने पाकिस्तान का जो आर्मी चीफ है उस समय तक यह फील्ड मार्शल नहीं बना था शायद। उसको भी बुला रखा है लंच पर। ट्रंप की चालाकी क्या थी कि
आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आमने-सामने बिठाकर एक फोटो खिंचवा ली जाएगी और कहेंगे देखिए हमने समझौता कराया। और दोनों को एक बराबरी पर कर दिया। कहां आसिम मुनीर और कहां नरेंद्र मोदी? आसिम मुनीर की अपने देश में कोई इज्जत नहीं है। कोई हैसियत नहीं है। और नरेंद्र मोदी की पूरी दुनिया में हैसियत है और इज्जत है। सम्मान की नजर से देखा जाता है। तो ट्रंप का दोनों को बराबर करने का और अपने को बड़ा दिखाने का एक मौका ट्रंप चूक गए। प्रधानमंत्री ने कहा कि उनको उड़ीसा जाना है। जगन्नाथ मंदिर के कार्यक्रम में
शामिल होना है। तो उन्होंने बताया हमारे लिए हमारी संस्कृति ज्यादा इंपॉर्टेंट है। हमारे लिए हमारा सनातन ज्यादा महत्वपूर्ण है। और ट्रंप के यहां जाने से मना कर दिया। लेकिन टेलीफोन पर जो बातचीत हुई थी वो ऑपरेशन सिंदूर का जो झूठ बोलना शुरू किया ट्रंप ने उसको देखते हुए तुरंत विदेश मंत्रालय ने सारी बातचीत का टैक्स जारी कर दिया। इससे पहले कि उसको लेकर ट्रंप कुछ झूठ बोले। उस पूरी बातचीत का ट्रैक्स जारी कर दिया। दुनिया भर को मालूम हो गया कि क्या बातचीत हुई थी। ट्रंप को यह दूसरा झटका लगा। उसके बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच में कोई बातचीत नहीं हुई। उसके बाद से दो बार फोन पर बातचीत हुई है। पहली बार बातचीत हुई 17 सितंबर को जब प्रधानमंत्री का जन्मदिन था और ट्रंप ने बधाई देने के लिए फोन किया। दूसरी बात दिसंबर में बातचीत हुई जब गाजा का जो पीस प्लान था उसके लिए जो सम्मेलन हुआ था शर्मल शेख में उसमें प्रधानमंत्री को बुलाने के लिए प्रधानमंत्री ने जाने से मना कर दिया। भारत के एक जूनियर प्रतिनिधि को भेजा गया वहां क्योंकि प्रधानमंत्री को पता था कि वहां भी यह कुछ खेल
कर सकते हैं। दरअसल मामला यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का डोनाल्ड ट्रंप पर से भरोसा उठ गया है कि आदमी कुछ भी झूठ बोल सकता है। जो बातचीत नहीं हुई उसका दावा करता है। तो अगर मिल लिए तो कुछ भी बोल देगा कि हमारी यह बातचीत हुई। अब आप सफाई देते रहिए। और यहां देश के दुर्भाग्य से ऐसा विपक्ष मिला है जो पूछता है कि ट्रंप का नाम क्यों नहीं लेते? फला का नाम क्यों नहीं लेते? उसको डिप्लोमेसी समझ में नहीं आती। उसको देश का सम्मान समझ में नहीं आता। उसको देश की गरिमा समझ
में नहीं आती। जो नरेंद्र मोदी को अच्छी तरह से समझ में आती है। उसके बाद डोनाल्ड ट्रंप ने चार बार फोन पर बात करने की कोशिश की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने। चारों बार मना कर दिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बात करने से। अब ट्रंप जैसे व्यक्ति के लिए जो आत्मलाघा में ही जीता हो जिसको हर समय और 24 घंटे प्रशंसा चाहिए। कोई ऐसा व्यक्ति नहीं चाहिए जो उनकी प्रशंसा ना करता हो। आलोचना की तो बात ही छोड़ दीजिए जो प्रशंसा ना करता हो। दुनिया में एकमात्र बल्कि मैं कहूंगा दो ऐसे नेता हैं। एक ब्राजील के
मुखिया और दूसरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। दोनों ने प्रशंसा करने से मना कर दिया। मतलब मोदी ने तो प्रशंसा को छोड़िए बात करने से ही मना कर दिया। और अमेरिका के वाणिज्य मंत्री का यह कहना है कि इंतजार होता रहा कि मोदी का फोन आएगा। मोदी का फोन अगर आ गया होता तो जुलाई में यह डील हो जाती। लेकिन मोदी ने फोन नहीं किया। क्योंकि मोदी को मालूम था कि वह कुछ भी बोल सकते हैं। जब बिना फोन किए यह कह सकते हैं डोनाल्ड ट्रंप कि मोदी ने फोन किया था और मुझसे पूछा सर आई मे
सी यू। मतलब क्या मैं आपसे मिल सकता हूं? एक तो नरेंद्र मोदी सर कह के किसी को संबोधित कर ही नहीं सकते। और जो डोनाल्ड ट्रंप चार-चार बार मोदी से बात करने की कोशिश कर रहे हैं और मोदी फोन पर नहीं आ रहे हैं वह मोदी उनको फोन करके ऐसा बोलेंगे। तो डोनाल्ड ट्रंप झूठ बोलने में किसी हद तक जा सकते हैं। इसमें मैंने पहले भी कहा था फिर कह रहा हूं इसमें उनका मुकाबला सिर्फ राहुल गांधी से है। दोनों बहुत बेशर्मी से झूठ बोलते हैं और लगातार बोलते हैं। उन पर कोई असर नहीं पड़ता
कि उनका झूठ पकड़ा गया या नहीं पकड़ा गया। अब अमेरिका के वाणिज्य मंत्री कह रहे हैं कि जो डील उस समय फाइनल हुई थी अब वह टेबल पर नहीं है। यानी अब वह वैध नहीं है। अब जो भी बातचीत होगी नए सिरे से होगी। तो एक बात इससे समझ लीजिए जो बात लुटनी हावर्ड ने कही है कि भारत ने समझौता करने से भारत ने झुकने से मना कर दिया। डील ना होने की कीमत पर भी भारत ने इस बात को मंजूर नहीं किया कि वह अपने देश के स्वाभिमान से समझौता करें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने
जो बात कही थी कई साल पहले कि मैं देश नहीं झुकने दूंगा तो देश को उन्होंने झुकने नहीं दिया। यह बात ट्रंप के गले के नीचे नहीं उतर रही है कि पूरी दुनिया हमारे सामने झुकने को तैयार है। लेकिन मोदी हमारे सामने झुकने को तैयार नहीं है। तो यह जो लिंटसे ग्राहम का बिल है जिसमें यह प्रोविजन है कि रूस से तेल खरीदने वालों पर 500% टेरिफ लग सकता है। यह दरअसल तलवार लटकाई जा रही है। यह तलवार चलेगी नहीं कभी। ऐसा मुझे लगता है। तलवार लटका कर रखी जा रही है कि इतना टेरिफ लगा
सकते हैं। 50% लगाकर देख लिया है ट्रंप ने। भारत पर उसका कोई असर नहीं पड़ा और भारत इसकी तैयारी पहले से कर रहा है और भारत इसके लिए तैयार है कि अमेरिका इस तरह का कुछ भी कदम उठा सकता है। तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्रंप के सामने झुकने से साफ-साफ इंकार कर दिया। झुकना तो दूर की बात है। बात करने से मना कर दिया। उन्होंने मान लिया है कि इस आदमी पर भरोसा नहीं किया जा सकता। इस आदमी से बात करना भी खतरनाक है। और यह उस व्यक्ति की बात हो रही है जो दुनिया
के सबसे शक्तिशाली देश का राष्ट्रपति है जिसके पास असीमित ताकत है और वह अपनी ताकत बढ़ाता जा रहा है। इस सबके बावजूद देश के स्वाभिमान को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऊपर रखा। उसको प्राथमिकता दी और याद कीजिए मैं मैं इसकी तुलना मतलब इतने बड़े पैमाने पर तो नहीं लेकिन इसकी तुलना अगर की जा सकती है तो 1998 से जब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने परमाणु परीक्षण करने का फैसला किया उस समय भी बहुत डर था और उस समय का एक एक छोटा सा किस्सा आपको बता दूं जिस दिन परमाणु परीक्षण होना था या हुआ जिस
दिन उस दिन परमाणु परीक्षण का जो टाइम था उसके बाद तुरंत उन्होंने मीडिया को संबोधित किया और पूरे पूरी दुनिया को बताया कि भारत ने परमाणु परीक्षण कर दिया है और भारत एक परमाणु हथियार संपन्न देश बन गया है। उससे पहले पीएमओ में दो लोगों को बुलाया गया। उन दो लोगों में एक थे लालकृष्ण आडवाणी जो देश के गृह मंत्री थे और दूसरे जसवंत सिंह जो देश के रक्षा मंत्री थे। दोनों को बुलाया गया और एक कमरे में बिठाया गया जहां से फोन पहले से हटा दिया गया था। उन दिनों मोबाइल फोन का बहुत ज्यादा
चलन नहीं था। शुरू ही 199596 में हुआ था। लैंड लाइन थी वो उसको हटा दिया गया था। वो लोग कुछ देर बैठे रहे। किसी की समझ में दोनों को नहीं आया कि क्यों बुलाया गया है। क्यों यहां पर बैठे हैं। थोड़ी देर बाद प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी आए और कहा कि हम परमाणु परीक्षण करने जा रहे हैं। उसके कुछ ही मिनट बाद जो है हो गया। दोनों उठकर खड़े हो गए। उन्होंने कहा क्या कर रहे हैं? पहले बात तो करनी चाहिए थी। दुनिया भर हमारे ऊपर सेंशंस लगा देगी। कैसे अर्थव्यवस्था चलेगी? कैसे देश चलाएंगे? उन्होंने
कहा हमने फैसला कर लिया है। क्यों यह कहा उन्होंने? केवल इसलिए नहीं कि जनसंघ के समय से और भाजपा के हर चुनाव घोषणा पत्र में भारत परमाणु परीक्षण करेगा इसकी बात थी क्योंकि उनको लग रहा था देश के स्वाभिमान के लिए देश को शक्तिशाली बनाने के लिए और देश की सुरक्षा के लिए डिटरेंट बनाने के लिए यह जरूरी है। इस बात की परवाह नहीं की कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। कितना नुकसान होगा? उनकी छवि को क्या होगा? उनकी सरकार को क्या होगा? सरकार का भविष्य क्या होगा? इस सब की परवाह नहीं की। यही काम प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी ने किया है। उनको मालूम है कि अमेरिका और अमेरिका की डीप स्टेट की ताकत क्या है? वो दुनिया भर में तख्ता पलट करवाने रिजीम चेंज करवाने में माहिर है। सबसे ताजा उदाहरण तो वेनेजुएला का ही है। हमारे बगल में बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल यह सब हम देख चुके हैं। इस सब के बावजूद और डोनाल्ड ट्रंप के स्वभाव को देखते हुए भी प्रधानमंत्री ने तय किया कि मैं भारत का सम्मान भारत का सर नहीं झुकने दूंगा और नहीं झुकने दिया। डील होगी कि नहीं मुझे मालूम नहीं है। लेकिन इतना अब तय है कि जो भी
डील होगी वह भारत की शर्तों पर ही होगी। किसी समझौते के तहत झुक कर नहीं होगी। तो इस अंक में इतना ही। अगले अंक में फिर मिलेंगे किसी नए मुद्दे के साथ। तब तक के लिए अनुमति दीजिए। आपसे अनुरोध है कि यह चैनल देखिए, शेयर कीजिए, लाइक कीजिए और सब्सक्राइब जरूर कीजिए। नमस्कार।