मंत्र दीक्षा लेने से आध्यात्मिक फायदे होते 33 प्रकार के और लौकिक फायदे तो बहुत सारे होते हैं तो दीक्षा लिए हुए साधकों के जीवन में जो शांति बरकत आध्यात्मिक फायदे और लौकिक फायदे होते हैं वह अनगिनत होते हैं जिनको फायदे हुए हैं वे हाथ ऊपर करो तुमने तो दीक्षा नहीं लिया तुम कैसे हाथ ऊपर करते जिन्होंने दीक्षा लिया है फायदे हुए हैं वे हाथ ऊपर करो पीछे मुड़ के देखो दीक्षा लेने वालों को कितने फायदे हुए हाथ हिलाओ जिनको फायदे हुए हैं हाथ ही लाओ नहीं हुए नहीं हुए हुए हैं हुए हैं ठीक है नारायण
नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण भगवान राम के गुरु वशिष्ठ जी थे भगवान कृष्ण के गुरु सांदीपनी थे शिव जी ने पार्वती को कहा गुरु मंत्रो मुखे यस्य तस्य सिद्धि ना अन्यथा गुरु लाभा सर्व लाभो गुरु हीन बालिस पार्वती जिसके मुख में गुरु मंत्र है उसको हिक और परमार्थिक और धर्म लाभ पूरे होते जो निगरे हैं वो राजा अंद्र घोसर था लेकिन निगरा था मरने के बाद क्रिकेट हो गया इब्राहिम लिंकन प्रेसिडेंट ऑफ अमेरिका मानवतावादी बुद्धिमान भी था प्रसिद्ध भी था मरने के बाद अभी वाइट हाउस में प्रेत होकर दिखाई देता है राजा आज मरने के
बाद सांप हो गया अजगर हो गया सुन लो चतुर सुजान निगरा नहीं रहना निगरा होता हिय का अंधा खूब करे संसार का धन पड़े नरक की खान सुन लो चतुर सुजान निगरा नहीं रहना तो गुरु मंत्र से तो बहुत फायदे होते हैं काली माता प्रकट होकर गदाधर पुजारी को कहती कि गुरु से दीक्षा ले लो तोतापुरी महाराज आत्मा परमात्मा का साक्षात्कार किए हु गुरु है दीक्षा ले लो बोले मां तुम्हारे दर्शन होते तुम प्रकट होती हो मूर्ति में से कलकत्ते की काली तेरा वचन ना जाए खाली ऐसा जयकार बोलते हैं उनको तो मिलती नहीं मेरी
पूजा से तुम प्रसन्न होकर मेरे हाथों का दिया हुआ फूल पहनती हो कभी-कभी अपनी चोट्टी में लगाती हो कभी गजरा में हाथों में बांधती हो मैया फिर मुझे गुरु करने की क्या जरूरत है बोले भाव में शरीर से तुम पुकारते हो तुम्हारी भावना से मैं प्रकट होती हूं फिर अंतर्धान हो जाती लेकिन यह अनमय शरीर प्राणम शरीर भाव मय शरीर विज्ञान मय शरीर आनंदमय शरीर उसकी गहराई में जो परब्रह्म परमात्मा उसका साक्षात्कार केवल दर्शन से नहीं होता गुरु की कृपा से होता है गदाधर महाराज ने तोतापुरी गुरु से दीक्षा ली और बाद में गदाधर महाराज
में से राम कृष्ण परमहंश प्रकट हुए ऐसे आसू मल में से लीलाशाह बापू की कृपा ने आशाराम को प्रकट करके करोड़ों करोड़ों लोगों के सामने रख दिया अगर मेरे को गुरु लीला सा प्रभु जी नहीं मिलते तो मैं कितना भी अपने तरफ से तप व्रत उपवास करता तो भी इतनी ऊंचाई को हम नहीं छूते हिमालय में पेड़ पर रहते हैं और हवा पीकर जीने वाले योगियों से मेरा परिचय जहां से गंगा जी निकलती गंगोत्री नहीं गोमुख उन इलाकों को मैंने छान मारा अदृश्य योगियों से मेरी बातचीत हुई फिर भी सतगुरु की कृपा से जो अनुभव
हुए और जो खजाने खुले उनकी बराबरी दुनिया की सारी दौलत भी नहीं कर सकती तीन टूक को पीन की भाजी बिना लूण तुलसी हृदय रघुवीर बसे तो इंद्र बा पड़ा को अंतर आत्मा का प्रकाश अंतरात्मा का ज्ञान अंतरात्मा की प्रीति अंतरात्मा में विश गुरु कृपा के बिना नहीं मिल तुलसीदास जी कहते हैं यह फल साधन ते ना होई गुरु कृपा ही केवलम शिष्य स परम मंगलम अब आप लोग कमर सीधी गर्दन सीधी लंबा शवास लो और एक से सवा मिनट रोको पेट को अंदर कर सको जितना ठीक है और नाभि से नीचे के सोच जाने
की इंद्रिय को सकोड के बैठो इससे मनोबल प्राण बल तो बढ़ेगा लेकिन भगवान की कृपा सामर्थ्य को झेलने की भी शक्ति बढ़ेगी ऐसा पांच से सात बार करो आप सब मिलकर लंबा शवास लो जितना ले सकते हैं कंठ में ओमकार स्वरूप ईश्वर का रटन करते हुए यह प्रयोग करने का है जिससे हमारी सुश शक्तियों के जो केंद्र हैं वो सजा होंगे और यह प्रयोग मन और बुद्धि के आरोग्य के लिए है लंबा शवास लो मैं करता हूं ऐसा [संगीत] करो फिर से गहरा स्वास [संगीत] अपने बच्चों को भी कराओ जिससे बच्चों के स्वभाव में जो
असंतुलन है वह ठीक होने लगेगा अभी आभा मंडल के रिसर्च कर्ताओं ने जाहिर किया है कि गाय के इर्दगिर्द न फीट आध्यात्मिक सात्विक ओरा होती है जो गाय को स्पर्श करता है गाय के गोबर में भी तात्विक रहती है दुनिया में 84 लाख प्राणी है बड़े पवित्र संत महात्मा ब्राह्मण है लेकिन किसी का भी मल मूत्र पवित्र नहीं माना जाता गाय ही एक ऐसा प्राणी जिसका मल मूत्र पूजा के समय भी काम में आता है गोज हरण एक तोला गोज हरण सुबह बासी मुंह पी लेवे कुछ दिनों में कैंसर ठीक हो जाता है एक दो
तोला गो झरण और थोड़ा पानी मिलाकर शरीर को रगड़ रगड़ के स्नान करें उसी दिन पापनाशिनी ऊर्जा जागेगी और आपकी चिंता और मन पर जो बोझ है हट जाएंगे आप प्रसन्न और अच्छे निर्णायक बन सकते हैं अगर गाय की दही रगड़ के स्नान करते हो तो आपके घर में लक्ष्मी का स्थाई वास होता है गाय का पंच गव बनाकर पीते हो तो आपकी हड्डियों तक के रोग मिटने लगते हैं कुछ समय में मन बुद्धि के पाप ताप नाश हो जाए वर्ष भर के अन्न के दोष अशुद्ध खा लिया किसी का खा लिया मुफत का खा
लिया ये अन्न दोष अन्न बिगड़ता है तो मन बिगड़ता है इन अनन दोषों को निवृत करने के लिए आंवले के वृक्ष की 108 परिक्रमा करने से आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन करने से दो गौ दान करने का फल होता है और प्रदक्षिणा करने से वर्ष भर के अन्न दोष से आदमी मुक्त हो जाता है तो आंवले के पेड़ पीपल के पेड़ पीपल के फल पीपल का दर्शन पीपल की हवा पीपल के पेड़ सामान्य पेड़ों के अपेक्षा सात गुनी अधिक सात्विकता पीपल के पेड़ों की हवा की है जहां पीपल के पेड़ों की हवा है वहां
के समाज में हार्ट अटैक और मानसिक दुर्बलता नहीं होती पीपल के पेड़ के ऐसी दैविक शक्तियां है कि आज एक परिवार आया मेरा परिचित है उन्होंने कहा कि हमने पीपल कटवाया तब से हमारे घर में यह यह यह यह यह मुसीबत आ गई मुसीबतों की लंबी कतार कही उसने तो और वृक्ष काटने से इतना उपद्रव नहीं होता परिवार में जितना पीपल का पेड़ काटने से तो ऐसे और वृक्ष को बोनास सींचना अच्छा है लेकिन पीपल के वृक्ष का लगाना ये पित लोक तक के हमारे पित्रों को भी तृप्ति और शांति देने में अगर तुम्हारे पास
खेत खली है जमीन है तो वो अपने घर मकान दुकान आदि के पश्चिम में अगर पीपल लगाते हो तो आपके लिए बड़ा शुभ होता है उसकी हवा भी शुभ होती है और तामसी शक्तियां भूत पिशाच डाकिनी शकीनी अलाए बलाए नहीं आती जैसे पीपल के वृक्ष की आभा विज्ञानियों ने सिद्ध किया अपने शास्त्रों ने सिद्ध किया है ऐसे ही गाय के गोबर की गाय के घी की गाय के झरण की और गाय के दही आदि की पंच गव की प्रशंसा शास्त्रों में भी है और अभी विज्ञानी इस बात पर ताज्जुब करते हैं कि गाय में सुवर्ण
सार गाय के दूध घी आदि में सुवर्ण सार पाए गए हार्ट अटैक के मरीज को कोलेस्ट्रॉल के मरीज को कहा जाता है कि चिकना मत खाओ गही तेल लेकिन गाय का घी हार्ट अटैक का मरीज भी खाए तो हार्ट अटैक बनता नहीं अभी तो हार्ट अटैक से रक्षित होने की संभावना बढ़ती है सुबह नींद में से उठे तो तनिक चुप होकर भगवान में बैठ जाए नींद में से आपका मन उठता है तो सचमुच में अंतरात्मा से बाहर आते ऐसे वार्तालाप करते चिंतन करते जब शुभ भाव में मन भर जाए तो फिर बोलना सुनना जरूरी नहीं
थोड़ी चुप्पी जिसे आपका भगवत प्रसाद जा मति का धन बढ़ता जाएगा गांधी जी महीने में एक हफ्ते में एक दिन मौन रहते चुप रहते जिससे शक्ति संचय करते और दिनों की अपेक्षा सोमवार के दिन यह बड़े-बड़े निर्णय और बड़े-बड़े काम करने में सफल होते भगवान ने कहा भजंते माम दृढ़ व्रता जो दृढ़ वृति है अपने कार्य में जिला प्रमुख हो जय राम जी जिला प्रमुख हो चाहे नगर अध्यक्ष हो अपने अपने क्षेत्र में दृढ़ता से शुभ कर्म में लगे तो बाधाओं को कुचल के समाज की दैविक सेवा करके अपना और समाज का मंगल कर सकते
बोले क्या करें जो भाग्य में होगा वह होगा भाग्य बड़ा है कि पुरुषार्थ बड़ा है तो कुछ लोग बोलते भाग बड़ा है कुछ लोगों का मानना है पुरुषार्थ बड़ा है और कुछ नालायक का मानना है ना पुरुषार्थ ना भाग्य खाओ पियो और मजा करो जो होगा देखा जाएगा ऐसे लोग हिपी हो जाते हैं हैप्पी रहो हैप्पी में से फिर वाडे जैसे हैप्पी बन जाते हकीकत में भाग्य का भी अपना प्रभाव है और पुरुषार्थ का भी अपना प्रभाव है और दोनों जब अपनी अपनी जगह पर होते तो बलवान होते हैं अवश्य मेव भोक्ति कृतम कर्म शुभ
शुभम नत जाण जानकी नाथे सवारे सुथा से अवसम व भोक्ति कृतम कर्म शुभ शुभम प्रारब्ध फल का अगर प्रतिकार होता तो दुखे न लिपर नल राम युधिष्ठिर युधिष्ठिर नल और राम नहीं चाहते थे फिर भी प्रारब्ध वेग से युधिष्ठिर को भी दुखों में जूझना पड़ा नल राजा को रामचंद्र जी को तो यहां प्रारब्ध की प्रधानता भी दिखती है और पुरुषार्थ की भी प्रधानता है अगर व्यक्ति चाहे तो पुरुषार्थ करके एक ऊंची स्थिति को पा सकता है एक भाई शादीशुदा अपने पति और बालक के साथ कहीं वृंदावन के तरफ से कहीं जा रही थी ड्राइवर की
लापरवाही कहो कि उसका प्रारब्ध कहो वास्तव में प्रारब्ध होता है तब लापरवाही भी दुख देती है नहीं तो प्रारब्ध बचने का होता है तो लापरवाही वाले ड्राइवर को भी आदमी अकल दे देता है अवश व भुक्ति तुम अगर कर्म होते तो वह भाई का एक्सीडेंट हो गया कार तो तोबा हो गई पति उसी समय मर गया ड्राइवर मर गया और खुद को तीन बड़े भयंकर फैक्चर हुए एक साल तक आगरा की अस्पताल में पड़ी रही मिलने वाले लोग गए बोले तुम तो इतना सत्संग करती हो फिर भी देखो उड़िया बाबा जैसे संत उड़िया बाबा के
चरणों में मथा टेकते थे अखंडानंद जी महाराज और अखंडानंद के चरणों में मथा टेक कर बैठती थी आनंदमई मां और आनंदमई मां के चरणों में इंदिरा गांधी आशीर्वाद लेने जाती थी तो प्राइम मिनिस्टर के दादा गुरु पर दादा गुरु जयराम जी बोलना पड़ेगा तो ऐसे उड़िया बाबा जैसे सं संत के पास तुम जाती हो और इतना सत्संग सुना फिर भी तुमको इतना दुख भोगना पड़ा पति मर गए अभी तो तुम्हारी उम्र छोटी है 30 साल भी नहीं पति मर गए तुम विधवा हो गई तुमको फैक्चर हो गए एक साल होने को आगरा के हॉस्पिटल में
पड़ी हो और किसी से बात कर रही थी बड़ी हंसती बसती बड़े आनंद और उल्लास से ठका मार के बात कर रही थी लेटी लेटी तो अब तुमको को दुख नहीं होता तुम बातचीत करती हो हस्ती हो तुम्हारे सत्संग का फल क्या उसने कहा सत्संग का फल यह है कि दुखद अवस्था आए फिर भी दुख से अपनी रक्षा कर ले चिंता अवस्था है फिर भी चिंता से पार कर दे दुखद प्रारब्ध आवे लेकिन पुरुषार्थ करके सत्संग कर ले तो दुख से अपने चित्त को निर्लेप रख सकते हैं प्रारब्ध तीन प्रकार का होता है मंद तीव्र
तर तीव्र मंद प्रारब्ध तो शुभ कर्म करने से मिट जाता है तीव्र प्रारब्ध शुभ कर्म और उसके विपरीत पुरुषार्थ करने से मिट जाता है मानो मुझे थोड़ा सा फूसी फोड़ा हुआ है और मैंने दबोच के अच्छी तरह से उसका मवाद निकाल के सरसों का तेल या और कुछ रगड़ दिया छुट्टी हो गई लेकिन कोई बड़ा फड़ा निकला है तो मैंने जरा सा पुरुषार्थ नहीं किया थोड़ा अच्छा पुरुषार्थ किया हकीम डॉक्टर अथवा जानकार का सहयोग करके मैंने उसको ठीक किया लेकिन तर तीव्र प्रारब्ध हुआ तो इलाज करने के बाद अस्पताल में भर्ती होने के बाद भी
उस रोग से मुक्ति नहीं हुई जैसे महावीर थे तो सज्जन पुरुष संत पुरुष थे तर तीव्र प्रारब्ध था पेचिस की बीमारी में आखिर उनके शरीर का दम टूट गया राम कृष्ण को कैंसर की बीमारी आखिरी तक शरीर ले गई रमण महा ऋषि को हाथ का कैंसर हुआ शरीर ने बहुत पीड़ा सही तो यह तर तीव्र प्रारब्ध है लेकिन पुरुषार्थ य है कि प्रारब्ध अपना काम करे तो पहले के कर्म जब फल देने को होते तो उसको बोलते प्रारब्ध और अभी जो हम कर्म करते उसका नाम है पुरुषार्थ तो अभी हमें धन मिला है नगर अध्यक्ष
का अथवा प्रमुख पद मिला है वो पहले का पुरुषार्थ अभी प्रारब्ध होकर हमारे पास सत्ता या उपयोगिता या घर मकान जो भी है वो पहले के प्रारब्ध से हमारे पास सुख सुविधा अथवा दुख अशांति आई अब हम उस सुख सुविधा का भोग करके अपना भविष्य बिगाड़े अथवा सुख सुविधा का बहुजन हिताय बहुजन सुखाए संयम साधना करके भगवान को पाए यह हमारा पुरुषार्थ अगर हम दुखी हैं और फिर दुखी में भी हम गलत साधनों का उपयोग करें चोरी जारी बेईमानी करके दुख से बचना चाहि तो यह हमारा हीन पुरुषार्थ हमारे को भविष्य में हीनता के तरफ
ले जाएगा रावण का पुरुषार्थ है प्रारब्ध है सोने का लंका मिली अब सोने की लंका का सदुपयोग करके और उन्नत हो सकता था लेकिन सोने की लंका और इतनी योग्यता मिली और फिर विलासी पने के तरफ जाते जाते परस्त्री गामी होते होते अपना प्रारब्ध की सुविधाओं को भी तुच्छ कर दिया शबरी भीलन का प्रारब्ध था मंद मंद प्रारब्ध होने पर भी शबरी भीलन ने मतंग ऋषि की शरण ली धीरे-धीरे मंद प्रारब्ध में जीते हुए भी रूखी सुखी खाते हुए भी अ असुविधा और प्रतिकूल वातावरण में जीते हुए भी शबरी के पुरुषार्थ ने भगवान राम को
अंतरात्मा में भी प्रकट कर दिया और दशरथ नंदन के रूप में भी अपने आश्रम में बुला दिया यह पुरुषार्थ दो ही रोग है और दो ही दवा है एक है पेट का रोग और दूसरा है आंख का रोग पेट का रोग है कि खपे खपे खपे लोभ लालच विकार भोग पेट भरता ही नहीं लाख वाला द लाख द लाख वाला करोड़ करोड़ वाला 10 करोड़ ऐसे ही छोटे पद वाला बड़ा पद ये वो चार साड़ी तो छ और ले आओ कैसा फर्नीचर है तो ये करो यह पेट भरता नहीं दूसरा के नजर ठीक होती नहीं
कोई किसी की पत्नी देखी किसी की लड़की देखी किसी का लड़का देखा किसी का मकान देखा किसी का फर्नीचर देखा ऐसी नजर कि बस य सुखी है मैं दुखी हूं ये ऐसा है हमारे को मिल जाए ऐसा मिल जाए तो नजरिया ऊंची हो जाए और पेट की भूख व्यर्थ की भूख मिट जाए इसके लिए दो प्रकार की दवा है पेट की भूख मिटाना है तो अपने तरफ से प्रयत्न करो और बाकी प्रारब्ध पर छोड़ दो तो लोभ मोह भूख मिट जाएगी प्रारब्ध पहले रचो पीछे भयो शरीर तुलसी चिंता क्या करे भज ले श्री रघुवीर तुलसी
भरोसे राम के निश्चिंत हुई सोय अन होनी होनी नहीं होनी होए सो होए इससे आपकी हाय हाय कम हो जाएगी और शांति मिलेगी अच्छे निर्णय होंगे सूझबूझ के धनी बनोगे नहीं तो खपे खपे खपे खपे में अभी के वर्तमान के सुख को भी खपा देंगे शांति को भी खपा देंगे बहुत सनप जम का भय व्याप ज्यादा चतुर बनते फिर भयभीत हो जाते और फिर हार्ट पर रदय पर मन पर बुद्धि पर भी बुरा असर होता है तो पेट के रोग को मिटाना है तो प्रारब्ध को आगे रख दो अपना पुरुषार्थ करो फिर जो मिले पत्नी
सुंदर मिले चाहे मिले स्नेह वाली मिले चाहे डांटने वाली मिले प्रारब्ध से जो हो गया संतुष्ट रहो तुकाराम की पत्नी ऐसी थी के महाराज उठ बठ करा दे कभी कभी तो डंडा ऐसा मारे के दो टुकड़े हो जाए गन्ने के गन्ना मार देती थी तुकाराम कहते हरि की इच्छा है हरि ने दिया है भगवान की कैसी कृपा है पत्नी अगर बहुत स्नेह करती तो मेरी विकार आसक्ति बढ़ती पत्नी का स्वभाव ऐसा है यह भगवान तेरी कृपा है एकनाथ महाराज की पत्नी ऐसी सती साधवी के पति को कौन से सीजन में कौन सा भोजन कौन सा
कपड़ा और किस समय कैसा पति की सेवा में लगना व खूब जानती थी मानो पति के अंतर्यामी हो गई तो एकनाथ का पुरुषार्थ है कि पति पत्नी सुंदर है गिरजा और सेविका है सद्गुण संपन्न है फिर भी पुरुषार्थ ऐसा करते कि मन भगवान में लगाते काम में गिरते नहीं राम रस पीते हैं औरों को पिलाते हैं और पत्नी की भी उन्नति चाहते यह पुरुषार्थ तुकाराम महाराज पत्नी के विरोध में भी सम रहते पत्नी की उन्नति चाहते और अपने चित्त को दुख से नहीं मारते नरसिंह मेहता की पत्नी मर गई प्रारब्ध से तो भगवान को कहते
हैं कि प्रभु दो चूड़ियां होती तो खटखट करती है इसलिए भजन में विघ्न पड़ता था तो आपने उसको अपने धाम में बुला लिया आपकी कृपा है तो पुरुषार्थ य है कि दुख के समय सम और संतुष्ट रहना और कर्म करते समय सावधान और फल भोगते समय प्रसन्न रहना यह पुरुषार्थ है फल भोगते समय फरियाद करते रहना अथवा फल भोगते समय अहंकार करना समझ लो कि यह पुरुषार्थ हीनता है तो दुख का अहंकार ना करो सुख का अहंकार ना करो मैं सुखी हूं सुखी हूं सुख भोक्ता होकर खोखले हो जाओगे मैं दुखी हूं दुखी हूं दुख
भोक्ता होते-होते तुम दुर्बल हो जाओगे दुख और सुख आता है तो दुख आता है संयम सादगी और भूल को खोजकर अनासक्त होने के लिए और सुख आता है उदार होकर दूसरों की सेवा करके आप और दूसरों के तरफ प्रसन्नता की सृष्टि करने के लिए यहां पुरुषार्थ की जरूरत है तो आंख की दवा और पेट की दवा छोटी सी काल्पनिक कहानी है वैधराज के पास मरीज गया कि आंख में ऐसी सी तकलीफ और पेट में भी पचता नहीं और बारिशों के दिन में गैस की तकलीफें होती गैस की तकलीफ होती तो हर चूसना चाहिए अथवा तो
सौफ नींबू में भिगो दे फिर थोड़ी सेक दे और वो सौफ खाए तो भूख भी अच्छी लगे और पेट की गड़बड़ भी ठीक हो यह तो मैंने मिलाया बीच में अब वो कहानी की तरफ चलते हैं वैद्य के पास गए वैद्य ने अपने कंपाउंडर को कहा कि इनको लवण भास्कर और यह वो थोड़ा तीखी अमुक अमुक औषध मिलाकर देना है ये फाके ग तो पेट भी साफ होगा एक दो दस्त भी आएंगे भूख भी लगेगी और यह चेहरे पर जो खिल विल है वो भी ठीक हो जाएगी और फलानी फलानी रोशन आदि दवा वो छाट
तो आंखें भी ठीक हो जाएगी इतने में एक अमीर आया और अमीर को भी वही तकलीफ थी तो सेठ ने उसके लिए भी बोला कि ऐसा ऐसा कर देना दवा दोनों के एक समान लेकिन अमीर समझदार था पुरुषार्थी था और गरीब ना समझी था और फरियाद आत्मक था नेगेटिव था वह गरीब दूसरे दिन आया कि वै दराज तुमने तो मेरा सत्यानाश कर दियो गरीब को भाग्य भी गरीब मेरी आंखें इतनी सूझ गई टमाटर ज हो और मेरा पेट इतना फूल गया मैं तो पहले से भी ज्यादा बीमार हो गया इतने में वह अमीर आया बोले
वैधराज भगवान तुम्हारा भला करें एलोपैथी की दवाए खाए खा के खुजली हो गई थी साइड इफेक्ट हो गया था आपने तो ऐसा गोली दिया और ऐसा चूर्ण दिया दो चार बार पेट साफ हो गया और बड़ी अच्छी नींद आई और आंखों में भी छाटा तो तपन बफन मिट गई बड़ी शीतलता हुई म आज मैं तो आपको क्या इनाम दूं क्या दुआ करूं आप तो बस हमारे लिए बस आप तो भगवान का रूप है व गरीब बोलता है य पैसे वाला था इसको बढ़िया दबा दी और हम गरीब थे घटिया दबा दी कंपाउंडर ने कहा दोनों
को एक जैसी थी वैद्य बोलता है दोनों के लिए एक जैसी लिखी है फिर तुमको ऐसी तकलीफ क्यों हुई कौन सी दवा कहां लिया था कैसे खाई है कुछ पुड़िया कोई बाची हां बोले पूरी नहीं खाई ज्यादा लगी तो तो मैंने ये थोड़ी बचा ली कौन सी बचाई बोले ये पेट में खाई थी वो बचा ली अरे पागल यह पेट की दवा नहीं ये तो आंख की दवा है लोशन आदि हो तो फाका तो तो पेट फुला देगी और आंख में डालने वाली दवा तूने पेट में खाली पेट की दवा बोले वो भी थोड़ी बची
ओ बोले सोठ और मेरा आंख में डालेगा तो आंख फूल तो जहां पुरुषार्थ करना चाहिए वहां प्रारब्ध पर छोड़ देते हैं और जहां प्रारब्ध से निश्चिंत होना चाहिए वहां पुरुषार्थ करते हैं तो बेटी की शादी है बेटे की शादी है फलाना है संसारी सुख सुविधा है यह तो आपका थोड़ा बहुत प्रयत्न करो बाकी प्रारब्ध वेग से ही आता है आप कितना भी प्रयत्न करो सभी धनी लोग होते नहीं और कितने भी धनी हो जाए फिर भी धन का भोग नहीं कर सकते तो इस बात में आप पुरुषार्थ करो पर दुख का तरता में और प्रारब्ध
वेग से गड़बड़ बड़ी हो गई तो उसमें सम रहने में पुरुषार्थ करो और प्रारब्ध से ऐश आराम मिल गया तो उसमें फंसने से आप बचने का पुरुषार्थ करो तो प्रारब्ध भी अपनी जगह पर महत्व रखती है और पुरुषार्थ भी अपनी जगह पर महत्व रखता है तो बोले दोनों में कौन बड़ा तो कुछ लोग बोल देते पुरुषार्थ बड़ा कुछ लोग बोलते थे प्रारब्ध बड़ा लेकिन अपनी अपनी जगह पर प्रारब्ध भी अपनी जगह पर उसका मौका है तो भी बहुत बड़ा होता है और पुरुषार्थ भी अपनी जगह पर बड़ा महत्व दिखाता है अपने अपने क्षेत्र में दोनों
महत्त्वपूर्ण है अभी हम यहां पर सत्संग में हमारा महत्व है राकेश गांधी को बिठाऊ तो ढीले पड़ जाएंगे लेकिन राकेश गांधी की जगह पर मैं जाऊ तो मैं बहुल हो जाऊंगा सीधी बात है बिल्कुल सच्चा गणित है जय राम जी बोलना पड़ेगा गोगुंदा वाले नारायण हरि बोलो नारायण हरि नारायण तो प्रारब्ध भी अपनी जगह पर है पुरुषार्थ भी अपनी जगह पर है उपयोग करने वाले की बलिहारी है तो जहां पुरुषार्थ की जरूरत है वहां हम प्रारब्ध के आश्रय बैठ जाते जैसे सुख दुख में सम रहना यह पुरुषार्थ के आधीन है विकारों में ना गिरना ये
पुरुषार्थ के आधीन है भगवत प्राप्ति करना यह पुरुषार्थ के आधीन है लेकिन कते क्या करें भाई हम तो ग्रहस्ती हैं भगवान की मर्जी हो गई तो भजन करेंगे तो पेट की दवा आंख में डाल दी और आंख की दवा पेट में डाल दी खपे खपे खपे खपे फुला दे गए पता पल का नहीं सामान 100 साल का पक्षी अभी किलोल करते हुए खाते हैं कल कहां रहेंगे कहां खाएंगे पता नहीं फिर भी वो बेचारे मस्ती से जी लेते मनुष्य ऐसा बेईमान हो गया कि खपे खपे खपे पेट ही नहीं भरता यहां तो धरता है और
विदेशों में भी धरता है मैं दुनिया के कई देशों में गया फिर स्विटजरलैंड भी जाना हुआ तो मुझे बताया गया कि फाइ मिलियन डॉलर का मकान है किसी चोर का बड़ा नेता है बड़ा चोर है नारायण और ऐसे नेताओं के छोरे फिर एश बहुत करते हैं इधर से उधर जहाज में जाएंगे सुबह फलानी जगह बंबई ऐश करके शाम को फिर जहाज में आएंगे क्योंकि पापा जो है सीएम है दो के दो बेटे तीन के तीन बेटे ऐसे विलासी छोरिया ऐसी तो हराम का पैसा आता है और अगर पुरुषार्थ नहीं है हराम के पैसे से बचने
को तो यह हराम का पुरुष हराम का पैसा और हमारी लापरवाही हमको नीचता की तरफ ले जाएगी अगर हम पुरुषार्थ करते तो कैसी भी परिस्थिति आए हम सावधानी से निकलकर ऊंचे चले जाते हैं तो कर्म करने में पुरुषार्थ और सावधान हीन कर्मों से बचे क्योंकि वह आगे चलकर आज का किया हुआ कल का प्रारब्ध पहले का कर्म अभी का प्रारब्ध है और अभी का कर्म भविष्य का प्रारब्ध है तो अब पहले के कर्म से जो हमें मिला है उसमें हम संतुष्ट रहे और करने में सावधान रहे यह पुरुषार्थ है तो बड़ा पुरुषार्थ भगवान बताते हैं
कि मत चित्ता मद गता प्राणा बोधि अंत परस्पर कथं च माम नित्यम तुष्यंति च रमती च मेरे में अपने चित्त को लगा मैं सत स्वरूप हूं चेतन स्वरूप हूं ज्ञान स्वरूप हूं नित्य हूं और प्राणी मात्र का सुहृद हूं ऐसा जो जानते हैं वे शांति पाते हैं आनंद पाते हर परिस्थिति के सिर पर पैर रख के ऊपर उठते जाते यह पुरुषार्थ है 20 बच्चे खेल रहे हैं और राकेश के मन में आ गया कि चलो इनको लड्डू खिलाए सबको एक एक लड्डू दे सकते हो तुम उस अपना ब चाबी खेल रहा है लेकिन जब अपने
और कभी कोई गड़बड़ी करते और बच्चा उदम करते तो राकेश अथवा और कोई आप बसों बच्चों को तमाचे नहीं मार सकते अपने बेटे को तो तमाचा मार सकते हो बसों बच्चों को तमाचा नहीं मार सकते क्या ख्याल है तो आप दया तो सब पर कर सकते हैं लेकिन अनुशासन तो अपने वाले परही कर सकते ठीक बात है अध्यक्ष ठीक बात है मिठाई तो सबको दे सकते हो लेकिन चपत तो अपने बेटे को ही मार सकते हो ऐसे ही सुख सुविधाए तो समझ लेना कि भगवान उदारता से हमको दे रहे हैं दुख विघ्न बाधा है तो
समझ लेना कि भगवान ने हमें अपना मानकर शुद्धिकरण का प्रयोग किया है वाह प्रभु तेरी जय हो ओम नमो भगवते वासुदेवाय लड़की अस्पताल में सोई पति मर गए तीन फैक्चर हुए आय के साधन चले गए विधवा हो गई और तुम अभी ठका मार के हस रहे बोले ऐसा कष्ट दिया भगवान ने तो अपना मान के दिया है ना संसार से आसक्ति छुड़ाने को दिया सत्संग का फल यही है आंख की दवा आंख में लगे पेट की दवा पेट में लगे आदमी निरोग हो जाए मैं निरोग हूं निश्चिंत हूं निर् दंद हो आज का मानवी क्या
है कि धन में भी दुखी है निर्धनता में भी दुखी है बाबा जी को ले गए एक सेठ अपने घर पर भोजन कराने को भोजन शुरू हुआ दाल में देखा तो थोड़ा नमक ज्यादा रसोय को सुनाई और थाली पटकी ऐसे घुसाया ऐसे घुसाया कि नालायक तुझे पता नहीं कितने बड़े संत आने वाले अरे दो पैसे की दाल नहीं बना सकता खाना खराब कर दिया बाबा ने समझा जैसे कैसे थोड़ा-थोड़ा खाके गए लेकिन बाबा मेरे को तो शांति तब मिलेगी कि कल आप हमारे घर भोजन करने का वचन दोगे दयालु बाबा थे बोले अच्छा भैया आ
जाएंगे अब तो खुश रहो लेकिन जिसको दवाई उल्टी खाने की आदत है खुश क्या रहे दूसरे दिन बाबा आए भोजन करने बैठे सेठ जी ने यह चखा वो चखा फिर दाल चखी बहुत बढ़िया दाल थी ना निमक कम ना मिर्च कम ना कु कम कम ना हल्दी कम ना बगार की राई मीठी कम बहुत बढ़िया और हिंग का छक भी दिया है अरे बोले इधर आ हे रामू पंडित इधर आ बेवकूफ नालायक कमीने जब इतनी बढ़िया दाल तू बना सकता था तो कल क्यों सत्यानाश किया तेरे की कल घटिया बनी तो खाना खराब और आज
बढ़िया बनी तो भी खाना खराब और बढ़िया भोजन आया तो पत्नी ऐसा खिलाती थी गुल्लू की मां आज 20 साल के बाद यह भोजन दिया है किसी ने तेरी याद आती है अब वो मर गई तू उसके पीछे मरा जा रहा है यह उल्टी दवा है जो बीत गई सो बीत गई तकदीर का शिकवा कौन करे जो तीर कमान से निकल गई उस तीर का पीछा कौन करे कहां तक करे कब तक करे एक बार गांधी जी और कस्तूर बा के बीच जरा टपा टप हो गई रात्रि के 930 से 10 के बीच झगड़े ने
जोर पकड़ा गांधी जी जरा स्वभाव के जिद्दी थे किसी भी कीमत पर मैं तेरे को अपने घर में नहीं रखूंगा जाओ निकलो अभी अी गो आउ हाथ पकड़ के कस्तूर बा को घर के बाहर कर दिया और दरवाज के दरार से आपको मजा आ रहा है ना सुनने में मेहमानों को आ रहा है मजा कस्तूर बा सीढ़ियों पर बैठी अब प्रारब्ध वेग से या ना समझी से झगड़ा तो हो गया अब य उल्टी दवा खाते हैं की सीधी दवा खाते हैं यह देख लेना उ दरार से देख रहे हजी बैठी छ शर्म नथी आवती जती
रे जती रे जती रे चली जा चली जा मुझे नहीं चाहिए नहीं चाहिए मेरे घर में तेरा पैर नहीं होगा पुरुषार्थ करके शांति की मूर्ति कस्तुरबा बैठी गांधी जी ने फिर जोर पकड़ा 10 15 मिनट छोड़ दिया फिर देखा बैठिए तो दरवाजा खोलकर बोलते तेरे को शर्म नहीं आती बोलता हूं चली जा मेरे घर में आज से तेरा पैर नहीं तो बोले कहां जाऊ बोले जहां चाहिए वहां जा शर्म नहीं आती इतनी इतना बोलता हूं चली नहीं जाती अब कस्तूर बा ने देखो पुरुषार्थ को करवट दी बोले आप वकील है जरा सुनो मुझे शर्म आनी
चाहिए कि आपको शर्म आनी चाहिए क्या बो है बोले जरा सुनो क्षमा करना आप तो ज्ञान का आदर करते हैं समझ का आदर करते हैं मुझे शर्म आनी चाहिए कि आपको शर्म आनी चाहिए आपको पता है घर गृहणी का होता है स्त्रियों का घर होता है उसी लिए बोलते घरवाली ऑफिस वाली नहीं होती फैक्ट्री वाली नहीं होती घर वाली होती घर स्त्रियों का होता है ऑफिस पुरुषों की होती है आपको जाना है तो चले जाइए मेरे घर में आप घुस गए हैं आप मेरे घर में घुसे हैं मैं तुम्हारी ऑफिस में नहीं घुसी हूं क्या
कानून आप ही जानते हैं धर्म मर्यादा क्या है ग्रणी होती है स्त्री घर वाली होती है ऑफिस वाली नहीं होती दुकान वाली नहीं होती है घर वाली होती है क्या ख्याल है और अभी रात्रि को मैं कहीं जाकर रहूं स तो कल मीडिया वाले छापें गांधी जी की पत्नी आज फलानी रात को किसी के घर में थी तो इज्जत किसकी जाएगी आपकी इज्जत मेरी इज्जत नहीं है अरे सॉरी सॉरी तू इतना ख्याल रखती मैं उताव में आजा आजा आजा कॉम्प्रोमाइज हो गया गांधी गा पुरुषार्थ करके झगड़े को फिर स्नेह में बदल दिया और बीमारी के
दिनों में गांधी जी ने कस्तूरबा की खूब सेवा की जवानी में जो ताड़न किया था उसका प्रायश्चित रूप पुरुषार्थ करके उत्तर काल में हुआ अब मैं मेरे बाप की और मां की कथा कहता हूं आप देखो मैं कितना दिल खोलकर बात कर रहा हूं अपने मां-बाप की प्राइवेट बात तुमको बताना मेरा आपके साथ मोहब्बत है कि नहीं है उसके बीच एक मैं हंसने की बात बोल देता हूं एक लड़का बड़ा तूफानी था उसकी मां ने कहा मेरे बाप मैं तेरे ना ना बीमार है दो दिन के लिए माके जाती हूं खिलौने ले यह पैसे ले
तू मैं तेरे को हाथ जोड़ती हूं तू अपने घर में और अपने चार मकान जो है रिश्तेदारों इस मोहल्ले में ही खेलना बाहर दूर जाना नहीं और जाकर तू मारपीट करता नहीं फिर लोग मना देती इसीलिए मैं तेरे को मारती मेरे बेटे लड़ाई झगड़ा नहीं करना किसी को मारना नहीं पत्थर नहीं मारना गाली नहीं बोल वचन देता ना बेटे हा माने लला चमा म मु पु जो सिंधी जानते हाथ ऊपर करे ठीक है शाबाश हो जागा मां दो दिन के बाद आई बोले बेटा किसी को पत्थर मारा बोले मां नहीं मारा किसी को गाली दी
मैं कुछ नहीं तो बेटा फिर क्या करहा मां मां हम टपाली तपाली खेले थे अच्छा तपाली तपाली खेले ओय हो ब तपाली तपाली ख बोलो बोलो बोलो कैसे खेले थे टपाली मतलब डाकिया यहां हिंदी में डाकिया बोलते हैं गुजरात में टपाली टपाली बोलते हैं तो हम डाकिया डाकिया खेले थे तो कैसे खेले बेटे मां तुम्हारी और पापा की शादी के पहले जो चिट्ठियां आती थी एक दूसरे को और जो कुछ ऐसी बातें को वो जिस बक्से में पड़ी थी वो बक्से का ताला ख हिलाया तो खुल गया और सारी चिट्ठियां लेकर हम एक एक चिट्ठी
घर घर में दे आ रे चोरा त टपाली टपाली डाकिया डाकिया ल खेलने से तेरे बाप की और मेरी इज्जत डाकिया डाकिया क तो मैं ऐसी बात नहीं कहूंगा फिर भी मेरे मां-बाप की बात आपको सुनाता हूं मैं डाकिया डाक नहीं खेला था मैं लगभग न 10 साल का था मेरा भाई बड़ा था मेरे पिता की जाने के दिन आए तो पूछते थे कि आज कौन सी तिथि है आज कौन सी तिथि है दिन के बाद बोले अच्छा अभी दो दिन और रुकना है आज 11 आज नौम है जब पूर्णिमा हुई सुबह जल्दी जल्दी मेरी
मां को उठाया और बोले जेठे को उठाओ गाय के गोबर का लेपन करें और तुलसी के पत्ते या अभी रात को तो तुलसी तोड़ना अपराध माना जाता है सूर्य दय के पहले तुलसी नहीं तोड़नी चाहिए और रात्रि को भी तुलसी नहीं तोड़नी चाहिए इतवार को भी तुलसी नहीं तोड़नी चाहिए तो द्राक्ष डाल के थोड़ा भगवान नाम स्मरण करके चरणामृत बना दे मेरे मुंह में डालो और मेरे को नीचे सुला दो गीता का पाठ करो फिर मेरे पिताजी मेरी मां से बहुत जबरदस्त अलग स्वभाव के थे मेरी मां भाव प्रधान थी श्रद्धालु थी कर्मठ थी परोपकार
में बड़ी माहिर थी मेरी प्रस्तुति होने वाली थी सुबह सुबह तो भगवान को जाकर पूजा कर रूम में प्रार्थना किया कि अभी नहीं कराओ ये दही छाछ मखन मखन बलो बलो हुए लोग आए दे बांटो फिर होए तो मेरे को भी रोक कर 1200 बजे के बाद दाई के पास गई और फिर प्रसुति हुई ऐसी बहादुर थी मेरी मां सेवा में तो उसके संकल्प में भी बल था कई लोग कुछ पूछने आते तो मेरी मां जो बताती बिल्कुल परफेक्ट निकलता था ऐसी मां का बेटा हूं और नीम के पेड़ को आज्ञा किया जाओ ठीक जगह
पर बैठो नीम का पेड़ चल पड़ा तब मुसलमानों ने मत्था टेका आप लीलाराम नहीं लीला ऐसे गुरु का चेला जय हो जय हो जय हो कहने का तात्पर्य है कि मेरे पिता बड़े दबंग थे और मेरी मां बड़ी भक्तानी थी तो जरा दम मारते थे मरते समय वह शेर मेरी मां को कहते हैं कि जेठे मां तुम मेरे को माफ कर दो जेठे मां तो कल्पना नहीं कर सकती कि ऐसे धबंग आदमी और मेरे जैसी भोली भाली गरीब देहाती महिला को हाथ जोड़ेंगे मृत्यु सेया पर लेटे हुए आसम आशाराम के बाप मेरे आशाराम की मां
को बोलते हैं कि जेठे मां तुम मेरे को माफ कर देना मैंने अनजाने में जाने में तेरे साथ कभी भी बच सलूक कई बार किया है तो मेरे को माफ वो बोले नहीं नहीं नहीं आप वो तो पति पराण थी वो तो पति देव मानती थी वो दिल में बुरा नहीं मानती थी जेठाणिया के कहने से भी मेरे पिताजी जरा आ जाते तो थोड़ा कड़क व्यवहार करते कभी हाथ भी उठा देते तो वह हाथ जोड़ते तो मेरी मां को आश्चर्य लगा कि आप क्या करते बोले नहीं तो देखो लेना देना रहेगा फिर तुम और मैं
फिर कुछ बनेंगे और एक दूसरे का चुकाना पड़ेगा तू मेरे को माफ कर दे तो मेरी मां ने भी आप भी मेरे को माफ कर दो ना ये पुरुषार्थ है राग को द्वेष को माफी ले दे के छुट्टा करके आप मुक्त आत्मा बन जाओ यह पुरुषार्थ है और मैं भी देख लूंगा मैं भी देख लूंगा यह पुरुषार्थ हीनता है आई आउट यू आउट हु विल कैरी डर्ट आउट मैं भी रानी तू भी रानी कौन भरेगा घर का पानी जो हो गया हो गया पुरुषार्थ करके राग को मिटाओ द्वेष को मिटाओ भय को मिटाओ दूरियों को
मिटाओ सब तुम्हारे तुम सभी के फासले दिल से हटा दो निंदा किसी की हम किसी से भूलकर भी ना करें निंदा किसी की हम किसी से भूलकर भी ना कर शास्त्र कहते हैं कि पर निंदा सम अघन गरिष पराई निंदा के समान कोई घना पाप नहीं है अब भी विज्ञानी बोलते हैं कि निंदा और ईषा से टाइड नाम का द्रव्य बनता है और एलडीएल बनता है जो हाई बीपी लो बीपी हार्ट अटक और बीमारियों को जन्म देता है तो निंदा करने से हमारा मन भी खराब होता है और शरीर में भी जहरी द्रव्य बनते हैं
तो अगर हम निंदा की जगह पर स्नेह और समता ज्ञान का पुरुषार्थ करेंगे तो हमारे शरीर में आरोग्य का रस बनेगा तो जिसके जीवन में सत्संग का पुरुषार्थ है उसको पथियारा करर ज्ञान हासिल नहीं करना पड़ता नित्य नवीन ज्ञान उभरता रहता है जिसके जीवन में सत्संग और प्रभु प्रीति का पुरुषार्थ है उसको सुख के लिए क्लबों में लेडी और लेड के चर्म चाटने नहीं जाने पड़ते अपने आप में तृप्त रहते उनको पिक्चर देखकर अपनी आंखें खराब नहीं करनी पड़ती अंदर की आंख से वे तृप्त रहते जिन्होंने सत्संग का गुरु मंत्र दीक्षा का पुरुषार्थ किया उनको
स्वास्थ्य के लिए कोई टोनिक नहीं खानी पड़ती ऐसे दिव्य रस पैदा होते र और 70 साल में भी जवान बापू बने रहते हैं क्या ख्याल है मैं बूढ़ा लगता हूं क्या बूढ़ा लगता हूं 70 साल का जवान नहीं लग रहा हूं क्या बूढ़ा है तो तुम्हारे बाप बूढ़े तुम्हारे दादा बूढ़े तुम्हारे गांव वाले बूढ़े हम तो जवान है नित्य नवीन रस तो भगवत ध्यान का पुरुषार्थ भगवत प्रीति का पुरुषार्थ भगवत पुरुष भगवत विश्रांति का पुरुषार्थ जो जाना है उसका आदर करें जिसको मानते उसमें अटल रहे और जो मिला है उसका सत उपयोग करें यह पुरुषार्थ
है जो योग्यता मिली उसका सत उपयोग करें जो जाना है उसके विपरीत ना करो जानते हैं कि यह अशुद्ध है याय ठीक नहीं जरा डटे रहो तो आपका मनोबल बुद्धि बल यश बल सब बढ़ [संगीत] जाएगा [संगीत]