श्रीमद् भागवत पुण्यम आयु आरोग्य पुष्टि दम श्रवण पठना तप सर्व पापे प्रम भागवत सुनने से पुण्य होता है यह तो समझो मान लिया लेकिन भागवत सुनने से महाराज आयुष्य कैसे बढ़ता है हम नहीं मानते जय राम जी की श्रीमद भागवत पुण्यम आयु आरोग्य आरोग्यता मिलती है पुष्टि मिलती है मन तन स्वस्थ होते पुष्ट होते श्रीमद भागवत पुण्यम आयु आरोग्य पुष्टि दम श्रवण पठना तप सुनो या तो पढ़ो सर्व पापी प्रम आज का नास्तिक आदमी बोलेगा कि महाराज यह बात हम नहीं मानते [संगीत] भागवत को सुनने से आयु बढ़ती है भागवत को सुनने से पुण्य होता
है तो समझो मान लेते श्रद्धा से आयु कैसे बढ़ती है उसका वैज्ञानिक प्रमाण जो आदमी जरा जरा बात में उद्विग्न हो जाता उसके श्वेत कण ज्यादा बिखरते हैं और जो शांत रहता है उसके श्वेत कण बहुत कम बिखरते हैं और वे स्वेत कण आयुष्य को पुष्ट करने वाले अगर विश्वास ना हो तो थोड़ी देर क्रोध करके देखो तो आप अपने को कमजोर महसूस करेंगे और क्रोध के समय शांत रहकर देखो तो थोड़ी देर के बाद शांति के कारण आप अपने को पुष्ट महसूस करेंगे भगवत कथा से राग और द्वेष की कमी हो जाती जो जरा
जरा बात में राग से या द्वेष से विचलित होते हैं उनकी आयुष्य जल्दी क्षीण होती है न भगवत कथा सुनने से भगवता का वृत्ति पैदा होती है वैसे देखा जाए तो समस्त ब्रह्मांड में एक ही व अकाल पुरुष सच्चिदानंद प्रभु है किसी में कम उसका विकास उभान है तो किसी में ज्यादा है जिसमें वह परमेश्वर कम विकसित है वह कीट पतंग जीव जंतु वृक्ष आदि दिखते हैं फिर मनुष्यों में उससे ज्यादा है लेकिन मनुष्यों में भी जिनस में अधिक प्रकाशित हुआ वे महापुरुष और संत हो गए और जिनमें अभी उतना प्रकाशित होने के रास्ते चल
रहे हैं वे साधक [संगीत] हुए तो ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों का कहना है कि सर्वत्र सब में एक अखिल ब्रह्मांड व्यापक सच्चिदानंद आत्मा परमात्मा की सत्ता है लेकिन माया की परत जिस जहां ज्यादा है वहां वह छोटा प्रतीत होता है नन्ना प्रतीत होता है अथवा छोटी भाषा में कह दो कि वहां वह तुच्छ रूप से प्रतीत होता है कि यह तो तुच्छ जीव है कीड़ी है मकोड़ा है मेडक है सांप है है तो तुच्छ जीव है तुच्छ जीव तो है लेकिन तुच्छ आत्मा नहीं है तुच्छ उनकी वृधि है उनकी ड्रेस तुच्छ है लेकिन उसमें भी मेरा रब
बैठा है यह निगा है ब्रह्म बेटा जड़ भरत जब चलते हैं रहु गण की डोली उठाकर तो कहीं मेरे पैर से इ नन्य वर्धी धारी परमात्मा की अवज्ञा ना हो जाए इसलिए जड़ भरत कूदते रहु गण डांटता है तू कूदता है और मेरी ड़ी टकराती है डोली से मैं उतरूंगा तेरी खाल उतार दूंगा मैं सिंध सौरभ का सम्राट हूं और बेगर करना तुम्हारा कर्तव्य है और बेगर लेना मेरा अधिकार है चमड़ी उधेड़ दूंगा इतनी डाट फटकार सहने के बाद भी वह भारत का बहादुर फिर से कीड़ी मकोड़ा देखता और मारता है जमप चमड़ी उधने आग
बबूला होकर वार्निंग दे रहा है फिर भी इस संत का हदय लापरवाही नहीं करता हजार हजार माताओं का हृदय मिलाओ तब कहीं संत हृदय मिलता है मैंने सुनी एक कहानी एक सेठ ने धन अनाप सनाब ढंग से इकट्ठा किया अब नाहक का धन नाहक का अन्न नाहक का मन बनाता है उसका बेटा लोफर जैसा हो गया सेठ तो मर गया लेकिन धन गलत रास्ते लग गया और यहां तक गलती की कि लड़के की शादी तो हो गई फिर भी लोफर के साथ इधर उधर भटकता था एक वैशा का बड़ा नाम था खूबसूरत थी उसके पास
गया कि मैं तेरे पास रात रहूंगा वैशा जानती थी कि ये बड़े घराने का है और उसकी मां को अपने पति के वियोग का अभी ठोकर लगा है यह लड़का अगर मेरे रास्ते चल पड़ा तो उनका खानदान बर्बाद हो जाएगा कभी-कभी छोटे वर्धी में रहने वाले चेतन भी बहुत ऊंची बात करते हैं जय राम जी बोलना पड़ेगा बलव मंगल की जिंदगी बदल दी सूरदास स्वामी बनाने में वैश्या का ही उपदेश था जरूरी नहीं कि आशाराम का उपदेश सुनने से ही आपका भला होगा यह कोई जरूरी नहीं है न जाने वो रब किसके उपदेश से किसके
दो वचन से आपका मंगल कर दे मैं नहीं कह सकता लेकिन वो कर सकता है वैशा ने बिल्व मंगल को मेणा मारा कि हाड मास के मेरे शरीर में इतनी आसक्ति के तू नदी यमुना यमुना की बाढ़ लांग कर आया है मूर्ख यमुना की बाढ़ के पानी से तू डरा नहीं और मेरे शरीर को चाटने चूसने को आया इससे आधी जो प्रीति भगवान में होती तो तू कहीं का कहीं बन जाता बोले एक बार तो दरवाजा खोल बोले अब यह दरवाजा नहीं खुलेगा दरवाजा उसी का तू खटखटा जो सबका दरवाजा है वही बिल्व मंगल चल
पड़ा और संत सुर दस बन गया वैश्या गामी भगवत गामी बन गया क्या है उस चैतन्य की लीला पत्नी के बिना नहीं रह सकते थे तुलसीदास माय के गई है पत्नी साहब नैन का चैन चुरा कर ले गई कर गई नींद हराम करवट लेते लेते देखा कि अब तो मिसिस के पास जाए बिना भी क्या जीना है तेरे बिना भी क्या जीना बीच में नदी आती थी ससुराल के घर जाते जाते नदी में कूदे कोई लक्कड़ समझकर फूले हुए मुर्दे का सहारा लिया मध्य रात पहुंचे बरसात के कारण बिल में से सांप नि अपनी जान
बचाने को कोई अजगर साप जो भी होगा खिड़की में लपट मार के लटक रहा था उस दो मुही दो मुह सांप को या अजगर को रस्सी समझकर खिड़की से कूद क्या आ है मिसस के गले लगे अरे कौन बोले मैं तेरा मैं वही तेरा इस समय इधर कैसे बोले प्रिय आ गया देख तूने भी मुझे चाहा रस्सी बांध रखी थी बोले जा रे मुआ मैं कहां रस्सी बांध रखी तेरे लिए बोले रस्सी जो लटका रखी थी मैं उसी रस्सी को पकड़ के कूद के आया पत्नी ने लाल टन की लो बढ़ाई देखा कि रस्सी तो
नहीं तो रसा है बड़ा साप तो नदी में तो पानी था कैसे आ गए बोले नदी में पानी था लेकिन लक्कड़ आया था भगवान ने लक्कड़ भेज दिया था चलो पास में नदी बह देखा लक्कड़ तो नहीं था जिसको लक्कड़ समझकर किनारे लगे थे व तो फुला हुआ मुर्दा था पत्नी ने कहा हाय राम हाय इस हाड मास दो हड्डियां है खड़ी कुछ आड़ी हड्डिया है मांस है अंदर मल है मूत्र है थूक है लीत है विस्टा है ये तो उस रब की कृपा है कि कवर डाल दिया चमड़े का जरा कवर हटाकर मानसिक ढंग
से देखें तो क्या भरा है बाहर चखी मक्खी अंदर दख है बाहर चखी मक्खी अंदर खी तुम मुझे बोलते हो सुंदरी और प्रेयसी तेरे बिना क्या जीना तेरा नाक तो तोते की चोच जैसा है लेकिन भरता मेरा नाक ऊपर उठाती हूं जरा देखो क्या भरा है तेरे दांत तो दाड की कली जैसे चमकते लेकिन इन दांतों में तो थूक और मरे हुए बैक्टीरिया के सिवा कुछ नहीं सुबह सुबह एक दूसरे का मुंह सु के देखो तो मेरा जाए तुम इस हाड मास के शरीर को इतनी प्रीति करते हो कि मुर्दे को तुम लक्कड़ समझ के
आए और सांप को तुम रस्सी समझ कर आए इतना तुम्हारे में बल था इस हाड मास की गंदगी का सानिध्य लेने के लिए इतना ही बल नहीं इससे आधा भी बल लगाते उस अंतर्यामी राम को पाने में जिससे यह हाड़ मास के शरीर चलते फिरते खाते पीते लेते देते दिखते हैं अकल वाले हुशार नेता जनता आदि जास सत्य ताते कर जड़ माया जिसकी सत्यता से जड़ माया का शरीर भी सत्य जैसा लगता है उस परमात्मा में अगर प्रीति होती इससे आधी भी होती तो तुम्हारा तो कल्याण हो जाता तुलसीदास कहते फिर से बोलो फिर से
कहो ना एक बार फिर से कह दो देवी रत्नावती कहती है तुलसीदास की पत्नी तुलसीदास हाड मास की देह ममता में इतनी प्रीति यात आधी हाड मास की देह ममता में इतनी प्रीति आते आधि जो राम प्रति अवस मिटे भव भीति बोले एक बार और कह दे अब देखो क्या उसका कल्याण कराने वाला उसी के दिल से बुलवा है कि एक बार और कह दे और उसके दिल से बोलता एक बार और सुन लो बोलने वाली अलग और बुलवाने वाला अलग लेकिन गहराई में वो एकदा एक यार ओ हो कहीं सात्विक वृत्ति के रूप में
चमका है कहीं सात्विक तो मिश्रित राजस तो कहीं सात्विक मिश्रित तामस तो कहीं सात्विक तन है कहीं राजस तन है कहीं तामस तन है कहीं अति तामस है सात्विक में भी उत्तम सात्विक मध्यम सात्विक कनिष्ठ सात्विक राजस में भी ऐसे तामस में ऐसे कई भेद देखते हैं लेकिन उन भेदों के बीच बैठा जो है वह अभेद है उस अभेद के नाते आप सबको प्रणाम है उस अभेद ब्रह्म परमात्मा के नाते आप सबको प्रणाम है आप मुझे इतना प्रेम करते स्नेह करते मुझे पता ही नहीं चलता कि आप क्यों कर रहे हैं जय राम जी की
मेरे में ऐसा कुछ है ही नहीं जो आप बोलते संत है यह हैं यह है महापुरुष है फलाना मुझ में तो मैं खोजता हूं तो मुझ में ऐसा कुछ है नहीं अगर है तो उसके सिवा कुछ नहीं है नारायण नारायण नारद जी ने कहा प्रभु आपने सृष्टि उत्पन्न की पितामह आप मेरे पिताजी है ब्रह्मा आपने सृष्टि उत्पन्न की आप बड़े महान है तब पितामह कहते हैं कि नारद लोग मेरे देव को नहीं जानते इसलिए बोलते हैं कि ब्रह्मा जी ने सृष्टि की मैंने सृष्टि नहीं की उसी के द्वारा सृष्टि हुई है ऐसे मैं कुछ नहीं
देता उसी के द्वारा आपको मिलता है बस वही है सारा का सारा नारायणा हरि नारायण बोलो ना कंजूसी ना करो नारायण हरि नारायणा हरि नारायण नारद भक्ति सूत्र में आता है श्रद्धा पूर्वा सर्व धर्मा मनोरथा फल प्रदा तुलसीदास के अंदर वह श्रद्धा मनोरथ को पूर्ण करने वाली फल प्रदानी श्रद्धा जगी रत्नावती को प्रणाम कि तू मेरी गुरु अभी तक तो भोग्या थी पानी ले रोटी बना दे ऐसा कर वैसा कर लेकिन श्रधा ने उस पत्नी के अंदर छुपे हुए पिया की याद दिलाई हाथ जोड़ दिए तू मेरी गुरु मैं जाता हूं आए थे काम भोग
करर कमर तोड़ने के लिए लेकिन राम के दो शब्द सुने और दिल जोड़ने का रास्ता मिल गया कमर तोड़ने के लिए आए थे दिल जोड़ने की प्रेरणा वो कैसा है कैसी उसकी लीला है मेरी तो जो जो उम्र बढ़ती है और जो जो समझ थोड़ी बढ़ती है ऐसा लगता है त्यों त्यों मुझे लगता है कि जब कुछ नहीं जानते तो समझता था कि बहुत कुछ जानते हैं और अब लगता है कि हम तो कुछ भी नहीं जानते बाबा हम कुछ भी नहीं जानते ईश्वर साक्षी है कि मेरा कोई पूर्व तैयारी नहीं थी कि मुझे आज
इधर आना है और क्या बोलना है मुझे पता नहीं और वह जो बुलवा रहा है वो मुझे ही आनंद आ रहा है भया नारायण हरि नारायण हरि कुछ लोग तो पूर्व तैयारी करते कुछ तो पढ़ लिख लिखाकर बड़ा लेटर ले आते और माइक के आगे पढ़ते रहते बड़ी मंजी धजी भाषा होती है फिर भी सुनने वालों को लगता है कि कब चुप करें 10 मिनट के लिए पढ़ता है फिर भी लोगों को लगता है कि भाई कब चुप करे बंदा और यहां य आप घंटों परर इंतजार करते हैं और हम घंटों भर बोलते रहते फिर
भी आपके मन में होता है कि अभी और बाबा जी और थोड़ा अभी और ना बोलो तो कोई बात नहीं खाली बैठे ही रहो बाबा जी परिश्रम हुआ है अति तो ना भी बोलेंगे तो बैठे रहे और आप बैठे रहते हैं तुम तसल्ली ना दो सिर्फ बैठे ही रहो गुरु जी तुम तसल्ली न दो सिर्फ बैठे ही रहो महफिल का रंग बदल जाएगा गिरता हुआ दिल भी संभल जाएगा संभल हम लोग जब संतों के चरणों में बैठते हैं तो हमारा गिरता हुआ दिल भी संभला रहता है नहीं तो इस शोर शराबे के युग में और
कलयुग में जरा सा शादी विवाह में जाते तो घड़ी-घड़ी में पानी वाला घूमता है आइसक्रीम वाला घूमता है पेप्सी वाला घूमता है फिर भी दो घंटे शादी बारात में बैठना मुसीबत लगता है अरे भाई खत्म करो जल्दी हमें जाना है और य ना कोई पानी प्यास लगे तो चुप बैठो और ये तपती रहती मायों को तो मैं भाई फिर से प्रणाम करता हूं चार बजे की बैठी होंगी कोई 3:30 बजे की भी देवियां धरना मार के बैठी होंगी और उस समय कितनी गर्मी लगती होगी फिर भी फरियाद नहीं मुस्करा के गम का जहर जिनको पीना
आ गया यह हकीकत है कि जहां में तुम्हें जीना आ गया नारायण हरि नारायण हरि नारायण हरि तो मैं फिर वही भागवत पर ले चलता हूं आपको लेकिन तुलसीदास की थोड़ी बात पूरी कर ले तुलसीदास जी जंगल में गए कि मैं तो कामी आदमी और तेरी भक्ति कैसे कर सकूंगा हे भगवान मुझे तेरा भक्त भक्त तो क्या बन सकूंगा तेरे संत का सेवक बना दे लेकिन वो भी नहीं बन सकता पहले तो सोचा कि मुझे तेरा भक्त प्यारा संत बना दे लेकिन हिम्मत नहीं थी संत बनाने की भीख मांगने की बोले अगर मैं तेरा प्यारा
भक्त नहीं बन सकता हूं तो तेरे संत का मुझे सेवक तो बना दे इतनी तो कृपा करते इतनी कृपा के मैं काबिल तो नहीं हूं तो कम से कम संत के सेवक ना बना सके तो संत के घर की गाय बना दे और दूध का छंडा उसकी सेवा में आ जाएगा और वही दूध तेरी भक्ति में काम आएगा तभी भी मेरा कल्याण हो जाएगा संत के घर की गाय बना दे मुझे संत के द्वार की गाय बना दे फिर सोचा कि संत के द्वार की गाय बनने के लिए भी कुछ तो पुण्याई चाहिए और मैं
तो कामी कुटिल मौसम कौन मेरे समान कामी कुटिल कौन और तुम्हारे जैसा रहमत करने वाला कौन उत्तर दक्षिण ध्रुव लगा है फिर मन में कि तुम और तो कुछ नहीं संत के द्वार का मुझे घोड़ा बना दे वो कहीं कथा वार्ता करने जाएंगे मुझ पर सवार होकर जाएंगे थोड़ा मैं तेरे काम आ जाऊंगा यार फिर सोचा कि संत के द्वार का घोड़ा बनने की भी योग्यता संत का स्पर्श पाने की योग्यता यह भी नसीब वालों का काम आखिर रोते रोते कहा कि और कुछ नहीं कुछ भी मैं बनने के योग्य नहीं तो कम से कम
मुझे संत के द्वार का कुत्ता ही बना दे उसके हाथ का टुकड़ा कभी मिल जाएगा कल्याण हो मेरे में योग्यता नहीं है तेरे प्यारे संत के द्वार का कुत्ता बनने की मेरे में योग्यता नहीं लेकिन अब मैं हुज्जत कर रहा हूं इतना तो तू कर दे कर दे इतनी प्रार्थना मेरी स्वीकार कर दे मैं तेरा हूं प्रार्थना स्वीकार कर दे स्वीकार कर दे प्रार्थना करते करते तुलसीदास जो पूर्व के तुलसीदास थे वो थोड़े से डूब गए और फिर जो जगे डूब गए मतलब अंतरात्मा में श फिर जो जगे तो ना कुत्ता बनना पड़ा ना घोड़ा
ना गाय ना दास तुलसीदास महान संत बन गए दुनिया जान और उनका लिखा हुआ रामायण लोग पढ़ते और उनका जीवन उन्नत होता है वि धर्मयोद्दा की एक युवक आया संत के पास बोले महाराज हमने तो सुना है कि रामायण सच्ची नहीं है आप बताओ बाबा जी रामायण सही है कि गलत है बाबा ने कहा बेटा रामायण लिखी थी उस समय में था नहीं तो मैं कैसे कहूं कि सही है और इतनी पवित्र रामायण के लिए जो सामने दिखती है उसके लिए मैं गलत कैसे कहू रामायण सही है या गलत है वो तो मैं नहीं कह
सकता हूं लेकिन इसको पढ़ने सुनने वालों का जीवन सही हो गया यह तो मैं कहता हं संत का हदय कितना साफ कितना तटस्थ रामायण लिखी गई उस समय में था नहीं तो कैसे कह तुलसीदास नेही लिखी है मैं वहां साी और गलत है इतनी बढ़िया ग्रंथ है हमारे सामने गलत में कैसे क रामायण सही है कि गलत है यह मैं नहीं कह सकता हूं लेकिन उसको पढ़ने सुनने वालों का जीवन सही हो गया मेरा भी जीवन सही हो गया है यह तो मैं कह सकता हूं [संगीत] कैसे हैं भारत के संत रूखा सूखा टुकड़ा खा
लेते पड़े कहीं मिला कहीं धक्का मुक्की मला सया उन पादरियों को तो 20 20 हजार रुप पगार मिलता है नौकर मिलते पेंशन मिलता है फिर भी करते क्या है कि भारत में आकर हिंदुओं को धर्म भ्रष्ट करके विधर्मी बनाकर बाद में पेंशन मिलता है लेकिन भारत के साधु को पेंशन की परवानी और वर्तमान में कोई त्याग तपस्या का जीवन बिताते हैं उसमें कहीं कुछ लोग ऐसे भी घुस जाते होंगे तो भाई सब जगह घुस जाता है होता रहता है तो यह भारतीय संस्कृति की उदार और ज्ञान मय दृष्टि है जिस मां को दूध पिलाने वाली
मां का त्याग कर दिया साधु बनने के लिए बाप का और बहन के प्यार और दुलार का त्याग करके गिरी गुफाओं में कंद्र में भागे तपस्या किया साधना किया लय योग किया हठ योग किया कुंडलिनी योग किया नादानुसंधान योग किया महाराज ब्रह्म क्या है आत्मा क्या है जीव क्या है जगत क्या है भागवत का आशय क्या है ब्रह्म सूत्र का आशय क्या है ब्रह्म सूत्र सृष्टि का प्रथम आश ग्रंथ है तो उसका पहला वचन क्या है अथातो ब्रह्म जिज्ञासा सिख धर्म का पहला ग्रंथ कौन सा है कि जप जी और जप जी का पहला वचन
कौन सा है कि एक ओंकार सतनाम नानक जी को साक्षात्कार कब हुआ कैसे हु सारा खोज खाज के जो कुछ पाया है व समाज को बांटने के लिए भारत का साधु गांव गांव गली गली नगर नगर डगर डगर घूमता है और बदले में जो कुछ मिलता है तो भाई आप ही की उदारता है आप ही का है क्योंकि आप ही सब रूप इसलिए यह भारतीय संस्कृति मुझे बहुत प्यारी लगती बहुत महान लगती हम फिर आते हैं श्रीमद् भागवत के चरणों में श्री भगवतम पुण्यम आयु आरोग्य पुष्टि श्रवण पठना प सर्व पापी प्रम चते भागवत पढ़ने
सुनने से पुण्य होता है जगत की बात सुनोगे तो राग और द्वेष होगा राग से भी चित कहीं फसे और द्वेष से चित कहीं उले इससे आपकी वो जो ऊर्जा है जो ओरा है ज्यादा नष्ट होती मन ज्यादा खिन्न होगा अशांत होगा भगवत कथा सुनने से खिन्नता कम हो जाएगी अशांति कम हो जाएगी तो आपके मन में थोड़ी शांति आएगी शांति पुण्य का फल है इसलिए भागवत श्रीमद् भागवत पुण्यम आयु आयुष्य कैसे बढ़ती कि वो रा जो ऊर्जा है वह कम से कम खर्च होगी नष्ट होगी अभी तो ऐसे कैमरा डेवलप हुए कि आदमी उन
इंस्ट्रूमेंट पर उंगलियां अपनी जमाए और फोटो ले ले तो जो शांत है पवित्र आत्मा है सात्विक है उसकी ओरा आभा मंडल फोटो के इर्दगिर्द पीला पीला हो जो पवित्र सात्विक और शांति का खजाना है तो पीले के साथ हरे रंग की ओरा होगी नीला नीला और केसरी तो जैसे सूर्य के सात रंग है खिन हम इन आंखों से उसे नहीं देख सकते साइंस के हिसाब से समझ सकते ठीक ऐसे वही सात रंग आपके शरीर में होते हैं और वही आप एक तरफ से लेते रहते और आपके स्वभाव के अनुसार दूसरे ढंग से आप उसमें से
कुछ लेकर छोड़ते रहते हैं जैसे आपने श्वास लिया श्वास में से कुछ लेकर फिर आश्वास नहीं छोड़ा तो टीबी वाला टीबी के कीटाणु वाला श्वास छोड़ेगा दमे वाला दम के कीटाणु के स्वास छोड़ेगा काम वाला काम के लोभ वाला लोभ तो आप लेते हैं और देते हैं उसमें आपकी जो स्थिति है वह उसमें मिश्रित होता है तो हमारे शरीर की जो रचना है जो नाभि है नाभि के आधा सेंटीमीटर ऊपर मणिपुर केंद्र है वह मणिपुर केंद्र वातावरण में से सूर्य की किरणों में से वातावरण में से ऊर्जा खूब लेता है और बाकी के सात केंद्रों
को पहुंचाता है अगर निरो रहना है तो सुबह सूर्य के किरणों में ऐसे बैठो कि जैसे नाभी पर सूर्य के किरण लगे और लग और आप भावना करो कि सूर्य का नील वर्ण में अधिक से अधिक पी रहा हूं ले रहा हूं नील वर्ण आकाश गगन सदृश्य जो व वो ले रहा हूं और मैं निरोग हो रहा हूं इससे तो आरोग्य होता ही है लेकिन भागवत कथा सुनने से भी जब आप हरि नाम उच्चारण करते हो तो यह भी नाभि केंद्र को डेवलप करता है ऊर्जा लेने की क्षमता इसकी बढ़ जाती है जय राम जी
बोलना पड़ेगा मैं आपको बिल्कुल सच्ची बात बताता हूं कि मेरी मां 86 साल की थी और बहुत सारी बीमारिया डॉक्टर ने कहा एक दिन से ज्यादा नहीं जी सकती एक दिन पूरा होने को था मैंने अपना इस पता आयुर्वेदिक दवाखाना जो देखता है साथ उसको मैंने बुलाया वैद को वैद को मैंने मेरी मां को देखने के लिए महिला आश्रम में भेजा और वैद्य नई का सा मूह लेकर आ रहा था बोले बापू जी एक कलाक से ज्यादा मां नहीं जी सकती है मैं कहा तुम वैद राज हो कुछ तो करो अंग्रेजी पढ़ाई लिखाई के हिसाब
से तो उन्होंने कहा लेकिन तुम अपना आयुर्वेदिक ढंग से कुछ तो ट्राई करो बोले बापू नाड़ी विपरीत चाल स नाड़ी विपरीत चल रही इसमें कोई भी दवा देंगे तो कुछ असर नहीं हो विपरीत नाड़ी मतलब वो पेशेंट जाक ही मानेगा नाड़ी विपरीत चल रही है तो वह वो मरीज जाके ही मानेगा किसी भी कीमत पर नहीं रुक सकता है मैंने कहा अच्छा ठीक है मैं महिला आश्रम में गया मेरी मां मुझे बेटा नहीं मानती हालांकि वह है मेरी मां मैं उसी की कुक से यह शरीर मेरे को मिला है अभी भी मैं जाता आता हूं
कहीं तो उसको नमन करके जाता लेकिन मेरी मां पत्नी इतना आपको नहीं पहचानती बहन शायद इतना नहीं पहचानेंगे दोस्त और दुश्मन भी आपको इतना नहीं पहचानते जितना आपको मां पहचानती है जय राम जी की क्योंकि आपका शरीर से व जुड़ी है उसके शरीर से आप जुड़े हैं फिर भी मेरी मां मेरे को बेटा नहीं मानती है जैसे महान बुद्धिमता माता देवती अपने पुत्र कपिल को पुत्र नहीं मानती थी ब्रह्मज्ञानी होखा साक्षात मेरा भगवान है प्रभु है ऐसा करके देवहुति ने अपने पुत्र से उपदेश पाया और ब्रह्म ज्ञान पाकर मुक्त हो गई मेरी मां जैसे कपिल
की मां कपिल को भगवान रूप मानती थी ऐसी मेरी मां मेरे को मानती अब उसकी गलती है या वह क्या व वो जाने यह उसकी उदारता है महानता है श्रद्धा होना भी महान आजकल बोलते लोग जो कमजोर आदमी है वो श्रद्धा करता है लेकिन उन मर्ख को पता नहीं कि कमजोर दिल बुझ दिल क्या श्रद्धा करेगा जिसको देखा नहीं आंखों से विषयों से उसके लिए चल पड़ना यह तो वीर दिलों का बहादुर दिलों का काम है श्रद्धा करना तो मेरी मां की मेरे प्रति श्रद्धा थी तो मैं गया तो हाथ जोड़कर रोने लगी कि मेरे
को अब आज्ञा करो मैं जाऊं मुझे छुट्टी दे दो मैं जाऊं मैं कहा मैं नहीं जाने देता हूं तुम कैसे जा सकती हो देखें मेरी मेरी आज्ञा के बिना तुम जा भी कैसे सकते आगे शब्द शायद नहीं बोला ऐसे कुछ शब्द बोलने में गलती भी हो सकती है नहीं जा सकते तो बोले फिर मैं ये मर लेट नहीं सकती सो नहीं सकती खा नहीं पी सकती करवट नहीं ले सकती ऐसी स्थिति बोले अब मेरे को जाने दो मुखे मोक मुखे मक मुझे मकल मा सा तुम कैसे जाते हो मैं देखता हूं नहीं जाएगा तो बोले
फिर मैं क्या करूं मैं क्या मैं मंत्र देता हूं और तुम जब को मैंने मंत्र दिया उसी वक्त उसने जपना चालू किया एक घंटा एक दिन दो दिन पाच दिन 25 दिन 50 दिन 100 दिन एक साल दो साल 88 साल पार हो गए अभी तक जिंदी है अभी तक अगर कुछ हुआ होता तो फोन आ गया होता लाइट कॉल अभी तक जिंदी है ये श्रद्धा देवी कैसी है तो मानना पड़ेगा श्रीमद् भागवत आयु आरोग्य पुष्टि धम भगवत कथा सुनने से श्रद्धा दृढ़ होती अकाल मृत्यु तो अजामिल की डल गई लेकिन 86 साल के समय
डॉक्टर ने कहा कि बस एक घंटे के बाद नहीं जी सकती अभी तक जिंदी है यह भगवत भाव का चमत्कार उसकी श्रद्धा और भगवान के नाम का प्रभाव आप तो ऐसे ही उताव में आकर यश मेरे को देते मैं यश के काबिल नहीं मैं तो आपकी सेवा के काबिल हूं नारायण हरि नारायण हरि नारायण और सेवा के काबिल हूं यह भी मैंने जल्दी बोल दिया है इतनी सेवा भी नहीं कर पाता हूं जितनी मैं चाहता हूं श्रीमद् भागवत पुण्यम आयु आरोग्य भगवत कथा सुनने से आरोग्य कैसे मिलेगा कि भगवत कथा सुनने से भगवत भाव होगा
काम क्रोध लोभ घटेगा तो काम में और क्रोध में जो तुम्हारी ओरा और ऊर्जा नष्ट होती वो कम होगी नष्ट आयु आरोग्य पुष्ट होगा तो जो लोग इस भगवत कथा का आयोजन करते हैं वे सचमुच में मनुष्य जाति के परम हित का काम करते हैं आठ प्रकार के दान कहे हैं शास्त्रों ने अन्नदान भूमि दान सुवर्ण दान कन्या दान गौ दान गौ रस दान विद्यादान और अभयदान बच्चों को स्कॉलरशिप देना या विद्या देना यह भी अच्छा है कन्यादान भी अच्छा लेकिन कन्यादान के बाद भी हो सकता है कि जमाई शराबी हो लेकिन जहां अभयदान सत्संग
मिलता है शराबी का शराब छूटता है जुवारी की जुआ छूटती है बेड़ी की भांग छूटती है पापी के पाप छूटते हैं अहंकारी का अहंकार छूटता है अशांत की अशांति छूटती है अ भक्त का अभ क्त पना छूटता और भक्ति भाव आता है अशांत की अशांति गुम होती और शांति आती है यहां तक कि जीव का जीववू करर उसके हृदय में ब्रह्म भाव जगता है ये अभयदान कथा ऐसी किसी को रोटी खिलाना अच्छा है पुण्य कर्म है कन्या दान करना अच्छा है ठीक है लेकिन कन्यादान के बाद भी जमाई शराबी जुवारी कामी क्रोधी लोभी मोही कपटी
हो सकता है होंदे लेकिन उन जमां को भी जब सत्संग मिल जाता है तो वह देवता पुरुष बन जाते हैं सत्संग बड़ी चीज मुझे तो लगता है कि अन्न दान से वस्त्र दान भूमि दान सुवर्ण दान इन सबसे ऊंचे में ऊंचा दान है भगवत कथा तो जो ये भगवत कथा करते हैं करवाते हैं करने कराने में सीधे अन सधे इस देवी कार्य में लगते हैं वे भगवान के बहुत जल्दी निकट हो जाते हैं जरूरी नहीं कि पुष्पों की माला फहराने में आप सबका नाम आए तभी आपने सेवा की ऐसी बात नहीं है आपका नाम नहीं
भी आए आपको कोई जाने भी नहीं और ऊपर से लोग आपको डांटे कि तुम कुछ भी नहीं करते हो फिर भी ईमानदारी से इस देवी कार्य में तुमने कहीं भी सेवा की तो आपका अंतरात्मा आपको संतोष का खजाना देगा तृप्ति देगा आनंद देगा कल एयरपोर्ट से हम उतरे तो आप लोग कुछ आ गए थे बापूजी और मेरे साथ गुजरात के मुख्यमंत्री भी जो अभी बने इतनी भीड़ भाड़ नमाम नमा फिर मैं जल्दी से किसी गाड़ी में बैठा तो एक सेवक बैठ गया तो मैंने उसको कहा तुम सेवक हो कि वीआईपी बनना चाहते हो वीआईपी तो
मेरे साथ बहुत होते थे जहाज में जयराम वीआईपी बनना बापू का निकटवर्ती दिखाना एक बात है लेकिन बापू के दैवी कार्य में भागीदार होकर अपनी दिव्यता जगाना यह दूसरी बात है तो जितनी जितनी श्रद्धा भक्ति होती है उतना उतना हृदय पावन होता है एहसास भी होता है खुशियां भी होती है आप 100 200 500 हजार 100 हजार लाख 10 लाख लेकर बाजार में जाइए चीजें वस्तुएं खरीदिए और उनका उपभोग करिए आपकी शक्ति का हरासर आप थक जाएंगे आत्म संतोष नहीं मिलेगा लेकिन सत्संग में तो मुफत मेंही आपको आत्म संतोष मिलता है जो 10 लाख की
वस्तु भोगने से नहीं मिल सकता [प्रशंसा] है श्रीमद् भागवत पुण्यम आयु आरोग्य पुष्टि दम श्रवण पठना तप सर्व पापे प्रम सारे पापों से वो मुक्त हो जाता है यह कैसे महाराज बड़े में बड़ा पाप है शरीर को मैं मानना संसार को सत्य मानना और उनकी चीजें लेकर सुखी होने की बुद्धि यह सारे पाप का मूल है जो जो भगवत कथा सुनेंगे त्यों त्य पता चलेगा कि शरीर मैं नहीं हूं ऐसे शरीर तो मेरे को कई मिले और संसार और संसार की वस्तुएं सत्य नहीं है यह तो बदलने वाले [संगीत] i