संसार समुंद्र है जैसे समुंद्र में जल ही जल है ऐसे संसार में मृत्यु ही मृत्यु है जो पैदा होता है मरने के तरफ यात्रा शुरू ही हो जाती जो सबंध है संयोग है वह वियोग में बदल जाता है जो संग्रह है वो विनाश में बदल जाता है ऐसा कोई शरीर नहीं कि जिसके साथ मृत्यु न जुड़ी हो ऐसा कोई सहयोग नहीं जिसके साथ वियोग न जुड़ा हो ऐसा कोई संग्रह या भोग नहीं जिसका वियोग या विनाश ना होता हो य संसार मृत्यु संसार को बोलते हैं संसार का मतलब है संसर इति संसार जो सरकता जा
है उसे सार बोलते कोई भी स्थिर नहीं सिख धर्म के आदि गुरु नानक जी ने कहा कि राम गयो रावण गयो ता को बहु परिवार क नान क थिर कछु नहीं स्वपने जो संसार शिव जी ने कहा उमा कह में अनुभव अपना सत्य हरि भजन जगत सब स्वपना व जैसे जहां खूब दध होता है उसे दुग दलय बोलते हैं जहां पुस्तक होती उसे पुस्तकालय बोलते जहां औषधि औषधिया होती उसे औषधालय बोलते हैं ऐसे जहां दुख ही दुख है उस संसार को दुखाल बताया गया है और यह दुखाल भी है साथ साथ में कैसा है के
विनाश शल है फिर भी ऐसे दुखाल और विनाश शल संसार में भी एक सुख स्वरूप भगवान का अनुभव और सांत्वना एक साथ मिल सकती है मरण धर्मा शरीर में अमर ईश्वर का एहसास हो सकता है नश्वर में शाश्वत की मुलाकात करने की संभावनाए छुपी है इसलिए मनुष्य जीवन सबसे श्रेष्ठ और दुर्लभ माना जाता है संसार जहां प्रत्येक वस्तु मौत के तरफ भागी जा रही है संसार की ऐसी कोई वस्तु नहीं ऐसी कोई परिस्थिति नहीं ऐसी कोई घटना नहीं ऐसा कोई सहयोग नहीं ऐसा कोई संबंध नहीं जो सदा रहे सब नाश के तरफ जा रहा है
खून पसीना बाता जा तान के चादर सोता जा यह नाव तो चलती हिलती जाएगी तू हसता जा या रोता जा कितना भी इसको थामने के लिए करो लेकिन संसार की चीजें और संसार थमा नहीं वह बदलता रहता है चांद सफर में सितारे सफर में दरिया सफर में तो दरिया के किनारे भी सफर में जहां बस्तियां थी वे टापू समुद्र में कहां खो गए पता तक नहीं और जहां समुद्र लहराता था वहां सड़कें बनी और गाड़ियां दौड़ रही जहां पानी उछल कूद करता था वहां तो द द मंजिले मकान दिखाई दे रहे हैं और जहां मकान
थे वे पूरे के पूरे टापू गायब हो गए दरिया में मोहन जो दरो एक नहीं सारी दुनिया मोहन जो दरो हो जाती समय पाकर देखत नैन चलो जग जाई का मागू कछु थिर नहाई देखते देखते य संसार की परिस्थितियां और वस्तु चली जा रही क्या मांगू अनि त्यानी शरीरा वैभव नव शाश्वत नित्य सहि तो मृत्यु कर्तव्य धर्म संग्रह शरीर अनित्य है वैभव शाश्वत नहीं है और रोज मौत के तरफ हर चीज और हमारा शरीर आदि भी मौत की तरफ बढ़ रहा है कर्तव्य यह कि धर्म का संग्रह कर ले और धर्म का संग्रह करने वाले
पुरुष के लिए भगवान वचन देते हैं तेशा महम समुद मृत्यु संसार सागरात भवाम न चिरा पार्थ मया वेष चत सा हे पार्थ मेरे में आविष चित्त वाले उन भक्तों का मैं मृत्यु रूप संसार समुद्र से शीघ्र ही उद्धार करने वाला होता हूं हे अर्जुन जैसे धनाढ्य व्यक्ति की पत्नी अगर भीख मांगे तो उस धना व्यक्ति की इज्जत सवाल है ऐसे मेरा भक्त भी संसार के सागर में बार-बार गोता खाए और जन्म मरे तो मेरी इज्जत का सवाल है जो मेरा होकर मेरा भजन करता है उससे पार होने की चिंता नहीं करनी चाहिए जो मेरा होकर
मुझे स्नेह करता है मेरा भजन करता है उसे भोजन छाजन नीर की भी चिंता नहीं करनी चाहिए और उसे कभी उदास नहीं होना चाहिए और संदेह नहीं करना चाहिए जैसे पतिव्रता स्त्री अपना पति मेरा भरण पोषण करेगा कि नहीं करेगा मेरे को सुख देगा कि नहीं देगा ऐसा संदेह नहीं करती ऐसे दृढ़ भक्त मेरे होकर भजन करते हैं फिर वह कोई संशय या संदेह नहीं करते संशय सबको खात है संशय सबका पीर संशय की जो फाकी करे उसका नाम फकीर बख मंगे का नाम फकीर नहीं है जिसने संशय की फाकी कर ठाकुर जी भजन महाराज
सुनते होंगे नहीं होंगे हमारा भजन फलता होगा कि नहीं फलता होगा य संदेह मताने हमारा क्या होगा बुढ़ापे में क्या होगा इसमें क्या होगा अरे भोजन छाजन नीर की चिंता करे स मढ भक्त चिंता ना करे निज पद में आरूढ़ निज पद में आरूढ़ चिंता करे स कैसी खुशी है ता में प्राप्त अवस्था जैसी गम की अंधेरी रात में दिल को ना बेकरार कर सुबह जरूर आएगी तू सुबह का इंतजार कर और सुबह वो तेरा परमेश्वर ही तो तेरी सुबह है भैया व परमेश्वर की प्रेरणा ही तो तेरी सुबह है शरीर की सुबह तो रोज
आती हो फिर अंधकार में रात आ जाती लेकिन परमेश्वर रूपी सुबह परमेश्वर रूपी प्रकाश हदय में एक बार आ जाता है वह अद्भुत होता है न तद भाते सूर्य ना शशि को न पाव का यह सूर्य शशि और पावक अग्नि आदि उस प्रकाश से व मेरा प्रकाश विलक्षण है न तद भास सूर्य न शशि को न पाव का यद गवा नि वर्तते त धाम परमम ममा जहां जाने के बाद फिर पुनरावर्तन नहीं होता मां के गर्भ में ऊंधा नहीं लटकना पड़ता है वो मेरा परम धाम है वो परम धाम कोई आकाश पाताल में या सातव
खंड में नहीं है वह परमधाम मेरा परमात्मा स्वरूप सबका आत्मा होकर बैठा है अर्जुन जो मेरे को अपना निकटवर्ती और नित्य शुद्ध बुद्ध चैतन्य स्वरूप जानते मानते और मेरा भजन करते हैं अपना चित्त मुझ चैतन्य में लगाते हैं उनको संसार समुद्र सेने की चिंता नहीं करनी चाहिए मृत्यु के समय शरीर तो कफ के प्रभाव से या रोग के प्रभाव से पीड़ित हो जाता है तो क्या जरूरी है कि मृत्यु के समय मेरा चिंतन करे तो मैं तार तो जीवन भर उनकी भक्ति का क्या होगा अर्जुन अगर मृत्यु के समय मेरा भजन करे और तभी मैं
उन्हें तारू तो फिर मेरे में और दुकानदार में क्या फर्क जो सचमुच में मेरे शरण एक बार आ जाता है मैं उसको नहीं छोड़ता सचमुच हम ईश्वर की शरण है वास्तव में लेकिन मानते नहीं राग द्वेष की शरण चले जाते हैं लोभ लालच की शरण जाते चले जाते हैं हाड मास के शरीर की शरण चले जाते हैं और वहां वहां कितना भी शरीर की शरण लो वो शरण देता नहीं कम वक्त खुद मरण धर्मा क्या देगा हमें शरण लोभ हमें क्या शरण देगा मोह क्या शरण देगा थप्पड़ लगा लगा के धकेल होता है लेकिन फर्स्ट
इंप्रेशन इज द लास्ट इंप्रेशन के सिद्धांत के अनुसार हमारा बुरा हाल हो रहा है कुछ समय पहले वैज्ञानिकों ने प्रयोग किए थे मुर्गी अंडों पर बैठी और दिन पूरे हुए तो अंडे को चौच मारी मुर्गी का बच्चा निकला अंडे से बाहर दूसरे अंडे को चोंच मारी और अंडा मुर्गी का अंडा मुंह बाहर निकाले उसके पहले बतक रख दी गई सामने असली मां हटा दी गई और नकली मां रख दी बतक रख दी अब वो बच्चे ने पहली पहली नजर पड़ी बतक पर मुर्गी के बच्चे की नजर पड़ी बतक पर वो बतक के पीछे पड़ रहा
है मुर्गी का बच्चा अंडे से खुलते ही वो कुड़ा करकट की तरफ जाता है खानपान की तरफ और बतक और बतक का बच्चा पानी की तरफ जाता है लेकिन उल्टा हुआ यह मुर्गी का बच्चा अपनी मां फड़फड़ा रही है पंख और अपना आहार की तरफ खींचे जेल लिए जाना चाहती लेकिन उधर नहीं जा रहा बतक के पीछे जा रहा है वह चोचे भी मार रहे हैं वहां सजाती भी नहीं दिख रही फिर भी वह बतक मुर्गी का बच्चा बतक के पीछे पीछे जा रहा है चोचे खा खा के मर गया ऐसे वास्तव में हम परमात्मा
के बच्चे हैं परमात्मा ज्ञान स्वरूप है तो हमारा आत्मा भी ज्ञान स्वरूप है परमात्मा सुख स्वरूप है तो हमारा आत्मा भी सुख स्वरूप है परमात्मा नित्य तो हमारा आत्मा भी नित्य है लेकिन हम यह माया रूपी बतक की इंप्रेशन में आ गए बतक माया रूपी बतक की कई चोचे लगती है कहीं काम की चोंच तो कभी क्रोध की कभी लो की लोभ की तो कभी मोह की तो कभी अहंकार की चोचे लगती और अंत में बड़ी चोंच लगती है मृत्यु की और ऐसी सदियों से चौच ते खाता यह जीव आया है मनुष्य जन्म में उसे
सत्संग मिल जाए और असली मां असली हमारा घर वह परमात्मा है असली हमारी विश्रांति की स्थली वह परमात्मा है ऐसा समझ में आ जाए परमात्मा मेरा है और मैं परमात्मा का आप चाहे तो भी भगवान के साथ आप अपना संबंध तोड़ नहीं सकते ऐसा तुम्हारा और ईश्वर का संबंध है आपका और ईश्वर का ऐसा पक्का संबंध है कि आप तोड़ना चा तो आप नहीं तोड़ सकते ईश्वर के साथ का संबंध और ईश्वर खुद भी तुम्हारे साथ संबंध तोड़ना चाहे तो नहीं तोड़ सकता है इतना हमारा और ईश्वर का अविभाज्य हम अंग है ईश्वर का इतना
हमारा और परमेश्वर का शाश्वत संबंध है लेकिन अज्ञानता के कारण हम कल्पित संबंध को सच्चा मानते हैं और सच्चे संबंध को पीठ किए हुए आपका और इस शरीर का संबंध 60 70 साल पहले नहीं था बाद में नहीं रहेगा और अभी भी नहीं के तरफ जा रहा है जो कुछ रोज खाते हो उसमें से सब बदलता जाता है तुम्हारा सेठ का रुपयों का संबंध पहले नहीं था बाद में नहीं रहेगा पिता का और पुत्र का संबंध पहले नहीं था पुत्र जन्म के पहले और मरने के बाद भी नहीं रहता है लेकिन यह जीवात्मा का और
परमात्मा के साथ संबंध तो शरीर के पहले भी था जन्म के पहले भी आपका ईश्वर चैतन्य से संबंध था जन्म लिए ले रहे थे गर्भ में तभी भी उस चैतन्य स्वरूप की चेतना थी बालक रूप में जन्मे तभी भी ईश्वर का आपके साथ संबंध है किशोर हुए और युवक हुए किशोर अवस्था का संबंध चला गया फिर भी तुम्हारा और ईश्वर का संबंध नहीं गया यवन अवस्था का संबंध चला गया बुढा पाया फिर भी आपका और ईश्वर का संबंध नहीं टूटा वृद्ध आई यवन चला गया और मृत्यु आएए तो बुढ़ापा चला गया मरने के बाद भी
जीवात्मा का परमात्मा के साथ संबंध नहीं टूट सकता है जैसे घड़े के आकाश का महाकाश के साथ संबंध नहीं टूट सकता है महाकाश तोड़ना चाहे घड़े के आकाश का संबंध तो नहीं तोड़ सकता और घड़ा तोड़ना चाहे महाकाश से संबंध तो नहीं तोड़ सकता है जैसे लहर पानी से संबंध तोड़ना चाहे तो नहीं तोड़ सकती और पानी तरंग से संबंध तोड़ना चाहे तो नहीं तोड़ सकता है ऐसे ईश्वर का और जीव का सनातन संबंध है मम वांस जीव लोके जीव भूत सनातन मन सष्ण इंद्रियानी प्रकृति स्थानी कर्ती पांच ज्ञान इंद्रिया और छठा मन यह प्रकृति
की चीजों में हमें आकर्षित करके अपने घर में रहते हुए भी हम पराया पन महसूस करते हैं मैंने सुना है कि लाल बू झक्कड़ ने शराब की दुकान पर खूब शराब पी ली दुकानदार ने कहा भाई अब हो गया तु जाओ एकदम आउट हो गए और हमें दुकान भी बंद करनी है शराब का अड्डा बंद करना है अब जाओ व लड़ता लड़ता 50 2 कदम गया चौराहे पर बैठा शराब की बंदी थी गुजरात का इलाका होगा या तो आजकल हरियाणा मान लो पुलिस के आदमी आए उन्होंने कहा लाल बू झक्कड़ हद हो गई हमारी नौकरी
का सवाल है भले तू हमें चाय पानी पिला देता लेकिन हमारी सर्विस का सवाल है तू अपने घर जा यहां नशे नशे में आउट होकर बैठा है चौराहे पर घर जा लाल बु झक्कड़ कहता कि मैं घर जाने के लिए तो बैठा हूं तो बोले जाता क्यों नहीं बोले मुझे सारा गांव घूमता हुआ दिखाई दे रहा है सारा दृश्य घूमता हुआ दिखाई दे रहा है घूमता घूमता यह नगर घूम रहा है जब मेरा घर आएगा तो मैं उसमें घुस जाऊंगा नगर घूम हुआ दिखाई दे रहा है मेरा घर आ जाएगा तो मैं घुस जाऊंगा नशे
ने ये इंतजार कराया कि मेरा घर आएगा मैं घुस जाऊंगा संसार तेरा घर नहीं दो चार दिन रहना यहां कर याद अपने राज्य की स्वराज निष्क जहां मानव तुझे नहीं याद है तू ब्रह्म का ही अंश है कुल गोत्र तेरा ब्रह्म है सद ब्रह्म का तू वंश है परमात्मा का तू विनाश हम ईश्वर के हैं इस बात में तो जरा भी संदेह नहीं करना चाहिए फिर जो जो भी करता है मान दिलाता है तो तेरी मौज है अपमान दिलाता तो तेरी मौज है अगर नरक में भेजता है तो हम तेरे होकर नरक में भी जाएंगे
अगर ईश्वर के होकर नरक में भी गए तो नरक के बाप की ताकत नहीं कि दुख दे जय राम जी की हरि को भजे सो हरि को होय जात पात न पूछे कोई अगर स्वर्ग में गए और हम ईश्वर के होकर नहीं रह रहे हैं भोगों के होकर रह रहे हैं तो वहां भी दुख ही दुख मिलेगा ईश्वर अंश जीव अविनाशी चेतन ममल सहज सुख रासी सो माया वश भयो गुसाई बंधो जीव मर्कट कीना पहले के जमाने में बंदर फसाने वाले लोग क्या करते थे कि कुछ सकड़े मुंह के बर्तन गाड़ देते जमीन में और
मंदिरों को दिखाकर उसमें चीजें डाल देते मूंगफली डाले केला डाले अपना छुआरे डाले खजूर डाले पतासे डाले ऐसा गुड़ के ढेले डाले बंदरों को देखा है और फिर वो शिकारी छुप जाते थे बंदर अंदर हाथ डालता और पूरा मुट्ठी भरता मुट्ठी भरता तो सकड़े मुह के बर्तन में फस जाता बंदर चीखता पूंछ हिलाता हाथ हिलाता दो पैर हिलाता सिर्फ पटकता लेकिन मुट्ठी नहीं खोलता और सब कुछ करता खाली मुट्ठी नहीं खोलता था बस चीखते चकते डबल और सिंगल भी कर लेता था लेकिन मुट्ठी नहीं खोलता था वो समझता था मेरे को किसी ने पकड़ लिया
है अब जरा सा मुट्ठी यूं करे तो मुक्त है फिर एक एक नंग उठाकर खाए गुड़ का ढेला पतासा उठाकर ले ले तो वो सब माल उसके बाप का है लेकिन जो मुट्ठी भर के पड़ा है वो ना खाने देता है मुक्ति का एहसास करता छुपे हुए शिकारी क्या करते उसके गले में फंदा डालते और उसके हाथ पर जोर से डंडा मारते मुट्ठी खुल जाती मुट्ठी खोलनी तो पड़ती उसको लेकिन डंडा खाने के बाद और जीवन भर बंधा रहता बंधो जीव मर कट की नाई जीवन भर वो नाच नाचता ऐसे यह जीवात्मा इस संसार की
मुट्ठी बांध लेता है अथर वेद का 39 वा अध्याय ईवास उपनिषद का पहला मंत्र ईवास मदम सर्वम यत किंचित जगम जगत तिन तिन भता यह सारा जगत ईश्वर रूप है त्याग से भोगो पकड़ो मत अंदर उसको गहरा मत उतारो जगत की परिस्थिति को जगत की बातों को अपने में मत उतारो अपने में अगर उतारने है तो जो अपना है उस ही प्रेम को अपने में उतारो तो वही रूप हो जाओ अपना सच पूछ तो अपना परमात्मा है और कोई नहीं संगी साथी चल गए सारे कोईन नियो साथ क नानक य विपत में टेक एक रघुनाथ
उसकी टेक ले दो 1923 में अमेरिका ने बड़े बड़े धना लो की एक सूची बनाई कॉन्फ्रेंस की सबसे बड़े बड़े जो चुन धनाढ्य लोग थे उनकी कॉन्फ्रेंस की और 1947 में 25 साल के बाद उन नाडियो का सर्वे किया कि अब वह कहां पहुंचे कितने ऊंचे शिखरों को छुए हैं या कितने धराशाई हुए 25 साल के बाद उन धना का तो कोई पता ही नहीं एक धनाढ्य था जिसके इशारे मात्र से गेहूं और आलू का मार्केट अप और डाउन हो जाता था वह सटटा करके इतना तो डाउन हो गया कि वह जेल में पड़ा है
दूसरा जो फाइनेंस कंट्रोल करता था जो रुपया पैसों में [संगीत] केश केश जिसके पास बहुत थी रोकड़े धन डॉलर जिसके पास बहुत थे जो जिस किसी को लाखों रुपए करोड़ों रुपए उधार दे देता था और बाजार में देता था और खींचता तो बाजार के लोग का हाथ टाइट हो जाता ऐसा धना उसको पैरालाइज हो ग और छोरों ने धन फूंक दिया कोई को पैरालाइज हुई तो किसी को हार्ट अटैक हुआ कोई पागल है तो कोई पागल खाने में पड़ा है तो कोई जेल में पड़ा है तो कोई नरक के जेल में चला गया अनि त्यानी
शरीरा आनी वैभव नैव शाश्वता नित्य सनि हितो मृत्यु हर रोज हम मृत्यु के निकट जा रहे हैं इस शरीर को मैं मानकर और वस्तुओं को मेरा मानकर जो सुखी होना चाहता है उसके भाग्य में दुख ही दुख है इस शरीर को मैं मानकर और वस्तुओं को और संबंधों को संभाल संभाल कर जो सुख ढूंढ रहा है उसको व्यापी कोटा का मूर्ख बोलते हैं महामूर्ख है श्री कृष्ण ने ऐसे लोगों को एक स्वर आ गालियां गिन कर दी है पूरी माला गीता में 108 गालियां दे डाली है वो भी कृपा करके दी जैसे छोरा अंगारे को
छूता है या अपना मैले को छूने जाता है तो मां उसे डांट है दो कड़वी बातें कहती है गाली दे देती है तो मां का द्वेष नहीं है मां की यह भी कृपा है ऐसे ही माताओं की माता और पितांबरा आया है और सुलभ शब्द गीता में एक बार आया है तस्य हम सुलभ पार्थ नित्य युग तस्य योगिना जो नित्य युक्त होकर मेरा भजन करते हैं उनके लिए तो मैं सुलभ हूं योग शब्द 64 बार आया है और जो शरीर को मैं मानते हैं वस्तुओं को और संसार को सच्चा मानकर सुखी रहने की और संबंधों
को बनाए रखने की बेवकूफी करते हैं उन वीआईपी कोटा के मूर्खों को 108 गालियां द की व मूर्खता छोड़े बोले महाराज गीता में 108 गालिया है यह तो आज नई बात सुनाई जरा नमूना बताओ बाबा सुन लो विमु वीआईपी कोटा के मूर्ख जय राम जी विमु नानु पसंती पसंती ज्ञान चक्षु है गाली नरा अधवा है गाली की नहीं है असुरम भाव आशिता आसुरी भाव का आश्रय करते इस प्रकार कृष्ण ने कृपा करके जो आसक्त होकर मन बुद्धि मिथ्या में लगाकर सच्चा सुख ढूंढना चाहते हैं उनको सावधान किया है अपनी निष्ठा उस परमेश्वर में रखो और
परमेश्वर को अपना मानकर अपने को परमेश्वर का मानकर तुम काम करो और चिंतन करो भजन करो तपस सर्वेश एकाग्रता परम तप सब तपस्या में एकाग्रता परम तप माना गया है कबीर जी ने कहा माला स्वासो स्वास की जगत भगत के बीच जो फेरे सो गुरुमुखी ना फेरे सो नीज ऐसा करने से प्राण की ताल बता होगी साधारण मनुष्य श्वास लेता है तो एक मिनट में 13 14 श्वास उसके खर्च हो जाते कोई भी पक्का और सच्चा ज्योतिषी यह नहीं बता सकता आपका हाथ देखकर कि आपकी उम्र 65 साल दो महीने 13 दिन और तीन घंटे
हैं ऐसा नहीं कह सकता पूरी उम्र नहीं बता सकता है ज्योतिषी कहेगा उम्र की रेखा देखकर क्या आप 60 से 70 साल तक जी सकते हैं 70 से 80 तक की आपकी उम्र है 50 से 60 तक की है ऐसा लगाएगा पूरा नहीं बोलेगा कि इतने साल और इतने महीने इतना नहीं बोल सकेगा क्योंकि वर्षों से आपकी उम्र का निर्णय होता ही नहीं जो भी प्राणी जन्म लेता है तो उसके इतने स्वास निहित हो जाते हैं मानो 38 करोड़ 50 लाख स्वास लेकर कोई प्राणी जन्मा है तो वो 50 वर्ष जी लेगा 21600 स्वास रोज
खर्चे तो लगभग 50 वर्ष पूरा वो जरा जरा बात में कामी क्रोधी लोभी लालची हो जाता है तो 50 वर्ष के पहले उसके स्वास का स्टॉक खत्म हो जाएगा वह 45 साल में भी जा सकता है और 48 साल में भी मर सकता है लेकिन जिसकी उम्र स्वास्थ के हिसाब से तो 50 वर्ष है लेकिन जरा जरा बात में उद्विग्न नहीं होता भयभीत नहीं होता खिन्न नहीं होता आकर्षित नहीं होता तो उसके स्वास कम खर्च होंगे वह 55 साल जी सकता है 60 साल भी देख सकता है चांग देव महाराज ने योग साधना की और
गुरु ज्ञानी जब तक नहीं मिलेंगे तब तक शरीर नहीं छोड़ना है जब जब मृत्यु आती तो चांगदेव महाराज तापी और पयो सण के संगम घाट पर अपना आश्रम बनाकर रहते थे मृत्यु आने की है वह योग से जान लेते थे अपने श्वास को प्राणों को ऊपर चढ़ ब देते 10 दिन की समाधि के बाद उतरते 100 साल उनकी आयुष्य रिन्यू हो जाती नए सिरे से 100 साल उनके पास हो जाते ऐसे 100 स साल करके चांगदेव महाराज ने 1400 साल तक अपना जीवन खींचा चांगदेव महाराज ज्ञानेश्वर के चरणों में गए तापी और पर पयो तट
संगम तट से गुरु जी के पास गए 22 साल के गुरुजी और 1400 साल के चेलाजी जय राम जी की ज्ञान में उम्र का महत्व नहीं है ज्ञान में जात पात का महत्व नहीं है ज्ञान में तो बस परमात्मा तत्व का महत्व है चांगदेव ने कहा मुझे आत्म ज्ञान दो जिससे मैं परमात्मा को यही अनुभव करूं और संसार से तर जाऊ रिद्धि सिद्धि तो थी चांगदेव के पास ज्ञानेश्वर ने कहा कि शीष दक्षिणा में दोगे तो ज्ञान मिलेगा और तो कोई शीष नहीं जो मैं योगी हूं मैं तपस्वी हूं मैं फलाना हूं यही शीष है
मैं और मोर तोर की माया बस कर दिनी जीवन काया अपने इस देह को और अपने जीववू दक्षिणा देत लोभी शीष ना दे सके नाम प्रेम खा लेत तभी तो बैरागी साधु में आरंभ से ही उस मैं के विसर्जन की यात्रा हो जाती वैरागी साधु को पता है कि ये मूर्ति हम ही लाए हैं शालिग्राम की हम हीने धरी है लेकिन दंडवत प्रणाम करेगा दंडवत प्रणाम करते समय बैरागी या वैष्णव यह नहीं मानेगा कि हम लाए हैं यह मूर्ति या पत्थर है नहीं साक्षात भगवान है जय राम जी भगवत भाव करेगा भगवत भाव पुष्ट होने
के लिए और अहंकार विसर्जित होने के लिए यह प्रणाम की परंपरा बनी होगी आद्य शंकराचार्य ने कहा गलते देह ध्यास वि ज्ञात परमात्मने यत्र यत्र मनो जाति तत्र तत्र समाध देह अध्यास गल जाए शरीर को मैं मानने का जो भाव है वो गल जाए परमात्मा तत्व का अनुभव हो जाए फिर जहां नजर जाएगी वहां ईश्वर ईश्वर सियाराम में सब जग जानी करू प्रणाम जोर पानी चांग देव को ज्ञानेश्वर ने आत्म उपदेश दिया सृष्टि में न जाने क्या क्या चमत्कार भृकुटी विलास सृष्टि लय हो ऐसा रोम रोम में रमने वाला परमात्मा उसके साथ का जो सनातन
संबंध है वह छोड़कर मिटने वाले संबंध कितने तना भी रखो कितने भी आप थाम थाम कर रुपए को पकड़ के बैठो लेकिन झोका आते मुट्ठी खुल जाएगी एक लोभी व्यक्ति महात्मा बन गया सन्यास ले लिया किसी ने पांच सोने की गिनिया रखी अब वो बूढ़ा बीमार पड़ा सोचा कि पांच गिनिया कोई ले ना जाए किसको दूं क्या पता जमाना खराब है कल उठके ना बोल दे तो उसने हलवा बनाया जै सरा और एक-एक गिन्नी सोने की एकएक कोर के साथ हलवे के कोर के साथ मिलाकर पेट में फिक्स डिपॉजिट वॉल्ट कर दिया अपने पेट को
ही लॉकर बना लिया उसने व समझा कि मैंने इसको सुरक्षित कर दिया लेकिन मरने के पहले ही मर गया क् मिटने वाली चीजों को जितना भी ज्यादा थाम है उतना आदमी टेंशन का शिकार हो जाता है उतना ही दुख और मुसीबतों को आमंत्रित कर देता है तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा कच त्याग से भोग बेटा है बेटी है पुत्र है परिवार है आश्रम है मठ है ठीक है संभाला लेकिन यह पहले हमारे साथ नहीं थे बाद में हमारे साथ नहीं रहेंगे और अभी भी नहीं की तरफ जा रहे यह ज्ञान पक्का रखो मरो मरो सबको कहे
मरना ना जाने कोई एक बार ऐसा मरो कि फिर मरना ना होई सियावर रामचंद्र तो वो कैसा मरे के भगवान कहते तेशा महम सम उदारता मृत्यु संसार सागरा भवाम नचरा पार्थ मया वेसित चेत समम हे पार्थ मेरे में आविष चित्त वाले उन भक्तों का मैं मृत्यु रूप संसार समुद्र से शीघ्र ही उद्धार करने वाला होता भगवान में अपने चित्त को आविष कर बाबा जी कौन सा भगवान जोन भगवान के रूप को मानते वोह भगवान और कोई रूप को नहीं मानते हो तभी भी जो भगवान का निराकार स्वरूप है उसको मानो तभी भी राजी और साकार
को मानो तभी भी राजी भगवान भ माना जिसकी सत्ता से भरण पोषण किया जा सकता है शरीर का मां जिसकी सत्ता से बालक का भरण पोषण करती ग माना जो गमना गमन की सत्ता स्फूर्ति देता है वा माना जिसकी सत्ता से वाणी उत्पन्न होती है वखरी मध्यमा पसंती परा ना माना यह सब ना होने के बाद भी जो रहता है उसका नाम भगवान है बोलो तुम्हारे साथ है कि नहीं तुम्हारे पास है कि नहीं तुम्हारे से कितना दूर तो आओ फिर भगवान के वचनों को राओ और अपने मन को भगवान के साथ मिलाने की कला
पालो तेशाम हम सम उद्धार का तेशाम अह सम उदारता मृत्यु संसार सागरात मृत्यु संसार सागरा भवाम नचरा पार्थ भवाम नचरा पार्थ मया वेश चित साम मया चेत हे पार्थ मेरे में आविष चित्त वाले उन भक्तों का मैं मृत्यु रूपी संसार समुद्र से शीघ्र ही उद्धार करने वाला बन जाता हूं जैसे समुद्र में जल ही जल है ऐसे संसार में मौत ही मौत है इसलिए सरकने वाले शरीर को मैं मानना और सरकने वाली वस्तुओं को मेरा मानना छोड़कर अपने को आत्मा और आत्मा को परमात्मा का मानकर जो यात्रा करता है उसका शीघ्र उद्धार हो जाता है
भवसागर में भक्त को भयभीत नहीं होना चाहिए क्योंकि उद्धार के लिए भगवान ने वचन दिया है और भगवान कहते हैं मेरे आम भक्तों की पूजा अर्चना के लिए मैं अवतार लेता हूं राम कृष्ण आदि साकार रूप प्रकट करता हूं और मेरे तात्विक भक्तों के लिए तत्व ज्ञान की बात कहता हूं और मेरे संसार में रहने वाले ग्रस्त जीवन में जीने वाले भक्तों के लिए मैंने हजारों हजारों अपने नाम व्यक्त किए हैं मेरे किसी भी नाम का आश्रय लेकर संसारी जीवन जीने वाले भी तर जाते हैं और विरक्त है तो मेरे स्वरूप का ध्यान करते हैं
और अत्यंत वैराग्य वान है तो मेरे स्वरूप का ज्ञान पाकर इसी जन्म में यहीं संसार सागर से पार होने का वे अनुभव कर लेते हैं हरि ओ म [संगीत]