है और 65 साल पहले दिल्ली की सत्ता पर मुगल सल्तनत का परचम बुलंद हो चुका था और इसके बाद शाहिद के सिंहासन पर अकबर की अनुमति अकबर विस्तारवादी नीति का बादशाह था शुरुआत से ही अकबर ने आस पड़ोस के राज्यों को मुग़ल सल्तनत के झंडे के नीचे लाने के प्रयास शुरू कर दिये पूर्व को जीतने के बाद अकबर ने अपने पश्चिम अभियान में राजपूताने की रियासतों पर मुगलों ध्वज फहराने की शपथ ली इसी के तहत राजपूताने में सबसे पहले आमिर रियासत ने अपनी पगड़ी उतारकर अकबर की बादशाहत वाली मुगल सत्ता को स्वीकार कर लिया है
कि शुरू में तो राजपूताने की दूसरी रियासतों ने आमिर रियासत को एक तुर्क की अधीनता स्वीकारने पर क्लिक करना शुरू कर दिया पर बाद में धीरे-धीरे इन रियासतों ने भी अकबर की सत्ता को स्वीकार कर लिया जब राजस्थान की बड़ी-बड़ी रियासतें अपनी मदमस्त शान को गुलामी की बेडियों में बांधने में लगी हुई थी उस वक्त व मात्र मेवाड़ अपने स्वाभिमान की चमक बिखेरते हुए पूरी दुनिया के साथ खड़ा था इस समय मेवाड़ पर राणा उदय सिंह का शासन हुआ करता था जिन्होंने अपने पूर्वजों की भांति किसी की अधीनता को स्वीकार नहीं किया इन्होंने अकबर को
पत्र भिजवाया कि हमारे राजा सिर्फ भगवान एकलिंग जी हैं हम तो मात्र उनके दीवान है पर फिर भी अकबर ने राणा उदय सिंह पर भारी दबाव बनाना शुरू कर दिया आस-पड़ोस के राजाओं को उदय सिंह के पास भेजा जाने लगा इन्हीं परिस्थितियों में दिन गुज़रते रहे हो कि एक दिन अचानक मौसम बदलने लगा बादलों की घमासान गर्जना के बीच राणा उदय सिंह की सबसे बड़ी रानी माता जयवंता बाई ने एक पुत्र को जन्म दिया मजबूत बदन बड़ी आंखें मुस्कान बिखेरता चेहरा बड़ा मनमोहक लग रहा था राणा उदय सिंह ने महल की औरतों से अपनी रानी
के हाल-चाल पूछे तभी पाली की दासियों ने जवाब दिया शेयर भी ने शेर को जना है महात्मा गांधी चित्तौड़ राणा सुणता हि जाजो लोधी रोना पुत्र पाकर बड़े खुश होने लगे वे कभी राणा कुंभा के बनाए विजय स्तंभ को देखने दौड़ते तो कभी बप्पा रावल की तलवार को प्रणाम करने सरदारों ने पूछा हुकुम कुंवर जी का नाम क्या होगा राणा शांत होकर बोले जिस तरह सूरज अपनी चमक से धरती को रोशन करता है उसी तरह मेरा पुत्र अपने शौर्य के प्रताप से मेवाड़ को रोशन करे का या अतः इसका नाम प्रताप होगा कुंवर प्रताप सिंह
सिसोदिया मदर जयवंता बाई कृष्ण भक्त थी उन्होंने शुरू से ही कुंवर प्रताप को भगवान कृष्ण और महाभारत के युद्ध कलाओं का ज्ञान दिया रानी जयवंता बाई कुंवर प्रताप को बताती है कि किस तरह उनके दादा राणा सांगा ने अपनी तलवार की धार से दिल्ली की बादशाहत को रक्त से नहलाया किस तरह उनके परदादा बप्पा रावल अश सूर्य के रक्त में नहाया हुआ कलेजा जब अब की धरती पर गिर जाए तो आने वाले 4 सालों तक कोई भी विदेशी भारत की तरफ आंख उठाने की हिम्मत नहीं कर पाया सिसोदिया वंश के इस अतीत को सुनते हुए
प्रताप बड़े होने लगे समय आने पर उनको गुरुकुल भेज दिया गया जहां प्रताप सुबह का समय गुरुकुल में बिताते दोपहर के समय वे भीलों की बस्तियों में चले जाते शाम होते-होते प्रताप लोहारों के गांव में निकल जाते हैं उनको हथियार बनाने की कला सीखने में बड़ा आनंद आता था जनता के बीच इस कदर घुल मिल जाने पर प्रताप सबके चहेते बन गए भीलों ने उनको की का कहकर बुलाया तो वहीं लोहारों ने उनको अपना राजा मारना शुरू कर दिया कुंवर प्रताप बचपन से ही वीर स्वाभिमानी और हठी स्वभाव के थे उनका शरीर सामान्य बच्चों से
कई गुना मजबूत आण कि उन्होंने छोटी सी उम्र में ही अफगानियों की बस्ती पर धावा बोलने शुरू कर दिए मेवाड़ से होकर गुजरने वाली मुगल सेना पर एक गुलेल से हमला कर देते उम्र के इन कारनामों को देखते हुए सबको लगने लगा था कि बड़े होने पर भी महापराक्रमी योद्धा बनेंगे और प्रताप ही भविष्य में मेवाड़ के राणा बनेंगे उदय सिंह जी की कई रानियां भी थी जिनसे उनको कुल अत्यंत इसे संतानें थी मीणा पर उदय सिंह जी की सबसे प्रिय रानी धीरबाई सा इनकी बात को राणा उदय सिंह अधिक महत्व देते थे इन्हीं के
कहने पर राणा उदय सिंह जी ने इनके पुत्र जगमाल को मेवाड़ का भाभी राणा घोषित कर दिया शास्त्रों के अनुसार सदैव बड़ा पुत्र हीरा बनता है पर सागर जैसे विशाल हृदय वाले कुंवर प्रताप ने पिता के इस आदेश को मानते हुए उस छोटे भाई जगमाल को राज्यसत्ता देना स्वीकार कर लिया है है किंतु सभी सामंत सरदार और राज्य की जनता ने उदय सिंह के फैसले पर विरोध किया वे कुंवर प्रताप को ही अपना राणा मानते थे समय के साथ राणा उदय सिंह का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा और असंत 1572 आते-आते उनका स्वर्गवास हो गया उनके अंतिम
संस्कार में कुंवर प्रताप सहित मेवाड़ का प्रत्येक व्यक्ति आया पर कुमार जगमाल इस समय महल में अपना राज्यभिषेक करवा रहा था ऐसी संकट की घड़ी में जगमाल के अपने पिता के अंतिम संस्कार में उपस्थित न होने के कारण है सभी सरदारों ने यही गुप्ता की पहाड़ियों पर रक्त से मेवाड़ के अश्लील बुक मिश्री कुंवर प्रताप का राज्याभिषेक कर दिया सरदार रावत कृष्णदास चूंडावत ने जोनल प्रताप की कमर में तलवार बांधते हुए लड़का लगाई मेवाड़ मुकुट के श्री कुंवर प्रताप सिंह और से मेवाड़ के राणा है तो यहीं से राणा प्रताप ने अपने सरदारों के साथ
कुंभलगढ़ की तरफ कूच किया पुराणों के आने की खबर सुनकर छोटा भाई जगमाल राजगढ़ी छोड़कर अकबर की शरण में भाग गया जिसके बाद साल 1573 को कुंभलगढ़ की राजगद्दी पर वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप का विधिवत रूप से राजतिलक कर दिया गया था यह कौन है यह महावीर जिसे दुनिया ने मेवाड़ मुकुट हिंदुआ सूरज के नाम से नवाजा मेवाड़ की राजगद्दी पर बैठने वाले महाराणा प्रताप एक ही वार में घोड़े सहित दुश्मन को काट डालते थे वह परम स्वाभिमानी शिव भक्त थे जिनके नाम से ही दिल्ली की बादशाहत का आप जाया करती थी उन्होंने जंगलों में
रहना स्वीकार कर लिया पर कभी अकबर की गुलामी स्वीकार नहीं की 72 किलो का भाला 81 किलो के छाती कब बचत और 208 किलो की भारी वजन के साथ महाराणा युद्धभूमि में निकलते जिनके रोद्र रूप को देख सामने वाला दुश्मन अपना रास्ता पलट लेता हल्दीघाटी के युद्ध में विशाल मुगल सेना को जबरदस्त टक्कर दी दिवेर का युद्ध में मुगल सत्ता को घटनाओं पर ले आए अपनी छापामार युद्ध नीति के दम पर मेवाड़ को फिर से आजाद करवा कर केसरिया ध्वज लहरा दिया मुगलों के छ अलार्म क्लॉक को जीतकर 40 हजार मुगलों को आत्म-समर्पण के लिए
मजबूर कर दिया जिनके भाले की नोक से शत्रु का रक्त कभी सूखा नहीं जिनकी तलवार ने कभी पराजय का मुंह देखा नहीं यह गया था है उस महाराणा कि जिसके सामने हर भारतीय बारंबार नतमस्तक होता है यह डाट आता है रूप एक लिंग अवतारी महाराणा प्रताप की आइए डिमांडिंग पंडित के साथ देखते हैं वह को मिश्री महाराणा प्रताप के इतिहास से जुड़े उन अनसुलझे पन्नों की पूरी दास्तान दे देता है जहां जो लो वो बोली 1572 को महाराणा खूब ने मेवाड़ की राजगद्दी संभाली इस समय मेवाड़ की स्थिति काफी खराब थी पिता उदय सिंह जी
के समय मुगलों के साथ युद्ध में मेवाड़ की पूरी व्यवस्था बेहाल हो चुकी थी खजाना खाली था और चित्तौड़ सहित मेवाड़ के बड़े भाग पर मुग़लों का अधिकार हो चुका था और अकबर मेवाड़ के बचे हुए इलाके पर भी अपना अधिकार करना चाहता था महाराणा प्रताप ने राजा बनते ही अपने समस्त सितारों को बुलाया और उनसे कहा कि लोगों को लंबा मन सदैव ऊंचा रहेगा मेवाड़ की छाती पर लहराता बुद्ध जब मेरा कलेजा चीर देता है बहुत जल्द हवाओं का रुख बदलेगा मेवाड़ पर केसरिया ध्वज पूरी शान से लहराएगा मेवाड़ का भविष्य जरूर चमकेगा मैं
शपथ लेता हूं जब तक मेवाड़ को पूर्ण स्वतंत्र नहीं करवा लेता तब तक मैं शांत नहीं बैठूंगा राजमहलों में नहीं का या पलंग पर नहीं सोऊंगा सोने-चांदी के तो उन्होंने भोजन नहीं करूंगा मेरे वीरों स्वाभिमान की दहाड़ से हमारा टकराव अब विशाल फौजों से होगा तैयार हो जाइए सभी सरदारों ने प्रतिघात के स्वर में अपनी तलवारें लहराई पूरा दरबार महाराणा प्रताप की जयकारों से गूंज उठा इसी के साथ महाराणा प्रताप ने अपनी सेना को संगठित करना शुरू किया उन्होने मेवाड़ के भीलों के गावों का दौरा किया भील योद्धाओं को अपने साथ जोड़ना शुरू किया लोहारों
को हथियारों के जखीरे बनाने का काम सौंपा गया सरदारों को प्राचीन युद्ध कलाओं का अभ्यास करवाया जाने लगा महाराणा प्रताप द्वारा सेना निर्माण के समाचार दिल्ली के बादशाह अकबर तक पहुंचने लगे अकबर ने भी राणा प्रताप को रोकने की पूरी तैयारियां शुरू की उन्होंने महाराणा प्रताप से अपनी अधीनता स्वीकार करवाने के लिए अपने दूत भेजने शुरू की है इसी के साथ अकबर ने अपने दरबार के सबसे चतुर और वाकपटुता दरबारी जलाल खान को ऋषि को महाराणा प्रताप के उम्मीवार बेटा पर महाराणा प्रताप ने अधीनता की बात सुनकर जलाल को तुरंत रवाना कर दिया इसके 1
साल बाद अकबर ने आमेर के राजा मान सिंह को महाराणा प्रताप के पास भेजा इस समय महाराणा प्रताप उदयपुर मे है मानसिक सीधा उदयपुर आ गया महाराणा उम्र में मान सिंह का एक अतिथि की तरह सत्कार किया महाराणा प्रताप उदयसागर झील तक मान सिंह का स्वागत करने के लिए आए इस झील के सामने वाले टीले पर आमेर के राजा के लिए दावत की व्यवस्था की गई थी भोजन तैयार हो जाने पर मानसिंह को बुलावा भेजा गया महाराणा प्रताप ने अपने पुत्र अमर सिंह को अतिथि की सेवा के लिए लगा दिया पर महाराणा प्रताप भोजन के
लिए नहीं आए मान सिंह द्वारा हुकुम के बारे में पूछने पर अमर सिंह ने बताया कि पिताजी को सर दर्द है वह नहीं आ पाएंगे आप भोजन करके विश्राम करें मान सिंह ने भूमि तानते हुए कहा कि राणा जी से कहो कि उनके सर दर्द का कारण मैं समझ गया हूं शेर सिंह राणा प्रताप के बिना भोजन स्वीकारने से मना कर दिया तब राणा प्रताप ने उन्हें संदेश भेजा कि जिस राजपूत के संबंध एक तुर्क से हो उनके साथ भला कौन राजपूत भोजन करें का यज्ञ मान सिंह जवाब देने की स्थिति में नहीं था क्योंकि
राणा प्रताप ने तो उन्हें बुलावा भेजा ही नहीं था मान सिंह ने भोजन को छुआ तक नहीं केवल चावल के कुछ कणों को जो अन्न देवता को अर्पण किए थे उन्हें अपनी पगड़ी में रख कर वहां से चला गया घोड़े पर बैठकर मान सिंह राणा प्रताप से कहा कि दिल्ली की बादशाहत को अस्वीकार करना एक संघर्ष को चुनौती है यदि आपकी इच्छा देखो में रहने की है तो एक दिन आपकी इच्छा जरूर पूरी होगी मान सिंह ने खेतान कर आगे कहा मैं तुम्हारा अभिमानू चूर्ण कर दूंगा अगली मुलाकात युद्धभूमि में होगी राणा प्रताप ने उत्तर
दिया मै प्रतीक्षा करूंगा का या ऐसे ही अकबर ने महाराणा प्रताप के पास अपने चार दूध भेजें यहां पर महाराणा प्रताप ने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की महाराणा प्रताप द्वारा अधीनता स्वीकार न करने पर सन 1576 में अकबर अपने सभी सेनापतियों के साथ अजमेर आ धमका यह अकबर ने मान सिंह को 1 लाख की विशाल मुगल सेना का सेनापति घोषित किया 3 अप्रैल 1576 को मान सिंह विशाल मुगल फौज लेकर मेवाड़ विजय के लिए निकल पड़ा दो महीने चलने के बाद मानसिक खमनोर नामक गांव में पहुंचा महाराणा प्रताप के वीर सिपाहियों ने अपने प्राणों
को संदेश भिजवाया कि हुकुम मान सिंह असंख्य मुगल सेना को लेकर मेवाड़ की तरफ बढ़ रहा है पर महाराणा प्रताप तो कब से अपनी तलवार की धार मजबूत कर ही रहे थे वह भलीभांति जानते थे कि युद्ध अवश्य होगा इधर मान सिंह बनारस की नदी के मैदानों में आ पहुंचा मान सिंह यहां मोलेला गांव में अपना डेरा लगाया दूसरी तरफ महाराणा हमने अपनी 20 हजार की सेना के साथ उस से 6 मेल सामने लो सिंह गांव में अपना पड़ाव डाला विशाल मुगल सेना में राजपूत और मुगल थे जो कि महाराणा प्रताप की सेना में राजपूत
भूल पठान और लोहारों के गांव के लोग से 18 अक्टूबर 1576 को संसार के अनोखे युद्ध का आगाज हुआ आकाश में घनघोर बादल थे और धीमी-धीमी हवाएं चल रही थी कभी-कभी बिजली की तेज गड़गड़ाहट हो रही थी इसी बीच मुगल सेना आगे बढ़ने लगी तभी महाराणा प्रताप ने अपने हरावल दस्ते को शत्रु पर प्रहार करने के लिए आगे भेजा हों उनकी हरावल सेना ने आगे बढ़ रही मुगल सेना के तीन हरावल दोस्तों को पूरी तरह से नष्ट कर दिया इस घनघोर हमले से घबराकर मुगल सेना का हरावल खेमा लूणकरण के नेतृत्व में भेड़ों के झुंड
की तरफ भाग निकला अब मेवाड़ और मुगल सेना आमने-सामने आ चुकी थी तभी वीर विराट मेवाड़ मुड़ हिंदुआ सूरज महाराणा अपने युद्ध भूमि में प्रवेश किया राणा श्री के युद्ध में आते ही मुगल खेमे में दहशत का माहौल फैल गया महाराणा जिस और बढ़ जाते वहां शत्रुओं की लाशों के ढेर लग जाते मुगलों ने पहली बार महाराणा प्रताप को देखा था इससे पहले सिर्फ उनका नाम ही सुना था बंदायूनी ने अपनी किताब में महाराणा प्रताप के संबंध में लिखा कि वह बहुत लंबे मजबूत और ताकतवर थे प्रताप हाथ में तलवार लेकर जब चलते थे तो
ऐसा लग रहा था कि मानो आधी सेना को अकेले ही लेकर डाल देंगे उनके चेहरे पर सदैव गुस्से की लकीरे चमकती रहती थी युद्ध भूमि में शुरुआत से ही किसी मुगल सैनिकों ने उन को छेड़ने की हिम्मत नहीं कि महाराणा प्रताप की सेना ने तीन घंटों में ही लाशों के ढेर लगा दिए घबराई हुई मुगल सेना अरावली के घाटे की तरफ भागने लगी मुगलों को भागते देख सेनापति मोहित रखा जोर-जोर से चिल्लाने लगा कि बाद तो सलामत अखबार विशाल सेना लेकर खुद युद्धभूमि में आ रहे हैं यह शब्द सुनकर भाग्य मुगल सेना सोच में डूब
गई कि भागे तो अकबर मार देगा नहीं भागे तो राणा मार डालेगा महाराणा प्रताप अब मान सिंह को युद्ध भूमि में ढूंढ़ने निकल पड़े जिसने कहा था कि अगली मुलाकात तो युद्ध भूमि में ही होगी तभी उन्होंने देखा कि मान सिंह हाथी पर बैठा था महाराणा प्रताप ने बड़े वेग से चेतक के अगले पैरों को मानसिक के हाथी के मस्तक पर टिका दिया और अपने भाले से मान सिंह पर करारा प्रहार किया पर मान सिंह अपने हाथी पर लगे हौज में छुप कर बैठ गया पुत्र राणा श्री के करारे वार से उसका महावत मारा गया
मान सिंह के हाथी की सूंड में एक तलवार लटकी हुई थी जिससे चेतक का अगला पैर कट गया इस समय तक महाराणा प्रताप के पैर में एक गोली लगी हुई थी उनके शरीर पर असंख्य घाव थे पूरा शरीर खून से लथपथ हो चुका था तभी सादड़ी रियासत के झाला उन्होंने कहा कि हम आपके प्रिय चेतक को इलाज की जरूरत है और आपके पैर पर भी गोली लगी है जिससे जहर फैल सकता है आप तुरंत वैद्य जी के पास जाएं महाराणा प्रताप अपने घोड़े चेतक को अपने पुत्र की तरह प्यार करते थे उन्होंने झाला बीदा को
मेवाड़ का राज छत्र दिया और बोले सेना को पूरा नेतृत्व देना और स्वयं चेतक पर सवार होकर युद्ध को पूरी तरह से पहाड़ियों की तरफ मोड़ लिया जहां पहाड़ियों पर भीलों ने युद्ध का मोर्चा संभाल लिया मुगलों को अब एक नई टक्कर मिली महाराणा प्रताप चेतक को लेकर पर्वतों की ओर निकल पड़े यह चेतक ने 26 फीट की गहरी खाई को कूदकर पार कर लिया और बोली गांव में घायल चेतक नीचे गिरकर बेहोश हो गया तभी महाराणा प्रताप का छोटा भाई शक्ति सिंह जो मुगल सेना की तरफ से लड़ रहा था महाराणा प्रताप का पीछा
करते हुए यहां तक आ पहुंचा महाराणा प्रताप बेहोश चेतक को सहला रहे थे कि तभी उनकी नजर श अपनी पर पड़ी और होने शक्ति सिंह से कहा सीना खुलेआम और भला तुम गाउलाश मिट्टीकरण लगे भारत माता कह दूंगा तेरे पूर्व दामन में बिगड़ लगे हैं और ज्योति सिंह बड़े भाई के शब्दों को सुनकर फूट-फूटकर रोने लगा और भाई के पैरों में जाग गया [संगीत] 100 है इधर हल्दीघाटी के मैदानों में घमासान युद्ध चल रहा था घाटी के घरों में राणा पूंजा भील और राजपूत सरदार मुगलों को भीषण टक्कर दे रहे थे अंत में मान सिंह
ने हल्दीघाटी के दरों में जाने की बजाय मुगल सेना को वापस अजमेर चलने का आदेश दिया और खबर की विशाल साधन-संपन्न सेना का गर्व मेवाड़ी सेना ने मिट्टी में मिला दिया मान सिंह और आसफ खान जब खाली हाथ अकबर के सामने उपस्थित हुए तो क्रोधित अकबर ने 3 महीने तक उनके दरबार में आने पर पाबंदी लगा दी उनकी संपत्ति को जब्त कर लिया गया उनका वेतन और सभी सुविधाओं को तुरंत रोक दिया गया हल्दीघाटी के भयानक युद्ध के बाद महाराणा प्रताप अपनी सेना के साथ कुंभलगढ़ आ गए विनाशकारी युद्ध का पासा महाराणा प्रताप के पक्ष
में था पर इस समय तक उनका खजाना खाली हो चुका था हल्दीघाटी के चार महीने बाद ही क्षण 1577 में अकबर ने एक बार फिर शाहबाद खान के नेतृत्व में भारी से भी कुंभलगढ़ पर हमला करने के लिए भेजी हल्दीघाटी जैसे विशाल युद्ध के बाद एक नया युद्ध मेवाड़ की सेना के लिए भारी था अतः महाराणा प्रताप ने किले को त्याग दिया कुंभलगढ़ पर शाहबाज खान का अधिकार हो गया कुछ महीनों के बाद महाराणा प्रताप ने फिर से सिर तैयार की और पूरी तैयारी के साथ शाहबाद कहां पर आक्रमण करके कुंभलगढ़ को वापस जीत लिया
कुंभलगढ़ विजय के बाद महाराणा प्रताप ने आगे की रणनीति बनाने के लिए सभी सरदारों को बुलवाया जहां सरदारों ने हमसे कहा कि हमें सीधी तरफ निकलना चाहिए जहां हम धन का बंदोबस्त करके एक विशाल सेना का निर्माण करेंगे और सीधा अकबर पर आक्रमण करेंगे इसी उद्देश्य से महाराणा प्रताप भाषण सुनकर आपको कुंभलगढ़ का किलेदार नियुक्त करके गुजरात की तरफ निकल गए आगे इसी रास्ते में महाराणा प्रताप ने शाहबाज खां को दो बार पराजित करके वापस लौटने पर मजबूर किया गुजरात पहुंचने के बाद महाराणा प्रताप ने चूड़िया गांव में अपना डेरा लगाया जहां पर मतदान वीर
भामाशाह ने महाराणा प्रताप के लिए अपना खजाना खोल दिया उन्होंने महाराणा प्रताप को 25 लाख रुपए की सहायता दी इतने बड़े धन को पाकर हुकुम पूर्ण सेना की तैयारियों में जुट गए बस यहीं से असली संघर्ष की शुरुआत होती है महाराणा प्रताप ने सिंध जाने की बजाए वह मेवाड़ की तरफ कूच किया और असंत 1582 में दिवेर के दरों में स्थित मुगल स्थानों पर आधी के समान टूट पड़े हुकुम रौद्र रूप धारण कर चुके थे उन्होंने अपने सामंतों को आदेश दिया के किले को चारों तरफ से घेर लोग कोई बचकर नहीं निकलना चाहिए थे तभी
महाराणा प्रताप के पुत्र अमर सिंह ने अकबर के चाचा सुल्तान खान पर भिजवा दो सुल्तान खान के घोड़े सहित आर पार निकल गया यहां 36 हजार मुगलों ने महाराणा प्रताप के सामने आत्मसमर्पण कर दिया महाराणा ने दिव्य के किले पर केसरिया ध्वज लहरा दिया मुगलों के दिवेर हार से बौखलाए अकबर ने सर 1584 में महाराणा प्रताप को बंदी बनाने के लिए भेजा पर जगन्नाथ कछवाहा बुरी तरह से पराजित हुआ था उसने महाराणा प्रताप से माफी मांगी और बकायदा हर्जाना भी दिया इसी के बाद महाराणा प्रताप ने कमलमीर के किले को जीत लिया जहां अमर सिंह
ने कमल मेरे के नोडल अधिकारी अब्दुल्ला को कई टुकड़ों में काट डाला इन्हीं लगातार जीतों के बाद 1585 में महाराणा प्रताप ने चावंड को जीतकर उसे अपनी राजधानी बनाया इसके बाद उन्होंने लगातार एक-एक करके मुगलों के 32 क्लॉक को जीतकर अकबर की नींदे हराम कर दी हैं कि मान सिंह से उसके देश अदरक का बदला लेने के लिए महाराणा प्रताप ने अपनी सेना लेकर आमिर के मालपुरा पर आक्रमण किया जहां से उन्होंने मान सिंह की बेशुमार औरत को अपने कब्जे में लिया अकबर ने स्वीकार कर लिया था कि राजपूताने के इस शेर को कोई कैद
नहीं कर सकता उसने अब महाराणा प्रताप को ना छोड़ने में ही अपनी भलाई समझी इसके बाद 12 सालों तक महाराणा प्रताप ने ऐसा शासन किया कि मेवाड़ के व्यापार को चार चांद लग गए मेवाड़ की खोई हुई चमक वापस लौटने लगी 19 जनवरी 1597 को 57 वर्ष की आयु में हुकुम शेर के शिकार पर निकले थे जहां धनुष की प्रत्यंचा खींचते हुए हुकूमत देवलोक सिधार वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की देशभक्ति और अमर स्वाभिमान ने हर भारतीय के मन में उनके लिए अपार सम्मान जागृत किया कवियों ने भी अपनी कलम से महाराणा के कीर्तिका कुछ युवक
खान किया कि गर्म रहेगा और पृथ्वी भी रहेगी पर मुग़ल-साम्राज्य एक दिन नष्ट हो जाएगा का यह हे राणा विशंभर भगवान के भरोसे अपने निश्चय को अटल रखना अब्दुर रहीम खान-ए-खाना जिसने अपने घोड़ों को कभी शाही सेना में भेज कर दाग नहीं लगवाया जिसने अपनी पगड़ी किसी के सामने नहीं जुटाई उसके शासनकाल में जनता को किसी से कोई भय नहीं हुआ था उसकी तलवार और भले ही उसका सच्चा साथी था वह वैदिक मार्ग का अनुयाई था जिसमें अनेक मंदिरों का निर्माण करवाया उसके शत्रु भी उसकी वीरता और स्वाभिमान के सामने झुक जाते थे उसकी शपथी
प्रताप के इस रुख से अकबर के लिए सदैव तुर्क ही निकले का यह तहें राणा जब-जब भी कलम महाराणा प्रताप लिखेगी तब तब सिर्फ महान महान् और महान् ही लिखा जाएगा दो इस वीडियो को बनाने में बहुत मेहनत लगी है कृपया इस वीडियो को अधिक से अधिक लाइक कीजिए का या चैनल को सबस्क्राइब करके Bell Icon जरूर दबाइए का या आपका आभार धन्यवाद है