[संगीत] [हंसी] [संगीत] आयुषा जी नागपुर से राधे राधे महाराज जी मा जी गीता के कर्म योग के सिद्धांत कर्म कर फल की चिंता मत कर का जीवन में पालन करना तो आवश्यक है लेकिन जब परिस्थिति कठिन हो या मन अशांत हो तब दिमाग मन को शांत रखने के लिए क्या कर क्या करें क्या विचार सोचे मन भविष्य की अनिश्चितता से भर जाता है तो इसे वर्तमान में स्थिर कैसे रखें भगवान पर जब हमारा भरोसा दृढ़ होने लगता है तो हमें पता है मेरे भगवान सर्वज्ञ हैं वह मेरे भूत को भी जानते हैं वर्तमान को भी
जानते हैं और भविष्य को भी जानते हैं हमें एकमात्र भगवान के आदेश का पालन करना है अनन्य चिंत तो माम ये जना परिपास तेशाम नित्या अभियुक्त नाम योगक्षेमं वाहम मैं योगक्षेम का वाहन करूंगा आगे मैं निर्वाह करूंगा वर्तमान में मैं निर्वाह करूंगा पीछे को मैं देख लूंगा योगक्षेमं जो अप्राप्य है उसे प्राप्त करा दूंगा जो है उसकी रक्षा कर लूंगा दूसरा कोई उपाय नहीं यदि भगवान का चिंतन नहीं है तो फिर डिप्रेशन में पहुंच जाओगे यही चिंतन फसा चला जाएगा तो तुम्हें परेशान कर देगा अनन्य निश्चिंत तो माम अन्य चिंतन त्यागो अनन्य चिंतन भगवान का
केवल करो व जो भगवान का विश्वास कर ले भगवान की शरण में हो जाए भगवान सबका भरण पोषण करते हैं पूरा विश्व ब्रह्मांड उन्हीं का रचा हुआ है अगर हम अपने विचार के द्वारा अपनी चाल तो फिर हमारे विचार बहुत छोटे हैं बहुत निम्न है और हम गिर जाएंगे अगर हम अपने विचारों को भगवान से जोड़ देते हैं तो महान से जुड़ने के कारण जिम्मेवारी महान को हो गई वो महान ऐसा है कि अपने शरणागत का प्रतिपल दुलार ऐसे करता है जैसे मां अपने ब करो सदा तिनक रखवारी जिम बालक राखे मतारी आप केवल भगवान
का चिंतन करो भगवान के भरोसे हो जाओ आगे बहुत बढ़िया संभाल देंगे बहुत बढ़िया विश्वास में बहुत बड़ी ताकत हर काम हर काम संभाल देंगे इसलिए मुझे लगता है आप चिंता ना करो चिंतन करो किसका प्रश्न था हां भगवान का चिंतन करो वो आगे भविष्य भी ब बना देंगे भूत में जो गलतियां हुई उनको क्षमा कर देंगे आ तोम सर्व पापे मोक्ष श्याम मा सुचा बिल्कुल आनंद हम अपने जीवन की बात कहते हैं भगवान की शरणागति परमानंद परमानंद अगर ना मिला होता तो हम मैक से कह देते कि यार जैसे कोई बाबा जी बनने आता
है तो उसको कह देते बिल्कुल नहीं बिल्कुल नहीं घर जाओ ब्याह करो बाबागिरी का मतलब समझते हो कोई खिलवाड़ थ नाटक पाखंड करना तो खिलवाड़ है बाबागिरी का म मतलब समझते हो पूरा जीवन जलना काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर हर से जलना हर युद्ध विरला कोई भगवान तक पहुंच पाता है और जो भगवान को प्राप्त हो गया तो परमानंद जानत तुम्हे तुम्हे हो जाए फिर उसके लेकिन उस आनंद तक पहुंचने तक जितनी परीक्षाएं हैं बैलेंस बना केर चले तो बात अलग है लेकिन सिर्फ भगवान अब बड़ी बात हो गई अब अब मतलब अब जलना
पड़ेगा अब जल के आगे बढ़ना पड़ेगा तो यह मतलब सबको ई कमांडो तो नहीं हो जाता है नहीं कमांडो तो कोई आर्मी में से विशेष विशेष छटे जाते हैं ऐसे ही जगत में कोई विशेष होते हैं जो विशुद्ध भगवान की भक्ति केवल भगवान लक्ष कोई साइड में किसी भी तरह का भोग मिश्रित नहीं केवल भगवान जिनके एक भरोसो एक बल एक आस विश्वास एक राम घनश्याम चातक तुलसीदास चातक की तरह जैसे चातक है ना वो दूसरे ृ नहीं बैठता जो जमीन के पानी से सींचा जाता है वो सिर्फ आकाश के पानी से सींचे हुए वृक्ष
पर बैठेगा और सिर्फ चोच में जो आएगा स्वाति का बूंद वही पिएगा वह गंगाजल में एक बाण मार के गिरा दिया चातक को तो ऐसे चोच किए था तो दूसरे पक्षियों ने गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा इस विषय दूसरे पक्षियों ने पूछा कि अरे गंगा का पुण्य जल अगर तुम्हारे मुंह में चला जाएगा तोम मुक्त हो जाओगे नका मुक्त तो हो जाएंगे लेकिन हम चातक है हमारी आन टूट जाएगी मैं सिर्फ आकाश से बरसे हुए स्वाति जल को लेता हूं नहीं तो इसीलिए गर्दन उठा कि मरते दम तक हमारी चोच में गंगा का पानी ना
चला जाए यह एक राम घनश्याम हित चातक तुलसीदास चातक की तरह भगवान में चलना ये थोड़ा कठिन बात है लेकिन भगवान बल देते हैं वैसे चलाते हैं तो भगवान का नाम सर्व मंगलकारी है हां य कुछ परिस्थिति कुछ समय के लिए ऐसी आती है जिसमें लगता है कि हमें भगवान क्या रक्षा नहीं कर रहे क्या क्या भगवान हमारे साथ नहीं है क्या मतलब ऐसी परिस्थिति आती है जैसे 12 वर्ष का बनवास एक वर्ष का ज्ञात वास महाराजी दृष्टि कुछ परिस्थितियां ऐसी भक्ति के जीवन में आती को पर जहां भगवान का आश्रय हुआ तो प्रकाश हो
जाता है द्रोपदी जी पहले अन्य का आश्रय लिए थे और ही देखा अब तो वस्त्र हटने वाला है हे गोविंद द्वार का खत्म खेल प्रकाश ही प्रकाश वस्त्र का यही भगवान का वस्त्रा अवतार हो गया तो हम लोग कुछ ऐसी परिस्थितियां आती है जिनमें ऐसा लगता है कि पता नहीं भगवान है भी कि नहीं भगवान हमारा सहयोग कर रहे हैं कि नहीं एक एक परिस्थिति उनके द्वारा पास होकर आ रही है वह देख रहे हैं बिल्कुल चुप रहो उन्हीं के आश्रित रहो परिस्थिति ऐसे निकल जाएगी पक्का मानिए पक्का मानिए बहुत कृपालु भगवान है हमसे लाख
अपराध बने तो भी वह अपराध नहीं मानते ऐसा कृपालु जन अवगुण प्रभु मान न काऊ दीन बं मदुर स्वभाव बहुत भगवान की करुणा हम तो एक ही बात जानते हैं कि अगर भगवान का भजन करोगे तो यहां वहां सब जगह सुखी रहोगे जी रामदीन तिवारी जी भोपाल से राधा वल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी ये दास स्वामी शंकराचार्य जी महाराज जी से दीक्षित है महाराज जी से तारक मंत्र की दीक्षा मिली राम नाम में स्वाभाविक रुचि प्रेम है महाराज जी मैं तीन वर्षों से य के माध्यम से आपका
प्रवचन निमित सुन रहा हूं महाराज जी मानस में आया है कि सोई जान जही देही जनाई जानत तुम ही तुम ही होई जाई महाराज जी तुम्हारी कृपा तुम ही रघुनंदन जानत भगत भगत उर चंदन प्रश्न ये है महाराज जी कि भगवत प्राप्ति कृपा साध्य है या पुरुषार्थ साध्य है कृपा साध्य है तो प्रभु प्रयत्न हमारा और कृपा भगवान की क्योंकि हमारे में जो प्रयत्न करने की भावना भी आई ना वो भगवान की कृपा से आज सत्संग में कह रहे थे कायर पुरुष भगवत प्राप्ति नहीं कर सकता हमारा प्रयास पुरुषार्थ और भगवान की कृपा और जो
पुरुषार्थ बन रहा है वो भी भगवान की कृपा से क्योंकि हम राम राम बोल रहे तो राम जी की कृपा से हम संत समागम सत्संग में आए तो राम जी की कृपा से जब दही दीन दयालु राघो तो साधु संगति पाइए तो हमारा जितना भी पुरुषार्थ है वो भी कृपा से हो रहा है पर हम पुरुषार्थ शल रहेंगे कृपा का भरोसा और पुरुषार्थ में पूर्ण पूर्ण हमारा दृढ़ निष्ठा कि हमारे चाहे प्राण चले जाए गलत आचरण नहीं करेंगे अच्छे आचरण करेंगे और जितना समय अव्य कालम एक क्षण भी हमारा खाली नहीं जाना चाहिए भगवान के
स्मरण से कोशिश करता हूं हां बस प्रयत्न हमारा कृपा भगवान की प्रयत्न हमारा अब ये कि गलत आचरण की तरफ जैसे जो वृत्तियां है उनको सहन किया जाता है उनके द्वारा आचरण नहीं किए जाते वृत्तियां उदय होती है सहन कर लो तो धीरे-धीरे शांत हो जाएंगी जो हमारे अंदर कु प्रवृतियां जो हमारी कुबुद्धि के द्वारा प्रेरित है उनको नष्ट करना है सत मार्ग की वृत्तियों के द्वारा असत मार्ग का दमन करके और फिर सत मार्ग का जो फल है अहंकार रहित हो जाना यह सब भगवान की कृपा से हो रहा है ऐसा भक्त को अनुभव
होने लगता है उसका लौकिक और पारलौकिक जो भी व्यवहार और परमार्थ है वह सब देखने लगता है भगवान करवा रहे हैं स्वयं भगवान हृदय में बैठकर करवा रहे हैं मेरे द्वारा कुछ नहीं हो रहा वो जीवन मुक्त महापुरुष हो जाता है जानत तुम्ह तुम्ह हा तुम्ह हो जाए मतलब व राम मैं हो जाता है उसका मन राम में बुद्धि राम में चित्त राम में अहंकार राम में उसको जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय नहीं सकल रामम जाने बंदो सब के पद कमल सदा जोर जुग पाग वो भगवत स्वरूप को प्राप्त हो जाता है जो
जितना नाम जप करता है और भगवान की आज्ञा का पालन करता है उतना ही उसके ऊपर कृपा उतरती है देखो गोस्वामी जी ने कहा पूर्ण कृपा का पात्र कौन बनता है तो बोले मन क्रम वचन छाड़ चतुराई भजता कृपा करी है रघुराई जो मन से वचन से कर्म से छल कपट छोड़कर भगवान का भजन करता है भगवान उस पर निश्चित कृपा करते हैं और भगवान की कृपा हुई कि वो भगवतम हो गया उन्हीं की कृपा सच्ची मानिए किसी का एक बस नहीं है बस वो अहंकार के कारण सारा का सारा दंड मिलता है नहीं अगर
अहंकार गलित हो जाए तो भगवत स्वरूप है हर कर्म उसके निष्फल हो जाए कोई फल प्रदान शुभ शुभ में बांधने वाले कर्म सब निष्फल हो जाएंगे वो भगवत प्राप्त हो जाएगा जब तक फल है तब तक भगवत प्राप्ति नहीं है ये बड़ा सूक्ष्म विषय है कर्मों का जब तक फल है तब तक भोग है जब कर्म निष्फल हो गए तो उनमें कोई फल तो लगा लेक शुभ अशुभ दुख सुख अब भगवत प्राप्त हो जाएगा जब तक शुभ अशुभ है तब तक भगवत प्राप्त नहीं होगा और जहां शुभ अशुभ दोनों नष्ट हुए वो भगवत प्राप्त हो
जाएगा तो भगवान की बड़ी कृपा है आप पर जो भगवान के नाम में जीवन को समर्पित कर रहे हैं दैन्य होकर अभिमान रहित होकर आगे बढ़ो महाराज जी जब साविक भाव में सुबह रहते पूजा पाठ करते तो आनंद में रहता के बाद फिर वो स्थिति नहीं रहती हां क्योंकि माया का भी तो अपना प्रभाव है जैसे भक्ति का प्रभाव है ऐसे माया का प्रभाव कोई छोटा मोटा प्रभाव नहीं बहुत बड़ा प्रभाव है अगर हम पहरेदार स अंग रक्षक साथ रखे तो हमको एक रहता है ना कि हमारा गार्ड है तो नाम पहर दिवस लिसी समझ
रहे ना हर समय हमारे साथ पहरेदार है नाम राम राम राम राम राम ना जानकी जी के ना नाम पहार दिवस निस ध्यान तुम्हार कपाट लोचन निज पद जंत जाहि प्राण के और दूसरी बात महा भागवत हनुमान जी जब हम किसी काम के लिए चले जी तो तुरंत पहले प्रभु का स्मरण करते हैं हर समय पर उस समय विशेष कि प्रभु इस समय मैं आपके कार्य के लिए जा रहा हूं आप ऐसी कृपा करो कि यह कार्य करते हुए आपका विस्मरण ना हो और यह जो कार्य है वो आपके चरणों में समर्पित प्रभ नग की
ज सब काजा हृदय राख कौशल राजा सब मंगल होगा भगवान मंगल भवन है ना सब मंगल भगवत स्मृति से युक्त जो भी क्रियाए की जाती है सब पूजा हो जाती है गुरुजी मेरे सदगुरु भगवान ब्रह्मलीन हो गए एक डेढ़ साल हो गया उनके बाद आप छवि दिखती उनकी छ भाव से जो भजन कर रहे हो ना पहली बार आपके दर्शन साक्षात हो रहे हैं राम वल्लभ जी हाथ रस से जी महाराज जी राधे राधे महाराज जी आपके चरणों में कोट कोटि प्रणाम म जी बहुत दिनों से संतों के भक्तों के सत्संग का लाभ लेने का
प्रयास कर रहे हैं हरि नाम संकीर्तन भी करते हैं गुरुदेव के चरण अरविंद से भी जुड़े हैं मराज जी फिर भी जीवन में अभी भजन के लिए दृढ़ता का अभाव दिखाई पड़ता है क्या हमसे भक्ति पथ पर कोई चूक हो रही है जो बार-बार सब जानते हुए भी मन भजन मेंट नहीं हो रहा वो अंदर से वो अंदर से आपको देखनी है ना सफाई पेश करनी है और ना बतानी है क्या चूक है अंदर से तुमको छानबीन करनी है पांच ज्ञानेंद्रियों के साथ मन विषयों में घूमता रहता है मना कटान इंद्रियानी प्रकृति स्थान कर सति
अब आप देखना है कि जैसे आपके अंदर काम भाव आया तो यदि अपनी पत्नी से संतान उत्पत्ति के लिए धर्म पूर्वक काम का प्रयोग किया जाए तो भगवान कहते वह काम मैं हूं धर्म युक्त काम भगवत स्वरूप है लेकिन वही काम जब हम दूसरे के प्रति दृष्टि बदल जाए दोष दृष्टि तो वो हमारे भजन में बाधा पहुंचा देगी क्रिया तो बहुत बड़ी बात है हमारी दृष्टि बदल जाए अब ऐसे ही पदार्थ हैं जो भगवान को बिना भोग लगाए पाए जाते हैं वह चाहे जितने सात्विक हो तमोगुण रजोगुण पैदा कर देंगे भोजन संभालो दृष्टि संभालो क्रियाएं
संभालो और वाणी संभालो आप रात दिन भजन का प्रयास करो और संतों की निंदा कर दो किसी भी संत की तो आपके सारे सुकृत नष्ट हो जाएंगे किय सुकृत बहु जन्म के क्षण में डारे खोए भक्तन निंदा अति बुरी भूल करो जिन को जैसे मा अलग-अलग स्वभाव है अब कोई पाखंड से जी रहा है तो भगवान की सृष्टि है भाई अगर सत्य है तो असत्य भी है अगर दिन है तो अंधेरा रात भी है उनका बगीचा है किसी को नीच बनाया किसी को ऊंच बनाया हमारा अधिकार थोड़ी भगवान की निंदा करने क्योंकि उसकी निंदा का
मतलब भगवान की निंदा उसमें भगवान विराजमान है और यह हम लोग बहुत वाचाल के कारण कर बैठते हैं कि भाई व संत तो बहुत बढ़िया और वो संत निंदा ऐसे जहां हम किसी से हां तो उसी तुलना में निंदा हो जाती है और जहा निंदा हुई तो हमारे सुकृत नष्ट हुए भजन में अरुचि आ गई पहले वाणी को कंट्रोल करो ब विचार के द्वारा ही वाणी खुले वाणी एक अमूल है जो कोई बोले जान ये तराजू तौल के तब मुख बाहरान किसी की निंदा कोई करने लगे कि वो राधा राधा राधा राधा राधा नहीं सुनना
नहीं राधा राधा तो इससे आप देखोगे आपकी भक्ति बढ़ेगी जहां आप के छेद हैं उनको लॉक कर दो शब्द स्पर्श रूप रस गंध ये पांच भगवान से जोड़ते भी है और भगवान से विमुख करते हैं अब जैसे नाम कीर्तन है भगवान की कथा है ये जब हम कानों से सुनते हैं तो भगवान से जोड़ते हैं और जब हम विषय फिल्मी गाना सुनते हैं फिल्म के डायलॉग सुनते हैं प्रपंच की बातें सुनते हैं भोग कथा सुनते हैं तो ये भगवान से विमुख कर देते अब स्पर्श भक्तों का स्पर्श भगवान को प्रसादी चढ़ाई हुई तुलसी पुष्प इत्र
इनका स्पर्श येय भक्ति बढ़ाएगा अब भक्तों का स्पर्श और जो विषय पुरुष है भगवान से विमुख है ऐसों का स्पर्श हमारे अंदर विषय परमाणु ले आएंगे या पराई माता बहनों का स्पर्श गलत भावना के द्वारा तो वो सब तो शब्द स्पर्श रूप अब इन सब रूपों में भगवान ही है अब इतना हमारा भाव नहीं जा पा रहा तो हम नमस्कार तो करें किसी रूप से राग कर लिया किसी से द्वेष कर लिया तो हम एक फस आओ फस गया द्वेषा क्मक रागा मेंक तो हम सब में बचने की कोशिश करें गंध भगवान के अर्पित की
हुई जैसे धूप है अगरबत्ती है इत्र है यही अब जैसे अपने के लिए ऐसे फुसफुस डाल के चले ना वो फसा आएगी रजोगुण पैदा करेगी बुद्धि आपकी कामा मेंक हो जाएगी देख लेना और भगवान को चढ़ाया हुआ और फिर ऐसे करोगे तो भक्ति बढ़ेगी महाराज तुलसी दल ग्रहण कर सकते महाराज गुरु चढ़ाया हुआम भगवान पर चढ़ाया हुआ तुलसी दल हां हां हां हां बिल्कुल ग्रहण कर सकते हैं बिल्कुल तो हमारे जीवन धन प्रभु को अर्पित की हुई वस्तु है शब्द स्पर्श रूप रस गंध अब जैसे जवान में रस है स्वाद भोजन का ऐसे पाओगे तो
फसा लेगा और भगवान को अर्पित कर तो हमारे राम जी ने पाया श्याम जी ने पाया प्रभु ने पाया तो हमारा प्रसाद हो गया तो ये शब्द स्पर्श रूप रस गंध जीव को भगवान से विमुख करते हैं अगर सही प्रयोग हो जाए तो भगवान के सन्मुख कर देते हैं तो हमको इनका सही प्रयोग करना है और नाम जप करना है तो देखो अगर मटकी सही हो और एक एक बूंद डालो तो एक दिन भर जाएगा और अगर उसमें चार पांच छेद हो रफ्तार से भी डालो तो भरेगा नहीं खूब भजन कर रहे हो पापा आचरण
भी कर रहे हो तो अनुभव नहीं होगा इसलिए पहले छेद बंद करो तो कुमार्ग गामी प्रवृत्तियों को रोको और सत मार्ग के मार्ग की जो वृतिया उनको बढ़ाओ तो आनंद आने लगेगा ठीक है देवांग गर्ग जी राधे राधे राधे राधे महाराज जी महाराज जी जानते हुए कि भगवान ही जो करते हैं वही होता है फिर भी मन कर्ता भाव से युक्त हो जाता है महाराज जी इस कर्तव्य इसी का नाम अज्ञान है इसी का नाम मोह हैय तुम्हारे नहीं सबके पूरे विश्व में हैय सारे विश्व में है और जब कर्ता भाव रहता है तो दो
ही कर्म होते हैं शुभ और अशुभ जब कृपा भाव आता है तब भजन होता है तो कर्ता भाव में ही पाप होते जैसे यह भाव आ जाए आपके अंदर कि सब कुछ श्री भगवान से हो रहा है तब आपके अंदर पाप वृत्ति नहीं आएगी अब गंदे आचरण नहीं आएंगे यह जो लोग गंदे आचरण करके कहते हैं ना कि भगवान की सत्ता के बिना पत्ता नहीं हिल सकता तो फिर ऐसे लोगों के लिए भगवान ने वीआईपी व्यवस्था नरक की भी की है भगवान ने तो बनाया तो भगवान को आप ऐसे देखो गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा
है भक्त का हृदय कैसा होता है गुण तुम्हार समझे निज दोष भगवान का गुण और अपना दोष समझे ही सब भाति तुम्हार भरो भक्ति बहुत पवित्र है यह गंदी वृत्तियां करके बोले भगवान ही सब करा रहे हैं ज्ञान बगते हैं और करते पाप है क्योंकि अहंकार का नाश नहीं हुआ ना साधना नहीं बनी तो बच्चा बिना साधना के अहंकार नष्ट होता अगर हम गुरु शरणागत होकर उनके कथन अनुसार भगवत भजन करें साधन करें तो धीरे-धीरे अहंकार नष्ट हो जाए बिल्कुल ऐसे दिखाई देता है जैसे कार में हम बैठे हैं ड्राइवर चला रहा है लक्ष्य की
तरह हम केवल बैठे हैं तो ऐसे दिखाई देता है हम केवल बैठे सब हो रहा है तभी तो कर्ता भाव और जब तक कर्ता भाव रहता है तब तक मूर्खता रहती है अहंकार विमु आत्मा करता हमति मनते मैं करता हूं मैंने ऐसा किया मैं ऐसा करूंगा य जब तक रहता है तो मढ़ता रहती है और मढ़ता जब तक रहती है तब तो घोरा ज्ञान ही है तो भले अच्छे-अच्छे कार्य करता हो लेकिन व अहंकारी है इसलिए अध्यात्म उसमें टिकेगा नहीं तो हमें लगता है बच्चा नाम जप करो शास्त्रों का स्वाध्याय करो सत्संग सुनो और अपने
जो कार्य में हो उस कार्य को पूजा समझो कोई न कोई कार्य तो करही रहे हो पढ़े लिख रहे होगे या कोई ना कोई व्यापार नौकरी कुछ ना कुछ वो पूजा है बड़ी ईमानदारी से वो पूजा करो भगवान उसी में प्रसन्न होते हैं छल कपट करके बोले थोड़ा इधर उधर झूठ कपट करके हम ज्यादा कमा लेे नहीं अध्यात्म वाला ऐसा नहीं वो भगवान 00 रुप में बहुत आनंदित रखेंगे और एक लाख रुप बेईमानी के लाओगे वो जला आएगा और भगवान से विमुख कर देगा तो चैन शांति चाहते हैं पर करते अधर्म है इसलिए अशांत और
बेचैन रहते हैं तो समझ पा रहे हो बच्चा जब तक साधना नहीं होगी तब तक ये अहंकार नष्ट नहीं होगा और साधना वो भी गुरु प्रदत्त मनमानी नहीं गुरु शरणागत होकर के तभी मान का नाश होता है गुरुपद पंकज सेवा ती शरी भक्त अमान अभिमान रहित होना मान रहित होना यह गुरु कृपा से होता है गुरु चरण रज लगेगी उनकी आज्ञा का पालन तो आपको यह अनुभव होगा कि हम तो नीच अधम है अगर हमसे कुछ अच्छा हो रहा है तो गुरु कृपा से हो रहा मेरे में बल कहां था मेरे तो गुरुदेव भगवान ने
कृपा करी तब ऐसा समझ पा रहे हैं आप सुनील कुमार हरि प्रसाद अग्रवाल जी राधे राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी हम जैसे एक साधारण मनुष्य के जीवन काल का सबसे सुखद क्षण है ये क्योंकि संत मिलन सम सुख जग मा नहीं श्री तुलसीदास जी ने भी रामचंद्र जी से नबधा भक्ति में कहा प्रथम भगति संतन कर संगा अब महाराज जी प्रश्न ये उठता है कि संत मिलन के दो कारण दर्शाए हैं बिनु हरि कृपा मिल ही नहीं संता पुण्य पुंज बिन मिल न संता मर जीी दोनों में क्या भेद
है हम कैसे अनुभव करें कि संत मिलन किसी पुण्य पुंज से हुआ है या हरि कृपा से से हुआ है जब भगवान कृपा करके बुद्धि शुद्ध करते हैं तब सत्कर्म बनते हैं जैसे गंगा स्नान करना दान पुण्य करना या जितने भी शुभ कर्म है उनमें प्रधान काम होता है बुद्धि का पवित्र विचार नहीं तो शुभ कर्म बनता ही नहीं है वो दिखावा बन जाता है तो जो पवित्र नदियों का सेवन तीर्थों का अवगाहन दूसरों की सेवा ये हमारे द्वारा जो हुई इसमें भी भगवान की कृपा है बिना भगवत कृपा के शुभ कर्म नहीं होते अच्छा
उन शुभ कर्मों का जब बहुत स्टाक हो जाता है तब भगवान उस पर दृष्टि ये डालते हैं कि ये बहुत पवित्र कर्म करने वाला है तो अब इसको आगे बढ़ाया जाए तो भगवान उसको आगे जही बढ़ाते तो उसमें शुभ कर्म उसके निमित्त बने और एक ऐसा होता है कि शुभ कर्म हो रहे हैं पर उसका बल नहीं उसको केवल भगवान का भरोसा है अब यह केवल कृपा पात्र है जैसे विभीषण जी शुभ कर्म हो रहे हैं उनसे भागवत की साधना हो रही लेकिन वह करता नहीं है कर्ता भाव में दिखा रहे हैं रावण के छोटे
भाई और प्रधानमंत्री है कहीं भी भगत की कोई भी झांकी नहीं है कि वो तिलक लगाए हो या उस शरीर में भक्ति का ऐसा धारण ही नहीं कर सकते लंका है लेकिन अंदर से वो भगवान के चिंतन में भरोसा एक मात्र भगवान का तो जब हनुमान जी के दर्शन होते हैं तब वो कह रहे हैं अब मोहे भाव भरोस हनुमंता बिनु हरि कृपा मिलेन और जिसे तपस्या है साधना है तीर्थ आटन है यह सब हुआ और उसके बल से जब किसी संत का मिलन होता है जैसे आज हम सत्संग में प्रारंभ में पहले पूज्य पाद
श्री प्रब उधान जी की चर्चा होती फिर उड़िया बाबा के वचन और फिर कथा थोड़ी देर होती तो कथा था कि पहले अक्रूर जी को चिंतन हुआ कि मैंने कौन सा ऐसा पूर्व जन्म में तप किया है दान किया है या शुभ कर्म किया है कि आज मैं भगवान के दर्शन पाऊंगा फिर कहा अरे नहीं नहीं मैं तो विषय जी हूं यह तो मेरे ऊपर भगवान की हेतु की कृपा हुई है दो वहां वहां भी कह रहे हैं कि अपनी तपस्या और शुभ कर्म पुण्य बल का स्मरण आया उनको फिर कहा नहीं नहीं यह तो
मैं विषय जीव अधम जीव भला भगवान के दर्शन इनसे कैसे हो सकते यह तो सिर्फ भगवान की कृपा है तो हम निर्णय निकालते हैं जब तो इसमें केवल केवल कृपा नजर आती क्योंकि वह जो पुण्य बना जिससे संत मिलेगा साधारण पुण्य से नहीं वह पुण्य भी भगवान की ही प्रेरणा से होता है तो हमें तो केवल कृपा नजर आती है केवल कृपा अगर किसी का पुण्य बल प्रकट भी होगा तो उसे स्वर्ग तक ले जा सकता संतो तक नहीं ले जा सकता तो हम उसी पुण्य को महान समझते जिसको भगवान ने प्रेरित करके करवा के
और भगवत भक्ति में लगा दिया उसे हम पूण्य मानते हैं लेकिन वो अगर केवल पुण्य का फल देखा जाए तो स्वर्गी और मृत सुख के सिवा संत समागम नहीं है पाप और पुण्य दो ही प्रकार के कर्म है जो स्वर्ग सुख और मृत सुख दे सकते हैं लेकिन उमा संत समागम समन लाभ कछु आन ये जब द्रव दीन दयालु राघव तो साधु संगति पाए हमारी तो भावना इस बात में जाती है कि अगर गोसाई जी ने पुण्य शब्द कहा है तो वह पुण्य शब्द वही होगा जिसे भगवान प्रेरित करके करवा रहे हैं जैसे भगवत भाव
से किसी की सेवा बन गई कोई बीमार पड़ा हुआ है भगवान द्रवित हो गए कि बड़ा दैन्य भाव से सेवा अब इसको साधु समागम मिलना चाहिए कोई ना कोई ऐसा क्रिया करवा दे भगवान वही करवा रहे क्योंकि हृदय में बैठ कर के वही तो है भगवान की पीठ से अधर्म उत्पन्न हुआ है और छाती से धर्म उत्पन्न हुआ है तो दोनों उन्हीं के तो है ठ पुतली को जैसे नचाए उमा दार जो सित की नाई सब नवत राम गोसाई तो राम गोसाई ने ऐसा पुण्य बनवा दिया जिससे साधु समागम हो गया उसमें राम गोसाई की
ही कृपा है दूसरे की हमें तो केवल कृपा नजर आ रही गोस्वामी जी जो पुण्य कह रहे उसी को भी कृपा समझिए बिना कृपा के नहीं हो सकता हां यह जरूर है कि जब तक श्रद्धा और विश्वास नहीं होगा तब तक संत समागम होने पर भी लाभ नहीं मिलेगा खल करे भली पाई सुसंग और मिटे न मलिन स्वभाव अभंग तो जरूरत है श्रद्धा और विश्वास भगवान से प्रार्थना करें कि हमारे अंदर संतों के प्रति श्रद्धा और विश्वास हो जाए बिना श्रद्धा अब आजकल ऐसी सीरियल चले हैं ऐसी सीरीज चली है ऐसी फिल्म बनाई जाती कि
साधु महात्माओं के मिटिया मेट हम यह नहीं कह कि गलत पक्ष नहीं है दोनों पक्ष है अगर दिन है तो अंधेरा भी है शुक्ल पक्ष है तो कृष्ण पक्ष है सही है तो गलत भी है असली है तो नकली भी है लेकिन असली को भी तो दिखाओ संतों के असली स्वरूपों को तो भी दिखाओ क्या हमारे भारत में असली नहीं रहे क्या ज्ञानदेव नामदेव सोपानदेव एक से एक तुकाराम एक से पूरे भारत में नजर डालिए मीरा जी श्री चैतन्य महाप्रभु एक से एक महापुरुष कभी नहीं दिखाएंगे व मतलब जिनके चरित्र देखकर हमारी बुद्धि भ्रष्ट हो
जाए और संतों से अ श्रद्धा हो जाए देखो समाज का सुधार दो से ही होगा शास्त्र और संत शास्त्रों में तुम्हारी पहुंच नहीं है तो संतों के वाक्यों पर श्रद्धा और विश्वास कर लो मंगल हो जाएगा भगवान की कृपा से य सब नहीं तो हम कह रहे हैं कि समाज भ्रष्ट होता चला जाएगा अगर संत वाणी का ब्रक नहीं लगेगा तो हमारा जीवन नरक की तरफ चला जाएगा आज कितने भाई ऐसे हैं जो ब्रक लगा पाए और आगे निकल पाए नाना प्रकार के गलत आचरण से तो अगर संतो का स मिल जाओ श्रद्धा विश्वास हो
बिन विश्वास भगति नहीं ते बिन द्रन राम राम कृपा बन सपने जीवन ल विश्राम विश्वास मेन बात है हित ध्रु जो विश्वास है तही सुधरे बात नात माया पंथ में फिरे टक्कर खात अच्छा एक बार हमने किसी गलत को देख लिया तो वोह रंग ऐसा चढ़ता है कि सब संत ऐसे नजर आने लगते हैं आने लगते हां तो ऐसा नहीं है हम ये नहीं क कि हम सत्य सांग ऐसा नहीं है नकली है तो उसका अस है खोजो अब ऐसे मिल जाएगा आप जाओ तो नकली आभूषणों की जो स्वर्ण आदि की नकली आभूषणों की दुकान
है उसमें भीड़ ज्यादा मिलेगी और जहा असली हीरे की ला वहा पहुंचना जेब की दम वाले की बात है तो अब हम कह सकते पूण पुंज बिन मिल जेब में दम है तो संत मिल जाएंगे ज में दम क्या आपके सत्कर्म आपका भगवत भाव तो आपको भगवान मिला देंगे संत और एक होता है भगवत आश्रय आश्रित जनों को भगवान अपनी कृपा से संतों से मिलाते हैं नहीं भगवान के आश हम तो संतो की जूठन और संतो की चरण रज अपने तो ना पढ़े लिखे हैं और ना कोई मतलब ज्ञान है हम तो यह देख रहे
हैं कि संत चरण रज भगवत कृपा अंदर बैठ कर के बुलवा रही नहीं हमको हम कोई पढ़े लिखे नहीं हम कक्षा नौ पढ़े गांव के गांव के कक्षा नौ पढ़े हम कोई व्याकरण आचार्य या पीएचडी या डिग्री सब कुछ कुछ नहीं पढ़े लिखे एक आए थे कहां के पीच व डिग्री देने मरजी व इधर कानपुर एक यूनिवर्सिटी थी हां वो आए थे कहते डिग्री दो हम हमारी डिग्री हमारी डिग्री अरे हम भगवान के दास है इससे बढ़कर कौन सी बात होगी परमेष्ठी पद ब्रह्मा जी का भी भगवान के दासत में नहीं आता हम हरि के
दास है इससे बढ़कर हमारे हमारे लिए अपमान है सब पद न पारम न महेंद्र नम न सार्वभौम र साधि पत्य यो सिद्धि अपन भव वा हम भगवान के दास है भगवान ने मुझे स्वीकार कर लिया इससे बड़ी और कौन सी डिग्री होगी मतलब भगवान के दास है हम इससे बढ़कर कोई डिग्री नहीं और भगवान अपने दास से सब करे करावे आप सब और जने बढ़ाई दे बढ़ाई हो रही कौन बोले प्रेमानंद और कर कौन रहे हैं वो आप बैठ कर के करे करावे आप सब जने बढ़ाई ये उनकी करुणा ये उनका दुलार है नहीं कौन
पूछे भाई वही भगवान सब कर रहे हैं अब कितने हजारों लोग कहते हैं हमारे स्वप्न में आप आए हम गए होते तो हमें पता होता ना हमें तो पता नहीं मेरे भगवान जाकर आकर्षित करते भगवान शब्द बुलवा जिससे आपको व शब्द खींच कर के ला रहा है वो सारा खेल भगवान का है अपने तो केवल निमित्त मात्र है जैसे तिनका उड़ कर के मंदिर की चोटी में बैठ जाए जाके फिर मुछ ठे कि भाई हम उड़ के आ गए तो बेईमानी है यह वायु की कृपा है जो तिनका मंदिर की चोटी पर बैठा ऐसे भगवत
कृपा है जो ऐसे को भगवान ऐसा बला दे वो उन्ही का खेल है जो ब्रह्मा को मच्छर बना दे मच्छर को ब्रह्मा मसक करे रंज मकते हील ऐसे भगवान सर्व सामर्थ शली अनमोल गर्ग जी हरिद्वार राधे राधे राधे राधे महाराज जी महाराज जी कीर्ति अकीर सफलता असफलता के चक्र से कैसे बचे ऐसे बचे जोई जोई प्यारो करे सोई भावे जब इस पर आ जाओगे तो भावे मोहि जोई सोई सोई करे प्यारे अगर मेरे प्यारे मुझे अपकीर्ति दिए हैं बहुत मंगल विधान है बिना भोगे हमारे सारे पाप नष्ट हो गए निंदा से एक अयोध्या का प्रसंग
है वशिष्ठ जी कुल गुरु थे तो पूर्व किसी पाप के कारण उनको गलित कुष्ठ था तो सभा में भी जाने से वो बहुत संकुचित होते तो वशिष्ठ जी से कहा इससे तो अच्छा है मृत्यु आ जाए उ कहा नहीं मृत्यु तो नहीं आएगी अभी तो उन क प्रभु कोई औषधि या कुछ ऐसा जिससे गलित कुष्ठ बोले औषधि भी काम नहीं करेगी एक काम करेगा तुम्हारी निंदा अयोध्या में होने लगे तो तुम गलित कुष्ठ से रहित हो जाओगे उ कहा प्रभु ऐसा कौन सा आचरण करूं तो बोले अगर गलत आचरण करोगे तो नष्ट ही नहीं होगा
तो बोले अच्छा आचरण करेंगे तो बड़ाई होगी निंदा कहां से होगी तो वश जी ने विचारा जो पहले राजा थे बड़े भाई वह पधार चुके थे युद्ध में उनकी पत्नी थी बोले दो घंटे जाकर रामचरित सुनाया करो दो घंटे 8 से 10 बजे तक रात्रि में रोज महल जाओ और उनको रामचरित्र सुनाओ अब धीरे-धीरे जो गेटमैन थे उनसे धीरे-धीरे समाज में फ किर बहुत नीच राजा है भाभी तो मां के समान होती है और यह दो घंटे रहता है ले जाता है इसका मतलब कोई पवित्र भाव से थोड़ी जाता होगा राजा है भाई अ पूरे
नगर में निंदा है फैलने लगी कि यह जो राजा है तो बहुत अपवित्र आचरण वाला है अपने और वो जा के रामचरित मानस सुनाते सारा गलित कुष नष्ट होने लगा अब एक महीना में उन्होंने कहा गुरु जी अब सहन नहीं होता इतनी निंदा हो रही है कि सहन नहीं होता है और ये नाक का गलित कुष्ठ जा नहीं रहा है तो बोले नाक वाला नहीं जाएगा अगर हम तुम्हारी निंदा कर दे तो अभी नाक का चला हम जानते हैं तुम गलत कार्य नहीं किए फिर पूरी सभा को बुलाया जब गलित कुष खत्म हो गया और
उनकी भाभी को बुलाया और कहाय दो घंटे क्या करते तो गुरु जी यह रामचरित मानस सुनाते हैं जाकर तब पूरी सभा तो जब पूरे अयोध्या में निंदा फैली तो उनका गलित कुष्ठ चला गया तो अगर हमारी निंदा हो रही तो हमारा कोई जो शारीरिक दंड होने वाला है वोह भगवान निंदा के द्वारा हटा दिए अच्छा हमसे जो हार हुई जैसे हम कहीं हार हो ग हमारी हार हो जाती है तो हमें विचार करना है कि हमारे अभ्यास में हमारी क्रिया में कोई चूक रही है चाहे हम पढ़ाई में हो चाहे खेल में हो चाहे कृषक
में हो चाहे व्यापार में हो हमें कोई अनुभवी का आश्रय लेकर हमें अभ्यास प्रण अपने अभ्यास में त्रुटि ना हो प्रमाद ना हो चाहे पढ़ाई कोई भी हो तो हम हार नहीं सकते पक्की बात है अगर आज हारे हैं तो हम अपनी त्रुटि को छिद्र को देखें कि कौन सा प्रमाद हुआ जो मैं हार गया अगली बार जीत जाओगे अभ्यास योग युक्त अभ्यास योग से युक्त हो जाओ तो कुछ भी कर सकते हो कुछ भी कर सकते हो बहुत बड़ा बल अभ्यास में है इसलिए हम ऐसे विवेक के द्वारा और यह तभी होगा जब भजन
होगा अगर नाम जप नहीं होता तो बातों से नहीं होता जिस समय हारोगेट ने से आएगा और विचार पूर्वक विचार से चलने से आएगा और भगवान की सब में कृपा है हार में भी कृपा है जीत में भी कृपा है हानि में भी कृपा है लाभ में भी कृपा है पर वह विवेक होना चाहिए जो कृपा देख सके जैसे एक राजा के मंत्री थे वो बड़े सत्संगी थे तो उनका अभ्यास पड़ गया था कि जैसे कुछ भी हो ते भगवान की बड़ी कृपा तो राजा के साथ शिकार खेलने गए थे प्रत्यंचा खींची और चूक हो
गई तो अंग उठा य से कट गया तो उनका मंत्री अंगूठा कट गया तो उने कहा महाराज भगवान की बड़ी कृपा बो मेरा अंगूठा कटा और तू कह रहा भगवान की कृपा इसको जेल में डाल दो बोले यह भी भगवान की बड़ी कृपा उनको अनुभव था कि मंगल भवन भगवान से कभी अमंगल हो ही नहीं सकता वो सत्संगी थे अब वो तो तुरंत राज आज भी है कि अगर हाथ कट जाए तुरंत उसको डॉक्टर के पास ले जा जाए विज्ञ डॉक्टर हो तो हाथ संचालन कर और उस समय तो औषधियों का जोर था अंगूठा कुछ
दिन में ठीक हो गया फिर शिकार खेलने गए तो कुछ सैनिक संघ थे मंत्री तो जेल में थे तो सैनिक पीछे रह गए उनका घोड़ा आगे बढ़ गया तो दूसरी सीमा में एक मनुष्य को ढूंढा जा रहा था नरबली देने के लिए तो जोही राजा को देखा तो दूसरे राजा ने अपने सैनिकों के साथ उनको कवर कर लिया कि इससे बढ़िया क्या होगा पड़ोसी राजा अब राजा को पकड़ लिया गया बंदी बनाकर ले गए स्नान आदि कराया और जब बलि के लिए ले जाने लगे तो देखा अंगूठा में कटे का चिन्ह तो उसी की बलि
चढ़ाई जाती है जो तनिक भी अंग भंग ना हो तो उन्होंने कहा भाई ये तो बलि देने लायक नहीं छोड़ो इसको छोड़ दिया अब उनको लगा यार मंत्री ने ठीक कहा था अगर अंगूठा ना कटा होता तो गला कट जाता भगवान की बड़ी कृपा लेकिन मंत्री जेल में सड़ रहा है मंत्री पद से हटकर जब उसको जेल में डाला तो उसने कहा बड़ी कृपा अब गए सीधे मंत्री को बुलाया और कहा भाई हमारा अंगूठा अगर ना कटा होता तो गला कट जाता पूरी बात बताई लेकिन तुम जेल में सड़ रहे हो ये कौन सी तुम्हारी
कृपा बोले महाराज मैं मंत्री हूं सैनिक कहीं भी पीछे रह जाते मेरा घोड़ा आपके साथ होता और आप बंदी बना जाते मैं बना आप आप तो अंगूठे के कटे होले से बच जाते लेकिन मेरी बली चढ़ जाती तो भगवान ने मुझे जेल में रखा है बड़ी कृपा तो अगर हम वास्तविक विश्वास करें तो भगवान जो करते हैं उसमें कृपा ही है पक्का कृपा है उसमें हम संशय ना करें भगवान के भरोसे रहे नाम जप करें हम वर्तमान की स्थिति को अ मतलब प्रतिकूल है तो हम समझते हैं यह क्या भगवान की कृपा होगी लेकिन परिणाम
में निश्चित भगवान की कृपा है आगे चलकर विवेक से देखेंगे तो भगवान की कृपा है मेरे प सा पहली बार दे इन्होने कोई कलरफुल बाबाजी ढूंढनी है पहली बार तो मैंने सोचा की चार दिन कात है उ तो धीरे धीरे सत्संग चने घर बदलने लग और मैं सिख परिवार से हूं मीडिया में हू फिल्म करती हूं सफी सूफी धारणा की हूं एक्चुअली तो जब मैंने एक बार चतुरा जी सुनी मेरे बेटा चतुरा जी के इतने पद बोलता था मैंने पहली बार उसे सुना हैरान हुई और मैंने कभी चतुरा जी पढ़ी नहीं कभी सुनी नहीं और
आज मैं जब पढ़ती हूं तो रात को उठती हूं तो मेरे अंदर चती च कपा ऐसा बहुत कृपा जैसे 12 प मैं रात को सोते वक्त टाइम नहीं होता सारा दिन रात को सोते वक्त क्या है की मैं पती व साथ में पता है पूरी चतुरा जी का टाइम नहीं होता बस ये मन में डर लगा रहता है कि चतुरा जी चले चलती रहे हा बहुत कृपा है अगर स्वत जैसे चलने लगी ना तोय समझो श्री जी की बहुत कृपा है सिद्ध वस्तु है हा और सेव सेवक जी कह रहे प्राण रम रही हरिवंश वाणी
बड़ी आप पर कृपा है कलरफुल तो है ही प्रिया प्रीतम का प्रेम का रंग चढ़ हमारा नाम जानते प्रेमानंद है प्रेम का आनंद प्रेम है प्रियाज और आनंद लाल वैसे कलरफुल तो [हंसी] है बराजू बैठ जा एक निवेदन था इस दक्षिणा के स्वरूप में आपको कुछ मंत्र अर्चन करना चाहते हैं आपके सम तांडव स्तोत्र सुना दे आपकी आज्ञा हा सुना दो सुना ओ जोम सा ओम भूर भुव स्वा ओ त्रमं जजा महे सुगंध पुष्टिवर्धनम उव बंधन मुय मामता ओ स्वा ृ नम महाकालेश्वराय नम नील कंवरा नमः रावण कत श्री शिवतांडव स्तोत्र द्वारा अर्चन ओ जटा
प्रले भज मालि तांडव न लरी विराजमान मुध गगगग पाव किशोर चंद्र शेखरे राध नंदने विलास बंधु बंधुर दिगंत संत प्रमोद मान मान कृपा कटाक्ष धोरण निगरे मनो विनोद मेने ज भुजंग पिल मण प्रभा कदम कुक मुखरे मनो विनोद मत भूत लोचन प्र धरण विंग माया जारा जा बु शरा ला नित पंच सायक यकम सुम लेया विराजमान शेखर महापा संपद शल मस्तु करल पिका गग धनंजया कता प्रच पंच साय धरा धरने चत्र पत्र प्रकल्प शिल्प लोचने तिमान मेघ मंडले निषे तमा प्रं कंधरा निप धरेरा सुरा कला निधान बुरा श्रीयम जगत ररा प्रभु नील पंकज प्रपंच कालि
प्रभाव कं कले रु प्रव कम पुरम बम मम गज कमम अव सर्व मंगला कलाकम मंजरी रथ प्रवाह माधुरी विणा मधु स्तक पुतम भवाम मतम गजात भम भुजंगम निर्गम कमरत करल मंग कमा प्रवर्तित भुजंग रत्न यो ंद प्रजा महे महेंद्र सव क सुध कोर्म सदा मलिल लोचन लगन मंत्र मुच भवा मुक्त उत्तम पम विशुद्ध हरे गुर सु भक्ति माया विमोह विकर पूवन सम दव गतम शंभु पूजन परम प प्रद सरंग लक्ष सव सुख लक्षमी सद वस मुखे ा सुध जगद नम देव नमो नमः नम पा महाकाल महाराज की जय नीलकंठेश्वर महा व की जयन निर्वाण रूप
विपका ब्रह वेद स्वरूप निम निर्गुण निर्विकल्पम निरीह जिदा काश महाकाश भजे निराकार ओमकार मूलम तुरे गिरा ज्ञान गतिता शम गिरी कराल महाकाल कालम कृपालम गुणाकार संसार पमन तो तुषार द शंका गरम गंभीरा मनो भूत कोटि प्रसी शरी मलिका लोनी चारु गंगाल सद भाल भाल कंठ उजा चलत कुंडलम बसम विशाल प्रसन्नन नील कंठम दयाल गाध चरमा बम मुंड माल प्रियम शंकर सर्व नाथम भजामि प्रचंड प्रकट प्रगल्भ परे अखंड मजम भानु कोटि प्रकाश ल निर्मूलन शल पाण भजे हम भवानी भाव कलात कल्याण कल्पा कारी सदा सज्जना नंद दाता पुरारी चिदानंद संध मोह पहारी प्रसिद्ध प्रसिद्ध प्रभु मनम
धारी नया वधु माना अरविंद भजन हलो के परवान राणा नवत सुखम शांति संताप नाश प्रसिद्ध प्रभु सर्व भूता दिवासा न जानम योगम जपम नव पूजन तो हम सदा सर्वदा शम भुतो जरा जन्म दुख मान प्रभु पाहि आप प्रभु पाहि आप नमाम शंभु प्रभु पाहि आप [प्रशंसा] प्र शनम पार्वती पत हर हर महादेव कृष्णाय वासुदेवाय हरा परमात्मने गोविंदाय नमो नम सदगुरु भगवान की आनंद बरसा दिया य महादेव का चढ़ा हुआ है अंग वस्त्र है बहुत सौभाग्य जय जय श्री राधे बोल महाकाल महाराज की जय साक्षी जी सनी दावास जी राधा वल्लभ श्री हवं महाराज जी राधे
राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी हम 17 साल से ऑस्ट्रेलिया में रह रहे हैं पहले लगता था जिंदगी में सिर्फ काम करना है और अर्थ कमाना है 2 साल पहले आपसे मिले आप और श्री जी से आपने मिलवाया अब लाइफ में बहुत सुकून और शांति है महाराज जी अब हम दोनों का भाव यह है कि हम वापस भारत आकर भक्ति मार्ग पर आगे बढ़े पर फिर भी ऐसा कि हम अपने कर्म से तो नहीं भाग रहे कर्तव्यों से तो नहीं भाग रहे क्या भारत में अर्थ नहीं है क्या भारत अर्थहीन
देश थोड़ी है कायता का एक भाव आता है कि कहीं हमारा जै नहीं नहीं नहीं परम कर्तव्य के लिए जो कदम उठाता है शूरवीर होता है कायर नहीं होता भोगों के प्रति जो कदम उठाता है परम कर्तव्य का त्याग कर उसे कायर कहते हैं यह थोड़ी कि हम भगवत मार्ग के लिए चले तो हम कायर कह जाएंगे नहीं नहीं ऐसा नहीं बच्चों के लिए महाराज जी जैसे दो बच्चे हम ये कह रहे हैं कि जो कार्य कर रहे हो क्या वो भारत में नहीं होता क्या अर्थ की अर्थ की इतनी कोई प्रॉब्लम नहीं है महाराज
जी अर्थ के लिए हम निश्चिंता पूरी तो धर्म के लिए तो विदेश के लोग आते हैं भारत में अपने धर्म अंकुर जागृत करने के लिए अगर कहीं विश्व में विशेष धर्म का प्रकाश है तो भारतीय ऋषि मुनि का प्रभाव होगा नहीं स्वर्ग नर्क से आगे बढ़कर कोई बात नहीं है स्वर्ग नर्क से बढ़कर कोई बात ही नहीं है मोक्ष और परम पद और प्रेम ये केवल भारत के दिव्य ऋषियों की अनुभूतियां है अगर कहीं भी कोई इस चल रहा है तो भारत के ऋषि की अनुभूति होगी तो अर्थ की जब कोई बात नहीं तो धर्म
की बात फिर स्वीकार करने में क्या इसकी चाहट है जैसा आपने दिया आप विचार कीजिए नहीं आप विचार कीजिए अपने ये बस प्रश्न हमें वो कर रहा था कि बच्चे जैसे बाहर है तो उनको अब हम लेकर आएंगे या उनको छोड़ के नहीं हम यह जानना चाहते हैं कि विदेश भोग प्रधान है भोग की बाहुल्य हो सकती है लेकिन भारत देश धर्म प्रधान है अब देखो वहां के हमने तो कभी गए नहीं हम कभी देखा नहीं हम तो सुनी बात कह रहे आप उसको सपोर्ट कर पाए वहां कहते हैं कि कोई भी किसी भी तरह
की धर्म मर्यादा नहीं आज आप के साथ कल आपके साथ घूमू कोई परेशानी नहीं बकुल ऐ ऐसा है ना हमारा भारत देश इसे स्वीकार ही नहीं करता है हमारा भारत देश स्वीकार करता है कि एक बार हाथ पकड़ा जिंदगी निर्वाह कर देंगे अगर तुम्हारा कैसा भी स्वभाव हो हम दोनों मिलकर के चलेंगे और पूरे जीवन भर साथ रहेंगे पवित्रता है ना कि प्रेम में सुख है या केवल भोग में सुख है आप सोचो केवल भोग तो राक्षस वृति है प्रेम प्रेम क्या यह बर्दाश्त कर पाएगा कि जिसको हमने अपना जीवन दिया वह किसी दूसरे के
साथ हमें खड़ा दिखाई दे या खड़ी दिखाई दे प्रेम कहां होगा तो अगर गृहस्थ भी यहां की भारत की है तो पवित्र है एक पाणी ग्रहण संस्कार मात्र से आजीवन के दुख सुख का साथी बन कर के और निर्वाह करना कितना सुख है अब बाहर की आधुनिकता आज प्रवेश कर रही है अब बॉयफ्रेंड गर्लफ्रेंड लिविन रिलेशन तो क्या कहते हैं हां आप समझो ये भारत है यहां की एक मर्यादा है यहां वीर सती हुई हैं यहां वीर यती हुए हैं यहां की तुलना कर और हमारा देश धन से कभी गरीब नहीं रहा बहुत बार लुट
चुका है लेखों ने लुटा अंग्रेजों ने लुटा बहुत बार लुट चुका है पूरा देश इसलिए कोई हम गरीब देश के नहीं है भारत को वैसे कहावत में पुराने लोग कहते थे सोने की चिड़िया है नहीं तो हमारा देश कोई निंदनीय या गरीब या ऐसा देश नहीं आज भी गरीब नहीं है आज भी गरीब नहीं भारत भारत है महाराज जी एक्सप्लेन भी करना आपकी कृपा से मैंने शराब छोड़ दी बच्चों के लिए नॉनवेज सब कुछ छुड़वा दिया उनको समझाना भी अब जैसे जाते हैं कि विदेश भी छुड़वा देंगे तुम्हारा बस सबसे प्रार्थना हमारी यही है मनुष्य
जीवन एक आनंद का जीवन है आनंद के लिए आप गलत रास्ता चयन मत करें शराब पीना नशा करना पराई बहन बेटियों की तरफ गंदी देखना किसी तरह से धन को शोषण वृत्ति से लेना घूस लेना यह सब कोई भी हो कहीं भी हो अधर्म आचरण कभी आनंद नहीं दे सकता यह दिमाग में बैठा लो और धर्म भले तुम्हें दुख दिखाई दे रहा है लेकिन वह आनंद की प्राप्ति कराएगा धर्म सदैव जय पर विराजमान होता है और अधर्म सदैव पराजय को प्राप्त होता है इसलिए अगर हम आप मिले हैं तो भगवान बड़ी कृपा से परम पावन
भूमि वृंदावन में संत समागम बैठकर कर रहे हैं तो हमारा आपका परिवर्तन होना चाहिए हमारे आपके मिलन में कुछ जादू होना चाहिए नहीं होना चाहिए कि भाई संत संग किया तो हमारा जीवन परिवर्तन हुआ तो कोई भी गंदे आचरण की तरफ कदम उठाए तो पहले हमारी बात को सुन ले कि वो उसका ही सर्वनाश करेगी वो आचरण वृत्ति उसको ही गिराए गी उसको ही दुख देगी इसलिए सबसे पहले अंदर जो सदगुरु गुरुदेव बैठे हैं उनकी बात सुनो ज आप गलत कदम उठाओगे अंदर से आएगा गलत है नहीं ब उनकी बात मान लो सबके अंदर आता
है ना भगवान गुरुदेव सबके अंदर बैठे हुए उपदेश देते हैं अच्छे बनो स्वस्थ रहो सुखी रहो और इसी जन्म में भगवान की प्राप्ति हो जाए यही हमारे जीवन का लक्ष्य है आप खूब आनंदित रहोगे यदि हमारी बात मानोगे आप मान के देख लो कोई पैसा तो लगता नहीं बातें तो माननी है तो इसलिए आप लोग इसका आनंद लीजिए इसको आनंद का स्वरूप है सत्य धर्म अच्छे आचरण अगर यह रहेगा ना तो किसी से आशीर्वाद मांगने की जरूरत नहीं नहीं चाहे जहां गघ आया हो हाथ रखवाया हो कुछ परिवर्तन हो जाए तो हमें बता देना आपको
अपने आचरण सुधारने होंगे आपको भजन करना होगा आपको दूसरों का उपकार करना होगा सब आशीर्वाद आपके पास आ जाएंगे सत्य में चलोगे तो अंतर से आशीर्वाद सबका आएगा जितने व्यक्त अव्यक्त महापुरुष है जैसे समुद्र अपनी मर्यादा में रहता है और नदियां उफान करती हुई वहां पहुंचती है ऐसे धर्मात्मा पुरुष जो गंभीर भजना नंदी और धर्म से चलता है सब ईश्व वैभव सबके आशीर्वाद अपने आप आ जाते हैं समुद्र बुलाता किसी को नहीं है जैसे पुष्प में पराग आ जाने पर भौरे स्वयं मनरा लगते हैं ऐसे ही तुम्हारे अंदर जोही भगवत निष्ठा धर्म निष्ठा जागृत होगी
सब ऋषि मुनियों की कृपा पर आ जाएगी देखो जामवंत कहा सुन रघुराया जा पर नाथ करहो तुम दाया ताही सदा शुभ कुशल निरंतर सुर नर मुनि प्रसन्नता ऊपर सोई विजय बनई गुण सागर तास सुजस त्रिलोक उजागर नाथ आप जिस पर कृपा कर दो तो जो धर्म से चलता है भगवान का आश्रय लेता है सब आशीर्वाद सब मंगल उसे घेर लेते इसलिए अच्छे से चलो गलतियों से बचा जाए भगवान का भरोसा रखकर हम में तो बल नहीं भगवान का बल भगवान का स्मरण भगवान का नाम जप हमारा मंगल कर देगा राधा राधा राधा राधा राधा राधा
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