कि बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम बॉयज नासरीन अस्सलाम वालेकुम मैं हूं आदिल जहांगीर वेलकम टू इन फॉरेस्ट आदिल कि नसरीन मुगलिया सल्तनत की बुनियाद जहीर उद्दीन बाबर ने सन 1526 में पहली जंग पानीपत में दिल्ली सल्तनत की आखिरी सुल्तान इब्राहिम लोदी को शिकस्त देकर रखी थी है और मुगलिया सल्तनत का स्थित आम सन अट्ठारह सौ सत्तावन इस बीच की जंग ए आजादी के बाद आखिरी मुगल हुक्मरान बहादुर शाह जफर पर हुआ था थे तकरीबन तीन सौ इकत्तीस साला दो हुकूमत में 19 मुगल हुक्मरान तख्त नशीन हुए और मुगलिया सल्तनत अपने कुरूद में तकरीबन पूरे शरीर पर हुकूमत करती रहेगी
यानी मौजूदा दौर के अफगानिस्तान पाकिस्तान भारत और बांग्लादेश के मालिक प्रमुख तमिल सारे स्थिति पर उनका दौड़ा दौड़ा था एक नजर इन आज की इस वक्त सर वीडियो में हम आपको मुगलिया सल्तनत के विरुद्ध वालों की मुकम्मल दास्तान और तमाम हुक्मरानों का मुकम्मल तारूफ और तारीख की दस्तावेजात में से हालात ए जिंदगी की झलकियां दिखाएंगे अगर वीडियो का बाकायदा आकाश करने से पहले अगर आप हमारे चैनल पर नए हैं तो बराए मेहरबानी हमारा चैनल इन्फो अ आदिल सब्सक्राइब करें जहां आपको बिल्कुल जूस इस्लामिक हिस्ट्री और विलोम दुनिया भर की मुनफरीद मालूमात पर हम की जाती
हैं एक नजर इन जहीरुद्दीन बाबर मुग़ल एंपायर कप पानी और सन 1526 से सन् 1530 तक हिंदुस्तान का पहला मुगल हुक्मरान था वह अमीर तैमूर की 5 मिनट असल में 14 फरवरी संत 1483 को रियासत यह गाना के दारुल हुकूमत में पैदा हुआ जबकि बाबर की वालिदा चंगेज खान की नस्ल से थी और यु बाबर की रगों में 2 बड़े खाते ही न अमीर तैमूर और चंगेज खान का खून शामिल था बाबर का बाप उमर शेख मिर्जा पर गाना का हाकिम था नरेन बाबर का असल नाम जहीरुद्दीन था मगर उसकी मां उसे प्यार से बाबर
यानि शेर कहती थी बाबर की उम्र बराबर थी के बाप का इंतकाल हो गया चर्चा और मामू ने स्वराज भरपाई कर दी जिसकी वजह से 11 बरस बाबर परेशान रहा है तो कभी तक पर कब्ज होता और कभी भागकर जंगलों में रूपोश हो जाता बिलआख़िर सन 1504 में बाबर बल और काबुल कहा कि बन गया और मुख्तलिफ इलाकों को फतेह करता हुआ हिंदुस्तान पहुंचा था ए नाज़नीन सन 1526 को सलतनते दिल्ली के हाथ केंद्र इब्राहिम लोधी के खिलाफ मशहूर एक ज़माना पानीपत जंग में बाबर ने अपनी फौज से दस गुना ताकतवर शख्स बात से जंग
लड़ी और उन्हें मगुलु कर दिया है क्योंकि बाइबल के पास बारूद और तो पे थी जबकि इब्राहिम लोधी के पास हाथी थे जो तोप की आवाज से बुध कर अपनी ही पौधों को रोंगटे सुल्तान इब्राहिम लोदी मारा गया और बाबर फातिर हां पानीपत की जंग में सफलता पाने के बाद बाबर ने हिंदुस्तान में मुग़ल एंपायर की बुनियाद रखी बाबर ने हिंदुस्तान में अपनी फोटो हाथ का सिलसिला जारी रखा और मुग़ल एंपायर काबुल से बंगाल और हिमालया से ग्वाल याद तक फैल गई तस्वीर उभरी उसकी मशहूर तसरीफ है जिससे पता चलता है कि वह न सिर्फ
तलवार का धनी था बल्कि कलम कभी बादशाह था ए पारसी और तुर्की जवानों का शायर भी था और मौसी की से भी खासा शौक था नरेन जहीर उद्दीन बाबर की मौत के मुतालिक जहीर उद्दीन बाबर की बेटी गुलबदन बानो अपनी किताब हुमायूंनामा में लिखती हैं कि बाबर का बेटा हू माई हू सदी बीमार था और बाबर ने अपने लख्ते जिगर की चारपाई के गिर्द चक्कर काटकर दुआ की कि ऐ परवरदिगार ए आलम मेरे बेटे की बीमारी मुझे लगा दे और मेरे हिमांशु को शहद चटाकर चुनाचे बाबर की दुआ कबूल हुई और हुमायूं अच्छा होता गया
और बाबर की हालत ख़राब होना शुरू हो गए जहीर उद्दीन बाबर 26 दिसंबर सन् 1534 को आगरा में इंतकाल कर गया और हस्बे वसीयत काबुल में दफन हुआ है के नजदीक 29 दिसंबर सन् 1530 को शहंशाह बाबर की वफात के तीन रोज बाद उनके 22 साल भर यह हद और बड़े बेटे शहजादा नसीरुद्दीन हिमांशु को मुग़ल एंपायर का हुक्मरान बनाया गया भाइयों ने संत 1534 से 1540 और संत 1555 से 1556 तक हिंदुस्तान पर हुकूमत की नर्सिंग विषय में मिला हुआ तक हिमांशु के लिए फूलों की सेज साबित नहीं हुआ बल्कि हुमायूं के तख्त नशीन
होते ही बहुत मुश्किलात का सामना करना पड़ा उन मुश्किलात से नफरत आजमा होने के लिए सियासी बसीरत और काबिलियत की जरूरत थी मगर हुमायों अजमो इस्तकलाल से आ रही था एक तरफ तो हुमायूं को बैरूनी दुश्मनों का सामना था तो दूसरी तरफ अपने ही भाई तक की लालच में हुमायूं के खून के प्यासे थे कि दादरी अनशन 1539 में हुमायूं और शेरशाह सूरी के दरमियान जन्म उपायों को शिकस्त हुई और शेरशाह सूरी ने हिंदुस्तान पर क़ब्ज़ा करके हुमायूं को हिंदुस्तान से भगा दिया कि शेरशाह सूरी के बाद उसका बेटा सलीम शाह सूरी हातिम बना मगर
उसकी वफ़ा के बाद सूर्य खानदान कमजोर तर हो गया और हुमायों सन 1555 के आगाज पर 14 साल की जिलावतनी के बाद दरिया-ए-सिंध को पार करके दिल्ली पर कब्जे के लिए आ गया पहले लाहौर फतेह किया और फिर दिल्ली और आगरा को भी पता कर लिया मगर हुकूमत उसके नसीब में न थी जनवरी सन् 1556 में उसे तख्त नशीन हुए अभी छह माह ही हुए थे कि एक दिन अपने को तक खाने में बैठा मुतालिक कर रहा था कि आज आने मगरिब की आवाज़ उसके कानो में पड़ी तो वह तेजी से मस्जिद की तरफ लपका
उसे ठोकर लगी और सीढ़ियों से फिसल कर दौड़ता हुआ नीचे आ गिरा 19 जख्मों से चंद रोज बाद उसका इंतकाल हो गया के नजदीक मशहूर यह आरपी मौर्या एक लिंक पोल के मुताबिक उसने तमाम उम्र ठोकरें खाई और बिलआख़िर ठोकर खाकर ही मरा था के बाद अब बामुलाहिजा होशियार परेशान हिंद सारे तक तितली-सा ने फ़रमाया ने मुरलिया जिल्लेइलाही जहांपना जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर तशरीफ ला रहे हैं मैं नागिन मुगल सल्तनत के तीसरे हुक्मरान जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर ने हिंदुस्तान पर सन् 1556 से लेकर 1605 तक भूख मर यानी कि अकबर हुमायूं का बेटा था हुमायूं ने अपनी
जिलावतनी के जमाने में सिंध के तारी ही शहर दादू के काव्य पाठ की औरत हमीदा बानो से शादी की थी अकबर उसी के बर्तन से सन् 1542 में उम्र कोर्ट के मकान पर पैदा हुआ अकबर को अपने बाप हुमायूं की मौत की खबर कल अनुसार जिला गुरदासपुर में मिली बैरम खान ने वहीं * का एक चबूतरा बनवा कर अकबर की रस में तक नशीनी अदा की और खुद उसका सरपरस्त बना था आज तक नसीब होते ही चारों तरफ से दुश्मन खड़े हो गए टिंवकल को पानीपत की दूसरी लड़ाई में शिकस्त दी मशरक में आदिलशाह सूरी
को खेड़ा फिर उसने अपनी सल्तनत को वह सब देनी शुरू कर दी सन् 1556 में दिल्ली-आगरा पंजाब फिर बवाल यार अजमेर जौनपुर बैरम खान ने फतेह किए 1562 में मालवा 1564 में गोंडवाना 1568 में चतुर 1569 में रंगम पुत्र और अल नजर 1572 में गुजरात 1576 में बंगाल 1585 में काबुल कश्मीर और सिद्ध संत 1592 में उड़ीसा 1595 में कंधार का इलाका फिर अहमदनगर असीरगढ़ और दक्कन के दूसरे इलाके फतेह हुए और अकबर की सल्तनत बंगाल से अफगानिस्तान तक और कश्मीर से टक्कर में कि दरिया योग गोदावरी तक फैल गई नजर अकबर ने एक हिंदू
औरतों जोधाबाई से शादी की जो उसके बेटे जहांगीर की मां थी जोधाबाई ने मरते दम तक इस्लाम कुबूल नहीं किया था कि दीन-ए-इलाही के नाम से अकबर ने एक नया मजहब भी जारी किया जो एक इंतिहा पसंद आना एकदम था और अकबर के हिंदू रत्नों की मुसलसल कोशिशों का नतीजा था दीन-ए-इलाही की वजह से अकबर मुसलमान उमरा और गुर्जर गाने दीन की नजरों में एक नापसंदीदा शख्शियत करार पाया वह खुद अनपढ़ था मगर उसने दरबार में ऐसे लोग जमा कर लिए थे जो इल्म फंड में ना बेरोजगार थे उन्हीं की बदौलत उसने 50 साल बड़ी
शानो-शौकत से हुकूमत की और मरने के बाद अपने जाने सीटों के लिए एक अजीब मुस्ताकिम सल्तनत छोड़ दिया अ कि नसरीन अकबर की बजाय शोहरत एक कमीज़ अनारकली को दीवार में चुनवा नबी है जो उसके बेटे शहजादा सलीम की महबूबा थी अकबर के दौरे हुकूमत ने हिंदुस्तानी तारीख के दौरान को नुमाया तौर पर मितासर किया उसके दो हुकूमत में मुगल सल्तनत जिस आमद और दोलत में तीन गुना बढ़ गई नजीर तीन अक्टूबर सन् 1605 में अकबर 63 साल की उम्र में पेचिश के बस में मुब्तला हुआ और 27 अक्टूबर सन् 1605 को शहंशाह ए हिंद
दुनिया से कूच कर गया और आगरा में दफन हुआ अकबर ने अपने पीछे 5,000 हाथी 12000 घोड़े 1000 चीते 10 करोड़ रुपया बड़ी अशर्फियों में शॉट ओला से 500 तो लाख तक की हजार अशर्फियां और 272 मन गैर मस्कट सोना 370 मंच आंधी एक श्रवण जवाहिरात जिसकी कीमत तीन करोड़ से ज्यादा थी थोड़े नरेंद्र 27 अक्टूबर सन् 1605 को मुगलिया सल्तनत के तीसरे हुक्मरान जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर की मौत हो गई इन थे मुराद और दानियाल दौड़ की जिंदगी में ही शराब नशे की वजह से मर चुके थे कि अकबर की वफात के बाद शहजादा सलीम
उद्दीन जहांगीर के लॉकअप से तक नसीब हुआ उसने बलिया सल्तनत पर्सन 1605 से सन् 1627 तक पुरानी कि उसने कई मुर्शीद इस लुहार नाफ़िज़ की कान और नाक और हाथ वगैरह काटने की सदाएं मनसुख कर दी शराब और दिगर नशा व रशिया का इस्तेमाल रुक्मण बंद कर दिया कई नाजायज महसुलात हटा दिए खास खास दिनों में जानवरों को सेवा करना बंद कर दिया पर यात्रियों की दृष्टि के लिए अपने महल की दीवार से एक संजीव लटका दी जिसे जंजीरें अल्प कहा जाता था नर-तन 1606 में सलीम यानि कि जहांगीर के सबसे बड़े बेटे कुश ने
अपने बाप के खिलाफ बगावत कर दी वह आगरा से निकलकर पंजाब तक जा पहुंचा जांगिड़ ने उसे शिकस्त दीप सिक्खों के गुरु अर्जुन देव गीत खुसरो की मदद की संस्था ने गुरु अर्जुन देव को कैद करके भारी जुर्माना ऐड कर दिया जिसको गुरु अर्जुन देव ने अदा करने से मांग रखी गुरु अर्जुन देव को शाही किला लाहौर में कैद में डाल दिया गया एक रोज गुरु अर्जुन देव ने फरमाइश की के वह दरिया रावी में नहाना चाहता है इजाजत दे दी गई नहाने के दौरान गुरु अर्जुन देव ने दरिया में डुबकी लगाई और उसके बाद
वह दिखाई न दिए जिससे यह जाहिर होता है कि उन्होंने दरिया रावी में डिप कर खुदखुशी कर ली थी जिस मुकाम पर गुरु अर्जुन देव ने दरिया में छलांग लगाई वह सिखों ने उनकी समाधि बना दी थी इस बात से मुगलों और सिखों के धर्म में नफरत का आगाज हुआ जिसके नतीजे में पैमाने पर मुसलमानों का कत्लेआम किया गया सन 1622 में खुर्रम ने मेवाड़ के राणा अमरसिंह क्विक इस दीप सन 1620 में कांगड़ा खुद जहांगीर ने फतेह किया संत 1622 में तन हार का इलाका हाथ से निकल गया जांगिड़ ही के जमाने में अंग्रेज
सर टामस रो सफीर के जरिए पहली बार हिंदुस्तान में तिजारती हक हासिल करने की नीयत से आए 1622 में खुर्रम ने बगावत कर दी क्योंकि नूरजहां अपने दामाद शहरियार को बलि ऐड बनाने की कोशिश कर रही थी आखिर 1625 में बाप और बेटे में स्लो हो गई बादशाह जहांगीर अपनी किताब तत्वों के जहांगीर में लिखते हैं कि इतने गुलाब मेरे दो हुकूमत में मल्लिका नूरजहां की वालिदा ने इजाद किया था जहांगीर बुध्दि उन्होंने लतीफा और को शिकार का बहुत शौक था कि उसने अपने हालात ज़िंदगी पर एक किताब तस्वीरों के जहां गिरी खुद लिखी न
दिन शराब नशे के 22 जहांगीर आखिरी दिनों में बीमार रहता था दार्जलिंग जहांगीर की बीवी नूरजहां उम्र इस अदरक में मदद करती थी जिसकी वजह से बहुत से हमारा जान ही दरबार से बदन हो गए और दरबार में कई मराठी आमदार आफ बंद हो गई नूरजहां चाहती थी के तख्ते दिल्ली पर उसका दामाद शहरियार रोनक अफरोज हो मगर दूसरी तरफ शहजादा खुर्रम भी तक का तलब गार था इसलिए दो फ्रीक बन गए जिससे मुगलों मरा में फूट पड़ गई मुगल आवाज का सिपहसालार महावत खान था कि मुगलों का वफादार ख़ादिम था मगर उसका झुकाव शहजादा
खुर्रम की तरफ था जिससे नूरजहां ने शहंशाह जहांगीर को महावत खान के खिलाफ कर दिया महावत खान को दरबार में तलब करके उसके साथ तोहीन आमैज सलूक किया गया उसकी बेटी का जज जप्त कर लिया गया जहांगीर जब कश्मीर जा रहा था तो रास्ते में महावत खान ने बगावत कर दी मोबाइल फोंस उसके साथ थी इसलिए उसने बादशाह ने कि जहांगीर को कैद कर लिया नजरें उन हालात में नूरजहां और उसके भाई आसफ जा सियासी चाल चलते हुए खुद को महावत खान के हवाले करने गए महावत खान एक * पाया जरनल था मगर साजिशों और
मकराना चावलों से बहरा था नूरजहां और आसफ जाने खुद को महावत खान के हवाले कर दिया नूरजहां ने जल्द ही दिनों में मुगल सोच के बहुत बड़े हिस्से को अपने साथ मिला लिया जिससे मुगल फौज में फूट पड़ गई और महावत खान तन्हा रह गया उसने फौरन फरार होकर जान बचाई नजर महावत खान की कैद से रिहाई के बाद जहांगीर ज्यादा जिंदा नहीं गर्मियों के मौसम में उसने कश्मीर में कुछ अच्छा वहां मुहिम रहने के बाद सन 1627 में कश्मीर से वापस आते वक्त रास्ते में दम भर के नाम पर उसकी मौत वाक्य कि उसकी
मैयत को लाहौर लाया गया जहां दरिया रावी के किनारे वाह दिलकुशा लाहौर मौजूदा शाहदरा में उसे दफन किया गया न ज्यादा काम अब मकबरा कि जहांगीर के नाम से लाहौर में मशहूर है एक नजर इन शहजादा सलीम यानि शहंशाह जहांगीर की मौत के बाद उसका बेटा शहाबुद्दीन मुहम्मद शाह जहां अव्वल या मिर्जा शहाब उद्दीन बैग मोहम्मद खां खुर्रम मोह लिया सल्तनत का पांचवा शहंशाह था जिसने सन 1628 से सन् 1658 तक रुको मत कि शाहजहां का अहद मोह लिया सल्तनत के विरुद्ध का दौर था और इस दौर को एडवाइजरी भी कहा जाता है 1658 में
शाहजहां को उसके बेटे औरंगजेब आलमगिर मजबूर कर दिया शाहजहां की तामिरा से दिलचस्पी और उसके दौड़े हुकूमत में शामिल होने वाले तामीरी शाकाहार आज भी कायम है उसे मुगलिया सल्तनत का अजीम तरीन मैम आर शहंशाह या इंजीनियर शहंशाह भी कहा जाता है शाहजहां की वजह सौरभ ताजमहल और मुमताज़ महल से उसकी मोहब्बत की दास्तान ए न शाहजहां का असल नाम खुर्रम जबकि कुख्यात अबू अल मुजफ्फर थी कब आला हजरत शाह बैकुंठ था अ कि नर्सिंग शाहजहां पांच जनवरी सन् 1592 इस बीच को लाहौर में पैदा हुआ उस वक्त लाहौर मुगलिया सल्तनत का दारुल हुकूमत था
और मुगल शहंशाह जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर 1586 से अपने खानदान के साथ लाहौर में मुकीम थे पैदाइश के छठे दौर जांगिड़ ने अपने वालिद जलालुद्दीन अकबर को मधु किया ताकि वह बच्चे का नाम तजवीज़ करें शहंशाह अकबर ने बच्चे का नाम खुर्रम रखा और रुकइया सुल्तान बेगम के हवाले कर दिया ताकि वह इसकी तबीयत कर सकें शाहजहां इस त्यौहार से होश संभालने तक और होश संभालने के बाद तीन साल तक रुपैया सुल्तान बेगम के दर्शाया परवान चढ़ता रहा नजर 28 अक्टूबर सन् 1627 को जब मुगल शहंशाह जहांगीर जहांगीर की वफात के वक्त शाहजहां के नाम पर
था जहांगीर की वफा आपके वक्त शाहजहां के उत्तर अबू अल हसन आसिफ खान ने उसके दूसरे भाई पुष्पों मिर्जा के बेटे दारूबक्श को तक पर बटोरे मुगल शहंशाह के बिठा दिया यह मतलब दावर पक्ष के लिए आरजी साबित हुई और जब खानदान के दूसरे शहजादे यानि दानियाल मिर्जा के बेटे रोशन मिर्जा और तहमा सभा और तैमूर रस शाहजहां के जरिए अमिताभ आए तो अबूल हसन आसिफ खान ने दावर पक्ष को इरान फरार हो जाने का मौका दे दिया मगर यह मौका उसके लिए पाटीदार साबित न हो सका और उसी दौरान लाहौर में पीस दिसंबर सन्
1627 को शाहजहां को मुगल शहंशाह तस्लीम कर लिया गया और 23 जनवरी 1628 को शाहजहां के हुक्म पर लाहौर में चारों शहजादों को कत्ल कर दिया गया था के नजदीक शाहजहां अपने तकरीबन 30 साला दौरे हुकूमत के दौरान अंदाजन 15 साल तक पुहंच बाय रहा इस मौके पर उसके निजी मामलात का मुक्तसर सब बयान उपाय से दिलचस्पी है तब मशीन के साल के अंदर ही उसे आगरा छोड़कर ग्वालियर जाना पड़ा ताकि वह झज्जार सिंह की सड़क को भी कर सके झज्जार सिंह ने इताअत कबूल कर ली और शाहजहां को एक महीने से उत्साहित कि बुद्ध
की गैरहाजिरी के बाद दोबारा आगरा वापस आना पड़ा दिसंबर 1629 में उसे दोबारा आगरा छोड़कर जाना पड़ा जिसकी वजह यह ठीक है वह खान जहां लोदी को ढक्कन भाग जाने पर सजा दे सके शाहजहां रणथंबोर के रास्ते से ज्यादा से होता हुआ मालवा से युक्त मार्च सन् 1630 को बरहामपुर पहुंचा और यहां 2 साल तक मुकीम रहा बरहामपुर में उड़ान के दौरान ही मम ताजमहल का इंतकाल हुआ नर्सिंग छह मार्च सन् 1632 को शाहजहां बरहामपुर से रवाना होकर जून 1632 में वापिस आगरा पहुंचा और यहां मस्जिद साल तक मुमकिन रहा 1632 के आखिरी महीनों में
शाहजहां ने अपने बड़े बेटे दारा शिकोह की शादी की तैयारी व्यक्त की और यह शादी 25 जनवरी सन् 1633 को तय पाई यह कंफर्मेशन 1633 को तक़ारीब फिर उसी मुलाकात हुई और शाहजहां मुमताज के इंतकाल के बाद से जारी अयाम 171 करके जिंदगी नगमा इस सच में वापिस आ गया दर्शकों की शादी के फौरन बाद ही 23 फरवरी सन 1633 को शाहजहां ने अपने दूसरे बेटे शुजा की भी शादी कर दी थी कि नवीन संत 1652 से 1658 तक पेशाब जहां शाहजहानाबाद के लाल कलम में कयूम पास जी रहा इस पुस्तक में वह सिर्फ दो
बार मुक्तसर हफ्ते के लिए बाहर गया एक बार आगरा और एक बार अजमेर नवंबर या दिसंबर सन् 1653 में मोती मस्जिद देखने गया जनवरी 1656 में एक मराठी दारु पीने शहंशाह पर कातिलाना हमला किया मगर कोतवाल ए महल के हमले से वह कत्ल हुआ नजर शाहजहां का दौर मुगलिया सल्तनत का बेहतरीन दौर था जिसने शाहजहां ने तमिल रात की दुनिया के अजीब सा कार तकलीफ करवाए जिनमें लाल किला ताजमहल मोती मस्जिद और तख्त-ए-ताऊस वगैरह शामिल है शाहजहां के दौर के बेशुमार वाकयात हैं जिसकी तस्वीर में जाने के लिए इंतिहाई तवील वक्त दरकार है अल अक्सर
शाहजहां ने बजाय बीमारी सन 1658 में वफात पाई है एक नजर इन औरंगजेब आलमगिर या मौजूद दीन मोहम्मद ने सन 1658 से 1707 तक मुग़ल एंपायर पर हुकूमत कि वह मुगलिया सल्तनत का आखरी अजीम ओ शान शहंशाह था उसकी वफ़ा से मुगल सल्तनत जमाल का शिकार हो गई औरंगजेब आलमगिर के दौर में हिंदुस्तान दुनिया का अमीर तृणमूल था और दुनिया की कुल जीडीपी का एक चौथाई हिस्सा पैदा करता था जबकि उसी दौरान इंग्लिस्तान का हिस्सा सिर्फ दो फीसद था एक नजर इन आपका नाम मोहियुद्दीन था औरंगजेब लगाव था उनके वाले शाहजहां ने उन्हें आलमगीर का
खिताब दिया था आप टीम नवंबर सन् 1618 को मालवा की सड़क पर पैदा हुए उनकी वालिदा अर्जुमंद बानो बेगम थी जो मुमताज़ महल के नाम से मशहूर थी औरंगजेब आलमगिर की उम्र 2 साल की थी कि शाहजहां ने अपने बाप जहांगीर के खिलाफ बगावत कर दी थी और बीड़ी बच्चों को लेकर चार साल तक बंगाल और तेलंगाना में फिरता रहा आखिर जहांगीर के कहने पर अपने बेटों द्वारा और औरंगजेब आलमगिर को दरबार में भेजकर माफी मांग ली जाएंगी ने दोनों बच्चों को मल्लिका नूरजहां की निगरानी में भेज दिया कि औरंगजेब को सैयद मोहम्मद अमीर हासम
और मुलायम साले जैसी शख्सियत की शागिर्दी का मौका मिला मुगल बादशाहों में औरंगजेब आलमगिर पहले बादशाह है जिन्होंने क़ुरआने मजीद फिर का ने हमीद हिप्स किया और फारसी मजमून नवीसी में नाम पैदा किया इसके इलावा घुड़सवारी और तीरंदाजी और उन्हें बागरी ने भी कमाल हासिल था 17 बरस की उम्र में 1636 को दक्कन के सूबेदार मुखर हुए उस दौरान में उन्होंने कई बगावतों को खत्म किया और चंद नए इलाके फतेह किए हैं में बबल्स के युवकों की सड़कों भी जिस जवांमर्दी से कि इसकी मिसाल तारीख से आलम में मुश्किल से मिलेगी के नजदीक शाहजहां की
बीमारी के दौरान में दारा ने तमाम इंतजाम में हुकूमत अपने हाथ में ले लिया दारा कि इस जल्दबाजी से शाहजहां की मौत की अफवाहें फैलने लगी और मुल्क में अवतरित फैल गई है के साथ सुलझाने बंगाल में अपनी बादशाहत कायम कर ली और आगरा पर फौज खुशी के इरादे से रवाना हुआ बनारस के करीब दारा और सजावटी पौधों में जब हुई जिसमें द्वारा को फतेह और सजा को शिकस्त हो गई औरंगजेब आलमगिर ने मुराद से मिलकर दारा के मुकाबले की ठानी अजहर के करीब दोनों का आमना-सामना हुआ औरंगजेब आलम ही को फतेह हुई साधुगढ़ के
करीब फिर लड़ाई हुई जिसमें औरंगजेब आलमगिर को दोबारा कामयाबी हासिल हुई कि औरंगजेब आलमगिर अबू अल मुजफ्फर मोहियुद्दीन के लिए कब से तपते सहरा से मोह लिया पर बैठा उसने हिंदुओं और मुसलमानों की फजूल रस्में खत्म की और फांसी का इंतजार किया और खूबसूरत मतपत्रों की तामीर ओं आराइश मम्मू करार दी कव्वाल नजूमी शायर मौकूफ कर दिए गए शराब फ्यून और भंग बंद कर दी दर्शन एक झरोखा की रस्म खत्म की और बादशाह को सलाम करने का इस्लामी तरीका राज किया सजदा करना और हाथ उठाना मौकूफ हुआ औरंगजेब आलमगिर ने सिक्कों पर कली मा लिखने
का दस्तूर भी खत्म किया खाने की जिंसों पर हर किस्म के टैक्सेस हटा दिए सन 1665 में आसाम कुछ बहार और चटगांव फतेह किए और पुत्तर जी और फिरंगी बहरी कषायों का खात्मा कर दिया अ कि संत 1666 में सड़क के शायर खुशाल खान खटक कि सूरज और मित्रा और अलीगढ़ के अलावा में जाटों की घड़ी खत्म की मैं नीरज सतनामियों की बगावत को खत्म किया सिक्खों के दसवें और आखिरी गुरु गोबिंद सिंह ने अनंतपुर के आसपास भारत गिरी शुरू की और मुगल फौज से शिकस्त खाकर फिरोजपुर के करीब हैदराबाद म काम पर जा बैठा
जहां बाद में मत सिरा बाद हुआ था आलमगीर ने उन्हें अपने पास ढक्कन बुलाया यह अभी रास्ते में थे कि खुद आलमगीर बहुत हो गया अब एक नजर इन औरंगज़ेब आलमगीर ने संत 1666 में राजा जयसिंह और दलेर खान को शिवाजी के खिलाफ भेजा उन्होंने बहुत से कलेक्ट पता कर लिए शिवाजी और उसका बेटा आगरा में नजरबंद हुए शिवाजी फरार होकर फिर महाराष्ट्र पहुंच गया और दोबारा कत्लोगारत घरी शुरू की 1680 में शिवाजी मर गया और उसका बेटा संभाजी जानशीं हुआ यह भी कत्लोगारत खरीदने मसरूफ हुआ औरंगजेब आलमगिर खुदा कल पहुंचा संभाजी गिरफ्तार होकर मारा
गया उसका बेटा साधु दिल्ली में नजरबंद हुआ दक्कन का मुतालिबा करके आलमगीर इस नतीजे पर पहुंचा कि बीजापुर और गोलकुंडा की रियासतों से मरहठों को मदद मिलती है उसमें 1686 में बीजापुर और सन 1687 में कोलकाता की रियासतें खत्म करती हैं कि उसके बाद मराठों के ताकत को में हिंदुस्तान के इंतिहाई डुबी हिस्से भी पता कर लिए और मुगलिया सल्तनत पूरे हिंदुस्तान में फैल गई है एक नजर इन औरंगज़ेब आलमगीर अहमदनगर में बीमार हुआ था और तीन मार्च सन् 1707 को तकरीबन नवे बरस की उम्र में बहुत हो गया वसीयत के मुताबिक उसे खुल्दाबाद में
दफन किया गया खुदा बाद से करीब एक मकान है जिसका नाम औरंगाबाद है औरंगाबाद में औरंगजेब आलमगिर की मुख्तलिफ यादगारें आज भी महफूज है बड़ा मुत्तक़ी पर रोजगार उधर बेर और आला दर्जे का मुंतजिम था खजाने से जाती खर्च के लिए एक पाई भी नदीम कि क़ुरआने मजीद लिखकर और टोपियां सीकर गुजारा करता था सुलझा हुआ अधिक था उसके सुत रकाते आलमगीर के नाम से व्रत तब हुए उसके हुक्म पर निगाह में इस अदरक चलाने के लिए एक मजबूत फतवा तसरीफ किया गया जिसे तारीख में फटा व आलमगिरी कहा जाता है पता व आलमगिरी फिर
का इस्लामी में एक ममताज मकाम रखता है बाद जो लामा ने सुल्तान और औरंगजेब आलमगिर को अपने दौर का मुद्दा अधिक करार दिया है 25 बेटे बहादुर शाह सुल्तान मोहम्मद अकबर मोहम्मद आज़म शार्प काम बख्स मोहम्मद सुल्तान और पांच बेटियां सेवन निशा जी न तनिषा मेहरूनिशा बदरुन्निसा शहादत अनुसार छोड़ी मशहूर शायरा जेवन नशा मुक्ति उनकी बेटी थी बेटा बहादुर शाह अव्वल बाप की सल्तनत का वारिस हुआ था कि नजर इन इंडिया के पहले बजरिया दम जवाहरलाल नेहरू ने सन 1946 में शामिल होने वाली अपनी किताब डिस्कवरी ऑफ इंडिया में औरंगजेब आलमगिर को एक मजहबी और
कदामत पसंद शक्शियत के तौर पर पेश किया है एक नजर इन आम तौर पर इंडिया में यह खयाल किया जाता है कि औरंगज़ेब आलमगीर हिंदुओं से नफरत करता था और उसमें हिंदुस्तान में हिंदुओं पर जुल्म किया मगर यह बात जरुरत नहीं एक अमरीकी तारीख दान अपनी किताब औरंगजेब द मैन एंड द मिथ में बताती हैं कि यह खयाल गलत है कि औरंगजेब ने मंदिरों को इसलिए निर्माण करवाया क्योंकि वह हिंदुओं से नफरत करता था वह लिखती है कि औरंगजेब की इस छवि के लिए अंग्रेजों के जमाने के मौर्य जो अंग्रेजों की फूट डालो और हुकूमत
कारों की पॉलिसी के तहत हिंदू-मुस्लिम फ़सादाद को रोक देते थे उन्होंने औरंगजेब के बारे में ऐसा लिखा इस किताब में वह यह भी बताती हैं कि अगर औरंगजेब की हुक्मरानी 20 साल से कम होती तो जगदीश मौर्य को ने उनका मुखतलिब ठंग से तय किया होता औरंगजेब ने 49 साल तक 215 करोड़ अपराध पर हुकूमत कि उनके दौर में मुगल सल्तनत इतनी बसी हुई कि पहली बार उन्होंने तकरीबन पूरे पर यह शरीर को अपनी सल्तनत का हिस्सा बनाया वह लिखती है कि औरंगजेब को एक बच्ची कब्र में महाराष्ट्र के खुल्दाबाद में दफन किया गया जबकि
इसके बरअक्स हुमायूं के लिए दिल्ली में लाल पत्थर का मकबरा बनाया गया और शाहजहां को आलीशान ताजमहल में दफनाया गया उनके मुताबिक यह एक गलतफहमी है कि औरंगजेब ने हजारों हिंदू मंदिर तोड़े उनके हुक्म से बराहे रास्त चंद्र ही तोड़े गए उनके दौरे हुकूमत में ऐसा कुछ नहीं हुआ जिसे हिंदुओं का कत्लेआम कहा जा सके दरअसल औरंगजेब ने अपनी हुकूमत में बहुत से अहम ओहदों पर हिंदुओं को तैनात किया है कि नसीर अपने आखिरी दिनों में औरंगजेब आलमगिर अपने सबसे छोटे बेटे काम पक्ष की वालिदा अधिक पूरी के साथ रहे जो के एक गुल्लू का
रथी दूसरे मर्द से काम विपक्ष को एक खत में औरंगजेब आलमगिर ने लिखा कि उनकी बीमारी में अधिक पूरी उनके साथ रह रही हैं और उनकी मौत में भी उनके साथ होंगी और औरंगजेब आलमगिर की मौत के चंद महीने बाद ही सन 1707 की गर्मियों में यदि पूरी की भी मौत हो गई थी कर दो एक नजर इन औरंगज़ेब आलमगीर की वफात के बाद मोहम्मद आजम शाह एक कल मुद्दत के लिए 14 मार्च सन् 1707 से 8जून 1703 तक तकरीबन सिर्फ तीन माह भर आए नाम मुगल शहंशाह था वह औरंगजेब आलमगिर का सबसे बड़ा बेटा
था अ कि नसीमुद्दीन मोहम्मद आजम शाह 28जून सन 1653 को पैदा हुए आप मुगल शहंशाह औरंगजेब आलमगिर के बड़े बेटे थे औरंगजेब ने उन्हें 1681 में अपना वली अहद नामजद किया और शहंशाह की वफात के बाद आजम शेख 14 मार्च सन् 1707 को तक नक्श हुए तनवीर अली जैदी के दौर में यानी औरंगजेब आलमगिर कि हुकूमत में आज हम शुद्ध कई सूबों के हकीम रहे जिनमें वेदर शुभा मालवा बंगाल गुजरात और दक्षिण शामिल है सन 1685 में औरंगजेब ने आज हम शाखाओं 50,000 के एक लश्कर के साथ बीजापुर की जानिब रवाना किया कि सिकंदर आदि
शाम को मोहल्ले तक का मुक्ति किया जा सके तो हम यह आम नाकाम रही और आज हम शाह को वैजापुर किले के दरवाजे से खाली हाथ वापस लौटना पड़ा आज हम शुद्ध व्हीलर सा निकाल के हातिम रहेगी और वहां का नजारा नस इंतिहाई उंगली से चलाया जिसकी बिना पर यह कहा जा सकता है कि अगर शाखं की जगह हुकूमत करते तो शायद भरे शरीर की तारीख कुछ और होती नदी तक मशीन की लड़ाई में आज हम शार्क उनके सौतेले भाई शहजादा शाखं के हाथों आरजून सन 1707 में शिकस्त हुई और वह अपने तीन बेटों सुल्तान
बेदार वक्त शहजादा जवां बख्त और शहजादा सिकंदर शान बहादुर कि हमरा कत्ल किए गए हैं कि नजर इन उर के कत्ल के बाद शहजादा शाखं बहादुर चावल के नाम से प्रसिद्ध हुए उन्हें औरंगाबाद में शहंशाह हुमायूं के मकबरे के साथ दफन किया गया और उनकी खोज में से एक मल्लिका भी उनके साथ ही दफन है नसरीन और के कत्ल के बाद बहादुरशाह अव्वल मुगलिया सल्तनत का सातवां शहंशाह था जिसने हिंदुस्तान पर्सन 1707 से 1712 तक हुकूमत की इसका असल नाम कुतबुद्दीन मोहम्मद मौसम था जबकि इसके वालिद औरंगजेब आलमगिर ने इसे सा आलम का खिताब दिया
था कि मुल्ला अबू सईद इसके उस्ताद मेहदी अगर तारीख़ बताती है कि बहादुरशाह अव्वल इंतिहाई नालायक और पुस्तक अब विराना तबीयत का मालिक था वह सिर्फ 5 साल तक ही हुकूमत कर सका मगर उसके दौर में आसाम भी मुगलिया सल्तनत में शामिल हो गया था जबकि दिगर बहुत से इलाके हाथ से निकलना शुरू हो गए थे सल्तनत में बगावतों का आगाज हुआ और वह शराब जोशी और दिगर बुरे कामों में मसरूफ रहा औरंगजेब आलमगिर के सशक्त किरदार हुकूमत की कठिन के नतीजे में मुल्क में बगावतें सर उठाने लगी थी जुनूब और मगरे में मरहठों श्रीमाल
में पठानों सिखों और जाटों की बगावतें श्रद्धा हो गई थी और मुगलिया सल्तनत के पास अब कोई ऐसा लीडर नहीं रहा था जो इन तमाम बगावतों को कुचल सकता कई मुसलमान मनसबदारों ने भी बगावत करते हुए अपनी एप रियासतों की आजादी का ऐलान करना शुरू कर दिया था यो यो 69 साल की उम्र में इस का इंतकाल हो गया और दिल्ली में सूफी बजुर्ग हजरत ख्वाजा बख्तियार काकी रहमतुल्लाह अलैह के मजार के अहाते में दफन हुआ नजर इन बहादुर शाह बल्कि वफा के बाद जहांदारशाह मिर्जा मुनीर उद्दीन बैग मोहम्मद खान जिस की पैदाइश दस मई
सन 1661 युद्ध और वख्त 12 फरवरी सन 1713 युद्ध मुगलिया सल्तनत का आठवां मुगल शहंशाह था जिसने सन 712 से 1713 के दरमियान सिर्फ 11 महीने हुकूमत की है एक नजर इन ए स्मॉल शहंशाह के बारे में तारीख में बहुत कम मालूमात दस्तयाब हैं क्योंकि इस कि हुकूमत बहुत कमर सा रही हैं कि उस दौरान शहजादा मोइन उद्दीन मोहम्मद फरुक सील अजीमुश्शान हक के में बंगाल के साथ बंगाल में मुमकिन था अ कि संसद 512 में बादशाह शाखं बल्कि वफात की खबर सुनकर अजीमुश्शान ने फर्क सिर्फ को बंगाल में अपना काम मक्का मुकर्रर किया और
खुद तख्ते दिल्ली के उसूल के लिए अपनी फौज के हमरा रवाना हुआ शहजादों की तक नशीनी कि कांग्रेस जनों के बाद शहजादा मोइजुद्दीन जहांदारशाह तख्त-ए-ताऊस का वारिस बना अ के नजदीक जहांदारशाह ने अपने एक साल से भी कम वक्त असरदार हुकूमत यानि 1712 से 1713 में लातादाद मुगल शहजादा दे मौत के घाट उतार दिए उसी स्नेह में जहां दार्शनिक फरुखसियर की गिरफ्तारी के लिए बंगाल की तरफ वह रवाना करने का हुक्म दे दिया यह खबरें बंगाल भी पहुंच गई जिससे फारुख सीर उसकी वालिदा और दिगर बहन-भाइयों में शोक की लहर दौड़ गई क्योंकि वह Bigg
Boss रिश्तेदारों का हश्र देख चुके थे फरुखसियर ने निहायत सोच-विचार के बाद ताकतवर उमरा सैयद इमरान से मदद हासिल करने का फैसला किया शहजादा फरुखसियर ने 11 जुलाई सन् 1713 को पॉज अधीन जहांदारशाह को शिकस्त देकर मुगलिया सल्तनत की बागडोर संभाली थी यहां पर क्षेत्र को हुकूमत सैयद इमरान की वजह से मिली थी इसलिए वह उनके मातहत था तमाम उम्र शर्त रात उनके मच्छरों से सृजन दिए जाते थे कुछ ऐसा बाद प्रमुख सचिव ने उनका जोर और ताकत तोड़ने की भी कोशिश की नजर इन फ्रूट सीर जनवरी 1713 से 28 फरवरी 1719 तक मुगल सल्तनत
का हक मार रहा है यहां पर उस क्षेत्र के बाद मुग़ल एंपायर का दसवां हुक्मरान रख योद्धा राजपूत जो रवि शान का बेटा और अजीमुश्शान का भतीजा था वह वर्षीय के बाद मुगलिया सल्तनत के तख़्त पर बैठा उसने मुग़ल एंपायर पर छह जॉनसन 1719 को सिर्फ 98 दिन हुकूमत की है कि नज़रोन केय मुग़ल एंपायर का नौजवान तरीके हुक्मरान गुजरा है जो तीस नवंबर सन् 1699 को पैदा हुआ और मैं 19 साल की उम्र में 1719 को बहुत हो गया मुगल शहंशाह शाहजहां साहनी नरीन शाहजहां साहनी जिसने छह जोन 1719 से 19 सितंबर 17 व
19 तक हुकूमत की तरफ युद्ध राजपूत की वफात के बाद शाहजहां सामने जिसके पैदाइश साथ जून सन 1696 को हुई और वफात 19 सितंबर सन 1719 को हुई इसका पैदाइशी नाम रसूल था मुगलिया सल्तनत का 11वां शहंशाह था जो अपने भाई रख युद्ध राज्ाद के बाद तक पर बैठा इसे शाहजहां साहनी कहा जाता है इस बगल हुक्मरान ने भी 1719 को अपने भाई मृत्यु दर आजाद की वफात के बाद सिर्फ 15 दिन मुगलिया सल्तनत पर हुकूमत की है और महज 13 साल की उम्र में इंतकाल कर गया कि मोहम्मद शाह अल मारूफ मोहम्मद शाह रंगीला
रोशन अख्तर नसीरुद्दीन शाह मुगलिया सल्तनत का 14वां बादशाह था जिसकी पैदाइश 17 अगस्त सन् 1702 को हुई और वफात 26th अप्रैल सन् 1748 को हुई नजर मोहम्मद शाह रंगिला औरंगजेब आलमगिर के बाद कि आदत और सियासी अख्तरी के दौरान में तब्दील मुद्दत बादशाह गुस्सा है मोहम्मद शाह रंगिला ने मुगलिया सल्तनत पर 1719 से 1748 तक हुकूमत की है कि उसने अपनी मुद्दत से हुकूमत का ज्यादातर वक्त ऐश्वर्य शांत परिस्थिति में गुजारा 17 यह मोह लिया कि धमाल कपडा थे जो औरंगजेब आलमगिर के बाद से चलना शुरू हो चुका था उसका सब मोहम्मद शाह रंगीला के
27 साला तब्दील दो हुकूमत ने किया जा सकता था मगर बदकिस्मती के बादशाह की ऐड पसंद दी और बेसिकली के सब नज्मों और नर्स की जिम्मेदारी वह जरा के कंधों पर थी जिनकी सियासी चमक ने मूल को सियासी और इक़्तेसादी दौरान से 24 कर रखा था निजाम उल-मुल्क आसिफ जान ए जो एक मुख्य समीर था हालात पर काबू पाने की बहुत कोशिश की मगर वह भी मायूस होकर दक्कन वापिस चला गया मरहठों और सिखों की बगावत जिसे औरंगज़ेब आलमगीर ने कुचल कर रख दिया था दोबारा सर उठाने लगी थी मगर मोहम्मद शाह रंगिला उन्हें बेखबर
एस उत्तर में वक्त गुजर जाता रहा है कि जब मोहम्मद शाह रंगिला को नादिरशाह के हमले की इत्तला मिली तो उसने निहायत बदहवासी में जोधा बहादुरशाह हजरत महल पर से मथुरा तलब किया नजर इसका असल नाम रोशन अख्तर था वह शाहजहां साहनी का बेटा और शाखं बहादुर शाह अबू अल कपोन तथा सैयद अबरार ने उसे जेल से रिहा करवाया और सत्रा सितंबर 1719 को तक पर बिठा दिया उसने अपने लिए नासिरुद्दीन मोहम्मद शाकालाका पसंद किया मगर तारीख ने उसे मुहम्मद शाह रंगीला का नाम दिया अ कि मोहम्मद शाह रंगिला एक ऐसे दबा और मुमताज़ संस्था
24 घंटे नशे में धूत रहता था और रखो सुरूर और पहाड़ियों और यानि का दिल दादा था वह कानून बनाने और कानून तोड़ने की खपत में भी मुब्तला था नर्सिंग एक ऐसा पारा सिर्फ इंसान था जो अचानक किसी शख्स को हिंदुस्तान का आलम तरी 9th सौंप देता था और जग जाता था वज्रासन को भी खड़े-खड़े जेल भिजवा देता था कि वह अफसर दरबार में नंगा आ जाता था और दरबारी भी उसकी फरमाबरदारी और इताअत पुजारी ने कपड़े उतार देते थे कि वह बाद उक्त जो से इकतिदार में दरबार में सरेआम खड़े होकर पेशाब कर देता
था और तमाम मॉल्स वह जरा दिल्ली के शराफत और उस वक्त के ओवर माधु जला वाक्य कर बादशाह सलामत की तारीफ करते थे वहां बैठे-बैठे हुक्म देता था कि कल तमाम दरबारी जनाना कपड़े पहनकर आएं और फ्लॉप फ्लॉप वजीर पांव में घुंघरू बांध लेंगे और वह जरा और दरबारियों के पास इंकार की गुंजाइश नहीं होती थी वह दरबार में आता था और ऐलान करता था जेल में तमाम बाद मुजरिमों को रिहा कर दिया जाए और इतनी ही तादाद के बराबर मस्जिद लोग जेल में डाल दिया चाहे बच्चा के हुक्म पर सिपाही शहरों में निकलते थे
और उन्हें रास्ते में जो भी सुख मिलता वह उसे पकड़कर जेल में पहनते थे वह बाजार से तक टीम करने का भी शौकीन था वह रोज पांच नए लोगों को वजीर बनाता था और सौ-पचास लोगों को चाय इस तिलक पेश करता था और अगले ही दिन यह बाजार से और इसकी जाते हैं वापिस ले ली जाती थी वह तवायफों के साथ दरबार में आता था और उनकी टांगों बाजुओं और पेट पर लेट कर कारोबार है 17 चला था वह काजी-ए-शहर को शराब से वजू करने पर मजबूर करता था और उसका हुक्म था कि हिंदुस्तान की
हर खूबसूरत औरत बादशाह की अमानत है और जिसने इस अमानत में खयानत कि उसकी गर्दन मार दी जाएगी और उसने अपने दौर में अपने अजीत करी घोड़े को वजीरे मामले कत बनाया हुआ था और यह घोड़ा साइज तिलक पहनकर वह जरा के साथ बैठता था न दीन मोहम्मद शाह रंगिला कसरते शराबनोशी के 2226 अप्रैल सन् 1748 को इंतिक़ाल कर गया है कि नसरीन 1738 में नादिरशाह ने कंधार पर कब्ज़ा करके होत की शतरंज का खात्मा कर दिया था कंधार पर नादिरशाही कब्जे के बाद अफवाह इन बागियों की हवाल जी के मुताबिक बे और इस पर
अमल दरामद न होने पर नादिरशाह का बिल को पता करता हुआ दिल्ली की जानिब बढ़ना शुरू हुआ मोहम्मद शाह रंगिला और नादिरशाह के दरमियान जंग 1739 में करनाल के मकान पर हुई जो दिल्ली के समाज में तकरीबन एक सौ दस किलोमीटर पर वाक्य है मोहम्मद शाह रंगीला की तकरीबन एक लाख से जॉइंट फौज नादिरशाह की मैच 55 हजार फौज का मुकाबला न कर सकी एक बात जो अहम थी वह यह कि नादिरशाह की फौज जगदीश तोपों बंदूकों और संपूरक एक तरह की कम वजन तो आप जैसे ऊंटों पर लगाकर दागा जा सकता है शैलेश थी
जो कम वजन और आसानी से मुंतक़िल और न की जा सकती थी अ है जबकि मोहम्मद श्रंखला की फौज के हथियार भारी-भरकम और पुरानी स्तर के थे जिनकी कसरत नादिरशाह के तौर मुनज़्ज़म फौजी एकदाम के मुकाबिल बेकसूर साबित हुई भारी भरकम हथियार और गैर-मुस्लिम फौज अगर किसी हो तो वह चुस्त और मुख्तार एक खोज का आसानी से निशाना बन जाती है जबकि करनाल में भी ऐसा ही हुआ मोहम्मद शाह रंगिला को इसकी ना तजुर्बाकारी और कमज़ोर जंगली हिकमत फैमिली के सब शिकस्त के पास हुई मोहम्मद शाह रंगिला गिरफ्तार होकर नादिरशाह के साथ दिल्ली में दाखिल
हुआ नजर अब मुगल हजारों की चाबी नादिरशाह के हाथ आलिया ने शहर की बगावत और नागरी फौजियों के कत्ल के वाकयात पर नादिरशाह ने कत्लेआम का हुक्म दे दिया और दिल्ली में लूटमार और लाभकारी शुरू हुई नादिर शाह ने दिल्ली को लूट रहा था तो उसके हमारा बेस बहुत ही का दरिया ऐनूल कोहिनूर तख्त-ए-ताऊस हजारों हाथी और घोड़े और जवाहरात इसमें शामिल थे जो मालूम जवाहिर इसके हाथ लगा इसकी कीमत करोड़ों के करीब बताई जाती है एक नजर इन इसकी कीमत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि नादिरशाह ने अपनी संस्कृत में
उसके बाद तीन साल तक टैक्स वसूल नहीं किया था नादिरशाह के हाथों मुगल सल्तनत को शिकस्त के बाद फिर संभलने का मौका नहीं मिला बद्री झालात दिग्गज होते चले गए नजर अफसोस के सरगना थे मुलिया के जानशी इस कदर ना महल और कुंजन हो चुके थे कि इस नाकामी से जरा भी सबक नहीं सीखा कि जाए के मूल का नज्मो न संभलते मुगलों उमरा कि सियासी कशमकश ने भी सल्तनत को खासा नुकसान पहुंचाया उनके जाति मवाद और खुदगर्जी पर अपनी गुरु बंदियों ने रही-सही कसर न छोड़ी लिहाज़ा बादशाहों की कमअक्ली और बेखबरी की वजह से
कम ज़र्फ़ लोग शाही दरबार में मसाले वह मरा की जगह पाते रहे और मुकेश और काबिल उमराव बेअसर होते चले गए हैं कि मोहम्मद शाह रंगिला अपने 27 सालों में सिवाय शहर शिकार के दिल्ली से बाहर नहीं निकला औरंगजेब आलमगिर ने जेनर खिलाफ पर शरियत दुश्मन को खत्म कर दिया था इन बेपरवाह बादशाहों के दौर में फिर से शुरू हो गई थी अ है नजीर मोहम्मद शाह रंगिला की मौत के बाद उसका बेटा अहमद शाह बहादुर मुग़ल एंपायर का हुक्मरान बना जिसने 26th अप्रैल सन् 1748 से लेकर दो जून 1754 तक मुगलिया सल्तनत पर हुकूमत
की और तकरीबन 1775 में उसकी भी मौत हो गई थी है नजीर मोहम्मद शाह रंगीला के बेटे अहमद शाह बहादुर के बाद उसकी जिंदगी में ही आलमगीर साहनी जिनका मुकम्मल नाम अजीजुद्दीन आलमगिर साहनी था वह 3 जून सन 1754 से 29 नवंबर 1759 तक मुगलिया सल्तनत का शहंशाह था नरेन आलमगीर ने भी तकरीबन 5 साल से ज्यादा अरसा मुग़ल एंपायर पर हुकूमत की मगर तारीख में कुछ खास और दिलचस्प बात याद उनके हवाले से मौजूद नहीं आलमगिर साहनी के बाद मुगल शहंशाह शाहजहां साले इस जिसने 10 दिसंबर 1759 से दस अक्टूबर सन् 1760 तक हुकूमत
की नजर यह तिहाई दलील मुद्दत के लिए मुगल शहंशाह था यह बादशाह औरंगजेब आलमगिर के सबसे छोटे बेटे काम मोक्ष के सबसे बड़े बेटे वहीं वो सुन्नत मिर्जा का बेटा था 1759 में मुक्तसर मुद्दत के लिए और उसे बादशाह बनाया गया उसके पास पर्याप्त नहीं थे असल स्थिति है रात वजीर-ए-आजम इंजमाम उल मुल्क और मठों के पास थे तब हम बाद में उसे मौजूद किया गया उसका दो हुकूमत तकरीबन 10 माथा न उनके बादशाह आलम साहनी बुनियादी तौर पर मुगलिया सल्तनत का आखिरी बाहर हुक्मरान था जिसने सन 1760 से 1806 तक मुगलिया सल्तनत पर हुकूमत
की सा आलम साहनी की पैदाइश 25 जून सन 1728 को हुई और वफात उन्नीस नवंबर 1872 को हुई है कि शाह आलम सामी मुगलिया सल्तनत के अधीन सवाल का आखरी बार असर मुगल शहंशाह था जिसके दो हुकूमत में मुगलिया सल्तनत मैं खुद मुख्तार रियासतों और सल्तनतों का कयाम अमल में आया और मुगलिया सल्तनत क्यों दूध सिमटकर दिल्ली तक मैं दूध हो चुकी थी ना रिक्शा आलम साहनी के आखिरी दौर में यह बकुला बहुत मशहूर हो चुका था कि हुकूमत एशा आलम आज दिल्ली पालम पालम दिल्ली का आखिरी भी इलाका है शाखं साहनी का पूरा नाम
मिर्जा अब्दुल अलीम बाहर बहादुर था आलम साहनी ने तकरीबन 18 साल बिना आई के बगैर गुजारे और 19 नंबर सन 1806 को शाखं साहनी ने 78 साल की उम्र में लाल किला दिल्ली में इंतकाल किया है के नजदीक उनकी व खाद के बाद अकबर शाम स्थानीय मुगल शहंशाह जिसमें उन्नीस नवंबर सन् 1806 से 28 सितंबर 1837 तक हुकूमत की अकबर शादी की पैदाइश 22 अप्रैल सन् 1760 और वफात 28 सितंबर सन 1837 को हुई वह शाखं साहनी का प्रचलन था नरेन शहंशाह आलम सामने की वफात के बाद उसका बेटा अकबर शाम स्थानीय सकते हैं पर
बैठा वह अपने बाप की तरह बे इश्तिहार और ब्रायन नाम हुक्मरान था असल इस या रात अंग्रेजों के पास थे बादशाह के पास लाल किला बेबी के अंदर तक में दूध इस तैयार आर्थिक बादशाह को शायरी शतरंज और मौसी की से व्यवस्था 1835 में शहंशाह ने अपने सफीर राममोहन राय को बताने अबे जाता के वह को मत यह बताने से शाही वजीफा में इजाफा का मामला तय करें है क्योंकि शहंशाह के लिए अंग्रेजों की तरफ से फिर भी एक खास के अल्फाज भी हजम कर लिए गए थे राममोहन राय ने सेंट जेम्स की अदालत में
अपनी खास पेश की और शहंशाह के हक में बदल दिए मगर इसका कोई नतीजा न निकला न जाए उसी दौरान शहंशाह की वफात हो गई अंग्रेजों ने निजाम हैदराबाद और नवा पॉइंट को उकसाया कि वह अपने लिए बादशाह कल आप इस तैयार करें नवाब और ने बादशाह का खिताब कुबूल कर लिया और बादशाह कल आप इस प्यार किया मगर निज धाम ने इनकार कर दिया सिर्फ यही नहीं SIM के तालपुर और कुल्हड़ों ने शहंशाह का अद्भुत स्तंभ बरकरार रखा नजरी नक्शा साहनी ने 28 सितंबर सन 1837 ओवर फत पाई बादशाह अपनी जिंदगी के आखिरी एग्जाम
में मामले की बीमारियों का शिकार हो गया था जिस्मानी कमजोरी के बाय हिसाब से वर्ष रहा मरहूम बादशाह को दरगाह कि आप उस दिन बख्तियार काकी के साथ देवी में दफन किया गया मजार संगमरमर का बना हुआ है जहां मुगल बादशाह बहादुरशाह अव्वल और शाखा ने भी पूर्व दिशा अकबर शादी के बाद जब लिया कि आखिरी मुजफ्फर सिराजुद्दीन मोहम्मद बहादुर शाह गाजी रूप बहादुर शाह ज़फ़र बहादुर शाह जफर अकबर शादी का दूसरा बेटा था जो लाल बटन से उनका सिर्फ लाइनर 11 वीं पोस्ट में शहंशाह जहीर उद्दीन मोहम्मद बाबर से मिलता है यह में पैदा
हुए बहादुर शाह जफर खान ने का आखिरी बादशाह और उर्दू का एक बेहतरीन और नाम था इब्राहिम जॉब के शागिर्द थे जॉब आफ मिर्जा गालिब शायरी में रहनुमाई हासिल करते थे थे कि सन 1252 हिजरी व मुताबिक 1837 इस विधि को कलाई दिल्ली में उनकी तक नशीनी की रस्म अदा की गई नजाने यह बात करते हैं हिंदुस्तानियों की अंग्रेजों के खिलाफ पहली जंग ए आजादी की अंग्रेजों ने इस जंग को नाम इसके दो सब बयान किए जाते हैं पहला यह कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने हिंदुस्तान के तमाम सुबह और कई रियासतें के बाद ग्रे अपनी
हुकूमत में शामिल कर ली थी जिसकी वजह से हिंदुस्तानियों के दिल में कंपनी के मुतालिक शिशु पैदा हो गए दूसरा यह के उन दिनों जो कारतूस फौजियों को दिए जाते थे वह आम दयाल के मुताबिक सुअर और गाय की चर्बी से आलू थे और इन्हें बंदूक को में डालने से बेहतर दांतों से काटना पड़ता था कि हिंदू और मुसलमान फौजी सिपाहियों ने इसे मजाक के मनाली समझा और उनमें खलबली मच गई जिन सिपाहियों ने इन कारतूसों को इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया उनकी फौजी वर्दियां तार कर उन्हें बेड़ियां पहना दी गई थी एक नजर
इन उन कैदियों में बहुत से ऐसे थे जिन्होंने अंग्रेजों की खातिर बड़ी बड़ी कुर्बानी अतिथि जंग-ए-आज़ादी यह एंड का आगाज सन 1857 में बंगाल में दमदम और बार पुत्र के मुख्य मार्ग पर हुआ जहां देसी सिपाहियों ने उन कारतूसों के इस्तेमाल से इनकार कर दिया जिनमें उनके खेल के मुताबिक सुअर और गाय कि जब भी लगी हुई थी अंग्रेजी हुकूमत ने उन सिपाहियों को रेयर मुसल्ला करके फौजी मुलाज़मत से बर्खास्त कर दिया लखनऊ में भी यही बात यह पेशा या बर्खास्त सिपाही मुफ्त में फैल गए और फौजों को अंग्रेजों के खिलाफ उभरने लगे 9 मई
सन अट्ठारह सौ सत्तावन को मेरठ में सिपाहियों ने चर्बी वाले कारतूस इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया दो सिपाहियों मंगल पांडे और ऐश्वर्य पांडे ने अंग्रेजों पर हमला कर दिया मंगल पांडे को गिरफ्तार कर लिया गया आप और उसे सजा-ए-मौत दी गई एक रजमत सिपाहियों को 10 साल कैद बामुशक्कत की सजा दी गई थी कि जिस तरीके से युक्त सुनाया गया वह भी तहजीब से घिरा हुआ था देसी सिपाहियों ने अंग्रेज अफसरों को हलवा करके उन कैदियों को आजाद करवा लिया और मेरठ से दिल्ली की तरफ बढ़ने लगे मिनट के सिपाहियों की दिल्ली में आमद
से दिल्ली की फौज और भी बिगड़ गई और दिल्ली के मुगल ताजदार बहादुर शाह जफर की तरफ मशीनी का ऐलान कर दिया गया इस ऐलान के बाद बगावत की आग दूर तक फैल गई यही में लिए हुकूमत के दो एक नजर इन बिला शुब्हा यह एक हकीकत है कि सन अट्ठारह सौ सत्तावन की जंग ए आजादी यह हिंद जिसको अंग्रेजों ने बगावत का नाम दिया है कि खात्मे के बाद बर्तानिया हिंदुस्तान पर एक मुथलिक अलार्म ताकत बन गई और अपनी मंशा के मुताबिक फैसले करने लगे यौन उत्पीड़न फौजी के मेष सत्ताईस जनवरी सन अट्ठारह सौ
सत्तावन को दिल्ली में जमा हुआ उसकी तस्वीर चीफ कमिश्नर पंजाब जॉन लॉरेंस की हिदायत के मुताबिक डिवीजन कमांडर मेजर जनरल एन सी विज के हुक्म से अमल में आई यह कमीशन एक सदर और चार अरकान पर मुश्तमिल था सरकार की जानिब से वकील ने इस्तगासा मेजर एप्स जय हे रोट डिप्टी जज एडवोकेट जनरल थे कि अदालत का फैसला शुकर तारीख सन अट्ठारह सौ सत्तावन की सत्ताईस जनवरी को दिन के 11:00 बहादुरशाह जफर के मुकदमे की समाधि के लिए लाल किला दिल्ली के दीवान-ए-खास में शुरू हुआ बहादुर शाह जफर पालकी में बिठाकर 60 ही रायफल्स के
जवानों की हिरासत में फौजी अदालत में पेश किया गया 82 साला जब होना तमाशा को एक कैदी की हैसियत से तकरीबन डेढ़ घंटा तक खड़ा रखा गया बहादुर शाह जफर पर मुकदमा चलाया गया कि हिंदुस्तान में बर्तानवी हुकूमत का वजीफा सवार होने के बावजूद उसने दिल्ली में बागियों की मदद जो नुसरत कि इस वर्ष बरपा कि जुर्म का इकबाल किया हिंदुस्तानी अवाम को जान-बूझकर जंग और बगावत में धकेल दिया यूरोपीयन अवाम का कत्लेआम किया सरकारी वकील ने कहा कि कैदी को सजा दी जाए मगर लेफ्टिनेंट जनरल आर सेटल विल्सन ने बहादुरशाह जफर को समाधि दी
थी अ कि जब बहादुर शाह जफर से जुर्म का पूछा गया तो कुछ देर तक खामोशी इस प्यार की और कहा तो सिर्फ इतना कहा कि नहीं यह झूठ है ना दिन यह कदम 21 दिन तक चलता रहा मार्च की नौ तारीख को फैसला हुआ करीब 18 मुस्तबा चश्मदीद गवाह पेश किए गए दोस्तों के अस्करी दस्तावेज पेश किए गए जिनका ताल्लुक बहादुर शाह जफर से था 29 मार्च सन अट्ठारह सौ सत्तावन को बहादुरशाह जफर को कॉल मी मुजरिम करार देकर बेहतरीन मिसाल कायम की गई और रघु भेज दिया गया जहां उनकी वफात मोरखा जो नवंबर
सन् 18062 हुई उनके दो बेटों और एक पोते को गोली से उड़ा दिया गया दिल्ली पर अंग्रेजो का कब्जा हो जाने से हर जगह जंग-ए-आजादी की अवतार मद्धम पड़ गई मार्च 1858 में लखनऊ पर दोबारा अंग्रेजों का कब्जा हो गया कि यहां भी जुल्मों सितम का खौफ नाक बाप दोहराया गया दिल्ली लखनऊ कानपुर और झांसी के इलावा चंद और मक्का बाद भी अंग्रेजों के तस रूप में आ गए जंगे आजादी का नारा अंग्रेजों को हिंदुस्तान से निकाल दो था इसलिए इसमें तमाम ऐसे अनासिर शामिल हो गए जिन्हें अंग्रेज से नुकसान पहुंचा था वह धोलासर एक
पुस्तक का दुश्मन के खिलाफ व्यक्ति या तो हुए थे मगर बदनीयत और कौमियत के तसव्वुरात से नाआशना थे इनमें मफत परत इतना पर दास लोग भी शामिल थे जिन्होंने मजहब के नाम पर अफसरों का डाला दुकानदारों को लूटा गया किसी घर या मोहल्ले को लूटने के लिए यह अफवाह काफी थी के यहां गोरा यानि अंग्रेज छुपा हुआ है नजर इन बहादुर शाह जफर जिसकी बात शायद का ऐलान बाकी सिपाहियों ने कर दिया था और फिर बादशाह ने ऐलान किया कि हमें हिंदुस्तान का बादशाह हूं और आप लोग हिंदुस्तानी फौज के सिपाही कि आज मैं अपनी
तरफ मशीनी का ऐलान करता हूं आज के बाद इस्ट इंडिया कंपनी को कोई इलाज की रकम नहीं देगा और हम यह भी ऐलान करते हैं यह फिरंगी हमारी मम लिख सकते हैं से निकल जाएं सिपाहियों के नाम लिखकर तनख्वाहें मुकर्रर कर दी गई बोल खजाना वैसे तो खाली था मगर वतन की मोहब्बत में मिले हुए महाराणा प्रताप और बादशाह अकबर और शिवाजी की औलादों को एक होने पर मजबूर कर दिया वहीं दर्शकों जंगे आजादी का असर बड़ा होकर किया गया और रकम बादशाह की नजर कि जिससे सिपाहियों को तनख्वाहें दी जाने लगी तो मिल गई
मगर ऐसा सिपहसालार मिल सका न दिन यह जंग मुकर्रर वक्त से पहले शुरू हो गई थी इसलिए झांसी की रानी कि तांतिया टोपी बहादुर शाह जफर में से कोई भी तैयार न था और गद्दारों की भी कोई कमी न थी झांसी की रानी को शिकस्त हुई उसके बाद वह मर गई तांत्रिक टोपी लापता हो गए सारा बोज एक लागर और जज बादशाह के सर पर आन पड़ा जंग में मिर्जा अबू बकर को सिपहसालार बनाकर भेजा गया जो बहुत अच्छा लग रहा था मगर सरदारों ने उसको शराब पिला दी जिसकी वजह से जन्म में मुगल सल्तनत
की फौज हार गई थी एक नजर इन उसके बाद एक नया सिपहसालार बहादुरशाह के पास आया और कहा आगे से जन्मे शुरू करता हूं उसने बहादुरशाह जफर को दिल्ली छोड़ने की दरख्वास्त की और कहा कि दोबारा हमला करके दिल्ली फतह कर लेंगे मगर तकदीर समझें या मुगल बादशाह का आश्चर्य दिल्ली से लगाओ बादशाह ने जाने से इनकार कर दिया और मकबरा युद्धों में बना ली बादशाह बादशाह के करीबी गद्दार हकीम ऐश्वर्या ने अंग्रेजों को बादशाह का पता बता दिया जिससे बादशाह को गिरफ्तार कर लिया गया न दोनों मुगल सल्तनत का सूरज शुरू हो गया और
फिरंगी इलाज शुरू हो गया है एक नजर इन इस बात में कोई शक नहीं कि मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर जंग-ए-आजादी यह हिंद की जान थे उनके होते हुए जंग-ए-आजादी सही तरह से शुरू हुई मगर उनके कैद होने के बाद मंद पड़ गई फिर भी जंगली आज़ादी-ए-हिंद की बुनियाद रखने वाला बादशाह बहादुर शाह जफर ही है तभी जाकर सौ साल बाद आजादी मिली अगर बात शाम रात लेते तो हिंदुस्तान में आजादी क सूरज शायद देर से शुरू होता न दूंगी कि के बाद अंग्रेज़ों ने शहरी आबादी से सौंफ नाथ इंतिक़ाम लिया लोगों को बेहतर एक
कत्ल किया गया सैकड़ों को फांसी पर चढ़ा दिया गया हजारों फैंस गोलियों से उड़ा दिए गए उनमें मुजरिम भी थे और बेगुनाह दी मुसलमान भी तलवार के घाट उतार दिए गए और हिंदू भी हिंदुस्तानियों को तोपों के सामने खड़ा करके तोप चला दी जाती जिससे उन इसमें के चीथड़े उड़ जाते सिर्फ एक दिन में 24 मुगल शहजादा मे फंसी के तख्ते पर लटका दिए गए मुसलमान चुन-चुनकर कत्ल किए गए बहुत से मुद्दे और मुसलमानों की जायदादें तबाह हो गए मामूली सफलता की बुनियाद पर मुसलमानों को उनकी जागीरों से बेदखल कर दिया गया जिसकी वजह से
वह कोड़ी कोड़ी को मोहताज हो गए हैं कि इन होलनाक मजा लेने का याद आ उन मुकदमा दर्ज किया गया जहां पहले जन की आग भड़की थी इन मसालों का जिक्र मिर्जा गालिब ने अपने कुएं में भी किया है जल्द ही अंग्रेजी फौज के सिपाहियों ने कत्लोगारत में फिरका वाराना रंग भर दिया उन्होंने मुसलमानों पर जुल्म ओ सितम की इंतहा कर दी मुसलमान रोजी कमाने के लिए घटिया और कमतर पेशे को अपनाने पर मजबूर हो गए दफ्तरों में उन्हें चपरासी चौकीदार या बगैर चीज जैसे काम ही मिलते थे सरकारी मुलाजिमों के इश्तिहार में यह चतुर
बजे कर दी जाती थी कि मुसलमान इस अवधि के हल नहीं हिंदू सिख और मसीह ही मुसलमानों से आगे निकल गए मुसलमान को लंबा ने अंग्रेजी समान पढ़ने और सीखने को खिलाफ पिछड़ा करार दिया था जिससे मुसलमानों ने यह समान नहीं सीख कि जिसकी वजह से वह तरक्की न कर सके तो कि नजर इंजन की आजादी के दौरान तकरीबन चार हजार अंग्रेजों की मौत बातें हुई जिसके जवाब में 12 लाख हिंदुस्तानियों का खून बहाकर भी अंग्रेज का उत्साह कम नहीं हुआ उन्होंने अगले 14 साल तक कभी हिंदू का और कभी मुसलमान का खून बहाया अगस्त
सन् 1858 में बर्तानवी पार्लियामेंट में ऐलान किया कि मलिका विक्टोरिया के जरिए ईस्ट इंडिया कंपनी का हातिमा करके हिंदुस्तान को ताजे भत्ता नियति सपोर्ट कर दिया जाए उस जन्म के बाद दुश्मन मुसलमान विजेयता बाय जबकि हिंदुओं ने मुकम्मल तौर पर अंग्रेजों से मुखड़ा मत कर ली जो मुसलमानों पर यदि दिल के दरवाजे बंद कर दिए गए और खुद मुसलमान भी नई दुनिया से दूर होते चले गए ऐसे में सर सैयद अहमद खान जैसे लोग सामने आए जिन्होंने उस जंग-ए-आजादी की गुहार पर रोशनी डाली और अंग्रेजों पर जोर दिया कि हिंदुस्तानियों में मौजूद एहसास नेहरू मी
को दूर करके ही अंग्रेज यहां हुकूमत कर सकता है सर सैयद अहमद खान ने मुसलमानों में ताली में इंक़िलाब लाने के लिए कॉलेजेस और यूनिवर्सिटीज कान की उस जंग-ए-आजादी में हिंदू और मुसलमान मिलकर हिंदुस्तान के लिए दौड़े मगर उसके बाद अंग्रेज की साजिश और कुछ हिंदुओं के रवैए की वजह से मुसलमान और हिंदू अलग-अलग गांवों की सूरत में बैठ गए जो पहली मर्तबा दो कॉल मी नजरिए की बुनियाद पड़ी थी एक नजर इन कहा जाता है कि सन अट्ठारह सौ सत्तावन में अंग्रेज में जरूर संघ के हिंदुस्तान के लिए बोले गए तोहीन आमैज अल्फाज दमदमे
में हम नहीं अब खैर मांगो जान कि ऐसा फटी हुई अब तेज हिंदुस्तान की इन अल्फाज का जवाब बहादुर शाह जफर ने आम हिंदुस्तानी के दिल की आवाज़ की शक्ल में कुछ इस तरह दिया था राज्यों में बू रहेगी जब तलक ईमान की तख्ते लंदन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की नजर इन मुगलिया सल्तनत की दास्तान स्थित आम मजबूर हुई है एक नजर इन उम्मीद है कि आपको हमारी का विष पसंद आई होगी जाने से पहले आपके लिए हमारी तरफ से मुगलिया सल्तनत के आखिरी हुक्मरान बहादुर शाह जफर की आखिरी गजल तो फत्तन पेश-ए-खिदमत है अच्छा
लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में किसकी बनी है आलम-ए-नापायेदार में बुलबुल को बागबां से न सय्याद से गिला किस्मत में कैद लिखी थी फ़स्ल-ए-बहार में कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें इतनी जगह कहां है दिल-ए-दाग़दार में 2017 के गुप्त बैड के बुलबुल है शादमां इन कांटे बिछा दिए हैं लार में कि उम्र-ए-दराज़ मांग के लाए थे चार दिन दो आरजू में कट गए दो इंतजार में 13 जिंदगी के खत्म हुए शाम हो गई महिला के पांव सोएंगे कुंजे मज़ार में कि कितना है बदनसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए कि कितना है
बदनसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए में दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में कि इजाजत दीजिए अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त आपका हम यू नासिर हो कर दो झाल