वेद का पाठ पाप समन में सद्गुण वृद्धि में पुण्य वृद्धि में सुप्रसिद्ध है वेद पाठ कोई द्विवेदी होता है कोई त्रिवेदी होता है कोई चतुर्वेदी होता है द्विवेदी बैठे हैं अगर त्रिवेदी आ गए तो द्वेदी उठकर उनका सत्कार करें क्योंकि तीन वेद का पाठ जानते हैं और चतुर्वेदी आ गया तो द्विवेदी एक वेदी त्रिवेदी सभी उसका आदर करें वेद के पाठ का वेद के ज्ञान का इतना भारी महात्म है लेकिन उस वेद पाठ में भी आरंभ में और अंत में हरि नाम उच्चारण करने का आदेश है कि उच्चारण में कहीं क्षति हो गई क्ति ना
हो आरंभ में हरि नाम ले और आरंभ के बाद जब पूर्ण होता है तो हरि नाम लेने से क्षति क्षम हो जाती हरति पात कानी दोषण इति श्री हरि हरति अक्षर द्वयं यह दो अक्षर वाला हरि नाम जिसके मुख में है उसको और तीर्थों में जाकर प्रायश्चित करने की आवश्यकता नहीं पड़ती तुलसीदास जी ने अपनी भाषा में कहा कलयुग केवल हरि गुण गाह कलयुग केवल हरि गुण गाह गावत नर पावई भव था यह संसार बड़ा विशाल भव सागर है इसमें कई लोग गोते खाते खाते गायब हो गए अरबों अरबों लोग पैदा होकर बेचारे चले गए
खरबो रबों लोग हो हो के चले अभी भी अरबों लोग संसार में गोते खा रहे हैं और समय की धारा में सब लोग मृत्यु की विष उदधि में खो जाते हैं संसार उसे कहते हैं जो सरकता जाए जो बदलता जाए अक्षर दो तत्त्व है एक होता है अक्षर बदलने वाला दूसरा होता है अक्षर शर उ से कहते हैं जो सरकता जाए बदलता जाए अनित्य है कितना भी संभाल के रखो और टके नहीं उसे शर कहते हैं अक्षर उसे कहते हैं कि कितना भी बदला हट और कितना भी बन बन के मिट जाए फिर भी जो
आपका साथ नहीं छोड़ और जो कभी मिटता नहीं है उसे अक्षर कहते हैं तो जिनकी क्षर में रुचि है वे संसार सागर में डूब मरते हैं कई जन्म से जन्मांतर तक भटकते रहते लेकिन शर में रहते हुए भी जो अक्षर की उपासना करते हैं नश्वर में रहते हुए भी जो शाश्वत की शरण जाते अनित्य में रहते हुए भी जो नित्य का अनुसंधान करने का सौभाग्य पा लेते क्ण भंगुर में भी जो स्थाई को खोजने के लिए ललक लगा लेते हैं मिथ्या संसार मिथ्या व्यवहार मिथ्या शरीर और मिथ्या दुख सुख में भी जो एक सत्य को
सार समझते उनको दुख का प्रभाव दबा नहीं सकता उनको सुख का स्वभाव प्रभाव विमो नहीं कर सकता तुच्छ जीव सुख में विमो हो जाते हैं और दुख में भी दुखी हो सारा संसार इन दो रस्सियों से बंधा है सुख की लालच और दुख का भय इन दो से सारे के सार अंतःकरण मलिता को प्राप्त हो सुख की लालच अगर शर में है दुख का भय भी क्षर से होता है अक्षर में ना सुख की लालच है न दुख का भय है अक्षर अर्थात अविनाशी आत्मा आनंद स्वरूप शांत स्वरूप सुख स्वरूप उसमें सुख और दुख दोनों
आते जाते रहते शर शरीर है शर संसार है और अक्षर आत्मा है गीता में भी क्षर अक्षर की महिमा वचन आए नजर अगर अक्षर पर है तो कितना भी आप कुछ भी बन जाओ शर द्वैत है द्वैत विवादास्पद है हो चाहे समष्टि हो लेकिन द्वैत परिछन हमेशा विवादास्पद होता है व्यापक ब्रह्म जो है राम ब्रह्म परमार्थ रूपा व अक्षर है जैसे मकान घड़े वस्तुएं पैदा होकर मिट जाती लेकिन आकाश उनकी अपेक्षा अक्षर वस्तु अक्षर है आकाश अक्षर है लेकिन जहां आकाश भी मिट जाता है फिर भी जो नहीं मिटता वोह परब्रह्म परमात्मा अक्षर है और
वही परब्रह्म परमात्मा आत्मा होकर अभी हमारे आपके सभी के साथ अनुसत है अनुसत उसको बोलते हैं जो सब समय में हो अन्वय व्यतिरेक जैसे अभी जागृत है तो स्वपना नहीं देखते हम जब स्वपना देखते तो जागृत नहीं होता जब गहरी नींद होती है तो ना स्वपना होता है ना जागृत होता है लेकिन वह अक्षर परमात्मा कल के जागृत में भी था रात के स्वपने के समय भी था स्वपना पैदा होकर मिट गया फिर भी अक्षर नहीं मिठ गहरी नींद आई कुछ नहीं देखा था कुछ देखने को भी जानने वाला मौजूद था कुछ नहीं देखा आनंद
से सोया था थकान मिट गई रात्रि जागरण से पित्त प्रकोप होता है इसलिए रात्रि का जागरण अथवा दिन को जो शयन करते भोजन करके दिन का शयन वायु प्रकोप और अजरण करता है तो वायु प्रकोप हुआ उसको भी कोई जान रहा है और मिट गया उसको भी कोई जान रहा है जो जो जान रहा है वह अक्षर है और जो हो रहा है वह अक्षर है तंदुरुस्ती थी उसको भी मैं जान रहा हूं और बीमारी थी उसको भी जान रहा हूं अब वृद्ध अवस्था है उसको भी मैं जान रहा हूं शरीर की मृत्यु आएगी उसको
भी अगर अक्षर भाव में जानू तो मैं अक्षर को पाऊंगा और अक्षर वाला अक्षर हो जाएगा अगर मैं गलती करता हूं कि येर शरीर है मर रहा है हाय रे मैं मर रहा हूं मेरे पैसों का क्या होगा मेरी बेटी का क्या होगा मेरे बेटे का क्या होगा मेरे दुकान का क्या होगा मेरे घर तोर का चिंतन करते करते फिर वही मेरी आत्मा भटकेगी फिर चाहे चिपकली होकर आऊ चाहे वहां का कुछ बैल बन कर आऊ या कोई जीव जंतु बन कर आऊ जहां चिंतन होगा वहीं फिर आना पड़ेगा विल विल फाइंड ए वे जहां
चाह होती वहां राह बन जाती है तो क्षर संसार में क्षर शरीर में अक्षर ईश्वर का ज्ञान अत्यंत आवश्यक है पेट भरने का ज्ञान तो ना भी पालो तभी भी पेट तो मकोड़ा चीटी और मच्छर भी भर लेता है और बच्चे पैदा कर लेता है पेट भरने का ज्ञान कोई बड़ी बहादुरी नहीं है हृदय को हृदयेश्वर के ज्ञान से जो संपन्न करता है उसका मनुष्य जीवन सु तो हृदयेश्वर का ज्ञान है अक्षर तत्व अक्षर आत्मा है शर शरीर और संसार है अक्षर आत्मा परमात्मा है तो बाबा जी आत्मा और परमात्मा में क्या फर्क है कि
अपने परिछन शरीर में जो चैतन्य है उसका नाम आत्मा पड़ता है और जो व्याप रहा है उसको परमात्मा बोलते जैसे घड़े में आकाश आया तो उसे घटा आकाश कहते और व्यापक आकाश को महाकाश कहते पाच साल के थे आठ साल के थे 10 साल के थे पूजा पाठ करते जय शिव ओमकारा शिव पार्वती प्यारा पीता बरवा गंबर शोभे लेकिन 80 साल के तभी भी वही आरती घुमा रहे और पीतांबर वागम शोभे तो आपने अभी अक्षर का शांति नहीं पाई अक्षर का ज्ञान नहीं पाया 80 साल का बूढ़ा भी अभी केजी पड़ रहा है शुरू शुरू
में यह पूजा पाठ आरतियां है पूजा पाठ और आरती का फल है कि सत्संग में रुचि हो जाए और सत्संग का फल है कि अक्षर में शांति मिल जाए अक्षर का आनंद मिल जाए अक्षर का अनुभव हो जाए पता चले कि जो अक्षर है वही मैं हूं और जो मरता है वह शरीर है दुखी होता है वह मन है और बीमार होता है वह तन है प्रॉब्लम आते हैं प्रॉब्लम का चिंतन करता है वह मन और मति है इस दोनों को यह दोनों प्रॉब्लम और प्रॉब्लम का चिंतन करने वाले दोनों क्षर है लेकिन उसको खने
वाला अक्षर है जब अक्षर का चिंतन बढ़ेगा तो आपके सारे दुख सदा के लिए मिट जाएग शर का चिंतन बढ़ेगा तो दुख और प्रॉब्लम और परेशानिया बढ़ जाएगी रॉक्स फेलर बड़ा स्मार्ट लड़का था 18 साल की उम्र में उसने कई मिलियन डॉलर कमा लिए एक मिलियन बराबर पाच करोड़ साढ़े करोड़ 21 साल की उम्र में स्टंडर वकम कंपनी बड़ी कंपनी का वह मालिक बन गया और 50 साल में तो उसने कई कंपनियां खरीद ली कई करोड़ नहीं कई अरबों का वह मालिक हो गया लेकिन मालिक हुआ क्षर वस्तुओं का मिटने वाली कंपनियों का मिटने वाली
वस्तुओं का तो चिंतन बाहर का इतना फास्ट हो गया कहीं इनकम टक्स का कहीं सेल टैक्स का कहीं नौकरों का कई उग्रणी का तो शर में इतना चिंतन बढ़ गया कि उसकी दिन की भूख मर गई और रात की नींद मर गई 53 साल की उम्र में तो उसको ऐसी दशा में हो गया कि कई डॉक्टरों को बुलाकर कान्फ्रेंस की क्या आखिर मेरी लाइफ कैसे बचेगी कैसे डॉक्टर ने कहा य विल बी एक्सपायर्ड विदन सिक्स मंथ छ म के अंदर आप मर जाओगे आपका चिंतन इतना बड़ा विस्तार किया है तो उसके चिंतन में आपको रात
की नींद और दिन की भूख मर गई स्वामी विवेकानंद उस समय अमेरिका में थे और रॉक्स फेलर का सौभाग्य है कहां गया विवेकानंद ने कहा कि इस जगत को जो अपना मानकर बढ़ाओ और और और और फिर उसकी संभाल करते करते तुम्हारी य दुर्दशा ई जो सदा अपने आप संभला हुआ है उसके लिए तुम प्रीति जगाओ तो इस संसार का लोभ मिटाने के लिए दान करो यह मेरा मेरा मेरा मेरा हमारा हमारा ही तेरी भूख मार दिया किसी का राह नहीं कितना भी छटपटा के संभाल संभालते आखिर तो छोड़ना ही पड़ता है तो जो रहना
है व रहना है छूटना है छूटना है तनाव टेंशन बढ़ाने की क्या जरूरत है जब जितना लोभ को मिटाना है तो दान करो रक्स पलर ने बात को क्योंकि मौत सामने दिख रही है बात को गंभीरता से लिया और जो धन बढ़ाने में लगा चिंतन वो धन का सदुपयोग करने में लगा कई सभा सत्संग अ ईसाइयों के चक्कर में था तो रॉक्स पेलर कन्वेंशन हॉल बनाया लंडन में धर्मांतरण करने के लिए जो हॉल बना करोड़ों रुपए का व रॉक्स पलर के दूसरे कुछ बगीचे बनाया कोई उपासना करया जैसे भी अच्छे कामों में ल तो जो
मेरी मेरा मेरा अक्षर का चिंतन था वो गॉड का है ऐसा करते करते जगत का चिंतन हुआ निश्चिंत था धीरे-धीरे स्वास्थ्य सुधरता गया वह जब 93 साल का हुआ तो उसने भाषण दिया कि मैं 53 साल में मरने की कगार पर था लेकिन संग्रह की जगह पर भोग की जगह पर सेवा में हमने अपने चित को बदला तो जो खुशी मिली रस आया उसी से फिर रस वानि का रस भी काम करने लगा दूसरे एक आदमी को विज्ञानियों ने पूछा कि तू 87 साल का है रिटायर हो गया फिर भी संस्था में इतना काम कर
रहा है घर का किराया खर्च के जाता है संस्था में और रोटी घर की खाते तुमको क्या मिलता है बोले मेरे को अच्छा लगता है तो तुम बीमार नहीं रिटायरमेंट ने के बाद भी इतना पर श्रम करते संस्था में बोले तुम लोग डॉक्टर हो विज्ञानिक चक उसका ब्लड टेस्ट किया गया यूरिन टेस्ट किया तो कई बीमारी पाई गई तो तुम्हारे को तो बहुत बीमारियां है बोले बीमारिया होगी तो होगी तुम जा चते रहो मैं तो खुश हूं तो मानव वैज्ञानिकों ने कहा कि जो सत्कर्म करते तो सत्कर्म करने की जो अंतरात्मा की प्रसन्नता होती है
अब आ गए फिर वो वैज्ञानिक भाषा यहां पूरी हो गई वो निष्काम से आप जाने अनजाने अक्षर के करीब आ जाते हैं जय राम जी के वो बेचारे नहीं जानते वो बोलते खुशी मिलती है खुशी तो और ढंग से भी मिलती है लेकिन जब स्वार्थ चला जाता है सुख की लालच और दुख का भय चला जाता है तो जीवन में निश्चिंता आ जाती और निश्चिंता से जो अक्षर का रस आता है उससे आरोग्य और प्रसन्नता बनी रहती अभी सन्यासी महाराज है महाराज हाथ ऊपर करने का कष्ट करो इनको मैं पुष्कर में 15 18 साल वैसे
का वैसा देखता हूं वैसे के वैसे कोई फर्क नहीं क्या बात बोले बस चार घरों से भिक्षा मांग के खाते भगवान का भजन करते तो मेरा तेरे की फिक्र नहीं है तो अक्षर में जानकर पहुंच गए फिर शरीर बदलो चाहे ना बदलो जो भी हो अनजाने में भी जब पहुंचते हैं तो फायदा होता है तो अब आप लोगों को क्या करना चाहिए कि आप सुबह नींद में से उठे तो अपने दाएं हाथ की तिलक करने वाली नीची उंगली से दूसरे नंबर की अंगूठे से चौथे नंबर की ये उंगली इससे आप ललाट में ति ल करें
ऐसे ही करें चाहे चंदन ना हो सुबह सुबह ऐसे करें प्रणाम करने की विधि बड़ा आसान है आप यूं पड़े रहो मथा टेक केस कई लोग कमर पीछे ऊंची रख देते नहीं ऐसे पड़े रहो हे सृष्टिकर्ता में तेरी शरण हे परमात्मा में तन से से मन से मति से जो भी तेरा ऐसा करके पड़े रहे सिर धरती पर होगा हाथ मिले हुए होंगे तनाव नहीं होगा बस पड़े रहना है तो एक शर शरीर थोड़ी देर निश्चिंत हो जाएगा तो लाभ बहुत भारी होगा दिखता तो छोटा काम है लेकिन इसका फल बहुत भारी आपने जो रात
भर खाकर पचाया है वो ओरा ऊर्जा और सुबह का समय ब्रह्म मुहूर्त होता है सूर्य उदय का समय होता है उस समय वातावरण में ओजोन गैस विज्ञानी ओजोन गैस बोलते हम लोग सत्व बाधा होती है जीवनी शक्ति होती बीमार आदमी से भी जाकर सुबह मिलो तो वो बोलेगा बुखार भी दो डिग्री कम बताएगा यंत्र सुबह आरोग्य के कण विशेष होते हैं ब्रह्म महूरत होता है सिख धर्म ने कहा चार अमृत वेला होती एक तो सूरज उगने से सवा दो घंटे पहले से लेकर सूरज उगने तक ब्रह्म वेला मानी जाती है दूसरा ब्रह्म वेता महापुरुषों का
जब दर्शन होता है तो ब्रह्म वेला है अमृतवेला सिख धर्म तीसरा उनका सानिध्य होता है तभी भी अमृतवेला और चौथा ब्रम स्वरूप परमात्मा का ध्यान करते वो अमृत वेला अर्थात सुबह की अमृत वेला संत दर्शन अमृत वेला परमात्मा का ध्यान अमृत वेला और सत्संग अमृत वेला ये चार अमृत वेला तो सुबह आप दो अमृत वेला तो ला सकते हैं एक तो अमृतवेला है ही है प्रकृति दूसरा ब्रह्म परमात्मा का तू अक्षर है तू कैसा है हम नहीं जानते लेकिन हम जैसे तैसे हैं तेरे यह तो आप कर सकते नहीं कर सकते हम वही कहते हैं
जो आप कर सकते हैं और हम वही सोचते हैं आपके लिए कि जो आपके लिए कम समय में ज्यादा लाभदाई हो इसलिए हमारी गिरा की बड़ी तेज रहती है कई जगह पर सत्संग के लिए लोग लकते रहते हैं 365 दिन में प्रोग्राम दे तो आधा दिन भी नहीं कहीं रह सकते सब ब्रेक मार के कुछ दिन विश्रांति एकांत तो एकांत जो है अक्षर में आने का सुंदर तरीका और सुबह जैसे एकांत मिलना संभव नहीं तो जाने अन जाने आप अभी तो पता नहीं अक्षर तू है कैसा है लेकिन हम नहीं भी जानते लेकिन अक्षर मतलब
वो परमात्मा की शांति में शांत हो शुरू में आप दो मिनट पड़े रहने का संकल्प कर लो बस दो मिनट तक नहीं उठेगा सिर दो पाच दिन में आपको शांति आने लगेगी दिन भर का आपका मंदिर की घंटी घंटे बजाने से जिनको जो लाभ होता है उनसे आप 10 गुना आगे पहुंचा जाओगे दो मिनट सुबह फिर से कह देता हूं दिन भर जो मंदिरों में इधर उधर रोज नियम करते हैं घंटी घंटे बजाते हैं शिव ओम का आराध पार्वती कारा पीतांबर बागमबर ये जो करते रहते हैं आरट की नाई घुमाते रहते हैं अपनी जिंदगी उसकी
अपेक्षा यह दो मिनट सुबह आपको बहुत आगे ले जाएगा अगर तीन चार मिनट तक पहुंच जाते तो और अच्छा है 5 मिनट पहुंचते तो और अच्छा है एक काम ये करो अक्षर में आओ दूसरी बात है के व्यवहार काल में सावधान ना हो शर माना नश्वर अक्षर माना शाश्वत नश्वर शरीर में हो नश्वर व्यवहार में हो नश्वर रत भात में हो तो सावधान रहना कि जो कुछ भी हो रहा है शर है अर्थात नश्वर है और देखने वाला अक्षर है शास्त्र भी कहते हैं भगवान कृष्ण की वाणी है और आपका भी अनुभव है बचपन और
उसके खिलौनों की परिस्थितियां अक्षर हो गई लेकिन तुम्हारा मैं अक्षर है बचपन के वह मित्र नहीं है बचपन की वह तोतली भाषा और मती नहीं है बदल गई लेकिन मेरी बचपन में मैं ऐसा सोचता था बचपन में मैंने ऐसा किया था बचपन में मैंने यह बेवकूफी की अब आपको मैं अपनी बेवकूफी बता दूं मेरे पिता ने गुरु जी ने कहा कि ये तो बड़ा संत बने फला जो भी तो मेरे पिता ने मेरे प्रति स्नेह दिखाते थे ज्यादा तो एक बुशर सिला दे और उस पर हीरे जड़वा दे ही नकली रे होंगे तो मेरी बुद्धि
में आया कि आसमान के तरफ नजर गई तो मैंने सोचा तुम भी कोई बड़े सेठ का बेटा होगा तुमने भी हीरे वाली कमीज पहनी है बट मैंने भी हीरे पहने तुम्हारे जैसे हमारा भी अभ मेरी बुद्धि का छोटा सा था ये बुद्धि का आप समझ रहे हैं हिसाब किताब खाली मेरी बुद्धि नहीं अपने सब की ऐसी हालत होती एक चॉकलेट भी चबा जरा सा खोल के मम्मी मैंने चॉकलेट खुद खोल दिया देखा देख मैंने खुद खा रहा हूं करते थे कि नहीं करते हैं जैसे अभी बचे खते ऐसे अपन भी तो वहीं से आए उस
परंपरा से तो बचपन की बेवकूफी वाली मति बदल गई बदली ना शरीर बदल गया माहौल बदल गया लेकिन वो देखने वाला तो अभी भी है ना कि बचपन में मेरी बुसट ऐसी थी और मैंने ऐसा सोचा था तो ना बुसट रही ना शरीर रहे ना अस्तिया हो र हर सात साल में तो हड्डिया भी बदल जाती फिर भी जो नहीं बदला वह अक्षर मेरा आत्मा है मैं और जो बदल गया र ऐसे फौज में भर्ती हुए कर्नल हुए पोस्टिंग हुई प्रमोशन हुए बदली हुई सब क्षर में हुई उन सबको जो जानता है वह कौन है
इतना सरल है परमात्मा का ज्ञान इतना परमात्मा निकट है कि भाई आप उसको कभी छोड़ नहीं सकते और संसार को आप सदा रख नहीं सकते ना बचपन रख सकते ना जवानी रख सकते ना दुख को रख सकते ना सुख को रख सकते संसार को आप रख नहीं सकते और परमात्मा को आप छोड़ नहीं सकते जिसको छोड़ नहीं सकते उसकी प्रीति उसका ज्ञान जिसको रख नहीं सकते उसका ज्ञान और वैराग जिसको रख नहीं सकते उसका ज्ञान हो जाए कि ये तो ऐसे ही है क्या करें नींद नहीं आती तो होता है उडपा है क्या करें घुटनों
में दर्द है दुखी हूं दुखी हूं सोचकर दुख बढ़ा मत ये होता है शर में हो रहा है लेकिन इसको जानने वाला सुख स्वरूप है उसका चिंतन कर दुख का चिंत करेगा दुख बढ़ेगा शर का चिंतन करेगा टेंशन बढ़ेगा अक्षर का चिंतन करेगा टेंशन के बीच होते हुए भी टेंशन रहि तनाव रहि तो पाश्चात्य जगत के लोग हम लोगों से ज्यादा दुखी क्यों है सुविधाएं तो है राजनीति भी उनकी कादे कानून बड़े तगड़े हैं लेकिन फिर भी अशांति और दुख हम लोगों से कई गुना ज्यादा है क्योंकि उनके पास ऐसा सत्संग नहीं वैसे व्यवहार में
नेस्टी आदि जो सिंपल दिखाएंगे वह माल देंगे जरा जरा बात में हम झूठ बोलते बो लोग ऐसा नहीं करते तो डिसिप्लिन प्रिंसिपल कई जगह पर उनके अच्छे भी है फिर भी जो इस प्रकार का तात्विक ज्ञान ना होने के कारण बीमारिया भी ज्यादा है शांति भी ज्यादा है शिव जी कहते उमा कहो में अनुभव अपना सत्य हरि भजन जगत सब स्वपना तो मूल में उस अक्षर की स्वभाविक ध्वनि ओमकार फिर जो जो बुद्धि मोटी हुई इंद्रियों का आकर्षण बड़ा आदमी पत पतन के रस्ते गया फिर वो ओमकार गायत्री में से गायत्री माता मंत्र बना फिर
व्याख्या चली फिर वेद वेदांत शास्त्र आपका पूरा जीवन समाप्त हो जाए फिर भी सब शास्त्र आप हम नहीं पढ़ सकते इतना विस्तार हो उस अक्षर के ओम गुंजन सार तोब दूसरा कदम क्या उठाए कि पड़े रहे फिर दूसरा कदम उठाए कि बैठ शवास ले जो पाप ताप हमारी बव को भी हरने में समर्थ है हरि प्रणाम ओम जिसका स्वाभाविक ध्वनि है अक्षर का श्नी शाश्वत का जैसे शक्र का स्वभाव है मिठास पेट्रोल की डीजल की अपनी स्वाभाविक भू है ऐसे जिसका स्वाभाविक ध्वनि उकार बच्चा पैदा होता है ना वा मा ये अक्षर की खबर है
मरीज बीमार होता है डॉक्टर हाथ ऊपर करके चले जाते उसे रिलीफ मिलता है अक्षर से शाश्वत आत्मा से किसी भी जाति का किसी भी धर्म का किसी भी बं का मरीज या अल्लाह हे राम माय गड वही आएगा अक्षर का ध्वनि है ये तो मनुष्य हैन कुत्ते जोने पिलर छोटे ी ज ठंड में रते तो वही अक्षर की ध्वनि सेरेली पा मां बोला उनको मैंने नहीं तुम ओम बोलो तुम अक्षर की ध्वनि निकालो मैंने नहीं सिखाया खुदा की कसम क्यों आरहा है तो बालक पोषक परिवर्तक अक्षर ब्रह्म है और जो पलता पोषित और बदलता है
वह अक्षर है र अक्षर एव नित्य और अनित्य का दोनों का यह लीला है इसी को बोलते प्रकृति और परमात्मा परमात्मा शाश्वत है और प्रकृति परिवर्तनशील दूसरा कदम हम क्या रखें हरि ओम [संगीत] हरि [संगीत] ओम हरि [संगीत] ओम मैं परमात्मा की शांति में अक्षर ईश्वर में शांत हो [संगीत] रहा बस बस भी करो बस कर लो अब बस करो शा शा हरि शरणम प्रभु शरण फर ऐसा क हरि ओम जितनी देर गुंजन करने में लगा उतनी देर चुप हो गए इससे कुछ समय में विश्रांति मिलेगी अक्षर में ईश्वर में यह समझो आप 15 मिनट
का नियम बना लो चार दिन के बाद आप ऐसा महसूस करोगे कि कुछ कुछ मिल रहा है कुछ हो रहा है शरीर में भी फायदा होगा पांच शरीर है आपके अनमय प्राणम मनोमय विज्ञान में पांचों में इस गुंजन का प्रभाव पड़े अगर आप को सोते समय 10 से 12 मिनट ऐसा करते हो सुबह 10 से 12 मिनट ऐसा करते हो चार चांद लग जाएंगे जीवन में शर के चिंतन से हम क्षर रो रहे थे अब अक्षर की शांति में हम अक्षर पद को पा रहे नश्वर के चिंतन में हम नाश को पा रहे थे अब
अविनाशी के शांति में हम अविनाशी सुख में शांत हो रहे हैं सभी मनुष्यों का हृदय कमल मुरझाया तो हमारे हृदय में अष्टदल कमल है नाड़ियों का गुच्छा है जैसे रात्रि को सूर्यमुखी मुरझाया सा रहता है ऐसे ही रहता है एक महीने की अगर तीव्र साधना करें तो धीरे-धीरे जैसे सूर्य उदय होने से सूर्यमुखी खिलता है ऐसे आपका हृदय खिलेगा और खिले हुए हृदय पर भग भवान नारायण की भावना करो भगवान नारायण आनंद स्वरूप अपने अक्षर स्वभाव में लेते आपका महाराज काम बन गया अभी तो फलाल करते रहो ह ओ आनंद [संगीत] [संगीत] शांति जल्दी बाजी
नहीं शांति ओम शांति हमारा हृदय कमल खिल रहा है [संगीत] हम अक्षर ब्रह्म की उपासना में पावन हो रहे [संगीत] हैं अक्षर पुरुषोत्तम परब्रह्म परमात्मा में पावन हो रहे हरि [संगीत] ओम ओम आनंद मधुर शांति हरि ओम [संगीत] [संगीत] ओम [संगीत] आनंद हरि ओम [संगीत] हरी ओ [संगीत] [संगीत] [हंसी] [संगीत] हरि ओम [संगीत] [संगीत] ओम ओम श्री परमात्मा ओम शांति ओम आनंद जो पाप ताप हर लेते हैं अपनी शांति मधुरता भर लेते हम उन्हीं की शरण में है शरण का मतलब पैर पकड़ नहीं है उनमें शांत होना [संगीत] [संगीत] है हरि ओम [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत]
शिव जी कहते हैं ध्यान के समान कोई तीर्थ नहीं है बाहर का तीर्थ तो शरीर को लाता है लेकिन ध्यान में तो साधक स्वयं परमात्मा तीर्थ में नाता है नास्ति ध्यानम समम तीर्थम नास्ति ध्यानम समम यज्ञम यज्ञ में तो जा तिल गुबल करगी की आवति होती लेकिन ध्यान में तो अपने विकारों की शर के आकर्षण की आवति होने लगती और अक्षर का आनंद उ भरता है नास्ति ध्यानम समम दानम दान करने से धन की शुद्धि होती है हृदय में अदारी सुख मिलता है लेकिन ध्यान करने से हृदय में हृदयेश्वर की शांति और सुख प्रकट होता
है तस्मा ध्यानम सचर शिवजी पार्वती को कहते कृष्ण अर्जुन को कहते लाशा साई मुझे कहते थे मैं तुम्हें कहता हूं वही अमृत स्वरूप ईश्वर के अक्षर आनंद के ध्यान अभ्यास में अपने को लगाते जाओ समय बीता जा रहा है चीज बहुत ऊंची है समय बहुत कम है और संसार कुछ नहीं देगा क्यों मजदूर क्यों सताए जाए क्यों अपने को और अपने संबंधियों को सताए यह मिल जाए यह दे दे वो दे दे आखिर क्या हो जाएगा छोड़ पवाड़े झगड़े सारे गोता वेद तो अंदर मार ह ओ श्वर में होते हुए शाश्वत में आ अनित्य में
होते हुए नित्य को पाओ बस यही तुम्हारी बुद्धिमता है बहादुरी कौन किसका बाप कौन किसका बेटा कौन किसकी पत्नी कौन किसका पति कौन किसका मित्र कौन किसका साथी सब अक्षर को प्राप्त हो रहे हैं सब नाश की तरफ जा रहे हैं सारे संबंध मिटने की तरफ जा रहे हैं अमिट संबंध तो अक्षर के साथ है तुम्हारा ईश्वर के साथ तुम्हारा सच्चा संबंध है और समाज के साथ तुम्हारा काल्पनिक कच्चा संबंध [संगीत] है ईश्वर से बढ़कर अगर किसी मित्र को सगे को संबंधी को महत्व दिया तो वहां से धोखा ही मिलेगा पक्की बात है जो प्रेम
परमात्मा को करना चाहिए वो प्रेम किसी मित्र कुट में रुक गया तो वहां से धोखा मिलेगा जो प्रीति ईश्वर को करना चाहिए वह प्रीति अगर धन को किया तो धन से परेशानी मिलेगी सुख नहीं मिलता है ईश्वर से प्रीति करो फिर मित्रों से धन से सबसे सुख तुम्हारे इर्दगिर्द गिड़गिड़ा जाएगा कि तुम्हारी रहमत की नजर पड़ जाए यह वह रस्य बताया जा रहा है और वह प्रयोग किया जा रहा है तुम शर के नश्वर सुख के पीछे भागने की आदत को अब इस साधना के तलवार से उस जंजीरों को उस जाल को काटो अपने आप
के स्वामी बनो अपत दीपो भवा अपना गुरु अपना स्वामी आप बनो अपने उद्धारक आप बनो अपने सुख के दाता आप बनो कोई सुख देगा इस बेवकूफी को त्याग दो पुत्र सुख देंगे पुत्र सुख देगी बहुए सुख देगी व दुखी हो के मर गए बेचारे सुख किसी के आधीन ना रहे तुम्हारा तुम्हारा अक्षर श्वर के साथ स बंद हो [संगीत] जाए मंदिर वालों को मंदिर की पूजा सफाई करने दो तुम तो हृदय मंदिर में आने का पावन प्रयास करो फिर तुम्हारा मंदिर जाना भी मंदिर है और जहां रहोगे वहां भी मंदिर है हर रोज खुशी हर
दम खुशी हर हाल खुशी जब आशिक मस्त प्रभु का हुआ तो फिर क्या दिलगिरी बाबा [संगीत] पांच प्राणायाम गहर शवास रोकने की पांच किया तो फिर चार मत करना घर पर पाच छ सात ऐसे 10 तक पहुंच जाओ 12 15 मिनट में 10 प्राणायाम हो जाएंगे स्वास्थ्य की रक्षा होगी बुढ़ापा जल्दी नहीं आएगा रोग जल्दी गर्दन नहीं दबाए 42 साल उम्र हो गई तो त्रिफला फाका कहो ताकि रोग टिके नहीं किडनी ठीक रहे लिवर ठीक रहे हार्ट ठीक रहे त्रिफला चूर्ण फाका करो अथवा रसायन चूर्ण फाका करो कोई बीमारी ऑपरेशन ऑपरेशन की तकलीफ में ना
ले आए न ओम ओम ये मिल जाए ये पालू ये पालू लेकिन आखिर ठंड ठंड पा हम काम क्रोध से आक्रांत व्यक्ति पराधीन है और काम संकल्प वर्जित व्यक्ति स्वाधीन है ऐसी स्वाधीनता पाने के लिए क्या किया जाए अगर कामनाएं हैं तो परहित की कामना बना दो संकल्प है तो सत्य स्वरूप परमात्मा को पाने का संकल्प बना दो कामना और संकल्प के बिना अगर काम नहीं चलता हो तो बहुजन हिताय कामना करो और अपने स्वरूप में ठहरने का संकल्प करो कामनाओं के कारण व्यक्ति की योग्यताएं कुंठित हो जाती हैं कामना रहित व्यक्ति की योग्यताएं विकसित
होती हैं कामना नश्वर चीजों को पाने की कामनाए जितनी कम उतना आप सुखी हो जाएंगे उतनी आपकी योग्यता बढ़ेगी और शर की कामनाए जितना ज्यादा उतना आपकी अक्षर की शांति अक्षर का सामर्थ्य से आप दूर हो जाए जिनको बुढ़ापे में आंखों की कानों की नाक की बीमारी नहीं चाहिए उनको टोपी पहननी चाहिए शास्त्र कहते हैं नहीं तो पगड़ी पहननी चाहिए जवानी में जो जवानी में लापरवाह रहते हैं इन बातों से उनको बुढ़ापे में ये तकलीफें होती है फिर बैल जैसे होते हैं बैल मुंडन भी कराते हैं और सिर खुला बैल छप बुद्धि होती सुनते महिमा
सिर ढकने की स्त्रियों को साड़ी से सिर ढका रखना चाहिए और पुरुषों को टोपी से पगड़ी से जो खुले सिर रहते हैं व अपने दिमा की स्वास्थ्य के दुश्मन हो जाते व्यक्तिगत भोग की कामना योग्यता को क्षीण कर देती है अभी विषय सुख भोग सुख नहीं मिलता भविष्य में मिलेगा कि नहीं इसकी चिंता भय और संदेह व्यक्ति की योग्यताओं को खा जाते हैं अगर काम्य पदार्थ व्यक्ति को मिल जाते हैं तो भोग वासना के कारण वह उन काम्य पदार्थों में बद्ध हो जाता है भोगने पर काम्य पदार्थ नष्ट हो जाते हैं अथवा भोगते समय भी
कुछ गड़बड़ी पैदा कर देते हैं इसलिए अक्षर तो शर है अपना समय बचा के अक्षर की उपासना में लगना चाहिए ओ [संगीत] ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओ हरि ओम हरि ओ हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम ओम नमो भगवते वा देवाय ओम नमो भगवते वासुदेवाय नारायण नारायण नारायण