यह कहानी वैश्या प्रेम में घिरे बिलवा मंगल की है बिलवा मंगल एक ब्राह्मण पुरोहित का बेटा था जो अपना सारा समय एक चिंतामणि नाम की वैश्या के कोठे पर व्यतीत करता था दुखी हो उसके पिता ने सोचा अगर इसकी शादी कर दी जाए तो यह सुधर जाएगा इसी सोच के साथ उन्होंने उसकी शादी एक सुंदर कन्या से कर दी शादी के बाद भी बिलवा मंगल में कोई बदलाव नहीं आया वह पहले की भांती ही चिंतामणि वैश्या के कोठे पर पड़ा रहता कुछ दिनों के बाद उसके पिता की मृत्यु हो गई बिलवा मंगल को चिंतामणि के
कोठे से बुलाया गया उसके आने पर संस्कार हुआ उसके पिता ने मरने से पहले ही सारी संपत्ति मंगल की पत्नी के नाम कर दी थी उसको जब यह मालूम हुआ तो उसने अपनी पत्नी से सारी संपत्ति अपने नाम लिखवा ली कुछ दिन तो वह अपने घर अपने पिता की मृत्यु के बाद रुका परंतु सारे क्रिया कर्म होने पर वैश्या प्रेम में अंधे बिलवा को चिंतामणि से मिलने की घनघोर इच्छा हुई एक रात को वह सारी दौलत लेकर चिंतामणि के कोठे पर जाने के लिए सोचकर निकला ही था वैश्या चूड़ामणि से मिलने की चाह में बिलवा
मंगल घर से निकला तो आधी तूफान चल रहा था नदी में बाढ़ आई हुई थी पर बिलवा मंगल को तो चिंतामणि से मिलने की लगन लगी हुई थी बाढ़ की परवाह किए बिना वह रात को अंधेरे में एक कांठ के टुकड़े जैसी चीज पर बैठकर नदी पार कर गया नदी के पार पहुंचकर बारिश में वह चिंतामणि के कोठे की ओर भागा वहां पहुंचकर उसने देखा कि चिंतामणि का कोठा बंद है उसने दरवाजा खटखटाया परंतु रात में किसी ने दरवाजा नहीं खोला बिलवा मंगल चिंतामणि के मोह में इतना पागल था कि वह किसी तरह भी उसके
पास पहुंचना चाहता था उसने देखा कि छत से एक रस्सी लटक रही है बिलवा मंगल ने सोचा शायद चिंतामणि ने उसी के लिए यह रस्सी लटक वाई है वह उस रस्सी से ऊपर चढ़ गया और ऊपर पहुंचकर उसने चिंतामणि को पुकारा बिलवा मंगल को अपने घर में देखकर वैश्या चूड़ामणि ने उससे पूछा वह इतनी भयानक रात में नदी कैसे पार करके आया है तो उसने बताया कि वह एक कांठ के तख्ते के सहारे आया है और जब चूड़ामणि ने पूछा कि वह कोठे के अंदर कैसे आया है तो बिलवा मंगल ने बताया कि वह रस्सी
से ऊपर चढ़कर आया है चूड़ामणि ने कहा कि उसने तो कोई रस्सी नहीं लटका है तब वहां जाकर उसने देखा तो वहां एक सांप लटक रहा रहा था फिर जब नदी की ओर देखा तो वहां पाया कि स्त्री की लाश बह रही थी उसी लाश पर बिलवा मंगल चढ़कर आया था चूड़ामणि ने यह सब दिखाकर बिलवा मंगल से कहा देखो तुम पाप में कितने अंधे हो चुके हो कि पाप और मोह के कारण तुमको स्त्री की लाश लकड़ी दिखी और काला सांप एक रस्सी अगर तुम इतना मोह मुझे छोड़कर उस मालिक में लगाओ तो तुम
इस संसार रूपी नरक से पार उतर जाओगे वैश्या चूड़ामणि की बातों का बिलवा मंगल पर बहुत असर हुआ उसने बुरे कर्मों को छोड़ने का निश्चय कर लिया पर असली परीक्षा तो बिलवा मंगल की अभी बाकी थी वैश्या चूड़ामणि ने जब बिलवा को परमात्मा से मोह करने की बात कही तो उसे भी एहसास हुआ कि वह खुद भी तो एक गंदे कीचड़ में धसी हुई है वेश्यावृत्ति करती है चूड़ामणि ने अपना साज सामान इत्यादि फिवारे बिलवा मंगल भी अब चूड़ामणि के द्वारा ज्ञान प्राप्त होने से भगवान के भजन में लीन हो गया वह बांसुरी बजाता और
भिक्षा लेकर अपना पेट भरता उसी नगर में एक महादानी सेठ भी रहता था उसका नियम था जो कोई उसके दर पर आता वह कभी भी उसे खाली हाथ नहीं लौटा एक दिन बिलवा मंगल भी सेठ के द्वार पर भिक्षा लेने के लिए पहुंच गया उस दिन सेठ जी की धर्मपत्नी दान देने के स्थान पर बैठी हुई थी वह अत्यंत रूपवती थी उसको देखकर बिलवा मंगल का मन चलायमान हो गया उस दिन तो बिलवा मंगल भिक्षा लेकर वापस चला आया दूसरे दिन बिलवा मंगल फिर से भिक्षा लेने गया उस दिन बिलवा मंगल ने सेठ जी से
कहा आप महादानी हैं इसलिए मैं आपसे एक दान मांगना चाहता हूं सेठ जी ने बिलवा मंगल से दान मांगने को कहा उस पर बिलवा मंगल ने सेठ जी से कहा कि वह एक रात उनकी धर्म पत्नी के साथ निवास करना चाहता है बीवी के साथ एक रात बिताने की बात सुनकर भी सेठ ने बिना विचलित हुए बिलवा मंगल को दूसरे दिन शाम को आने का निमंत्रण दे दिया सेठ ने जब यह बात सेठानी को बताई तो वह अत्यंत घबरा गई बोली आपने यह क्या कर डाला सेठ जी ने उत्तर दिया कि वह इतनी छोटी सी
बात के लिए अपना प्राण नहीं तोड़ना चाहता दूसरे दिन शाम को जब बिलवा के आने का समय हुआ तो सेठानी अत्यंत घबरा रही थी सेठ जी ने उससे कहा कि अतिथि सेवा में कोई भेद नहीं आने पाए तुम्हें उसकी एक पत्नी के रूप में सेवा करनी होगी बिलवा मंगल जब आया तो उनको स्नान कराया नए वस्त्र पहनाए चंदन लगाया और फूलों के हार पहनाए उसके बाद उसको सेठानी ने भोजन कराया भोजन करने के बाद जब बिलवा मंगल सोने के स्थान पर जा बैठा तो उस समय सेठानी असमंजस में पड़ गई कि वह क्या सेवा करें
जब उसने बिलवा मंगल से पूछा तो उसने सेठानी को दो सुई लाने को कहा सेठानी की समझ में ना आया कि बिलवा मंगल को सुई क्यों चाहिए परंतु उसने अपने कर्तव्य अनुसार आज्ञा का पालन किया बिलवा मंगल ने पहले सेठानी को बहुत अच्छी तरह देखा फिर दोनों सुईं को अपनी आंखों में घुसे लिया यह विचित्र घटना देखकर सेठानी बहुत घबराई और उसने शोर मचाकर सेठ जी को बुला बुला लिया सेठ ने भी जब बिलवा को देखा तो घबरा गया और उसने बिलवा मंगल से आंखें फोड़ने का कारण पूछा तब बिलवा मंगल ने सेठ को अपनी
पूरी जीवन कथा सुनाई उसने कहा कि वह अपने नेत्रों के कारण रूप के मोह में फंसकर भगवान से दूर हो जाता था ये उसके नेत्र ही थे जो उसको विषय वासना में फंसा देते और उसके विचारों को अच्छाई और उस परमात्मा से भटका करर पाप के द्वार की ओर ले जाते इसलिए उसने इस सारे फसाद की जड़ को ही काट डाला इस घटना के बाद बिलवा मंगल परमात्मा की भक्ति में लीन हो गए और पूर्ण संत बने जिन्होंने अनेक प्रसिद्ध काव्यों की रचना भी की जिन्हें हम सूरदास जी के नाम से जानते हैं जो अपने
समय के सर्वश्रेष्ठ कवि और परम ईश्वर भक्त थे निष्कर्ष सच्ची भक्ति और ईश्वर प्राप्ति का मार्ग हमारे आंतरिक मोह और वासनाओं के त्याग से होकर गुजरता है बिलवा मंगल यानी सूरदास जी ने अपनी आंखों को प्रतीकात्मक रूप से त्याग कर यह सिद्ध किया कि जब तक हम विषय वासना और सांसारिक आकर्षणों से ऊपर नहीं उठते तब तक ईश्वर की सच्ची अनुभूति संभव नहीं होती यह आत्मज्ञान और विवेक की यात्रा है जिसमें बाहरी सौंदर्य और भौतिक सुखों का परित्याग कर हमें अपने अंदर की दिव्यता को पहचानना होता है भगवान की प्राप्ति केवल वही कर सकता है
जो अपने इंद्रियों और मन पर विजय प्राप्त कर पूर्ण समर्पण और त्याग के साथ भक्ति करता है