[संगीत] गीता प्रेस गोरखपुर की गीता अगर होगी तो उसमें मधुसूदन लाखों लाखों के घर होगी करोड़ के घर हो गया मैं जब गीता की व्याख्या करता हूं तो उसे महापुरुष का आसरा लेट हूं सीधी बात है अपना मेरे पास नहीं इतना माल मैं उसे महापुरुष के वचन का आसरा लेट हूं जब उसकी व्याख्या करता हूं क्या तूने कृष्णा के दर्शन कर लिए कलाम उठाकर लिखने ग गया कृष्णा पर व्याख्या करने ग गया गीता पर विद्वान तो तू है मैं जानता हूं खानदान खंड खाद्य जो वेदांत का तगड़ा ग्रंथ है बड़े-बड़े विद्वान भी जी पर कसरत
करके पहुंच पाते मुश्किल से खानदान खंड खाद्य तूने लिखा है लेकिन गीता पर टूटी करने जा रहा है की वास्तविक ज्ञान का प्रकाश मिलेगा जिससे बुद्धि को ज्ञान मिलता है इंद्रियों को ज्ञान मिलता है मां भी उसके बीच कम करता है मधुसुदन्या मंत्र ले लिया और बराबर नियम सेवा ने सोचा कोई बात नहीं कर्म कट गए होंगे अब दूसरा ही कर लेते दूसरा अनुष्ठान किया घंटे भर रोज ध्यान करें और नियम करें घंटा भारत लेकिन दूसरा नुस्खा और कोई कृष्णा वृषण आया नहीं मधुसूदन मोड ली हो गए और मैं इतना जग जाहिर विद्वान पंडित किसी
बाबा के चक्कर में ए गया कृष्णा कृष्णा कर रहा हूं कहां तो मेरा तत्व ज्ञान [संगीत] और फिर स्वामी जी को महके बस महाराज दोनों स्थान करके तक गए हर गए महाराज चक्की धोखे के भाई मैं पहले बार ए रहा हूं और मुझमें रास्ते जाते साधु को तुम इतना व्यंग करते हो कहते हो दो अनुष्ठान करके तक गए क्या कहना चाहते हो बोले महाराज तुम गीता की टीका लिखने जा रहे थे और साधु ने दो साधु ने अनुष्ठान जाप करने को कहा और आपने दो अनुष्ठान किया और आपको कृष्णा के दर्शन नहीं हुए और आप
मूड चेंज करने को आए सच्ची बातें की नहीं बोले भाई यह बात तो सच्ची लेकिन तेरे को कैसे पता चला बोले मेरे को पता चला महाराज मैं कोई साधुवादू नहीं मेरी तामसी साधना है मैंने करंट मेरा शायद हमारी लायक नहीं है तुम्हारे भूत के ही दर्शन कर दे यार कुछ तो देखें बोले मेरा भूत तो मारा तीन दिन के अंदर ए जाएगा बिल्कुल पक्की बात है 72 घंटे की साधना है महाराज को दे दिया विधि बता दी महाराज ने पूरे कर दिए ना भूत आया ना भोसड़ी आई कोई महाराज का क्या तू मेरे से इतना
ऊंचा के तेरे पास आकर मेरे पास अभी तक कोई भूत नहीं आया आखिर क्या है थोड़ा दूर किसी गली में अपनी विद्या से जो कुछ उससे बातचीत करनी थी करके आया बोले महाराज मेरे नाम लिया तू ही हमें उनके मंत्र से आकर्षित हुए लेकिन उन्होंने दो कृष्णा नाम के अनुष्ठान और उसके पहले उन्होंने ओम सहित भी कुछ जपती है तो उनकी और उनकी आभा उनका आध्यात्मिक तेरे जैसा की अगर हम उनके निकट प्रकट होते तो हम जल मरते हम उनके निकट नहीं जा सकते उनको प्रार्थना करो की एक अनुष्ठान की वास्तु उसे थोड़ी ज्यादा करो
महाराज जी ने दो किया लेकिन अब कृष्णा जैसे कृष्णा को लाने में एक अनुष्ठान और कर ले श्री कृष्णा प्रगति होंगे और गीता लिखेंगे और इन्हीं के नाम से वह गीता की टीका मशहूर होगी महाराज ने तीसरा अनुष्ठान किया और भगवान कृष्णा प्रगति हुए और बातचीत हुआ कृष्णा ने मुस्कान भारी समझी दी और बाद में महाराज ने गीता लिखी लाखों ने करोड़ लोगों के पास मधुसुदनिटी का गीता होगी आप घर में देख लेना मधुस्टालियन मंत्र में शब्द में आकृति को प्रकट करने की प्राकृतिक व्यवस्था है मनोवैज्ञानिक क्षमताएं हैं आप चलो महाराष्ट्र में चलते हैं अपन
किसी भक्ति ने 40 दिन की अखंड धुन का आयोजन किया [संगीत] मोर बाबा इन तीनों को उसे भक्ति ने पुर्नवती समारंभ में आने के लिए राजी कर दिया संत को बुलाना यह कोई मजाक की बात नहीं [संगीत] नेता को बुला सकते क्योंकि वोट बैंक बन जाएगा जय राम जी की वो गणित लगा देगा और किसी को बुला सकते कुछ पैसे वैसे की थप्पड़ के लालच संत को एन वोट बैंक की लालच ने पैसे की लालच ने वह भाई की लालच और बाई चलो हम जैन और यह भगवान दिल देंगे ऐसी बात भी नहीं है तो
संत क्यों है संत केवल आता है तुम्हारी श्रद्धा और स्नेहा के करण और कोई चीजों से आकर्षित नहीं कर शक्ति सच्ची श्रद्धा और स्नेहा तो वो उनको बुला सकते भगवान और संत को लाने के लिए वोट बैंक भी फेल हो जाति जय राम जी की बैंक भी फेल हो जाति है तब तक उसे मजा भी नहीं आता तुम जब संत को हर अर्पण करते हो रोज संत तुम्हारा हर तुम्हें भारत नहीं अर्पण नहीं करता तो उसे मजा नहीं आता अब उनको कैसे तुम रिझाओगे अच्छी रहे हो आप लोग और केवल यहां नहीं सब जगह ऐसे
होता है महाराज आपको मैं क्या बताऊं तू कर्म कोरी बाबा को रिझालिया पूर्ण होती के दिन उन्होंने आने की सहमति दे दी भक्तों की भी कई चले होती है पवित्र चालू इसको उसको का के उससे जिसने कीर्तन करवाया था 24 दिन का 40 दिन का रिचार्ज करने में भी आप सफल 2000 भक्तों ने मौन रखा उपवास किया और समर्थ को रिझाने में सफलता का संकल्प किया हम लोगों के सामने प्रकट होकर प्रसाद ग्रहण करें इतनी कृपा करें समर्थ मंद मुस्कुराए एक ना तुकाराम महाराज के तरफ देख और आकर समर्थ बोली पद गया अगर तू को
बाहर रुको आप और विट्ठल को प्रकट करेंगे तो मैं सियाराम को तकलीफ दूंगा नहीं तो मैं नहीं बुलट तो कर हमने मोर बाबा की तरफ देखा के भाई रिद्धि सिद्धि के मलिक तो गणपति है पहले तो रिद्धि सिद्धि वाले हां बोलते तो अमीर तुम जिक्र तुम्हारे पीछे पीछे चल रहे हैं तो तुकाराम ने कहा जो बड़ों की मर्जी वो हमारी मर्जी तीनों संतो ने सहमति दी महाराज व्यवस्था हुई 2000 आदमी भजन कर सके वह उसके हक पसीने की कमाई के पैसों से बना था दो नंबर एक नंबर का सवाल ही नहीं था और वह भजन
बना बनाया और अपने अपने इस्ट का आवाहन किया मंत्र जब करके गहराई में गए लोगों के 2000 महाराष्ट्र में 2000 व्यक्तियों की इन जर्मनी जंक्शन से लोगों ने देखा की प्रकाश पुंज उतार रहा है मां ही मां अर्ज पद से पूजन कर दिया बाद में सीताराम को बिताया तुकाराम ने अपने इस्ट देव को रुको बाहर विट्ठल को बिठाकर गणपति स्वामी को देखा और भजन परोसार उन्होंने खाया और भारत के लोगों ने अपने नैनों से निहार और तब से महाराष्ट्र के कई लोग इस बात को इस कथा को जानते हैं की मंत्र का आकृति के साथ
प्राकृतिक संबंध है मनोवैज्ञानिक संबंध है यह चाय आप सुन ना सुन लेकिन यह इतना तो जरूर बोलते के साथ समर्थ ने सीताराम को प्रकट किया महाराष्ट्र भगवान को प्रकट किया इसीलिए गणपति जी के नाम के साथ मौर्य नाम अभी भी आप हम सुनते हैं गणपति दादा मौर्य लड्डू [संगीत] अपने हाथ से लड्डू खिलाएं थे अब जय राम जी बोलना पड़ेगा गोरा कुंभार का घर ऐसी जगह पर था की महाराष्ट्र के सौराष्ट्र के यात्री जब जाते तो गोरा कुंभार का घर मां उनके लिए है विश्राम ज्ञानेश्वर महाराज मुक्ताबाई और दूसरे संत गोरा कुंभार के अतिथि हुए
नामदेव महाराज विट्ठल से बातचीत कर सकते थे विट्ठल को प्रकट कर लेते थे इतनी उनकी भक्ति थी मूर्ति तो वही क्यों कलकत्ता के काली मां की मूर्ति वही की वही मिलेगी रामकृष्ण पुजारी नहीं थे तभी भी वह मूर्ति थी रानी रश्मोनी ने लगे मंदिर बनवाया उसे समय कई पुजारी रामकृष्ण की पूजा में इतना बाल था की मूर्ति से मां प्रगति होकर उनके हाथ का प्रसाद लेती थी पहले भी थी नाथद्वारा नारे नाम की लड़की का उत्साह कैसे बाढ़ गया केवल आचार्य ने है लेले की प्रभु आज प्रकट होगी तो भजन कराऊंगा नहीं तो मैं भी
बुखार कटोरा लिया जब ये दूध के कटोरी की बात फेल गई सब कानों तक बात पहुंच गई तो नारे नाम की लड़की ने भी यह श्रद्धा की है ले और नारे नाम की लड़की भी ठाकुर जी को दूध पिलाने में समर्थ हो गई ऐसे तुकाराम महाराज बिठाकर जी को प्रगति कर लेते और बातचीत करते हैं यह सब अतिथि संत आपस में कुछ गोष्टी कर रहे थे स्वभावी ढंग से बैठे फटाफट ना जानते हैं हम लोग बैठे हैं गोरखपुर लगाने ग गए [संगीत] आंखों पर देखें ऐसे करते-करते जब नामदेव गवारा आया कतर में बैठे थे नामदेव
चढ़ गई मैं तो विट्ठल का दर्शन करता हूं विट्ठल का दर्शन करता था बात तो सच्ची थी विट्ठल को प्रकट करता था बहुत सच्ची थी घोड़ा को करने का एक कच्छ घड़ा है अब तो नाम देव रूट गए मैं अभी तुमको सबको बताता हूं की कौन कच्छ है सगड़े मिलूं हंसते सगड़े मिलूं मां जी मस्ती करते मिलूं जब देखना है मिलन पकड़े तुम मैं अत्तजा तो माला विट्ठला बुलावे आया है मस्करी करते नामदेव कहते विट्ठल मैं कच्छ खड़ा हूं अभी कच्छ हूं बोले हां संतो ने जो कहे सही कहा है ज्ञानेश्वर जैसे संत जट क्यों
बोलेंगे तू कच्छ गधा है घोड़ा को करने का है तू सच्ची बात है उनकी कच्छ खड़ा है सब संतो का मध्य के साथ सहमत हूं तेरे साथ सहमत नहीं हूं तो भगवान तुम इस पक्का कर करूंगा माला भगवान बोलते हैं कम ए जाना चोर को पकड़ना डीएसपी विभाग है न्यायाधीश का कम नहीं है करना है चोर पकड़ना या छाप मारना न्यायालय का कम नहीं है रेड डालना छाप मारना यह न्यायालय का कम नहीं है क्या ख्याल है अथवा अस्मिता राज द्वेष है इनको निकालना गुरुओं का कम है मैं तुम्हारे प्रेम और भाव से प्रकट हो
जाता हूं मुझे तुम देखते हो प्रश्न होते हो मैं तुम्हें देखकर प्रसन्नता हूं मैं चला जाता हूं तो तुम रोटी रहते हो और तू जिसे नामदेव है यह दोनों के बीच जो अविद्या अस्मिता राज द्वेष है इन चोरों को निकालना तो सद्गुरु का कम है नामदेव मेरी सलाम माने तू जा संत के पास नामदेव के पास जा उनकी शरण पर वो तुझे पक्का घड़ा बनाते गया और उसे बयान में शिवलिंग पर पर पसारे भगवान पर पर रख के सो रहा था शिवलिंग पर पर पसारे शिवबा खेचर सोए थे नामदेव सोचा के याद हो गई विट्ठल
ने भेजो है की इस जगह उसके पहले पक्का घड़ा होने के लिए तुमको भी ठंड में भेजो है बोले हां लेकिन महाराज हमको बात समझ में नहीं आई सूरज उदय हो गया और आप सो रहे संत तो ब्रह्म मुहूर्त में उठाते सिख धर्म कहता है कर प्रकार के ब्रह्म मुहूर्त होते अमृत वेल जिसको बोलते हैं एक तो सूरज उगने से सव दो घंटे पहले से प्रभावित कल जो चला है उसको अमृतवेला बोलते हैं ये भौगोलिक डांग से दूसरी अमृतवेला है की अमृतम परमात्मा का जाप करते करते जब ध्यान होता है तो अमृत मिला है तीसरी
के जिनके हृदय में वाकल पुरुष का दीदार हो गया ऐसा ब्रह्मज्ञानी का दर्शन जी मिले मिलता है वो अमृतवेला है लेकिन जी समय संत का दर्शन मिल जाता है वह अमृत वेल मनी गई जी समय संत के हृदय में जो चाय बोले भाई अमृतवेला हम तो अभी उठे हैं महाराज चलो अभी उठे तो बुद्ध हो कोई बात नहीं तो भगवान शंकर पर पर रखकर सोए हो यह तो शोभा नहीं देता तो सच ही तुम्हारी नाम दे मैं बुद्ध हो गया हूं तू मेरे पर उठाकर ऐसी जगह पे रख जा भगवान ना हो वो संत के
पर उठाकर जहां भगवान नहीं है ऐसी जगह पे रखा और संत ने योग शक्ति का वही भगवान शिवा फिर जहां जहां पर रखें वहां शिवलिंग का एहसास नाम से बोला एक आया है चरण है की भगवान प्रगति फैक्ट्री है भगवान भगवान से उनके चरणों में प्रणाम किया महाराज सदा कुर्बानी जैसा उसने व्यवहार कर लिया के नाम देव भगवान जब अंत करण की भाव विशेषता वृत्ति तो वही अतः केवल से सरकार हो जाता फिर अंतर्धान हो जाता है तुम अपने को जीव मानते और भगवान को ईश्वर मानते और अपने को उनसे अलग मानती हो यह अविद्या
है अविद्या से ही अस्मिता होती है डे में मैं अच्छी संबंधी मेरे देख के वस्तुएं मेरी मैं तोर की माया शुरू होती है और जीवन की गया वर्ष हो जाति है लेकिन लिंग शरीर का अंत नहीं होता फिर सूक्ष्म शरीर से दूसरा शरीर लेट है अगर शरीर में आस्था है तो जगत में भोग वास्ता होगी सूक्ष्म शरीर में आस्था है तो विचारों में ए शक्ति होगी और करण शरीर में आस्था है तो अवस्था में आसक्ति योगिता बने रहे [संगीत]