[संगीत] हजरत अली रदी अल्लाह ताला फरमाते 1000 के मुकाबले में वो लड़ा करता था। मेरे मुकाबले में आया तो कहने लगा भतीजे तुझे पता है मैं मरहब हूं। मैं मरहब हूं। तुझे पता है कैसे मुकाबला करोगे? तुम्हें पता है? हजरत अली कहने लगे मुझे तेरा नहीं पता। मुझे तो अपना पता है। कहा आप कौन है? फरमाने लगे अनसदुल्लाह व रसूल ही मुझे पता है कि मैं खुदा का भी शेर हूं, मोहम्मद मुस्तफा का भी शेर हूं। तो मुकाबले में तो आ मैदान लगेगा तो पता चलेगा। जब मैदान लगा तो हजरत अली ने एक जर्ब लगाई
तलवार ज्यादा नहीं। एक ज़रब लगाई। एक ज़रब लगाई तो कहते हैं उसका सर भी काटा, गर्दन भी काटी, वजूद भी काटा और इतनी जोर से तलवार मारी कि उसके घोड़े के भी दो टुकड़े हो गए। हुजूर ने क्या फरमाया? फरमायात अली य खंदके अफ इबादत सकल नबी पाक ने फरमाया अली की तलवार का एक बार खंदक के मैदान में एक बार अली की तलवार का फरमाया दो जहां में अगर सारे लोग नफली इबादतें करे तो अली को अल्लाह फिर भी ज्यादा दर्जा अता फरमाएगा सारी दुनिया की इबादतों से ज्यादा दर्जा ले गए एक तलवार चला
के एक तलवार चला के और जब खैबर का दिन आया कई दफा सहाबा कहे फतह नहीं होगी। मेरे रसूल ने फरमाया सवेरे मैं झंडा दूंगा और जिसको दूंगा उसे अल्लाह फतह देगा। हजरत सैयदना अबू हुैरा कहते हैं मैंने कान में पूछा। मैंने कहा हुजूर वो कौन है जिसको आप झंडा देंगे? चले मुझे कान में बता दें। वो कौन है? तो हुजूर ने फरमाया उसका तारुफ ये है कि वो खुदा से भी प्यार करता है। मोहम्मद मुस्तफा से भी प्यार करता है। हुजूर कोई कोई एक तारफ और तो हुजूर ने फरमाया खुदा रसूल भी उससे बड़ा
प्यार करते हैं। हजरत अली सबा कहते हैं सारे मुंतसिर रहे। हजरत उमर कहते हैं मैं सोया ही नहीं सारी रात कि मेरे हाथ झंडा आने वाला है। सवेरे मुझे मिलेगी फतह की नदीद और खुशखबरी फरमाते हैं मैं सोया ही नहीं। हजरत अली से पूछा आप किधर थे? जनाबे अली शेर खुदा रदी अल्लाह ताला अनो फरमाते हैं मैं तो अपने कमरे में सो रहा था। मेरी तो आंखों में तकलीफ थी। मैं सोया हुआ था। पता है क्या बना? कोई आया लेके चला गया। कोई उम्र भर भी ना पा सका मेरे मौला तुझसे गिला नहीं ये तो
अपना अपना नसीब हुजूर सैयद आलम सल्लल्लाह वसल्लम ने फरमाया आईना अली इब्नेबी तालिब अली इब्नेबी तालिब को बुलाओ हजरत अली रदी अल्लाह ताला अन आए तो आंखों के ऊपर हाथ रखे हुए कहा या रसूल अल्लाह मेरी आंखों में दर्द है फरमाया हाथ पीछे कर अल्लाह ने तेरे हाथ पे फतह लिख दी है पीछे कर हाथ हजरत अली कहते हैं हुजूर ने लुआबे दहन लगाया मेरी आंखों पे मुझे पहले से भी ज्यादा बेहतर नजर आना शुरू हो गया। हजरत अली शेर खुदा एक हाथ में तलवार एक हाथ में 40 गज ऊंचा था खैबर का दरवाजा और
40 गज चौड़ा था। हजरत अली शेर खुदा कहते हैं मैं अल्लाहू अकबर के नारे लगाता मैदान में गया। अल्लाहू अकबर के नारे। मैं रसूल अल्लाह का भेजा गया तो मैं शान से गया। कि मैंने सीधे हाथ में तलवार उल्टे हाथ से पकड़ के मैंने दो-तीन दफा दरवाजे को हिलाया और अल्लाहू अकबर कह के जब मैंने फेंका तो 40 गज दूर जाके गिरा। सुभान अल्लाह। 40 हजरत अली ने ना कूफे में दावत की लोगों की। जब आप अमीरुल मोमिनीन थे दावत की सब लोग आए। एक नौजवान आया जिसने शोरा सुना था पर हजरत अली को देखा
नहीं था। और हुजूर ने फरमाया इबादा मेरे अली का चेहरा देखना भी इबादत है। तो एक सहाबी ने कहा हुजूर जो ना देख सके फरमाया जिक्र अली इबादा उनके लिए अली का जिक्र करना इबादत है। अली का तजरा करना भी उनके लिए इबादत। हजरत अली को देखा नहीं था। जवान कहता है जब मैं आया ना मैंने लोगों से पूछा वो बूढ़े मौला अली किधर है? जिन्होंने खैबर का दरवाजा तोड़ा था। बड़ी शोहरत है। किधर है? कहते हजरत अली साहब ने बैठे थे मुझे किसी ने कहा वो बैठे हुए मैं गया तो हजरत अली अखरोट खा
रहे थे तो पूरा जोर लगा रहे हैं तो अखरोट कोई नहीं टूटता पूरा जोर दो तीन दफा कभी इस दांत में कभी इस दांत में टूटता ही नहीं कहते मैं हंसने लगा तो हजरत अली ने मुझे पास बुलाया कहा बेटे इधर आ तो मैं गया तो कहने लगे क्या सोच रहा है कहते मैं डर गया मैंने कहा हुजूर कुछ भी नहीं कहने लगे नहीं नहीं जो सोच रहा था तू बता मैंने कहा नहीं कुछ नहीं फरमाने लगे मैं बताऊं तू क्या सोच रहा था? बताऊं कहा हुजूर बताइए? आप फरमाने लगे तू सोच रहा था बाबे
से अखरोट तो टूटता नहीं। खैबर कैसे तोड़ दिया था? तू सोच रहा था कि इससे अखरोट तो टूटता नहीं तो खैबर कैसे तोड़ा था? फरमाते हैं मैंने कहा मैं यही सोच रहा था। ये जब अर्ज किया ना तो फरमाते हैं शेर खुदा का रंग ही बदल गया। पहले मुस्कुरा रहे थे फिर अंदाज बदल गया। उन्होंने अपने मुंह से वो जो अखरोट लगा था झाड़ा हाथ मुंह झाड़े इमामा सीधा किया और फरमाते हैं शेर खुदा बन के बैठ गए कहने लगे बेटे अखरोट को छोड़ कोई खैबर हा तो ला मैं अभी भी तोड़ने को तैयार हूं।
खैबर कोई है तो ला अभी भी तोड़ने को दीवारें हिलती रहती हैं और दर कांप जाता है। अली का नाम सुनके अब भी खैबर कांप जाता है। फरमाया तू इसको छोड़ अखरोट को। तू ला कहते हैं मैंने कैफियत देखी तो हजरत अली का तो रंग ही बदल गया। मैंने कहा वाकई ये तोड़ डालेंगे। ये खैबर आज भी ये तोड़ डालेंगे। कैफियत ही बदल गई। फरमाते हैं शेर खुदा मुस्कुराए। कहने लगे बेटा डर ना मसला समझ कहा हुजूर क्या है आप फरमाने लगे अखरोट मैं जिस्म की कुत से तोड़ रहा हूं और खैबर मैंने अपने ईमान
की कुत से तोड़ा था मेरे ईमान में आज भी बड़ी कुत है आज भी अगर कुफ्र ललकारेगा आज भी अगर दीन का दुश्मन ललकारेगा अली का जज्बा जिहाद आज भी बड़ा जवान है गैरत ईमानी आज भी बड़ी दीन के साथ वफा का रिश्ता आज भी बड़ा मेरा जवान है तू बता कोई खैबर तोड़ना है तो हजरत अली शेर खुदा हर जगह कुर्बानी हजरत अली की जब मदीने में ना हुजूर ने सबको अंसार और मुहाजरीन को भाई भाई बना दिया तो हजरत अली चुप करके खड़े हैं हुजूर ने फरमाया क्या सोच रहे हो कहा हुजूर मुझे
भी तो किसी का भाई बनाए ना हुजूर ने फरमाया अता अख दुनिया व आखिरा तू दुनिया में भी मेरा भाई है आखिरत में भी मेरा भाई है इमाम राज़ ने लिखी है एक बात बड़ी बड़ी अजीब बात लिखी इमाम इमाम राज़ कहते हैं जमीन पे नबी पाक ने हजरत अली को भाई बनाया था तो आसमानों पे जिब्रील अमीन ने हजरत मीकाईल को भाई बना लिया। तो रब करीम ने पूछा क्यों भाई बन गए हो? कहा तेरे महबूब का जलवा देख के बन गए। जिस रात नबी पाक सल्ला वसल्लम हिजरत करके आए ना एक को हुजूर
ने साथ ले लिया। अमीरुल मोमिनीन हजरत अबू बकर सिद्दीक। अबू बकर का पहला नंबर। पहला नंबर किसका है? दूसरा तीसरा चौथा ये सबक बच्चों को याद कराएं। अब हमारे लोग मसले भी कवालों से पूछने लग गए। फतवा भी कवाल का चलता है। अल्लाह ही खैर करे। हजरत अबू बकर सिद्दीक को हुजूर ने साथ ले लिया। हिजरत की रात और मौला अली शेर खुदा को बिस्तर पे सुलाया। रस्ते में भी बड़ा खतरा था। पर बिस्तर पे उससे ज्यादा खतरा था। इसलिए कि जब चादर में लिपटा हुआ कोई शख्स है तो किसी को क्या पता कौन है।
अगर आके वो पर्दा ना हटाते ऐसे ही कत्ल कर देते तो क्या पुरसाने हाल होता। कुछ भी ना होता। इमाम राज़ कहते हैं रब करीम ने फरमाया जिब्राइल मिलई तुम दोनों कहते थे हम भी भाई भाई बन गए बताओ तुम में से कोई एक दूसरे पे जान कुर्बान करेगा करेगा जान फरिश्ते खामोश हो गए तो रब ने फरमाया अब नीचे जरा जलवे तो देखो अली मेरे रसूल पे जान कुर्बान कर रहा है जाओ देखो ना जा के जलवे तुम तो भाई भाई बने थे फरिश्ते अर्ज करने लगे मौला हमारी ड्यूटी क्या है फरमाया अब तुम्हारी
ड्यूटी ये है कि तुम जाओ जमीन पे दो तलवारें ले लो और अली की चारपाई के ऊपर खड़े हो जाओ उसने मेरे मुस्तफा पे जान कुर्बान की है। उसकी जान की हिफाजत करो। सुभान अल्लाह। वहां खड़े हो जाओ। खड़े हो जाओ। फरिश्ते भी करते हैं ताज़म मेरी। फिदा हो के उन पर ये इज्जत मिली है। हजरत शेर खुदा मौला अली हर मैदान में अव्वल। हर जंग में पैदल असबिक साबिक उलाल मुकरबून। अल्लाह फरमाता है सबकत लेने वाले सबकत ले गए। आगे गुजरने वाले आगे गुजर गए। और यही लोग हैं जिन्हें रब का कुर्ब नसीब हुआ।
हजरत अली ने मकान नहीं बनाया सारी जिंदगी मकान नहीं बनाया कोई कारोबार नहीं किया सारी उम्र अब इस पहलू पे भी जरा गौर करें हजरत अली रदी अल्लाह ताला ने कोई बैंक बैलेंस नहीं बनाया सबा इकराम अलीम रिवान फरमाते हैं बड़े-बड़े रिश्ते आए सैयदा फातिमा के लिए बड़े-बड़े अमीर कबीर लोगों हुजूर ने फरमाया मैं रब के फैसले का इंतजार कर रहा हूं एक दिन तीनों तीनों यार इन लोगों का खुलूस देखे मौला अली के साथ। हजरत अबू बकर, हजरत उमर, हजरत उस्मान हजरत अली एक यहूदी के बाग में मजदूरी कर रहे थे तो वहां गए
और जाके कहा अली तू हुजूर से सैयदा फातिमा का रिश्ता क्यों नहीं तलब करता? तो हजरत अली कहने लगे भाइयों ना मकान है ना घर है ना कुछ है। रिश्ता कैसे मांग लूं? कहा तू जा तो सही। हमें तो लगता है रसूल पाक तेरा इंतजार कर रहे हैं। मौला अली शेर खुदा कहते हैं मैं गया। मैं गया और जब मैं हुजूर की बारगाह में गया तो इन्होंने मुझे यार थे ना तैयार करके भेजा मुझे लफज़ भी सिखाए क्या कहने हैं लेकिन जब मैं वहां पहुंचा ना तो मेरे अंदर ताकत ही खत्म हो गई बोलने की
सलाम लेके तो हुजूर के पास बैठ गया हुजूर ने फरमाया अली कैसे आए हो तो मैं खामोश फिर पूछा कैसे आए हो मैं खामोश फिर पूछा कैसे आए हो मैं खामोश कहते हैं दिलों का हाल जानने वाले रसूल ने फरमाया अली फातिमा के लिए आए हो फातिमा के लिए आए हो। तो हजरत अली कहते हैं मेरा जवाब बड़ा निराला है। मैंने कहा हुजूर वो तीनों मेरे पास बाग में गए थे। वो तीनों गए थे मुझे उन्होंने भेजा है। कहते हैं रसूल पाक मुस्कुरा दिए। फरमाया अली उन्होंने नहीं तुझे भेजा। रब करीम ने फातिमा का तेरे
साथ निकाह कर दिया है। तेरे लिए फैसला हो गया है फातिमा का। तेरे हक में फैसला हो गया। हजरत अली सैय्यदा फातिमा को ब्याह के ले गए तू हजरत ज़द बिन हारसा के मकान में। कोई मकान नहीं। ओ भाई तू दौलत देख के बेटी की शादी करता है। सरमाया देख के फिर दुआ कराता है। दुआ करें अल्लाह मेरे दामाद को हिदायत दे दे। मेरे रसूल ने बेटी की शादी की तकवा देख के परहेजगारी देख के दीनदारी देख के उस शख्स को बेटी दी जो साबिक साबिक के दर्जे में शामिल जो इन खरिया के दर्जे में
शामिल उनको अपनी बेटी दी हजरत अली शेर खुदा रदी अल्लाह ताला अनो फरमाते हैं कि सैयदा फातिमा ज़हरा को मैं ब्याह खिलाया सारे घर के काम हजरत फातिमा ने किए मैं मजदूरी करता दो घंटा या डेढ़ घंटा जोर से असर के दरमियान काम करते। 2 किलो खजूरे मिली तो मौला अली ने उठा के अपनी कमर पर रखी। बाग का मालिक कहने लगा अली थोड़ा काम और कर लो। फरमाया 2 किलो हो गई या बड़ी है। एक किलो मेरे बच्चे खाएंगे एक किलो मदीने के गरीब बच्चे खाएंगे। तो कहा अली कल क्या करोगे? फरमाया कल जो
रब जिंदगी देगा वो रोज़ भी देगा। तो बंदा मशवरा देने लगा। मशवरा भी होता है ना करीब से मशवरों वाले भी बड़ी खराबी करते हैं इल्ला माशा्लाह कहा अली जायज पैसे तो इकट्ठे कर लेने चाहिए क्या हर्ज है जायज जायज इकट्ठे कर ले तो शेर खुदा ने एक जुमला कहा पर शेरों जैसा कह दिया हजरत अली फरमाने लगे माल हराम हो तो अज़ाब होता है हलाल हो तो हिसाब होता है लिहाजा ना मैं अज़ाब वाला काम करता हूं ना हिसाब वाला काम करता हूं मैं इकट्ठे ही नहीं करता ना बंदा हसाब के चक्कर में पड़े
ना अज़ाब के चक्कर में पड़े। मैं मैं इस रास्ते जाता ही नहीं। मौला कायनात शेर खुदा और भाई हजरत सैयदना अबू हुरैरा रदी अल्लाह ताला अन फरमाते हैं मैं जब उस बात को याद करता हूं तो आज भी रो पड़ता हूं। कहा कौन सी बात? फरमाने लगे मैं कूफे के बाजार से गुजर रहा था तो मौला अली शेर खुदा कूफे के चौक में खड़े थे। और हाथ में जिरा पकड़ी हुई थी। वो वाली जिरा जो बदर में भी उनके पास थी। वो वाली ज़रा जो ओहद, हुनैन, खंदक और खैबर में भी उनके पास थी। ज़रा
पकड़ी हजरत अली ने और शेर खुदा कह रहे हैं ओ भाइयों मेरी ज़रा खरीद लो। मेरी ज़रा अमीरुल मोमिनीन है उस वक्त अमीर वक्त है बादशाह है। कूफे के बाजार में ओ भाई मेरी ज़रा खरीद लो। ये बड़ी निस्बत वाली है। बदर ओहद हुनैन में मेरे साथ रही। और शेर खुदा फरमाते क्या है? फरमाते हैं जब अली ने ये लफज़ कहे तो मेरी चीखें निकल गई। हजरत अली फरमाने लगे अगर मेरे पास नया तामद खरीदने के पैसे होते तो मैं इसे कभी ना बेचता। नया तामत खरीदने के पैसे होते तो मैं कभी ना बेचता। हजरत
अली रदी अल्लाह ताला अनो ने वो जिंदगी गुजारी। पाप पर्दा परहेजगारी दरवेशी सादगी सारी जिंदगी किसी का शिकवा नहीं किया मौला अली ने। हजरत अली कहते हैं 10 साल की उम्र में कलमा पढ़ा। अल्लाह पाक ने फरमाया महबूब अपने करीबी रिश्तेदारों को डराएं करीबियों को डराएं करीबी रिश्तेदारों को दीन की दावत दें। करीबी जरा मुश्किल से मानते हैं। नेड़े रहने वालों को कदर जरा थोड़ी होती है। ये जरा मुश्किल से मानते हैं। हजरत अली कहते हैं मेरी नबी पाक ने ड्यूटी लगाई। फरमाया अली जा सारी बिरादरी को बुला के लाओ। आप फरमाते हैं 10 11
साल का मुब्ली गलियों में फिरने लगा। 10 11 साल का मुबलिक यह देखें कहां दोस्ती का आगाज होता है। कहते हैं मैं पहले दिन निकला अपने रसूल के कहने पर मैं 10 11 साल की उम्र में दीन के लिए निकला और फिर वो 10 साल में निकले तो बदर से लेकर ओहद तक हुनैन से लेकर खैबर तक और मदीने से लेकर कूफे की जामिया मस्जिद की शहादत तक जनाबे अली दीन के लिए निकले ही रहे। फरमाते हैं 10 11 साल की उम्र में मैं निकला। मैंने अबू सुफियान को कहा, अबू लहब को दावत दी, मैंने
अबू जहल को बुलाया, उतबा को, ततबा को, वलीद को, मैंने अब्बास को, हमजा को कहते मैं तमाम को कुरैश को दावत दी हुजूर के घर में नबी पाक ने खाना खिलाया और खाना खिला के ना हुजूर ने नजर डाली। फरमाया मेरी बिरादरी वालों, मेरे चाचाओं, मेरे अजीजो इसलिए बुलाया है कि मैं अल्लाह का रसूल बन के आया हूं। मैंने सारी दुनिया को ला इलाहा इल्लल्लाह का पैगाम देना है। मेरी मदद करो। मेरे साथ चलो। मेरे साथ ताुन करो। आओ निकलो चले। उठो मेरे साथ। कहते खाना खाते वक्त तो गुफ्तगू सारे कर रहे थे। उस वक्त
तो पुरजश थे। चोरी खाने वक्त तो सारे तैयार थे। जब कहा खून देने की बारी आई है तो चुप कर गए। खून देने की बारी आई है तो चुप कर गए। जिसे जिंदगी हो प्यारी वो यहीं से लौट जाए। मेरे काफिले में शामिल कोई कम जर्फ नहीं है। कहा चलो मेरे साथ उठो। तो हजरत अली कहते हैं हुजूर एक-एक का चेहरा देखते एक-एक को पुकारते तू चल तू चल पर कोई आवाज ना देता। कहते जब मैंने हुजूर के चेहरे पर हल्की सी परेशानी देखी। मौला अली उम्र 10 साल 9 साल। कहते मैंने हल्की सी परेशानी
देखी तो मैं खुजूर खा रहा था। मेरी नजर पड़ी तो मैंने खजूर भी पूरी ना की। मैं पीछे बैठा था। बच्चा जो था पीछे बैठा था। पीछे कहते मुझसे रहा ना गया। मैं उठा कद पहले छोटा था। उम्र थोड़ी थी। मैंने एड़ियां हैं मैंने कहा मैं यही सोच रहा था ये जब अर्ज किया ना तो फरमाते हैं शेर खुदा का रंग ही बदल गया पहले मुस्कुरा रहे थे फिर अंदाज बदल गया उन्होंने अपने मुंह से वो जो खरोड़ लगा था झाड़ा हाथ यूं झाड़े इमामा सीधा किया और फरमाते शेर खुदा बन के बैठ गए कहने
लगे बेटे अखरोट को छोड़ कोई खैबर आया तो ला मैं अभी भी तोड़ने को तैयार हूं। खैबर कोई है तो ला मैं अभी भी तोड़ने को दीवारें हिलती रहती हैं और दर कांप जाता है। अली का नाम सुनके अब भी खैबर कांप जाता है। फरमाया तू इसको छोड़ अखरोट को तू ला। कहते हैं मैंने कैफियत देखी तो हजरत अली का तो रंग ही बदल गया। मैंने कहा ना बंदा असाब के चक्कर में पड़े ना अज़ाब के चक्कर में पड़े। मैं इस रस्ते जाता ही नहीं। मौला कायनात शेर खुदा और भाई हजरत सैयदना अबू हुरैरा रदी
अल्लाह ताला अन फरमाते हैं मैं जब उस बात को याद करता हूं तो आज भी रो पड़ता हूं कहा कौन सी बात फरमाने लगे मैं कूफे के बाजार से गुजर रहा था तो मौला अली शेर खुदा कूफे के चौक में खड़े थे और हाथ में जिरा पकड़ी हुई थी वो वाली ज़रा जो बदर में भी उनके पास थी वो वाली ज़रा जो ओहद हुनैन खंदक और खैबर में मिलता था झंडा बनाने के लिए तो हजरत आयशा की पुरानी चादर थी उसका झंडा बनाया गया तो झंडा सबसे पहले मौला अली शेर खुदा ने उठाया हजरत आयशा
सिद्दीका के साथ प्यार मौला अली शेर खुदा रदी अल्लाह ताला यहां तो लोग ना जाने इस कौन सी खिदमत कर रहे हैं। अगर हुजूर के करीब रहने वाले पास बैठने वालों में आपस से इत्तेफाक नहीं था तो आज मुसलमानों में कैसे पैदा हुआ? तुमने तो दीन का सारा रंग ही गदला करके रख दिया। तुमने तो वहां बुज़ पैदा कर दिया जहां से लोगों को इत्तेफाक का दर्स मिलना था। वफा का सबक जहां से लोगों ने पढ़ना था। ने वहीं हालात खराब कर दिए। मौला कायनात शेर खुदा कलम अल्लाह ताला वज करीम सबा के मजमे