आपने भगवान विष्णु के दशावतार के बारे में तो बहुत सुना होगा लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान शिव ने भी 19 अवतार लिए थे यह एक ऐसा रहस्य है जिसे बहुत कम लोग जानते हैं आखिर ऐसी कौन सी वजह थी कि भगवान शिव को अलग-अलग अवतार लेने पड़े इन अवतारों के पीछे छिपे उद्देश्य क्या थे शिव महापुराण के अनुसार भगवान शिव के दो अवतार आज भी कलयुग में जीवित हैं और इसके पीछे एक गहरा रहस्य यह है कि इसका संबंध भगवान विष्णु के दसवें अवतार भगवान कल्कि से जुड़ा हुआ है इतना ही नहीं भगवान
शिव के एक अवतार ने शनिदेव को ऐसा श्राप दिया कि वे जन्म से लेकर 16 वर्ष की आयु तक किसी को भी कष्ट नहीं दे सकते भगवान शिव का एक ऐसा अवतार भी था जिसमें उन्हें आठ पैरों वाले एक भयानक जंतु के रूप में प्रकट होना पड़ा यह तार इतना अद्भुत था कि उसका शरीर आधा सिंह आधा मनुष्य और आधा श्रब पक्षी का था लेकिन आखिर ऐसी क्या वजह थी कि भगवान शिव को इस रूप में अवतार लेना पड़ा इन सभी सवालों के जवाब और भगवान शिव के 19 रहस्यमय अवतारों की अद्भुत गाथा आज की
इस वीडियो में विस्तार से जानेंगे तो जुड़े रहिए हमारे साथ क्योंकि यह कथा है महादेव के 19 अद्भुत और रहस्यमय अवतारों की [संगीत] शिव पुराण में भगवान शिव को देवों के देव अर्थात महादेव कहा गया है वे ना केवल सृष्टि के संहारक हैं बल्कि सृजन करता भी है संहारक का अर्थ केवल सृष्टि के अंत से नहीं बल्कि पुनर सृजन की प्रक्रिया से भी है जब-जब धरती पर पाप हावी होता है जबजब मनुष्यता का अंत होने लगता है तब सृष्टि को नव जीवन की आवश्यकता होती है ऐसे में भगवान शिव कभी पूर्ण अवतार कभी अंशा अवतार
तो कभी रुद्र अवतार के रूप में प्रकट होकर संहार और सृजन का कार्य करते हैं दोस्तों आगे बढ़ने से पहले वीडियो को लाइक जरूर कर दीजिए और कमेंट में हर हर महादेव लिखकर अपनी भक्ति प्रकट करें अगर आप हमारे चैनल पर नए हैं तो सब्सक्राइब कर लीजिए ताकि आपको हमारी हर नई वीडियो की सूचना सबसे पहले मिले तो चलिए शुरू करते हैं भगवान शिव का प्रथम अवतार है वीरभद्र अवतार जिन्हें शिव का एक प्रचंड और अजय गण माना जाता है उनका जन्म स्वयं महादेव की जटा से हुआ था यह कथा शुरू होती है प्रजापति दक्ष
के महायज्ञ के आयोजन से दक्ष ब्रह्मा जी के मानस पुत्र थे उन्होंने अपने विशाल यज्ञ में सभी देवताओं और ष को आमंत्रित किया लेकिन भगवान शिव और माता सती को आमंत्रण तक नहीं दिया माता सती अपने पति महादेव की इच्छा के विरुद्ध पिता के यज्ञ में पहुंची लेकिन वहां उन्होंने देखा कि ना तो उनके पति का सम्मान हुआ ना ही उनका यज्ञ में कोई भाग उल्टा उनके पिता दक्ष ने उन्हें अपमानित किया और शिव का तिरस्कार किया इस अपमान से आहत होकर माता सती ने वहीं यज्ञ की अग्नि में आत्मदाह कर लिया जैसे ही भगवान
शिव को यह दुखद समाचार मिला वे प्रचंड क्रोध से भर उठे उन्होंने अपनी जटा से एक महा विनाशक योद्धा को उत्पन्न किया जिसका नाम था वीरभद्र जैसे ही वीरभद्र उत्पन्न हुए उन्होंने अपनी प्रचंड से यज्ञ स्थल को हाहाकार से भर दिया उन्होंने दक्ष की सेना को परास्त किया उनके सलाहकारों को दंड दिया और अंततः दक्ष का सिर धड़ से अलग कर दिया इस घटना का वर्णन स्कंद पुराण शिव पुराण और देवी भागवत में मिलता है बाद में ब्रह्मा और विष्णु जी कैलाश पर्वत पहुंचे और भगवान शिव से विनती की कि वे अपने क्रोध को शांत
करें और दक्ष को जीवन दान दें कई प्रार्थना हों के बाद भगवान शिव ने दक्ष के धर से एक बकरे का सिर जोड़कर उसे पुनर्जीवित कर दिया और इस तरह यज्ञ पूरा हुआ वीरभद्र जो शिवजी के सबसे शक्ति शाली गणों में से एक माने जाते हैं आज भी दक्षिण भारत में भगवान शिव की तरह पूजे जाते हैं आंध्र प्रदेश के लेपाक्षी गांव में स्थित वीरभद्र मंदिर इस अवतार की गाथा का साक्षी है जहां देश भर से श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं अब जानते हैं दूसरा अवतार जिसे पिप्पलाद कहा जाता है प्राचीन काल की एक
अद्भुत कथा के अनुसार जब त्रिलोक पर वृत्ता असुर का आतंक बढ़ता जा रहा था तब देवताओं ने महर्षि दधीच से उनके हड्डियों के दान की याचना की क्योंकि दधीच की हड्डियां भगवान शिव के तेज से युक्त और अत्यंत शक्तिशाली थी उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए सहर्ष अपने प्राण त्याग दिए और उनकी हड्डियों से इंद्रदेव ने वज्र का निर्माण किया जिससे वृत्ता सुर का वध संभव हुआ लेकिन जब महर्षि दधीच की पत्नी सुवर चला लौटी तो उन्हें ज्ञात हुआ कि उनके पति की हड्डियों का उपयोग देवता के अस्त्र बनाने में किया गया है यह सुनकर
वह सती होने को तैयार हो गई तभी आकाशवाणी हुई हे सुवर चला तुम्हारे गर्भ में महर्षि दधीच के ब्रह्म तेज से स्वयं भगवान शिव का एक अवतार जन्म लेने वाला है अतः इसकी रक्षा करना अत्यंत आवश्यक है कुछ समय पश्चात पीपल के वृक्ष के नीचे एक दिव्य बालक का जन्म हुआ जिसे स्वयं ब्रह्मा जी ने पिप्पलाद नाम दिया देवताओं ने उन्हें आशीर्वाद देकर उनके सभी संस्कार पूरे किए लेकिन जैसे-जैसे पिप्पलाद बड़े हुए उनके मन में एक प्रश्न उमड़ने लगा आखिर ऐसा क्या कारण था कि मेरे पिता दधीच जन्म से पहले ही मुझे छोड़कर चले गए
और मेरी माता भी जन्म के तुरंत बाद ही सती हो गई क्यों मुझे बचपन में ही अनाथ होकर कष्ट सहने पड़े जब पिप्पलाद ने देवताओं से यह प्रश्न पूछा तो उन्होंने उत्तर दिया कि यह सब ण ग्रह की अशुभ दृष्टि के कारण हुआ है यह सुनकर पिप्पलाद अत्यंत क्रोधित हो गए उन्होंने कहा क्या यह शनि नवजात शिशुओं को भी नहीं छोड़ता इसका अहंकार इतना बढ़ गया है और फिर एक दिन पिप्पलाद मुनि का सामना शनिदेव से हुआ पिप्पलाद ने अपने ब्रह्म दंड को उठाया और शनिदेव पर प्रहार कर दिया ब्रह्म दंड का प्रहार सहन करने
की शक्ति शनिदेव में नहीं थी इसलिए वे भयभीत हो होकर भागने लगे तीनों लों की परिक्रमा करने के बाद भी ब्रह्म दंड ने शनिदेव का पीछा नहीं छोड़ा और अंततः उनके पैर पर जाकर लगा जिससे शनिदेव लंगड़े हो गए देवताओं ने पिप्पलाद मुनि से शनिदेव को क्षमा करने की प्रार्थना की देवताओं के विनय करने पर पिप्पलाद ने शनिदेव को इस शर्त पर क्षमा किया कि शनिदेव जन्म से लेकर 16 वर्ष की आयु तक किसी भी मनुष्य को कष्ट नहीं देंगे तभी से यह माना जाता है कि जो भी व्यक्ति पिपलाद मुनि का स्मरण करता है
उसकी क्षणी पीड़ा दूर हो जाती है लेकिन आगे बढ़ने से पहले इस वीडियो को एक लाइक करके चैनल को सब्सक्राइब जरूर कर लीजिए क्योंकि यह आपके लिए सिर्फ एक सेकंड का काम है लेकिन इससे हमारी टीम को बहुत बड़ा सपोर्ट मिलता है भगवान शिव का तीसरा अवतार है नंदी शिव महापुराण के अनुसार शिलादित्य थे लेकिन उन्हें यह चिंता थी कि उनकी वंश परंपरा आगे नहीं बढ़ेगी उन्होंने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया और उनसे यह वरदान मांगा कि उन्हें एक ऐसा पुत्र प्राप्त हो जो जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो भगवान
शिव उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए और उन्हें वरदान दिया कि वे स्वयं उनके पुत्र रूप में जन्म लेंगे कुछ समय बाद शलादर प्राप्त हुआ जिसका नाम उन्होंने नंदी रखा यह बालक जन्म से ही दिव्य शक्तियों से युक्त था और महान विद्वान बना जब नंदी को ज्ञात हुआ कि संसार में मृत्यु अटल है तो वे अत्यंत दुखी हुए तब शिलादित्य की जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपना अनन्य भक्त और अपने गणों का अधिपति बना लिया भगवान शिव ने नंदी को अमृत्व का वरदान दिया और उन्हें अपना वाहन बनाया इसके साथ ही शिवजी ने घोषणा
की कि जहां भी नंदी की पूजा होगी वहां उनकी भी आराधना की जाएगी यही कारण है कि हर शिव मंदिर में नंदी की मूर्ति भगवान शिव के समक्ष विराजमान होती है नंदी के विवाह की भी एक कथा है भगवान शिव ने की पुत्री सुयशा से नंदी का विवाह करवाया था जिससे यह सिद्ध हुआ कि वे केवल एक वाहन ही नहीं बल्कि एक महत्त्वपूर्ण दिव्य शक्ति भी है भगवान शिव का चौथा अवतार है काल भैरव भगवान शिव का काल भैरव अवतार उनका सबसे उग्र और न्याय कारी स्वरूप है यह अवतार अधर्म के विनाश और संतों की
रक्षा के लिए प्रकट हुआ था स्कंद पुराण शिव पुराण और काशी खंड में इस अवतार का विस्तृत वर्णन मिलता है शिव पुराण में बताया गया है कि एक बार ब्रह्मा और विष्णु स्वयं को भगवान शंकर की माया से प्रभावित होकर श्रेष्ठ मानने लगे थे इस बारे में जब वेदों से पूछा गया तो उन्होंने शिव को सर्वश्रेष्ठ एवं परम तत्व कहा लेकिन ब्रह्मा और विष्णु ने उनकी बात का खंडन किया साथ ही ब्रह्मा जी ने शिव जीी की निंदा भी की यह सुन शिव जी बेहद क्रोधित हो गए और ब्रह्मा जी से अपने अपमान का बदला
लेना चाहा शिवजी ने अपने रौद्र रूप से काल भैरव को प्रकट किया जैसे ही काल भैरव प्रकट हुए उन्होंने भगवान शिव के आदेश का पालन करते हुए ब्रह्मा जी का पांचवा सिर अपने नाखून से अलग कर दिया इस कारण से उन पर ब्रह्म हत्या का पाप लग गया और ब्रह्मा जी का पांचवा सिर काल भैरव के हाथ से चिपक गया इस दोष से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव ने काल भैरव को आदेश दिया कि वे पृथ्वी पर जाएं और जब उनके हाथ से ब्रह्मा का कटा हुआ सिर गिर जाएगा तभी वे ब्रह्म हत्या के
पाप से मुक्त हो जाएंगे काल भैरव ने समस्त तीर्थों का भ्रमण किया लेकिन वे ब्रह्म हत्या के दोष से मुक्त नहीं हो सके अंततः जब वे काशी पहुंचे तो वहां उन्हें इस दोष से मुक्ति मि गई और ब्रह्मा जी का सिर उनके हाथ से गिर गया तब से काल भैरव काशी में ही स्थित हो गए और वहां के नगर कोतवाल कहलाए यही कारण है कि काशी में काल भैरव को नगर रक्षक और न्याय का देवता माना जाता है काल भैरव अवतार के दो प्रमुख रूप माने जाते हैं काल भैरव और असिता भैरव काल भैरव को
काशी के अधिपति माना जाता है और वे वहां के सभी भक्तों की रक्षा करते भक्तों का विश्वास है कि काशी में बिना काल भैरव के दर्शन किए कोई भी पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकता अब बात करते हैं भगवान शिव के पांचवें अवतार अश्वथामा की अश्वथामा जिन्हें भगवान शिव का रुद्र अवतार माना जाता है महाभारत के सबसे शक्तिशाली योद्धाओं में से एक थे उनका जन्म महर्षि द्रोणाचार्य और कृपी के घर हुआ था अश्वथामा का जन्म एक विशेष उद्देश्य के तहत हुआ था धर्म की रक्षा और काल के प्रवाह में अपनी अमृता के रहस्य को समेटे रखने
के लिए द्रोणाचार्य जो स्वयं महायोद्धा और कौरवों के गुरु थे उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी ताकि उन्हें एक ऐसा पुत्र प्राप्त हो जो युद्ध में अपराज हो भगवान शिव ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर अपने रुद्र रूप का एक अंश द्रोणाचार्य के पुत्र के रूप में प्रकट किया जन्म के समय ही अश्वथामा के माथे पर एक दिव्य मणि विराजमान थी जो उन्हें अपार शक्ति प्रदान करती थी और किसी भी अस्त्र शस्त्र से अजय बनाती थी महाभारत के युद्ध में अश्वथामा ने कौरवों का साथ दिया और अपनी असाधारण युद्ध कौशल का परिचय दिया
जब उनके पिता द्रोणाचार्य की मृत्यु हुई तो अश्वथामा अत्यंत क्रोधित हो उठे उन्होंने कौरवों के आखिरी से सेनापति के रूप में युद्ध की कमान संभाली और प्रतिशोध लेने की प्रतिज्ञा ली युद्ध की समाप्ति के बाद जब पांडव अपने शिविर में विश्राम कर रहे थे तब अश्वथामा ने क्रोध में आकर नर संहार कर दिया उन्होंने द्रौपदी के पांचों पुत्रों की हत्या कर दी जिन्हें वे पांडव समझ बैठे थे जब यह बात अर्जुन और श्री कृष्ण को पता चली तो उन्होंने अश्वथामा को दंड देने का निर्णय लिया अश्वथामा नेने अपनी रक्षा के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया
लेकिन अर्जुन ने भी ब्रह्मास्त्र का संधान कर दिया जब पूरी पृथ्वी विनाश की ओर बढ़ने लगी तो श्री कृष्ण ने दोनों योद्धाओं को अपना ब्रह्मास्त्र वापस लेने को कहा अर्जुन ने अपने अस्त्र को रोक लिया लेकिन अश्वत्थामा ने इसे गर्भवती उत्तरा के गर्भ में पल रहे अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित पर छोड़ दिया इस क्रूर कृत्य से क्रोधित होकर श्री कृष्ण ने अश्वथामा को युगों युगों तक धरती पर भटकने का श्राप दे दिया उन्होंने अश्वथामा की दिव्य मणि छीन ली जिससे वह कष्टों से घिर गया कहा जाता है कि वह आज भी पृथ्वी पर अमर है
भटक रहा है और मोक्ष की खोज में लीन है अश्वथामा को भगवान शिव का अंश माना जाता है और कई किंवदंतियों के अनुसार वह आज भी शिव भक्ति में लीन रहता है कई संतों और तपस्वी ने उनके दर्शन होने का दावा किया है अब बात करते हैं भगवान शिव के छठे अवतार शरभा अवतार की शिव पुराण और लिंग पुराण में भगवान शिव के इस अद्भुत अवतार का उल्लेख मिलता है भगवान विष्णु ने जब हिरण्य कश्यप का वध करने के लिए नरसिंह अवतार लिया तो वे आधे सिंह और आधे मानव के रूप में प्रकट हुए थे
लेकिन हिरण्य कश्यप के अंत के बाद भी उनका क्रोध शांत नहीं हुआ उनका उग्र रूप पूरी सृष्टि के लिए खतरा बनता जा रहा था देवता भयभीत हो उठे उन्होंने भगवान शिव से प्रार्थना की कि वे इस संकट को शांत करें भगवान शिव ने सृष्टि के संतुलन को बनाए रखने के लिए एक विशेष रूप धारण किया जिसे श्रब अवतार कहा जाता है शरब अवतार एक शक्तिशाली और अद्भुत स्वरूप था जिसमें आठ पैर थे और वह आधा सिंह और पक्षी के रूप में प्रकट हुआ यह रूप इतना बलशाली था कि स्वयं नरसिंह से भी अधिक शक्तिशाली माना
गया जब भगवान शिव शरभ रूप में प्रकट हुए तो वे भगवान नरसिंह के पास पहुंचे लेकिन भगवान नरसिंह इतने उग्र थे कि किसी को भी अपने पास नहीं आने दे रहे थे तब शर्व अवतार ने अपनी विशाल पूंछ में भगवान नरसिंह को लपेट लिया और आकाश में उड़ चले अपनी दिव्य शक्तियों और करुणामय कृपा से उन्होंने भगवान विष्णु के इस उग्र रूप को शांत कर दिया शरभ अवतार के प्रभाव से भगवान नरसिंह का क्रोध समाप्त हो गया और वे अपने मूल स्वरूप में लौट आए इस प्रकार भगवान शिव के शरभ अवतार ने महाविनाश को रोककर
पूरी सृष्टि को संकट से बचा लिया अब बात करते हैं भगवान शिव के सातवें अवतार गृप के बारे में पुराणों के अनुसार नर्मदा नदी के तट पर धर्मपुर नामक नगर में एक महान ऋषि विश्वा अपनी पत्नी श चिमती के साथ निवास करते थे वे अत्यंत धार्मिक और शिव भक्त थे लेकिन संतान सुख से वंचित होने के कारण दुखी रहते थे अपनी संतान की प्राप्ति के लिए उन्होंने कठोर तपस्या की और भगवान शिव को प्रसन्न करने का संकल्प लिया भगवान शिव उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए और उन्हें वरदान दिया कि वे स्वयं उनके पुत्र के रूप
में जन्म लेंगे कुछ समय बाद शुचि स्मती ने एक दिव्य बालक को जन्म दिया जो स्वयं भगवान शिव का अवतार था ब्रह्मा जी ने इस बालक का नाम [संगीत] गृहप्रवेश के हुए तब नारद मुनि उनके घर आए और भविष्यवाणी की कि उन्हें आग से भय रहे और यह भय उनके जीवन के लिए संकट बन सकता है यह सुनकर माता-पिता चिंतित हो उठे लेकिन गृहपटीस का संकल्प लेकर काशी चले गए काशी में उन्होंने एक पवित्र स्थान पर शिवलिंग की स्थापना कर कठोर तपस्या शुरू की जब उनकी तपस्या की शक्ति से पूरा ब्रह्मांड प्रभावित होने लगा तब
इंद्र देव वहां पहुंचे और को कहा लेकिन गृहप्रवेश [संगीत] [संगीत] शिव ने [हंसी] [संगीत] गृहप्रवेश दिया कि मोक्ष प्राप्ति के लिए सन्यास आवश्यक नहीं है बल्कि गृहस्थ जीवन में रहकर भी आध आध्यात्मिक उन्नति संभव है अब बात करते हैं भगवान शिव के आठवें अवतार चिरंजीवी हनुमान जी के बारे में धार्मिक कथाओं के अनुसार हनुमान जी भगवान शिव के 11वें रुद्र अवतार माने जाते हैं उनके जन्म को लेकर कहा जाता है कि जब भगवान विष्णु ने प्रभु श्री राम के रूप में अवतार लिया तब भगवान शिव ने उनकी सहायता के लिए हनुमान जी के रूप में
अवतरण किया दूसरी ओर राजा केसर और माता अंजना कठोर तपस्या कर रहे थे उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें वरदान मांगने को कहा माता अंजना ने कहा हे प्रभु मुझे ऐसा पुत्र प्राप्त हो जो बल में रुद्र के समान गति में वायु के समान तेज और बुद्धि में गणपति के समान मेघावी हो माता अंजना की यह बात सुनकर भगवान शिव ने अपनी रौद्र शक्ति के अंश को पवन देव के माध्यम से यज्ञ कुंड में प्रविष्ट करा दिया जिससे हनुमान जी का जन्म हुआ पौराणिक कथाओं में यह उल्लेख मिलता है कि महावीर हनुमान
ने शनिदेव को रावण की कैद से मुक्त कराया था इस पर शनिदेव ने उन्हें वचन दिया था कि वे उनके भक्तों को कष्ट नहीं देंगे लेकिन कलयुग के आगमन के बाद शनिदेव अपना वचन भूल गए और स्वयं हनुमान जी को साढ़े साथी का कष्ट देने पहुंचे हनुमान जी ने उन्हें अपने सिर पर बैठने की अनुमति दी जब शनि देव उनके सिर पर बैठ गए तब हनुमान जी ने एक विशाल पर्वत अपने सिर पर धारण कर लिया पर्वत के भार से शनिदेव असहनीय पीड़ा में आ गए और क्षमा मांगने लगे शनिदेव ने वचन दिया कि जो
भी सच्चे मन से हनुमान जी की भक्ति करेगा उसे ण की महादशा साढ़े साथी और ढैया का कष्ट नहीं भोगना पड़ेगा तब जाकर हनुमान जी ने उन्हें मुक्त किया अगर आप भगवान शिव के 11 रुद्र अवतारों की कथा पर एक विशेष वीडियो देखना चाहते हैं तो कमेंट करके जरूर बताएं अगर ज्यादा कमेंट आते हैं तो हम इस विषय पर जल्द ही एक खास वीडियो लेकर आएंगे अब बात करते हैं भगवान शिव के नौवे अवतार वृषभ अवतार की शिव पुराण के अनुसार जब समुद्र मंथन के दौरान अमृत निकला तब देवताओं और दानवों में उसे पाने के
लिए भयंकर युद्ध छिड़ गया युद्ध को ने और असुरों का ध्यान भटकाने के लिए भगवान विष्णु ने अपनी माया से अप्सराओं का सृजन किया जैसे ही दानवों की नजर उन अप्सराओं पर पड़ी वे मोहित हो गए और उन्हें अपने साथ पाताल लोक ले जाकर बंदी बना लिया इधर जब असुर अमृत कलश लेने वापस आए तब तक देवता अमृत पान कर चुके थे यह देखकर दानव क्रोधित हो उठे और उन्होंने देवताओं पर आक्रमण कर दिया भगवान भगवान विष्णु ने असुरों को हराकर पाताल लोक तक उनका पीछा किया वहां पहुंचकर उन्होंने सभी दानवों का नाश कर दिया
और बंदी बनाई गई अप्सराओं को मुक्त किया लेकिन अब एक नया संकट उत्पन्न हो गया अप्सराएं भगवान विष्णु पर मोहित हो गई और उन्होंने भगवान शिव से विष्णु जी को वरदान स्वरूप पति के रूप में पाने की प्रार्थना की भगवान शिव ने वरदान दिया जिससे भगवान विष्णु सब कुछ भूल गए और अप्सराओं के साथ पाताल लोक में रहने लगे समय बीतता गया और उन अप्सराओं से भगवान विष्णु के कई पुत्रों का जन्म हुआ लेकिन वे सभी दानवी प्रवृत्ति के थे भगवान विष्णु के शक्तिशाली पुत्र होने के कारण उन्होंने तीनों लोकों में अत्याचार मचाना शुरू कर
दिया देवता भयभीत हो उठे और वे इस समस्या का समाधान मांगने भगवान शिव के पास पहुंचे महादेव ने नीले रंग के एक विशाल बैल का रूप धारण किया जिसे वृषभ अवतार कहा गया इस अवतार में भगवान शिव पाताल लोक पहुंचे और वहां भगवान विष्णु के सभी राक्षसी पुत्रों का संहार कर दिया जब भगवान विष्णु ने अपने वंश का विनाश होते देखा तो उन्होंने भगवान शिव के वृषभ अवतार पर आक्रमण कर दिया दोनों महा शक्तियों के बीच भयानक युद्ध छिड़ गया ब्रह्मांड तक का काप उठा लेकिन तभी अप्सराओं ने भगवान विष्णु को अपने वरदान से मुक्त
कर दिया बंधन मुक्त होते ही भगवान विष्णु को अपनी भूल का एहसास हुआ और उन्होंने युद्ध रोक दिया फिर वे पाताल लोक छोड़कर विष्णु लोक लौट गए इसी तरह भगवान शिव ने अपने वृषभ अवतार के माध्यम से अधर्म का अंत किया और ब्रह्मांड में संतुलन स्थापित किया दोस्तों इस वीडियो में हमने भगवान शिव के 19 अवतारों में से नौ अवतारों के रहस्यों को जाना लेकिन अगर हम सभी 19 अवतारों को एक ही वीडियो में कवर करेंगे तो यह वीडियो बहुत लंबा हो जाएगा इसलिए हम इसका दूसरा पाठ जल्द ही लेकर आएंगे जिसमें हम भगवान शिव
के बाकी 10 अवतारों के रहस्य और उनकी लीलाओं के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे अगर आप चाहते हैं कि दूसरा भाग जल्दी से जल्दी पब्लिश हो तो वीडियो को लाइक करें कमेंट में हर हर महादेव जरूर लिखें और चैनल को सब्सक्राइब करना बिल्कुल ना भूलें ताकि सनातन धर्म के अद्भुत रहस्यों और गुण ज्ञान आपको मिलता रहे जल्द ही मिलते हैं इस वीडियो के दूसरे भाग में तब तक के लिए जय महाकाल हर हर महादेव [संगीत]