ओ श्री परमात्मने [संगीत] नम हमारे जीवन में बहुत सारी संभावनाएं सोई हुई पड़ी है हम जिस जगत में जी रहे हैं जो कुछ जान रहे हैं वह जगत बहुत छोटा है हम तो एक ही सूर्य को देख रहे हैं लेकिन इस सूर्य से भी लाखों गुना बड़े-बड़े सूर्य तारे आकाश गंगा में है ऐसी कई आकाश गंगा एक ब्रह्मांड में है ऐसे कई ब्रह्मांड को यथा विधि चलाने वाली जो सत्ता है वही सत्ता हमारे शरीर में बाल उगाती है वही सत्ता हमारे शरीर में बाल उगाती है बाल उगाती है खून बनाती है नेत्र को देखने की
सत्ता देती है वही सत्ता मन को सोचने की सत्ता देती है बुद्धि को निर्णय करने की सत्ता देती है निर्णय बदल जाते फिर भी जो सत्ता नहीं बदलती दुख बदल जाते सुख बदल जाते वे लोग बहुत छोटे रह जाते जो दुख की बात को याद करके बैठे रहते कि इन्होंने मेरे को फलाने टाइम ऐसा बोला था मेरा अपमान किया था दूसरों ने की हुई गलती याद रखेंगे तो हमारा हृदय खराब होगा अपना उपकार याद रखेंगे तो हमारा हृदय अधिकार की लोलुपता में मरेगा आपने उपकार किया व भूल जाओ हजूर अगर सुखी रहना है तो दूसरे
ने अपकार किया तो यह भूल जाओ तब उस सत्ता के करीब आ जाओगे नहीं तो सत्ता से दूर चलते जाओ लोग सोचते कि अब धंधा चला गया मैं क्या खाऊंगा भाईया मेरे लोफर को रोटी मिल जाती है दोदो मर्डर करते उनको मिल जाता है सब कुछ छोड़कर फेंक के नर्मदा किनारे बैठ गए थे उनको मिल गया तो तुम काम धंधा करने की इच्छा वाले भूखे रह जाओगे क्या कबीर जी ने कहा मेरो चिंत होत नहीं हरि को चिंत होए हरि चिंत हरि करे मेर निश्चिंत चिंता ना करो प्रयत्न थोड़ा करो लेकिन प्रयत्न को चिंता का
जामा पहरा कर बुद्धि को और भाग्य को दबोच मत दो तुलसीदास ने कहा तुलसी भरोसे राम के निश्चिंत ई सोए अन होनी होनी नहीं होनी हो सो होई लेकिन मन चालाक ऐसा होता कि क्या करें बेटी है बेटा है एक सज्जन आए थे दो ढाई दिन कोशिश किया उन्होंने पुष्कर की शिबिर थी तब आए दुबई से बापू जी से बात करा दे कोई तो उसको उसको उसको आखिर उनका नंबर लग ही गया शिविर पूरी होने के बाद दूसरे दिन के तीसरे दिन उनको किसी ने मुलाकात के लिए मेरे तक पहुंचा दी बाबा जी बहुत दुखी
हूं कि क्या बात है भविष्य साफ नहीं दिखता है क्या दुबई में रहता हूं जयपुर का हूं दुबई में फलानी पोस्ट पे हूं बड़ी चिंता साथ मैं क्या किस बात की चिंता है क्या होगा आखिर मैं कितना पगार बोले 6000 राम 6 हज रप हुआ हिंदुस्तान का उस समय 60 अभी तो 70 मान लो 60 ले बाबा जी लेकिन क्या कर बेटी है एक उसका सोचता हूं तो भविष्य का क्या हो कितनी बड़ी हो गई बोले न साल की है उसकी भी तो कभी शादी करानी पड़ेगी इसको बोलते हैं भावनात्मक तनाव क्रिएट करने की बेवकूफी
शारीरिक तनाव वाले को सुरा और सुंदरी चाहिए भावनात्मक तनाव वाला सुरा सुंदरी नहीं लेकिन तनाव तनाव में ऐसे निर्णय कर बैठता कि रात को नींद नहीं आएगी फ नींद की गोली चाहिए उसे मैं कहा तुम बोले जयपुर का मकान है वह भी भाई ने दबा लिया है खैर वो तो कोई बात नहीं भाई मैं तो वही रहता हूं उसकी तो कोई चिंता नहीं लेकिन मकान तो ले लिया मेरे को तो फिरसा सम बच्चे कितने बोले दो हैं बेटा है वो तो बोले पाच छ साल का बेटी न साल की हो गई सादी अभी न 10
साल तो पड़े हैं तो अभी से क्यों भावनात्मक तनाव पैदा करते हो हकीकत में जिसका जहां अनन जल है जैसे है सटाक फटाक से हो जाता है और अपन चिंता करते हैं तो उसमें और भी हमारी बुद्धि मारी जाती तो क्या करना क्या ना करना वो भी ठीक निर्णय नहीं होता भगवान ने उधव को कहा कि उधव सत्संग और मेरी भक्ति ही दुखों का शमन करके परम सुख और मुक्ति देने वाली दो ही मार्ग मेरी भक्ति और [संगीत] सत्संग बिना सत्संग के वृति सत स्वरूप में नहीं लगेगी सत्संग से पता चलता है कि आपका आत्मा
कितना महान है और आप कितनी छोटी कल्पनाओं में अपने को परेशान कर यह तो बेटे बेटी की शादी है हम खाने पीने रोजी रोटी की बात है लेकिन आप इतनी ऊंची चीज हो कि सब आपका दुकान घर मकान और शरीर सबको स्वा कर दिया जाए फिर भी आपका एक नखा भी नहीं बिगड़ता आप इतनी ऊंची चीज और रोज का एक करोड़ रुपया आपकी कमाई कर दी जाए तभी भी आपको कोई विशेष फायदा नहीं होता है आप इतने ऊंचे विशेष हो जय राम जी की आठ में अरस तेरा नूर चमक द तू उससे भी ऊंचा हो
फकीरा आपे अल्लाह हो तुम ईश्वर के अविभाज्य अंग राम मरे तो हम मरे हमरी मरे बला सत्पुरुष का बाल खा मरे ना मारा जाए कबीर जी ने क जब प्रलय महा प्रलय भी तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सके और फिर से तुम्हारा जन्म होता और यह सब होता है तो मंदिर तुम्हारा क्या कर लेगी लड़की की शादी तुम्हारा क्या बिगाड़ लेगी छोरा नाराज होकर घर छोड़ के चला गया तो क्या हो जाएगा शादी कैंसिल हो गई तो क्या हो जाएगा शादी रुक गई तो क्या हो जाएगा छो मुयो बनारी ना एक को थे तो सुठा तो
थे को थे दो सुठा थ जो हो गया अच्छा हुआ जो हो रहा है अच्छा है जो होगा वही भी अच्छा ही होगा यह नियम परमात्मा सत्ता का है बच्चे का नाक पहुंचती है मां और रगड़ के स्नान कराती तो अच्छा नहीं लगता लेकिन बच्चे की अच्छा के लिए स्कूल जाना बच्चे को अच्छा नहीं लगता शुरू में लेकिन कैसे भी करके धमका के दबा के कुट मिले जाते तोही संसार का नियम है कि हम जो चाहते वह सब तो होता नहीं है अगर हम जैसा चाहे ऐसा होने लगे तो हम मुसीबत में हो जाएंगे हम
जैसा चाहे ऐसा होने लग जाए सबका तो मुसीबत के महासागर में हम खप जाएंगे सब इसलिए उसकी बड़ी कृपा है परम सत्ता की हम जो चाहते हैं वह सब होता नहीं है जो होता है वो सब हमको भाता नहीं ध्यान से सुनना हम जो चाहते हैं वह सब होता नहीं जो कुछ हो जाता है वह सब भाता नहीं और जितना भाता है वह टिकता नहीं यह उस सत्ता की कृपा है और इसी से हम परेशान है हम चाहते कि हम जो चाहे वो हो जाए ठीक है ना मुन्ना से पूछा पापा ने कि बेटा अगर
तू प्रधानमंत्री हो तो क्या करेगा बोले सब स्कूल बंद करवा दो शराबी को पूछा तू अगर प्रधानमंत्री हो जाए तो क्या करे बोले एक रुपए में बोतल करवा दूंगा मेरे से कोई पूछे आप प्रधानमंत्री हो जाओ तो मैं बोलूंगा सबको सत्संगी बना दूं ताली बजाने की जरूरत नहीं है तो फिर ये संसार की भट्ठी में कौन पचेगांव ट्रैफिक हो जाएगा हम जो चाहते हैं वह सब होता नहीं जो होता है वह सब भाता नहीं जो भाता है वो टिकता नहीं अगर भाया हुआ टिके तो मरते समय बहुत दुख होगा भाया हुआ टिके तो उसमें और
आसक्ति हो जाएगी अच्छा कि भाता है वह टिकता नहीं शरीर अपना अपना शरीर तो सबको भाता है तो क्या टिकेगा शरीर यश सबको भाता है तो यश टिकता है क्या सदा साथ में अपयश भी चलता है तंदुरुस्ती भाती तो क्या टिकती है सदा सबकी तंदुरुस्ती सुख भाता है लेकिन टिकता है क्या सदा यह नहीं टिकता इसीलिए तो हमारी प्रगति हो रही है इसीलिए तो हम कोई सच्चे सुख के द्वार तक पहुंच सकते हैं अगर यह कच्चा सुख टिक जाए तो हम एकदम कच्चे जीवन में खप जाएंगे जैसे शिशु की अपेक्षा उसकी मां शिशु का हित
किसम है वह मां जितना जानती शिशु नहीं जानता और मां जितना उसका सही शिशु का सही हित कर सकती उतना शिशु स्वयं अपना हित नहीं कर सकता है तो जीवात्मा है महा शिशु और परमात्मा है माताओं की माता तो भगवान कहते हैं भोक्ता रम यज्ञ तप साम सर्व लोका [संगीत] महेश्वरम सु हदम सर्व भूता नाम ज्ञात माम शांति सभी के गहराई में यज्ञ तप के फल का सुख का भोगता में अंतर आत्मा चैतन्य इसलिए किसी को भी भलाई के कार्य से किसी को भी आप संतुष्ट सुखी करते हो तो यह बेवकूफी मत लाना कि बिचारा
पिता है बिचारा गरीब है बिचारे बेटे हैं बिचारी बेटियां है बिचारे ये हैं मैं ना होंगा तो इनका क्या होगा बेटियों का बेटे का बिचारे का फलाने का क्या होगा तो आप अपने को कर्ता के टेंशन से मुक्त करिए भरतरी हिरण के बच्चे का चिंतन करने लगे तो इसका बच्चे का बिचारे का क्या होगा उस चिंतन चिंतन में मरे तो दूसरा जन्म हिरण का हो गया तो कोई सेवक भोजन बनाता था वृद्ध संत हुए हटा दिया कि मरते समय तेरा चिंतन हो जाएगा तो फिर लाल लेकिन हटा देने से चिंतन हट जाए यह जरूरी नहीं
है चिंतन को बाधित करने के लिए वेदांत का ज्ञान चाहिए किस किसको हटागे ना हटाओ ना पकड़ो सबकी सत्ता काल्पनिक है प्रतिभास है व्यावहारिक है तात्विक सत्ता किसी की भी नहीं है स्वामी जी ये क्या बोल दिया आपने काल्पनिक है प्रतिभास है व्यवहारिक है तात्विक नहीं है यह समझ में नहीं आया मैं आशाराम महाराज हूं यह मेरी दहाड़ है जय राम जी यह है व्यवहारिक सत्ता ठीक बोला हूं मैं ठीक है ना व्यवहार दाढ़ी बढ़िया है किसी को बढ़िया लगती होगी बढ़िया है यह कल्पना है जिसको बढ़िया लगती है दाढी को पता नहीं मैं बढ़िया
हूं घटिया हू तो काल्पनिक हो गया स्वपना देखा और कुछ स्वप्ना में देखा तो प्रतिभास हुआ तो व्यवहारिक प्रतिभास काल्पनिक यह सब हो हो के बदल जाता है वास्तविक सत्ता के आधार पर और वास्तविक सत्ता जो है वही अपना आत्मा है वही अपन है मैं जहां से उठता है तो व हर एक तत्व प्रतिभास स्वपने में काल्पनिक व्यवहार [संगीत] में तो इन सबके पीछे जो [संगीत] सार्थ सुख स्वरूप आनंद स्वरूप ज्ञान स्वरूप माधुर्य स्वरूप है वो तात्विक है कितनी चीजें खाने की है लेकिन खाई जीभ में स्वाद आया सुख आपको यही होगा हदय कितनी बातें
सुनने की है कान से सुने लेकिन सुख यहां होता है संगी नाक से लेकिन सुख का एहसास य होता है ईश्वर सर्व भूता नाम हृदय से अर्जुन तिष्ठती वह जो ईश्वर है आनंद स्वरूप वो हृदय में बोले भगवान सर्वत्र है महाराज फ हृदय में है बोलते है तो सर्वत्र लेकिन उसके अनुभव का केंद्र हृदय है इसलिए बोलते ईश्वर हृदय जैसे आप तो सर्वत्र है चर्म और चेतना सर्वत्र है आपके गाल पर रसगुला लगा दे तो कैसा रहेगा मीठा लगेगा ललाट प मल दे चासनी तो स्वाद नहीं आएगा पेट पर रख दे हलवा बांध दे तो
स्वाद नहीं आएगा पीठ पर मोन थाल रगड़ दे तो कुछ नहीं होगा बाबा पैरों में रस मलाई और रबड़ी लगा दे तो पूरे शरीर में लेप कर दे रबड़ी का तो खूब चीनी वाली रबड़ी स्वाद नहीं आएगा स्वाद का केंद्र है जीवा रसना ऐसे ही परमात्मा के स्वाद का केंद्र है आपका शुद्ध रद है तात्विक विचार वाला भक्ति ज्ञान वैराग्य युक्त तात्विक विचार वाला हृदय बनता है त भगवान का अनुभव होता है भगवान तो थे है और रहेंगे आपके साथ कि अनुभव नहीं होता क्योंकि प्रति भाषिक व्यवहारिक और काल्पनिक बातों में इतने गिर गए इतने
खो गए हैं कि जो दुखों का अंत और परम सुख और सामर्थ्य उससे अलग तो नहीं हो सकते लेकिन अलग तलग जैसे हो गए जनक राजा ने स्वप्ना देखा शत्रु ने राज्य को घेर लिया है युद्ध में मुझे जाना पड़ा है और भीषण युद्ध घमासान युद्ध चला शत्रु एकत्रित हो गए तीनों पड़ोसी शत्रु और वह जो मुख्य मेरा शत्रु है वह मेरे पर भारी हो रहा है आखिर धड़ धड़ धड़ हाथी चिड़े घोड़े उका सैनी कटे मरे तेज बहादुर जिंदाबाद जनक राजा मुर्दाबाद जनक बगे व से शत्रु राजा मिथिला का नरेश हो गया और जनक
को बंदी मनाकर सामने लाया गया है यह देख रहे हैं जनक राजा जनक स्वपने में देख रहे हैं जीतने वाला राजा कहता कि जनक तुम धर्मात्मा हो इसलिए तुम्हें मृत्यु दंड नहीं देता हूं नहीं तो शत्रु राजा को जिंदा नहीं छोड़ना चाहिए ढंडेरा पिटवा दिया जाता है कि कोई भी जनक से सहानुभूति भरा व्यवहार करेगा वो राजद्रोह के गुनाह के कारण मृत्यु दंड का पात्र होगा तुम एक धोती एक अंगोछा और एक लोटा लेकर मिथिला से मिथिला के जंगल से जल्दी से जल्दी प्राण प्रिय हो तो अपने को बचा के ले जाओ नहीं तो पिछले
27 घंटे के बाद अगर मेरे रेंज में होगे तो तुम्हें पकड़ के मौत की घाट उतारा जाएगा जनक ने कहा धन्यवाद आपने मुझे प्राण दंड नहीं दिया प्राण रक्षा की भगवान आपका भला करे जनक चल पड़े 27 घंटे के अंदर पूरी मिथिला और उसके जंगल लाने स्वपने में जनक लांते लांते लांते लाते भूख प्यासे प्राण प्रिय होते हैं पड़ोसी राज्य के जंगल में पहुंचा जंगल लागते लागते कोई बस्ती में पहुंचा दो दिन का भूखा प्यासा जंगली व्यक्ति जैसा कई खिचड़ी बट रही थी और लोग लाइन में खड़े थे नग भी जाकर खड़े हुए तो लोगों
ने कहां से आ र हट पीछे जा पीछे जा पीछे सबने धकेल दिया खिचड़ी बढते बढ़ते सबको मिली लेकिन जनक का वारा हुआ तो खिचड़ी खत्म हो गई अन्य क्षेत्र वाले ने कहा गरीब का भाग्य भी गरीब होता है तुम तो कैसे अभग आदमी आया भगवान तुम्हारा भला करेगा दो दिन का भू खाऊ जो कुछ हो भैया कुछ तो दे दो बोले देख ये जो पतीले है ना मैं उसकी खुरे निकाल यह पतीले जो पहले वाले हैं वह मांज ले यह खुरे तेरे भाग्य में आ जाएगी पतीले मांज लिए पतलो को लगी हुई खिचड़ी की
खुरे जिसमें कंकड़ भी थो थोड़े नीचे दोनों हाथ के चुलो में लेकर जनक जा रहा है कहीं जाकर बैठ के खाऊंगा नीचे देख के तो चल नीचे नजर थी कहीं से पानी की नाली थी वो देखा तो चील आई जोरों का झपटा मारा चील के पंजों ने तो नाखून जमा दिए उसके और खिचड़ी गिर गई नाली में जनक अपने राज दरबार में बड़े आलीशान फूलों की शया पर सो रहे हैं और वहां दुख देख रहे हैं कि हाय दो दिन का भूखा और ये खिचड़ी भी भाग्य में नहीं हे विधाता आंख खुली हृदय धड़क रहा
है कि मैं इतना दुख देखा यह क्या है जनक चुप हो गए सुन हो गए सुबह दरबार भरी विद्वानों से पूछा यह सच्चा कि वह सच्चा विद्वान कोई जवाब नहीं दे पाए साधु संतो कोला जनक ने कहा मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं मिलेगा तब तक आप नहीं जा सकते नजर केद होते चले गए अष्टावक्र तक के महापुरुष को जब प्रवेश मिला राजा साहब बोलते यह सच्चा कि व सच्चा उत्तर ना दे तब तक नजर केद रहेंगे सब अष्टावक्र ने देखा कि जनक क्या सवाल है सच्चा वह सच्चा अष्टावक्र तात्विक सत्ता में जीने वाले महापुरुष थे
अपन लोग व्यवहारिक सत्ता में भटक रहे प्रति भाषिक सत्ता में कल्पना सत्ता में जी रहे हैं तो अपने पास उतनी योग्यता नहीं अष्टा वकर क्ण बार तात्विक सत्ता में गए बोले जनक शत्रु शत्रु बोले हां महाराज राज्य को घेर लिया घेर लिया बोले हा जो जनक ने देखा था स्वपना घमासान युद्ध शत्रु ने राज्य छीन लिया आप परास्त हो गए दो दिन तक जंगलों में भटके खिचड़ी भी मुश्किल से मिली और वो चील ने झपट मारी महाराज ये सच्चा कि वो सच्चा बोले वत्स दोनों झूठे जब वह था तब यह शयन खंड और जनक का
आलीशान आराम नहीं था और जन्म जनक आराम की जगह पर आए तो वह नहीं था ना वो सच्चा ना यह सच्चा उन दोनों को देखने वाला पुत्र तू है अपने आप को जान अपने सोहम स्वभाव को जान अपने सो हम को जान सारे दुख सदा के लिए गायब हो जाएंगे वत्स जनक अपने उस आत्म वैभव को जान जिसकी सत्ता से सूर्य सलामी मारता है जिसके हुकुम से दरिया सिर रगड़ रहा है दिन रात हवाएं दौड़ रही है जिसके हुकम से उस हुक्मी अंदर सबको बाहर हुक्मी न कहना जाई एको दाता सो में विसर ना जाए
वाणी की भी बात आथ वो एक दाता है परमेश्वर सत्ता तो उस परमेश्वर पद सत्ता को पाने की रीत अनेक अलग-अलग है और बड़ी सुंदर रीत महापुरुषों ने बताई और तुमको बताऊ और तुम करने लगो तो तुमको लगेगा कि हाय रे हम इतने बेवकूफ थे राजा भरत करने लगे और जब उसको परमार्थिक सत्ता का अनुभव हुआ तो भरतरी लिखते जब स्वच्छ सत्संग किनो तभी कछु कछु चीन मूड जान आपको मैं बेवकूफ था अब पता चला सोने की थाली में भोजन कर रहा हूं भाग्यशाली हं नहीं बेवकूफ था पिंगला रानी मुझे बहुत प्रेम करती मैं बेवकूफ
था कि अपनी कमर तोड़वा र जब स्वच्छ सत्संग किनो तभी कछु कछु चिन क्या चिन के जान आपको मैं बेवकूफ था अब पता चल रहा है बेवकूफी के समय पता नहीं चलता मैं बेवकूफ हूं जब बेवकूफी मिट जाती अभी बोले कि बाबूलाल बाबूलाल जब बच्चे थे ना और नाक से य निकलता था फिर यूं करते थे उस समय कोई बोलते कि बेवकूफ है तो बोले अच्छा नहीं लगता था और अभी अरे बोले यह छोरा बेवकूफ है लेकिन अपन भी तो वही से आए चनी के लिए कितना कूदते थे दो पैसा ढोड़ी गिर जाती तो कितना
परेशान हो जाते थे लेकिन उस समय कहते था भा वो तो है ना वो तो होना पड़ेगा ना तेरे को क्या पता हमारे पैसे गए हैं कोई बड़े चतुर मानते थे अपने को तो दोवनी चवन्नी मिली तो बड़े अपने को भाग्यशाली मानते थे और आने दवाने की चीज घर गई तो बड़े अपने को दुखी और अभागी मानते थे अभी लगता कि वो बेवकूफी थी जैसे उस काल की बेवकूफी अभी लगती ऐसे ही परमार्थिक सत्ता का थोड़ा भान हो जाए तो ये सारी आज की परिस्थितियां भी बेवकूफी है मेरे रिश्तेदार हैं मेरा जवाई है मेरा दुकान
है मेरी कुर्सी है मेरी क्रेडिट है भाई तू इतना छोटा क्यों बनता है आकाश गंगा भी जिसका आगे कोई माना नहीं रखती वह अनंत ब्रह्मांड नायक परमात्मा तेरा आत्मा होकर बैठा है और तू वही है वही है यह पता नहीं चलता बेवकूफी में जी रहे हैं और बेवकूफी पैदा हुए बेवकूफी में जी रहे हैं और बेवकूफी के वातावरण में अपने को लगाए हुए तुलसीदास ने कहा मोह निशा सब सोवन हारा देख स्वपने अनेक प्रकार स्वपने में स्वपना देख रहे मैं विद्यार्थी हूं मैं कॉलेजियन हूं मैं दुला हूं अब बेटों का बाप हूं अब बहुओं का
ससुरा हूं धो तो का नाना हूं यह सब स्वपना ही देख रहे हो स्वपने बदलते जा रहे हैं मैं क्या हूं असली में वो पता ही नहीं है यह काल्पनिक प्रतिभास और व्यवहारिक कल्पना में ही जिंदगी पूरी हो गई अपने को पहचानने के लिए जो बुद्धि मिली थी समय मिला था वो इसी बेवकूफी में खत्म हो हो रहा है मंदिर में गए सीख क्या है जय शिव ओमकारा शिव पारवती प्यारा लेकिन शिव जी जो कहते उसको कब समझेगा जय जगदीश हरे ठीक है लेकिन जगदीश जो कह रहे हैं या जगदीश कहां है उसको कब जानेगा
एक दंत दयावंत चार भुजाधारी मस्तक में सिंधु सुए चूहे की सुहारी लडन का भोग लते संत करत सेवा जय गणेश जय गणेश जय गणेश जिमला मल भक्त थे और हम घर में थे ना भगवान की खोज के लिए इधर उधर तो कोई भी मंदिर में जाते एक जिमड़नहॉल [संगीत] [संगीत] लेकिन शुरू शुरू में ये करो आगे भी तो यह सब करने का उद्देश्य क्या है हम तो ये सब झंझट में ज्यादा नहीं पड़े थोड़ा बहुत किया आगे चलो आगे चलो फिर पता चला खुशी से खा खुशी से पी ना गफलत में रहो एकदम अगर है
शौक मिलने का तो हर दम लव लगाता जा न बन बम्मन न बन मुल्ला नज काशी नज मक्का न रज खोजा नमर भूखा अगर है शौक मिलने का तो हरदम लव लगाता जा परमार्थिक सत्ता में परम चैतन्य आत्मा में प्रीति करता है बाकी तो जीवन भर यही पुरानी बचपन सेही जो साधन भजन किया वही करते करते जीवन पूरा हो गया मंदिर में गए तिलक किया मंगलवार है आज हनुमान जी के यहां गए सोमवार है आज शिव जी के यहां गए लेकिन शिव जी जहां ले जाना चाहते वहां भी तो चल लाला नारायणा हरि इसीलिए कहते
हैं गुरु कृपा ही केवलम शिष्य स्य परम मंगलम हमने भी पापड़ तो ऐसे खूब बले कोई जमना मल मिल गए कोई हरगोविंद पंजाबी मिल गए कोई दूसरे जैसा करते थे भक्ति भाव करे फिर कुल गुरु मिले तो उन्होंने बताया तो वैसा भी करते थे लेकिन भूख जगती रही तड़फ बढ़ती रही खोज चलती रही जिन खो जा तन पाया गहरे पानी पैठ मैं भोरी डू बन रही डरी रही किनारे बैठ गोविंद जी के मंदिर में जाते रहो जाते रहो लेकिन आखिर क्या किसी ने मूर्ति की स्थापना की आपकी भावना से आप भगवान मानते हो लेकिन भगवान
जो कहते हैं उसको आप जानो तो भगवान कहते हैं कि इस प्रकार से सुबह दोपहर शाम को द द प्राणायाम करें धव एक महीने के अंदर उसके प्राण पर विजय हो जाती है फिर हृदय कमल उल्टा सा है मेरा जप करते हुए भावना कर के उसको सीधा करें और हृदय कमल के अष्टदल कमल की पंखुड़ियां खुली है उस पर सूर्य देव अग्नि देव चंद्रमा देव कि महान सुंदरता का चिंतन करके मुझ नारायण को वहां स्थापित कर लेकिन वहां भी रुके नहीं प्रिय धव इस प्रकार का ध्यान करने से शूद्र मेरे शरीर की धारणा करें ताकि
उसका शरीर भी सुधर हो कमल लोचन की धारणा करें भगवान की सुंदर रूप की धारणा करने का उद्देश्य क्या होता है कि धारक के चेहरे पर और धारक के शरीर पर उसका प्रभाव पड़े भगवान ऐसे हैं भगवान के नेत्र कमल है भगवान के दृढ़ बाहु है आजान बाऊ है भगवान स्मित कर रहे हैं इस प्रकार का पिता तांबर लहरा रहा है तो पीत वर्ण का चिंतन करने से मन उर्द गमी और सात्विक बनता है भगवान शांता गारम है गगन सदृश्य है तो य व्यापकता का भाव बढ़ेगा तो इस प्रकार की उपासना करते करते फिर हृदय
कमल की धारणा भी छोड़ के आकाश के तरफ की धारणा करें और आकाश में एक दृष्टि रख के स्थिति करें आकाश को टक देखते देखते शांत मना होगा तो मेरे हृदय का फिर आ जाए और फिर आकाश की धारणा भी छोड़कर मुझ चैतन्य में वास्तविक सत्ता आत्मा परमात्मा में एक हो जाए ऊंची सत्संग की बात इसलिए बता रहे हैं कि यहां जो भी आते हैं चुन चुन कर दूर दूर से छन छन कर आते हैं प्रतीक्षा करते करते बैठते हैं तो बदले में सत्संग भी एकदम पीएचडी आध्यात्मिकता की पीएचडी का सत्संग चल जाता है केजी
मिडिल क्लास माध्यमिक कॉलेज की बात कम होती है यह पीएचडी है सत्संग इसलिए सबको पले तो नहीं पढ़ा लेकिन सुनने मात्र से भी स्नातन तेन सर्व तीर्थम उसने सारे तीर्थों में स्नान करने का फल पा लिया कृतम तेन सर्व यज्ञम उसके द्वारा सारे यज्ञ संपन्न हो गए तम तेन सर्व दनम उसने सारा दान पुण कर दिया येन क्षणम मन ब्रह्म विचार स्थिर कत एक क्षण के लिए उस ब्रह्म परमात्मा त तात्विक सत्ता में मन को शांत कि तब आप शांत होकर बैठे श्वास को देखें स्वास अंदर जा रहा है तो शांति बाहर आ रहा है
तो गिनती शवास अंदर जा रहा है ओम बाहर आ रहा है गिनती थोड़े शवास गिनते जाइए y