हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ के उपलक्ष में राष्ट्रव्यापी समारोहों को मंजूरी दी है। यह आयोजन भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में इस गीत की ऐतिहासिक भूमिका और सांस्कृतिक विरासत को सम्मानित करने का अवसर है। वंदे मातरम की रचना बंकिम चंद्र चटर्जी ने संस्कृत में की है और यह 1882 में उनके उपन्यास आनंद मठ में पहली बार प्रकाशित हुआ। 1896 ईस्वी में रवंद्र नाथ टैगोर ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में इसका पहला प्रमुख प्रदर्शन किया। उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष में यह गीत स्वतंत्रता सेनानियों की प्रेरणा का नारा बन गया।
भारत का राष्ट्रगान जनगणन है। लेकिन संविधान सभा ने वंदे मातरम को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया। संविधान ने 24 जनवरी 1950 को राष्ट्रगान जन गण मन और राष्ट्रगीत वंदे मातरम दोनों को अपनाया था। उस दिन संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की थी कि राष्ट्रगीत वंदे मातरम को राष्ट्रीय गान के समान ही सम्मान दिया जाना चाहिए। हालांकि राष्ट्रगीत को गाना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है। यह भारत के बहुलवादी समाज में इसके भावनात्मक और ऐतिहासिक महत्व को दर्शाता है। यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक रहा है जो मातृभूमि के प्रति श्रद्धा और
सांस्कृतिक एकता को व्यक्त करता है। केवल इसके पहले दो छंदों का सार्वजनिक गायन होता है। 150 वी वर्षगांठ के अवसर पर देशव्यापी कार्यक्रम, शैक्षिक पहल और सार्वजनिक स्मरण उत्सव भी आयोजन किए जाएंगे जो स्वतंत्रता संग्राम में वंदे मातरम की भूमिका और इसके सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करेंगे।