ओम श्री सदगुरु परमात्मने नमः श्री सुखदेव जी कहते हैं परीक्षित सतरा ने श्री कृष्ण को झूठा कलंक लगाया था फिर उस अपराध का मार्जन करने के लिए उसने स्वयं सेमंत मणि सहित अपनी कन्या सत्य भामा भगवान श्री कृष्ण को सौंप द राजा परीक्षित ने पूछा भगवन सतरा ने भगवान श्री कृष्ण का क्या अपराध किया था उसे सेमंत मणि कहां से मिली और उसने अपनी कन्या उन्हें क्यों दी श्री सुखदेव जी ने कहा परीक्षित सतत भगवान सूर्य का बहुत बड़ा भक्त था वे उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उसके बहुत बड़े मित्र बन गए थे सूर्य भगवान
ही प्रसन्न होकर बड़े प्रेम से उसे से मं तक मणि दी थी सतराजनी को गले में धारण कर ऐसे चमकने लगा मानो स्वयं सूर्य ही हो परीक्षित जब सतराजनी ना सके दूर से ही उसे देखकर लोगों की आंखें उसके तेज से धिया गई लोगों ने समझा कि कदाचित स्वयं भगवान सूर्य आ रहे हैं उन लोगों ने भगवान के पास आकर उन्हे इस बात की सूचना दी उस समय भगवान श्री कृष्ण चौरस खेल रहे थे लोगों ने कहा शंख चक्र गदाधारी नारायण कमल नयन दामोदर यदुवंश शिरोमणि गोविंद आपको नमस्कार है जगदीश देखिए अपनी चमक किरणों से
लोगों के नेत्रों को चधि हुएं प्रच रश्मी भगवान सूर्य आपका दर्शन करने आ रहे हैं प्रभु सभी श्रेष्ठ देवता त्रिलोक में आपकी प्राप्ति का मार्ग ढूंढते रहते हैं किंतु उसे पाते नहीं आज आपके यदुवंश में छिपा हुआ जानकर स्वयं सूर्यनारायण आपका दर्शन करने आ रहे हैं श्री सुखदेव जी ने कहा परीक्षित अनजान पुरुषों की यह बात सुनकर कमल नैन भगवान श्री कृष्ण हंसने लगे उन्होंने कहा अरे यह सूर्यदेव नहीं है यह तो सतत है जो मणि के कारण इतना चमक रहा है इसके बाद सतत अपने समृद्ध घर में चला आया घर पर उसके शुभ आ
मन के उपलक्ष में मंगल उत्सव मनाया जा रहा था उसने ब्राह्मणों के द्वारा सेमंत मणि एक देव मंदिर में स्थापित करा दी परीक्षित वह मणि प्रतिदिन आठ भार सोना दिया करते थे और जहां वह पूजित होकर रहती थी वह दुर्भिक्ष महामारी गृह पीड़ा सर्प भय मानसिक और शारीरिक व्यथा तथा माया वियों का उपद्रव आदि भी कोई भी अशुभ नहीं होता था एक बार भगवान श्री कृष्ण ने प्रसंग वश कहा सराजित तुम अपनी मणि राजा उग्रसेन को दे दो परंतु वह इतना अर्थ लोल लोभी था कि भगवान की आज्ञा का उल्लंघन होगा इसका कुछ भी विचार
न करके उसे अस्वीकार कर दिया एक दिन सतत के भाई प्रसेन ने उस परम प्रकाशम मणि को अपने गले में धारण कर लिया और फिर वह घोड़े पर सवार होकर शिकार खेलने वन में चला गया वहां एक सिंह ने घोड़े सहित प्रसेन को मार डाला और उस मणि को छीन लिया वह अभी पर्वत की गुफा में प्रवेश कर ही रहा था कि मणि के लिए ऋषिराज जामवाल ने उसे मार डाला उन्होंने वह मणि अपनी गुफा में ले जाकर बच्चों को खेलने के लिए दे दी अपने भाई प्रसेन के न लौटने से उसके भाई सतराजनी ही
मेरे भाई को मार डाला हो क्योंकि वह मणि कले में डालकर वन में गया था सतत की यह बात सुनकर लोग आपस में काना फुसी करने लगे जब भगवान श्री कृष्ण ने सुना कि यह कलंक का टीका मेरे ही सिर पर लगाया गया है तब वे उसे धोने बहाने उ के उद्देश्य से नगर के कुछ सभ्य पुरुषों को साथ लेकर प्रसन को ढूंढने के लिए वन में गए वहां खोजते खोजते लोगों ने देखा कि घोर जंगल में सिंह ने प्रसेन और उसके घोड़े को मार डाला है जब वे लोग सिंह के पैरों का चिन्ह देखते
हुए आगे बढ़े तब उन लोगों ने यह भी देखा कि पर्वत पर एक रिच ने सिंह को भी मार डाला है भगवान श्री कृष्ण ने सब लोगों को बाहर ही बिठा दिया और अकेले ही घोर अंधकार से भरी हुई कृष राज की भयंकर गुफा में प्रवेश किया भगवान ने वहां जाकर देखा कि श्रेष्ठ मनि सेमंत को बच्चों का खिलौना बना दिया गया है वे उसे हर लेने की इच्छा से बच्चे के पास जा खड़े हुए उस गुफा में एक अपरिचित मनुष्य को देखकर बच्चे की धाय भयभीत की भाति चिल्ला उठी उसकी चिल्लाहट सुनकर परम बली
कृशराज जामवाल क्रोधित होकर वहां दौड़े आए परीक्षित जामन उस समय कुपित हो रहे थे उन्हें भगवान की महिमा उनके प्रभाव का पता न चला उन्होंने उन्हें एक साधारण मनुष्य समझ लिया और वे अपने भगवान श्री कृष्ण से युद्ध करने लगे जिस प्रकार मांस के लिए दो बाज आपस में लड़ते हैं वैसे विजय अभिलाषी भगवान श्री कृष्ण और जामन आपस में घमासान युद्ध करने लगे पहले तो उन्होंने अस्त्र शस्त्रों का प्रहार किया फिर शिओ का तत्पश्चात वे वृक्ष उखाड़ कर एक दूसरे पर फेंकने लगे अंत में उनमें बाहु युद्ध होने लगा परीक्षित वज्र प्रहार के समान
कठोर घुसो से आपस में वे 28 दिन तक बिना विश्राम किए रात दिन लड़ते रहे अंत में भगवान श्री कृष्ण के घुसो की चोट से जामवाल के शरीर की एक एक गांठ टूट फूट गई उत्साह जाता रहा शरीर पसीने से लतपंचार चकित होकर भगवान श्री कृष्ण से कहा प्रभु मैं जान गया आप ही समस्त प्राणियों के स्वामी रक्षक पुराण पुरुष भगवान विष्णु है आप ही सबके प्राण इंद्रिय बल मनोबल और शरीर बल है आप विश्व के रचियता ब्रह्मा आदि को भी बनाने वाले हैं बनाए हुए पदार्थों में भी सत्ता रूप से आप ही विराजमान काल
के जितने भी अवयव है उनके नियामक परम काल आप ही है और शरीर भेद से भिन्न भिन्न प्रीति मान अंतर आत्माओं के परम आत्मा भी आप ही है प्रभु मुझे स्मरण है आपने अपने नेत्रों में तनिक सा क्रोध का भाव लेकर तिरछी दृष्टि से समुद्र की ओर देखा था उस समय समुद्र के अंदर रहने वाले बड़े-बड़े नाग घड़ियाल और मगरमच्छ शुब हो गए थे और समुद्र ने आपको मार्ग दे दिया था तब आपने उस पर सेतु बांधकर सुंदर यश की स्थापना की तथा लंका का विध्वंस किया आपके बाणों से कट कट कर राक्षस हों के
सिर पृथ्वी पर लौट रहे थे अवश्य ही आप मेरे वे ही राम जी श्री कृष्ण के रूप रूप में आए हैं परीक्षित जब ऋषिराज जामवाल ने भगवान को पहचान लिया तब कमल नयन श्री कृष्ण ने अपने परम कल्याणकारी शीतल कर कमलो को उनके शरीर पर फेर दिया और फिर अतु की कृपा से भरकर प्रेम और गंभीर वाणी से अपने भक्त जाम पान जी से कहा ऋषिराज हम मणि के ही तुम्हारे इस गुफा में आए हैं इस मणि के द्वारा मैं अपने पर लगे झूठे कलंक को मिटाना चाहता हूं भगवान के ऐसा कहने पर जाम बान
ने बड़े आनंद से उनकी पूजा करने के लिए अपनी कन्या कुमारी जामवली को मणि के साथ उनके चरणों में अर्पित कर दिया भगवान श्री कृष्ण जिन लोगों को गुफा के बाहर छोड़ गए थे उन्होंने 12 दिन तक उनकी प्रतीक्षा की परंतु जब उन्होंने देखा कि अब तक वे गुफा से नहीं निकले तब वे अत्यंत दुखी होकर द्वारका को लौट गए वहां जब माता देवकी रुक्मिणी वसुदेव जी तथा अन्य संबंधियों और कुटुंब हों के मालूम हुआ कि श्री कृष्ण गुफा में से नहीं निकले तब उन्हें बड़ा शोक हुआ सभी द्वारका वासी अत्यंत दुखित होकर सज को
भला बुरा कहने लगे और भगवान श्री कृष्ण की प्राप्ति के लिए महामाया दुर्गा देवी की शरण में गए उनकी उपासना करने लग उनकी उपासना से दुर्गा देवी प्रसन्न हुई और उन्होंने आशीर्वाद दिया उसी समय उनके बीच में मणि और अपनी नव वधु जावती को अपने साथ सफल मनोरथ होकर श्री कृष्ण सबको प्रसन्न करते हुए प्रकट हो गए सभी द्वारका वासी भगवान श्री कृष्ण को पत्नी के साथ और गले में मणि धारण किए हुए देखकर परमानंद में मग्न हो गए मानो कोई मरकर लौट आया हो तदनंतर भगवान ने सतत को राजसभा में महाराज उग्रसेन के पास
बुलाया और जिस प्रकार मणि प्राप्त हुई थी वह सब कथा सुनाकर उन्होंने वह मणि सतत को सौप दी सतत अत्यंत लज्जित हो गया मणि तो उसने ले ली परंतु उसका मुंह नीचे की ओर लटक गया अपने अपराध पर उसे बड़ा पश्चाताप हो रहा था किसी प्रकार वह अपने घर पहुंचा उसके मन की आंखों के सामने निरंतर अपना अपराध नाचता रहा बलवान के साथ विरोध करने के कारण वह भयभीत भी हो रहा था अब वह यही सोचता रहता कि मैं अपने अपराध मार्जन कैसे करूं मुझ पर भगवान श्री कृष्ण कैसे प्रसन्न हो मैं ऐसा कौन सा
काम करूं जिससे मेरा कल्याण हो और लोग मुझे कोसे नहीं सचमुच मैं अदूर दर्शी शुद्र हू धन के लोभ से मैं बड़ी मूर्ता का काम कर बैठा अब मैं रमणि हों से रमयों में रत्नों के समान अपनी कन्या सत्य भामा और वह सेमंत मणि दोनों ही श्री कृष्ण को दे दो यह उपाय बहुत अच्छा है इसी से मेरे अपराध का मार्जन हो सकता है और कोई उपाय नहीं सतत ने अपनी विवेक बुद्धि से ऐसा निश्चय करके स्वयं ही इसके लिए उद्योग किया और अपनी कन्या तथा सेमंत मणि दोनों ही ले जाकर श्री कृष्ण को अर्पण
कर द सत्यभामा शील स्वभाव सुंदरता उदारता आदिक सद्गुणों से संपन्न थी बहुत से लोग चाहते थे कि सत्यभामा हमें मिले और उन लोगों ने उन्हें मांगा भी था परंतु अब भगवान श्री कृष्ण ने विधि पूर्वक उनका पाणी ग्रहण किया परीक्षित भगवान श्री कृष्ण ने सत से कहा हम सेमंत मणि न लेंगे आप सूर्य भगवान के भक्त है इसलिए वह आपके ही पास रहे हम तो केवल उसके फल के अर्थात उससे निकले हुए सोने के अधिकारी है वही आप हमें दे दिया करें श्री सुखदेव जी कहते हैं परीक्षित यद्यपि भगवान श्री कृष्ण को इस बात का
पता था कि लाक्षा ग्रह की आग से पांडव का बाल भी बाका नहीं हुआ है तथापि जब उन्होंने सुना कि कुंती और पांडव जल मरे तब उस समय का कुल परम पर चित व्यवहार करने के लिए वे बलराम जी के साथ हस्तिनापुर चले गए वहां जाकर भीष्म पितामह कृपाचार्य विदुर गांधारी और द्रोणाचार्य जी से मिलकर उनके साथ संवेदना सहानुभूति प्रकट की और उन लोगों से कहने लगे हाय हाय यह तो बड़े ही दुख की बात हुई भगवान श्री कृष्ण के हस्तिनापुर चले जाने से द्वारका में अक्रूर और कृत वर्मा को अवसर मिल गया उन लोगों
ने शत धनवा से आकर कहा तुम सतत से मणि क्यों नहीं छीन लेते सतत ने अपनी श्रेष्ठ कन्या सत्यभामा का विवाह हमसे करने का वचन दिया था और अब उसने ने हम लोगों का तिरस्कार करके उसे श्री कृष्ण के साथ बहा दिया है अब सतत भी अपने भाई प्रसेन की तरह ही क्यों न यम पूरी जाए शत धनवा पापी था और अब तो उसकी मृत्यु भी उसके सिर पर नाच रही थी अक्रूर और कृत वर्मा के इस प्रकार बहका पर सत धनवा उनकी बातों में आ गया और उस महाद ने लोभ वश सोए हुए सतत
को मार डाला इस समय स्त्रियां अनाथ के समान रोने चिल्लाने लगी परंतु शत धनवा ने उनकी ओर तनिक भी ध्यान ना दिया जैसे कसाई पशुओं की हत्या कर डालता है वैसे वह सतत को मारकर और मणि लेकर वहां से चंपत हो गया सत्यभामा जी को यह देखकर कि मेरे पिता मार डाले गए हैं बड़ा शौक हुआ और वे हाय पिताजी हाय पिताजी मैं मारी गई इस प्रकार पुकार पुकार कर विलाप करने लगी बीच-बीच में वे बेहोश हो जाती और होश में आने पर फिर विलाप करने लगती इसके बाद उन्होंने अपने पिता के शव को तेल
के कढ़ाई में रखवा दिया और आप हस्तिनापुर को गई उन्होंने बड़े दुख से भगवान श्री कृष्ण को अपने पिता की हत्या का वृतांत सुनाया यद्यपि इन बातों को भगवान श्री कृष्ण पहले से ही जानते थे परीक्षित सर्वशक्तिमान भगवान श्री कृष्ण और बलराम जी ने सब सुनकर मनुष्यों की से लीला करते हुए अपनी आंखों में आंसू भर लिए और विलाप करने लगे कि अहो हम लोगों पर तो यह बहुत बड़ी विपत्ति आ पड़ी इसके बाद भगवान श्री कृष्ण सत्यभामा जी और बलराम जी के साथ हस्तिनापुर से द्वारिका लौट आए और सत धनवा को मारने तथा उससे
मणि छीनने का उद्योग करने लगे जब सत धनवा को यह मालूम हुआ कि भगवान श्री कृष्ण मुझे मारने का उद्योग कर रहे हैं तब वह बहुत डर गया और अपने प्राण बचाने के लिए उसने कृत वर्मा से सहायता मांगी तब कृत वर्मा ने कहा भगवान श्री कृष्ण और बलराम जी सर्व शक्तिमान ईश्वर है मैं उनका सामना नहीं कर सकता भला ऐसा कौन है जो उनके साथ वैर बांधकर इस लोक और परलोक में सकुशल रह सके तुम जानते हो कि कंस उन्हीं से द्वेष करने के कारण राज लक्ष्मी को खो बैठा और अपने अनुया के साथ
मारा गया जरास जैसे शूरवीर को भी उनके सामने 17 बार मैदान में हारकर बिना रथ के ही अपनी राजधानी में लौट जाना पड़ा था जब कृत वर्मा ने उसे इस प्रकार टका सा जवाब दे दिया तब शत धनवा ने सहायता के लिए अक्रूर जी से प्रार्थना की उन्होंने कहा भाई ऐसा कौन है जो सर्वशक्तिमान भगवान बल पौरुष जानकर भी उनसे वैर विरोध ाने जो भगवान खेल खेल में ही इस विश्व की रचना रक्षा और संहार करते हैं तथा जो कब क्या करना चाहते हैं इस बात को माया से मोहित ब्रह्मा आदिक विश्व विधाता भी नहीं
समझ पाते जिन्होंने सात वर्ष की अवस्था में जब वे नीरे बालक थे एक हाथ से ही गिरिराज गोवर्धन को उखाड़ लिया और जैसे नन्हे नन्हे बच्चे बरसाती छतों को उखाड़कर हाथ में रख लेते हैं वैसे ही खेल खेल में सात दिनों तक उसे उठाए रखा मैं तो उन भगवान श्री कृष्ण को नमस्कार करता हूं उनके कर्म अद्भुत है वे अनंत अनादि एक रस और आत्म स्वरूप है मैं उन्हें नमस्कार करता हूं जब इस प्रकार अक्रूर जी ने भी उसे कोरा जवाब दे दिया तब धनवा ने सेमंत मणि उन्हीं के पास रख दी और आप 400
कोस लगातार चलने वाले घोड़े पर सवार होकर वहां से बड़ी फूर्ति से भागा परीक्षित भगवान श्री कृष्ण और बलराम दोनों भाई अपने उस रथ पर सवार हुए जिस पर गरुड़ चिन्ह से चिन्हित ध्वजा फहरा ही रही थी और बड़े वेग वाले घोड़े जूते हुए थे अब उन्होंने अपने शसुर सतत को मारने वाले शत धनवा का पीछा किया मिथिलापुरी के निकट एक उपवन में क्त धनवा का घोड़ा गिर पड़ा अब वह उसे छोड़कर पैदल ही भागा वह अत्यंत भयभीत हो गया था भगवान श्री कृष्ण भी क्रोध करके उसके पीछे दौड़े शत धनवा पैदल ही भाग रहा
था इसलिए भगवान ने भी पैदल ही दौड़कर अपने ण धार वाले चक्र से उसका सिर उतार लिया और उसके वस्त्रों में सेमंत मणि को ढूंढा परंतु जब वह मणि मिली नहीं तब भगवान श्री कृष्ण ने बड़े भाई बलराम जी के पास आकर कहा हमने शत धनवा को व्यर्थ ही मारा क्योंकि उसके पास स मंक मणि तो है ही नहीं बलराम जी ने कहा इसमें संदेह नहीं है कि शत धन वाने से मं तक मणि किसी ना किसी के पास रख दिया है अब तुम द्वारका जाओ और उसका पता लगाओ मैं विदेह राज से मिलना चाहता
हूं क्योंकि वे मेरे बहुत ही प्रिय मित्र है परीक्षित यह कहकर यदुवंश शिरोमणि बलराम जी मिथिला नगरी में चले गए जब मिथिला नरेश ने देखा कि पूजनीय बलराम जी महाराज पधारे हैं तब उनका हृदय आनंद से भर गया उने झटपट अपने आसन से उठकर अपने सामग्रियों से उनकी पूजा की इसके बाद भगवान बलराम जी कई वर्षों ततक मिथिलापुरी में ही रहे महात्मा जनक ने बड़े प्रेम और सम्मान से उन्हें रखा उसके बाद समय पर धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन ने बलराम जी से गदा युद्ध की शिक्षा ग्रहण किया अपने प्रिय सत्यभामा का प्रिय कार्य करके भगवान
श्री कृष्ण द्वारका लौट आए और उनको यह समाचार सुना दिया कि शत धनवा को मार डाला गया परंतु समं तक मणि उसके पास न मिली इसके बाद उसके भाई बंधुओं के साथ अपने शव शूर सत जीत की वे सब धध क्रियाएं करवाई जिनसे मृतक प्राणी का परलोक सुधरता है अक्रूर और कृतवर्मा ने शत धनवा को सतत के वध के लिए उत्तेजित किया था इसलिए जब उन्होंने सुना कि भगवान श्री कृष्ण ने शत धनवा को मार डाला है तब वे अत्यंत भयभीत होकर द्वारका से भाग खड़े हुए परीक्षित कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि अक्रूर के
द्वारका से चले जाने पर द्वारका वासियों को बहुत प्रकार के अनिष्ट और अरिष का सामना करना पड़ा दैविक और भौतिक निमि से बार-बार वहां के नागरिकों को शारीरिक और मानसिक कष्ट सहना पड़ा परंतु जो लोग ऐसा कहते हैं वे पहले कही हुई बातों को भूल जाते हैं भला यह भी कभी संभव है कि जिन भगवान श्री कृष्ण में समस्त ऋषि मुनि निवास करते हैं उनके निवास स्थान द्वारका में उनके रहते कोई उपद्रव खड़ा हो जाए उस समय नगर के बड़े बूढ़े लोगों ने कहा एक बार काशी नरेश के राज्य में वर्षा नहीं हो रही थी
सूखा पड़ गया था तब उन्होंने अपने राज्य में आए हुए अक्रूर के पिता शफल को अपनी पुत्री गांधी नहीं बहा दी तब उस प्रदेश में वर्षा हुई अक्रूर भी शव फल के ही पुत्र है और इनका प्रभाव भी वैसा ही है इसलिए जहां जहां अक्रूर रहते हैं वहां वहां खूब फरसा होती है तथा किसी प्रकार का कष्ट और महामारी आधिक उपद्रव नहीं होते परीक्षित उन लोगों की बात सुनकर भगवान ने सोचा कि इस उपद्रव का यही कारण नहीं है यह जानकर भी भगवान ने दूत भेजकर अक्रूर जी को ढूंढ पाया और आने पर उनसे बातचीत
की भगवान ने उनका खूब स्वागत सत्कार किया और मीठी मठी प्रेम की बातें कहकर उनसे संभाषण किया परीक्षित भगवान सबके चित्त का एक एक संकल्प देखते रहते हैं इसलिए उन्होंने मुस्कुराते हुए अक्रूर जी से कहा चाचा जी आप दान धर्म के पालक है हमें यह बात पहले से ही मालूम है कि सत धनवा आपके पास वह स्यमंतक मणि छोड़ गया है जो बड़ी ही प्रकाशमान और धन देने वाली आप जानते ही है कि सतत के कोई पुत्र नहीं है इसलिए उनकी लड़की के लड़के उनके नाती ही उन्हें तिलांजलि और पिंड दान करेंगे उनका रण चुकाएंगे
और जो कुछ बच रहेगा उसके उत्तर अधिकारी होंगे इस प्रकार शास्त्रीय दृष्टि से यद्यपि सेमंत मणि हमारे पुत्रों को ही मिलनी चाहिए तथापि वह मणि आप ही के पास रहे क्योंकि आप बड़े व्रत निष्ठ और पवित्र आत्मा है तथा दूसरों के लिए उस मणि को रखना अत्यंत कठिन भी है परंतु हमारे सामने एक बहुत बड़ी कठिनाई आ गई है कि हमारे बड़े भाई बलराम जी मणि के संबंध में मेरी बात का पूरा विश्वास नहीं करते इसलिए महा भाग्यवान अक्रूर जी आप वह मणि दिखाकर हमारे इष्ट मित्र बलराम जी सत्य भामा और जावती का संदेह दूर
कर दीजिए और उनके हृदय में शांति का संचार कर दीजिए हमें पता है कि उसी मणि के प्रताप से आजकल आप लगातार ही ऐसे यज्ञ करते रहते हैं जिसमें सोने की विदिया बनती है परीक्षित जब भगवान श्री कृष्ण ने इस प्रकार सांत्वना देकर उन्हें समझा बुझाया तब र जी ने वस्त्र में लपेटी हुई सूर्य के समान प्रकाशमान वहम मणि निकाली और भगवान श्री कृष्ण को दे दी भगवान श्री कृष्ण ने वह सेमंत मणि अपने जाति भाइयों को दिखाकर अपना कलंक दूर किया और उसे अपने पास रखने में समर्थ होने पर भी पुनः अक्रूर जी को
लौटा दिया सर्वशक्तिमान सर्वव्यापक भगवान श्री कृष्ण के पराक्रम से परिपूर्ण यह आख्यान समस्त पापों अपराधों और कलंक का मार्जन करने वाला तथा परम मंगलमय है जो इसे पढ़ता सुनता अथवा स्मरण करता है वह सब प्रकार की अपकीर्ति और पापों से छूटकर शांति का अनुभव करता है that's