साल था 2006 हबल स्पेस टेलीस्कोप को लॉन्च हुए 16 साल बीत चुके थे और यूनिवर्स में बिलियंस ऑफ लाइट इयर्स झांकने के बाद वैज्ञानिक यह मान चुके थे कि ब्लैक होल ही हमारे ब्रह्मांड का मोस्ट पावरफुल और डिस्ट्रक्टिव ऑब्जेक्ट है पर तभी दो वैज्ञानिक एक ऐसी थिरी लेकर आते हैं जिसने सभी को चौका के रख दिया उन्होंने यह दावा किया कि जिस ऑब्जेक्ट को हम ब्लैक होल समझकर बैठे हैं ना वो असल में ब्लैक होल है ही नहीं इनफैक्ट वो तो कुछ ऐसा है जो ब्लैक होल को भी खत्म कर सकता है और इनको नाम
दिया गया ग्रेविटेशनल कंडेंसेट्स इन शॉर्ट कहे तो ग्रेव स्टार्स अब सबसे इंटरेस्टिंग तो इनका कंपोजिशन होता है क्योंकि ये एटम न्यूट्रॉन या इलेक्ट्रॉन से नहीं बल्कि वैक्यूम से बने होते हैं लेकिन क्या ऐसा कोई ऑब्जेक्ट रियलिटी में एजिस्ट कर सकता है अगर हां तो यह कैसे पॉसिबल है और क्या ये यूनिवर्स से जुड़ी हमारी थ्योरी को पलटने वाला है वेल इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमें सबसे पहले तो यह समझ ना होगा कि आखिर ऐसा ऑब्जेक्ट बनेगा कैसे ठीक वैसे ही जैसे कि एक ब्लैक होल का जन्म होता है देखो जब भी किसी
मैसिव स्टार में सुपरनोवा एक्सप्लोजन होता है ना तो उसकी ग्रेविटी उसे कुछ ही सेकंड्स में कंप्लीट कोलैक्स करा देती है इस सडन क्लैप्स से कोर का टेंपरेचर बेहद ज्यादा बढ़ जाता है जिसका रिजल्ट होता है एक डिस्ट्रक्टिव एक्सप्लोजन जिसकी इंटेंसिटी बहुत ज्यादा होती है अब इस प्रोसेस को तो हम अपने पिछले वीडियोस में कई बार समझा चुके हैं अब अगर कंक्लूजन पर आए तो बेसिक इस एक्सप्लोजन के दो रिजल्ट्स हो सकते हैं या तो इससे एक सुपर डेंस न्यूट्रॉन स्टार बनता है या फिर ये कोलैक्स होकर सिंगुलेरिटी में समा जाता है जिसे हम ब्लैक होल
कहते हैं पर क्या होगा अगर मैं आपसे यह कहूं कि यहां पर एक थर्ड ऑप्शन भी अवेलेबल है सोच कर देखो यहां डेंसिटी इतनी ज्यादा बढ़ जाती है कि ये ब्लैक होल के लेवल को भी पार कर देती है ऐसे में नॉर्मल मैटर अपनी ओरिजिनल स्टेट को खो देंगे और एनर्जी में कन्वर्ट हो जाएंगे यानी अब हमारी कोर मैटर की नहीं बल्कि एनर्जी की बनी हुई होगी अब एक्सट्रीमली हाई डेंसिटी के कारण यह एनर्जी एक्सपेंशन शुरू कर देगी लेकिन इस एक्सपेंशन के बीच एनर्जी का सामना मैटर के उन पार्टिकल से होगा जो स्टार के क्लैप्स
होने के बाद ग्रेविटी के कारण नीचे की ओर आ रहे होंगे यानी कि एक तरफ एनर्जी के इस बबल का एक्सपेंशन हो रहा होगा और दूसरी तरफ पार्टिकल्स ग्रेविटी के इन्फ्लुएंस में नीचे आ रहे होंगे और दोनों ही अपोजिट डायरेक्शन में फोर्स लगाएंगे अब इन पोजिंग फोर्सेस के कारण इनके बीच एक शेल का फॉर्मेशन होगा जो हमारे ग्रेवा स्टार की वॉल को बनाएगा पर आखिर ये शेल एक्चुअल में किस मटेरियल का बना होगा वेल देखो इसका जवाब तो किसी को नहीं पता लेकिन जो भी होगा ना वो मोस्ट एक्सट्रीम पॉसिबल मटेरियल होगा क्योंकि वैज्ञानिकों के
अनुसार ये शेल एक एटम से भी पतली होगी पर पोजिंग फोर्सेस के कारण ये इतनी टाइट होगी कि इसे सिर्फ 1 मीटर स्ट्रेच करने के लिए पूरे सुपरनोवा की पावर लगा लगानी पड़ सकती है और इसका टेंपरेचर एब्सलूट जीरो यानी कि -273 डिग्री सेल्सियस से जस्ट 1 बिलियन सेल्सियस ज्यादा होगा ये ग्रेवा स्टार एक कॉस्मिक सोप बबल की तरह होगा जिसके शेल एक परफेक्ट ब्लैक ऑब्जेक्ट की तरह कोई भी लाइट को रिफ्लेक्ट नहीं करेगी और यही रीजन है कि अभी तक वैज्ञानिक यूनिवर्स में कोई भी ग्रेवा स्टार की खोज नहीं कर सके हैं लेकिन पावलो
मेजर और एमिल मोटोला इन दो वैज्ञानिकों के द्वारा ये ब्लैक होल थ्योरी के अल्टरनेटिव में दी गई एक ऐसी हाइपोथेसिस है जिसने वैज्ञानिकों के बीच खलबली मचाई हुई है क्योंकि इस हाइपोथेटिकल ग्रावा स्टार के अंदर कुछ ऐसा होता है जिसे सुनकर आप भी अपना सर पकड़ कर बैठ जाओगे और यह चीज है कुछ नहीं साइंटिफिक टर्म्स में बोलूं तो इसके अंदर हमें यूनिवर्स की फंडामेंटल नथिंगनेस का कांसेप्ट देखने को मिलता है अब देखो जिन पार्टिकल्स को हम जानते हैं जैसे इलेक्ट्रॉन फोटोन या क्वार्क ये इंडिविजुअली सॉलिड नहीं होते वेव पार्टिक ड्युअलिटी कांसेप्ट कहता है कि
यह पार्टिकल वेव के फॉर्म में होते हैं एक पार्टिकल वेव बिना किसी मीडियम के ट्रेवल कर सकती है और क्लासिकल फिजिक्स में एब्सेंट ऑफ मीडियम ही वैक्यूम कहलाता है पर क्वांटम फिजिक्स में यह कांसेप्ट ना पलट जाता है क्वांटम फील्ड थ्योरी के अनुसार वैक्यूम क्वांटम एनर्जी से भरा हुआ होता है जिसमें वर्चुअल पार्टिकल्स हर वक्त क्रिएट और डिस्ट्रॉय होते रहते हैं अब चलो इस कांसेप्ट को ना एक रियल वर्ल्ड एग्जांपल से समझते हैं मान लीजिए कि वैक्यूम असल में हमारे ओश है जहां वेव्स यानी कि लहरें उठती रहती हैं और शांत हो जाती हैं इस
वैक्यूम रूपी समुद्र में मछलियां दूसरे जीव और शिप्स भी इन लहरों पर सवार होकर ही आगे बढ़ते हैं जो वैक्यूम में पार्टिकल्स को रिप्रेजेंट कर रहे हैं लेकिन क्या यह पार्टिकल्स पूरे समुद्र में फैले हुए हैं वेल जी नहीं समुद्र के सामने यह कुछ भी नहीं है ठीक उसी तरह जैसे 99.99% यूनिवर्स बिल्कुल खाली है इवन एक एटम के अंदर भी 99.99% एमटी स्पेस होता है मैं और आप यह पूरा यूनिवर्स लिटरली एमटी स्पेस से ही बने हैं लेकिन दोस्त वैक्यूम का डायरेक्ट मतलब एमटी स्पेस नहीं होता जैसे समुद्र पानी का बना होता है वैसे
ही वैक्यूम भी एक फ्लूइड है जो पूरे यूनिवर्स में भरा हुआ है एक ग्रेवा स्टार की फॉर्मेशन के दौरान ग्रेविटेशनल कोलप्पलुर कर देता है कि ये अपने एक्सट्रीम लेवल तक सुपर डेंस वैक्यूम फ्लूइड बन जाता है और इसके अंदर मौजूद एनर्जी की डेंसिटी नॉर्मल वैक्यूम में मौजूद एनर्जी डेंसिटी से 10 टू द पावर 44 टाइम्स ज्यादा होती है कुछ-कुछ ब्लैक होल की तरह साउंड कर रहा है ना एक ब्लैक होल के अंदर मैटर और एनर्जी भी इसी तरह एक्सट्रीम लेवल की डेंसिटी के साथ होती है तभी तो ग्रेवा स्टार को ब्लैक होल का एविल ट्विन
भी कहा जाता है अब रीजन सिंपल है एक तरफ है इसके अंदर की इमस वैक्यूम एनर्जी जो एक्सपेंशन के लिए पूरी कोशिश कर रही है लेकिन इसे जंजीरों में बां बांधा हुआ है एक ऐसे एग्जॉटिक मैटर से बनी शेल ने जो शायद यूनिवर्स का मोस्ट एक्सट्रीम मटेरियल होगा अब अगर हम एक ब्लैक होल और ग्रेवा स्टार को कंपेयर करें तो जहां ब्लैक होल के अंदर सिंगुलेरिटी होती है वहीं ग्रेवा स्टार सुपर कंडेंस्ड वैक्यूम एनर्जी से बना होता है जिसको एक एग्जॉटिक शेल कवर करती है ब्लैक होल के अराउंड एक इनविजिबल बाउंड्री होती है जिसे हम
इवेंट होराइजन कहते हैं अब जो कोई भी मैटर लाइट या इंफॉर्मेशन इस इवेंट होराइजन को क्रॉस कर लेती है तो एक्सट्रीम ग्रेविटी की स्ट्रेंथ के कारण उसका स्पेगेट फिकेशन हो जाता है यानी वो इतना स्ट्रेच हो जाता है कि उसके टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं और वो ब्लैक होल के अंदर हमेशा के लिए समा जाता है अब हालांकि ग्रेवा स्टार में कोई इवेंट होराइजन जैसी चीज नहीं होती लेकिन जब भी कोई मैटर या लाइट इसके शेल से टकराते हैं तो वो पार्टिकल्स में स्प्लिट हो जाते हैं और ये पार्टिकल्स एनर्जी के फॉर्म में ग्रेवा स्टार के
अंदर एब्जॉर्ब हो जाती है यानी ये दोनों ही चीजें लगभग सिमिलर है पर भाई क्या ये ग्रावा स्टार नाम की पहेली सच में एजिस्ट करती है या ये सब महज हवा-हवाई बातें हैं तो देखो इसका ना कोई क्लियर आंसर तो फिलहाल हमारे पास नहीं है अब आज से अगर एक सेंचुरी पहले ही दुनिया में झांकी तो ब्लैक होल्स भी हमारे लिए ठीक ऐसे ही थे थोरेट्स थे पर असल में डिस्कवर करते-करते कई डिकेड्स लग गए और ब्लैक होल की फर्स्ट फोटो तो अभी हमने कुछ सालों पहले ही ली है पर ग्रेवा स्टार ना इस खोज
को एक लेवल और हाई पर ले जाता है क्योंकि ये ब्लैक होल से इतने ज्यादा सिमिलर होते हैं हैं कि इनमें और ब्लैक होल के ऑब्जर्वेशन में अंतर भी नहीं किया जा सकता ब्लैक होल्स और ग्रेवा स्टार्स दोनों ही मैसिव ऑब्जेक्ट्स होते हैं जो अपनी ग्रेविटेशनल फील्ड के कारण स्पेस टाइम को डिस्टोर्ट कर देते हैं ब्लैक होल का इवेंट होराइजन इनविजिबल होता है तो ग्रावा स्टार का आउटर शेल कंप्लीट डार्क होता है और दोनों अपने पास आने वाली लाइट को वापस नहीं लौटने देते यानी मिलियंस और बिलियंस ऑफ लाइट इयर्स दूर से ऑब्जर्व करने पर
तो हम इनके बीच फर्क कर ही नहीं सकते तभी तो कई वैज्ञानिक मानते हैं कि जिन ब्लैक होल्स को हमने अभी तक आइडेंटिफिकेशन तो ब्लैक होल जैसा कुछ एजिस्ट करता ही नहीं है मतलब आज तक जिन भी ऑब्जेक्ट को हमने ब्लैक होल समझकर खोजा है वो सारे के सारे ही ग्रेवा स्टार्स हो सकते हैं नाउ बिलीव मी र नॉट ये पूरी दुनिया के लिए एक शॉकिंग रियलिटी हो सकती है क्योंकि ग्रेवा स्टार्स का कांसेप्ट ब्लैक होल की एक ऐसी पहेली को सॉल्व करता है जिसने सालों से साइंटिफिक कम्युनिटी को उलझा कर रखा था और वो
पहेली है सिंगुलेरिटी जिसके एसिस्टेंसिया इक्वेशन जो आइंस्टाइन की जनरल और स्पेशल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी को फाउंडेड बनाते हुए दी गई थी ना वो भी सिंगुलेरिटी के कांसेप्ट को एक्सेप्ट नहीं करती है हॉकिंग इंफॉर्मेशन पैराडॉक्स भी सवाल उठाता है कि आखिर सिंगुलेरिटी में मैटर और इंफॉर्मेशन का क्या होता है बेसिकली सिंगुलेरिटी एक ऐसा आईडिया है जो क्लियर फिजिक्स के रूल्स को ब्रेक करता है लेकिन जस्ट ब्लैक होल्स के कांसेप्ट को रियलिस्टिक बनाए रखने के लिए हम अभी तक इसे कुछ ऐसा सोचते आ रहे हैं जो करंट ह्यूमन अंडरस्टैंडिंग से बाहर की चीज है पर ब्लैक होल
के अपोजिट ग्रेवा स्टार के आईडिया में सिंगुलेरिटी के आईडिया की कोई भी जरूरत नहीं है और ग्रावा स्टार की फॉर्मेशन से लेकर इसके एजिस्ट हैंस तक सब कुछ क्वांटम मैकेनिक्स की बाउंड्रीज के अंदर ही आता है इवन आज तक हमने ब्लैक होल से जुड़े जो भी इफेक्ट्स ऑब्जर्व किए हैं ना जैसे ग्रेविटेशनल पुल एक्रस डिस्क या फिर ग्रेविटेशनल वेव्स ये सभी ग्रेवा स्टार्स के कांसेप्ट में भी फिट बैठता है बस प्रॉब्लम यह है कि वैक्यूम क्वांटम एनर्जी एक ऐसा साइंटिफिक टर्म है जो सिंगुलेरिटी और इवेंट होराइजन की तरह पॉपुलर इज नहीं किया गया और हमारे
ग्रावा स्टार का शेल कौन से एग्जॉटिक मैटर से बना होगा इसकी खोज होना अभी बाकी है अब जरा इमेजिन करके देखो कि जिस ब्लैक होल के आईडिया को लेकर कई वैज्ञानिकों ने अपना लाइफ टाइम निकाल दिया है जो नियर फ्यूचर में शायद एक फेक कांसेप्ट साबित हो जाए पॉसिबल है कि ब्लैक होल्स का नाम बदलकर हमें ग्रावा स्टार रखना पड़ जाए और उनके स्टडी को पूरी तरह से नए सिरे से शुरू किया जाए वैसे आप इसके बारे में क्या सोचते हैं क्या ग्रावा स्टार जैसा कुछ सच में एजिस्ट कर सकता है आप अपनी राय मुझे
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भी एजिस्ट नहीं करता बल्कि उसे तो वैजा ने अपनी कमियां छुपाने के लिए बस यूं ही साइंटिफिक टर्म्स में डाल दिया था पर क्या यह वाकई में सच हो सकता है जानने के लिए इस वीडियो को जाकर देखो बहुत इंटरेस्टिंग है मैं मिलता हूं आपको नेक्स्ट एपिसोड के साथ तब तक के लिए बाय जय हिंद