बहुत समय पहले की बात है भान सिंह नाम का एक राजा हुआ करता था उसे अपने धन ऐश्वर्य पर बड़ा अभिमान था वह निहायत ही स्वार्थी और चापलूस पसंद इंसान था उस राजा की सात पुत्रियां थी सातों एक से बढ़कर एक सुंदर जहां उसकी छह पुत्रियां एक नंबर की कामचोर बद दिमाग थी वहीं उसकी सबसे छोटी पुत्री प्रेमलता बहुत ही बुद्धिमान सत्यप्रिया व न्याय पसंद लड़की थी राजा की छह पुत्रियां राजा के गलत कार्यों को भी सही बताकर उसकी खूब चापलूसी किया करती थी लेकिन उसकी सबसे छोटी पुत्री उसके किसी भी गलत व अन्यायपूर्ण कार्य
में अपनी भागीदारी देना उचित नहीं समझती थी जिसकी वजह से राजा उससे अप्रसार ने अपनी सातों पुत्रियों को अपने पास बुलाया पुत्रियों मैं तुम सबसे कुछ पूछना चाहता हूं वैसे तो मैं तुम सबका जवाब जानता हूं फिर भी तुम सबके मुंह से सुनना चाहता हूं तुम सब यह बताओ कि तुम सब किसका खाती हो सबसे पहले उसकी सबसे बड़ी पुत्री ने जवाब दिया निसंदेह पिता श्री हम आपका खाते हैं उसका जवाब सुन राजा बहुत प्रसन्न हुआ अब उसने अपनी दूसरी पुत्री की ओर देखा उसने भी कहा यह कोई पूछने वाली बात है पिताश्री यह बात
सभी जानते हैं कि हम सब आपका ही खाते हैं राजा फिर से बहुत प्रसन्न हुआ इसी तरह राजा की तीसरी चौथी पांचवी और छठी पुत्री ने भी राजा को इसी प्रकार जवाब दिया परंतु जब बारी उसके सातवी और सबसे छोटी पुत्र पुत्री की आई तो उसने अपनी बहनों की तरह जवाब ना देकर कुछ अलग जवाब दिया उसने कहा पिता श्री आप मेरे जन्मदाता हैं मैं आपका बहुत सम्मान करती हूं आपके लिए अपने प्राणों को भी दांव पर लगा सकती हूं परंतु असत्य नहीं कह सकती यह सत्य है कि आपने मुझे जन्म दिया इसमें भी संदेह
नहीं कि मैं आपकी पुत्री हूं इन सबके उपरांत भी मैं यह मानती हूं कि मैं आपका नहीं खाती इस जीवन में मैंने जो कुछ भी पाया वह अपने भाग्य का पाया इसलिए मेरा जवाब यही है कि मैं आपका नहीं अपितु अपने भाग्य का खाती हूं राजा को उससे ऐसे अप्रत्याशित उत्तर की अपेक्षा ना थी वह क्रोधित हो उठा अच्छा तो तुम मेरा नहीं खाती ठीक है मैं मान लेता हूं कि तुम अपने भाग्य का खाती हो परंतु तुम्हें यह साबित करना पड़ेगा अगले पांच वर्षों के लिए मैं तुम्हें अपनी पुत्री होने के अधिकार से विमुख
करता हूं अगर इन पांच वर्षों में तुमने यह साबित कर दिया कि तुम अब तक मेरा नहीं अपितु अपने भाग्य का खाती आ रही थी तो उसी दिन मैं अपना सारा राज्य तुम्हें सौंपकर वनवास धर्म निभाने वन को चला जाऊंगा परंतु इसी के साथ अगर तुम यह बात साबित नहीं कर पाई तो तुम दंड की अधिकारी होगी उसी क्षण राजा अपने सिपाहियों को आदेश देता है सिपाहियों प्रेमलता को अभी और इसी वक्त किसी बीहड़ स्थान पर छोड़ आओ सिपाही उसे ले जाकर एक ऐसे स्थान पर छोड़कर आ जाते हैं जहां दूर दूर दूर तक ना
कोई मानुष ना किसी मनुष्य की जाति केवल वीराना ही वीराना था उस समय प्रेमलता की उम्र केवल 14 साल थी कई दिनों तक भूखी प्यासी भटकते भटकते वह एक गांव में पहुंच जाती है जहां उसे एक कुआं दिखाई पड़ता है प्यास से उसका गला सूखा जा रहा था वह पानी पीने उस कुएं के पास जाती है कुएं के अंदर झांकती है उस कुएं में पानी तो होता है लेकिन पानी निकालने के लिए कोई बाल्टी या रस्सी नजर नहीं आती चारों तरफ निगाह दौड़ाने के बाद उसे वहीं कुछ दूरी पर एक कोठी दिखाई देती है वह
उस कोठी की तरफ जाती है लेकिन कोठी पर एक बड़ा सा ताला लगा देख निराश हो उठती है आसपास कोई दिख भी नहीं रहा था जिससे वह सहायता ले सके प्यास के मारे उसके प्राण सखते जा रहे थे कोई रास्ता ना देख वह उस ताले को बिना चाबी खोलने का प्रयत्न करने लगती है और वह यह देखकर हैरान रह जाती है कि उसके छूते ही ताला अपने आप खुल जाता है वह अंदर जाती है वहां आंगन में उसे एक रस्सी और बाल्टी दिखती है वह झट उस रस्सी और बाल्टी को उठाकर कुएं पर ले आती
है और कुएं से पानी निकालकर हाथ मुंह धोने के पश्चात अपनी प्यास बुझाती है प्यास बुझाने के बाद राजकुमारी रस्सी बाल्टी रखने उस कोठी के अंदर जाती है रस्सी बाल्टी को वहीं आंगन में रखकर वह कोठी को ध्यानपूर्वक देखने लगती है उस कोठी में कुल 21 कक्ष थे जिसमें से 20वें कक्ष का दरवा दरवाजा खुला था सिवाय एक कक्ष के वह एकएक कर प्रत्येक कक्ष में जाती है उन 21 कक्ष में से 10 कक्ष तो कीमती रत्नों और हीरे जवाहरा तों से भरे हुए थे पांच कक्ष में खाने पीने की चीजें थी दो कक्ष सुंदर
सुंदर वस्त्रों से भरे पड़े थे और बचे हुए तीन कक्ष में पलंग बिछे हुए थे सारे कक्ष देखने के बाद वह वापस खाने की सामग्री से भरे कक्ष में आती है उसे जोरों की भूख लगी होती है वह खाने वा चीजों में से थोड़ा सा गुड़ चिवड़ा लेकर खाती है फिर वह पलंग वाले कक्ष में आकर लेट जाती है थकावट की वजह से उसे ऐसी नींद आती है कि वह पूरे दो दिनों तक सोती रहती है नींद खुलते ही उसका ध्यान उस बंद कक्ष की ओर जाता है वह उस ओर जाती है लेकिन ताला लगा
देख वापस आ जाती है उसने उस कोठी को अपना भाग्य मानकर उसे अपना बसेरा बना लिया उस कोठी में रहते-रहते राजकुमारी प्रेमलता उस कोठी से अजीब सा जुड़ाव महसूस करने लगी थी अक्सर आते-जाते उसकी नजर उस ताले लगे कमरे की ओर जाती तो उस कमरे को लेकर उसकी उत्सुकता बढ़ जाती कई बार वह उस कमरे की ओर बढ़ती लेकिन फिर स्वयं को रोक लेती एक दिन उसके कदम उस कमरे की तरफ अपने आप ही बढ़ते चले गए पता नहीं क्यों उसे ऐसा लगा मानो उस कमरे में कुछ ऐसा है जो उसके आने वाले जीवन से
जुड़कर उसके भाग्य की कहानी कहने को आतुर है उसके हाथ खुद बखुदा उस ताले की ओर बढ़ते चले गए और उसका हाथ लगते ही वह ताला खुल गया अब तो उसे तनिक भी संशय ना रहा कि हो ना हो उस कमरे से जरूर उसका भाग्य जुड़ा है वह दरवाजा खोलकर अंदर जाती है तो देखती है कि उस कक्ष के बीचों बीच एक शैया सेज बिछा हुआ है जिस पर एक निष्काम शरीर पड़ा हुआ है उसके शरीर पर ढेरों सुइयां जुभो हुई हैं वह उसके समीप बैठ जाती है और मन ही मन सोचती है ऐसी अवस्था
में होते हुए भी इनके चेहरे की कोमलता लाली मा ज्यों की त्यों बनी हुई है ऐसा लगता है मानो अभी बोल पड़ेंगे इनके पहनावे और इनके चेहरे के तेज से यह कोई राजकुमार जान पड़ते हैं पता नहीं किन अवस्था में इनकी ऐसी गति बनी राजकुमारी प्रेमलता उस राजकुमार को अपना भाग्य मानकर उसके शरीर से उन सुईं को निकालने का निर्णय लेती है छ मास तक बिना दाना पानी वह निरंतर उन सुईं को निकालती रहती है जब खरी के दो सुई रह जाते हैं तो उसे शुद्ध होता है कि वह कितने मास से बिना दाना पानी
यहां बैठी है अब तो सारी सुई निकल चुकी है यह दो सुई बची है इन्हें भी मैं निकाल दूंगी इससे पहले जाऊं थोड़ा स्नान ध्यान कर कुछ खा पी लूं लेकिन इसके पहले मैं किसी को इनकी सुरक्षा में बैठा दूं पता नहीं मुझे कितनी देर लग जाए यह सोचकर वह बाहर निकलती है संयोग से उसी वक्त एक स्त्री कुएं से पानी खींच रही होती है राजकुमारी प्रेम लता उसके समीप जाती है और अनुनय विनय करके उसे कुछ देर के लिए उस शरीर के पास बैठने को राजी कर लेती है और फिर निश्चिंत होकर चली जाती
है प्रेमलता के जाते ही उस स्त्री के मन में पाप आ जाता है वह सोचने लगती है अगर मैं इस कोठी की मालकिन बन जाऊं तो मजा आ जाए इस कोठी का सारा कुछ मेरा हो जाएगा और मैं रानी बनकर राज रजू गी यह सोच उसने राजकुमार के आंखों में चुभे उन दो सुईं को निकाल दिया सुई निकलते ही राजकुमार उठकर बैठ जाता है और अपने समीप बैठे स्त्री को देखकर पूछता है हे देवी आप कौन हैं जिसने मुझे नया जीवन दान दिया वह स्त्री राजकुमार को प्रेमलता की सारी कहानी अपनी बताकर सुना देती है
राजकुमार उसका आभार व्यक्त करता है और उसे अपनी जीवन संगिनी बनाने का वादा करने के साथ ही अपनी कहानी सुनाता है राजकुमारी प्रेमलता कुछ समय पश्चात जब वापस आती है तो यह देखकर प्रसन्न होती है कि वह जिस निष्काम शरीर को उस स्त्री के देखरेख में छोड़कर गई थी वह एक हंसते खिलखिलाते स्वस्थ रूपवान नवयुवक में बदल चुका है राजकुमारी उस स्त्री का आभार व्यक्त करते हुए उसे जाने को कहती है इस पर वह स्त्री प्रेमलता से पूछती है तुम कौन हो जो मुझे जाने को कह रही हो इस बात से हैरान हो प्रेमलता उसे
कुछ समय पहले की बात याद दिलाते हुए अपने ना परिचय देती है लेकिन वह स्त्री राजकुमार के सामने उसे झूठा बताते हुए उससे उसकी बात को प्रमाणित करने का शर्त रख देती है राजकुमारी निरुत्तर हो जाती है क्योंकि उसके पास इस बात को प्रमाणित करने के साक्ष्य के रूप में वही एक स्त्री थी जो उसे झूठा बना उससे खुद प्रमाण मांग रही थी राजकुमारी उस स्त्री से ज्यादा बहस करना उचित नहीं समझती और वहां से जाने लगती है लेकिन राजकुमार उसे यह कहकर रोक लेता है कि जब तक झूठ और सच का निर्णय नहीं हो
जाता तुम इसी कोठी में रहोगी राजकुमार जो राजकुमारी को देखते ही मंत्र मुग्ध हो गया था पता नहीं क्यों राजकुमारी की बातें उसे सच्ची लग रही थी लेकिन कोई प्रमाण ना होने की वजह से वह उस स्त्री को पूरे तरीके से झूठ ला भी नहीं सकता था राजकुमार असमंजस में पड़ा हुआ था क्या करें कैसे सच और झूठ का निर्णय करें इसी कसमसा हट में वह अपनी सारी रात गुजार देता है कोई रास्ता सूझता ना देख वह राजकुमारी से अकेले में मिलकर उससे बात करने का निर्णय लेता है सुबह होते ही उसकी निगाहें राजकुमारी को
ढूंढने लगती हैं लेकिन राजकुमारी कहीं नहीं दिख रही थी वह हर उस जगह राजकुमारी को तलाशा आता है जहां वह हो सकती थी मगर वह नहीं मिलती राजकुमार बेचैन हो जाता है उसे इतने दिनों में राजकुमारी से एक आत्मिक जुड़ाव सा महसूस होने लगा था उसे यह सोचकर पश्चाताप होने लगता है कि कहीं राजकुमारी की बातों को ना मानकर उसने कोई गलती तो नहीं कर दी वह विचार कर ही रहा होता है कि उसकी नजर राजकुमारी पर पड़ती है जो कि बगीचे में फूल तोड़ने गई थी राजकुमार उसे देखते ही इस कदर प्रसन्न होता है
जैसे उसकी कोई प्रिय वस्तु खोने के बाद उसे वापस मिल गई हो वह उससे अपने मन की बात कहने जा ही रहा होता है कि वह स्त्री फिर से वहां आ जाती है और राजकुमार उसे देख चाहकर भी कुछ नहीं बोल पाता जब कभी भी राजकुमार मौका देख राजकुमारी से बात करने की कोशिश करता तो हर बार वह स्त्री बीच में आ जाती थी जिसकी वजह से वह राजकुमारी से बात करने से चूक जाता था एक दिन राजकुमार किसी काम से नगर जा रहा होता है तो राजकुमारी से वहां से कुछ लाने के लिए पूछता
है राजकुमारी यह कहकर मना कर देती है कि उसे किसी चीज की जरूरत नहीं परंतु राजकुमार के जिद्द करने पर व उसे काट की कठपुतली लाने को कह देती है राजकुमार यह सुनकर हंस देता है कठपुतली उसका क्या करेंगी आप बस आप ले आइएगा राजकुमार चला जाता है कुछ दिनों पश्चात वह वापस आने पर राजकुमारी के लिए कठपुतली लाना नहीं भूलता कठपुतली देख राजकुमारी खुश हो जाती है पहली बार राजकुमार ने उसे हंसते हुए देखा था हंसते हुए उसका रूप और निखर गया था राजकुमार उसे अपलक देखे जा रहा था और सोच रहा था कोई
इससे भी ज्यादा रूपवती होगी भला इधर वह स्त्री राजकुमारी के रूप से जलने लगी थी उसे लग रहा था कहीं इसके रूप जाल में फंसकर राजकुमार को उसकी बातों पर यकीन ना हो जाए फिर मेरा क्या होगा रानी बनने का मेरा सारा ख्वाब धरा का धरा रह जाएगा यही सोच वह उसके खिलाफ राजकुमार के कान भरने लगती है और जल्दी से जल्दी उसे वहां से निकालने की योजना बनाने लगती है इधर राजकुमारी जब भी खाली होती अपने कठपुतली से अपने दिल की बातें किया करती थी एक दिन रात्रि के पहर में राजकुमार को राजकुमारी के
कक्ष से किसी के बोलने की आवाज सुनाई पड़ती है राजकुमार हैरत में पड़ जाता है उत्सुकता में राजकुमार उस कक्ष के दरवाजे के पास कान लगाकर सुनता है तो वह राजकुमारी की आवाज होती है जो कठपुतली को अपनी और उस स्त्री की बातें बता रही होती है राजकुमार उसकी सारी बात सुन लेता है लेकिन वहां से बिना कुछ कहे और राजकुमारी को बिना कुछ जताए दरवाजे से ही वापस लौट आता है अब सच्चाई उसके सामने थी उस धूर्त स्त्री की सच्चाई जान राजकुमार को उस पर बहुत क्रोध आ रहा था बहुत सोचने विचारने के बाद
उसने उस धूर्त स्त्री को कठोर दंड देने का निर्णय लिया दूसरे दिन राजकुमार एक बहुत गहरा कुआ खुदवा आता है कुआ खुद होता देख वो स्त्री मन ही मन यह सोच खुश हो रही थी कि उसने जो सलाह राजकुमार को राजकुमारी प्रेमलता को रास्ते से हटाने के लिए दी थी वह सलाह राजकुमार अमल में ला रहा है कुआं बहुत गहरा खुद चुका था वह स्त्री प्रसन्न चित हो उस कुएं के पास आती है और कुएं में झांकते हुए उसकी गहराई मापने की कोशिश करती है इसी बीच उसे पीछे से धक्का दे दिया जाता है और
फिर उस कुए को अच्छी तरह से ढकवा दिया जाता है उस झूठी स्त्री को उसके किए की देने के पश्चात राजकुमार राजकुमारी से धूमधाम से ब्याह रचा आता है और दोनों खुशहाल जिंदगी जीने लगते हैं एक दिन राजकुमारी ने राजकुमार से उसके शरीर पर गुदे सुयो का राज जानना चाहा लेकिन राजकुमार को कुछ याद ही नहीं था सिवाय इसके कि एक स्त्री होगी जो तुम्हें इस श्राप से मुक्ति दिलाएगी और वही तुम्हारी जीवन संगिनी भी बनेगी वह श्राप मुझे क्यों और किन स्थितियों में मिला मुझे कुछ स्मरण नहीं राज कुमार का जवाब सुन राजकुमारी चुप
हो जाती है कुछ समय पश्चात राजकुमारी और राजकुमार वन बिहार पर निकलते हैं और शाम हो जाने के कारण वह रास्ता भटक जाते हैं चलते चलते उन्हें एक गुफा से कुछ प्रकाश आता दिखाई पड़ता है अंधेरा हो जाने के कारण वह रात उसी गुफा में गुजारने का निर्णय लेते हैं वैसे भी उनका रात को इस तरह खुले में रहना खतरे से खाली नहीं था वह उस गुफा के अंदर प्रवेश कर करते हैं अभी वह कुछ कदम की दूरी पर ही बड़े होंगे कि उनके कानों में एक आवाज आती है आओ रानी रूपमती और राजा विक्रम
सिंह आवाज सुन दोनों चकित हो जाते हैं [संगीत]