नारायण नारायण नारायण नारायण भूसुंडी जी बोले हे मुनीश्वर केवल एक आत्म दृष्टि सबसे श्रेष्ठ है जिसे पाने से सारे दुखों का नाश हो जाता है और परम पद प्राप्त होता है वह आत्म चिंतन सब दुखों का नाशक है वह चीर काल के तीनों ताप से तपे हुए और जन्म मरण के मार्ग में चलने से थके हुए जीवों के श्रम को दूर कर देता है चिंतन वाली दृष्टि जो है उससे जो फायदा होता और दुख मिटते हैं ऐसा त्रिभुवन का राज्य मिलने से भी दुख नहीं मिटते आत्म चिंतन वाली दृष्टि से जो सुख और शांति और
वैभव मिलता है वह प्रधानमंत्री पद तो क्या इंद्र पद तो कई प्रधानमंत्री हजारों प्रधानमंत्री पदों के भी ऐसी तैसी कर देता है इंद्र पद व इंद्र पद भी कुछ नहीं है आत्म दृष्टि जागृत करने से इंद्र पद से भी ऊंची सुख की अनुभूति होती है अंतःकरण में शास्त्र कहते यत पदम प्रेप सव दीना शक्रादय स देवता शक्र सर्व देवता अहो तत्र स्थि योगी हर्षमण मानते उस आत्म सुख की सामने ऐसे आत्म पद को पाया हुआ योग अहंकार नहीं करता इंद्र से भी ऊंचे आत्मा परमात्मा के सुख को पाया हुआ योगी सहज में जैसे सुखदेव जी
मुनि है जनक है गारगी है कबीर जी है नानक जी है हमारे गुरु जी हैं और भी जो महापुरुष हो गए य आत्म पद बहुत ऊंचा सुखद पद है सारे शोको को हरने वाला सारे दुखों का अंत करने वाला आत्म दृष्ट ही है सोचते थे कि पास हो जाएं तो सुखी हो जाएंगे शादी हो जाए तो सुखी हो जाएंगे बेटे हो जाए तो सुखी हो जाएंगे जीत जाए तो सुखी हो जाएंगे लेकिन यह सारी परिस्थितियां सुख का धोखा है सुखा भास है ये जैसे दादर की खुजली होती है ना दाद की खुजली होती है खुजलाने
से जरा आराम जैसा लगता है लेकिन और बढ़ती है ऐसे ही संसार का सुख ऐसा कोई नहीं कि जिससे फिर दुख और जिम्मेदारियां ना बढ़े बेटी की शादी करनी है कर्जा हो गया है मार्केट मंदा है फलाना जो कुछ कोशिश किया तो सुखी होने के लिए लेकिन दुख के जंजाल में ऐसे फंस गए कि अब छटपटाते और निकल नहीं पाते जैसे हाथी दलदल में गया और ं निकलता है त्य गहरा गुस्सा गया ऐसे ही है संसार में संसार का सुखी होना ऐसा ही है ऐसा कोई सुख भोग नहीं जिसके पीछे दुख भय और रोग नहीं
तो संसार का जो सुख है उसके पीछे दुख भय रोग शोक भरे और एक भय शोक दुख मिटता है नहीं मिटा के दूसरा आक तैयार हो जाता दूसरा हटाते हटाते दम घुटा ना घुटा तो तीसरा बोलता अब हमारा वारा है जीवन तो पूरा हो जाता है लेकिन जिम्मेदारियां पूरी नहीं होती क्या ख्याल है मरते समय आदमी से पूछो क्या ख्याल है उसकी सारी जिम्मेदारी आपकी पूरी हो गई सारे दुख मिट गए आप सुख सुख सुख से मर रहे हो क्या बोलेगा कोई सुख से मरता है सारा निपटा के जिम्मेदारियां निपटा के सारे दुख मिटा के
कोई सुखी होकर मरा है तो चाहे कितना भी धन मिल जाए कितनी भी सत्ता मिल जाए कितना भी वैभव मिल जाए कितने भी खुशा मत करके पद मिल जाए ना जाने कितने लोगों की खुशा मत करी तो यह जगत दृष्टि है तो जगत दृष्टि से कितना भी आप कुछ कर लो फिर भी निर्द पद नहीं पाते इसलिए आत्म दृष्टि का आश्रय लीजिए और वह आत्म दृष्टि कुछ पाने से नहीं मिलेगी कुछ बनने से नहीं मिलेगी जो मौजूद है उसकी महिमा जाने उसको समझे एक बिख मंगा था ठान लिया कि मैं सम्राट [संगीत] बनू तो सुबह
4 बजे उठकर अपनी चादर बिछा देता था गरीब को एक पैसा देते जाओ बापू जी प्रभात की बेला है सुबह होता बोले सूरज उगा है तुम्हारे जीवन का सूरज उगेगा चवन्नी दे जाओ रुपया दे जाओ आठ शाम होती दोपहर होती इस भूखे के लिए एक टाइम के रोटी के पैसे डाल जाओ नहीं तो कम से कम नाश्ते का पैसा दे दो एक फुलके का दो दो दो पैसे डालते जाओ रात होती चाय पीने के पैसे शाम होते कैसे भी क्या-क्या [संगीत] करता कहीं कोई यात्री रेलवे स्टेशन से गुजर ना जाए इसलिए वह वहीं पड़ा रहता
वहीं लेटा रता कुछ खाना पना भी वही निपटा लेता एकाएक उसकी मृत्यु हो गई समाज से भी लोगों ने देखा कि बुड्ढा मर गया उसको तो सम्राट होना था पैसे इकट्ठे कर कर के अब सम्राट होने के लिए पैसे कहीं छुपाए होंगे उसने देड़े दो चार बना के वहीं थोड़े गाड़ रखे थे लोग तो पर चिल्लर चिल्लर थी किसी में से कुछ हजार डेढ़ हज की कहीं से 500 की कहीं से 1700 की किसी को शक पड़ा कि हो सकता है कि इसने गहरा भी कुछ गाड़ा हो हालांकि इसके बख मांगी चिल्लर तो नहीं मिले
लेकिन गहरा गाड़ने से प्राचीन काल के राजा का सुवर्ण के कलश मिले हीरों से भरे हुए ओ हो सुवर्ण की देग हीरों से भरी हुई मिली जहां लेटता था खाता था पीता था और कंगा लत गई नहीं बस वही कहानी हमारी है व बख मंगे की हमारी कहानी है हे नाक तू सुख दे दे संगता हूं सुख दे दे हे आंख तू सुख दे दे हे जीभ ये तू सुख दे दे हे कान तू बाबाई का सुख दे दे सेक्स इंद्री तू संभोग का सुख दे भीख मांगते मांगते मौत की गोद में हो जाते बख
मंगा कोई सम्राट हुआ क्या राजाओं के राजा परमेश्वर और देघ की देघ जो आत्म विद्या पड़ी है उधर को गए नहीं बाहर से अंदर भीतर भर जहां बैठे हैं वहां गहरे गए नहीं बाहर वाले दे जाए तब हम सम्राट हो जाए तो बाहर से सुख मांगना और सुखी होने की कोशिश करना भीख मंगे होना है अंदर ध्यान में गहराई में जाना वो असली खजाना पाना है तो श्री कृष्ण कहते हैं कि उधव जीव ना जाने क्या-क्या उपाय करता है सुखी होने के लिए लेकिन दुख दूना दिन दूना रात चना दुख [संगीत] दूना बुढ़ापा आ जाता
है घुटने दर्द करने लग जाते हैं शरीर कृष होने लगता है कृष नहीं हुआ तभी वायु प्रकोप होने लगता है कभी कुछ कभी कुछ कभी कुछ बाल पक जाते हैं झुरियां पड़ जाती है दुकान मकान व्यवहार में विफल होने लगता है बुढ़ापे के कारण रिटायर हो जाता है फिर भी इच्छा वासना है यह पाऊ यह करूं कि नहीं जाती अंत में व एकाएक कभी ना कभी किसी निमित से मर जाता है और फिर भटकता रहता है इसलिए मरते समय इस जीव का कौन हितेश है युधिष्ठिर ने पूछा भीष्म से बोले ना मित्र इसके हितेश ना
बांधव वो दान पुण करके जगत की आसक्ति छोड़े मृत्यु के समय और श्री कृष्ण कहते हैं कि मरते समय तो प्राणी का दान ही मित्र है लेकिन जीते जी प्राणी का मित्र है सत्संग और मेरी भक्ति मेरी भक्ति और सत्संग से भक्ति से रस आएगा और सत्संग से मुझ आत्मा परमात्मा का ज्ञान प्राप्त होगा जैसे बख मंगा बाहर से मांगते मांगते सम्राट नहीं होता अगर वहीं गहरा खोदता तो सम्राट पद जैसा माल था ऐसे ही आप थोड़े गहरे जाएं रात को सोते समय ओम ओम ऐसा जप करें आपका कमरा प्रभावशाली हो जाएगा आपकी तो भाति
क्या है जिस जगह पर रहोगे वह जगह प्रभावशाली हो जाएगी आपका अनुभव होगा कि इधर घूमे उधर घूमे उधर घूमे जब इधर आते तो इस जगह के प्रभाव से आपके मन में कुछ लगता है ना बोले पुष्कर से इधर कुछ निराला है लगता है कि नहीं लगता एहसास होता है ना तो य जगह प्रभावशाली हो सकती तो आपका चित प्रभावशाली हो जाए आपका मन पावन हो जाए इसमें क्या बड़ी बात है क्योंकि यहीं से तो उठता है भगवन नाम अर्थ सहित नाम प्रसाद शंभु अविनाशी भगवन नाम प्रसाद में शिव जी अविनाशी पद को प्राप्त हुए
तक पूजे जा रहे शांत फिर उस मंत्र के अर्थ में मन को शांत जितनी देर जपो उतनी देर शांत जितनी देर जपो शांत ऐसे 10 12 मिनट करो बस देखो क्या होता है आप कर सकते हैं वही बोलता हूं मैं और आपको थोड़ा करने से ज्यादा लाभ हो वही खोजता हूं मैं और आपकी संस सार की गाड़ी चलती रहे आप बाबा जी बन जाए ऐसा भी नहीं बोलता हूं संसार की गाड़ी भी चलती रहे लेकिन गाड़ी लड़ खड़ा है नहीं और ईश्वर की मंजिल तक पहुंचे ऐसा खोजता हूं और ऐसे ही बोलता हूं मैं खाली
10 से 12 मिनट करो होठों को अगर कोई रोग है बीमारी किसी भी प्रकार की बीमारी सुबह 10 12 मिनट यह करके अपना नाथ धोकर जब बैठे तो सुबह स्वेत वर्ण का सफेद रंग का थोड़ा ध्यान करो दोपहर को लाल रंग का शाम को काले रंग का सभी रोगों की जड़े उखड़ने लगे श्वेत लाल और कृष्ण रंग का ध्यान और जब बैठे तो दांतों के मूल में जीभ को दबा के स्वासो स्वास को गिने इससे भी शरीर निरोग रहेगा मन पवित्र होगा मुका मिले तो आकाश की तरफ यं देखते रहे गुरु मंत्र जपते जपते देखते
रहे मन को रस आएगा अंदर यात्रा हो बुद्धि को तीव्र करने के लिए बुद्धि पर से जो दोष है बुद्धि छोटी होती है तो छोटी आकांक्षा करते लोग मुझे नौकरी मिल जाए मैं परिचारिका बन जाऊं भोगियों की शराबियों की भोगियों की कैसी कैसी नजर वालों की पैसेंजर की सेविका बन जाऊ छोटी बुद्धि होती तो छोटी आकांक्षा होती मैं हो जाऊं मैं फलाना हो जाऊं मैं ंगना बन जाऊं मैं ंगनी बन जाऊ अरे जयपुर में है गलता तीर्थ गलता पता है वहां कौन तप करती थी शांडी तब का मतलब है बस इसी तरीके से अपने आत्मा
में शांत होना इसी का नाम तप इससे वह बड़ी तेजस्वी हो गई प्रभावशाली हो गई शीली तो सांडली का प्रभाव देखकर गालव ऋषि और गरुड़ जी उसके आश्रम में ठहरे और सोचने लगे कि इतनी सुंदरी इतनी प्रभाव संपन्न और यहां धरती पर कोई युवराज शादी करेगा तो क्या मिलेगा इसको यह तो भगवान नारायण को वरने जैसे तो प्रस्ताव रखा कि देवी तुम चाहो तो ध्यान भजन से निवृत हो और भगवान नारायण के साथ हम तुम्हारा विवाह करा दे शाली ने कहा विवाह करूंगी फिर क्या बोले हैं लक्ष्मी की ना तुम्हारा आदर सम्मान होगा पूजी जाओगी
सुख वैभव मिलेगा बोले सुख मिलेगा तो बाहर से लोग वाहवाही करेंगे तो कान के द्वारा सुख मिलेगा ना भगवान पास में बिठाए तो उसका सुख मिलेगा तो पराश्री सुख हुआ मैं अपने आप मेंही सुखी हूं यह बात मेरे सामने नहीं रखना शादी बर्बादी हम नहीं चाहते इधर उधर की बातें गालव जी ने और गरुड़ जी ने समझाई मना कर दि अतिथि रूप से चलो रहते हैं रात को इसको बल पूर्वक उठा के ले चले वैकुंठ में लब ऋषि का भी तपो बल था और गरुड़ भी कम नहीं थे गरुड़ जब उड़ान भरते थे सामवेद की
ऋचाओं का गान निकलता था ऐसे गरुड़ बड़े भारी प्रभाव संपन्न थे तुम्हारे इस यहां के जहाजों की ऐसी तैसी गुरुत्वाकर्षण के नियम पार जहाज नहीं जा सकते लेकिन गरुड़ तो वहां भी जाए यहां भी प्रकट हो जाए गरुड़ ने और गालव ऋषि ने विचार किया कि इसको बल पूर्वक पकड़ के ले चलेंगे बोले तुम मेरे पीठ पर इनको बिठा देना तुम पकड़ रखना इनको मैं उड़ान भरू व कुट ये जयपुर के पास गलता तीर्थ की जगह की बात है पूर्व काल रात्रि हुई इनका इरादा कोई बुरा तो नहीं था भाई जबरन खुद छेड़खानी करे या
अपने वो तो नहीं था भगवान नारायण के लिए उठा के ले जाना शाली ने कहा जब मैंने सुबह मना कर दिया और फिर तुम्हारी ऐसी नियत है तो तुम क्या समझते हो ंडली ने जल उठाया और दोनों के पंखों उसके पंख और इसको दोनों को छाट दिया छाट दिया तो उनके पंख और वो गालव ऋषि गलने लग गए और ऐसी शरीर में अशांति और दुख पैदा हुआ कि बड़े थथ आने लगे पाहिमाम पाहिमाम समताम समताम लब और गरुड़ गिड़गिड़ा नहीं लगे जब वो गलने लग गए दोनों बड़ी आज आतुरता से प्रार्थना की तब शाली ने
क्षमा की ना श्राप वापस लिया वही जगह तुम्हारा गलता तीर्थ जयपुर से 12 किलोमीटर सुना है गलका गलता तीर्थ ऐसी ऐसी लड़कियों के अंदर भाइयों के अंदर ऐसी ऐसी शक्तियां छुपी लेकिन भीख मांगने की आदत ने भिखारी बना दिया यह सुख दे वह सुख दे बाहर सुख खोजते रहे अंदर जाने से वंचित रह गए सुनया सखना कोई नहीं सबके भीतर लाल मूर्ख ग्रंथि खोले नहीं कर्मी भयो कंगाल मूर्ख को तो बुद्धि नहीं सत्संग में जा ही नहीं सकता सत्संग में तो जाते लेकिन संसार के कर्मों में इतने उलझे हैं कि अंदर से कंग हो बैठे
हैं श्री कृष्ण कहते विमु नानु पसंती पश्यंति ज्ञान चक्षु सावे मुड लोक मुझ आत्मा चैतन्य वैभव को नहीं देख सकते ज्ञान के नेत्रों से देखते हैं ज्ञान मान जहा एक को नाही किसी प्रकार की मान्यता और पकड़ नहीं देखत ब्रह्म समान सु माई सारा जगत में व्याप्त मुझ परब्रह्म परमात्मा को फिर देखते हैं जानते हैं जैसे बल्ब आने का ट्यूबलाइट अनेक है फ्रिज अनेक है लेकिन उसमें विद्युत एक है ऐसे ही शरीर अनेक है मन अनेक है शरीर के मॉडल अनेक हैं आकृतियां अनेक है लेकिन उसमें सत्ता चेतना एक एक की एक है जिस चेतना
से मेरी आंख देखती उसी चैतन्य की सत्ता से तुम्हारी गाय की घोड़े की आंख देखती उस सत्ता में शांत हो जाते तो उसमें जप करते करते प्राणायाम जप ध्यान साधु संगति जो जाने सत्संग प्रभाव लोक न वेदन आन उपा तो सत्संग के द्वारा उस साधन भजन के आश्रय से जैसे पक्षी दो पंख से उड़ता है मनुष्य दो पैरों से चलता है प्रकृति की कि उत्पत्ति विलय उत्पत्ति विलय लीलाए ऐसे ही सत्संग और मेरी भक्ति से उधव यह जीव परम पद को पाता है परम सुख को पाता है सभी मनुष्यों की दो चीज की ही मांग
है शादी करने वाले चाहे कुवारे रहने वाले बाबा जी बनने वाले चाहे बच्चों को जन्म देने सभी दो चीज चाहते शांति और आनंद सब चाहते हैं ऐसा कोई नहीं जो इसके सिवा तीसरी चीज चाहे बोले महाराज मैं तो चुनाव में जीतना चाहता हूं तो अशांत होने के लिए जीतना चाहते हो क्या दुख के लिए चाहते हो क्या नहीं सुख और शांति अपने चुनाव के झंझट में नहीं पड़ना ये तो बेईमानों का काम है आजकल तो क्या चाहते हैं सुख शांति चुनाव लड़ के भी सुख शांति चाहते और चुनाव बेमानी का काम हम नहीं चाहते उससे
भी सुख शांति चाहते चोर भी सुख शांति चाहता है साहूकार भी सुख शांति चाहता है माई भी सुख शांति भाई भी सुख शांति किसी को बड़ा लड़ा के झगड़ा से के भी सुख चाहता है और केवल य पाप नहीं करेंगे सच्चाई सेज रहकर भी सुख शांति चाता तो गलत तरीकों से जो सुख शांति चाहता है वह ज्यादा दुखी होता है और सही से जो सुख शांति चाहता व देर सब सुख शांति के द्वार पहुंच जाता सुख कह दो रस कह दो रस और शांति रस और शांति कितना भी प्रिय धन हो मित्र हो कुटुंबी सबको
छोड़कर रात्रि को गहरी नींद में चले जाते शांति धंधा खूब हो गया फटाक की दुकान वा की दुकान फिर वो थक जाते गरा से लड़ते अरे बंद करया च दे होता रहता है तो आते रहेंगे छ जिस धंधे के लिए दुकान सजाई थी पैसे ब्याज पला के भी माल लाए रखे थे वह अ गिरा की ज्यादा हो गई देर हो गई तो अशांति हो गई तो दुकान बंद करना पसंद करते हो अशांति पसंद नहीं तो सुख [संगीत] शांति तो बाहर के सुख शांति टिकती नहीं और अंदर की सुख शांति जब तक नहीं मिली तुलसीदास ने
कहा निज सुख बिन मन होव कि थीरा निज आत्मा के सुख के बिना मन थिर कैसे हो निज सुख बिन मन होवई की थीरा निज के जैसे वो भीख मंगा पैसा दो पैसे से सम्राट नहीं होता निज बल से निज वैभव से सम्राट होते हैं लोग भीख मांग के कोई सम्राट होता है ऐसे विषय विकारों की भीख मांगकर कोई परम पद को परम सुख को प्राप्त नहीं होता इसलिए सत्संग में यह रास्ता बताया जाता है ऐसा साधन करो ऐसा वातावरण ऐसा हल्का आ गया है कि सुनते साईं की जय बोल देते साईं की वाहवा कर
देते साई चलो प्रोग्राम अरे प्रोग्राम प्रोग्राम ठीक है लेकिन सारे प्रोग्राम की ऐसी तैसी करके भी सा साई जो एकांत में बैठे तो कुछ तो होगा तो आप भी थोड़ा एकांत का अभ्यास करो ना उद्देश्य ईश्वर प्राप्ति हो जाए बस उद्देश्य सच्चे सुख के तरफ हो जाए उद्देश्य सच्चे सुख के तरफ हो जाए और रीत सच्चे सुख को पाने के आ जाए बस दो बात कोई समय को गवाए नहीं मूर्ख अंग्रेज बोलते हैं टाइम इज मनी अरे मूर्ख टाइम इज मनी पैसा समय धन है ओ हो समय देकर तो धन कमा सकते लेकिन धन देकर
बीता हुआ समय नहीं ला सकते टाइम इज मनी क्या है बकवास कुछ ऐसे मूर्ख लोग बोलते हैं कि भाई जैसे बड़े पेड़ के आगे छोटा पेड़ विकसित नहीं होता ऐसे बड़े आदमी के पास बड़े गुरु के पास बड़े आदमी के पास रहने से अपना विकास नहीं होगा अरे मूर्ख बड़ा पेड़ तो आसपास के रस को चूस लेता इसलिए छोटा पेड़ नहीं विकसित होता लेकिन बड़े आदमी ऐसा कौन सा रस खींच लेते जो तू भूखा मरेगा बड़े आदमी की तो बड़ी नजरिया होती है बड़ी सूझबूझ होती है और जल्दी बड़पन आता है अरे मूर्ख वो वृक्ष
है रस खींच लेता है इसलिए दूसरे बधे छोटे रह जाते इंदिरा अगर नेहरू के संपर्क नहीं करती और इंद्रा बड़े गुरु के चरणों में नहीं रहती तो इंद्रा इतनी बोल्ड नहीं हो सकती थी हम गुरु के चरणों में नहीं रहते तो इतने नहीं हो सकते थे ऐसे ही बच्चा मां-बाप और आचार्यों के बड़ों के संपर्क में नहीं रहे तो बच्चे का विकास नहीं हो सकता व जंगली रहेगा तो कैसा बकवास की परंपरा चली जाती है बस बड़े वृक्ष के आगे जैसे छोटे नहीं पनपते ऐसे बड़े लोग आदमियों के सामने अपना विकास नहीं होगा ऐसा भूत
घुस जाता है फिर लोग भटकते रहते फिर छोटे हलकट चमचे लोग जो सुना दे वो सच्चा लगे और गुरु की बात बड़े ल ऐसी ऐसी बेवकूफी की बात घुस जाती कि आदमी एक जन्म नहीं द द जन्म तक भटकते रहते यह सारी बेवकूफियां सत्संग से निकलती है इसीलिए भगवान बोलते हैं त विद्धि प्रण पाते न परिवन सेवया जो मति हीन होते हैं ना अकल नहीं होती तो वह अपना ही विनाश और दूसरे का भी विनाश करते इसीलिए करते हैं कि मूरख हृदय न चेत यद्यपि गुरु मिले बरं चम ब्रह्मा जी जैसे गुरु मिल जाए लेकिन
हल्की बुद्धि वाला उससे फायदा नहीं उठाता एक व्यक्ति ने तपस्या की तपस्या की तपस्या तपस्या की और ब्रह्मा जी खुश हो गए ब्रह्मांड ने कहा वरदान मांग लीजिए बोले प्रभु मैंने बहुत दुख बो बोले अब क्या चाहता है बोले बो मैं जो चाहूं मेरे को मिल जाए ऐसा कुछ अक्षय पात्र बोले अच्छा बेटा ये ले अक्षय पात्र तू उससे मांगेगा तेरे को मिलेगा उससे दुगना पड़ोसियों को भी मिलेगा तेरे कारण पड़ोसी भी सुखी रहेंगे वो भगत ले तो आया मेरे को एक मकान हो जाए तो पड़ी स की दो दो मकान मेरे घर गाय हो
जाए पड़ोसी को दो दो गाय तो उसकी औरत तो जेल स वाली थी तो देखा कि तो अपने तो फिर भी गरीब रहे य सब इतने डबल हो गए कि अपने तो सिंगल ही सिंगल लगते बोले हे अक्षय पात्र हमारे घर के आगे एक एक कुआ एक कुआ खुद जाए तो पड़ोसी के घर के आगे दो दो कुए ुद गए बोले मेरी एक आंख फूट जाए अब तो पड़ोसी की दो आंख फूटना है लेकिन विधाता इस नियम को अक्ष पात्र दृश्य हो गया पड़ोसी की तो दो आंखें रही वो कानी हो गई नारायणा हरि नारायण
ऐसे हमारी मां कहानी सुनाती थी डहरी हो डहरी च डहरी जन तो उसको उसके हाथ में आ गई तलवार मा वीर बहादुर अपने घर में बड़े मौज से ऊपर के कमरे में बैठ तो उसके घर बकरी थी बकरी के जो बच्चा होता है उसने मठ में मुंह डाल दिया मुंह डाल दिया तो बकरी ने मुंह डाल दिया मठ के दे मीटी के तो तुम तो उधर चले गए तलवार मिली और मेरा तो यह बकरी नहीं अरे बोले मैं हम है तो क्या गम है व आया धड़क से तलवार से बकरी का गर्दन काट दी बकरी
अलग और मटका मटका अलग बोले यह तो अलग तो हुआ लेकिन मुंडी तो अंदर रह गया बोले मुंडी अभी निकाल देता हूं मटका फोड़ दिया मटका फड़ दिया बोले ये भी ले अरे बकरी भी मार दी और वो गड़ा भी फोड़ दिया ऐसे मूर्ख लोगों को महापुरुष या गुरु संत मिल जाए ना तो कुछ नहीं अपना काला मुह कर लेते अच्छे बुद्धिमान को मिलते तो ऊंचा उठ जाते और मूर्खों को संत मिल जाए तो अपना काला मुह कर लेते जैसे मूर्ख को तलवार मिल गई ना क्या किया बकरी भी काट दी गड़ा भी फोड़ दिया
मूर्ख हृदय न चेत यद्यपि गुरु मिले बरं च से तो ऐसे अपन मूर्ख बनते हैं तो मनुष्य जीवन मिला है आयुष्य भी खत्म और पुण्य भी खत्म और मकान दुकान बनाया छोड़ के मर जाते अपन लोग मेरा आश्रम मेरा मठ लेकिन साथ में थोड़ी चलेगा आश्रम मठ मकान घर मैं यह बनू मैं वो बनू मैं वो बनू मैं वो बनू अरे जो है उसको जान ले बेटा काम बन जाए मन तू ज्योति स्वरूप अपना मूल पिछा आखिर कब तक यह रहेगा शरीर कब तक रहेगा पत्नी कब तक पति कब तक मकान कब तक यह सब
कब तक रहेगा नित पिंजरो छन प लोकन मा लडन प दाद क दरवेश जोगड़ा छड पिंजरे शरीर रूपी पिंजरा है इसमें कब तक प्रीति करेगा भैया शास्त्र कहते अनि त्यानी शरी रानी शरीर अनित्य है वैभव नहीं शाश्वत वैभव शाश्वत नहीं है नित्य सहीतो मृत्यु रोज मौत के नजी जा रहे कर्तव्य धर्म संग्रह धर्म के धन का संग [संगीत] करिए धर्म के खजाने को पाइए यह मिल जाए वह मिल जाए वह मिल जाए भीख मंगा मत बनिए अपने अत आत्मा में ईश्वर में आईए सच्चाई से परहित के काम करिए सेवा करिए जप करिए जिसके जीवन में
परहित नहीं है उसका लौकिक विकास भी नहीं हो सकता अलौकिक विकास का तो नाम ही मत परहित सरिस धर्म नहीं भाई परहित से जो दूसरों के दुख हारने में नहीं लगता उसके दुख नहीं हार सकते दूसरे के दुख हारी बने तो अपने दुख हरी हार लेंगे जो अपने सुख के लिए प्रयत्न करता है वह जीवन संग्राम में विफल हो जाएगा जो अपनी वाहवाही के लिए अपनी सुख सुविधा के लिए प्रयत्न करता है या निर्णय करता है या सोचता है वह विफल होके ही रहेगा अपना स्वार्थ छोड़ दे पर हित के लिए लगे तो सफल होके
ही रहेगा क्योंकि आप पर हित जितना हित देंगे बाहर उतना अनंत गुना हित लौट के आता है जितना लड़ाई झगड़ा ये वो कपट अपने तरफ सुख को मत खींचो दूसरों के तरफ सुख को भलाई को स्वास्थ्य को भेजो किसान जैसा जी बीज खेत में फेंकता है ऐसे ही उसके पास आता है ऐसे ही जितना भी आप संसार समाज की तरफ देते उतने अनंत गुना होके आपके प्रारब्ध में आता भीष्म जी ने कहा कि इस जीव को इस जगत में अपने किए का फल अवश्य मिलता है पुण्य का फल सुख अवश्य मिलता है पाप का फल
दुख अवश्य मिलता है मिश्रित का फल मिश्रित होता है उसको भुगतना ही पड़ता है इसलिए जीव को सावधान होकर सत्कर्म में लगे रहना चाहिए पुण्य कर्म अर्जित करना अत्यंत अनिवार्य [संगीत] है जो भी चराचर में यह जीव दिख रहे हैं इधर उधर वो सब अपने अपने कर्मों से सुरक्षित जब तक उनके कर्म जीने के तुम कितने भी कुछ करो तो नहीं मरेगा जब मरने के तो तुम्हारे सब कि कराए चौपट हो जाएंगे वो मर जाएगा चाहे भाई हो चाहे बेटा हो चाहे दादा हो चाहे दादी हो चाहे नाना हो अपने अपने कर्मों से वह जी
जीवित है सुरक्षित है चाहे पुण्य कर्म हो चाहे पाप कर्म हो बेटे का भाई का पत्नी का पति का सब अपने अपने कर्मों से ही जी रहे आप नहीं चाहते तभी भी आपका बेटा बेटी भाई भतीजा दुख भोग रहे हैं वह नहीं चाहते तभी भी आपको दुख भोगना पड़ता है आप यह नहीं सोचना कि मेरे पति के कारण में दुखी हूं बेटे के कारण दुखी हूं कोई किसी को दुख नहीं दे सकता अपनी बेवकूफी के सिवाय कोई किसी को दुख दे नहीं सकता को काह को नहीं सुख दुख करि दाता निज कृत कर्म भोगते ब्रता
अपने कर्मों का फल भोगते अरे बोले मेरी पत्नी ने ऐसा कर दिया महाराज तभी मैं दुखी हो गया मैं पाय माल हो गया तो तेरे कर्मों से ही तेरी पत्नी की बुद्धि ऐसी हुई मेरे पति ने ऐसा कर दिया मैं धर धर की ठोकर खा रही हूं तो तेरे कर्मों से ही पति के द्वारा ऐसा हुआ अभी भी तू सोच विचार को बदल दे कि पति के द्वारा या पत्नी के द्वारा गड़बड़ हुई तो यह संसार गड़बड़ वाला है जहां गड़बड़ नहीं उस हरि ओम में आ जाओ तो कोई गड़बड़ कोई पुण्य पाप का प्रभाव
ना पड़े ऐसी जगह पर अभी तुम आ सकते जो मानता है मेरे को इसने दुखी दुख दिया है मूर्ख जिसने सुख दिया है चलो अभिवादन कर दो लेकिन आपके शुभ अशुभ कर्म ही उसमें निमित है आपकी सूझबूझ ही उसमें निमित है दुख में आपकी बेवकूफ निमित और सुख में आपकी सूज और पुण्य निमित दुख में आपका पाप और बेवकूफी निमित इसीलिए अपना पाप और बेवकूफी मिटाना ही कर्तव्य है सुख में पुण्य और सूझबूझ निमित है दुख में पाप और बेवकूफी निमिता है वशिष्ठ बोले हे राम जी जिन पुरुषों ने संतों के संग रूपी औषध से
इन रोगों की चिकित्सा की है वेही मुक्त रूप हुए हैं और जिन्होंने वह औषध नहीं की वे पुरुष चाहे पंडित हो तो भी दुख पाते हैं वह औसत क्या है शम दम और सत्संग इन साधनों के यत्न से जिसने आत्म पद सम माना मन को एक जगह लगाने का अभ्यास करें भगवान की मूर्ति गुरु की मूर्ति एक टक देखते रहे शम दम आदि साधनों से अपने मन को ईश्वर के सुख में लगावे