[संगीत] अरुण सिंह जी राधे े राधे राधे महाराज जी महाराज जी जब सांसारिक जीवन में सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा हो तो पूर्ण समर्पण कैसे किया जाए तब तो और अच्छा से समर्पण किया जा सता है क्योंकि दुख में कुछ मांग होती है अच्छाई की सुख की मांग होती है और जब सुख की सब सामग्रियां है तब तो भगवान की कृपा हमारे चारों तरफ खेल रहे हमें भगवान कितना दुलार कर रहे हैं हमें पूर्ण भगवान की शरण में होने के लिए तो पर अहंकार और ममता यह होने नहीं देते यह होता विपत्ति में है
संपत्ति ऐश्वर्य सुख में शरणागति हो गए तो बनी रहेगी अगर भगवान का स्मरण चल रहा है नहीं सुख सुविधाओं के भोगता मन को भगवान की शरणागति नहीं होती भोगेश्वर प्रसताव आत्मिका बुद्धि समाध न विधि यते जिसको भोग और ऐश्वर्य में सुख मिल रहा है उसका चित्त अपरत हो चुका है वह भगवान की शरण में होने के लिए पर यदि सत्संग मिल जाए तो बिना विपत के भी भगवान की शरण में जाया जा सकता है क्योंकि विवेक के द्वारा हम असत वस्तुओं को महत्व हटा दे तो हमारे हृदय में भगवान के प्रति महत्व आ जाए पर
जब तक असत वस्तुओं का महत्व रहेगा तब तक भगवान का महत्व नहीं रहेगा जैसे खीर पूड़ी कचौड़ी पकोड़ी यह वो अब देखो मातो आया अब भूल गए भगवान को और प्रसाद पाया फि अरे यार इतनी देर भगवान को भूले रहे एक भोजन ने भगवान को हल्का कर दिया और मत्व ज्यादा अपना डाल दिया कोई व्यक्ति कोई वस्तु कोई स्थान कोई भोग सामग्री जो भगवान को भुलवा दे वो भगवान को हल्का कर दिया हमारे हृदय में महत्व और अपना महत्व अधिक कर दिया तो अगर असत भोगों का महत्व तो भगवान का भी स्मरण हो जाएगा और
अगर पूरा सत भोगों का मत्व तो भगवान का स्मरण नहीं होगा गांव गली में चलते फिरते वाला राम राम भैया वो भले हो जाता हो लेकिन किसी को य कि भग प्राप्ति करनी है भजन कर यह सब ले कमाओ खाओ लड़का बच्चा ब्या बस इतना ही रहता है यह तो कोई विवेकी सत्संगी जन के हृदय में आता है कि आज भगवत प्राप्ति के लिए मनुष्य शरीर मिला है साधन धाम मोक्ष कर द्वारा पाई न ज परलोक संभरा सो परत दुख पावई सिर धुनि धुनि पछताए काले कर्म ईश्वर मिथ्या दोष लगाए फिर वो बड़ा पछताता है
जो मनुष्य शरीर को प्राप्त करके भगवत प्राप्ति नहीं करता तो दो प्रकार हैं एक है विवेक के द्वारा संसार के असत भावना मिथ्या भावना और भगवान में सत्य बुद्धि विवेक के द्वारा व चाहे चक्रवर्ती सम्राट हो अमृत जी चक्रवर्ती सम्राट है ना कोई भोगा आकर्षण नहीं साव मना कृष्ण पदार विंदे क्योंकि विवेक और एक विपत्ति विपत्ति ऐसी घेर ले कि कोई हमारा मित्र और सहयोगी ना मिले तो फिर एक ही बात आती है हे भगवान जैसे द्रोपदी जी पहले पांच पतियों का भरोसा सबका भरोसा जब देखा कि कोई नहीं तो अपना भरोसा जब अपना भी
भरोसा गया तब हे गोविंद हैना आई ना शरणागति गजेंद्र हे गोविंद हे हरि तब पुकारा जब सब हाथी थिनिया भाग गए अपना भी बल जाता रहा और ग्राह जलचर जीव उ से घसीट लाया अब देखा कि मैं मरने वाला हूं तो अंतिम फाइनल हे हरि तो विपत्ति के द्वारा शरणागति या विवेक के द्वारा शरणागति दो में ही गति तो सुख संपत्ति है और विवेक जागृत कर लो तो उसका महत्व खत्म हो जाए देखो ज्ञान बुद्धि से तो बात अलग लेकिन हम व्यवहार बुद्धि से कहते हैं जैसे तुमको किसी देश में भेजा जाए और वहा आपको
सब सुविधा मिले स्त्री पुत्र परिवार खानपान मकान सब व्यवस्था लेकिन आपको भारत आने पर आपके वस्त्र भी उतरा लिए जाए वहां से ऐसे देश में कमाना पसंद करोगे रहना पसंद करोगे नहीं ना अगर पूरी डिटेल बता दीजिए जो चाहो आपको सब मिलेगा मेहनत करो सब मिलेगा लेकिन जब आप वापस अपने देश को आओगे तो आपका कपड़ा भी उतरा लिया जाएगा ऐसे देश में हो आप इसका नाम मृत्युलोक है यह कपड़ा तक उतरा लिया जाएगा उतरा लिया जाएगा क्या ले जाओगे यसे रहना पसंद कर रहे हो ना ये जब यह बात तुम्हारी सम में आ जाएगी
कि मुझे यहां से जाना है और इस देश के जितने मित्र बने पत्नी पुत्र परिवार रिश्ते नाते यार एक भी साथ नहीं जाएगा यह कपड़ा भी उतरा लिया जाएगा देह रूपी कपड़ा भी उतरा लिया जाएगा एक सिक्का नहीं जाएगा चाहे जितना बैंक बैलेंस कि हो चाहे जितना बढ़िया मकान हो एक मिनट नहीं रह पाओगे जिस दिन ऑर्डर आएगा ना ट्रांसफर मिनट भर नहीं कि कोई अटैची तैयार करना है मिनट भर भी नहीं सेकंड भी नहीं ऐसे नहीं कर सकते जही ट्रांसफर तो कटिंग सब खत्म ए भैया उस दिन की सोचो उड़ जाएगा हंस अकेला ये
दो दिन का जीवन मेला उस दिन के सोचो जिस दिन तुम्हारे साथ कोई नहीं होगा और तुम्हारी कमाई सब यही रह जाएगी फिर जहां जाना है उस लोक में जो खर्चा करना है वो दाम है ही नहीं तुम्हारे पास वो है भगवान नाम कबीरा सब जग निर्धना धनवंता नहीं कोई धनवंता सोही जानिए जाके राम नाम धन एक कमाई है यहां की भगवन नाम जप लो चाहे जिस लोक में चले जाओ यह वो सरकारी सिक्का है हर जगह काम करेगा और मृत्यु लोक का पैसा काम नहीं करेगा ऊपर के लोग को य यही तक है तो
यहां के पैसे का क्या महत्व है या यहां के शरीर का क्या महत्व यहां के रिश्ते नाते का क्या महत्व कभी भी छूट सकते हैं तो सबको प्यार करो पर असलियत में सब में भगवान है यह जानकर प्यार करो भगवान ही को तो प्यार करते हैं सब सच्ची कहते हैं सब भगवान को प्यार करते हैं पर वो जानकर नहीं करते जैसे बहुत सुंदर पुत्र है लेकिन भगवान अंतरध्यान हो गए तो उस शरीर को जला दोगे ना तो सुंदर पुत्र से थोड़ी प्यार कर रहे थे उस सुंदर से प्यार कर रहे थे जो उसके अंदर था
पर उसको जानते नहीं हो पर प्यार उसी को कर रहे थे जैसे उससे पूछो कि शरीर को क्यों जलाओ ग तुम्हारा पुत्र है बोले नहीं जो था वो तो चला गया तो उसको कभी जाना नहीं अनजाने से प्यार कर रहे थे और जो जान कर के तो वो सामने तुम्हारे उसको जला दिया गया इसका मतलब सबको अंदर से देखो वो सबको भगवान ही प्यारे लगते हैं पर अनजाने में उनसे अनजाने में प्यार कर रहा है उनका नाम नहीं जप रहा उनको मान नहीं रहा कि पुत्र में भगवान पत्नी में भगवान तो हमें लगता है विवेक
जागृत हो जाए तो काम बन जाए या ऐसी भगवान परिस्थिति दे दे परिस्थिति भी ऐसी आती है कि अब जब कुछ नहीं कोई नहीं तब आता है हे भगवान आप हो आप ही सहारे हो तो परिस्थिति के लिए तो मांग करो मत बड़ी भयावह होती है बड़ी भयावह हमने देखा है परिस्थिति को अपने जीवन में परिस्थिति को देखा है ऐसे पानी रखा है कोई देने वाला नहीं शरीर किडनी रोग से ग्रसित हम उठाकर पी नहीं सकते प्यास लगी उठा के पी नहीं सकते बस ज्ञान दे दे विपत्ति तो बहुत बहुत ही कड़वी है मतलब व
बहुत ही कड़वी है विपत्ति वोह शरणागति देती है जो विवेक वान जो शुद्ध ज्ञानी है उसी को शरणागति में दूसरा उपाय नहीं है विपत्ति में जब कोई नहीं होता ना तब रोना आता है और रो के जब भगवान को पुकारा जाता है तो इससे भगवान की बहुत जल्दी प्राप्ति हो कबीरा हसना छोड़ दे रोने से कर प्रीति बिन रोए किन पाइया प्रेम प्यारा में सच्ची कहते हैं कोई नहीं कोई नहीं ना रिश्ता ना परिवार ना संसार अब आपको झूठे प्रेम में माया फसाए इसलिए आपको लगता है हमारे बहुत कुछ है बहुत कोई है कोई नहीं
प्यारे जिस दिन तुम सड़ने लगोगे किसी के काम लायक नहीं रहोगे उस समय तुम्हें कोई प्यार करे तो हमें बताना काम लायक हो इसलिए सब प्यार कर रहे हैं भोगेश्वर प्रसताव यह भगवान की केवल कृपा और विवेक से हो सकता है नहीं तो वह विपत्ति दे दे तो भगवान के विपत्ति मत मांगना विपत्ति बहुत ऐसी है कि बहुत छाती मजबूत होए तो भगवान की तरफ नहीं अ श्रद्धा हो जाएगी भगवान से कहो विवेक दे दे मुझे ज्ञान दे दो और संसार से वैराग्य करके वैराग्य का मतलब कहीं भागना नहीं है वैराग का मतलब है जहां
जहां हमारा मन जाता है वहां वो निसार देखने लगे यार कुछ इसमें नहीं सत्य वस्तु तो भगवान है इसी को वैराग्य कहते हैं ऊपर के कपड़ा बदल ले और रुपया कमाने में लगे तो वैरागी थोड़ी हो जाएंगे उद्देश्य बदल जाए हमारा भेष बदले ना बदले देश बदले ना बदले उद्देश्य बदल जाए तो भगवत प्राप्ति हो जाएगी अंदर का उद्देश्य बदल जाए वो चाहे तो मच्छर को ब्रह्मा बना दे ब्रह्मा को मच्छर बना दे बस उस भगवान का भरोसा कर ले तो सब बात है नहीं तो ब्रह्मा को मच्छर बना दे और ब्रह्मा कौन बड़ी पदवी
देखो सबसे बड़ी पदवी मच्छर बना दे मच्छर को ब्रह्मा बना दे इसलिए भगवान का आश्रय ले लो किसी व्यक्ति का आश्रय मत रखो वही सुंदर जीवन वपन करवाते हैं वही वही सच्चे मित्र है और यहां तो भैया हम आपसे सच्ची कह रहे जिस दिन तुम्हें ज्ञान होगा उस दिन तुम्हें पता चलेगा कि धोखे में जीवन कट गया पूरा अमूल्य जीवन भगवान का भजन ना किया तो धोखे में हमारी प्रार्थना मान लो 24 घंटे में 24 मिनट ही राधा राधा हमारे लिए कर लो कि बाबा ने कहा है राधा राधा तुम्हारा मंगल हो जाएगा 24 घंटा
में 24 मिनट हमारी आज्ञा का पालन कर लो राधा राधा राधा राधा राधा जैसे डॉक्टर दवा देता है ना ऐसे तुम मान लो तुम्हारा मंगल हो जाएगा नहीं यहां का कुछ साथ जाने वाला नहीं और कोई मित्र नहीं कोई मित्र नहीं पक्का समझ लेना हम अपने अनुभव की कहते हैं और बहुत देखा है पक्का समझ लो अगर अपने लोग को भगवान विवेक दे दे तो अब भी हम अपना जीवन संभाल सकते हैं कि हम सब में भगवान को देखकर खूब प्यार करें और भगवान का नाम जप करें मयंक अग्निहोत्री जी कानपुर से महाराज जी आपके
चरणों में छत छत नमन मराज जी पिछले छ महीने से आपसे एकांतिक में भक्ति मार्ग पर बढ़ने की और शराब छोड़ने की आकांक्षा करी थी आपने मुझसे सामर्थ्य मिलने और आपकी दोस्ती पक्की रखने की बात कही थी महाराज जी मैं बता नहीं सकता कि मुझे कितना सामर्थ्य मिला आपने कृपा की महाराज जी महाराज जी मेरा एक प्रश्न है कि महाराज जी क्या इस मन की मतलब बेसिक प्रवृत्ति ही गंदी है या कलयुग का प्रभाव नहीं हमारे कई जन्मों का अभ्यास मन रूपी चिप एक यह चिप है अलौकिक चिप है इसमें सब जमा होता जाता है
जैसे सीसी कैमरे में है ना कुछ करना नहीं है वह सब लेता जाता है एक महीने तक दो महीने जितना आपके पास तो यह भागवत िप है जब तक भगवान की प्राप्ति नहीं होगी और जब से सृष्टि हुई तब से अब तक की हर सीन इसमें मौजूद है इसीलिए जैसे ज्ञान प्राप्त होता है तो पीछे क्या हुआ आगे क्या हुआ सब इसमें भरा हुआ है वह सब आगे क्या होगा सब दिखाई दे देगा एक अलौकिक चिप है जिसको लिखते हैं चित्रगुप्त जी चित्रगुप्त का नाम सुना है हां वो इस मन में मन रूपी चिप में
कोई किताब नहीं रखी वो मन रूपी चिप में लिखते हैं अब हमको पूरा चिप डिलीट करना है तो जैसे 5000 बार एक आदमी ने आपको मैसेज किया हो और एक एक बार डिलीट करना हो तो 5000 बार उसी का मैसेज तो आपको लगेगा डिलीट हो रहा है कि नहीं हो रहा है हमें तो लगता है डिलीट ही नहीं हो रहा क्योंकि वही बार-बार तो जैसे काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर इनकी गंदी लीलाएं बहुत जन्म जन्म में सब हुई है हमसे वो सब मन में भरी हुई हैं अब जब हम भजन में बैठते हैं तो
वही सब निकल रहे हैं तो डिलीट हो रहे हैं अब उनको पकड़ो मत जो गंदी बात मन में आ रही भजन करते हुए वो जा रहे हैं बस यह अनुभव करो साक्षी रहो उसमें लिप्त मत हो तो खत्म हो जाएंगे यह मन में है कलयुग का प्रभाव जैसे आप कोई दृश्य देख रहे हैं उस समय आपके मन की जो दशा हो रही वह प्रभाव है जसे मोबाइल में या बाहर अच्छा या बुरा उसको हम प्रभाव मानते हैं लेकिन हम चुपचाप बैठे हैं एकांत में उस समय जो चल रहा है वो हमारी पर्सनल रील है जो
चल रही है उसको पूरा डिलीट करना है अब इसीलिए पूरा प्रयास रहता है वर्षों प्रयास किया जाता है तोब कहीं जाकर के कुछ सफलता मिलती जैसे जैसे मन हल्का होता जाएगा निर्विक होता वैसे वैसे आनंद आने और पूरा डिलीट हुआ कि भगवान का साक्षात्कार हो गया क्योंकि मन ही भगवान हो जाता है इंद्रिया नाम मन्या स्म गीता में भगवान कहते इंद्रियों में मैं मन हूं वैसे भी एक गीत में साधारण में सुना था तोरा मन दर्पण कहलाए भले बुरे सारे कर्मों को देखे और दिखाए ते तोरा मन दर्पण कर मन ही मंदिर मन ही देवता
मन से बड़ा ना कोई ऐसा ना और जो मन को अपने वश में कर ले भगवदाज़्जुकाम भा दुरात्मा हो गया यह चिप है इसको हटानी पड़ेगी इसको डिलीट करने का एक ही उपाय राधा राधा राधा राधा जितना नाम जप करोगे उतना ही खाली होता है भगवान कहते हैं ना निर्मल मन जन सोमोई पावा तो मन को निर्मल कैसे किया जाए यह सत्संग सुनो नाम जप करो परोपकार करो कोई पापा आचरण ना करो तो पूर्व की जो गंदगी वो सब साफ होती चली जाएगी समझ पा रहे हैं आप कलयुग का हम प्रगट में दृश्य ऐसे मान
सकते हैं कि जैसे हम कोई गंदी बात देख रहे हैं कोई गंदा तो हमें देखने से बड़ा परेशानी हो रही तो वह वर्तमान का है लेकिन हम आख मधे बैठे हैं एकांत में अब जो परेशानी हो रही उसमें कोई युग धर्म क्या करेगा वह तो हमारे अंदर की चीफ है समझ रहे हर युग में सब कुछ होता था आप ऐसा नहीं कह सकते कि जो इस युग में होता वह किसी युग में नहीं होता था अब इस युग में महात्माओं को खा तो नहीं रहा कोई और त्रेता युग में खाक हड्डियों का डेर लगा दिया
था रामचरित्र मारस में पढ़ के देखो भगवान पूछते हैं हड्डियों डेर किसका बोले प्रभु अनजान हो कर के पूछ रहे हो सर्वज्ञ हो आप तो अनजान बन के पूछ रहे होय ऋषियों की हड्डियां है भैया महात्माओं को कोई खातो ले रहा कलयुग में हर युग में आप ये समझो कलयुग में भी सतयुग है जैसे आप भगवान का नाम कीर्तन कर रहे हो कथा वार्ता कर रहे हो मान लो यहां बैठे हो अब हमें बताओ क्या कलयुग है है ना तो अगर हम सात्विक विचार अच्छा वातावरण तो कलयुग नहीं है ऐसे हर युग का प्रभाव है
आप देखो यहां सतोगुण सतयुग मिलेगा भगवान की चर्चा भगवान का की आप अभी हाल में जब ठाकुर जी विराजमान पद कीर्तन हो रहा गायन हो रहा है तो अब हम सराब के ठेके में गए बार में गए अब उनमें घोर कलयुग आपको मिलेगा व कहीं सतोगुण रजोगुण घोर तमोगुण रजोगुण की अधिकता मिलेगी नहीं मिलेगी अब वहां आप सोचो कि शांति सुख आनंद तो वहां हर्ष मिलेगा विषय भोगों की कामना बढ़ेगी और अशांति जलन तृष्णा ये बढ़ेगा तो कलयुग के पास हम जाएंगे तो कलयुग है नहीं तो आप बताओ कहां कलयुग है अगर हम अभी गंदी
बात करने लगे गंदी चेष्टा करने कलयुग हो गया तो क्या यह पहले नहीं होता था क्या पहले भी होता था तो हम आज भी सतयुग में है यदि अच्छे आचरण करें अच्छा चिंतन करें भगवत भाव में रहे तो सतयुग में अगर गंदे भाव में रहेंगे तो कलयुग में क्या गंदे लोग पहले युगों में नहीं थे क्या तभी तो भगवान अवतार लेकर उनको मारने के लिए आए जब इतने बड़े गंदे थे कि और किसी से संभल ही नहीं सकते थे तो भगवान फिर उनको जी मनोज कुमार शर्मा जी मथुरा से महाराज जी आपके चरणों में कोटि
कोटि प्रणाम मराज जी वर्तमान में देश में अनेका अनेक संत जन गुरुजन अपने ढंग से धर्म का प्रचार ई देव की प्राप्ति का जनजागरण कर रहे हैं महाराज जी किंतु मुझे आपका दृष्टिकोण और समझाने का प्रयास अधिक सरल व्यापक लगा महाराज जी महाराज जी इनका एक प्रश्न है ये आजकल बार-बार आ रहा है मैं उसका समाधान अनेक ढंग से हो जाए इसलिए कह रहे हैं महाराज जी इनका प्रश्न है कि भगवत प्राप्ति के लिए या धर्म कर्म के लिए मंदिर या आश्रम में जाना आवश्यक है क्या घर पर शुद्ध मन से नाम जप करते हुए
परिवार के प्रति अपना उत्तरदायित्व सही से निर्वाहन करते हुए बिल्कुल करेक्ट बिल्कुल करेक्ट बिल्कुल करेक्ट जो आपने कहा वो बिल्कुल करेक्ट है भाग भाग करके तुम थक जाओ कहीं भगवान मिले तो मुझे बता देना जब मिलेंगे तो यहां मिलेंगे अब यहां वाले भगवान तक पहुंचने के लिए हमें जो पवित्रता चाहिए उसके लिए हम गंगा स्नान करते हैं उसके लिए हम धाम आते हैं कि हमारे दर्शन में हमारे भाव आज हमने बिहारी जी के दर्शन किए आज राधा वल्लभ जी के दर्शन के आज संत समागम तो हमारा चिंतन बदला अब जब आपका चिंतन बदलने लगा जैसे
नाम जप है तो बिना भगवत भक्तों के संग के ना नाम जप की प्रेरणा मिलती है और ना नाम जप में रुचि होती है और ना नाम जप की सिद्धि होती है क्योंकि नाम जब करना कठिन करके बचाना कठिन और बचा के पचा कठिन भजन न होई संग बिनु और भजन बिना नहीं प्रेम खास बात भजन है पर भजन होगा कैसे जब हम सत्संग करेंगे जब हम तीर्था वगन करेंगे जब हम भगवत दर्शन के लिए जाएंगे तो एकएक कदम हमारा सत मार्ग में चलने लगा हमारे शरीर से बहुत से अपराध हुए बहुत असत क्रियाएं हुई
तो जब सत क्रियाएं होंगी तो असत क्रिया नष्ट होंगी तो हृदय हमारा निर्मल होगा तो भगवान में हमारी प्रीति होने मिलेंगे भगवान आखिरी वाली बात से चाहे जहां हो अपने कर्तव्य का पालन करते नाम जप करो निश्चित भगवान मिल जाएंगे पर नाम जप करना कितना कठिन है अगर अभ्यास नहीं तो आप देख लो खुद एक घंटे केवल एक घंटे केवल राधा नाम पर मन एकाग्र करके जप के देखो आप एक घंटे एकाग्र होकर कोई भी करना एक घंटे बस राधा नाम से आंतरिक दृष्टि नाटे राधा राधा राधा राधा फिर हमें बताना कैसा आनंद आने लगा
अगर कहीं 10 पाच घंटे भजन होने लगा तो फिर किसी की कृपा की जरूरत नहीं अपने आप देखोगे आनंद का उल्लास होने और भजन ना करो देखो यह मंडन किया अब हम कह रहे भजन ना करो और सब जगह घूम आओ तो एक अहंकार हो जाएगा कि मु जगह होया लेकिन आत्म शांति नहीं मिलेगी क्योंकि बाहर यह सब कुछ हुआ अंदर तो जैसे सांप बांबी के अंदर बैठा है और लाठी ऊपर से चला रहे हो बांबी के ऊपर छेद के ऊपर सांप का कुछ बिगड़ेगा क्या तो र अंधकार बैठा हुआ है अज्ञान रूपी सर्प उसको
मारो अंदर वाला मार दिया गया तो बा अब अंदर वो तब मरेगा जब पहले उसका ठिकाना पता चले और फिर उसका अस्त्र हो कि वो अंदर जाकर उसको मिटाए तो ठिकाना हृदय देश में ही है भगवान भी है और अज्ञान भी वही है अब हृदय का अज्ञान नष्ट करने के लिए गुरु जी के चरणों का आश्रय लेकर जब साधन में लगते हैं तब पता चल जाता है जा मरा ज्ञान तो फिर आप ब्रह्म स्वरूप हो ब्रह्मविद ब्रह्म भवत जो ब्रह्म को जान लेता है ब्रह्मम हो जाता है तो वास्तविक बात ये है कि हमें बाहर
से अंदर आना है पर बाहर से गंदे आचरण के इसलिए थोड़ा पवित्र आचरण करके और जहां मन एकाग्र थोड़ा पवित्र हुआ तो अंतर्म मुख हुआ बात अंतर्मुखी है बहिर्मुखी है अंतर्मुखी बननी ये बात हम आपकी 100% सपोर्ट करते हैं कि अपने कर्तव्य का पालन करते हुए भगवान का नाम जप कर रहा है उसे भगवत प्राप्ति निश्चित हो जाएगी वोह कहीं जाए ना जाए कुछ करे ना करे पक्की बात नाम जप करते हुए अपने कर्तव्य का पालन करने के लिए भगवान आदेश करें मामनु स्मर युद्ध चर युद्ध रूपी खतरनाक काम सामने से गर्दन उड़ाना अपनी गर्दन
बचाना और मेरा स्मरण करना भगवान कहते इसी से सब कुछ हो जाएगा कर्तव्य का पालन और भगवन नाम जप यह दो बहुत ज्यादा जोर की बात है और ये हजारों बार सत्संग में बोले हैं हजारों बार बोले हैं एकांतिक में भी और सत्संग में भी बिल्कुल कहीं जाने की आवश्यकता नहीं नहीं है व जहां चरण रख देगा वहां तीर्थ हो जाएगा जिसके भगवत चिंतन चल रहा है तीर्थ कुर्वंति तीर्था भगवान का भक्त जहां चरण रख देता वहां तीर्थ हो जाता है क्योंकि हर समय भगवान का पावन चिंतन कर रहा है अहो सु पच तो गरिया
यवग वर्तते नाम तुभयम अहो वो चांडाल भी श्रेष्ठ है जो जिसका अभ पदार्थ भोजन होता है वो चांडाल भी श्रेष्ठ है जिसकी जिव्या पर भगवान का नाम विराजमान है अहो ब पतो गरि यान जिग वर्तते नाम तु्य अगर भगवान का नाम नहीं चल रहा है सब बाहरी बातें तो हम यह देखा है आपको सच्ची बता दे धर्म फिर अर्थ फिर काम फिर मोक्ष चार पुरुषार्थ रखे गए धर्म पहले है और जहां धर्म है वहां अर्थ पीछे है और जहां अर्थ आगे है वहां धर्म नहीं है आज अर्थ आगे है आप देख लीजिए अर्थ आगे है
धर्म पीछे कर दिया गया है धर्म आगे होता है अर्थ उसके पीछे चलता है जो भगवान के आश्रित है जो धर्म में चलता है शास्त्र कहते हैं जैसे नदियां बिना चाह के समुद्र में अपने आप जाती है ऐसे भोग सामग्रियां ईश्वर उसके चरणों में लुटता है जो भगवान और भगवान के बनाए हुए धर्म मर्यादा से चलता है धर्म आगे तो अर्थ पीछे अर्थ आगे तो धर्म गायब बड़ा समस्या है बस हम इतनी प्रार्थना करते हैं कि जहां आपको शास्त्र सम्मत बात सुनने को मिले वो बात पकड़ो परमार्थ में चल दो किसी के पीछे लगने की
जरूरत नहीं है किसी भगवान आपके साथ है गुरु आपके हृदय में बैठे हुए हैं वोह आपको एक एक कदम संभाल के चलते जाएंगे पीछे पढ़ने की जरूरत नहीं आज पीछे पढ़ने में पता नहीं चल सकता कि हम गलत मार्ग में जा रहे हैं कि सही मार्ग में जा रहे हैं उसके लिए हमें भजन चाहिए बुद्धि पवित्र चाहिए और तस्मा शास्त्रम प्रमाणम ते कार्या कार्य व्यवस्थित हो शास्त्र के अनुसार कार्य की व्यवस्था हो बहुत धज्जिया उड़ाई जा रहे हैं शास्त्र के जो सत मार्ग है उनको गुप्त किया जा रहा है क्योंकि सत मार्ग से जो हमें
लाभ मिलेगा भगवता अंद होगा भगवता अंद चाहिए नहीं वियान चाहिए तो फिर सत मार्ग को गुप्त करके अपनी बात रखी जाती है जीन्ने एक कविता लिखी थी नेवी में तो मतलब प्रभु त है जो ओम में जो मेरे रोम रोम में अस्तित्व में विलोम में पधार मेरे स्म में है भय भी तू है आस तू अदृश्य तू प्रकाश तू निकट है पर आभास तू तू शीर है कैलाश तू प्रभु तू है जो नीर में जो है धरा में है शरीर में एकांत में तू भीड़ में कल्पित है तू तस्वीर में ऊष्म है तू शीत में
तू ताल है संगीत में तू प्रेम मेरे मीत में भविष्य तू अतीत में प्रभु तू मेरे ध्यान में है समस्त ज्ञान में है वन में तू उद्यान में तू लौ में है तू प्राण में तू मां में है पिता में है है गर्भ में चिता में है चिंता में में है चिंतन में है तू मेरे अंतर मन में है तू ब्रह्म है संसार है तुझसे समस्त सार है तू विष्णु है अवतार है तू शिव प्रलय अकार है तू शून्य है निर्विकार है तू मैं है मेरा प्रकार है तू धर्म है तू कर्म है मेरे प्राण
तुझ में बसते तेरे मन में मैं मेरे मन में तू परमात्मा नमस्ते वासुदेवा सर्वम की पूरी व्याख्या है वासुदेवा सर्वम सब कुछ वही है बिल्कुल बहुत सुंदर एक पर बहुत अच्छा लगा आप सैनिक हो कर के हा देश सेवा और भगवत आराधना में भी ऐसी तत्परता खूब नाम जप करते रहिएगा अब पारस पए बाबा जी क्योंकि हम यहां पर देखिए साढ़े प आ ग थे जितने मत शिष्य गण है ना उनसे मतलब उनसे बातचीत का व्यवहार हुआ इतनी सज्जनता इतनी शीलता कोई हद नहीं देखिए बातचीत से पता चलता है कि संस्कार कैसे है तो आपके
य शिष्य इतने संस्कार भरे कोई इसीलिए आप पारस मण सबको पारस कर दिया है आपने और जो मतलब जनता सुन रही है मतलब य पर या किसी भी माध्यम से लोगों में परिवर्तन आ रहा है कृपा है महाराज जी आप बिल्कुल भगवान की कृपा है उन्हीं की कृपा से हम ये सबके अंदर जो है वो भगवान ही ऐसी दैन्य दे रहे हैं नहीं सब नौजवान हैं और सब संसार से पढ़े लिखे आए हुए हैं संसार का रंग छूटना बड़ा कठिन होता है पर इन लोगों ने हमें सहयोग दिया ये हमारे कथन अनुसार चल रहे हैं
तो भगवान इनमें रंग भी ला रहे हैं जो आप लोग प्रमाणित कर रहे हैं यही है रंग जब दूसरे प्रमाणित करें हम मान लो हम सही हैं कि गलत यह तो भगवान जाने लेकिन जब आपके हृदय में आवे कि ये सही है तब बात समझ में आती है बस सबका आशीर्वाद लगा रहे कि इनकी बुद्धि खराब ना हो ये ऐसे ही समाज सेवा भगवत सेवा में लगे रहे धन्यवाद धन्य धन्यवाद मेरे नाथ आप की जय संदीप कुमार पांडे जी राधे राधे म श्री ह मराज प्रश्न में थोड़ी त्रुटि है म जी नाम जप और भजन
बढ़ाने से क्या आत्मज्ञान हो सकता है क्योंकि मन में एक डर सा होता है इसको लेकर कि कहीं आत्म ज्ञान से कोई पाप ना हो जाए आत्म ज्ञान से पाप सत और असत्य का ज्ञान कहीं त्रुटी ना हो जाए कि जो अंदर से भाव प्रकट होता है उसम से कहीं कुछ असत्य ना हो असत्य का निर्णय ना लेले हा बिल्कुल बात ठीक है बच्चा ये सावधान रखना चाहिए पर हम सावधानी ज्यादा ना रखकर चिंतन करें अनन्य चिंत तो माम ध्यान देना ये जना पर पासत तेशाम नित्या युक्ता नाम योगक्षेमं वामम प्रभु कह रहे हैं तुम
डरो मत तुम भय मत करो तुम निश्चिंत होकर मेरा चिंतन करो तुम्हारे योग क्षेम का आवान मैं करूंगा अप्राप्य की प्राप्ति कराना योग और जो है जो साधन है जो भजन है उसकी रक्षा करना छेम भगवान कह रहे मैं तुम्हारी प्राप्त वस्तुओं की रक्षा करना और जो प्राप्ति करनी है वह प्राप्ति कराना दोनों जिम्मेवारी मेरी है तुम केवल नाम जप करो करो सदा तिन के रखवारी जिम बालक राखे मतारी अगर सच्ची शरणागति है तो भगवान ऐसे संभालते हैं जैसे मां अपने बच्चे को बच्चा तो कुछ भी कर सकता है कुछ भी खा सकता है पर
मां की दृष्टि रहती अनजान है अज्ञानी कहीं गलत ना कर दे तो जिम्मेवारी हम भगवान को दे देते हैं और शरणागत होकर भय रहित होकर खूब भजन करते हैं यह चिंता मत करो नाम जप सच्चा ज्ञान प्रकट कर देगा नाम जप आत्म बोध आप समझो बच्चा राम राम कहना नहीं आता था मरा मरा क के तीसरी बार में शुद्ध नाम आ जाता है मरा मरा मा आ रामा राम ब्रह्म ज्ञानी महापुरुष हुए भगवान के पावन चरित्र को लिख दिया संस्कृत से जिनको राम कहना नहीं आता था तो आत्मज्ञान इनसे बड़ा कोई आत्मज्ञानी होगा बहुत बड़े
ब्रह्म बध संपन्न महापुरुष हुए ब्रह्मर्षि कह गए इसलिए नाम जप में तो संशय ना करो पता नहीं ब्रह्म ज्ञान होगा कि नहीं होगा सब हो जाएगा ठीक है और डरो मत बस इतना है कि जो गलत जानते हो उधर जाओ मत जब आप जाने भी लगोगे तो भगवान बचाएंगे भगवान क्षमा करेंगे तुम्हारा विश्वास दृढ़ होना चाहिए ठीक है ज्ञानी प्रसाद शर्मा जी सुमिता शर्मा जी राधे राधे गुरुदेव बैठ विराज बैठ जा प्रभु आप महाराज जी आपकी कृपा से वृंदावन का वास मिला गुरुदेव भगवान वृंदावन वास होने के बाद भी यह मन परिवार मोह से युक्त
होकर कभी-कभी यहां से जाने के लिए विचलित करता है सुन भरत भावी प्रबल बिलख क मुनि नाथ हानि जीवन मरण यह बात समझो अगर लिखा है गांव में मरना तो तुम्हें घसीटे अगर तुमने हिम्मत कर ली कि अब नहीं तो कट जाएगा प्रारब्ध और यहां पर शरीर छूटेगा भगवान की प्राप्ति हो जाएगी भगवान के धाम में मरना बहुत मंगलमय होता है ज रेन पर मरीब मंगल आए देखो अब आपका शरीर भी जाएगा प्रभु परिवार तो छूट ही जाएगा शरीर भी जाएगा अब अंतिम समय मोह ज्यादा सताता है हमें लगता है कि थोड़ा करे बन जाओ
मजबूत बनो समझ में आ रहा हमारी बात सुना महाराज जी कह रहे थोड़े मजबूत बनो महाराज आपकी शरण में आ गए हा अब हा अब बाहर जाने की कोशिश मत करो अंतिम समय है 85 साल और 80 साल उम्र है लेकिन हमें लगता है कि थोड़ा कड़क पर जाए आसपास के लोग भी कड़क पर जाए जैसे वृद्ध शरीर है तो फिर ऐसे जबरदस्ती भी करना चाहिए नहीं धाम में रुको नहीं जाना कहीं नहीं जाना और आपका ही नहीं अभी एक भगत आए थे उनकी मां नहीं एकदम वयोवृद्ध है और वो बिल्कुल सीन यही थी वह
भी यही कह थी मुझे गांव भ ये धाम है यहां मरना बहुत कठिन है बहुत कठिन है इस न पर मरना जो आपने उनके पिताजी को उपदेश दिया था वो पांच सात दिन बाद ही उनके पिताजी का शरीर छूट गया हां कहा था कि तुरंत लाओ उनको लाओ लाए और शरीर उनका मराज जी पूरी उम्र भजन नहीं हुआ और अभी भजन की वृत्ति नहीं है तो क्या वृंदावन वास मात्र से कल्याण बिल्कुल बिल्कुल कल्याण बिल्कुल कल्याण पारसमणि ये कसाई के घर का गड़ासा है कि पंडित जी के पूजा के ग्रह का लोहा ये नहीं देखता
पारस गुण अवगुण नहीं चितवन करत खरो समझ रहे हो ना पारस का अपना प्रभाव है तो वृंदावन प्रभाव सुन अपनो ही गुण देत जैसे बालक मलिन को मात गोद भर लेत जे रेण पर मरीबो मंगला महाराज जी उसमें अंतिम समय में जो अभी प्रश्न हुआ था उसमें उच्चारण मात्र का भी भगवत नाम भी अगर उच्चारित नहीं अब यहां ना चिंतन ना उच्चारण हां यह धाम है य अपने प्रभाव से मंगल करता है जिस समय अंतिम समय आता है तो यहां की देवी है अधिष्ठात्री वृंदा सखी तत्काल उसके कान में राधा नाम और उसको परम पद
की प्राप्ति है कोई खिलवाड़ थोड़ी है मराज ये तो सस्ता शोदा है महाराज हां तो आके कोई आ जाए हाथ हो जाए पूरा जीवन वृंदावन वास करे देख रहे हो ना बूढ़े बाबा अपने अनुभव कह रहे हैं कि मन घसीट है हमको परिवार की तरफ अरे समझ रहे हो लड़ भीड़ करके भाग जाते हैं यहां से भगवान के धाम भगवान के नाम में ऐसे थोड़ी है बड़ा मतलब बड़ा भाग्यशाली होता है जो वृंदावन धाम में परम पावन धाम में भगवान का आश्रय लेकर शरीर छोड़े अंतिम में भैया यह तो जन्म जन्म की बिगड़ी बन जाए
बाजी है बाजी छूट गई छूट गई बा खंड खंड होए जाए तन अंग अंग सत टूक वृंदावन नहीं छाड़ छाड़ बड़ी चूक लेकिन बहुत पाए रतन चीन नहीं दिन करते डार ये माया श्री कृष्ण की मोह सब संसार ऐसा लगता है कि जो गांव गली के लोग हैं आप समझते हो एक वृद्ध को हमने जब व ऐसे भरभरा गए भरभरा गांव के लोग ज ऐसे बात करते हैं मिलते वो सुख कहां वृंदावन में कौन कि हाट के मरीज है हा हार्ट के मरीज है कभी भी फेल हो सकता है इसलिए खूब खूब भजन की तत
खराब है हां नहीं नहीं खूब नाम जप करो बुढ़ापा है मत जाओ नाती यही प रहता है हां बढ़िया है अरे कोई ना होता है तो श्री जी सब व्यवस्था करते हमने देखा है भैया जिनके वृद्ध शरीरों की सेवा में कोई नहीं रहता उनकी सेवा में भगवान लगा देते हैं हमने देखा है हम खुद किए हैं जिनकी सेवा में कोई नहीं चार संत मिलकर ड्यूटी बांध करके जाते थे ऐसे हाथ में सोच कर आते थे और उनकी सब सेवा जीवन भर भज भजन किए थे वो हमें लगता है है कठिन बात अगर हठ नहीं है
तो प्रारब्ध ले जाएगा ये हमने खुला देखा है खूब हर सुविधा देक देखा नहीं भैया वो सुविधा नहीं गांव में वो भैंस के पास लेटना अच्छा लगता है वो चार लोग आके तबाकू बला के खवाए वो अच्छा लगता है प्रपंच अच्छा लगता है ये भ भगवत दम में कोई बोलने वाला तो है नहीं राधा राधा जपो अपने अपनी कुटिया में बले रोते हैं अच्छा नहीं लगता अरे बहुत मोह का ऐसे थोड़ी है मोह बहुत मोह महान है जो पूरे जगत को बांधे हुए जी सब अपनी टक्कर के है काम क्रोध मोह लोभ छह शत्रु रखे
गए काम क्रोध लोभ मोह कबड्डी का खेल है यह कबड्डी का खेल एक तरफ भगवान की भक्ति के लिए है और एक तरफ ये माया के पार्षद है आना पड़ेगा माया के पार्षदों के बीच में वो आएंगे हमारे भी पाले में तो जैसे कबड्डी में होता है कि उधर जाओगे तो सब लद बैठेंगे तुम्हें पाले तक आना होगा सांस ना टूटने पावे तो यहां है राधा राधा राधा राधा नाम ना छूटने पावे और चाहे जहां चले जाओ और काम क्रोध लोभ तुम्हें दबाए फसना मत उनके चुंगल से अपने पाले में आओ नाम ना छूटने जैसे
कबड्डी कबड्डी कबड्डी नहीं राधा राधा राधा राधा राधा अंदर चलता रहे और फिर माया के कार्यों में जाओ हानि नहीं होगी ये कबड्डी का खेल है और अगर नाम छूट गया पाले तक नहीं आ पाए तो दबा लेंगे पांच छह है बड़े जोर के है और फिर फिर आउट भा हां बिल्कुल यहां राधा राधा राधा राधा प्राण तजो बन ना तजो कहो बात को लाख लाख प्रकार समझाओ मैं प्राण छोड़ सकता हूं वृंदावन नहीं तो बात बन जाए अपने लोग मनाते हैं कि हे भगवान कभी ऐसा कोई लीला ना हो जाए नहीं हम तो श्री
जी से यही मनाते कभी ऐसा ना हो सबको यही कहते हैं चाहे जितना कष्ट हो यही अंगज स्न लगवा हो यही दवा दे हमको बाहर मत ले जाओ हमारा जीवन वृंदावन ना जाने कौन से घड़ी में मृत्यु हो जाए धाम अच्छा जिनको धाम मिल गया है वो धाम क्यों छोड़े जिनको नहीं मिला है वो नाम को ना छोड़े तो 10 गति हो जाए ये चार है नाम रूप लीला धाम कोई एक पकड़ लो नाम पकड़ लो तो वहीं आ जाओगे धाम पकड़ लो तो वही आ जाओगे रूप ध्यान में तो वही आ जाओगे लीला गायन
चिंतन में तो वही आ जाओगे लीला चिंतन में तो ये चार है नाम रूप लीला धाम ह जीहा छूटने पे कल्याण होता है महाराज जी या फिर सेवा में जाते सेवा की बात तो हम नहीं कह रहे कल्याण की बात कह रहे हैं सेवा में तो वही जाएगा जो जीते जी भाव देह को प्राप्त हो गया है ऐसा थोड़ी है सेवा में श्री जी की पहुंचना तुम खिलवाड़ समझते हो मोक्ष कल्याण मंगल सब है सायुज साम प सूप सब मोक्ष है लेकिन श्री जी की सेवा में श्री जी की सहचर बनकर वो तो जीते जी
होता है आचार्य परंपरा में जो सहचर भाव का मंत्र उस मंत्र का अनुष्ठान करके अपने स्थूल देह को भूल कर के पांचों भूले देह शद और सह चरी स्वरूप में हर समय स्थित है वो तो जीते जी सह चरी शरीर छूटा हो तो पहले से स्थित था वो सेवा में जाता है सेवा बात अलग है श्री जी की सखी बनना ऐसे थोड़ी कि शरीर छूट गया तो सखी बन जाओगे नहीं नहीं न जय ठीक हो सब ठीक हो गया ऐसा हुआ कि हमें ऐसे ही लग रहा था ठाकुर जी और श्री जी स्वयं वहां पर
हा ख रहे हा बिल्कुल बकल दृढ़ विश्वास करे तो कहो स कहां जहां प्रभु ना है भगवान कह रहे अपनो परण विसार भगत को पूरो परण निभाओ अपनी बात पीछे रख कर के भक्त की बात को आगे रखता हो ऐसे बस धीरे-धीरे हम सत्य की तरफ चले अच्छाई की तरफ चले लोगों को सुख पहुंचाने की भावना रखें अपनी हृदय की एक एक वृति को देखें उसमें जो कमी हो भगवान से प्रार्थना करें कि हमें बल दे हम उसे सुधार करें हमारा यह जन्म व्यर्थ नहीं जाना चाहिए नहीं यह जन्म मतलब इतना बढ़िया भगवान ने सहयोग
दिया है तो हम अच्छे बने इतने अच्छे बने कि कोई हमारी किसी भी वृत्ति से दुख ना पावे है ना अभी अबलो निशानी अबना न सयो अब तक जो हुआ सो हुआ अब हम अपने जीवन को ऐसा सुधारे कि किसी को दुख कोई एकांत में आपके लिए जब सोचे तो यह सोचे कि कितना अच्छा आदमी है हम मिले तो बहुत अच्छा लगा नहीं वो आदमी सोचे ऐसे बनो क्योंकि अब आप संतों का संग कर रहे हैं बहुत अच्छे जनों का संग कर रहे हैं जो पवित्र है तो फिर आपका चिंतन करने वाला आपका संग करने
वाला आपका मिलने वाला एक बार सोचे कि आपकी बहुत अच्छे हैं ऐसा कभी आपको कोई ऐसा ना कहे कि जैसे आदमी के दो चेहरे होते हैं कोई बिरला एक चेहरे वाला होता है एक होता है जो सामने बहुत अच्छा और एक होता है पीछे जिसमें एक आसुरी प्रवृत्ति होती है जो अपने शोषण की वृत्ति रखता है अपने को ऐसा नहीं होना अपने को जो सामने मंच में वही एकांत में वही जो मन में वही वाणी में वही शरीर में तभी साधु संग माना जाएगा ऋषि दुबे जी यूएसए से राधे राधे जी राधे राधे महाराज जी
महाराज जी मैं आपका सत्संग पिछले एक वर्ष से youtube1 दर्शन की प्रबल इच्छा थी जो श्री जी ने पूरा किया महाराज जी मेरा प्रश्न है कि भरत जी परम भागवत थे लेकिन हिरण जी के बच्चे से आसक्ति हो जाने के कारण उनका अंतिम चिंतन हिरण का हो गया इसलिए उन्हें फिर से जन्म लेना दूसरी तरफ अजामिल जी का चिंतन उस उसके पुत्र का था परंतु केवल भगवत नाम के उच्चारण से भगवत ये भगवान नाम की महिमा है कि अंतिम में वो नारायण उच्चारण मात्र से भाव कु भाव अन खाल स हो नाम जपत मंगल दिस
दसो यह भगवान के नाम की महिमा अंतिम समय में है कि आपका चिंतन कुछ भी हो यदि भगवान का नाम उच्चारण हो गया तो आपको परम गति मिलेगी भगवान के नाम की महिमा भगवान से भी बढ़कर के यह दिखाया जही नारायण बोला तही भगवत पार्षद उपस्थित हो गए और यम पास काट दिया और उनको इतना हिरण से मोह हो गया कि उसमें भागवत में पढ़कर देखना भगवान की विस्मृति हो गई पूरा राग पैदा हो गया हिरण से व अंतिम समय हिरण का ही स्मरण कहीं एक बार राम कृष्ण हरि नहीं तो फिर हिरण की योनि
मिली पर हिरण की योनि में भी जो पूर्व में भजन छूटा था व भजन शुरू हो गया अब अगला जो जन्म मिला वह ब्रह्म बोध संपन्न महापुरुष के रूप में उन्हें कोई साधना करनी नहीं पड़ी वो ब्रह्म बोध संपन्न पांच ज्ञान की पांचवी भूमिका को पार किए हुए महापुरुष ऐसे महापुरुष जो जड़ भरत जी के रूप में हुआ भजन कभी निष्फल नहीं होता परव हिरण की आसक्ति इतनी प्रबल हो गई कि भगवान का विस्मरण हो गया बस उसी के दुलार प्यार में तो इसीलिए सबकी ममता ताग बटोरी मम पद मन बाध बर डोरी भगवान में
यदि आसक्त हो जाए तो अंतिम समय अगर भगवान को भूल जाता है जीव तो भगवान उसकी स्मृति बन जाते हैं जैसे पीड़ा बहुत है मूर्छा आ गई मृत्यु का समय है अब उस समय भगवान की स्मृति करने की ताकत ही नहीं रही अब उस समय भगवान स्मृति बन जाएंगे पर इनकी स्मृति करने की ताकत होने पर भी स्मृति छोड़ दी और हिरन में आसक्त हो गए यह त्रुटि हो गई इसलिए इनका जन्म हुआ और उसको भग भन के नाम का जिव्या से संयोग य जिव्या वर्तते नाम तुभयम इसी से कल्याण हो गया नाम की अपार
महिमा भगवान की है तो इसलिए उसका जोड़ नहीं किया जा सकता ठीक है ना भगवान के नाम में अपार सामर्थ है और जी फिर एक प्रश्न आ सकता है कि पूरा उम्र कुछ मत करो अंतिम समय में नाम जप ले नहीं हो सकता यह संत कृपा से हुआ था जामिल को अजामिल को जिस समय संतो की मंडली एक गांव में आई तो कुछ मन चले उपहास करने वाले गांव में लोग होते हैं तो संतों ने पूछा कोई पवित्र ब्राह्मण का घर हो तो आज हम सब वहीं भिक्षा पाए अपने ठाकुर जी विराजमान करें तो बोले
वो वैश्या का बगीचा था बोले वो जो बगीचा बहुत पवित्र है और उसमें जो है बहुत पवित्र ब्राह्मण रहते हैं तो आमिल ही वैश्या के साथ रहते थे तो बगीचा तो बहुत सुंदर था उपवन उसमें जाकर ठाकुर जी विराजमान किए थोड़ी देर में देखा तो एक मृग मार कर के वृद्ध जामिल आ रहा था तो उसने देखा मेरे यहां संत तो पहले धर्मात्मा पुरुष ता जामिल बहुत संयमी पुरुष था एक वैश्या को गलत सं क्रिया करते जंगल में देखकर वह अपने दिमाग को नहीं संभाल पाया और सुंदर वैश्या उष में आसक्त होकर सब धन वैभव
सब मर्यादा नष्ट कर दी वैश्या के संग ही रहने लगा अब पूरा वैभव दे दिया तो वैश्या किसी से मतलब ना रखने लगया जामिल से संग तो आज उससे कई बच्चे हुए अब ये जो ही देखा संत तो संत दरस ज में पातक टरे संतों के दर्शन से पाप नष्ट होता है भगवत भाव बढ़ता है क्योंकि ऐसे परमाण होते रो पड़ा और सब संतों के चरणों में गिरा कि आप यहां कैसे मैं तो नीच अधम पापी यह वैश्या का उपवन है प्रभु तब उन्होंने कहा नहीं तुम्हारे ऊपर भगवान की कृपा है क्योंकि बिन हरि कृपा
मिले नहीं संता नका प्रभु कृपा क्या मैं नीच ऐसा ऐसा बोले आपकी जो संतान होगी मैं देख रहा हूं आपकी जो संतान होगी उसका नाम नारायण रख देना तुम्हारा इसी से कल्याण हो जाएगा और सब संतों ने अपने ठाकुर जी उठाए चल दिए कि वहां कुछ खापी तो सकते नहीं थे ना तो वहां से चल दि बस संतों ने कहा आपकी जो संतान होगी उसका नाम नारायण रखना इसी से कल्याण हो जाएगा बस अपने उस पुत्र पर मानो मोक्ष पर प्रीति हो गई हो ऐसा प्रेम करने लगा तो अंतिम समय अपने उसी पुत्र को पुकारा
जो संतों के आशीर्वाद से नारायण हो गया उसमें सबको ई अंत में जीवन भर पाप करे और अंत में राम कृष्ण हरि बोल दे असंभव ये तो संत कृपा थी संत कृपा से व बोले पाए नारायण नहीं तो भगवन नाम नहीं आता जिव्या पे हा पक्की बात समझ लो इसीलिए जन्म जन्म मुनि यतन कराही व अंत राम कही आवत नाही इसके दो अर्थ है जन्म जन्म अभ्यास करते अंत में भगवान का विस्मरण हो जाता है अंत राम कही आवत नहीं जबान से राम नहीं निकल पाता और इसका और भी अर्थ है कि जन्म जन्म जब
अभ्यास करते हैं तो अंतिम समय निकलता है राम राम कही फिर आवत नहीं फिर संसार में उनका जन्म नहीं होता है तो कठिन है अंतिम समय भगवान का स्मरण पर जब हम भगवान के शरणागत है भगवान का जीवन भर जैसे बना भजन करते रहे तो फाइनल में भगवान सहयोग करते हैं भगवान कहते उसकी स्मृति मैं बन जाता हूं अर्थात स्वयं अंदर चलने लगता है हरि राम कृष्ण जो जीवन में जपा व स्वयं चलने ल भारी पीड़ा में भी भगवान का स्मरण जैसे संतों का संग हो जाए भगवान की शरणागति हो जाए पक्का कल्याण हो जाएगा
राधा बाबा के चरित्र में पढ़ा कि पूज्य राधा बाबा की कुटिया के सामने जो जगह थी एक बूढ़ी माई आती थी सोनी लगा जाती थी कभी बाबा बात नहीं करते थे वह दो चार दिन नहीं आई सालों सोनी लगाई सोनी का मतलब समझते हैं ना झाड़ू तो बाबा ने पूछा व माई नहीं दिखाई दे रहे बोले बाबा सुनते हैं वो बहुत बीमार मरणासन मरणासन है चलो हमको ले चलो बाबा कहीं नहीं जाते थे उतनी सेवा का फल घर गए उसके तो मरणासन में जैसी पड़ी थी ऐसे हाथ रखा कहा माई कुछ दिखाई दे रहा है
बोले हां राधा कृष्ण सामने खड़े हैं अल बाबा गए प्राण छूट गए भगवत प्राप्त हो गई ऐसे भगवान की कृपा संत की कृपा यही भगवत प्राप्ति कराती है मोक्ष मूलम गुरु कृपा तो अजामिल के ऊपर संत की विशेष कृपा हो गई दया आ गई और पूर्व का धर्मात्मा पुरुष था मध्य में बिगड़ गया तो अंतिम संभाल दी भगवान ने तो अगर हमसे कोई चूक भी हो जाती है तो भगवान फिर छोड़ते नहीं है रात न प्रभु चित चूक किए की करत सुरत स बार की इसलिए ऐसा कोई सोचे कि जीवन भर पाप करें अंत में
राम बोल देंगे असंभव असंभव ऐसा नहीं हो सकता जी राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा