भगवान के नाम में बड़ी शक्ति है कितने भी पाप थाप हो भगवान का नाम उन्हें नष्ट कर देता है इसलिए मैं पापी हूं मेरे से बड़े पाप हो गए कैसे मिटेंगे यह चिंतन छोड़कर ओम नारायण गोविंद माधव मैं चैतन्य हूं माधव का हूं मैं सुख स्वरूप आनंद स्वरूप मेरे बुद्धि में मेरे मन में मेरे चित्त में मेरे अहम में जो चैतन्य स्वरूप भगवान ऋषि केश है सर्वव्यापक है सर्वेश्वर हैं सर्वेश्वर है ऋषि का ऋषिकेश है माधव है गोविंद है ओम आनंद पापों की क्या मजाल है कि भगवान ऋषि केश गोविंद और माधव के प्रभाव के
आगे टिक सके मैं पापी हूं यह सोचना बंद कर देंगे मैं ऋषिकेश का चैतन्य स्वरूप का आनंद स्वरूप का अद्वित आत्मा ब्रह्म का अविभाज्य अंग हूं ओम आनंद ओम ओम परमात्मने नमः ओम ओम केशवा नमः ओम ओम माधवा नमः ओम ओम ऋषिकेश नमः ओम ओम बुद्धि दाता है नमः ओम ओम सर्वेश्वरा है नमः जो मेरी बुद्धि में है मेरे अहम में है मेरे चित्त में है मेरे तन में है समग्र ब्रह्मांड में पहले हैं उस आदि नारायण स्वरूप परमात्मा के चिंतन में हम परमात्मा मय हो रहे हैं ओ हरि ओम ओम हरि ओम हरि ओम
हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम मा हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम डूबते जाओ पाप राशि के समूह से जान छूटी अ पुण्यम हरि ओम में माधव में पुंडरीकाक्ष में केशव में ऋषिकेश में एकाकार होता जाएगा साधक सिद्धवट [संगीत] डूबते जाए [संगीत] चित हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि
ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओ हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरिओ ह हरि ओम ह ह [संगीत] हरि मन ही मन बोलो ना बोलो लेकिन उसमें खोते [संगीत] जाओ हृदय कमल खिल रहा है उस ऋषि केश के हरि के नाम में पाप राशियों को शमन करने का अद्भुत सामर्थ्य है अब हम निष्पाप नारायण के आनंद में आनंदित हो रहे हैं नारायण के रस में रसमय
हो रहे हैं ओम हरि ओम हरि [संगीत] ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओ हरि ओम हरि ओम हरि ओम आखरी में हरि ओम बोलने से विश्रांति की क्षणे आ जाएगी बड़ा हितकारी हरि ओम ह हरि ओम [संगीत] ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम ओम हरि ओम मा हरि ओम मा हरि ओम हरि ओम प्रभु ओम प्रभु ओम प्रभु ओम प्रभु ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि
ओम हरि ओम हरि ओम [संगीत] जय [संगीत] हो आनंद है माधुर्य [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] है हदय कमल खिल गया है निष्पाप चि की पहचान है भगवन नाम से आनंदित हो जाए शांत हो जाए प्रसन्न हो जाए निर्वासन होने लगे जय हो [प्रशंसा] [संगीत] [संगीत] बीन का आवाज सुनकर विषधर अपना विला स्वभाव भूल जाता है तो हरि का नाम सुनकर हमारा चंचल और पापी मन पाप ताप बोलकर हरि के रस में झूमने लग जाए तो स्वाभाविक है आनंद है [संगीत] हरि ओम हरि ओम हरि [संगीत] ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि [संगीत] ओम हरि
ओम हरि ओम हरि ओम आनंद है सती अमावस्या है सिहत पर्व है शिप्र जन नगरी अ दस [संगीत] सुयोग आनंद है ना हद हो गई कौन कहता है कि रंग नहीं चढ़ता देख लो भक्तों का बेड़ा तरता हो [संगीत] [प्रशंसा] हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओ हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओ हरि ओ हरि ओ हरि ओम जय हो कन्हैया जय हो हरि जय हो गोविंदा जय हो गिरधारी हरि ऋषिकेश ये स्तोत्र पाठ से
हम लोगों के पापत शू हो गए और तेरा आनंद प्रकट हो रहा है ना हरि पक्का विश्वास हो गया कि तेरे नामों में ये ताकत है कि हमारे सारे पाप नष्ट हो गए [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] हैं हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम शिव ओम शिव ओम शिव ओम शिव ओम शिव ओम म शिव ओम म शिव ओम म शिव ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओ हरि ओम हरि ओम
हरि ओम हरि ओम हरि ओम ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ह ओ ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम जय हो [प्रशंसा] [संगीत] कोई किसी को रोकेगा टोके नहीं सोमवती अमावस हरि के हेत को उभरने दो प्रभु के रस को छलकने दो कुंभ को छलकने दो य छलका अभी भी गा इसी समय छलकने दोर से [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] कुंभ छलक रहे हैं देवसर युद्ध
में तो एक कुंभ छलका था लेकिन भगवन नाम के कीर्तन में अनेक कुंभ छलक रहे हैं सो तो [संगीत] है हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम शिव ओम शिव ओम शिव ओम शिव ओम शिव ओम शिव ओम शिव ओम शिव ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम जय हो हरे [प्रशंसा] [प्रशंसा] अरे माधव शिपे आनंद रूपा माधुर्य रूपा हरे ऋषि केशा हे मुकुंदा हे ममा आत्म देवा ओ मम साक्षी स्वरूपा ओ गुरुदेव हरि ओम जय हो
[संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओ हरि ओ आनंद है रग रग पावन हो रही है लख लख पलिया बर भर पए चढ़े न मस्ती नैन एक बूंद हरि रस की मस्त करे दिन [प्रशंसा] रन [प्रशंसा] ह [संगीत] हरि हरि ओ हरि
प्यारे हरि मेरे हरि हरि ओम हरि ओम हरि ओम ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम ओम हरि ओम ओम हरि ओम ओम हरि ओम ओम हरि ओम ओम हरि ओम हरि ओ हरि ओ ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम ओम हरि ओ हरि ओम हरि [प्रशंसा] ओ ओओओओ ओ ओम ओम ओम ओम ओम [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] ओ बैठो बैठ बैठ कुछ ना करो की जय की जय की जय सगुरु भगवान की जय [संगीत] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [संगीत] मेरा चित्त निर्दोष हरि के जत ध्यान
से पाप प्रायश्चित से पूर्व के सारे पाप ताप का शमन होने मेरा चित चैतन्य स्वरूप परमात्मा के सुख से शांति से और ज्ञान से संपन्न हो रहा है पुष्ट हो रहा है वाचिक कायिक और मानसिक पापों का शमन सुबह दोपहर शाम और रात्रि में जाने अनजाने किए हुए सारे पापों का शमन और भगवत प्रसाद का रस स्वाद लेकर मैं अब भगवत मय जीवन जिऊंगा जन्म और मरण मेरा नहीं शरीर का है सुख और दुख मेरा नहीं मन का है राग और द्वेष मेरा नहीं बुद्धि का है मेरा तो चैतन्य ऋषिकेश जो मन में बुद्धि में
चित्त में और मुझ में व्याप रहा है वही वि भू व्यापक प्रभु है ना [संगीत] जो कभी मुझे नहीं छोड़ता जिसको मैं कभी नहीं छोड़ता वह मेरे भगवान है और सबके आधार सृष्टि पैदा हो हो के नष्ट हो जाती है फिर भी जो पैदा नहीं होता नष्ट नहीं होता वह मेरा परमेश्वर उपास स्वपने पैदा हो हो के नष्ट हो जाते लेकिन स्वप्न दृष्टा झुका रहता है ऐसे मेरा सर्वेश्वर परमेश्वर आकाश की नाई जो ओत प्रोत भरा है वही मेरा जिगरी जान है ओम आनंद ओम शांति ओम माधुर्य अब मैं ध्यान नहीं करूंगा कुछ नहीं करूंगा
विश्रांति विश्रांति ध्यान का एक उत्तम तरीका है कुछ ना करना भी एक बहुत ऊंचा करना है जो ध्यान की कोशिश करते उनका अहंकार आता लेकिन जो प्रेम से चुप बैठ जाते नींद से बचते आलस्य से बचते हैं बीच में हरि नाम लेते उनका तो ध्यान अपने आप स्वभाव बन जाता है जैसे गर्भिणी स्त्री को ध्यान करना नहीं पड़ता आठन महीने का गर्भ हो तो उसे रटना नहीं पड़ता मैं गर्भिणी हूं सहज स्वभाव गर्भ की स्मृति रहती है ऐसे ही गर्भस्थ शिशु में और गर्भिणी में जो मेरा चैतन्य ऋषिकेश बैठा है उसका ध्यान में नहीं करता
हूं वो तो ही है ना हे ऋषिकेश हे गोविंदा हे अच्युता जल में स्वाद तू बनकर बैठा है फूलों में सुगंध तेरी पृथ्वी में गंद गुण तेरा पक्षियों में किलोल तेरी व सिर पर बोजा लेकर पंचकोशी की यात्रा करने वाले तो भोले नहीं तू ही भोलानाथ है भक्त तो जानते हैं जो आग उगलती हुई पृथ्वी को तपा रहा है और सिर पर सूरज चमका रहा है वही कल हृदय में शीतलता भी देगा आज जो पत्थर कंकड़ और काटे और शूल पर चलवा रहा है कल वही सहजा पध रेगा अनेक रूप उसी के हैं भक्त भोले
नहीं जानते हैं कि वही पृथ्वी में गं गुण तो जल में रस गुरु में गुरुत्व तो शिष्य में श्रद्धा वही का वही सब खेल कर रहा है व ऋषिकेश व अच्युता व [संगीत] माधव नास्तिक भले भक्तों को मूर्ख मान ले लेकिन भक्त मूर्ख नहीं है भक्तों की तो जन्म जन्म की मू मूर्खता मिटाने की यह तपस्या हो रही है चाहे पंचकोष यात्रा हो चाहे सिंहस्थ स्नान हो चाहे गुरुद्वार पर हरि कीर्तन हरि कथा हरि ध्यान भक्त बड़ा जानकार है यह सारा हरि का ही वै भन्य विलास विलक्षणता है ताकि मेरा भक्त उबे ना पंचकोशी करते
थके ना कीर्तन करते थके ना ध्यान करते थके ना इसलिए ध्यान के बाद कीर्तन कीर्तन के बाद ध्यान जप सेवा विनोद स्नान ये वै चिता करने वाले कराने वाले और उसके फल के नियामक मेरे हरि है भक्त अच्छी तरह से जानता है जो आज तक्त भूमि पर चला रहा है कल वही फूल भी बिछाने वाला है जो आज आंखें दिखाकर अनुशासित करता है वो पल भर के बाद स्नेह बरसाने वाला तू ही है हम तो को जानत है ना कहीं आंखे दिखाकर अनुशासित कर हो तो कहीं मधुरता की मुस्कान देकर हमारे चि को अपने और
चिंतन करथ ओ माधव ओ माधव गोविंदा ओ केशवा ओ महाकाला तेरे रूप अनेक तेरी लीलाए अनेक लेकिन तेरे भक्तों को पहचानने की कला भी अनेक दे रखी है तूने तू कोई कम है क्या तेरा भक्त कम होगा काहे कम होई तुम्हारा भक्त तुम्हारे से सवाया हो है तुम्हारा भक्त तुम्हारा गुरु बन सकेता है तुम्हारा सखा बनी सकेत है तुम्हारा मित्र बनी सकत है तुम्हारा भक्त को तुमने अपने से अलग क्यों माना कब माना रस लेने के लिए माना अह भक्त पराधीन तू तो भक्तों के पराधीन बना बैठा है ओए ओ होए [संगीत] तेरी दो वीक
पॉइंट भगत जान गए इसलिए तुझे नचा लेते तू प्रेम का भूखा है और प्रेम करने की ताकत भक्तों के पास है धन ना हो तो क्या है विद्या ना हो तो क्या है बल ना हो तो क्या प्रेम तो सभी कर सकते और तू प्रेम का भूखा है तेरी भूख को जानते और उनके पास खुराक भी है भक्तों के पास खुराक है और तेरे को भूख है तू कहां जाई हो हरी तू कहा हो कहां द भया दौड़ दौड़े फिर यही भक्त की दिल की गुद में [संगीत] बैठे और दूसरी तेरी पंट य है कि
तू भक्त को किसी जीव को अपने से अलग नहीं कर सकता अपनी सृष्टि से नहीं निकाल सक एक तो तू प्रेम का भूखा और दूसरा तू उसको अपनी सृष्टि से नहीं निकाल सकता आप प्रेम वो कर सकते य प्लस पॉइंट उनका और तेरी सृष्टि से बाहर नहीं जा सकते नहीं रह सकते त कर नहीं सकता तो तेरा अविभाज्य अंग है अब तू क्या करोगे छेड़े तो जुड़ जाए है गुरु छेड़ा जाने जोड़ना जानि है और तुम आनंद और प्रेम चाहि तो और भक्त मुक्ति और माधुर्य का दीवाना है ओ हो तूही भक्त बना है तू
ही गुरु बना है और तू ही प्रभु बना है ओ होहे का लीला करत हो कैसन कैसन खेल खेलत हो अकेला रहते रहते उ बाना ही तुझे एक हम बहुत श्याम में एक होते हुए बहुत हो जाऊ और फिर आप ही भक्त और आप ही गुरु और आप ही भगवान आप ही बोलने वाला आप ही सुनने वाला आप ही ताल मिलाने वाला आप ही बजाने वाला आप ही सिखाने वाला और आप ही सीखने वाला क्या है तेरा रंग आला हो हो हो क्या करत हो चलो तो आसमान देखें आसमान सब तारे तारों का चांद भी
तू तेरा मकान आला जहां कहां बसा है तू चलो तो जरा बाजार देखें बाजार में सब आदम आदम का दम भी तू तेरा मकान आला हर आदम हर व्यक्ति के स्वासो स्वास का दम भी तू ही बना बैठा है ना चलो तो जरा समुद्र देखें नजदीक जाकर निहारे समुद्र में सब लहरी लहरियों का लाल भी तू तेरा मकान [संगीत] आला जहां कहां बसा है तू [संगीत] अभी तोत तपत बनकर तप रहा है तो फिर रिमझिम करके आने वाला भी तू ही है हो और फिर अभी गर्मी देता है तो फिर रिमझिम देगा और रिमझिम बनक
बरसने के बाद ठठरा वाला भी तू और ठुर वाला कौन होय ओ ठुर वाले ओ ठु राने वाले और मेथी पा खाकर पुष्ट होने वाले और गर्मियों में जरा पसीना बहाकर डबले होने वाले तेरी लीला अजब गजब है [संगीत] ना नारायण नारायण नारायण तुम एक बात पक्की समझ लेना कि जगत में जो कुछ भी जिनको मिला है श्रेष्ठ उनके पीछे तपस्या है अभी आप गर्मी सह रहे हो भूख प्यास सहकर भी जो बैठे हैं एक प्रकार की तपस्या हो कबीर जी कहते हैं गुरु मोहि जीवन मूर दई जल थोड़ा बर्षा भई [संगीत] भारी गुरु मोहे
जीवन मूर दई जल थोड़ा बर्षा भई भारी छाया रही सब लाल मई छिन्न छिन्न पाप कटन जब लगे बाढ़ लागी प्रीति नई जल थोड़ा वर्षा भई भारी वेदांत और सत्संग का जल तो थोड़ा लेकिन कृपा की बरसात भारी कुंभ का स्नान का जल तो थोड़ा लेकिन उसके पुण्य की वर्षा भई भारी गुरु मोहे जीवन मूर दई जीवन का मूल जो है आत्म सुख परमात्मा का ज्ञान परमात्मा की प्रीति गुरु मोहे जीवन मूर दई जल थोड़ा बर्षा भई भारी सत्संग का जल थोड़ा लेकिन कृपा उसका फल रूपी बरसात भारी ई छाय रही सब लाल बई सब
जगह शीतलता हो गई बाहर बले धरती तपे और सूर्य सिर पर तपे लेकिन सत्संग और सिंहस्थ और पंचकोशी की तपस्या ने अंतःकरण में शीतलता की छाया कर दी छिन्न छिन्न पाप कटन जब लागे क्षण क्षण में हमारी पाप वासना क्षीण होने लगी बादन लागी प्रीति नई नई प्रीति बढ़ने लागी अमरपुर में खेती की नहीं जहां मृत्यु की गंध नहीं है मृत्यु शरीर की होती है अमरपुर आत्मा है अमरपुर में खेती की नींद हीरा नग भेट भई कहे कबीर सुनो भाई साधो मन की दुविधा दूर भई गुरु मोहे जीवन मूर दई अब संसार यह मिलेगा कि
वोह मिलेगा यह करूं कि वो करूं यह अच्छा कि वह अच्छा यह सब दुविधा दूर हो गई संसार का दुख तो दुख है लेकिन सुख भी दुख से भरा है अब उसमें दुविधा नहीं रही सुख स्वपना दुख बुलबुला जो होगा देखा जाएगा बेटी की चिंता बेटे की चिंता इज्जत की चि चिंता आरू की चिंता मकान की चिंता बीमारी की चिंता नहीं अब हम निश्चिंत हो गए दुविधा दूर गई प्रारब्ध वेग से जो हो गया वह देख लिया जो हो रहा है देख रहे हैं जो होगा देखा जाएगा हमारा आत्मा मूर जो है मूल वो सत्य
चिता आनंद शरीर एक दिन जल जाएगा बड़ी कोठियों में रहे और सोने के बर्तनों में भोजन करें तभी भी आखिर तो राख में मिल जाएगा और साधे सधे घरों में मकानों में रहे फिर भी आखिर राख में मिल जाएगा शरीर राख में मिल जाए उसके पहले गुरु मोहि जीवन मूर दई गुरु ने मेरे को जीवन का मूल सुख दे दिया मूल ज्ञान दे दिया मूल शांति प्रसाद दे दिया जल थोड़ा वर्षा भई भारी सत्संग के शीतलता वाला जल तो थोड़ा लेकिन पुण्य रूपी बरसात भारी हो गई पहले जो दुख आकर दबोच देता था गला अब
सत्संग समझने के बाद दुख में भी ह हृदय हरा भरा है सुख आकर प्रभावित करता लेकिन अब सुख में भी आ सक्ति नहीं रही अमरापुर में खेती कीनी जहां मौत की गंध नहीं वह अमरपुर अपना आत्मा में खेती की हीरा नग दे भेट भई आत्म हीरा नगदी भेट भई कहे कबीर सुनो भाई साधु मन की दुविधा गई महाभारत में भीष्म जी कहते हैं कि जिस मनुष्य को जो कुछ अभी ऊंचाई मिली है उसकी ऊंचाई में उसका त तपस्या काम करती है यज्ञ दान और तप बुद्धि को स्वच्छ करता है अहिंसा सत्य दान इंद्रिय संयम से
भी बड़ा भारी तप है उपवास उपवास सबसे बड़ा भारी तप है निवृत्ति मार्ग के लिए उपरा उपवास से दोषों का पापों का शमन होता है राजा जनक ने गुरुवर से पूछा कि श्रेय का साधन क्या है जिसको पाकर मनुष्य फिर गर्भ का दुख नहीं भोगता जरा व्याधि दुख से बच जाता है ऐसा कौन सा कर्म है जिसका फल नष्ट नहीं होता कहां गया हुआ जीव फिर संसार में नहीं भटकता हे गुरु पाराशर व्यास भगवान के पिता पाराशर व्यास व्यास के पुत्र थे सुखदेव जी [संगीत] महाराज और व्यास जी के पिता थे पाराशर जी महाराज राजा
जनक पाराशर महाराज का आदर सत्कार से पूजन करता है और प्रार्थना करता है कि गुरुदेव यह सारे तीर्थ भजन का फल यह है कि आप जैसे गुरु के चरणों में बैठकर अंतर आत्म तीर्थ में जावे जहां कुछ ना करने कि से भी सब कुछ करने का फल मिल जाता है हजार यज्ञ तप का फल उसको मिल जाता है जो कुछ ना करता है तो ऐसा कौन सा कर्म है जिसका फल नष्ट नहीं होता कहां गया हुआ जीव फिर से संसार में माता के गर्भ में नहीं लौटता श्रेय का साधन क्या है तब भगवान पाराशर कहते
हैं कि आसक्ति का अभाव जो बेटे में आसक्ति करते हैं बेटा सुख देगा उनको सचमुच बेटे बड़ा दुख देंगे बेटे को पालो पोशो पढ़ाओ लिखा शादी विवाह कराओ लेकिन बेटे के आधार पर आपके सुख को मत बांधो पत्नी सुख देगी पति सुख देगा मित्र सुख देगा नहीं यह आसक्ति है इस आसक्ति को रखने वाले को सुख की जगह पर दुख मिलता है निराशा मिलती है सुख स्वरूप मेरा भगवान अभी सुख स्वरूप है बेटा क्या सुख दे देगा बहू क्या सुख दे देगी सुख कोई दे ऐसे आप लाचार मत बनो वोह आदमी कितना दरिद्र है कि
किसी के सुख देने पर सुखी हो किसी की वाहवाही पर उसका सुख आधारित है किसी की उदारता या सेवा पर उसका सुख आधारित है वह आदमी कितना लाचार है भगवान आपको लाचार नहीं देखना चाहते गुरु आपको लाचार नहीं देखना चाहते संत पाराशर जनक को लाचार नहीं देखना चाहते कोई चाहे मान दे चाहे सुख दे चाहे कुछ दे लेकिन आपका अपना परमेश्वर आत्मा ही सबसे ऊंचा है दिया हुआ सुख और मान कब तक टिकेगा सुख जिससे दिखता है मान जिससे दिखता है तोत उसी को देखने की इच्छा से गोता मार कुछ ना कर फिर तू सुख
मांगने वाला नहीं होगा मान मांगने वाला नहीं होगा सुख मान का तू दाता बन जाएगा जनक तू इतना महान आत्मा है तेरा तो मंगल होगा लेकिन जनक तेरा यह संवाद और वार्ता सुनने वाले भी निर्दोष नारायण में शांति पाएंगे पराशर भगवान कहते के आ सक्ति का [संगीत] अभाव श्रेय का मूल है सारे सुखों का मूल है सारे बलों का मूल है सारे ज्ञान का मूल है आसक्ति जहां जहां हो वहां वहां से मन को हटाकर भगवान में लगा दो आसक्ति बड़ी दुर्जय है लेकिन वही आसक्ति अगर भगवान में भगवान के प्यारे संतों में और भगवान
के नाम में होती है तो वोह आसक्ति सारे दुखों को मिटाकर परम सुख रूप स्वयं को बना देती है राजा जनक आत्मा परमात्मा का ज्ञान सबसे उत्तम गति है दुनियादारी रोटी का है मकान दुकान का है व्यक्ति वस्तुओं का ज्ञान जीव को बांधता है लेकिन अपने आत्मा परमात्मा का ज्ञान जीव को उत्तम गति देता है और सबसे उत्तम कौन सा कर्म है उसके उत्तर में जनक को कहते हैं कि स्वयं किया हुआ तप और सुपात्र को दिया हुआ दान स्वयं किया हुआ तप सबसे उत्तम कर्म है सत् पात्र को दिया हुआ दान उत्तम दान है
उसका फल नष्ट नहीं होता अधर्म और पाप का उे द राजा जनक अधर्म और पाप जीव को दुख देते और दुखद योनियों में ले जाते धर्म का अनुष्ठान करने से अधर्म का प्रभाव और पाप का प्रभाव नष्ट होता है जो सत्संग सुनते हो और चुपचाप बैठ तो उनका मन भगवान में शांत जल्दी होता है भगवत शांति सारे प्रसाद की जननी है उस प्रसाद से सारे दुखों का अंत होता है शांति लाभ समान और कोई धन नहीं है जिस शांति के लिए जोगी गुफाओं में जाते हैं तप तप करते हैं जपी जप करके शांति चाहते हैं
वह शांति तुमको सत्संग में सहज में प्राप्त हो रही है यह भगवान की दया और तुम्हारी [प्रशंसा] तपस्या अशांत स्य कुत सुखम अशांत को अशांत को सुख कहां शांत आदमी को दुख शांति पर्व में भीष्म कहते हैं के उत्तम पद को पाने के लिए ते बातें सुन लो इसको सुनने से भी बड़ा भारी पुण्य होता है एक तो अपने चित्त को ऐसा साधो जैसे बच्चे को साधते ने कभी प्यार करते कभी पटाते कभी आंख दिखाते कभी दूसरी कहानी सुनाकर उसका मन बदलते ऐसे ही अपने चित्त को लाल ते बाल वतम चित्तम बुरी जगह जाता हो
बुरा सोचता हो थवा चिंता में डूबता हो तो निश्चिंता की बात करो बुरी जगह जाता हो तो अच्छी जगह ले जाओ बुरा सोचता हो तो अच्छे सोचने में लगाओ नहीं तो फिर हे भगवान मैं तो बुराई के रह से जा रहा हूं जैसे दूध घी मक्खन रसोई कौआ कुत्ता बिगाड़ तो आप कैसे करते भगाते ऐसे ही जब इधर उधर बुरा विचार हरि ओम ओम ओम ओ नारायण नारायण नारायण राधे राधे अरे अरे अरे अरे ऐसा करके अपने चित्त को बुराई से बचा लो अपने जीवन में राग और द्वेष काम और क्रोध बढ़ने ने पाए प्रिय
को देखकर आसक्ति ना हो और शत्रु को देखकर अंदर में जलन ना हो हृदय में सम बनने को यह बड़ी ऊंची सम तपस्या है दम माना दूसरे की वस्तु की इच्छा ना करना गंभीरता पूर्वक धीर धीरता पूर्वक निर्भयता पूर्वक मन को आसक्ति के रोग से रहित अपने आनंद स्वरूप के चिंतन में लगाना यह दूसरा सद्गुण है तीसरा बड़ा भारी सद्गुण है मत सरता का अभाव अर्थात कोई थोड़ा बहुत दान करते मैंने दान किया मैंने यह क्या इस प्रकार का मत्सर नहीं धर्म में मन लगाओ मत सरता से बचेगा मन काबू में आएगा यह तीसरा सद्गुण
है चौथा सद्गुण है कि क्षमा का गुण बढ़ाओ जो गृहस्थ में जीना चाहते उनको तो क्षमा का गुण बढ़ाना ही पड़ता है कभी बेटा गलती करेगा कभी पति करेगा कभी पत्नी करेगी कभी बहू करेगी किसकिस से लड़ते बिरते रहोगे उनको समझाओ लेकिन हृदय में क्षमा भरे रखो तो तुम्हारे हृदय को क्रोध की आग नहीं चलाएगी अप्रिय वचन मत बोलो शत्रु के प्रति भी दुष्ट वचनों का उपयोग ना करो तो आप ग्रहस्ती में सुखी रहोगे तू तड़ाक की भाषा से अपने को गंदा मत करो प्रेम की भाषा क्षमा की भाषा जैसे भगवान राम बोलते थे नम्रता
से बोलते थे आप अमानी रहते थे दूसरों को मान से सम्मानित करते थे सार गर्भित बोलते थे प्रसंग उचित बोलते थे वाणी ऐसी बोलिए मनवा शीतल होए औरन को शीतल करे आप शीतल होए पांचवा सद्गुण है लज्जा किसी वस्तु व्यक्ति का खेद ना करना शांत और प्राप्ति और अपने मन को संयत शांत रखना निर्लज होकर खेद ना करना छठा है तितिक्षा जो सुख दुख मान अपमान मिल जाए धैर्य पूर्वक उसको बीतने दो इससे तुम्हारी योग्यता बढ़ेगी भगवत प्राप्ति के सदगुण खिलेंगे तुम्हारे कर्मों के ब धन कटेंगे धैर्य रखो यह भी गुजर जाएगा यह भी बीत
जाएगा बहुत गई थोड़ी रही व्याकुल मन मत हो धीरज सबका मित्र है करी कमाई मत को जैसे सत्संग में आते और धैर्य पूर्वक बैठे रहते हैं उनको एक कदम चलकर आने से एक एकक यज्ञ का फल होता है बैठते तो भक्ति योग फलित होता है सुनते हैं तो ज्ञान योग फलित होता है जब सत्संग में कीर्तन करते हैं तो तमल ध्वनि पैदा होती उनका शरीर भगवत भजन से नहाकर पावन होता है सात्मा सदगुण अपने में यह करो कि दूसरों के दोष ना सुनो ना देखो दूसरों के दोष देखने से अपने मन में दोष आएंगे दूसरों
के मन के दोष दूसरों के दोष सुन ऐ से अपने मन और बुद्धि में उनका चिंतन होगा भगवान का रस छूट जाएगा गुरु मोहि जीवन मूर दही गुरु ने मेरे को जीवन की मूल की बात सुना दी जीवन का मूल्यवान हीरा दिखा दिया जल थोड़ा बर्ष भई भारी सत्संग का जल तो एक आध घंटे का लेकिन जीवन भर बरसा होती रही आनंद की बर्ष होती रही अमर सुख की बरसा होती रही पुण्य की वर्षा होती रही माधुर्य की ऐसे मेरे गुरुदेव ने मेरे को ज्ञान दे आठवा गुण है आसक्ति का त्याग करो बीड़ी की आदत
पान मसाले की आदत खाली पेट चाय पीने से धातु की ग्रंथि कमजोर हो जाती है वीर्य का कोष कमजोर हो जाता है चा कॉफी बीड़ी और पान मसाला धातु को कमजोर करता आसक्ति का त्याग करो राग द्वेष का त्याग करो इससे ध्यान में और भजन में बड़ी भारी बरकत आएगी लोग भजन करते तप करते तीर्थ करते साधन करते हैं लेकिन फिर भी सच्चा सुख और सच्चा आनंद नहीं आता क्यों कि असा साधन भी करते हैं जैसे पुण्य तो करते फिर वही थोड़ी देर में झूठ बोलते या दूसरे का हक छीन पाप भी कर लेते इसलिए
पुण्य पाप नाश के लिए कुंभ करते हैं जप तप करते दान पुण करते फिर दूसरे पाप कर डालते नहीं दूसरे पापों से अपने को बचाए तो जल्दी भगवान के ध्यान में कुछ ना करने में आपकी सफल गति हो जाएगी अभी आपको एक एक मि मिनट में कितना महा पुण्य हो रहा है एक एक मिनट आपको हजारों कपिला गौ दान करने का फल हो रहा है आप य ब्रह्म विद्या सुन रहे हैं तीर्थ नाए एक फल संत मिले फल चार सतगुरु मिले अनंत फल कहत कबीर विचार तीर्थ में नाने से धर्म लाभ एक फल होता है
अमावस्या का स्नान किया जो भी संत मिले तो धर्म अर्थ काम और मोक्ष चार लाभ होते लेकिन सतगुरु के चरण में शांति से कबीर जी कहते हैं गुरु मोहि जीवन मूर दई जल थोड़ा बर्षा भई भारी छाया रही सब लाल लाल मई तो य सतगुरु मिले अनंत फल जिस फल का अंत ना हो वो अनंत फल तुम कमा रहे हो इस कमाई को करते [संगीत] जाना दसवा गुण है आर्य अर्थात श्रेष्ठ आचरण करना छुपे हुए सत्कर्म कर लेना अपने को बड़ा कर्ता घोषित ना दिखाना यह आरता है शुभ करना लेकिन शुभ का ढोल ना पीटना
यह गवा गुण है धैर्य जीवन है तो सुख भी आएगा दुख भी आएगा कभी कोई लांछन भी लगेंगे तो कभी कोई अपमान भी होगा धैर्य रखो गुजर जाएगा बीत जाएगा यह वर्षा तो ज्ञान की थोड़ी है जल तो थोड़ा है लेकिन सत्संग की और पुण्य की वर्षा जीवन भर काम देगी ऐसी [संगीत] वर्षा बारवा सदगुण है अहिंसा ऐसी चुभने वाली वाणी ना बोलो जो किसी के मन को दुख दे चलते फिरते नजर धरती पर रखो निर्दोष जीव जंतु तुम्हारे पैरों के द्वारा पीड़ित ना हो किसी प्राणी का तुम्हारे द्वारा ना हो यह सदगुण भरोगे तो
भगवान प्रसन्न होंगे अंतर्यामी ईश्वर का सुख प्रकट होगा ज्ञान प्रकट होगा आनंद प्रकट होगा भगवान की प्रेरणा प्रकट होगी और अंत में भगवान से आप मिल जाओ यह बड़ा भारी कल्याणकारी सत्संग तुम सुन रहे हो तेरवा सदगुण है दया अपने हृदय में सबके लिए दया भाव रखो मंगल कर आप दूसरों के लिए दया और स्नेह रखोगे तो दूसरों के हृदय में भी छुपे हुए परमात्मा दयालु आप पर भी दया बसाएंगे प्रेम बसाएंगे आप भगवान दयालु है प्रेमी है तो आप भगवान के गुण को जगाओ सबसे दया भरा प्रेम भरा व्यवहार करो सत्य शमा हृदय में
रहे भय और क्रोध का त्याग कर दो युधिस्टर में यह बड़ा भारी गुण था युधिष्ठिर ने कहा दिन भर तो मैं युद्ध के मैदान में तुम्हारे साथ रहूंगा लेकिन शाम को मैं अपनी अलग से साधना करने जाऊंगा मेरे को कोई रोकना टोकना नहीं इस से मैं महाभारत के युद्ध में आता भाइयों ने कहा ठीक है सूर्यास्त होता युद्ध शांति का शंख बचता युधिष्ठिर जाते नाथ होकर वस्त्र बदल के कुछ खिसक जाते देर रात को आते थे आप कहां जा रहे हो यह पूछना नहीं है यह चंदे बैठे [संगीत] हैं एक दिन क्या हुआ कि भीम
तो भीम ठहरा धीरे से दबे पैर युधिष्ठिर रात को कहां जाते क्या साधना करते संध्या को युद्ध पूरा होता है जल्दी से ना धो के वस्त्र बदल के कुछ चले जाते हैं देखा तो कहां जा ते युधिष्ठिर महाराज ओ हो युधिष्ठिर [संगीत] महाराज किसी को पानी पिला रहे तो किसी को पंखा हाक रहे किसी को औषध पिला रहे तो किसी को डस बंधा रहे शत्रु की सेना के जो घायल जवान है उनकी सेवा सुसरा कर रहे औषधि आदि से उनको स्वस्थ करने का सेवा चाकरी कर रहे भीम भागा और अर्जुन को बुलाया कि बड़े भाई
देखो यह क्या उपासना साधना करते हैं यह तो शत्रु सेना के जवानों को स्वस्थ करने की सेवा कर रहे एक भाई ने देखा दूसरे ने देखा तीसरे ने और चौथे ने चारों ने उंगलियां दांतो उतली प्रभात काल हो गई युधिष्ठिर आए चारे भाइयों ने कहा भैया रात भर आप क्या साधना कर रहे थे मंद मंद मुस्कुराए कि भैया तुम्हारी साधना हमने देखी लेकिन ऐसी अगर साधना करोगे तो यह शत्रु सेना वाले तो हमको मार डालेंगे हावी हो जाएंगे अर्जुन ने कहा कि शत्रु की तो नीव काट डालनी चाहिए भीम ने कहा अधम शत्रु को तो
मार डालना चाहिए सहदेव नकुल ने कहा कि शत्रु के पक्ष में काम करना है तो यह महाराजा युधिष्ठिर शांत हुए अर्जुन को प्रकाश हुआ के नहीं नहीं युधिष्ठिर जो करते हैं ठीक करते हैं दिन में हम युद्ध करते हैं लेकिन युद्ध से सितो की है और सेवा तो परम सिद्धांत है चाहे कोई भी हो शत्रु भी हो तो उसके अंदर में अपना ईश्वर है यह महाराजा युधिष्ठिर धर्मराज केवल नाम मात्र नहीं इनका काम भी धर्मम इसलिए जहां धर्मराज युधिष्ठिर है वहां विजय है श्रेय इन्हीं के बल से तो धरती पर अभी भी रौनक दिखती है
युधिस्टर महाराज शत्रु पक्ष के आंसू पोछने चले जाते परहित सरी स धर्म नहीं भाई सबसे बड़ा धर्म है परोपकार