अगर आपकी एज अभी 14 से 28 के बीच में है तो यह वीडियो आपके लिए देखनी बहुत जरूरी है क्योंकि आज हम आपको आपकी मेंटल हेल्थ को ठीक करने का सलूशन देने वाले हैं इसीलिए अगर आप अभी यंग हो तो आपके लिए एक सवाल है लेकिन आपको एकदम सच-सच जवाब देना है जब आप अपने फ्यूचर के बारे में सोचते हो तो आप कैसा फील करते हो सोचकर अच्छा लगता है कि हां आने वाला फ्यूचर अच्छा होगा आपके सारे सपने सच होंगे खुद को एक कंफर्टेबल लाइफ जीते हुए इमेजिन करते हो अपने फ्यूचर को लेके पॉजिटिव
सोचते हो ऑप्टिमिस्टिक फील करते हो हो या फिर फ्यूचर का सोच के दिल एकदम ऐसा भारी हो जाता है एंजाइटी होने लगती है पता नहीं क्या होगा कैसा होगा और सोच के जरा भी अच्छा फील नहीं होता एंजाइटी और स्ट्रेस होने लगता है अगर यह आप हो तो दोस्त आप अकेले नहीं हो क्योंकि आज के समय में बहुत सारे लोग स्पेशली यंग लोग ऐसा ही सोचते हैं इवन एक रिसर्च के हिसाब से आज का यूथ पहले की जनरेशन के लोगों से ऑलमोस्ट डबल से भी ज्यादा डिप्रेस्ड और होपलेस निस फील करते हैं और जो सबसे
ज्यादा शौक करने वाली बात है ये लोग तीन गुना ज्यादा ऐसा फील करते हैं कि उनकी लाइफ सही नहीं है उनकी लाइफ वैसी नहीं है जैसी वह चाहते हैं यूथ के लिए लाइफ इतनी मुश्किल हो चुकी है कि उन्हें लगता है कि इससे अच्छा यही होगा कि वो म क्या आपको कभी साइडल थॉट आया है या ऐसा मोमेंट जब आपको लगा हो कि इससे बढ़िया तो मैं पैदा ही नहीं हुआ होता बात बहुत सीरियस है हम सब कितना ज्यादा सेल्फ हेल्प कंटेंट कंज्यूम करते हैं हमारे पास दुनिया के बेस्ट ऑफ द बेस्ट माइंड्स का एक्सेस
है इतना सब कुछ हमारी हेल्प करने के लिए है और हम इन सबकी हेल्प लेते भी हैं मगर इतना एक्सेस होने के बाद भी हमारी मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम्स क्यों बढ़ती जा रही हैं एंजाइटी डिप्रेशन ओवरथिंकिंग स्ट्रेस लो सेल्फ एस्टीम ये सब हमें अंदर से खाए जा रहा है इन सबके विदाउट थेरेपी प्रैक्टिकल सलूशन जानने से पहले ये समझते हैं कि इन सभी प्रॉब्लम्स की आखिर जड़ क्या है पार्ट वन द रियल प्रॉब्लम आज का जो यूथ है वो बहुत ज्यादा सेल्फ कॉन्शियस हो चुका है वो अपनी मेंटल हेल्थ को इतनी प्रायोरिटी देता है वो कैसे
दिख रहे हैं कैसे बोल रहे हैं किन लोगों से बात करते हैं वो सब कुछ सोच समझ कर करते हैं उनके लिए लोग टॉक्सिक और ग्रीन फ्लैग के दो एक्सट्रीम्स में डिवाइड हो चुके हैं ग्रीन फ्लैग वाले लोग उन्हें मिलते हैं बाकी बचे सभी उनके लिए टॉक्सिक हैं ऑनलाइन हजारों लोगों से कनेक्टेड होने के बाद भी रियलिटी में व अपना ज्यादातर टाइम अकेले रहने में बिताते हैं क्योंकि लोगों से उनकी वाइब मैच नहीं हो पाती ऐसे लोग ना अपॉलॉजी में बिलीव नहीं करते अगर किसी ने कोई गलती कर दी रिलेशनशिप में कोई छोटी-मोटी लड़ाई हो
गई किसी ने कुछ कह दिया तो सीधा रिश्ता खत्म बाय-बाय टाटा एंड ब्लॉक्ड वो काम भी सिर्फ तभी करते हैं जब उनका मेंटल स्टेट उन्हें सही लगता है और फिर अगर मन हो तो उस काम में अपनी पूरी जान भी लगा देते हैं लेकिन जब उनका काम करने का मन नहीं करता तो फिर चाहे जो भी हो जाए वो उस काम को नहीं करते क्यों क्योंकि कहीं उनका मेंटल पीस और मेंटल हेल्थ डिस्टर्ब ना हो जाए एक टाइम था जब बच्चों के मां-बाप उन्हें दूसरे बच्चों से कंपेयर करके उनकी सेल्फ एस्टीम और कॉन्फिडेंस लो करते
थे अब मां-बाप को यह काम करने की जरूरत ही नहीं है बच्चे खुद ही सोशल मीडिया पर दिन भर खुद को दूसरों से कंपेयर कर कर के अपनी सेल्फ वर्थ गिराते जा रहे हैं दूसरों की डिग्रीज उनके लुक्स उनका पैसा उनकी सोशल स्किल्स उनके कपड़े जूते सब कुछ उन्हें ये याद कराते हैं कि उनके पास क्या नहीं है जो अंदर ही अंदर उनकी सेल्फ वर्थ गिराता जाता है और इन सब को लेकर अगर वह जरा भी एंसिस या डिप्रेस्ड फील करते हैं तो यह उन्हें अपने सोशल सर्किल में कूल इंटेलेक्चुअल या तगड़ा वाला इंट्रोवर्ट दिखाता
है ऐसा वो समझते हैं डिप्रेशन और एंजाइटी को ना एक तरह से रोमांटिसाइज करना शुरू कर दिया है आजकल की मूवीज और पॉप कल्चर को देख के फेमस लोग और इन्फ्लुएंस के मेंटल हेल्थ को देखकर लोग अनस्टेबल मेंटल हेल्थ को बहुत रोमांटिसाइज कर रहे हैं इसे ऐसे ट्रीट करा जाता है जैसे डिप्रेशन एंजाइटी ये सब बहुत कूल इंटेलेक्चुअल डीप थिंकर और इंट्रोवर्ट लोगों को होती है लोग अपने ग्रुप में कैजुअली ऐसे बोलते हैं आई एम फीलिंग डिप्रेस्ड जिससे यह सुनकर बाकी के लोग उन्हें कंसोल करने लगते हैं और उनके सारे बिहेवियर जस्टिफाइड हो जाते हैं
काम नहीं करना क्योंकि आई एम फीलिंग डिप्रेस्ड आई एम फीलिंग लो खाना नहीं खाना क्योंकि आई एम नॉट फीलिंग वेल किसी से बात नहीं करनी क्योंकि आई एम इंट्रोवर्ट और डिप्रेशन से बचने के लिए उन्हें चाहिए सीधा थेरेपी और ये थेरेपी आज इतनी ज्यादा कॉमन हो चुकी है जैसे कोई अपने खांसी जुकाम की दवाई लेना हो पर ये सब हो क्यों रहा है पार्ट टू द रियल कॉसेस 2012 के आसपास इंडिया में स्मार्टफोंस का ट्रेंड तेजी से बढ़ने लगा था धीरे-धीरे ये हर किसी के हाथ में नजर आने लगे चाहे वो स्कूल का स्टूडेंट हो
या एक वर्किंग प्रोफेशनल बच्चे जो पहले अपना वक्त दोस्तों के साथ खेलने बात करने और रियल लाइफ एक्टिविटीज में लगाते थे वो अब ज्यादातर अपने फोन पे बिताने लगे सोशल मीडिया और इंटरनेट उनके लिए रियल लाइफ इंटरेक्शन से ज्यादा इंपॉर्टेंट बन गए पहले जो बातें प्लेग्राउंड या स्कूल की कैंटीन में फेस टू फेस होती थी वो अब और इसके चलते उनका इमोशनल सपोर्ट सिस्टम धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा जो दोस्ती पहले स्ट्रांग थी अब वो सिर्फ ऑनलाइन स्टेटस और स्टोरी अपडेट्स और लाइक्स तक सीमित हो गई रात को देर तक फोन यूज करना उनकी नींद को
डिस्टर्ब करने लगा जो उनके ओवरऑल मेंटल हेल्थ पे बुरा असर डाल रहा था लेकिन ये सिर्फ शुरुआत थी स्मार्टफोंस के अलावा भी और फैक्टर्स हैं जो आज के यूथ की मेंटल हेल्थ को बिगाड़ने में बड़ा रोल प्ले कर रहे हैं आज के फास्ट पस्ड वर्ल्ड में फैमिली टाइम बहुत कम हो गया है पहले पेरेंट्स अपने बच्चों के साथ ज्यादा वक्त बिताते थे उनकी बातें सुनते थे उन्हें गाइड करते थे लेकिन आजकल बिजी लाइफ स्टाइल्स और डुअल इनकम फैमिलीज के कारण पेरेंट्स के पास अपने बच्चों के लिए वक्त कम होता जा रहा है इसके चलते बच्चे
अपनी प्रॉब्लम्स और इनसिक्योरिटीज शेयर नहीं कर पाते जो उन्हें इमोशनली आइसोलेट कर रहा है ये इमोशनल डिस्कनेक्ट उनके मेंटल हेल्थ पे बहुत बुरा असर डाल रहा है क्योंकि उन्हें अपनी फीलिंग्लेस तरफ सोसाइटल प्रेशर और कंपटीशन भी आजकल इतना इंटेंस हो गया है कि यंगस्टर्स हर वक्त अपने आप को दूसरों से कंपेयर करते रहते हैं सोशल मी इंडिया पर देखा जाने वाला कांस्टेंट कंपैरिजन सक्सेस और परफेक्शन के अनरियलिस्टिक स्टैंडर्ड्स उनके स्ट्रेस एंजाइटी और ओवरथिंकिंग को और भी बढ़ा देता है हर तरफ से आने वाली एक्सपेक्टशंस और प्रेशर से डील करना मुश्किल होता जा रहा है आज
के यूथ का इमोशनल कंट्रोल भी खत्म हो चुका है इंस्टेंट ग्रेटफोर रेजिल को बहुत कमजोर कर दिया है जब भी उन्हें कोई प्रॉब्लम फेस होती है उनका पहला इंस्टिंक्ट होता है एस्केप करना या फिर उस सिचुएशन को अवॉइड करना इंस्टेड ऑफ फेसिंग एंड सॉल्विंग इट इसका रिजल्ट ये होता होता है कि छोटी-छोटी प्रॉब्लम्स भी उनके लिए ओवर वेल्मिनिक डाउन करने लगते हैं रिलेशनशिप डायनामिक्स भी बदल गए हैं पहले रिलेशनशिप्स डीपर इमोशनल कनेक्शंस पर बेस्ड होती थी लेकिन अब वो ज्यादा सुपरफिशियल हो गई हैं लोग बस अपने काम से काम रखते हैं और एक सेल्फ सेंटर्ड
लाइफ जीना पसंद करते हैं जैसी वेस्ट में जी जाती है इन सब फैक्टर्स के मिलने से आज की जनरेशन की मेंटल हेल्थ पे बहुत बुरा असर पड़ रहा है स्मार्टफोन शायद शुरुआत थे लेकिन अब ये सिर्फ एक रीजन नहीं है हम अब एक ऐसे वर्ल्ड में जी रहे हैं जहां सब कुछ क और डिस्कनेक्टेड लगता है और ये सब हमारे बिलीव्स और नैरेटिव को धीरे-धीरे कमजोर कर रहा है पहले के टाइम में एक स्ट्रांग कम्युनिटी और फैमिली सपोर्ट सिस्टम होता था लेकिन आज की दुनिया में यह सपोर्ट सिस्टम वकन हो गया है जिससे यूथ अपने
आप को ज्यादा लोनली स्ट्रेस्ड और इमोशनली वल्नरेबल फील करने लगे हैं हम लोग एक ऐसे वर्ल्ड में जी रहे हैं जिसे फिलोसोफर हाइपर रियलिटी कहते हैं जहां सब कुछ कैटिक और डिस्कनेक्टेड लगता है अब हम पहले से ज्यादा फ्री तो है लेकिन साथ ही साथ ज्यादा लोनली और कन्फ्यूज्ड भी ऐसा लगता है जैसे हमें एक खुले मैदान में छोड़ दिया गया हो जहां हम डायरेक्शन लेस फील करते हैं फ्रीडम बिना किसी ऑर्डर के केस बन गई है हमारे पास दुनिया भर के ऑप्शंस हैं लेकिन फिर भी हम खुद को लॉस्ट फील करते हैं बट अब
करें तो क्या करें ऐसे तो नहीं चल सकता हमें बाकियों से अलग बनके इसे चेंज करना होगा वेल इसका ये सलूशन है पार्ट थ्री द सॉल्यूशन देखो आजकल लोग खुद ही खुद के डॉक्टर बने हुए हैं बिना कोई टेस्ट करवाए बिना किसी प्रोफेशनल से कंसल्ट करे हर दूसरा पर्सन खुद ही कह रहा है कि मुझे डिप्रेशन है मुझे एंजाइटी है मैं बहुत ही ज्यादा इंट्रोवर्ट हूं मुझे समझना आसान नहीं है तो सबसे पहली चीज है कि अगर इन केस आप भी अपने आप को खुद ही टैक्स देते हो तो जरा इन सब चीजों के ऊपर
उठके सोचो एक बार खुद से पूछो कि क्या मुझे सच में डिप्रेशन है या मेरी लाइफस्टाइल डेली रूटीन और हैबिट्स ही ऐसी है जो मुझे डिप्रेस्ड या एंसिस फील करवाती हैं क्या मैं उन्हें ठीक करके बैटर फील कर सकता हूं क्या मैं ओवरथिंकिंग नाना करके अपनी लाइफ को सिंपल बना सकता हूं या फिर नॉट फीलिंग वेल एंजाइटी और डिप्रेशन को मैंने अपना एक इजी बहाना बना लिया है अपने आलस का अच्छा आपकी सिर्फ हैबिट्स कितना बड़ा रोल प्ले करती हैं वो इस स्टडी में साफ शो होता है एक्चुअली कुछ महीने पहले एक बहुत बड़ी स्टडी
पब्लिश हुई जिसमें रिसर्चस ने 97 स्टडीज के डाटा को एनालाइज किया इस स्टडी में 120000 से भी ज्यादा लोगों के डाटा को एनालाइज किया गया और पता है उन्होंने क्या पाया फिजिकल एक्टिविटी यानी एक्सरसाइज डिप्रेशन की ट्रीटमेंट में 50 पर ज्यादा इफेक्टिव है कंपेयर टू ट्रेडिशनल थेरेपी और मेडिकेशन अब हम ये नहीं कह रहे कि थेरेपी या मेडिकेशन काम नहीं करते वो अपनी जगह इफेक्टिव है लेकिन अगर एक ऐसा सलूशन है जो फ्री है और अब रिसर्च कहती है कि ये 50 पर ज्यादा इफेक्टिव है तो ये वो पहली चीज होनी चाहिए जो आपको करनी
चाहिए एक्सरसाइज करना अपनी बॉडी को मूव करना ये सब आपके मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम्स के अगेंस्ट बहुत पावरफुल तरीके से काम करता है इसके अलावा एक जो परमानेंट सलूशन है जो आपकी सारी मेंटल हेल्थ को जड़ से खत्म कर सकता है वो एशियंट ग्रीक फिलोसोफर एपिक टेटस की इस बात में छुपाए हैप्पीनेस और फ्रीडम शुरू होती है एक प्रिंसिपल के साथ कुछ चीजें हमारे कंट्रोल में होती हैं और कुछ चीजें नहीं ये प्रिंसिपल समझना बहुत जरूरी है हमारी लाइफ में कितने इतनी ही ऐसी चीजें होती हैं जो हमारे कंट्रोल के बाहर होती हैं लोगों का बिहेवियर
सिचुएशंस आउटकम्स और बाकी सब कुछ जो हमारे हाथ में नहीं है अगर हम इन चीजों को लेकर कांस्टेंटली स्ट्रेस या एंजाइटी में रहते हैं तो हम अपनी मेंटल पीस खुद खत्म कर रहे हैं लेकिन अगर हम सिर्फ उन चीजों पर फोकस करें जो हमारे कंट्रोल में है जैसे हमारे एक्शंस हमारे थॉट्स और हमारे रिएक्शंस तो हम अपनी लाइफ में ज्यादा पीस और कंटेंटमेंट फील करेंगे एक और बहुत जरूरी बात है स्टॉय जम फिलोसोफी से जिसमें कहा गया है प्री मेडिट यो मलोर यानी बैड थिंग्स विल हैपन इसका मतलब ये नहीं है कि हम नेगेटिव सोच
रखें बल्कि यह है कि हम अपने आप को हर सिचुएशन के लिए मेंटली प्रिपेयर करें जब हम अपने माइंड को यह तसल्ली दे देते हैं कि कुछ भी बुरा हो सकता है और हम उससे डील करने के लिए तैयार हैं तो एंजाइटी या डर अपने आप कम होने लगता है यह अप्रोच हमारी मेंटल रेजिल को बढ़ाता है और हमें अनप्रिडिक्टेबल सिचुएशन से लड़ने के लिए तैयार करता है इस केटक वर्ल्ड को हम कंट्रोल नहीं कर सकते लेकिन अपने रिस्पांस और रिएक्शन को जरूर कंट्रोल कर सकते हैं इसमें हमारी फिजिकल हेल्थ रिलेशनशिप्स और पर्सनल ग्रोथ शामिल
है जब हम उन चीजों को कंट्रोल करते हैं जो हम कर सकते हैं और जो नहीं कंट्रोल कर सकते उन्हें एक्सेप्ट कर लेते हैं तो हम मीनिंग ढूंढने लगते हैं चाहे लाइफ कितनी भी एब्सर्ड क्यों ना लगे लाइफ शॉर्ट है और चाहे लाइफ कितनी भी मीनिंग लेस लगती हो अभी के लिए इसमें मीनिंग है तो आज से आप अपनी एक अलग कहानी लिखो और एक बात याद रखो अगर खुद बोलते हो कि आपको डिप्रेशन या एंजाइटी है तो इसका मतलब आपको सिर्फ ऐसा लगता है ये सच और फैक्ट तभी साबित होगा जब कोई डॉक्टर आपको
बोलेगा कि हां आपको सच में डिप्रेशन या एंजाइटी है थैंक यू अपना ख्याल रखो और एक ही मेरी लाइफ को अच्छे से जियो तो अगर आपको ये वीडियो अच्छी लगी तो वीडियो को लाइक और चैनल को सब्सक्राइब करके हमें सपोर्ट करो और बेल नोटिफिकेशन ऑन कर लीजिएगा ताकि आप आने वाली वीडियोस मिस ना कर पाओ थैंक यू फॉर वाचिंग