[संगीत] [हंसी] [संगीत] एडवोकेट प्रदीप कुमार जी हाई कोर्ट से महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी घर में अकेले होने के कारण सारी जिम्मेदारी है और ग्रस्त में मन नहीं लगता मन भगवत भक्ति में लगा रहा है घर में अकेले हो फिर गृहस्थ कौन-कौन है माता पिता प्रति तो मन लगाना ही पड़ेगा मात्र देव भ पितृ देव भ साक्षात भगवान है ऐसी भावना से उनकी सेवा में रत रहो जब तक माता पिता है तब तक बाहर कदम मत रखना व मेहनत करो या जो संपत्ति है उसके द्वारा माता-पिता को उनकी गति हो
जाए फ जैसा आपको मन भावे वैसा कीजिए फिर आप ब्या तो किए नहीं पति पत्नी बच्चे पति पत्नी है महाराज बच्चे आप कह रहे हो अकेले कमाने वाले अकेले घरदारी अकेले कमाने वाले तो दुनिया में बहुत अके प्रश्न अकेले कमाने वाले सब अकेले माता-पिता की सेवा और अब जो संतान है उसकी ब्याह परर तक बिल्कुल आपकी जिम्मेवारी है भगवान सबका भरण पोषण करते हैं आप जो कमा पा रहे हैं उससे कुछ लोग ऐसे हैं जो नहीं कमा प े उनके भी परिवार का भरण पोषण होता है अपनी अपनी भाग्य और स्थिति के अनुसार सबको भगवान
दे रहे हैं हां हमारी आवश्यकताएं बढ़ती चली जा रही है वह बात अलग है लेकिन ऐसा कोई नहीं है जिसको उसके कारण कर्म और भाग्य के अनुसार भगवान ना देते हो सबका भरण पोषण कर रहे हैं मलो जिनके परिवार में एक मुखिया व पधार गया तो क्या परिवार नष्ट थोड़ी हो जाता है भगवान उनका भी पालन पोषण अनंत ब्रह्मांड का वरण पोषण करते हैं नाम जप करो अपने कर्तव्य का पालन करो देखो हमारा मनुष्य जन्म हुआ कर्तव्य पालन के लिए भागने के लिए नहीं हुआ कहीं अब जैसे कोई नहीं है या बचपन से वैराग्य है
वो बातें अलग है कि अब जब रास्ता ही कोई नहीं तो निवृत्ति मार्ग में चल रहे या बचपन से ब जैसे अपने लोग हैं अब पूर्व जन्म का हमारा संस्कार था कि बचपन से भगवत मार्ग में चल पड़े तो अब ये सेवा दी आना तो संसार में ही पड़ा ना सेवा तो यही हो रही देखो सेवा नहीं हो रही आप लोगों से वार्ता कर रहे हैं भगवान के नाम भगवान की महिमा असत चरणों से हटाने की वार्ता तो वो जो हमारा भजन हमारा साधन हमारे ऊपर जो भगवान की कृपा हुई वो सब बांट रहे हैं
तो अपने कर्तव्य का पालन हमको भी करना पड़ रहा है तो आप भी अपने कर्तव्य का पालन करें कि नाम जप करें और पुत्र को जैसे आपको माता-पिता ने सयाना किया ऐसे सयाना करके जब उसका पानी ग्रहण करा दे और अपनी संपत्ति उसको दे दे अब स्वतंत्र हो रहे हैं फिर भजन की बात कि भाई हम तीर्थ आटन या धाम तब तक नाम जप करें अपने कर्तव्य का पालन करें कर्तव्य सबसे बड़ी पूजा है अगर कर्तव्य छोड़ दे तो ठीक बात नहीं फिर वह भजन अधूरा माना जाता है वो ठीक नहीं होता माता-पिता की सेवा
करो बच्चों को पढ़ाओ लिखा उनका ब्याह करो और अपनी सीमा के अनुसार भगवान ने हमें जैसा बनाया है जितना सामर्थ्य दी उसके अनुसार हमें सब सोचना चाहिए बहुत लंबी सोचने से फिर बहुत परेशानी हो जाती है जिसे अंग्रेजी में कहते हैं ना ओवरथिंकिंग यह जितने परेशान है सब ओवर थिंकिंग में परेशान है व्यर्थ का चिंतन व्यर्थ की हम ऐसे ऐसे बम परेशान है देहाती भाषा में कहते हैं उतना पैर पसारिए जितनी लंबी चादर बड़े सुखी रहोगे अगर संतान को करोड़ों का सुख भोगना है ना तो वैसे विवेकवानी है ना तो तुम करोड़ों जमा करके चले
जाओ वो नष्ट कर देगा धैर्य पूर्वक ग्रहस्ती में रह चाहिए दुख सुख के थपेड़े आते रहते हैं नाम जप करे मेहनत से कमाए धर्म पूर्वक चले तो उसका परिवार सुखी प्रसन्न और उन्नति शल होगा आगे पक्का और जो बेईमानी घूस अधर्म पापा आचरण तो चाहे जितना इकट्ठा कर लो रुपया अंतिम में बर्बाद हो जाएगा पूरा परिवार बर्बाद होगा यह लिख लो ये धर्म स्वयं आनंद स्वरूप है और अधर्म स्वयं अशांति और क्लेश स्वरूप है तो अधर्म का आया हुआ धन धर्म से किया हुआ पापा आचरण वो आपको दुख और अशांति ही देगा तो इतना ना
सोच करो कि अकेले कमाने वाले हैं हमें लगता है ऐसे करोड़ों लोग होंगे जो अकेले कमाने वाले कमाने वाला अकेला ही होता है खाने वाले 10 पाच जरूर हो जाते हैं तो इसमें चिंता ना करो अकेले ही भगवान ने सृष्टि रची है केई दो सरयाल उन्हीं के तुम भी अंश हो भगवान ही के तो अंश हो चिंता मत करो हां ये जरूर है कि दुख सुख का ऐसा खेल होता है बड़े-बड़े उसमें चिंतित होने लगते हैं देखो सुदामा जी भगवान के मित्र हैं पर कई कई दिन भोजन नहीं मिलता पर एक दिन परिणाम आया कि
जैसे द्वारिका पुरी वैसी सुदामा पूरी बनी तो हमें धैर्य से चलना चाहिए जैसे दिन नहीं टिकेगा रात आएगी तो रात भी नहीं टिकेगी दिन आएगा ऐसे दुख सुख का चक्र चल रहा है कोई सदैव सुखी रहा हो ये भगवान के घर में सुख नहीं रहा जहां भगवान अवतरित हुए आप देख लो महाराज दशरथ चक्रवर्ती सम्राट भगवान जहां नौ किशोर अवस्था को प्राप्त हो रहे हैं महाराज फूले नहीं समा रहे दशरथ जी अब ब्याह होकर आ गया जनक नंदिनी जानकी जी से अब तो क्या सियाराम की जोड़ी पूरी अयोध्या को आनंद दे महाराज के मन में
आया कल प्रातः कालीन राज्या राज्याभिषेक राम जी का अयोध्या निहाल हो जाएगी हे बदल गया चक्र रात्रि के चक्र बदल गया 14 वर्ष का भगवान को बनवास दशरथ जी का प्राण त्यागना कौशल्या मैया आदि का वैधव्य अयोध्या का 14 वर्ष के लिए महान विपत्ति दुख कि ऐसे भगवान से दूर रहकर उनके विरह में व्यतीत करना पड़ा अयोध्या वासियों को 14 व अब आप देखो जहां भगवान अवतरित हो रहे वहां एक जैसा नहीं रहा वहां दुख की क्या बात है सुख ही सुख होला पर आप देखो कितना अयोध्या में दुख मचा जी के तो प्राण छूट
गए सौभाग्य उजड़ गया कौशल्या मैया सुमित्रा मैया का अब इधर देखो जब कृष्ण जी अवतरित हो रहे तो कंस के कारागार में मैया और बाप है देवकी और वसुदेव जी ले कंस के कारागार में भगवान अवतरित हो रहे रात्रि के अंधेरे में गोकुल छोड़ने जा रहे हैं सोचो अपना लाड़ला भगवान जैसा पुत्र हो और वो भी तुरंत छोड़ना पड़े कैसा मतलब दुख तो देखो यहां संसार में भगवान जब अवतरित हुए तो लीला करके दिखाया तो हम लोग तो जीव है वह तो ईश्वर है वो तो भगवान है तो हमको भी धैर्य रखना चाहिए कभी दुख
कभी सुख कभी गरीबी कभी अमीरी यह तो लहरे हैं संसार समुद्र की लहरे हैं आती रहती धैर्यवान बने गंभीरता पूर्वक दुख सुख को सहते हुए भगवान का नाम जप करते हुए अपने कर्तव्य को पूजा मानकर करता रहे जितना भगवान दिए उसके अनुसार चलता है क्यों मजबूत बनो हा अकेले नहीं भगवान तुम्हारे साथ है ऐसा सोचो ना भगवान सबके साथ है बिल्कुल भगवान का सहारा लेकर संसार में चला जाता है टर मल जी कर्नाटक से राधे राधे गुरुदेव आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम गुरुदेव हमने जो गुरु बनाए थे वे दे लोग जा चुके हैं उनके
द्वारा हमें कोई भी गुरु मंत्र प्राप्त नहीं हुआ था मैं गुरु किस बात अगर गुरु मंत्र ने प्राप्त हुआ तो गुरु किस बात प गुरु ने किया था क्या कान में बो बत अभी तक याद नहीं है मुझे अभी क्या बोला कोई [हंसी] ही बो बोला ये तो बहुत आश्चर्य की बात पहली बार हमने ऐसा आश्चर्य सुना मंत्र पढ़ो करके य बोला नहीं मेरे को इसीलिए मैं उन शिवजी की आराधना को ओ नम शिवाय उन्हे बोला था शिव को भी जल चढ़ते शिवजी को पूजा करते रहो कोई मंत्र करके स उसके मैं इतना बर्ष से
चल रहा हूं फिर उसके बाद में अभी आपका ये सत्संग सुनन हमारा बेटा उसम आयाम सदाशिव सदाशिव य कहा मैं ये कर रहा हूं अभी मुझे सही मार्गदर्शन नहीं मिल रहा है मुझे क्या जाप करना चाहिए और पहली बात तो आज के बाद ये जो पंचाक्षरी मंत्र उच्चारण किया ना अब इसको बाहर ना उच्चारण करना ठीक है आज से इसको गुरु मंत्र मान पंचाक्षरी मंत्र को समझ गए ना पंचाक्षरी मंत्र अब ना बोलना और इसको अंदर से जपो आप मंत्र को और जब अपवित्र हो शरीर अपवित्र है तब शम सदाशिव और जब पवित्र हो तो
जो मंत्र बोले ना यही गुरु मंत्र पंचाक्षरी मंत्र जो बोले ना अब इसे बोलना नहीं कभी अब अंदर जपते रहना आज से फिर आप इसका लाभ देखना गुरुमंत्र को बोला नहीं जाता तो अब मान लो कि ये गुरुमंत्र दे दिया तो आप इसको जपो जल चढ़ाओ अंदर ही अंदर बोलो अब मुंह से मत बोलना मुह से बोलना साम सदाशिव साम सदाशिव साम सदाशिव और यह जिसमें प्रणो लगता है और नमः लगता है यह वैदिक मंत्र कभी उच्चारण नहीं किए जाते ये आज जो नहीं समझ रहे हैं उनका कीर्तन करवाते हैं उनको अब तो यंत्रों में
मंत्रों का सब नहीं भरा रहता तो यह सब बहुत कलयुग में हानिकारक है य नहीं समझते हैं पहले जानते हो ये गुरु मंत्र कैसे दिए जाते थे घंटा शंख बजा के कपड़ा उठा के फिर की कोई जान भी ना पावे तो अभ ये मंत्र बोलना नहीं इसको अंदर-अंदर जपना शंकर जी की जैसी आराधना कर रहे हो वैसे ही करना और नाम जब शम सदाशिव करना ठीक है ना और गुरु अपने उन्हीं को मानो जो गुरुदेव भगवान तुम्हारे ना गुरु एक ही होता है उनके रूप बहुत हो सकते हैं तो रूप वही गुरु का मानो और
भावना कर लो कि इधर आकर के गुरुदेव मुझे बोले गुरुदेव वही है उन्हीं की पूजा करो उन्हीं का भाव करो भाव ऐसा कर लो कि गुरु यहां से बैठ के बोल रहे अखंड मंडला काम व्याप्त में चरा चरम चराचर में वही भगवान गुरुदेव व्याप्त है तो वही आपको मार्ग दे रहे हैं आगे आगे बढ़ने के लिए यही पर्याप्त पर अब उच्चारण मत करना गुरु मंत्र को गुप्त रखा जाता है जिस दिन से मिला उसी दिन से उसे स्वीकार कर ले भाव से वही गुरुदेव भगवान है तुम्हारे और गुरुदेव शरीर छोड़ सकते हैं लेकिन आपको नहीं
छोड़ सकते वह आपका कल्याण करके ही छोड़ेंगे गुरु तत्व होता है नहीं जो तुम्हारे अंदर भी बैठा हुआ है अखंड मंडलाकारं व्याप्तम चराचर तत् पदम दर्शित तस्मै श्री गुरुवे नमः अखंड मंडला काम तो तुम्हारे हृदय में भी बैठे अब खूब नाम जप करो मंत्र जप करो और शिव जी को जल चढ़ाओ उनकी आराधना करो थोड़ी देर रामायण सुना दिया करो शिव जी को सुनाते हो हा हां बहुत हा हां बहुत बहुत सुंदर बहुत बिल्कुल ठीक हैर में लगता नहीं सब हो ग भगवान की कपा से सबन एक हमारी प्रार्थना य मान लो कि कई बार
भागने की जरूरत अब नहीं है अगर कहीं भाग के जाते हो तो अब वृद्धावस्था है और सच्चा संत मिलना सच्चा मार्ग मिलना बहुत कठिन है आप ये समझ लो हा पाखंड की बाजार हा तो इसलिए घर में रहो आराधना करो भगवान सर्वत्र है तो घर में भी तो है कभी-कभी मनावे तो तीर्थ आटन कर लो अपने परिवार के बच्चों को साथ लेकर काशी है वृंदावन है अयोध्या है ऐसे दर्शन कर बकाया घर में रहो अब समय नहीं रह गया कि चौथा पन में विरक्त होकर कहां जाओगे हे सच्चाई की बात समझो घर में भजन करना
इस समय बहुत ही अच्छा है क्योंकि किसी का दान पुण्य नहीं लेना किसी का प्रणाम नमस्कार नहीं लेना किसी से मांगने की जरूरत नहीं अपना कमाया है बच्चे हैं धर्म पूर्वक खाओ और भजन करो बाहर भागने की जरूरत नहीं है नहीं तो बाहर भागने पर जितना भजन होता है वो र क्षीण हो सकता है बढ़ नहीं सकता अब समय नहीं रहगा कहां रहोगे आप समझो कहे कहां रहोगे और आज अगर ऐसी व्यवस्था में ना रहो तो लाठी खाओगे देखो ना साधु को घेर कर मार डाला वो कहा हां वोने वहां सुना था कि ऐसे अ
भैया आज समय नहीं अपने घर में रहो बाल बच्चों के बीच में रहो यह सब भगवान की फुलवारी है जो कमाया है धर्म पूर्वक उसी से खाओ और वहीं जीवन व्यतीत करो कहीं भागने की जरूरत नहीं साल छ महीना में कभी कोई तीर्थ याना दर्शन करया शम सदा शिव घर बैठे भगवान की प्राप्ति घर बैठे खूब नाम जप करो जहां नाम सुन करोगे वही भगवान आ जाते हैं वहीं भगवान मद भक्ता यत्र गायत्री त तिष्ठ मनार जहां मेरे भक्त गायन करते वहां मैं पहुंच जाता हूं जी अविनाश त्रिपाठी जी महाराज जी आपके चरणों में नवत
प्रणाम महाराज जीय के माध्यम से पिछले डेढ़ वर्ष से आपका एकांतिक वार्तालाप संकीर्तन सुन रहा हूं और जीवन में बलपूर्वक उतारने का प्रयास करता हूं ज्यादातर हार ही जाता हूं देख क्या है अब यहां थोड़ा समझना है बलपूर्वक उतारने का जो है उसमें अहंकार है अहंकार से अध्यात्म चला ही नहीं जाता अहंकार वि मूढ़ आत्मा करता हमति मनते मैंने ऐसा किया मैं ऐसा कर रहा हूं मैं ऐसा कर लूंगा अध्यात्म में नहीं हो सकता जितना होगा सब प्रकृति जन्य होगा अध्यात्म में नहीं होता अध्यात्म में तो अहंकार शून्य मार्ग है जब तक अहंकार तब तक
मड़ता जब तक मोड़ता है तब तक अध्यात्म में तो प्रवेश है नहीं तो शबद बदलो भगवान की कृपा बल से जैसा उन्होंने हम पर कृपा की हम उसको धारण करने की चेष्टा कर रहे हैं भगवान की कृपा बल से हो सकता है आपका भाव बढ़िया हो लेकिन शब्द गलत हो गए बल पूर्वक व अहम करता मिति मनते मैंने किया मैं कर रहा हूं मैं ऐसा करूंगा अहंकार विमु आत्मा अज्ञानी अहंकारी तो वो अध्यात्म में प्रवेश नहीं होता हो सकता है आपके भाव बहुत निर्मल हो शब्दों का ज्ञान ना होने के कारण शब्द में त्रुटि हो
गई हो तो आगे से जितने सत्संगी हैं शब्द का सुधार करो पहले वाणी पवित्र आचरण पवित्र मन पवित्र वाणी पवित्र कोई भी वाणी का शब्द का अहंकार से संबंध नहीं होना चाहिए जैसे जब से सत्संग सुना तब से आचरण में उतारने की जो लालसा हुई वो भगवान की कृपा से आप संतों की कृपा से जितना हमें बल मिला उतना आगे हम संपूर्णता उतार सके संपूर्ण त हम कृपा पूर्वक भगवान के मार्ग में चल सक ऐसे मतलब अब क्योंकि शब्दों का ज्ञान तो अलग है ना भाव हो सकता है आपका शुद्ध हो और भगवान भाव देखते
हैं पर अब यहां आपकी बात और हमारी बात को लाखों लोग सुनेंगे उसका सुधार हो शब्दों का इसलिए टोका यद्यपि आपका भाव अच्छा है क्योंकि आप के शब्द से हमें कड़वाहट नहीं महसूस हुई शब्द तो वो बल अभिमान शब्द से जुड़ता है पर एक होता है कि जैसे भावुक होता है और शब्द बिगड़ जाए तो स्वाद उसका नहीं बिगड़ेगा तो आपके जो शब्द हमारे कान में गए उसमें स्वाद है उसमें स्वाद रहित नहीं है इसका मतलब शब्द बिगड़ गया है लेकिन भाव सही है और जैसे कहीं कहीं भाव गलत हो शब्द संभाल के बो तो
चिड़चिड़ापन आ जाएगा फिर वो उत्तर उसका थोड़ा आक्रोश में आ जाएगा हां अब बोलो आप क्या कहना चाहते हृदय की प्रसन्नता ढूंढ रहा हूं और व्यवस्था मेरी प्रारंभिक से भी पीछे है आपने एकांतिक में कहा था कि हृदय की प्रसन्नता के लिए निर्मल मन जन सो मोहि पावा होनी चाहिए तो फिर मेरे जैसे जो अभी साधना की प्रारंभिक अवस्था में है ऐसे में निर्मल मन एक चीज इसमें इसमें समझो साधना की प्रारंभिक और साधना की पूर्णता और साधना का मध्य तीनों शरणागति है एक प्रारंभ की शरणागति और मध्य की और अंतिम शरणागति ही है अब
जैसे प्रारंभिक हम वचन से कह रहे हैं भगवान आपके हैं शरीर से हम सारी चेष्टा एं करना चाहते हैं भगवान के लिए ही उनकी आज्ञा के अनुसार गलत ना होने पावे मन से भी सोच थोड़ा सही करना चाहते हैं यह भी शरणागति है और एक है दृढ़ भाव से हमारा मन वही जो भगवान की आज्ञा हमारे आचरण वही जो भगवान की आज्ञा हमारी वाणी वही जो भगवान की आज्ञा मन वचन कर्म से भगवान का शुद्ध शरणागत फिर इसके बाद आखिरी शरणागति मैं काभी भी स्मरण हो गया मैं शरणागत हूं आप ही आप है यहां भी
आप है यहां भी आप आप ही बोल रहे हैं आप ही बुलवा रहे हैं आप ही चलवा रहे हैं आप ही सारी चीज टाक अब असली शरणागति आ गई जो मेरे वचन से बोल रहे हों मेरे भगवान बोल रहे हैं जो मेरे शरीर से आचरण हो रहा मेरे भगवान करा रहे हैं मेरे हृदय मंदिर में बैठे हुए स्वयं सब कुछ कर रहे हैं मैं हूं ही नहीं भगवान केवल भगवान जिधर देखता हूं वही अंदर बाहर वही भगवान ब यह हुई पूर्ण शरणागति अब इस कितने जन्म में होगी इसका कहा नहीं जा सकता और कितने मिनट
में हो जाएगी इसको भी नहीं कहा जा सकता तो हमें घबराने की जरूरत नहीं हमें पुकारने की जरूरत है कि हम लंबी यात्रा नहीं कर सकते आपके लंबे डग हैं जिनम हरि की शरण में उनके बड़े लंबे डग हैं हम कितने मीटर फैला सकते हैं अपना पैर जिसमें चल सके बहुत ज्यादा तो नहीं फैला फैला पाएंगे तो इतना फैला पाएंगे पर चल नहीं पाएंगे जितने हम चल सके तो थोड़ा डग है और भगवान ने जब वामन अवतार लिया एक डग फैलाया ब्रह्म लोक पहुंच गया नहीं तो हमारे लिए तो यात्रा बहुत दूरी है बहुत लंबी
समय के लिए भी है जन्म जन्म मुनि जतन कराए भगवान के लिए सेकंड की है कि नहीं है तो हम भरोसा अपनी चाल प करें कि भगवान की कृपा प कर तो अगर हम भगवान की कृपा प करें तो अभी आनंदित हो गए कि नहीं यार भगवान चाहेंगे ना तो एक सेकंड में मिल जाएंगे आके क्योंकि उनकी चाल बहुत है हमारी चाल तो कितनी चाल है हम कितना चल पाएंगे तो गोस्वामी तुलसीदास जी के भाव हैं मेरे बनाए ना बनेगी कोटि कलप लो आपके बनाए बनेगी पल पाव में पले एक बहुत छोटा समय होता है
उसके चौथाई समय में आप हमारी जीवनी बना सकते हो नाथ जिंदगी संवार दोगे प्रभु मेरे से नहीं बन पाए बड़ी लंबी यात्रा है हम बाट जोर हैं आपकी कि कब आप कृपा करोगे यही सच्ची शरणागति है हम नाम जप कर रहे हैं भगवान की कृपा का भरोसा कोई गलत आचरण नहीं कर रहे अगर कोई गलत आचरण हो रहा है तो हम रोते हैं फिर प्रभु देख लो यह मन ये इंद्रिया हमारे थांबे नहीं थम रहे सच्ची मानो जो आखिरी शरणागति की गति होगी उसकी यही होगी प्रारंभिक की वही गति होगी क्योंकि भगवान वचन की शरणागति
को स्वीकार कर लेते फिर आप तो हृदय से शरणागत हो और सच्ची बताओ यह मार्ग बहुत कठिन है ऐसे बातचीत करने में सरल लग रहा है लेकिन जब मन घसीट है भोगों की तरफ सबको ही देख लो ना तब रोक पाना बहुत कठिन है उस समय हमारा कोई बल काम नहीं करता उस समय भजन का बल भगवान का कृपा बल यह दो ही काम करते हैं अब चूंकि संसार में रत रहे तो इतना भजन बल तो है नहीं आप देख लो भाई रात दिन भजन में लगे वह बल तो है नहीं तो एक बल है
शरणागत भगवान के वचन है जो सीत आवा शरणाई रख ों ताई प्राण कि नाही अगर संसार से भयभीत होकर मेरे आगे सर झुका दिया तो मैं उसे अपने प्राणों से भी अधिक प्यार करूंगा बस हमको यह बात पकड़ लेनी है कितने बड़े पापी हम है भगवान कह रहे हैं कोट बप बद ला गए जाहु आए शरण तजो नहीं ताह करोड़ों ब्रह्म हत्या किए हो तो भी मैं उसे नहीं छोडूंगा यदि वो मेरी शरण में आ गया भगवान कह रहे हैं और एक बात कह रहे हैं जो नर होई चराचर द्रोही आवे सबे शरण तक मोही
यदि चराचर का दुश्मन हो गया हो और फिर भी मेरी शरण में आ जाए मैं उसे साधु बनाऊ तज छल कपट मोह मद माना करो सद्य तेही साधु समान करो मैं स्वयं उसे साधु बनाऊंगा गीता जी में कह रहे अप चेत सु दुराचार भजते माम अनन्य भाग साधुर सम मंतव्य सम्यक व्यव सिता हिसा महान दुराचारी रहा हो अब उसके दिमाग में आ गया कि भगवान के सिवा कोई हमारा कल्याण करने वाला नहीं कोई हमारा साथी नहीं कह रहे मैं उसे साधु बना दूंगा भगवान कह रहे भगवान को बहुत उदार स्वभाव है एक बार स्वामी अखंडानंद
जी महाराज वृंदावन के बहुत बड़े महापुरुष वो पूज्य भाई जी से हनुमान प्रसाद पोतदार जी से तो एक बार कहा भाई जी आप अपने मन की कोई पसंद की बात बता दो संत संत से मिलेंगे तो भाई जी के आंखों में आंसू आ गए और एक चौपाई गाई उमा राम स्वभाव जही जाना ताही भजन तजी भावना जिसने भगवान के स्वभाव को जान या इतने करुणामय कि घोर अपराधी को भी महान ऋषि बना दे घोर पापा आत्मा जीव को ब्रह्म ऋषि बना दे इनका इनका प्रभाव इनका स्वभाव तो जिसने स्वभाव भगवान का जाना उसे भजन छोड़कर
अच्छा नहीं लगता क्योंकि जैसे आपने प्रश्न किया कि जाना है यार कोई साथ नहीं है आखिरी बात तो यह है कि अकेले जाना है यहां से कुछ नहीं ले जाना है फिर हम प्रयोग क्यों लेकर पा रहे क्योंकि हमारा ज्ञान अभी सच्चा नहीं है क ज्ञान है सच्चा तब होगा जब केवल भगवान के भजन में चित्त जुड़ेगा तब असलियत में जब बात आ जाएगी जैसे 2000 के नोट बंद हो गए एक टाली आपको दिया जाए तो उठाओगे आप एक नोट नहीं उठाओगे एक टाली पूरे नोट डाल दिए जाए तो आपको इतनी भी खुशी नहीं होगी
क्यों असलियत में पता है कि अब ये नहीं चलेंगे नकली हो गए उस आपके लिए प्रयोग में नहीं आएंगे ना तो असलियत में जब पता चल जाएगा कि ब्रह्म सत्यम और जगन मिथ्या तो ऐसे मिथ्या आप नहीं छुओंग जैसे नकली नोट नहीं उठाओगे पर अभी हमको सच्चा ज्ञान नहीं है कहते जरूर है मिथ्या है ले पर हमको स्वाद मिथ्या में आ रहा है इसलिए व ज्ञान हमारा प्रयोग में ले आ रहा है तो इसलिए नाम जप करें और संत समागम करें और भगवान की कृपा का भरोसा रखें हमसे तो गलती हो सकती है हमसे गलती
हो सकती है पक्की स क्योंकि इतना फिसलन का मार्ग कहीं भी फिसल सकते लेकिन जैसे छोटा बच्चा अगर खेल रहा हो तो उसकी जो मां है वह बच्चा ना देख पा रहा हो कि मां देख रही कि नहीं लेकिन मां की दृष्टि बनी रहती है वह कहीं ना कहीं किसी खिड़की से झरोखे से दरवाजे से थोड़ी थड़ी दे में खेल रहा है कि नहीं खेल रहा व अपने बच्चे पर दृष्टि अच्छा मां तो एक सीमित दृष्टि वाली है सीमित शरीर वाली है सीमित बल वाली है लेकिन भगवान बल वाले वो क्या कह रहे हैं करो
सदा तिन के रखवारी जिम बालक राखे मतारी मैं अपने भक्तों की वैसे रक्षा करता हूं जैसे मां अपने बच्चे की तो मां तो सीमित शक्ति वाली भगवान असीम शक्ति वाले मां सीमित जगह है और भगवान सर्वत्र है मां अल्पज्ञ है भगवान सर्वज्ञ है जब भगवान हमारी रक्षा करे तो हमें डर किस बात का फिर हम प्रसन्न है हृदय हो जाएगा जैसे आप कहते हैं ना हृदय की प्रसन्नता जब भगवान पर भरोसा भगवान की कृपा पर भरोसा भगवान के बल का भरोसा सर्वत्र है तो मेरे पास है सब में है तो मेरे अंदर है सब समय
है तो इस समय भी मैं डरू क्यों एक आनंद आ जाएगा देखो अभी जैसे कोई पदाधिकारी अपने भारत का हो और आपका परिचय हो जाए उससे तो आप देखो आपकी छाती कैसे फूलती है व अखिल कोटि ब्रह्मांड नायक परात्पर न तुम्हारे अब तुम्हारी छाती कैसी होगी पर देखो सच्चा ज्ञान नहीं है तो कुछ नहीं समझ में आ रहा एक संसारी आदमी संसारी पद वाला आपसे हाथ मिला ले कह दे देखो ये नंबर ले तो आपकी छाती फूल जाएगी चाहे कभी नंबर ना उठावे नहीं कभी ना उठावे पर आपकी छाती फूल जाएगी और भगवान गीता जी
में कह रहे हैं अनन्य चिं तंतु माम ये जना पर उपास तेशाम नित्या युक्ता नाम योगक्षेम वाम रात दिन तुम्हारे योग क्षेम का वाहन करूंगा योग माने जो अप्राप्य है उसे प्राप्त कराऊंगा और क्षेम माने जो प्राप्त है उसकी रक्षा करूंगा केवल तुम मेरा चिंतन करो अनन्य चिंत तो मा यह नंबर लो राम राम राम राम कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरि हरि पूरी जिम्मेवारी हमारी भगवान लेकिन हमें भरोसा भगवान पर नहीं संसार पर है हमें भरोसा एक आदमी लाठी लेकर साथ चले बंदूक लेकर चले उसका जितना होगा वो सुदर्शन चक्रधारी भगवान का ल होगा आप
देख लो ना हम अकेले चल रहे हैं कोई घटना घटनी है तो भगवान जान रहे हैं भगवान सब मालिक है भगवान रक्षक है वो अगर रक्षा करेंगे तो कोई मार नहीं सकता अगर उन्होंने लाल से आई फेर दिए तो कोई बचा नहीं सकता इसलिए हमें भगवान पर जब भरोसा हो जाएगा भगवान की कृपा स्वभाव को जब हम जान जाएंगे तो हृदय हर्षित हो जाएगा आनंदित हो जाएगा हमको अपने ब अपनी साधना का भरोसा बहुत जल्दी होता है पर भगवान का बल भगवान की कृपा का भरोसा नहीं होता जिसे भरोसा हो गया वह आनंदित रहता है
पक्का समझो देखो एक होता मेहनत करके करोड़पति बनना और एक होता करोड़पति की गोद नामे में चले जाना समझ रहे हो मेहनत करके तो बहुत समय लगेगा कोई करोड़पति गोद में ले ले तो अभी सेकंड में करोड़पति हो जाओगे तो अनंत ब्रह्मा ंड के प्रभु हमें स्वीकार कर लिए और जब भगवान की आप वृत्ति में रहोगे तो माया तो अपने आप आ जाएगी माया को सबको ई भजे माधव भजे ना कोई जो माधव को भजे तो माया चेरी होए माया दासी भगवान की दासी है आप ज भगवान का भजन करोगे सब बिल्कुल विश्वास कर लो
भगवान हर समय तुम्हें देख रहे हैं कोई क्षण नहीं जिस समय तुम भगवान की दृष्टि में ना हो जब नाम जप कर रहे हो अच्छे आचरण कर रहे हो तो भगवान की कृपा से दुखों से पार हो जाओगे एक दिन ऐसी कृपा होगी निहाल हो जाओगे हमारी बात मान लो बस चुपचाप चले रहो अब जैसे चल रहे हो इस समय और आपको दुख आ रहा है तो आपको लग रहा मेरी भक्ति रंग नहीं ला रही भक्ति का क्या फल जब दुख आ रहा है भैया य पीछे की फसल है भक्ति नई फसल है अभी शुरू
किया है अब यह जब रंग लाएगी आपको सच्ची कहते लोक परलोक सब मालामाल हो जाओगे बात मान लो नाम जप करो भगवान का आश्रय ले लो भगवान की लीला कथा पढ़ो भगवान की लीला कथा सुनो संतों का संग करो संतों की भागवत भाव से सेवा करो मंगल पक्का मंगल हो जाएगा अब ये लोग थोड़ा इन बातों पर अब विश्वास कम रखते हैं क्योंकि सत्य मार्ग है बड़ा विचित्र संसार छल कपट में उसका श्रद्धा विश्वास होगा और सत शास्त्रों में नहीं होगा देखो अगर इन सब बातों से काम होता तो महाराज दशरथ जी के जंतुर बांध
देते वशिष्ठ जी नहीं बांध देते कि अब कोई विघ्न नहीं होगा राम जी का राज्य अभिषेक होगा सब चकाचक होगा नहीं सुनो भरत भावी प्रबल बिनक कहो मुनि नाथ हानि लाभ जीवन मरण जस अपजस विधि हार ये सत्य बात को समझो तभी आनंद को प्राप्त कृष्णा कुमार जी कुरुक्षेत्र से राधे राधे राधा वल्लभ शेरीन जय श्री कृष्णा महाराज जी महाराज जी भोग योनि जिस किसी भी लोक में हो चाहे ऊपर के लोग हो पृथ्वी लोक हो या निम्न लोक हो क्या उस भोग योनि में उन्हें आभास संज्ञान रहता है कि वह किस पुण्य का फल
या किस पाप का कष्ट भोग रहे हैं नहीं नहीं यह तो सिद्ध पुरुषों को होता है जो भगवान में निरंतर तन्मय है उनको य पता होता है कि मुझे जो शरीर की प्रतिकूलता या अनुकूलता दी गई है यह किस कर्म का फल है जिनको त्रिकाल ज्ञ प्राप्त हो गई है सर्वज्ञ प्राप्त हो गई नहीं तो माया का कार्य पदे से ढक देना हर बात को पर्दे में ढक देना जैसे इसी जन्म का आप देखो मां के गर्भ में नौ महीना अपने लोग रहे पर कुछ भी याद नहीं है मतलब 100 में एक परट भी याद
नहीं है जो मां के गर्भ में हम रहे कष्ट सहा उसका एक परसेंट भी याद नहीं हमें नहीं याद है ना विस्मृति के गर्त में माया डालती जाती जाए तो ऐसे ही जो इतना विस्मृति हमारे को किए हुए माया कि हमको यह अनुभव ही नहीं हो पाता कि हमारे किस कर्म का हमको य फल प्राप्त हुआ है क्योंकि कर्म पूर्व हुए हैं और फल आप मिल रहे हैं तो पूर्व वर्तमान और भविष्य त्रिकाल जता पर ही तो जानी जा सकती है हमारी अभी परसों हमने क्या खाया याद करना पड़ेगा नहीं करना पड़ेगा इतना जोर का
विस्मरण की हवा चल रही माया की कि परसों 12:00 बजे खाया कि 10 बजे खाया और क्या खाया उसके लिए थोड़ा रुकना पड़ेगा और लगानी पड़ेगी परसों के लिए लेकिन अगले शनिवार को आपने क्या खाया अब इसके लिए बहुत जांच पड़ताल करनी पड़ेगी पत्नी से घर परिवार से पूरा निर्णय निकालना पड़ेगा कि कहीं होटल में कहीं घर में कहां क्या कैसा इतना फिर पूर्व जन्म में हमारे क्या कर्म हुए और इस जन्म में मुझे उसका सुख मिल रहा है दुख य तो किसी भी को नहीं ना मनुष्य को ना पशु को ना पक्षी को किसी
को भी नहीं ये तो त्रिका लज ता जो पूर्व वर्तमान और भविष्य तीनों को जानते हैं ना जो भूत भविष्य वर्तमान उनको ये ज्ञान होता है वो त्रिका लग जो ब्रह्म प्राप्त भगवत प्राप्त महापुरुष है उनको होता है अच्छा मे तो बस प्रश्न यही था कि भोग योनि वाले में ही क्या आ मनुष्य योनि की तो बात ठीक है जी भोग योनि उसमें तो और मढ़ता होती है मनुष्य में तो विवेक होता है मनुष्य तो बुद्धि प्रधान होता है वो तो और मढ़ता है अन्य योनियों में तो और मुड़ता है तो फिर वहां तो गुंजाइश
ही नहीं है अब कोई ऐसे अज्ञानी बोले तो बात अलग है लेकिन हम आपको शास्त्रीय पद्धति से कहते हैं कि वो उनको कुछ ज्ञान नहीं है मनुष्य सबसे श्रेष्ठ योनि है क्योंकि इसमें थोड़ा ज्ञान का विकास है और वह चाहे तो पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर सकता है थोड़ा ज्ञान है कि मरना है लेकिन यह ज्ञान काम नहीं कर रहा कि हम अमृत्व कैसे प्राप्त कर ले हम अविनाशी स्वरूप में कैसे स्थित हो जाए जब मरना है तो मैं इन नीच भोगों में समय क्यों नष्ट करूं तो वो चाहे तो सच्चा ज्ञान प्राप्त कर सकता है
केवल श्रेष्ठ योनि मनुष्य है जब उसमें इतनी मढ़ता छाई हुई है कि हम दो चार 10 दिन पहले की घटना को याद करने के लिए विवस हो जाएंगे और हमें बहुत उसमें डूबना पड़ेगा तो हम फिर पूर्व के अपने कर्मों का फल जो अब मिल रहा है उसको हम नहीं जान सकते तो अन्य योनियों की तो बात ही नहीं अन्य योनियों का तो कोई सवाल ही नहीं कि वो जान जाए उनको सब ज्ञान हो क्योंकि वो सर्वज्ञ पशु थोड़ी होते हैं सर्वज्ञ तो ब्रह्म ऋषि होते हैं भगवान के स्वरूप जो वही हो सकते हैं क्योंकि
भगवान सर्वज्ञ तो यह जो सर्वज्ञ होता है संपूर्णता तो श्री भगवान में है जैसे भीष्म जी कह रहे कि यह जो मैं बाण सैया पर पड़ा हूं मैं लगभग 100 जन्म देख रहा हूं प्रभु कोई ऐसा पाप हमसे नहीं हुआ तो मतलब उनकी भी देखने की सर्वज्ञ अखंड ब्रह्मचारी भीष्म जो द्वादश भागवत में एक सीमित है पर असीम सर्वज्ञ श्री भगवान में विराजमान है श्री भगवान ने कहा और थोड़ा आगे बढ़ कर के देखो तब भगवान ने आगे की बात बताई कि आप एक नृप राजा थे और आपने एक सर्प को उठाकर कांटे वाले वृक्ष
पैसे डाल दिया और कई दिन तक तड़प कर वो कांटों में मरा भाई सर्प का अपना स्वभाव है भिक्षु का अपना स्वभाव है मच्छर का अपना स्वभाव सब जीवों का स्वभाव भगवान ने रचा है तो ऐसा थोड़ी कि सृष्टि में तुम ही रह सकते हो और जीव कोई रह नहीं सकता तो ऐसा वो जो दंड दिया उस सांप को कई दिनों में मरा उसी का परिणाम तुम बाणों की सैया में छह महीना से पड़े हो तो भीष्म जी की भी सर्वज्ञ होता एक सीमित थी जबकि ये वसु अवतार है और बड़े-बड़े देवताओं से सब शिक्षा
दीक्षा प्राप्त है भीष्म जी बड़े-बड़े महिमा सालियों से दीक्षा शिक्षा प्राप्त सब सब शिक्षाएं प्राप्त है तो ऐसे महापुरुष भी 100 जन्म को केवल देख पा रहे तो हम लोगों की तो बुद्धि इतनी मंद है कि 100 दिन पीछे नहीं देख सकते कि 100 दिन पीछे आपने क्या खाया क्या पिया वो नहीं समझ सकते तो जब हमारी बुद्धि मनुष्य श्रेष्ठ है सबसे और उसकी बुद्धि जब निर्णय नहीं कर सकती तो पशु पक्षियों की तो बात ही नहीं श्याम सुंदर जी जयपुर से राधे राधे गुरुदेव आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम गुरुदेव मैं एक निश्चेतक हूं
हमारे जो एनेस्थीसिया देते हैं ना ऑपरेशन से पहले ब और धर्म पूर्वक जीवन निर्वाह करने का प्रयास करता हूं मैं पहले डीएनसी सफाई करने वाले ऑपरेशंस में निच निश्चेतक था लेकिन आपका प्रवचन सुनकर मैंने कार्य बंद कर दिया अब मेरा प्रश्न ये है कि कुछ मा क्यों बंद कर दिया इसमें कोई पाप लगता है क्या भ्रूण की हत्या है भूण हत्या जो हो जाती है उसके बाद में उसको सफाई करके बाहर निकाला जाता है अच्छा वो उस हा वो तो नहीं नहीं वो तो बहुत सुंदर बात की आपने जो ऐसा वो तो हमने सोचा जैसे
मान लो शारीरिक कई पीड़ा हैं और उनका ऑपरेशन होना है उसमें आपको बेहोश करना है तो हां वो करना चाहिए वो बंद कर देना चाहिए जिसमें ऐसा पापा आत्मक कार्य है और वह किसी को भी नहीं करवाना चाहिए ना करना चाहिए बहुत ह हम कह रहे हैं कि आजकल बहुत डॉक्टर बुद्धिमानी सब ऐसे हैं आपको गर्व नहीं चाहिए तो आप उस हिसाब से रहिए संयम से रहिए ब्रह्मचर्य से रहिए आप मतलब ऐसे प्रयोग से रहिए जीव जब आ गया गर्भ में अब उसकी हत्या करवाना है तो बहुत बड़ा पाप है बहुत बड़ा पाप है हमें
लगता है कि उस घर में कभी सुख शांति सफलता नहीं जहां य भ्रूण हत्या गर्भ हत्या ऐसी करा आजकल माताएं बहने इस बात को समझती नहीं है कि यह हमारे वही संतान है कि जो बालक अगर आंगन में खेल रहा हो कोई एक चपत लगा दे तो माता की छाती बर्दास्त नहीं करती और तुम वही माता हो अपने गर्भस्थ शिशु की हत्या मतलब जो बिल्कुल आपके ही सहारे है चाहे व बच्ची हो चाहे बच्चा अब लोग बच्ची अगर बच्ची नहीं होगी तो बच्चा कहां से आ जाएगा अच्छा माता को तो इस पक्ष में ज्यादा रहना
चाहिए क्योंकि वो भी कभी-कभी बच्ची रही है तो गर्भस्थ शिशुओं के प्रति अच्छा जैसे कुछ लोग ये दलीले देते हैं कि कुछ अंग भंग ऐसा तो क्या अंग भंग हो जाने पर उसका गला ही काट दिया जाए मान लो हमारा जवान लड़का है एक्सीडेंट में पैर टूट गया तो उसे गोली मार देंगे तो ऐसे ही अगर गर्भस्थ शिशु कहीं थोड़ा कमी है तो उसका प्रारब्ध हमारा प्रारब्ध है आने दो उसको ऐसा नहीं है कि जो थोड़ा सा कोई अंग इधर उधर तो पता नहीं कितना बड़ा अधिकारी बन जाएगा वो भगवान कब कहां किसको उठाते तो
यह चीजें ज्ञान ना होने के कारण लोग गर्भ हत्या भ्रूण हत्या आदि कराते हमें लगता है कि यह तुम्हारे परिवार को कभी सुख शांति प्रदान नहीं करेगी हां फिर जो ऐसे लोगों के परिवार में वह कर्म आ कर के आतंक मचाता है वो सब विध्वंस कर देता है इसलिए बहुत सुंदर किया कि आपने ऐसे पाप कर्म से अपने हां अपने आप को बचा लिया सुभाष सिंह जी राधे राधे धा वल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी राधे राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि नमन प्रणाम महाराज जी जीवन नश्वर है इस बात को जानते हुए भी
मनुष्य मोह और लालसा से बाहर नहीं निकल पाता है जबकि उसे पता है कि यहां कुछ भी स्थाई नहीं है कृपया उचित मार्गदर्शन करें यह भजन की कमी के कारण हम अपनी जानकारी का प्रयोग नहीं कर पाते जानकारी तो है जानकारी तो एक साधारण ग्रामीण पुरुष को भी है क्योंकि जब शव यात्रा जाती है गांव में कहते राम नाम सत्य है सत्य बोलो मुक्ति बोलते हैं ना सब मुक्ति का लास से व बता रहे हैं राम नाम सत्य है सत्य बोलो मुक्ति है और जब स्मशान में जाते हैं वहां बैठ कर के एक दूसरे से
चर्चा करते हैं कि यार सब नाशवान है रो मत सबकी यही गति होनी है इतना ज्ञान तो काफी ज्ञान है भगवान की प्राप्ति के लिए इतना ज्ञान तो बहुत बड़ा ज्ञान हो गया ना कि सब नाशवान है सब शरीरों की अंतिम गति यही है सत्य है तो भगवान का नाम सत्य है और उसी सत्य का स्मरण करने से मुक्ति है लेकिन प्रयोग नहीं है इसलिए इस ज्ञान का प्रयोग नहीं क्योंकि भजन नहीं है अगर भजन हो जो बोल रहे हैं वही भजन करने लगे राम राम राधा राधा कृष्ण कृष्ण हरि हरि तो फिर उसके अंदर
ज्ञान बल वास्तविक आ जाए तो जैसे हम विष्ठा त्याग हैं तो क्या अभिमान होता है क्या ऐसे मलव संसार के समस्त वैभव का त्याग हो जाता अंदर से रहता उसी में जैसे विष्ठा त्याग की स्मृति भी नहीं आती ऐसे त्यागा अभिमान भी नहीं संपूर्ण भोगों का त्याग करा देना नाम के बल से नाम जब जपोगे तो उससे दो लाभ मिलते हैं एक तो प्रगट में हमें सत्संग मिलेगा जब नाम जपेंगे भगवान को पुकारेंगे तो सच्चे संतों का संग यह भगवान की कृपा से मिलता है अब मय भाव रोष हनुमंता बिनु हरि कृपा मिले नहीं संता
संतों का समागम और संसार से वैराग्य यह नाम प्रदान करता है जितना नाम जप करोगे उतने उत्तम उत्तम महात्मा स्वप्न में आकर जागृत में मिलकर आपको बल प्रदान करेंगे संतों के पास जाने से पहला परिचय कि हम संत से मिल रहे हैं हमारे हृदय में अपने दोषों के प्रति रणा होने लगना दूसरा उनके देखने से अजीब शांति अलौकिक तीसरा देखा पहली बार लेकिन लग रहा है कि हम इनसे बहुत बार मिले हैं हमें लग रहा है जैसे हमारे परिचय के हो ये क्योंकि परिचय के भगवान है ना और वह भगवान के परिचय में है तो
एक अपनापन होना चौथी बात भगवान की प्राप्ति के लिए उत्साह जागृत हो जाना संतो का सबसे बड़ा चमत्कार क्या है मन का परिवर्तन हो जाना विषय संसार मन वो भगवान में लगने लगा ये सबसे बड़ा चमत्कार तो संतों का संग मिलता है नाम जप से देखो विभीषण जी राम नाम तेही सुमिरन कीन्हा हृदय हरसी कपि सज्जन न्हा यही सन हठ करि हो पहचानी साधु ते होए ना कारज हा नाम ने ही हनुमान जी का दर्शन करवाया जब उन्हो राम राम जप रहे थे तो हनुमान जी फिर कि ये तो साधु है इससे मिलने में कोई
हानि नहीं लंका में इसलिए मिले तो जो भगवान का नाम जप करता है तो बड़े-बड़े संत या तो आकर उससे मिलते हैं या बड़े-बड़े संतों के यहां पहुंचा दिया जाता है और संत समागम जब होता है तब उसके अंदर विवेक जागृत होता है बिन सत्संग विवेक ना होई और राम कृपा बिन सुलभ न सोई भगवान की कृपा के बिना संत संग नहीं मिलता और संत संग के बिना विवेक नहीं होता और विवेक जब तक नहीं होता तो जानकारी है आपको लेकिन प्रयोग नहीं कर सकते वो विवेक बल है नहीं तो नहीं जो करना है वही
होगा जो नहीं करना वो नहीं उसको कहते हैं जितेंद्रीय मनो निग्रह शास्त्र की भाषा में इंद्रियों को अधीन किए मन को अधीन किए कौन विवेक संत समागम और नाम जप इन दो से बात बनती है दोनों भगवान की कृपा आपके ऊपर है संत समागम भी मिल रहा है और नाम का भी परिचय जानते हो अब जप बढ़ाओ अंदर ही अंदर अंदर ही अंदर नाम जो संपत्ति चाहोगी मिल जाएगी देखो वि विषण जी की हालत लाथ मार के निकाल दिया भगवान की शरण का प्रभाव जो संपदा शिव रावन दीन दिए दस माथ सोई संपदा विभीषण सबकुछ
दल रघुनाथ देखो भगवान सबकुछ ते लंकाधिपति बना दिया जिस लंका से निकाले गए थे लात मार के उसी लंका का स्वामी जाते ही बना दिया नहीं बना दिया भगवान की शरण में सब सुख शांति है बस जीव ये समझ पावे और यह समझ आएगी सत्संग और नाम जप से साधन को हरि भजन है क सत्संग सहाय जब संत संग करोगे और नाम जप करोगे तब तुम्हारा ज्ञान पवित्र होगा ज्ञान वही जो प्रयोग में आ सके प्रयोग में ना आया तो बकवास यही है अब हम तुम्हें उपदेश करें हमारे आचरण गंदे हो तो उपदेश किस बात
का भाई हमें जो ज्ञान है उसको जब अनुभव किया उस पर चले तब तो बात बनी नहीं तो जानकारी का मतलब क्या है जैसे हम बहुत बढ़िया 56 प्रकार के भोग बनाने की प्रक्रिया जानते हैं लेकिन खाया कभी नहीं तो फायदा क्या हुआ प्रक्रिया जानने से पहले किया जाना और पहले खाओ खाके पचा हो उसका स्वाद समझो फिर प्रवचन करो तो अपने आप रंग आ जाएगा तो हम लोग ज्ञान तो बहुत जानते हैं ऐसा नहीं कोई ना जानता हो आप किसी के पास बैठ जाओ प्रणाम करके बढ़िया ज्ञान आपको दे देगा पर उपदेश कुशल बहु
तेरे लेकिन आचरण में उतारना यह कठिन बात है तो जो आचरण में उतार ले सो ज्ञानी जो आचरण में नहीं उतारा तो अज्ञानी ही है ज्ञान की बात करते हुए वो ज्ञानी नहीं नाम जप करो और सत्संग करो सत्संग दो प्रकार से होता है एक शास्त्र स्वाध्याय से होता है और एक संतों से होता है शास्त्र स्वाध्याय भी सत्संग मान लो रोज संत संग ना मिल पाओ वैसे तो आजकल मोबाइल है मोबाइल से सत्संग सुन लो नहीं तो शास्त्र स्वाध्याय करो गीता जी है श्रीमद् भागवत जी है संतों के वचन है गीता प्र से प्रकाशित
होते हैं बहुत सुंदर सुंदर वाणिया प्रकाशित होती है तो एक नशा बना ले घंटा आध घंटा शास्त्र स्वाध्याय करना घंटा आध घंटा सत्संग सुनना और निरंतर नाम जप करना फिर देख लो बहुत जल्दी लाभ मिल जाएगा इस लोक का परलोक का सब सुख मिल जाएगा विश्वास करो भगवान में विश्वास भगवान जो सब रचा है ना पलक झपकते ही भृकुटि विलास सृष्टि लय ई सृष्टि की रचना और सृष्टि का संघार भृकुटि के संचालन निमिस मात्र में वो भगवान है हम ऐसे भगवान को प्राप्त कर लिए तो सोचो क्या बका रह जाएगा तो इस जन्म में चूक
ना करें अपने ज्ञान का प्रयोग करने के लिए अंदर ही अंदर नाम जप करे जो नाम प्रिय हो ना वही जपे भगवान के सब नाम समान फलदाई है पर हमारा मन जिसमें ज्यादा लगे उसी को जपना चाहिए तो उससे प्रीति हो जाती है ना अब मान लो जैसे हम कहे कि आप अमुक नाम जप करो और आपकी प्रीति अमुक नाम में है तो जिस नाम में वही नाम जपना चाहिए और फिर जब गुरु प्रदत हो जाए तो जो गुरु दे दे फिर उसी फिर तो वही जप चा जो गुरु प्रदान कर दे और जब तक
गुरु ना हो तो जो रुचि हो वो भगवान का नाम जपना चाहिए राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधारा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा [संगीत] राधा राधा [संगीत] राधा राधा श्री [संगीत] राधा राधा [संगीत] राधा हे [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत]