[संगीत] स्टडी इक इस अब तैयारी हुई अफोर्डेबल इमरजेंसी दरकेस्ट फेज ऑफ इंडियन डेमोक्रेसी वेलकम तू स्टडी इक मेरा नाम है आदेश सिंह 28 जून 1975 की सुबह हाथ में इंडियन एक्सप्रेस पढ़ने के लिए जब न्यूज़पेपर खोला तो हर ये क्या एडिटोरियल पेज तो ब्लैक है आखिर ऐसा क्यों दोस्तों भारत एक लोकतांत्रिक देश है और एक लोकतांत्रिक देश की चार स्तंभ में से एक माना जाता है प्रेस यानी मीडिया को लेकिन देश में एक समय ऐसा भी आया जब लोकतंत्र के इसी चौथे स्तंभ की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को छीन लिया गया और इसके पीछे की वजह
थी देश में लगी इमरजेंसी जी हान वही इमरजेंसी जिसे भारतीय लोकतंत्र का कला अध्याय का कर याद किया जाता है आज हम बात करेंगे की 1975 में इमरजेंसी लगने के पीछे क्या कारण द उसे वक्त देश में सिचुएशन कैसी थी साथी यह की इमरजेंसी को लेकर कॉन्स्टिट्यूशन में क्या कहा गया है और इसके प्रभाव क्या होते हैं लेकिन सबसे पहले बात करेंगे की भारत में इमरजेंसी को लगाया क्यों गया और इसकी शुरुआत कैसे हुई अनाउंसमेंट ऑफ इमरजेंसी 26 जून साल 1975 की सुबह बाकी दिनों की तरह आम नहीं थी इस दिन सुबह तो हुई थी
लेकिन लोगों की आवाज़ गम हो चुकी थी लोग अंधेरी कोठरी में बंद द 25 जून की वो रात बहुत लंबी हो गई थी 26 जून की सुबह के 3:00 बज रहे द प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी वेस्ट बंगाल के कम सिद्धार्थ शंकर ने और कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत वर्मा यह फैसला कर रहे द की लोगों को आपातकाल का मतलब कैसे समझाना है क्योंकि इससे 3 घंटे पहले ही देश में इंटरनल इमरजेंसी लगा दी गई थी एड्रेस की तैयारी हो रही थी है और सुबह के 8:00 बजे हमेशा की तरह जब न्यूज़ सुनने के लिए लोगों ने रेडियो ऑन
किया तो न्यूज़ एंकर की जगह पीएम इंदिरा गांधी की आवाज़ सुनाई दी इंदिरा गांधी ने राष्ट्र के नाम संदेश सुनाया पहले हिंदी में फिर इंग्लिश में संदेश में इदरा ने कहा की भाइयों बहनों राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है लेकिन इससे आम लोगों को डरने की जरूरत नहीं है भाई सिस्टर डी प्रेसिडेंट हज डिक्लेयर्ड स्टेट ऑफ इमरजेंसी बट कॉमन पीपल नीड नॉट बी एफ फ्री ऑफ दिस पूरा देश यह सुनकर हैरान रह गया था बाईट 8 घंटे में आजाद हिंदुस्तान में बहुत कुछ बदल गया था लेकिन इमरजेंसी लगाने के पीछे व्हाट वेदर रीजंस
फॉर दी इमरजेंसी सबसे पहले बात करते हैं कुछ पॉलिटिकल रीजंस की कनफ्लिक्ट विथ ज्यूडिशरी इंदिरा गांधी साल 1971 का इलेक्शन गरीबी हटाओ के नारे के साथ लड़ती हैं और रायबरेली विधानसभा सीट से उन्हें जीत मिलती है इस इलेक्शन में उन्होंने अपोजिशन के लीडर राजनारायण को बहुत ही बड़ी संख्या से हराया था इसी साल दिसंबर में इंडो पाक वॉर में इंडिया को बड़ी जीत हासिल हुई जीत का सेहरा पीएम इंदिरा गांधी के सर बंधा गया इसी इंदिरा गांधी की लोकप्रियता और बढ़ गई 1972 में मध्य प्रदेश महाराष्ट्र राजस्थान और कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होने द इंदिरा
गांधी ने बिहार पंजाब और हरियाणा की विधानसभा को समय से पहले भांग कर दिया और इन राज्यों में भी चुनाव करने का ऐलान कर दिया इन सभी राज्यों में इंदिरा की कांग्रेस को जीत मिली साल 1972 में तमिलनाडु को छोड़कर पूरे भारत पर इंदिरा की कांग्रेस का ही रोल था और इसके साथ शुरू हुआ इंदिरा का राज इंदिरा सब कुछ धीरे-धीरे चेंज कर रही थी इंदिरा इस वक्त काफी ज्यादा पॉप्युलर हो गई थी अपनी बप्पी एलिट को bhunate हुए उन्होंने दो बड़े फैसले लिए एक था प्रिवी वर्ष का खत्म और दूसरा बैंक्स का नेशनलाइजेशन हालांकि
उनके इन फसलों से एक बड़ा वर्ग सहमत था इन फेस सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया गया और सुप्रीम कोर्ट ने अपनी सनी में पीएम इंदिरा गांधी के इन दोनों ही फसलों को खारिज कर दिया पीएम इंदिरा सुप्रीम कोर्ट के इस जजमेंट से बिल्कुल खुश नहीं थी इसके बाद उन्होंने इस ज्यूडिशियल ऑब्सटेकल को हटाने के लिए कांस्टीट्यूशनल अमेंडमेंट का रास्ता अपनाया वो कॉन्स्टिट्यूशन में 24 और 25th अमेंडमेंट लेकर आए 5th नवंबर 1971 को 24th अमेंडमेंट लाया गया जिसमें कहा गया की संसद कॉन्स्टिट्यूशन के किसी भी पार्ट में चेंज ला सकती है और 1972 के अप्रैल में
25th अमेंडमेंट लाया गया इसके तहत प्रॉपर्टी के फंडामेंटल राइट्स को कटेल किया गया और कहा गया की पब्लिक उसे के लिए अगर प्राइवेट प्रॉपर्टी को जप्त किया जाता है तो कंपनसेशन का अमाउंट सरकार ही तय करेगी उसमें कोर्ट्स किसी भी तरह का interfearance नहीं कर सकती इन अमेंडमेंट को भी सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया गया और लैंडमार्क के इस केशवानंद भारती में कोर्ट ने अपना जजमेंट सुनाया इसके बाद कोर्ट की पावर फिर से रिस्टोर हो चुकी थी और कहीं इंदिरा गांधी का ज्यूडिशरी से टसल बढ़ता जा रहा था मूवमेंट इन गुजरात एंड बिहार इसके अलावा
दोस्तों इंदिरा jinvadon की वजह से पीएम बनी थी उन्हें वो कहीं एन कहीं पूरा नहीं कर का रही थी देश में गरीबी बढ़ती जा रही थी करप्शन महंगाई जमाखोरी अपने चरम पर द कई राज्यों में सूखा पद गया था उनमें से ही एक राज्य गुजरात था ऐसे हालातो में लोगों में सरकार के खिलाफ गुस्सा बढ़ता जा रहा था और यह गुस्सा फूटा 20 नवंबर 1973 को जब एलडी इंजीनियरिंग कॉलेज अहमदाबाद के स्टूडेंट्स ने प्रोटेस्ट शुरू कर दिया स्टूडेंट्स ने बड़े हुए खाने के रेट्स के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करना शुरू किया उधर बिहार में नारा गुंजा
गुजरात की जीत हमारी है अब बिहार की बारी है 18 मार्च 1974 को बिहार में स्टूडेंट्स ने प्रोटेस्ट किया और बिहार विधानसभा का gherap किया जिसमें पुलिस एक्शन में तीन स्टूडेंट्स मारे गए जब इसकी खबर जनता में पहुंची तो लोगों का गुस्सा फुट पड़ा और नतीजा 23 मार्च 1974 को बिहार बंद किया गया सरकार ने प्रोटेस्ट को काबू करने के लिए बहुत से स्टूडेंट्स को अरेस्ट कर लिया जिसके बाद स्टूडेंट यूनियन ने जयप्रकाश नारायण को बुलावा भेजा जेपी एक फ्रीडम फाइटर द और राजनीति से दूर रहकर समाज सेवा कर रहे द लेकिन जेपी दूर से
खड़े हुए सब होता हुआ देख रहे द जेपी ने स्टूडेंट यूनियन का इनविटेशन एक्सेप्ट किया और देशभर में आंदोलन की घोषणा कर दी उसी दौरान समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस ने रेलवे हड़ताल की घोषणा कर दी मे 1974 से शुरू हुआ यह आंदोलन 3 महीना तक चला इसे लगभग रेलवे कर्मचारी ने सपोर्ट किया इस तरह बिहार और गुजरात से चला गया आंदोलन धीरे-धीरे पूरे देश में फैल रहा था उसे वक्त देश की राजनीति दो लोगों की इर्द-गिर्द घूम रही थी एक तरफ इंदिरा थी तो दूसरी तरफ जय प्रकाश नारायण इसी बीच कुछ ऐसा हुआ जिसने आग
में घी डालने का कम किया और वह था इलाहाबाद हाई कोर्ट का एक ऑर्डर लिए जानते हैं यह क्या ऑर्डर था इलाहाबाद हाई कोर्ट ऑर्डर देश में सरकारें आम लोगों से लगातार दूर होती चली जा रही थी साल 1974 में ही सुप्रीम कोर्ट में एक पिटीशन लगाई गई रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल्स एक्ट 1951 में हुए अमेंडमेंट के खिलाफ britishnar राज नारायण यह वही नाम था जिसने लगभग 350 साल पहले यानी 24 अप्रैल 1971 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक और पिटीशन दायर की थी और वह थी पीएम इंदिरा गांधी के चुनाव के खिलाफ इसमें आरोप लगाया गया
था की पीएम इंदिरा ने इलेक्शन में अनफेयर मेंस का उसे किया है और इसलिए उनके इलेक्शन को रद्द कर दिया जाना चाहिए आजाद भारत में यह पहली बार हुआ की कोई प्राइम मिनिस्टर पद पर रहते हुए कोर्ट में पेश हुआ 22 जून 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट जज जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी का इलेक्शन कैंसिल कर दिया और उनकी अगले छह साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी मार्च 1971 के इलेक्शन में करप्शन के आरोप में इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले लेने भारत की राजनीति में गर्माहट पैदा कर दी इसके बाद मामला सुप्रीम
कोर्ट गया 24 जून 1975 यानी इमरजेंसी से 1 दिन पहले सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अय्यर ने अपना फैसला सुनाया सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के इलेक्शन कैंसिल करने के फैसले को सही बताया लेकिन इंदिरा को प्राइम मिनिस्टर बनी रहने की छूट दी वो लोकसभा में तो जा सकती थी लेकिन वहां वोट नहीं कर सकती थी और यह इमरजेंसी के जस्ट 2 दिन पहले हुआ था उधर जीबी आंदोलन धीरे-धीरे पूरे देश में तेज हो गया था कोर्ट की जजमेंट के बाद इसकी और ज्यादा उग्र होने के असर साफ नजर ए रहे द इस आंदोलन को
सफल बनाने के लिए अपोजिशन ने अपनी पुरी ताकत थी 25 जून को जब ने दिल्ली के रामलीला मैदान से ऐलान कर दिया की अगर इंदिरा अपनापन नहीं छोड़ती हैं तो पूरे देश में आंदोलन किया जाएगा इस दौरान इस रैली में पूरा विपक्ष शामिल हुआ था रामलीला मैदान में 5 लाख लोगों का हम जेपी का भाषण सुनने के लिए आया था चारों ओर चेहरे ही चेहरे द भीड़ की भीड़ थी जब ने यहीं से नारा दिया सिंहासन खाली करो देखो जनता आती है इंदिरा को दर था की जय प्रकाश की आह्वान पर सीना तख्ता पलट ना
कर दे जिसके बाद इंदिरा गांधी ने इंटरनल डिस्टरबेंस को देखते हुए अपने consultran से सलाह ली और देश में 25 जून की आधी रात को नेशनल इमरजेंसी लगा दी लेकिन इन सबसे अलग इंदिरा गांधी मेंशन थ्री रीजंस फॉर दी इमरजेंसी इन 1975 1975 में इमरजेंसी के लिए इंदिरा गांधी ने तीन वजह बताई थी इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक इंदिरा गांधी सरकार द्वारा बताया गया की भारत में 21 मंथ तक चलने वाली इस इमरजेंसी का में मोटिव देश में फैले इनर्ट अमोल यानी आंतरिक शांति को कंट्रोल करना था इसलिए देशभर में कांस्टीट्यूशनल राइट्स को
सस्पेंड किया गया फ्रीडम ऑफ स्पीच और फ्रीडम ऑफ प्रेस पर रोक लगाई गई इंदिरा गांधी ने अपने संबोधन में तीन वजहों का जिक्र किया था और इमरजेंसी को सही बताया था पहली वजह देते हुए उन्होंने कहा देश में जयप्रकाश नारायण द्वारा शुरू किए गए आंदोलन की वजह से भारत की सुरक्षा और लोकतंत्र खतरे में है दूसरी वजह देते हुए उन्होंने कहा की मेरे विचार हैं की देश में तेजी से इकोनॉमिक्स डेवलपमेंट बैकवर्ड क्लासेस अंडर प्रिविलेज्ड के विकास की जरूरत है और तीसरी वजह बताते हुए इंदिरा गांधी ने यह कहा की विदेशों से करने वाली शक्तियां
भारत को अनस्टेबल और वीक कर सकती हैं दोस्तों हम आपको बता दें की इंदिरा गांधी जिस जयप्रकाश नारायण को देश के लिए खतरा बता रही थी ये वही जय प्रकाश नारायण द जिन्हें कभी देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अप प्रधानमंत्री बनाना चाहते द और यह वही जय प्रकाश नारायण द जो कभी इंदिरा गांधी को मेरी प्यारी बिंदु का कर सलाह दिया करते द यह जयप्रकाश नारायण द जिन्होंने कभी कुर्सी के लिए राजनीति नहीं की और ये वही जयप्रकाश नारायण द जो इस वक्त देश के सबसे बड़े नेता द दोस्तों इमरजेंसी हिंदुस्तान के लोकतंत्र पर
लगा सबसे कला गहरा धब्बा है इसी इमरजेंसी के पीछे की असली वजह कौन रहा इंदिरा गांधी जयप्रकाश नारायण या कोई और ही पुरी कहानी सुनने के बाद आप यह अच्छी तरह समझ सकते हैं अब हम बात करेंगे इंदिरा गांधी ने कॉन्स्टिट्यूशन के कौन से आर्टिकल का उसे करके देश में नेशनल इमरजेंसी लगाई थी इमरजेंसी प्रोविजंस ऑफ़ द कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ़ इंडिया पीएम इंदिरा गांधी ने कॉन्स्टिट्यूशन के आर्टिकल 352 के अंदर देश में इंटरनल इमरजेंसी लागू की थी दोस्तों इमरजेंसी हमारी इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन में वो प्रोविजन है जिसका इस्तेमाल सरकार तब कर सकती है जब देश किसी इंटरनल
एक्सटर्नल या फाइनेंशियल खतरे का सामना कर रहा हो इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन के 18th पार्ट में आर्टिकल 352 से 360 तक इमरजेंसी का प्रोविजन दिया गया है इमरजेंसी के वक्त देश के सारे पावर सेंट्रल गवर्नमेंट के अंडर ए जाती हैं देश में इमरजेंसी केबल राष्ट्रपति यानी प्रेसिडेंट ही लगा सकता है बता दें की इससे पहले पूर्व पीएम लाल बहादुर शास्त्री के समय 1962 इंडो चीन वॉर के दौरान और 1971 इंडो पाक वॉर के समय भी आर्टिकल 3521 के अंदर नेशनल इमरजेंसी लगाई गई थी इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन में तीन तरह की इमरजेंसी के प्रोविजंस हैं पहला नेशनल इमरजेंसी आर्टिकल
352 दूसरा प्रेसिडेंट रूल और स्टेट इमरजेंसी आर्टिकल 356 और तीसरा फाइनेंशियल इमरजेंसी आर्टिकल 360 अभी तक भारत में कभी भी फाइनेंशियल इमरजेंसी नहीं लगाई गई है लेकिन इमरजेंसी के इन प्रोविजंस की जरूरत क्या है तो बता दें की इंडिया जब आजाद हुआ तो उसे वक्त संविधान को बनाने वालों ने इमरजेंसी जैसी सिचुएशन को इमेजिन करते हुए इस तरह का प्रावधान बनाया था जिससे संकट की ऐसी किसी वक्त में देश की एकता अखंडता और सुरक्षा कभी खतरे में ना पड़े इसकी तहत सेंट्रल गवर्नमेंट बिना किसी रोक-टोक की सीरियस डिस्कशन ले सकती है और किसी भी परिस्थिति
सी देश को उभर सकती है इंदिरा गांधी ने इसी आर्टिकल का फायदा उठाते हुए देश में इमरजेंसी लगा दी थी लिए अब जानते हैं उनके इस फैसले के क्या परिणाम देखने को मिले इफेक्ट्स एंड कंसीक्वेंसेस ऑफ इमरजेंसी 25 जून की रात को पीएम इंदिरा गांधी ने उसे वक्त के प्रेसिडेंट फखरुद्दीन अली अहमद से इमरजेंसी लगाने की बात कही प्रेसिडेंट ने तुरंत ही लेटर पर साइन कर दिए यहां गौर करने वाली बात ये है की इंदिरा गांधी ने इससे पहले अपने कैबिनेट मिनिस्टर से कोई सलाह मशवरा करना तो दूर उन्हें इस बारे में बताना तक जरूरी
नहीं समझा था और इसके बाद जो हुआ वो किसी ने शायद सपने में भी नहीं सोचा था शाम को ही तमाम न्यूज़पेपर ऑफिस की बिजली काट दी गई प्रेस पर सेंचुरी शिप लगा दी गई आधी रात को ही सोते हुए लोगों को जागा कर कहीं और ले जया जाने लगा हर तरफ लोगों को अरेस्ट किया जा रहा था मिस और डॉ जैसे एक्ट्स के तहत देश में ज्यादा आम लोगों को जिम 11000 अपोजिशन लीडर्स शामिल द अरेस्ट कर जेल में दल दिया गया महसूस हो रहा था जैसे अटल बिहारी वाजपेई लाल कृष्ण आडवाणी मुलायम सिंह
यादव आदि सभी को आधी रात को ही उठा लिया गया था इसके साथ ही देश के सबसे बड़े गांधीवादी नेता जेपी को भी अरेस्ट कर लिया गया उन्होंने कहा सोचा होगा की आजादी के बाद भी उन्हें एक बार फिर जेल जाना होगा इन सबके साथ ही सरकार ने नजरबंदी कानून का इस्तेमाल काफी बड़े लेवल पर किया जिन लोगों की इस वक्त गिरफ्तारी हुई थी वो लोग बेल के लिए पिटीशन भी नहीं दल सकते द इसी बीच इनफॉरमेशन इन ब्रॉडकास्टिंग मिनिस्टर का कार्य भर गुजराल से लेकर संजय गांधी के चाहते विद्या चरण शुक्ल को दे दिया
गया शुक्ल ने सेंसरशिप की बागडोर अपने हाथों में ले ली जिसके बाद प्रेस सेंस शिप का भयानक दौर शुरू हुआ अखबार छापने से पहले उसकी हर चीज पर नजर राखी जाने लगी अगर कुछ अखबारों को छोड़ दें तो पुरी की पुरी मीडिया इंदिरा गांधी के आगे झुकते नजर ए रही थी इस पर लाल कृष्ण आडवाणी ने कहा था की मीडिया को झुकने को कहा था और वो रिंगने लगी ऐसा इसलिए क्योंकि बहुत से मीडिया हाउसेस सरकार की चाटुकारिता करने लग गए द लेकिन बहुत से ऐसे भी द जो अपनी पुरी शक्ति के साथ इसका लगातार
विरोध कर रहे द उदाहरण के तौर पर इंडियन एक्सप्रेस और स्टेट्समैन जैसे बहुत सी न्यूज़ पेपर्स ने प्रेस पर लगी सेंसरशिप का विरोध किया सरकार ने जिन न्यूज़ को छापने से रोका था उनकी जगह न्यूज़ पेपर में खाली छोड़ दी थी जिससे लोगों तक सेंसेटिव का सही अंदाजा पहुंच सके इमरजेंसी की गज केवल भारतीय पत्रकारों पर ही नहीं बल्कि विदेशी पत्रकारों पर भी गिरी विदेशी अखबारों के मालिकों को उनकी खबरों के लिए अरेस्ट तो नहीं किया जा सकता था लेकिन उन्हें देश से निकाला जाने लगा इसमें सबसे पहले वॉशिंगटन पोस्ट नाम की अखबार के लुइस
एम सी मिंस द क्योंकि उन्होंने संजय गांधी एंड है मदर नाम से एक आर्टिकल लिखा था इसी तरह बीबीसी के marksli को भी इंडिया छोड़कर जाना पड़ा था इस तरह से जेल एक तरह से राजनीति की पाठशाला बन गई थी बड़े नेताओं के साथ जेल में युवा नेताओं को बहुत कुछ सीखने समझने का मौका मिला मीडिया रिपोर्ट और इतिहासकारों ने इसी इमरजेंसी को कंट्रोवर्शियल और उन डेमोक्रेटिक का है इसे लागू करने के बाद राजनीतिक तौर पर इंदिरा गांधी के घर विरोधी जेपी ने इसे भारत के लोकतंत्र के इतिहास का कला अध्याय का कहा इमरजेंसी ने
देश के राजनैतिक दलों से लेकर पूरे पॉलिटिकल सिस्टम को तो हिलाकर रखा ही हुआ था दूसरी तरफ संजय गांधी ने देश को आगे बढ़ाने के नाम पर पंच सूत्री एजेंडा लागू कर दिया था उनमें द फैमिली प्लानिंग एलिमिनेशन ऑफ डायरी सिस्टम एडल्ट एजुकेशन प्लांटिंग treesan ऑफ कास्ट सिस्टम लेकिन इस एजेंडा में सबसे ज्यादा भयानक था स्टेरलाइजेशन यानी नसबंदी का फैसला इस फैसले ने इसी राजनैतिक गलियारों से निकलकर आम जैन के निजी जीवन तक पहुंचा दिया जनता के अधिकार पहले ही छीने जा चुके द फिर नसबंदी ने घर-घर में दहशत फैलाने का कम किया उसे दौरान
गली मोहल्लों में इमरजेंसी के सिर्फ एक ही फैसले की चर्चा सबसे ज्यादा थी और वो था यही जबरदस्ती चलाया जा रहा स्टेरलाइजेशन कैंपेन एक रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ एक साल के अंदर देश भर में 60 लाख से ज्यादा लोगों की नसबंदी कर दी गई इनमें 16 साल से लेकर 70 साल के बुजुर्ग तक शामिल द यही नहीं गलत ऑपरेशन और ठीक इलाज एन मिलने की वजह से करीब 2000 लोग मारे गए संजय गांधी का यह मिशन जर्मनी में हिटलर के शासन में चलाए गए नसबंदी अभियान से भी ज्यादा भयानक था जिसमें करीब 4 लाख लोगों
की नसबंदी कर दी गई थी इसके साथ ही संजय गांधी ने सुंदरीकरण कार्यक्रम के तहत दिल्ली की झुग्गियों पर बुलडोजर चलवा दिया था जो लोग इसके रास्ते में आए उन पर गोली तक चलवा दी गई आप सोच सकते हैं की निरंकुशता की किस हद तक सरकार जा रही थी खैर हर काली रात की सुबह जरूर होती है एक समय के बाद इमरजेंसी का भी अंत हुआ इमरजेंसी [संगीत] 21 महीने बाद 21 मार्च 1977 को आखिरकार इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी को हटाने का ऐलान कर दिया उन्हें सलाह दी गई थी की इस समय अगर इमरजेंसी को
हटाकर इलेक्शन कर दिए जाएं तो जीत उन्हें की होगी लेकिन इमरजेंसी लगाने का फैसला इंदिरा गांधी की सरकार और कांग्रेस को भारी पड़ा इसके बाद हुए इलेक्शन में इंदिरा गांधी की सबसे बड़ी हर हुई और मोरारजी देसाई की लीडरशिप में देश में पहली बार गैर कांग्रेस की सरकार बनी जनता पार्टी की सरकार आते ही इमरजेंसी प्रोविजंस के मिसयूज पर रोक लगाने के लिए कुछ कदम उठा गए 44 वन संविधान संशोधन 1978 के जरिए इमरजेंसी प्रोविजन के मिसयूज को रोकने की व्यवस्था की गई और साथ ही इसके द्वारा आपातकाल के दौरान हुए 40 सेकंड अमेंडमेंट की
कंट्रोवर्शियल प्रोविजंस को भी रद्द कर दिया गया इसके अलावा 45वें संविधान संशोधन के जरिए हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के अधिकार वापस दे दिए गए इमरजेंसी के 21 महीना में इंदिरा गांधी बेहद ताकतवर सत्ताधारी बनी रही लेकिन इसके खिलाफ उठी आवाज़ ने जल्द ही अधिनायकवाद के गुरुर को तोड़ कर रख दिया इमरजेंसी ने देश को एक बहुत बड़ा बदलाव यह भी दिया की इमरजेंसी के बाद ही देश में पहली बार गैर कांग्रेस सरकार बनी यह कोई एक दल की सरकार नहीं थी बल्कि जनता के ही समर्थन में उठी उसे विपक्ष की सरकार थी जिसको दबाने
के लिए इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाई थी कहीं ही भारतीय लोकतंत्र इमरजेंसी के बाद और मजबूत बनकर खड़ा हुआ था कंक्लुजन राजनैतिक तौर पर देखें तो इमरजेंसी का यह एपिसोड सब को यह सबक देता है की चाहे आप कितनी भी पॉप्युलर हो जाए अगर आप जनता की उम्मीद पर खरे नहीं उतरते हो तो आपका हर दाब उल्टा पद जाता है लोकतंत्र में जनता की इसी शक्ति को राजनेता हमेशा याद रखते हैं इसके अलावा इमरजेंसी के विरोध में मीडिया का योगदान भी हमेशा याद रखा जाता है इमरजेंसी के काले अंधकार के हटने के बाद भारतीय राजनीति
और ज्यादा परिपक्व होती नजर आई स्टडी इक इस अब तैयारी हुई अफोर्डेबल