केवली कुंभक जिसका हो जा उसका भूतल में क्या काम बाकी रहता उसके तो मनोरथ पूरे हो जाते दूसरों के भी मनोरथ पूरे हो जाते तो यह जप करें और प्राणायाम करें तो फिर स्वासो स्वास की गति जो अभी एक मिनट में हमारे 13 14 स्वास खर्च होते हैं फिर 10 स्वास में एक मिनट पसार हो जाएगा तो ट आयुष्य बढ़ जाएगी प्राणायाम करने से शांत और प्रसन्न रहने से कौन चाहता है जल्दी मरना जो चलते चलते बात करते हैं दिन में सोते हैं अमावस्या पूर्णम अष्टमी तवार को सेक्स करते हैं उनकी तो जो आयुष है
उसमें से भी कम हो जाती है अकाल मृत्यु मरते जो प्राणायाम करते हैं ध्यान करते हैं जप करते हैं मौन रहते हैं उनकी आयुष जो स्वास है उससे आयुष उससे भी ज्यादा जी लेते हैं ऐसे नहीं वर्षों पर रेखाए वर्षों का नहीं बताती कोई भी जोश यह नहीं कह सकता कि 74 साल दो महीने सात दिन तीन घंटे आप जी हो गए ऐसा नहीं बता सकता रेखा लगभग 60 से 70 क होगी लगभग बोलेगा 60 65 70 80 ऐसा बोलेगा क्योंकि स्वास होते जीव जन्मता हैना तो एक एक दिन में 21600 स्वास खर्च होते हमारे
अगर चलते चलते बात करते हैं मैथम करते हैं दिन को सोते ज्यादा चंचल होते हैं तो ज्यादा स्वास खर्च हो जाते हैं अगर एक कुछ टा कम होती तो स्वास एक दिन बीत जाता 24 घंटे और 21600 में से भी कुछ बचत हो जाती कुछ योगी लोग तो ऐसे स्वास को नियंत्रित कर देते हैं कि संकल्प करके बैठ गए तो ओ बाप रे बाप जितना जीने का संकल्प करते उतना जी लेते जैसे चांगदेव महाराज 1400 साल किनाराम महाराज ने काया कल्प और एकांत में र थोड़ 173 साल 73 की 76 साल किनाराम महाराज [संगीत] 170
वशिष्ठ जी महाराज लाख वर्ष च ऋषि 6 हज वर्ष कुछ वर्ष पहले एक जोगी साधु था सिद्ध पुरुषों को खोजने के लिए हिमालय में खूब भटका तो बद्री का आश्रम जाते समय जोशी मठ आता है जिन्होंने जोशी मठ देखा सुना है हाथों पर करो जोशी मठ आ तो जोशी मठ से बद्री का आश्रम नहीं गए बद्रीनाथ लेकिन पूर्व दिशा में गए वह उत्तर दिशा में है बदरीनाथ जोशी मठ से वह पूर्व दिशा में गए चलते गए चलते गए कहीं छोटे-छोटे होती बस्तियां पहाड़ों में भी गुजारा कर कोई महापुरुष मिले कोई सिद्ध पुरुष मिले इस ललक
झलक से जगह कोई बैठ गए जप कर तो एक लंबी सी मूर्ति श्वेत कपड़े ब्रह्मचारी थोड़ी सी दाढ़ी हिमालय में तो वैसे ही आदमी खूबसूरत हो जाता है प्रभाव बोले क्या चाहते हो सिद्ध पुरुष का दर्शन करना चाहता तो मोर सल्ली जैसा कोई फल दिया पेड़ में से बोले खाओ आठ दिन तक भूख प्यास नहीं लगेगी ओमकार का जप करो तो तुम्हारी पुण्याई प्रभाव बढ़ेगा तब अपन मैं आपको ले चलूंगा ना ठंड लगेगी ना भूख प्यास लगेगी आठ दिन के बाद वह महापुरुष आए श्वेत कपड़े वाले ब्रह्मचारी और मेरे को ले गए अब उस पुरुष
की भाषा में मेरे को मना मुझे नहीं हां उस पुरुष की भाषा में कहता हूं उस साधु की मेरे को ले गए चलते चलते छह आठ आदमी मुश्किल से हटा सके ऐसी एक चट्टान थी उन्होंने उस चट्टान को खदेड़ दिया फिर हम अंदर गए हटा द बंद कर दे [संगीत] अंदर गए नीचे उतरते उतरते तो देखा क ओ वृक्ष है शांति ऐसी वैसी और बड़ी बड़ी जटा ऐसे कोई पत्थर पर लिखी हुई मूर्ति जैसे कोई कोई पुरुष बैठे तो उसमें से एक पुरुष ने कहा कि कलयुग का आदमी इधर कैसे आ गया तो ब्रह्मचारी को
मैंने पूछा मैं मैंने पूछा मतलब जो साधु गया था उसने आश्रम नहीं भ्रमित मत होना मैंने गया था मैंने पूछा मतलब उस साधु ने पूछा ब्रह्मचारी से कि कलयुग का मनुष्य आ गया ऐसा बोल महापुरुष यह कब के हैं कोई बोले कोई द्वापर का है कोई त्रेता के हैं कोई सतयुग के [प्रशंसा] बस जैसे शीला पर मूर्ति लिखी होती है जैसे होती है ना मंदिर की मूर्ति शांत बैठे उस ब्रह्मचारी ने कहा सिद्ध पुरुषों का दर्शन हो गया चलो तो साधु ने कहा कि ऐसे महापुरुषों को छोड़कर कहां जाऊंगा बोले नहीं तुम रात यहां नहीं
रह सकते हो ये अलग दुनिया है [संगीत] बोले कृपा करो बोले र रहोगे बने तो यहां की शक्ति तुमको उठाकर वहां छोड़ देगी जहां से तुम आए थे एक मिनट में [संगीत] ही तो साधु ने सोचा चलो कहां तो ऋषि केश से चलाऊं अगर रहने देंगे तो महापुरुषों से कुछ वाता होगी और नहीं तभी भी ऋषिकेश तो पहुंचा देंगे [संगीत] तो ब्रह्मचारी महाराज कथा जोड़ के के कृपा करो मेरे को तो ब्रह्मचारी ने कहा देख लेना उन सिद्धों की जो सेवा में रहते थे ब्रह्मचारी वह तो चले गए अपनी जोवा भी मैं बैठा रहा कोई
शक्ति मेरे को उठाकर ले जाए तो उस शक्ति के पैर पकडा दर्शन करूंगा देखो करूंगा बोलता हूं मतलब मैं नहीं उस साधु के वचन बोल रहा तो रात ई कहीं झका ना आ जाए क्या 11 12 बजे होंगे एक बजा होगा ब सावधान ऐसे करते करते किस समय कोई झका आया झका आया और य सावधान हुआ तो आंख खुली तो ऋषिकेश में फिर मैं गया वही पीपल चट्टी से आ गए खोजा उस पहाड़ में तो कोई जगह मिली नहीं खोजते खोजते थक गया वापस आया इस प्रकार दूसरे साधु का भी ऐसा अनुभव कि कुछ और
ढंग से महापुरुष दो मिले थे तो जिनकी ओमकार की उपासना पराकाष्ठा पर पहुंच जाती और जगत से निवृत होकर समाधि हो उनके सामर्थ्य का वर्णन जैसे आप स्वप्ने में दुनिया बना लेते हैं जैसे विश्वामित्र ने बाजरी बना दी जवार बना दी मक्का बना दिया य सब उनकी एकांत ओमकार की साधना गायत्री की साधना की पकाश है विश्वामित्र यहां तप करते थे इसी पहाड़ पर नाग पर्वत जहां करते थे वह जगह देखा अभी तो कोई भंगड़ा है लेकिन पानी खुट नहीं वहां का अभी भी पहाड़ी प कुआ है ऐसे अगस्त ऋषि ने भी तप किया है
पूर्व काल में सप्त ऋषियों ने भी तप किया है आबू में य पुक उनके भी आश्रम थे समय के धारा में व आश्रम चले अभी कहीं कहीं कोई गुफा कोई आश्रम है परमात्मा शांति से आपका मंगल होता है ओम शांति अपना प्रभाव पड़े ऐसा बात सोचना हलकट पना है बस अपने भगवान में रहे आप जो जो भगवान के निकट पहुंचो त आप निर् दुख होते जाओगे भगवान ऐसा नहीं कि कोई लोक लोका में कहीं जाएंगे निकट बैठेंगे नहीं जितने आप शांत होते अत आत्मा में उतने आप भगवान के निकट है भगवान के श तमेव शरणम
गच्छ सर्व भावे न भारता तुम मेरी शरण आ जाओ सर्व भाव से तत् प्रसादा पराम शांति तो स्थानम प्रप शाश्वत शाश्वत पद की प्राप्ति हो जाए शाश्वत और नश्वर दोनों साथ रहते नश्वर शरीर और व्यवहार शाश्वत है अपना आत्मा परमात्मा बचपन नश्वर है लेकिन बचपन को जानने वाला आत्मा शाश्वत है दुख नश्वर लेकिन मेरे को फलाने ने दुख दिया था उसको जानने वाला शाश्वत सुख नश्वर है लेकिन सुख का साक्षी शाश्वत मान नश्वर है लेकिन मान का साक्षी अपमान नश्वर है अपमान का साक्षी शाश्वत उसी साक्षी को नानक जी ने कहा मन तू ज्योति स्वरूप
अपना मूल पछ तू जान वाला जो जानने में आता है वह माया है और जो जानता है वह परमात्मा है जैसे पुरुष और पुरुष की शक्ति अभिन्न रहती है ऐसा नहीं कि भाई तुम काम करो तुम्हारे तो 50 रुपए दिन के और तुम्हारे अंदर जो शक्ति है उसके 0 रुप देंगे पगार ऐसा नहीं पुरुष और पुरुष की शक्ति दो दूध और दूध की सफेदी तेल और उसकी चिकनाहट तरंग और पानी जैसे अभिन्न है ऐसे ही आत्मा और प्रकृति परमात्मा और संसार अभिन्न है तरंग है तो संसार है शांत पानी है तो परमात्मा है जैसे वृक्ष
हैना तो वृक्ष का रस रस ही है लेकिन रस ही लकड़ा बन जाता है पत्ता बन जाता है काष्ट बन जाता है फल बन जाता है फूल बन जाता है है तो रस तो यह रस रस ही वृक्ष के रूप में बदल जाता है ऐसे रस स्वरूप परमात्मा ही यह प्रकृति के रूप में दिखते हैं जब अपने अंतर में देखोगे तो बाहर भी सब ही हलो तहली आसमान डिस आसमान मेड़ी तारा तारन जो चं भीत त जो मकान आला जित कित वसीत चलो तो दरिया देखे दरिया मड़े लहर लहर का लाल भीतू तेरा मकान ला
तो धव को भगवान ने कहा कि सत्संग और मेरी भक्ति दो साधनों से ही तर का सुगम रास्ता सत्संग के बिना भक्ति में बरकत नहीं आएगी और भक्ति के बिना सत्संग का रस नहीं टिकेगा सत्संग और भक्ति देश भक्ति गुरु भक्ति जाति भक्ति यह सब ठीक है लेकिन जिस परमात्मा से आप अलग नहीं होते उससे मिलने की रुचि उसमें विश्रांति य परम भक्ति ओम शांति ओम शांति तो ओमकार का जप करने की रीत बहुत सुंदर कल बताई शास्त्रों ने परसों [हंसी] ओ तो इससे इंडा पिंगला न वाड़ी के बीच जो सूक्ष्म है उसका द्वार खुलता
है अभी विज्ञानी बोलते 10 अरब न्यूरॉन्स है दिमाग में सबके खोपड़े में दो मस्तिष्क में उसके बीच की खाई है तो खाई को पूर्ति करा तो महापुरुष बन जाएगा तो खाई की पूर्ति सक्षम के द्वारा होती इसीलिए योगी लोग ध्यान समाधि करते सत्कर्म करते जो लोग कूट कपट करते दगाबाजी करते तो उनका अंतरात्मा तो देखता है ना मलिन होते जाते हैं खाई और बढ़ती जाती है करना कुछ और बोलना कुछ तो खाई बढ़ जाती समझते हैं बनते भगत ठग जगत पड़ते भव की जाल गांधी जी ने देखा कि भगवान सत्य स्वरूप है शरीर नहीं था
तभी भी मेरा आत्मा भगवान थे मैं मर जाऊंगा तभी भी मेरा आत्मा परमात्मा तो मेरे को जानते हैं वही है भगवान सत्य स्वरूप है तो सत्य से ही भगवान मिलेंगे तो भगवत जनों की सेवा देश को आजाद कराना यह भी अपने लिए नहीं सत्ता के लिए नहीं भगवत जनों की सेवा किसानों का शोषण करते थे अंग्रेज व्यापारी गांधी जी ने हलचल चलाई किसानों से सस्ते में लेते हैं और बहुत महंगा बेचते हैं किसानों का खून पीते गांधी जी ने आंदोलन चलाया थोड़ा अंग्रेजों ने उनका दमन करना चाहा गांधी जी ने अच्छा बातचीत करेंगे तो तुम
क्या भाव लेते हो और क्या भाव भेजते हो तुम्हारे कागजात दिखाओ अगर मुनाफा वाज भी होगा तो हम आंदोलन वापस करेंगे बोले वो तो हम नहीं दिखाएंगे तो वो क्रूर अंग्रेजों का राज बड़ी-बड़ी कंपनियां और यह बेचारा एक मुट्ठी भर हड्डियों का पिंजर यह क्या कर लेगा हमारा अंग्रेजों को भी घमंड था तो गांधी जी के भक्तों में एक भक्त ऑफिसर अंग्रेजों की फर्म में काम करता था वो सारी फाइल उठाकर ले आया बोले बापू जी वो नहीं देते तो ये फाइल है ये फलानी चीज भाव लेते ऐसे ऐसे ति आडत में य इसकी अपन
कॉपी कर ले य गांधी जी ने उसको देखकर थोड़े तो गंभीर हो गए फिर कहा कि भाई ईश्वर सत्य स्वरूप तुम यह चुरा के ले आए हो तो असत्य हुआ चोरी कि तुम फाइल देखना नहीं और मेरे को यह सिखाओ मत जहां रखी थी वही छोड़ो हम अगर सत्य के पूजारी हैं ईश्वर की सत्ता हमारी रक्षक है उन्हीं अंग्रेजों के हाथों से यह फाइल में लूंगा चोरी की नहीं कपट से नहीं कपट से आदमी की योग्यताओं का नाश हो जाता है योग्यता है मेरे परमात्मा के बच्चों लेकिन छल कपट से तबाही हो जाती रोटी में
भी महंगे लगते हैं बमान और ईमानदार आदमी तो कितना भी उसको दो कम भाई हमारा सार्थक हो गया बेईमानी से जितना घाटा होता है उतना तो महाराज अपने पैर पर को हाड़ा मारते तो उतना घाटा नहीं होता खाली पैर ही कटता है लेकिन बेईमानी से तो अंतःकरण इतना खराब होता है कि फिर गधे बनो बबुल के वृक्ष बनो पेड़ बनो मेंडक बनू तो ब बहुत घाटा होता है मन को जो पुस्तक अपना भला चाहते हैं तो झूठ कपट की आदत मिटाने के लिए मन को सीख पुस्तक पढ़ना चाहिए मेरे गुरुदेव के वचन है उसम मेरा
कुछ नहीं बनते भगत ठग जगत धर्म की जगह पर तो और ज्यादा भारी पाप लगता है किसी को ठगना धर्म के नाम पर धर्म की क्या हुआ कि गांधी जी तो अटक रहे किय तो छुपा के ले आया फाइल बोले बापू जी इसमें चोरी नहीं है व तो ऐसे नहीं चोरी असत तो असत होता है तू देखना मत और समय पाकर ऐसा गांधी जी का संकल्प दृढ़ रहा कि वह अंग्रेजों को वही फाल फाइल अपने हाथों से देनी पड़े कि लो महात्मा जी अब फिर उस पर बातचीत ई और जी विजय नेता कितनी मीठी मठी
बातें करते हैं कितना मस्का मारते फिर भी उनका इतना आदर नहीं रहेगा जितना गांधी जी का रहता पंडित लोग कितना कितना भाषण करते हैं बड़े-बड़े आचार्य कितनी कितनी ऊंची मंजी हुई बातें बोलते लेकिन मेरे गुरुदेव का जितना सत्य में आग्रह था और हित में उससे जो मेरे को लाभ हुआ वो दूसरे पंडितों से नहीं हुआ तो जो सत्य में रहता है ईश्वर शांति पाता है उसको तो फायदा होता है उससे अपन लोगों को भी फायदा होता है और जो बेईमान है चालू है कपटी है उसको अपना उसको तो नुकसान होता है लेकिन उसके संपर्क वालों
को भी धोखा ही मिलता है बेमान आदमी को रखना अपने पास कपटी को तोय तो सांप को दूध पिलाने जैसा हुआ ये तो बेमान लोगों को रखना यह तो अजगर का सिराना बनाकर जैसे पथिक अजगर का सिराना बनकर बनाकर सोए तो मूर्ख है जैसे चूहा सांप की फन की छाया में बैठे तो उसके लिए खतरा है छल छिद्र कपट छल करना दूसरे का छिद्र खोज के अपने को बड़ा बनना और कपट करना यह तीनों भगवान बोलते मेरे को कभी नहीं भाते में सबका अंतर आत्मा मन क्रम वचन छंडी छल जग जब लगी जनन तुम्हार तब
लग स्वपने ह सुख नहीं करे कोटि उपचार कितनी भी बेईमानी कर ली सुखी नहीं रह सकता थोड़ी देर के लिए हर्षित हो जाएगा लेकिन अंदर का सुख नहीं अंदर का द्वार नहीं खले द्वार ऐसे जैसे तुम्हारे कमरे केसा फट से द्वार खुल गया ऐसा नहीं है सूझ बूझ अंदर का जो होता है वहां द्वार कहना क्या करें शब्दों की कमी छल छिद्र कपट मोहे स्वपने न भावा प्रयत्न करें कि हमारे जीवन में छल रहिता है कपट रहिता है दूसरे के दोष देख हां किसी की भलाई के लिए कुछ कह देना वो अलग बात है लेकिन
दूसरे के दोष का फायदा उठाने के लिए दोष देखना बड़ा अथवा ऐसे दोष देखकर ना किसी को ठीक नहीं अगर संसार में सुखी रहना हो तो आपने की हुई भलाई उसको याद ना करो और दूसरे की की हुई बुराई को याद ना करो सपना है आप निश्चिंत में आगे बढ़ो मैत्री करुणा मुदिता उपेक्षा जो श्रेष्ठ जन है उनसे मैत्री करो जो आपसे छोटे उन पर दया करके उन्हें मौका दो सुधरने का करुणा मुदिता जो अच्छा काम कर रहे हैं उनका प्रोत्साहन कर दो अनुमोदन और जो निपट निराले नहीं मानेंगे उनसे उपेक्षा कर लो आप ग्रहस्ती
में भी शांति पाने के काबिल हो जाएंगे मैत्री करुणा मुदिता उपेक्षा आखा जगत ने क्या सुधार जा अने लोभ न कोई अंत नथी आ वधार ते वधार कर प्रारब्ध मा जतला पैसा से ला मल से रुपया और गधा तेरे भाग्य में वो जमाने में रुपया मतलब आज के 600 मान लो प्राचीन बोले बाबा मैं कितनी भी मेहनत करता हूं बस देखता हूं अमावस्या को साब तो मेरे पास छ रुप रह जाते रुप और गधा बच जाता बस बाबा ने कहा अच्छी बात है तो ये छ रुपया का भंडारा कर दे जो 10 20 25 साधु
जि मेंगे दक्षिणा दे देंगे वो जमाने में तो एक पैसे में आदमी जिम लेवे 64 साधु एक रुपए में जिम ले पा छ 30 300 लोग जमी सके थ तो सोने जमा बीजी दक्षिणा बची काड उस आदमी का विश्वास था युवक का गधा बेच दिया और ₹ का मंडा रखा गधा का और पैसे का मंडा रात को किसी सेठ को सपना आया कि सुबह उठते उठते लाने कुंभार को एक गधा और रुप दे आना नहीं तो तेरा सर्वनाश हो जाएगा वो सेठ दे गया साधु ने कहा देखो प्रारब्ध देवता कैसी कैसी लीला करता है तो
कर दे भंडार कर दिया भंडारा कोई दूसरे सेठ को प्रेरणा हुई ऐसे दो पांच जगह पर हुई आखिर प्रारब्ध देव आया महाराज को बोला बाबा मेरे को तकलीफ में डाल दिया आप इसको सब चट कर देते हो मेरे को इसका बैलेंस बनाने के लिए किसी ने किसी को प्रेशर देना पड़ता है तो बोले प्रारब्ध देव इसके भाग्य में छ रुप या पाच रुप और गधा लिखा है इससे दो चार मंडिया लगा दो बोले महाराज जो कहोगे कर देते लेकिन इसको रोज भंडारा मत करवाओ तो आपके प्रारब्ध में जो रहने वाला होगा वही रुकेगा बाकी तो
कोई खई जैसे क्या फसे जैसे जे प्रारब्ध में धन आवान सव से बहु बलखा ऐ करने गड़प जल्दी लाव पछी रोग पकड़ अन कोई पूछ से नहीं बहु ड्राइविंग नहीं करवान बहु चलता चलता बोलन नहीं थोड़ी शांति पामानी [संगीत] ओम दो कलाक रोज य रीते करने शांति पाम सवारे सांझे बप तो आटली मजूरी थी ज नहीं मल करता घण वधारे मल ईश्वर से आप जितने एक होते उतना प्रकृति अनुकूल हो जाती है जितना आप प्रकृति में फंसते हैं उतना जैसे छाया को पकड़ने भागते तो परेशान होते हो छाया को पीटते के सूरज के तरफ आते
तो छाया पीछे पीछे आती ओम की उपासना यह सूर्य स्वरूप ईश्वर में जाना है अ प्रॉब्लम जीरो ये रोज का एक लाख रप कमाता था एक लाख नहीं तो 70 800 हज तो 000 डलर रोज का कमा लेते 000 डलर लगभग एक लाख दो ाज डॉलर काटते कटते समझो ना पौना लाख रोज का तो 2 लाख रुप मने का अमेरिका में लेकिन शांति तो नहीं जो शांति में अंतर आत्मा में सुख है वह 20 लाख रुप महीने में क्या सुख है सब छोड़ के आ गए अमका इधर ही रहते हैं 20 लाख क्या होता है
मैंने कहा आखिर तो दो रोटी खानी और फिर ढेर करके छोड़ के ही तो मरना है तो बुद्धिमान वो है जो मरने के बाद भी ना जाए उस आत्म शांति का धन पाए अ मूर्ख वह है जो छोड़ के बड़ा ढेर करके मर जाए तो बड़ा गधा है कोई छोटा ढेर छोड़ के मर गया तो छोटा गधा है और क्या है ढेर छोड़ छोड़ के तो मरना है हम कर थम कर शांति पामो के ओम शांति ओम शांति