राम न सक नाम गुण गाई नाम प्रसाद शंभु अविनाशी जपा सिद्धि जपा सिद्धि अधिकम जपम अधिकम फलम सृष्टि के आदि में भगवान ब्रह्मा जी ने हजार दिव्य वर्षों तक समाधि की तप की फिर शुद्ध सत्व गुण वही सच्चिदानंद परब्रह्म परमात्मा संकल्प से सनक सनन सनद सनत कुमार चार रूप में प्रकट हु रजोगुण तमो गुण का लेश भी नहीं है अधिकतर जन लोक में विराजते हैं कभी-कभी भूमंडल पर विचरण करने को लोक मांगल्य के लिए पधार सनका य सं कादी ऋषियों ने नारद जी को श्रीमद् भागवत के उपदेश से भक्ति के दो पुत्र ज्ञान वैराग्य सजग
होंगे और भक्ति कि तुम घर-घर में स्थापना करने में सफल होंगे है तो पुरखों के पुरख है लेकिन पांच वर्ष के दिखाई देते हैं स वे जन लोक में रहते हैं और जन लोक के महापुरुष सदा भगवत चर्चा सुनते करते कराते हैं उसमें से एक वक्ता बन जाते दूसरे श्रोता बनते हरि कथा हरि गुण गान में ही उनका रसमय जीवन होता है नित्य नवीन रस भगवत कथा से भगवत ध्यान से बृंदावन में किसी बनिया किसी भक्त ने पूछा हाथी बाबा उड़िया बाबा हरि बाबा आनंदमय मां ये चारों उच्च कोटि के महापुरुष थे और मित्र थे
आपस आनंदम मां को तो इंदिरा गांधी गुरु के रूप में मानती थ और आनंदमय इन संतों के चरणों में आदर से मथा टेकते थ हरि बाबा के पास कोई आ गया कहा कि बाबा भगवान के नाम जप से क्या फायदा होगा वो संत बोले आज कोई मैंने पाप किया है आज मेरे से कोई पाप हो गया कि तुम्हारा दर्शन हुआ भगवान के नाम से क्या फायदा क्या जीवन नश्वर फायदे के लिए है कि भगवत रस से भी है क्या फायदा क्या फायदा तब हाथी बाबा ने कहा कि बाबा यह कोई बनिया लगता है य बनिया
का बच्चा है सभी चीज में फायदा फायदा खोजता है जो हिक फायदा खोज के कुछ करना चाहते वे ठगे रह जाते जो एक फायदे को छोड़कर भगवान ऐसे हैं कि भगवान के चिंतन बिना भगवान के नाम बिना भगवान की कथा बिना भगवान के गुणगान के बिना मन माने ही नहीं चाहे और कुछ भी कितना भी मिल जाए राम कथा सुनने को रसिया हनुमान जी भगवत कथा के रसिया शिव जी सत्संग के रसिया श्री रामचंद्र जी गुरुकुल में रहते तभी भी भगवत चर्चा कथा में और जब वनवास मिला तभी भी श्री रामचंद्र जी ऋषियों के आश्रम
में जाते और भगवत कथा श्रवण करते अगस्त मुनि के आश्रम में भगवान शिव जी कभी-कभी पार्वती को भी ले जाती भगवत कथा भ अयोध्या में वर्ष भर के लिए श्री राम जी ने वरदान मांगा शिव जी से कि आप वर्ष भर अयोध्या में और तो सब चीज एक चीज की कमी है भोलेनाथ आप आए वरदान देना चाहते हैं तो एक ही वरदान अयोध्या में आप एक वर्ष के लिए हमारे अयोध्या वासियों को भगवत चर्चा सुने आप सोचेंगे तो भगवान राम स्वयं थे भगवान शिव स्वयं थे तो फिर भगवत चर्चा क्या सुनाना हो तो भगवान को
देख ले लोग यह भगवान का बाह्य श्री विग्रह है लेकिन भगवान जसे भगवान है उस भगवत चर्चा से भगवत रस नित्य नवीन रस उत्पन्न होता है धर्मत बरती बराबर धर्म का अनुष्ठान करते हैं तो वैराग्य आएगा विषय विकार धर्मत विरती योगत ज्ञान योग ध्यान आदि करेंगे तो ज्ञान होगा ज्ञान क्या होगा कि ज्ञान त मोक्ष मोक्ष अर्थात बंधनों से इंद्रियों के आकर्षणों से बचकर नित्य नवीन रस की प्राप्ति जीवन की दो मांग है शांति और रस जिसको भगवत रस मिलता उसे भगवत शांति भी मिलती है भगवत शांति जो पाता है उसे भगवत रस भी मिल
जाता है चार प्रकार के रस होते हैं एक होता है विषय विकारों का रस शादी किया नई शादी है बड़ा रस आ रहा है इन जीवनी शक्ति का रास करके जैसे अपने गाल पर तमाचा मार के गाल लाल कर दिया ऐसे अपने शरीर को जो जीवनी शक्ति है कीमती ऊर्जा है उसको नष्ट करके भोग विकार भोगा शादी का मजा तुम लोगों को तो पता ही होगा शादी के दिन समझते थे कि बड़ा मजा है अब देखो क्या हाल है मजे के बदले में क्याक मिला है जिम्मेदारियां और सजा विषय ार का रस है खानपान से
जो रस आता है मजा आता है यह सब विषव का रस है यश सुनने से जो मजा आता है कान के द्वारा सुनने का मजा नाक के द्वारा सूंघने का मजा जीभ के द्वारा चखने का मजा संभोग के द्वारा स्पर्श का मजा इसको बोलते हैं क्रिया जन्य सुख अर्थात वि विकारों का सुख दूसरा होता है भाव जन्य सुख भगवान की मूर्ति को देख रहे मंदिर में अपने पूजा स्थली प प्रेम से पुष्प चढ़ा रहे हैं आरती कर रहे हैं सद्भाव से भगवान के आगे मत्था टेक रहे है तो शालिग्राम गंडकी नदी का पत्थर है लेकिन
भक्त उसको पथर नहीं मानता है भक्त के भाव में वह भगवान है पथर का निमित्त है मन को एकाग्र करने के लिए मूर्ति का निमि है लेकिन भक्त के मन में भगवत भाव मंदिर से जब लौटता है तो यह सोच के नहीं लौटता कि मैं दोज के बस हज केज के जयपुर के पथर का दर्शन करने गया था या करके आया वो तो भगवत भाव सुपी में भी करके अपना फायदा उठा सकते इसको बोलते भाव जन्य सुख तो विषय जन्य सुख से भाव जन्य सुख में खतरा नहीं है और सुख है मेहनत कम है हरा
नहीं है और सुख है लेकिन भाव भी लंबा समय नहीं टिकता है भाव जन्य सुख से भी एक कदम और आगे है शांत सुख विचार जन्य सुख नीति नीति नीति आखिर हवाई जहाज में भी क्या है हवाई पति में भी क्या है कोई सार नहीं तो भाव जन्य सुख से भी शांत सुख दे मिथ्या है जगत मिथ्या है आत्मा सत्य है परमात्मा सत्य उसमें शांत हु उस शांति से सामर्थ्य बढ़ता है शक्तियां आती है लेकिन शं सुख एक कदम आगे जाते नित्य नवीन सुख आत्मा का जैसे सागर में नित्य नवीन लहर उठती रहती लहराता रहता
है ऐसे इसी आत्मा परमात्मा का नित्य नवीन सुख प्राप्त होता है तो भगवत चर्चा भगवत ज्ञान भगवत श्रवण करते करते भगवतम वृति हो जाती श्रीमद् भागवत में लिखा है न चलति भगवत पदारविंदा त लवन मि शार दम मप यस वै वैष्ण आग्रह जो भगवत पदों से भगवत चरण अरविंद से ल निमेष मात्र भी दूर नहीं हटती जिसकी प्रति वैष्णव में भक्तों में अग्र गण है तो सं कादी ऋषि इस प्रकार के भगवत जन थे और जन लोक में ही विशेष विराज थे कभी-कभी भूमंडल में प आते ला राम थया न फलान आम थयो आ तो
बता राक्षसों नी वातो छ तो बधा पते पछ मर ई आम कर्य कन आम कर मन आम कर बधू तो ठिकाना विनानु जगत से हेडे जसेन कोई अंत नथी मन तू राम भजन कर जग मरवा दे वाइन पिए ने पिवा दे डिस्को करे ने करवा दे डॉलर गणे ने गवा दे मन तू राम भजन कर जग मरवा दे ऐसा करके भगवत रस पा लेता है भगवत ज्ञान भगवत शांति भगवत आनंद उसके आगे यह सारा संसार अमेरिका फ अमेरिका तो क्या सारा धरती तो क्या 14 भवन भी कोई विशेष माना नहीं रखते ऐसा वो भगवत रस
में तृप्त रहता है इसी के वर्णन में शास्त्र कहते सततो भवती तृप्त र स तृप्त भवती अपने आप में वो तृप्त है स अमृतो भवति बजाती जानी वा तो माने पर अंदर थ समझ गया ब स्वपना स्वपना माम थई ग तेम थ ग फला थ खुली तो कई नहीं बधू सरकत उ आए ये आए वो आए अंग्रेज आए गए सब कहां चले गए ऐसे ये सब वही चले जाए करोड़ों लोग कर करा के जहा हम चले गए खप गए ऐसे ही सब शशो ो वाले खप जाएंगे तुम ख अपने वालों के लाइन में मत जाओ
तुम तो अपने भगवत रस के तरफ संका दी ऋषियों ने नारद जी को सलाह दी कि श्रीमद् भागवत की कथा करने से लोगों की भगवता आकार वृति बनेगी जगत की बातें सुनने से जगता आकार चित बनता है फलाना जगह बड़ी प्राचीन है लेकिन भाई मेरे तुम्हारे से बढ़कर कोई प्राचीन नहीं ये 15 हज वर्ष पुराना है लेकिन तुम सृष्टि नहीं थी उसके पहले के हो अभी भी हो और बाद में भी रहोगे तुम्हारी पुराना पन के आगे 15000 वर्ष क्या होता है तुम अविनाशी आत्मा हो परमात्मा के सनातन स्वरूप यह सत्संग से पता चलता है
किसी ने सुना दिया तुम यह हो तुम पापी हो तुम जीव हो तुम ऐसे हो तुम बनिया हो तुम मारवाड़ी हो यह सुन सुनकर मान लिया बेचारे ने लेकिन भगवान कहते उस बात को जान लो भगवान कहते मम वांस जीव लोके जीव भूत सनातन तुम मेरे वंशज हो अंश हो सनातन हो सृष्टि के पहले तुम थे अब भी तुम हो और सृष्टि नाश हो जाए शरीर नाश होने के बाद जीव रहता है इससे प्रलय होने के बाद भी तुम प्रकृति में सोए विश्राम करते हो फिर सृष्टि होती तो तुम उत्पन्न हो जाते जैसे हए नहीं
चलती तो लहर शांत हो जाती फिर हवाए चली तो फिर वह लहर तो प्राण लहर तो पहले थी कुछ समय तक नहीं दिखती ऐसे कुछ समय तक प्रकृति में विश्राम करने को पर हो जाता है जीव शांत हो जाता कुछ नहीं रहता कुछ नहीं रहता उसको भी जानने वाला तो रहता है ना कुछ नहीं रहने का भी तो पता रहता नहीं एक सूरज ऐसे 12 सूरज आकाश गंगा के तपते हैं तो धातु भी पिघल जाता है सब वाष्प भूत हो जाता है फिर बरसात पड़ती है सारी धरती भरती सब जलमय हो जाता है 100 वर्ष
तक ऐसा रहता है फिर भगवान अवतार धारण करके जैसे कश्यप अवतार धारण किया वरा अवतार धारण किया ऐसे फिर भगवान अपने अपने युग के अनुसार पृथ्वी को धरातल प लाते इस बार पृथ्वी जलाशय से बाहर आई तो पहले पहले कैलाश हम अमेरिका गए तो पूछा किसीने ये हिंदुस्तान में इतनी भक्ति और भगवान अवतार क्यों लेते हैं और जगह भगवान क्यों नहीं आते तो भाई जहां बारिश होती है वहां हरियाली होती है जहां हरियाली होती है वहां बारिश होती है ऐसे ही जहां पृथ्वी में पहले कैलाश उबरा भगवान संभ सदास फ ऋषि मुनि तो जहां पर
ऋषि मुनि और भगवान और भगवत चर्चा है वहां भक्त होते हैं और जहां भक्त होते हैं व भगवान आएंगे बारबार जहा हरियाली वहां बारिश व जहां बारिश वहां हरियाली वो भगवत रस जो है नित्य नवीन रस उसकी प्राप्ति का सुंदर उपाय है भगवन [संगीत] नाम सुबह दोपहर शाम को 10 द प्राणायाम करे विधिवत एक महीने के अंदर प्राण शुद्ध हो जाएंगे मन पवित्र हो जाएगा भगवत रस के द्वार खुल जाए एक महीना विधिवत करें जैसे शवास लेते देते लेते देते तो एक मिनट में तेरा स्वास खर्च हो जाते अगर स्वास ताल बध चलने लग जाए
तो एक मिनट में 10 स्वास मेंही काम चल जाएगा तो 30 टका 25 टका आयुष्य बढ़ जाएगा फिर बुद्धि पर कुछ संस्कारों का और कुछ बात पित कफ के दोष का प्रभाव होता है जैसे कांटा घूमते मैल जम जाता है तो घड़ी आगे पीछे हो जाती स्लो आद हो जाती ऐसे हमारा मति का केंद्र है उस पर भी कर्मों का वात पित कफ का जड़ता तो बुद्धि सूक्ष्म निर्णय नहीं कर सकती दिव्य निर्णय नहीं कर सक तो 25 प्राणायाम रोज करें गर्दन को पीछे दबा के लंबा शवास ले और छोड़े बुद्धि विलक्षण हो जाएगी विद्यार्थियों
के लिए तो वरदान महाराज खड़े होकर बता देंगे ऐसा करें गर्दन ऐसी करें दबाए पीछे तो यहां दबाव पड़ेगा उन नाड़ियों पर और शवास लिया जोर से मन में गिनते गए बस 25 स्वास गन लेवे कैसा भी बुद्धु विद्यार्थी हो छ महीने के अंदर तो उसके कुटुंब धन्य धन्य हो जाए याद नहीं रहता हो स्मृति शक्ति कमजोर हो तो गर्दन आगे झुका के 25 स्वास ले लेकिन एक बार 25 ले तो फिर 24 नहीं रोज करें तो दोषों का पापों का और स्थूलता का उन्मूलन होने लगेगा सूक्ष्मता आएगी फिर प्राणायाम करके एक मिनट तक स्वास
रोके मुडा पा जल्दी नहीं आएगा नाड़ियों स्फूर्ति रहे रक्त का संचार होगा प्राणवायु का संचार होगा जल्दी से कोई जीव लेवा बीमारी नहीं आ मन पवित्र रहेगा और शवास रो के फिर धीरे-धीरे छोड़े सब पांच प्राणायाम करे पहले फिर 6 सात आन 10 तक आ जाए 10 प्राणायाम सुबह 10 दोपहर 10 शम एक महीने के अंदर विकारी रस से मन ऊपर आ जाएगा भावना का रस बढ़ जाएगा विचार का रस बढ़ जाएगा और नित्य नवीन रस के द्वार पहुंच जाए ऐसे सुंदर सुंदर उपाय मिल जाते कबीर जी ने कहा भटक मुआ भेदु बिना पावे कोन
उपाय खोजत खोजत युग गए जी शांति चाहता है नित्य नवीन रस चाहता है थोड़ी देर बातचीत किया मजा आया तब तक नहीं तो फिर चलते ब खाया पिया जो भी कुछ करता है रस के लिए ही करता है ये विकारी रस विषय रस इससे तो भावना का रस ऊंचा भावना से तो विचार रस ऊंचा है विचार रस से भी नित्य नवीन रस अंतरात्मा का जागृत करें बड़ी बहादुरी की बात तो संकादंगल ऐसे महापुरुष अनित्य नवीन रस भगवत चर्चा भगवत कथा से बढ़ता रहता है कथा कीर्तन जा घर नहीं संत नहीं मेहमान वा घर जमरा डेरा
दिना सांझ पड़े समन कथा कीर्तन जा घर भयो संत भए महमान वाघर प्रभु वासा की वो घर वैकुंठ समान घर माना वही हृदय तो भगवत जप भगवत ध्यान भगवत जनों का संग और नित्य नवीन रस पैदा करने वाली भगवत कथा गहरा स्वास लो कमर सीधी गर्दन [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] सीधी कृष्ण कन्हैया बंसी बजैया बृंदावन की कुंज गलियों में भक्तों की दिल की गलियों में त नित्य नवीन रस देने वाले दाता प्रभु तुम्हारी जय हो तुम हमारे हृदय में छुपे रहते हो तुम आनंद स्वरूप हो तुम प्रेम स्वरूप हो तुम प्रेरणा दाता हो तुम कर्मों
के नियामक हो कर्मों के प्रेरक हो कर्मों के फल दता हो और प्राणी मात्र के सुहृद और सबके साक्षी सबके साथ और सबसे न्यारे जैसे आकाश सबके साथ और सबसे न्यारा जैसे सूर्य का प्रकाश सबके साथ और सबसे न्यारा ऐसे परमेश्वर तुम सब शरीरों के साथ और शरीर मर जाए फिर भी तुम और तुम्हारा जीवात्मा [संगीत] शाश्वत सनातन अंश अमर रहते हो प्रभु तुम्हें प्रणाम हे हृदयेश्वर हे परमेश्वर हे दीन दयाल बरद संभारी हर नाथ संकट भारी संकट य कि मिथ्या जगत सच्चा लग रहा है नश्वर वस्तुएं और नश्वर बातें सच्ची लग रही है असत्य
त शाश्वत है और भुला सा जा रहा है यही तो भारी संकट है ना हे देव हे दीन बंधो कृपा सध त मीरा का कन्हैया तू शबरी का राम तू प्रहलाद का नरसीह भगवान और सका दी ऋषियों का अपना [संगीत] अ अनेक रूप तेरे अनेक नाम तेरे और सभी रूप और नामों से न्यारा भी तो मारा वालड़ा मरा कानुड़ा कन तो नाम राख मारा देन प मारा कानड़ धन लाग पटेल खात [संगीत] जाए ओम आनंद ओम शांति ओम माधुर्य ओम नमो भगवते वासुदेवाय ओम नमो भगवते वासुदेवाय वासुदेवाय इष्ट देवाय प्रभु देवाय आनंद देवाय हरि ओम
हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि [संगीत] ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम ओम हरि ओम हरि ओम मा हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि [संगीत] ओम ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम राम ओम श्याम ओम शिव ओम शिवओम राम हरि ओम
हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओ हरि ओ [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] हरि ओ [संगीत] ओ [संगीत] ओ नारायण नारायण नारायण ओम नारायण नारायण नारायण हे मुनीश्वर आपके दर्शन से मैं अब पूर्ण आनंद को प्राप्त हुआ हूं जो नित्य नवीन रस में रहते हैं ऐसे महापुरुषों के दर्शन से भी अंतर का आनंद अंदर की शांति बढ़ती है सन कादी ऋषि उसमें के महापुरुष संत की संगति चंद्रमा की चांदनी सी शीतल और अमृत की नाई आनंद को देने वाली है संत का दर्शन संत की संगति चंद्रमा की नाई चंद्र तो गौण शीतल है बाहर की शीतलता
देता लेकिन संत का संत अंतःकरण में भगवत शीतलता देते इसलिए संत की संगति बड़े भाग्य से मिलती नहीं तो लोग विषय विकारों के ल में फसक छटपटा के जीवन पूरा कर लेते संत की संगति मिलने से भगवत रस शांत रस नित्य नवीन रस तक ऊंची यात्रा कर सकता है इसलिए वशिष्ठ जी कहते राम जी चंडाल के घर की भिक्षा एक टाइम मिल जाए ठीक में और संतों का सत्संग मिल जाए आत्म ज्ञान का तो अन्य ऐश्वर्य का त्याग करके सत्संगति कर चाहिए भगवान कृष्ण ने धव को कहा कि संसार बंधन से छूटने के दो उपाय
है मेरी भक्ति और संतों का सत्संग हे राम जी ऐसा कौन है जो संत के संग से आनंद को प्राप्त न हो ऐसा कौन है जो संत का संग करके ईमानदारी से आनंद को प्राप्त ना सभी संत के संग से आत्मानंद को प्राप्त हो जाते हैं संत का संग चंद्रमा के अमृत से भी अधिक है क्योंकि वह तो शीतल गौण है हृदय की तपन नहीं मिटाता और संत का संग तो अंतःकरण की तपन को मिटा देता है वह अमृत क्षीर समुद्र मंथन के ोप से निकला है और संत का संग सहज में ही सुख को
प्राप्त होता है और आत्मानंद प्राप्त कराता है इससे यही परम उत्तम है मैं तो इससे उत्तम और कोई भी वस्तु नहीं मानता संत का संग सबसे उत्तम है हे राम जी संत भी वही हैं जिनकी आरंभ में रमणी सारी इच्छा ण ठ पठ फला जागती ण की इच्छा जिनकी शांत हो ग ऐसा पाऊ ऐसा बनू ऐसा करू य उलझने वाली इच्छा जो उलझने वाली इच्छा जिनकी शांत हो गए वे संत अंतरात्मा के सुख में हे राम जी जिसका चित आशा रूपी फांसी में बंधा है वह संसार समुद्र से पार नहीं हो सकता जैसे जिस पक्षी
के पंख टूटे हुए हैं सो समुद्र को नहीं तर सकता बीच में ही गिरकर गोते खाता है और गरुड़ पंखों से शीघ्र ही लांग जाता है तैसे ही जिन पुरुषों के वैराग्य और अभ्यास रूपी पंख टूटे हैं वे संसार समुद्र से पार नहीं हो सकते और जिन पुरुषों ने वैराग्य और अभ्यास रूपी पंख हैं वे शीघ्र ही तर जाते हैं हे राम जी जैसे केशरी सिंह पिंजड़े को तोड़कर निकल जाता है तैसे ही ज्ञानवान पुरुष भोग वासनाओं के बंधनों को तोड़ डालता है यश भोग तो बड़ा खतरनाक है पांचों इंद्रियों का हो जीव को वियोग
में कर देता है ईश्वर अपना आत्मा होते हुए भी कहां तो अनंत ब्रह्मांड का स्वामी है जी और कहां बेचारा भटक रहा है भोगी पछताते इसको सब कोई क्या जाने ऐसा कोई सुख भोग नहीं जिसके पीछे दुख भय और रोग भोगी होकर पछताते इसको सबको कोई क्या जाने हम गुरु संदेश सुनाते सुनाने वाले भी सुनाते मानने वाले कोई कोई माने हे राम जी जितनी जितनी जगत की इच्छा जीव को उतना उतना तुच्छ उतना उतना लागू जितनी इच्छा कम उतना ऊंचा इच्छा नहीं तो जीव ही तो ब्रह्म रूप है परमात्मा रूप है चा चमारी चहरी नी
चन की नीच तू तो पूर्ण ब्रह्म था जो चाह न होती बीच चाहा से इच्छा से तुच्छ हुआ है गहरी नींद में कोई इच्छा नहीं होती तो कितना शांत होता है जितना दुनिया की ज्यादा इच्छा करते उतना तनाव टेंशन बढ़ता है और होते होने वाला वही होता है जो प्रारब्ध में होता है मुर्दे को प्रभु देता है कपड़ा लकड़ा जिंदा नर चिंता करे उसके बड़े अभग चिंता की बजह चिंतन कर अपने शुद्ध बुद्ध आत्मा का परमात्मा का आनंद का नित्य नवीन रस का चिंतन कर जगत का चिंतन तो राग द्वेष देगा भगवत चिंतन भगवत रस
देगा भगवत शांति देगा भगवत माधुर्य देगा नारायण नारायण नारायण नारायण