[संगीत] [हंसी] [संगीत] शिखा जी दिल्ली से राधे राधे राधे राधे महाराज जी महाराज जी किसी भी जन से अधिक समीप प्राय मानसिक कष्ट का कारक क्यों बनती है हां क्योंकि ममता दुख का हेतु है ममता दुख का है तो किसी शरीर से क्या अपने शरीर से ही अपने शरीर से भी अधिक प्रेम करोगे तो तुम्हारे दुख का हेतु बनेगी अगले जन्म का हेतु बन जाएगी उपाय भगवान से ममता उपाय सबकी ममता ताग बटोरी भगवान ने बोल रहे मम पद मनही बांध बर डोरी भगवान से ममता जोड़ लो अभी आनंद की प्राप्ति होने लगेगी प्रभु से
श्री कृष्ण से श्री राम से श्री हरि से अपनी ममता जोड़ लो उससे आनंद की प्राप्ति होने हमें आनंद क्यों नहीं मिलता दूसरे की ममता से क्योंकि उसका मन है उसकी बुद्धि है और चाहते कि हम आपको प्यार करें तो आप मेरे मन के अनुसार चले आप मेरी बुद्धि के अनुसार चले नहीं आपका भी मन है आपकी भी बुद्धि है तो थोड़े दिनों के बाद अपने अपने मन का रास्ता तो फिर वह हमको दुख होता है कि हमने इसको इतना प्यार किया हम इतना समर्पण हुए इसके लिए लेकिन यह हमारे लिए कुछ नहीं अपनी तरफ
से इतना करे इंशा उसके बाद आगे सेना हां ना मिलेगा नहीं मिलेगा क्योंकि उसका भी मन है उसकी भी बुद्धि है समझ रहे ना हा इसीलिए अंततोगत्वा जो विवेकी है वह पूरे संसार में घूमने के बाद जब देख लेते हैं कि इसमें कोई मेरा नहीं है असली में कोई नहीं तो वह फिर भगवान की शरण में जाते संभलना बहुत मुश्किल हो बड़ा मुश्किल है बड़ा मुश्किल है उसी मुश्किल को संभालने के लिए तो अध्यात्म है बस आपको जब से सुनना शुरू किया थोड़ा सा क्या माया उसी को संभालने के लिए में भगवान अपने भक्त पर
जब कृपा करते हैं तो ज्ञान का चश्मा दे देते हैं उस चश्मे में दिखाई देता कोई अपना नहीं कोई अपना नहीं है तब मन भागता कि कोई तो अपना होगा तो वो निकलते हैं भगवान दूसरा कोई नहीं निकलता देखो आपको तब तक कोई प्यार करेगा जब आपसे बढ़कर कोई नहीं मिलेगा और जिस दिन उसको आपसे बढ़कर लगा भले ना हो आपसे बढ़कर लेकिन उसको लगा वो आपको छोड़ देगा और यह मन का स्वभाव है यह मन का स्वभाव है वो नवम नवम चाहता है इतने साल करके वो लगता है क्यों ऐसा क्यों हुआ नहीं ऐसा
होगा क्योंकि ऐसी रीति है संसार की हम तो कई बार भरथरी जी का चरित्र सुनाया है कई ऐसे चरित्र सुनाए मन की रीति ऐसी है मन की रीति ऐसी यहां प्यार नहीं मिल सकता यहां कोई प्यार नहीं कर आर पार आर पार का निर्वाह मतलब जिसे और छोर कर निर्वाह कहते ना यहां नहीं हो सकता यहां नहीं हो सकता संसार में नहीं कर सकता संसार में आपके पास रूप है आपके पास गुण है आपके पास धन है आपके पास बुद्धि जो देखकर आपसे जुड़ा है वो जब तक है तब तक आपसे प्यार जिस दिन उससे
बढ़कर मिल गया तो आपको छोड़ देगा या वोह वस्तु आप पर नहीं तोव छोड़ देगा वो फिर निर्वाह नहीं करेगा वो इसका निर्वाह भगवान करते हैं भगवान प्यार करते हैं दूसरा प्यार नहीं करता हमारे मन में बचपन में यही बात आई थी कि मेरी मां पधार जाएगी तब फिर मैं कैसे जिऊंगा मेरे पिता चले जाएंगे तब कैसे जिऊंगा मेरा भाई चला जाएगा तो कैसे जिऊंगा तब लगा कि मेरा है कौन फिर तब लगा व है तो भगवान तो भाग फिर भगवान की प्राप्ति के लिए तो कक्षा नौ में साइनसाइट पढ़ रहे थे उसी समय फिर
भाग पड़े नाइंथ पास हुए साइंस साइड और भाग पड़े भगवान की खोज में और पूरा जीवन भगवान से तो अब हमा कोई भूख थोड़ी है कि हमें कोई प्यार करे हमें कोई मान करे हमसे कोई मिले हमें कोई चा नहीं ऐसे महान की प्राप्ति जब हो जाती है जरा सा अपनापन हो जाए तो संसार छूटने लगता है फिर उसके प्यार को प्राप्त कर ले तो फिर क्या कहला है हा अब सब रूपों में वही प्यार कर रहे देखो 13 वर्ष से लेकर 35 वर्ष तक जो हमारे जीवन की यात्रा रही कभी भरपेट भोजन नहीं मिला
भारी कष्ट भारी अपमान जब भ्रमण में रहे 35 वर्ष की अवस्था में वृंदावन आ गए थे वृंदावन में जब आए तो जो अब देखो लाखों नेत्रों से भगवान प्यार करते हैं लाखों नेत्रों से सुबह जब हम आते हैं देखो कितनी भीड़ होती है लोग दर्शन के लिए ख वो दर्शन देने के लिए खड़े अच्छा हम कोई हीरो हीरोइन है क्या भाई आप विचार करके देखो हमें कौन देखना चाहे हमको हीरोइन बाबा जी है नहीं बाबा जी है ना तो देखना क्या चाहते हैं मेरे भगवान इतने रूपों में मुझे प्यार देने आते हैं ही आप है
हम यह देखते हैं ना कि इन सब रूपों में मेरे भगवान प्यार करने आ जिसके लिए हम जिंदगी भर तो वो आज हमको आखिरी में जीव जब भगवान से प्यार करता है अब देखो मरने का भी डर नहीं क्योंकि मर के मैं उन्हीं से मिलूंगा जिनके लिए जीवन भर भजामि का और उसके मिलने का समय हो तो तुम्हें डर लगेगा क्या तुम्हें तो उत्साह होगा तो जीवन भर जिससे मिलने की चा की अब शरीर छूटकर से मिलने का समय आ रहा है अब तो आनंद है अच्छा जिसने भगवान को नहीं बजा अब परिवार से प्रेम
किया अब यही छूटने का समय आ तो घबरा ले जाएगा वो कि जिनसे हमारा अपनापन है वो तो छूट रहे हैं अब हम कहां जाएंगे मर के पता नहीं कहां जाएंगे हमें पता है मर के हमें कहां जाना है अपनी लाडली जी के पास जाना है अपने प्रभु के पास जाना है तो वही हम सिखा रहे हैं कि यहां प्यार धोखे का है यहां कोई किसी से प्यार नहीं करता अपनी सुख वृत्ति से आपकी पूर्ति सुख की हो नहीं उसको परवाह अपनी सुख वृत्ति की पूर्ति के लिए व आपसे प्यार कर रहा है अपनी सुख
वृति के लिए आप गौर से देखना अपना मतलब निकल गया बस बस और यह जब बात आपको समझ में आ जाएगी कि मेरे से कोई प्यार नहीं करता अब मैं उससे प्यार करूंगी जो सिर्फ मेरे से प्यार करता है और वो भगवान है वो सिर्फ भगवान है पुनीत जी करोली राजस्थान से राधे राधे महाराज जी आपके चरणों में कोट कोटि महाराज जी मैं अपनी मनोदशा आध्यात्मिक विकास तथा मानसिक शांति के लिए श्रीमद् भगवत गीता को पढ़ना चाहता हूं किंतु मुझे इसके नियमों का ज्ञान नहीं कि मैं इसको कैसे पढ़ूं क्या क्योंकि कभी समझ नहीं है
वैसे पहले किसी संत से या भगवत प्रेमी भक्त से इसे सुनो बैठकर चुपचाप और फिर स्वयं करोगे तो ज्यादा अनुभव होगा आध्यात्मिक उन्नति के लिए मनो शांति के लिए प्रथम सुने भागवत भक्त मुक्त भगवत वाणी भगवत वाणी गीता या भागवत किसी भगवत प्रेमी महात्मा से सुने ठीक है ना अगर ऐसा अवसर नहीं मिल रहा तो पूज्य स्वामी श्री राम सुखदास जी द्वारा रचित बहुत सुंदर टीका की गई है साधक संजीवनी नाम है उसका वो खरीद लो और स्नान करके एकांत में पहले भगवन नाम जप करो और फिर पढ़ो अर्थ सहित व स्त टीका है फिर
समझ में आ जाएगी साधक संजीवनी टीका गीता पश से मिल जाएगी आप उसको खरीद लो पूज्य स्वामी श्री राम सुखदास जी महाराज नाम सुना होगा नहीं सुना हा अभी नए जगत में आए हो तो नाम नहीं सुना व पधार चुके अंतर ध्यान हो चुके बड़े महापुरुष थे गीता जी में ऐसी सुंदर टीका स्वामी जी महाराज ने की है श्री स्वामी राम सुखदास जी ने कि एक बार अगर से समझकर पढ़ ले तो फिर और किसी टीका को पढ़ने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी बहुत सुंदर विस्तृत बढ़े आनंद में मतलब जैसे नहीं कहते आनंद आ गया
रसोई चक बनी हो ना जैसे कहते आनंद आ गया ऐसे स्वामी जी महाराज ने जो गीता जी की टीका की बिल्कुल सरल भाषा में दिव्यता खोल के रख दी गीता जी की तो पहले तो नाम जप करो और किसी संत महा भागवत के मुख से गीता सुनो और फिर एकांत में जब मनन करोगे तो ज्यादा लाभ मिलेगा और गीता मनन करने के लिए सबसे पहले नियम है कि श्री कृष्ण भगवान को अपना मान ले अपना स्वामी मान ले मित्र मान ले गुरु मान ले सर्वस्व मान ले यहीं से गीता जी प्रारंभ होती है शिष्य सतेम
साधि माम प्रपन्नतिहरे आप ही हमारे पिता हो आप ही हमारे सर्वस्व हो और फिर गीता जी पढ़े कृष्ण के होके तब वो गीता समझ में आएगी और वो अपने आनंद के लिए अध्यात्म उन्नति के लिए दूसरों को उपदेश देने के लिए नहीं अपने अध्यात्म उन्नति के लिए तब फिर गीता जी रंग गीता का रंग आ गया तो फिर वो जीवन मुक्त कर देती है गीता जीवन मुक्त कर देती है समझ पा रहे हो नाम जप करो अच्छे आचरण करो यही गीता जी की योग्यता है मान लो बाहरी स्नान करके बैठ गए फिर क्या है बाहरी
स्नान क्या है हम बाहरी स्नान का ज्यादा महत्व नहीं रखते बच्चा ऐसा नहीं तीन बार स्नान करते हैं पर बाहरी स्नान का महत्व नहीं त्रिकाल स्नान करते बचपन से ब बाहरी स्नान का महत्व नहीं रखते क्योंकि पता है यही सोच भरी है नहीं सोच लघुशंका यही तो बरी मूत्राशय मलाशय यही है अब जैसे एक बढ़िया रेशम की थैली हो और उसमें सोच भर दी जाए और ऊपर से पैक कर दी जाए अब आप उसको बढ़िया जल से धो लो और अगर जिसको पता इसमें सोच भरी तो वो छूना चाहेगा क्या लगेगा ना पवित्र है यार
तुम बाहर से 100 बार धो दो है तो सोच ही तो एक चमड़ी का भर खेल है नहीं य मलाशय मूत्राशय है तो क्या पवित्रता पवित्रता मन की मन की पवित्रता तन की पवित्रता तो चाहे जितना धोलो अपवित्र ही बना रहेगा मन की पवित्रता मन कैसे पवित्र होता है मन अपवित्र होता है संसार को अपना मानने से और मन पवित्र होता है भगवान को अपना मानने से भगवान को को अपना मानकर जब हम नाम जप करते हैं तो अपवित्र पवित्रो वा सर्वा वस्तो पिव या स्मर पुंडरीका क्म सवा अभ्यांतर सुच वो बाह्य और अंतर से
परम पवित्र हो जाता है जो भगवान को अपना मानकर कमल लेन श्री हरि का स्मरण करता है तो भगवान को अपना मानकर उनका स्मरण करते हुए जब गीता पढ़ोगे तो भगवान समझा देंगे स्वय जाने ज देहु जनाए जिसे भगवान अपना ज्ञान दे देते हैं वही सच्चा ज्ञानी होता है ठीक है पूजा गुप्ता जी दिल्ली से राधे राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि नमन महाराज जी उड़िया बाबा महान ईश्वर प्राप्त संत है परंतु उनका महापरायण बहुत दुखत हुआ था महाराज जी इसके पीछे भगवान द्वारिकाधीश सर्व लोक महेश्वर परायण हो रहा है तो चरण में
बाण संधान हो रहा है जिन महापुरुषों ने अपने शरीर को पुराने कपड़े की तरह पहले से ही त्याग दिया है तो पूर्व जन्मों का अनंत जन्मों का प्रारब्ध होता है बाबा के आश्रम में ही किसका प्रश्न है हां बाबा के आश्रम में रहते थे मोर छल करने के लिए आए पहले मना कर दिया निज सेवकों ने पता नहीं उसके दिमाग में कौन सा कर्म प्रेरित करके लाया कि ऐसे निर्मल महापुरुष के शरीर को जहां कुंतल मनो पुष्प चढ़े थे वहां गड़ा से जिनका कभी स्वप्न में भी किसी के प्रति राग द्वेष हो ही नहीं सकता
वो तो सिद्ध महापुरुष भगवत ब्रह्म स्वरूप ऐसे महापुरुष की तो केवल उड़िया बाबा की नहीं बहुत से ऐसे महापुरुषों की लीलाएं हुई मगनान सरस्वती जी महाराज सेन आपु के हम काफी समय वहां रहे हैं गंगा के किनारे तो एक संत आए तो गांजा वांजा पीते थे तो अन्य संतों ने उनको विरोध किया कि ऐसे संत को तो स्वामी जी ने मगनान सरस्वती जी ने उसे विशेष प्यार दिया जब उनके पास दूध लाया जाता तो उसके पास जरूर भिजवा सबने कहा बड़ा उपद्रव करता है अपने मतलब साधकों के लिए बहुत हानिकारक है जब उनसे शिकायत करते
तो कहते नहीं यहां सब कोई रह सकता है ये प्रभु का आश्रम है सब कोई रह सकता है एक दिन वो बाबा से कहा कि आपका यश सुनकर हमको बहुत जलन होती है उन कहा मिटा लो आपको जैसे जलन मिटाना फरसा टाइप रखता था 2 बजे रात के उठे मगनान से आठ 10 जगह उनको और आठ 10 शिष्य थे सब पर से गायब हो गए देखो भगवान की तीन प्रकार की लीला है सृजन पालन और संहार वह अपने आप से अपने आप का सृजन करते हैं अपने आप से अपने आप का पालन करते हैं अपने
आप से अपने आप का लय कर लेते हैं तो ब्रह्म बोध महा संपन्न पुरुष हैं यह लीला करके दिखा रहे हैं कि शरीर के अंतिम गति यही है इसका नाश ही है कुछ हमको उस पर ज्यादा नहीं जाना चाहिए हमें देखना चाहिए जीवित अवस्था में हमारे द्वारा परम पवित्र आचरण हो भगवत चिंतन हो अब इसके बाद शरीर की क्या लीला होगी बड़े प्रेमी महापुरुष थे बक्सर के मामा जी और एक्सीडेंट में शरीर पूरा हो गया गाड़ी से जा रहे थे कथा कहने बस एकदम राधा फिर शरीर और जानकी जी को बहन मानते इसीलिए जगत मामा
थे बक्सर वाले बड़ा विचित्र है अंतिम लीलाएं तो जो संयोग बना है प्रारब्ध का शरीर का अंतिम वो होगा सुनो भरत भावी प्रबल बिलख कहो मुनि नाथ हानि लाभ जीवन मरण जस अपजस विधि हाथ ये विधान के हाथ है अगर मरना है जैसे तो वैसे मरना यह पक्का है इसमें देखो भगवान ने अपनी लीला संवरण करने के समय दिखाया ले अ अयोध्या नाथ परिकर सत सरियों में और द्वारिकानाथ अपने चरणों में बाण का संधान से कर अंतर तो भगवान का कौन सा प्रारब्ध है लेकिन लीला है अंतिम संघार लीला समरण लीला ये ऐसी है भगवान
की बड़ी विचित्र लीला है इसीलिए जीते जी भजन कर ले और शरीर से राग मुक्त हो जाए यही खास बात है बाबा तो जीवन मुक्त महापुरुष ब्रह्म स्वरूप थे उनका तो कोई अंतर नहीं प्रजल इटावा से महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी जिन दिनों में परेशान रहता हूं समस्या में रहता हूं उन दिनों में मेरे ईश्वर में खूब ध्यान लगता है और जब मैं खुश होता हूं तो ध्यान की कमी हो जाती है महाराज जी क्या यह मानव स्वभाव है या यही स्वार्थ है अभी भगवान में ध्यान लगा नहीं बच्चा नहीं
अनुकूलता प्रतिकूलता और सुख दुख का कोई महत्व नहीं ऐसा नहीं है पर दुख में गाढ़ चिंतन तुम्हारा होता है और सुख में चिंतन भूल जाते हो मुझे विश्वास ही नहीं होता क्योंकि जब गाढ़ चिंतन होने लगेगा तो फिर उसका स्वाद मिलेगा और स्वाद मिलेगा तो उससे बढ़कर सुख क्या है फ कौन सा सुख है जिसमें तुम प्रभु को भूल जाते हो हम प्रभु को तभी भूलते हैं जब प्रभु से ज्यादा हमें कुछ अच्छा लगता है आप देखना भाई किसी वस्तु को हम तभी त्याग हैं जब उससे श्रेष्ठ मिल जाए तो प्रभु के गाढ़ चिंतन से
श्रेष्ठ कोई सुख लगा इसका मतलब स्वाद ही नहीं मिला अगर स्वाद मिला होता तो त्रिभुवन की राज्य लक्ष्मी देने पर भी जो आधे पल के लिए प्रभु का विस्मरण ना करें उसे भगवान का भक्त कहते हैं तो अभ्यास आपने शुरू किया है अभी अभी कोई स्वाद तो मिला नहीं तो इसलिए जब संसार अनुकूलता मिलती है तो हर्ष आ जाता है और हर्ष समय फूल करके प्रभु को भूल जाते हो और जब प्रतिकूलता आती है तब लगता है अ समस्या का समाधान तो भगवान ही है तो हम भगवान का स्मरण करने लगते हैं वो कोई प्रेमी
का भजन नहीं है व एक परिस्थिति का भजन है लेकिन अच्छा है किसी भी भाव से भगवान से अगर हमारा चित्त जुड़े तो मंगल ही होता है तो अब आप विचार वान बनो क्योंकि अब संत संग मिला कि कौन सी ऐसी वस्तु है जो हमें भगवान को भुलवा देती है कौन सा ऐसा व्यक्ति है कौन सी ऐसी घटना है कौन सा ऐसा सुख है जो हम भगवान से भी श्रेष्ठ माने तो जिस समय हम भोजन कर रहे हैं जिस समय हम किसी से बातचीत कर रहे हैं जिस समय हम किसी भी भोग को स्वीकार कर
रहे उस समय में खास भगवान के नाम को पकड़ना चाहिए एकांत में या दुख के समय जब तुम्हारा मन लग जाता है तो बड़े सौभाग्य का विषय अब हमको देखना चलते हुए बातचीत करते हुए स्नानादि क्रिया करते हुए या भोजन करते हुए या किसी भी क्रिया में भगवान का विस्मरण होता है उनको जिनका अभ्यास दृढ़ नहीं है हमको इन्हीं में अभ्यास करना है जब अभ्यास दृढ़ हो जाएगा तो उठते बैठते चल फिरते खाते पीते सोते जागते हर समय हमारी स्थिति भगवान में रहेगी क्योंकि भगवान से बढ़कर अब हमारी दृष्टि में कुछ नहीं है और जब
तक भगवान से बढ़कर कुछ है तब तक विस्मरण है पक्का है है नहीं आप देखो ना म आपके मिलने पर हमें भगवान की स्मृति गई भूल गए तो आप श्रेष्ठ हो गए ना भगवान लघु हो गए मतलब हमारा इतना गिरा हुआ स्तर भगवान के लिए है कि नार की भोग मिले तो भी हम छोड़ दे मल मूत्र जनित देह जनित राग और इन द्वारों को भोगने का तो हमें भगवान का भी स्मरण हो जाएगा म कितना हम कमजोर जगह में भगवान को बैठा ले तो हमें भगवान को सर्वोच्च स्थान पर रखना है वह तभी माना
जाएगा कि आपने भगवान को सर्वोच्च स्थान पर रखा जब किसी भी घटना परिस्थिति व्यक्ति वस्तु स्थान चाहे वो अनुकूल हो या प्रतिकूल हो भगवान का विस्मरण ना हो सारे आचरण भगवान के अनुकूल हो और हम भगवान का जरा भी विस्मरण बर्दाश्त ना करें तो फिर हमारी स्थिति आ जाएगी पर अच्छा है हम आपको धन्यवाद देते हैं कि आप इस नई अवस्था में और भगवान की तरफ चल रहे हैं जहां प्रमाद स्थिति कामा आदि दोषों से युक्त होकर व्यसन आदि में बच्चे जाते हैं वहां तुम भगवान की तरफ चल रहे हो भगवान तुम्हारे ऊपर बहुत प्रसन्न
है और विशेष कृपा तुम्हारे ऊपर है तुम इसको समेट अब हर परिस्थिति में स्मरण करना शुरू करो 5 मिनट के अंतर में एक बार नाम जरूर ले लो इसको पकड़ो हर 5 मिनट में एक बार राधा बोलो 24 घंटे का नशा छा जाएगा क्योंकि हर 5 मिनट में डर लगा रहेगा अगला पा मिनट फिर ही ना चला जाए क्योंकि मुझे राधा बोलना है तो कितनी बार राधा स्मरण नाम हो जाएगा हर पाच मिनट में अगर एक बार राधा बोलने का नियम तुम लो तो 24 घंटे का नियम वो पूरा उसमें ले आएगा बहुत आनंद बच्चा
जीवन की सार्थकता भगवान के स्मरण में है जो भगवान से विमुख होकर धन संपत्ति नाना प्रकार के भोग ये एक बड़ा स्वप्न है 40 साल 50 साल 80 साल और शरीर छूटा कुछ नहीं जो हमने अशुभ कर्म किए या शुभ कर्म किए वही हमारे साथ जाएंगे और यहां आए हो शुभ अशुभ दोनों को मिटा के भगवत प्राप्ति करने के लिए शुभ अशुभ के लिए भोगने के लिए तो पशु पक्षी योनि यां बहुत है मनुष्य योनि ये शुभ अशुभ दोनों को मिटाकर नए प्रारब्ध की रचना नए भाग्य की रचना करने के लिए और वह सामर्थ्य भगवान
में है इसलिए भगवान की कथा सुनो नाम जप करो माता-पिता परिवार की सेवा करो जब कभी किसी की सेवा का अवसर मिल जाए तो उसमें भगवान की भावना करके मेरे भगवान इस व्यक्ति के रूप में है आज मुझे सेवा का अवसर मिला है दिल खोलकर सेवा करो सेवा से जो लाभ मिलता है ना वो बड़ी-बड़ी तपस्या से भी नहीं मिलता पर हित सरिस धर्म नहीं भाई जो दूसरों का हित करने की भावना है ये बहुत जरूरी है आध्याम मार्ग में बड़ी याद आ थ मा से बड़ी विनती किया आप मा का स्वरूप आप देख व्याकुलता
होती इतनी व्याकुलता होती थी की एक ब ली दर्शन बा तो मेरे साथ 24 घंट मतलब जब से मिला ऐसा लगता है मतलब पकड़ लियाने कोई समस्या नहीं है हर समस्या का आप सामने बैठे जीवन को हर सास में आप मेरे साथ में रहते हर सास जो जीवन में कभी सोचा नहीं था जितना हम अपने चित्त को समर्पित करते जाएंगे उतना ही परिवर्तन होता चला जाएगा संसार में समर्पित होगा तो दोष युक्त होगा संत और भगवान में समर्पित होगा तो गुण युक्त हो जाएगा भागवत देवी संपदा आने लगेगी चित्त का इशारा खेल चित्त का चिंतन
अगर इधर हुआ तो पतन और भगवान की तरफ हुआ महान उन्नति भगवान प्राय जहां उपदेश किए ना उसमें अनन्य चिंत तो माम अनन्य चेता सततम चित्त को भगवान में लगाने की बात तो भगवान ही संतों की वाणी में बैठकर चित्त को घसीट लेते हैं अगर संत रूप ना हो तो भगवान तक पहुंचा ही नहीं जा सकता जैसे वायु चंदन के वृक्ष की सुगंध को दूर दूर तक फैला देती है अगर वायु ना हो तो आसपास के वृक्षों में सुगंध ही ना हो चंदन है भगवान और वायु है संत जन जैसे वायु सुगंध लेकर सबकी ग्रहण
इद्री तक पहुंचा देती है ऐसे भगवान का आनंद संत जन अपनी वाणी से अपनी चेष्टा से अपनी दृष्टि से सब में फैला देते हैं भगवान है समुद्र और संत है मेघ जैसे समुद्र से खारे जल को घसीट कर किरणों के द्वारा और जब वो बादल बन के बरसता है तो मीठा जल बरसता सबको प्राप्त होता है पशु पक्षी फसल सबके पीने योग्य हो जाता है ऐसे ही भगवान आनंद समुद्र है अब उस आनंद समुद्र का अवगाहन भगवान के संत जन उनके नाम रूप लीला धाम ऐसे खींच के और ऐसे बरसाते हैं जगत को आनंद प्रदान
करते हैं तो भगवान की जब अतिशय कृपा होती तो संत समागम होता है और संत की जब कृपा होती तो चित्त भगवान में स्थित हो जाता है संत की कृपा का मतलब चित्त का भगवान में लग जाना यही है और दूसरा लाभ नहीं है संत के संग का जो लाभ कहा जाता है पहले जीवन का परम लाभ है संत संग उमा संत समागम समन लाभ कछ आन और संत समागम का लाभ क्या है चित्त का मन का भगवान में लग जाना भगवान में ज लगा तो सत्संगति संसृति कर अंता सत्संग ने संसृति जो आवागमन चक्र
पुनरपि जनन पुनरपि मरणम पुनरपि जननी जठरे सनम उसका अंत हो गया संत संग का संत का यही चमत्कार है कि हमारा मलिन मन प्रभु में लगने लगे हमारे मलिन मन की गति जो संसार की तरफ थी वो भगवान की तरफ अगर यह नहीं तो या तो वो संत नहीं है और या फिर हम उनकी बात नहीं मान रहे नहीं तो संत संग का सीधा फल है बड़े भाग पाइब सत्संगा तो बिन ही प्रयास होई भव भंगा संसार समुद्र से हमारा पार हो जाना यह संत संग का फल है अगर संत संग मिला और हमारे दोष
नष्ट नहीं हो रहे भगवत वृत्ति नहीं बढ़ रही तो हम जरूर मनमानी अहंकार पूर्ण आचरण कर रहे परिवर्तन हो आपको रात दिन अनुभव होगा कि वह संत हमारे साथ है जब आप आज्ञा पर चलोगे तो जैसे आज हम स में कह रहे थे कि गुरुजन तो यहां बैठे रहते ऐसा लग रहा है जैसे कुछ बात होती ऐसा सवाल होता है लगता आपने जवाब दे दिया य है तो ऐसा जी व यही बैठे रहते आज्ञा चक्र परही गुरुदेव बैठे रहते मि तो अजीब लगता है ऐसा देखो तोसा लगता राधारा बैठी बगल में आप बैठे ऐसा नहीं
ऐसा करना है ऐसा लगता गौरव कुमार शर्मा जी उत्तराखंड से राधा राधावल्लभ गुरुदेव आपके चरणों में कोटि कोटि नमन महाराज जी पिछले लगभग दो वर्ष से आपका सत्संग एगम एकांतिक वार्तालाप सुन रहा हूं और उसके बताए मार्ग पर चलने का प्रयास कर रहा हूं महाराज जी मेरा प्रश्न है कि दृष्टा भाव रखने के बाद भी कभी-कभी किसी कार्य के करने पर अहम तथा दूसरे के प्रति दोष दर्शन हो जाता है जिसके बाद मैं ग देखो आप सिद्ध तो हो नहीं गए साधक में तो त्रुटि होती रहेगी तो हमको क्या करना है कि जिस समय आहम
हो उस समय तत्काल विचार वान होना है कि मेरे से क्या हो सकता है यह तो मेरे गुरु की कृपा है मेरे प्रभु की कृपा है नहीं नहीं मेरे से तत्काल उसमें काटो अहंकार जब आ रहा है तो उसको काटो अगर शरीर से कोई सत्कर्म बन जाता है भागवत कर्म बन जाता प्रशंसनीय बन जाता है तो हम उसको तुरंत भगवान से जोड़ते हैं कृपा से जोड़ते हैं और जब कोई असत कर्म बनता है तो हम अपने अहम से जोड़ते हैं जो सच्चे भक्त की पहचान है गुण तुम्हार समुझ निज दोष जे सब भात तुम्हार भरोसा
तुम्हे छाड़ गति दूसर नाही बसो राम तिन के मन मा है तो हम जब दृष्टा भाव में अगर ज्ञान मार्ग में देखते हैं तो दृष्टा भाव में तो फिर करता कौन होता है जिसको अहंकार आ जाता है तो उस समय आप अपने दृष्टा भाव से चूक गए तो फिर लौटकर आइए उसी दृष्टा भाव में और उसको काट दीजिए जो आपकी मान्यता हुई अच्छा दूसरे में दोष दर्शन तो दूसरा कौन है तो फिर दोष दर्शन क्यों इसी बात को तो काटना है हमें दूसरा है कौन जैसे बिल्कुल सच्ची बात समझिए आप एक लाख घड़े रखे हैं
और उसमें सूर्य भगवान के एक लाख प्रतिबिंब पड़ रहे हैं तो सूर्य एक लाख थोड़ी हो गए और उन घड़ों के टूटने से सूर्य थोड़ी टूट जाएंगे मत लो एक डंडा उठावे 100 घड़े फोड़ दे तो सूर्य का क्या बिगड़ा ऐसे ये सब घड़े हैं इनमें एक ही परमात्मा है और दूसरा नहीं तो हम परमात्मा देखने निकले या दोष देखने निकले अब दोष देखोगे तो फिर दोष में फंस जाओगे अगर परमात्मा तत्व देखोगे तो दोष नहीं देखना है जी करता तो ऐसे ही हो लेकिन कभी-कभी हो जा तो हां उस समय भी हमें विवेक का
प्रयोग करना मतलब 10 मिनट हमसे चूक हो गए तो जब हमें होश आया हम उस 10 मिनट को संभाला कि नहीं हमसे चूक हो गई थी बार-बार चूक संभालते संभालते एक दिन ऐसे हम दृढ़ हो जाएंगे कि हमसे चूकी नहीं होगी उसी को सिद्धावत कहते हैं तो हम अभ्यास रत रहे पर नाम जप चलता है चलता है नाम जप बिना नाम जप के सब माया लपेट में ले लेगी दृष्टा भाव साक्षी भाव सब मिनट में लपेट शिव रंच का मो है कोहे पुराण असज जान भजी माया पति भगवान आपकी कृपा से करता हूं हा नाम
जप करते रहना नहीं तो यह ज्ञान विज्ञान जो है ना जो ज्ञानेन कर चित अप रई बियाई विमोह बस करई बहुत बलवान भगवान की माया सकती है बड़ी जल्दी ज्ञानी नाम चेतांसी देवी भगवती हिसा लादा कृष महाय महामाया प्रक्ष भगवान को नमस्कार कि वो अपनी माया से हमें बचा के रखे नाम जप नाम जपने ज्ञान विज्ञान कुछ काम नहीं करेगा बड़े-बड़े ऋषि मुनियों को भी क्षण में मोहित कर ले ऐसी भगवान की प्रचंड माया शक्ति है जो माया मुक्त है उनको घसीट ले अपने लोग तो सब माया में फसे तो नाम जब चल रहा है
तो निश्चित मंगल हो जाएगा निश्चित भगवत प्राप्ति हो जाएगी चंपालाल राठी जी कोलकाता से श्रद्ध महाराज जी आपके चरणों में प्रणाम महाराज जी मेरा प्रश्न है कि अगर कोई आदमी देनदारी छोड़कर दुनिया से विदा हो जाता है उसके देनदारी छोड़कर उसके ऊपर कर्जा हो उसके ऊपर कर्जा हो और चले गया उसके वारिस लड़के ने अपने पिताजी की कर्जा चुका दिया तो इस परिस्थिति में उस जाने वाले जीव को ऋण कर्ज से मुक्ति मिल जाती हा मिल जाती पक्का मिल जाता है पक्का मिल जाता है क्योंकि इसीलिए तो संतान की आकांक्षा की जाती है और संतान
के ऊपर मात ऋण पितृ ऋण ऋषि ऋण देवऋण यह सब इसीलिए होते हैं तो जो या तो भगवत प्राप्ति कर ले तो सब ऋणों से मुक्त हो गया नहीं तो यदि संतान है तो आपको भगवत प्राप्ति भी करा सकती है मान लो आपने भगवत प्राप्ति नहीं की आप पधार गए और आपका पुत्र महान तपस्वी भजनानंद तो अपने भजन के प्रभाव से व अपने 21 पीढ़ियों को तार देता है तो पिता तो बहुत नजदीक हुएना 21 पीढ़ियां तर जाती है उस कुल की सो कुल धन्य मा सुन जगत पूज्य सपनी जो भगवान का भजन करने वाला
महा भागवत पैदा हुआ 21 पीढ़ियां तर जाती है तो यह तो सांसारिक कर्जा है अगर वह सांसारिक कर्जा पिता का पुत्र निपटा देता है तो मुक्त हा ऋण मुक्त हो जाएगा कोई अन ननन दे जीवात्मा हा वो भी उसको मिलेगा बिल्कुल मिलेगा पक्का मिलेगा क्योंकि य सरकारी हिसाब किताब है आप किसी को भी पुण्य दे सकते हैं अपना जो आप आपके पास धन है आप 500 गए लिए 500 ग आप किसी को दान दे सकते अच्छा अभी वर्तमान वाले को दान देकर संकल्प करके जो शरीर छोड़ चुका है उसको दे सकते हैं आप यह शास्त्रीय
विधान पर उसके लिए संकल्पित जो संकल्प बनाने वाला है वह ब्रह्म ऋषि वह मंत्र वेत्ता होना चाहिए क्योंकि ट्रांसफर करने के लिए पैसा फिर सरकारी कागजात से होगा मलो जो बैंक में आपके जमा है आपको कहीं भेजना है अमेरिका भेज दो कहीं भी भेज दो पर वो सरकारी ही होगा तो ऐसे वैदिक सिद्धांत से आपके द्वारा गौ दान हो और फिर उसका संकल्प पढ़ा जाए जो जीव शरीर छोड़ चुका है और वो भगवान को दिया जाए तो वो भगवान के द्वारा वहां पहुंचेगा उस जीवात्मा को प्राप्त हो जाएगा यह विधान तभी तो पिंड दान किया
जाता है गौ दान किया जाता है शरीर पूरा होने वाले के लिए भागवत कथा कराई जाती है भंडारा पवाया जाता है कि ये सब पुण्य उसको प्राप्त हो हां बिल्कुल मिले मिलेगा संकल्पित जब करके दिया जाता है उसको मिलता है म यह तो पिंड दान और गौ दान आदि हो गया य शास्त्रीय पद्धति के अनुसार पंडित जो भी होते हैं कर्मकांड के हिसाब से म जीी जैसे आपने बोला कि नाम जब भी हम ट्रांसफर कर सकते हैं ये तो सीधे भगवान को समर्पित करो भगवान वहां पहुंचा देंगे सीधे आप उस जीवात्मा को नहीं दे सकते
यह सरकारी नियम जैसे 1000 नाम जप किया पहले भगवान को समर्पित करें हे करुणामय श्री कृष्ण चंद्र जू यह नाम हम आपके चरणों में समर्पित करते हैं इस नाम का फल हमारे पिता को मिल जाए हमारे बाबा को मिल जाए हमारे अमुक को मिल जाए व व ट्रांसफर हो जाए कोई भी भगवान का जो सेवा कार्य है भजन कार्य है किसी को भी आप दे सकते और इसमें परम लाभ है कि उसका तो लाभ हुआ अब इस दान का फल आपको मिलेगा अब जैसे कहते कि हमने अपना भजन दे दिया अब हम तो खाली हो
गए नहीं आपने उसको भजन दिया उसका कल्याण हुआ लेकिन उसको भजन देने का जो का फल है वो लौटकर आपके पास आएगा कई गुना बढ़ कर के आएगा पर इतनी हिम्मत होनी चाहिए पहले इतनी हिम्मत होनी चाहिए कि अपना भजन अपना पुण्य हम किसी को दान कर दे फिर उसका फल लौटकर आपके पास डबल होकर आएगा जो और आनंद प्रदान करेगा तो अब ये तो अपने लिए भजन नहीं करे दूसरे के लिए कौन भजन करेगा आप सोचो अपने लिए भजन नहीं हो रहा य अपने लिए सब सुख वांसा से परेशान है तो दूसरों के लिए
पुरखों के जिंदा बाप को तो कवल नहीं दे रहे मरे हुए को गौ दान पिंड दान कौन करेगा अब आज का समय आप देख लो ऐसा हो रहा है वो तो जिनको धर्म का ज्ञान है बात अलग है नहीं आज के बच्चे ऐसे हो रहे हैं माता-पिता की बिल्कुल मान्यता नहीं कर रहे चाहे मनमानी ब्याह के लिए हो चाहे मनमानी आ चरणों के लिए हो चाहे मनमानी कहीं भी वो उनकी आज्ञा उनका मतलब आदेश पालन करें ऐसा और बड़े बूढ़े माता-पिता का अपमान कर रहे हैं यहां तक कि हाथ उठा देते हैं यहां तक कि
घर से निका डाल देते हैं तो तो जो कोई इस अध्यात्म से जुड़ा है वही यह बातें सोचेगा कि हम अपने माता-पिता का उद्धार करें अपने माता-पिता के लिए गौ दान करें श्रीमद् भागवत का पाठ कराए या संतों को भोजन कराएं उसका फल उनको प्रदान हो गौ सेवा करें उसका फल उनको हो नहीं तो आजकल के बच्चे तो अपने वासनाओं की पूर्ति में ही ज्यादा वह पितृ ऋण मातृ ऋण देवऋण ऋषि ऋण इनसे कोई मतलब नहीं है धर्म से कोई मतलब नहीं है जिस मन आया उससे अपना शरीर संबंध भाव किया जहां जो जैसे मनया
वासनाओं की पूर्ति की रसेंद्र जने इंद्री इसी के शिष्ण दर परायण कोई भागवत की चर्चा कोई यह तो बड़ा सौभाग्य है कि आप लोग आकर के सं संग सुन रहे हो हमें सौभाग्य मानते हैं कि आज कलयुग में आप लोग चलकर आकर के सत्संग सुन रहे हो नहीं तो कलयुग का ऐसा प्रभाव है लोग देखो ना इतना माया में आसक्त है बहुत मतलब अहं जनित चेष्टा एं नशा गंदे आचरण तो भला पाप वंत कर सहज स्वभाव जिनका बन गया है तो भजन मोर्ते भावन का जो प दुष्ट हृदय सोई होई मोरे सन्मुख आव के सोई
ये तो बड़ी कृपा है भगवान की कि आज आप सत्संग में आए आप सत्संग सुन रहे हैं आप उसको जीवन में उतार रहे हैं तभी य एक अक्षर भी उतारा है तभी आपको आने को मिलेगा एक अक्षर भी उतारना चाहते हैं तभी आपको आने को मिलेगा नहीं तुम्हारे मन को ही भगवान पलट देंगे आने ही नहीं देंगे वो अपने गंदे आ चरणों में मन को लगाए रहते हैं तो बड़े धन्य भाग हैं जो धर्म शास्त्रों को सुनते हैं जो उसके अनुसार आचरण करते हैं नहीं तो बहुत दुखी होना पड़ेगा परिणाम जो आएगा बहुत दुखी परिणाम
आएगा आप आप लोग तो संसार में समाचार सुनते हो सब देखो अब देखो जीव हर जीव बचना चाहता है अब छोटा सा मुर्गा है बकरा है अन्य जीव है ये जो काट काट के खा रहे हो तुम्हारा पाप नहीं बढ़ रहा तुम्हें भोगना नहीं पड़ेगा ऐसे भोगना पड़ेगा अच्छा यह पूरा मूल नहीं हिसाब किताब हुआ शरीर छूटने के बाद अब जब जजज के पास जाओगे धर्मराज वो न्याय अलग है यह तो अभी ब्याज है मूल तो वहां है जो रास्ते में पिटाई होती ना पुलिस करती वो कोई न्याय थोड़ी पूरा हो गया न्याय तो वहां
जज्ज के सामने होगा यह तो तुम्हें ले जाने की पध राव नहीं है यह पधरा नहीं बहुत समल के कर्म बहुत होश में तो आज का जो नौजवान है वो बहुत कृपा कर रहा है कि सत्संग सुन रहा है अपने को बदल रहा है जैसे न नवयुवक भाई आते हैं ना कहते हैं महाराज जी हम आपको धन्यवाद देते हैं ऐसा वैसा तो हम हाथ जोड़ के कहते भैया तो धन्यवाद के पात्र आप लोग हो जो बात मान रहे हो तो यह तो बहुत बड़े अच्छे विचार हैं कि अपने बुजुर्गों के लिए दान पुण्य करना उनके
लिए भगवत उद्धार की बातें करना वर्तमान में विराजमान माता-पिता की सेवा करने को बच्चे तैयार नहीं है भ जी आपके सत्संग से समाज में युवा पडि बहुत कल्याण जी हां भगवान की व्रत तो है नहीं कोई बात नहीं है जी जी युवा पीडी का बहुत जव कल्याण जी जी ओ ये सब श्री ठाकुर जी महाराज की कृपा है कि भाई लोग हमारी बात मान रहे हैं नहीं कोई ऐसा जादू तमाशा नहीं है यह बात मान रहे हैं यह कृपा कर रहे हैं युवा भाई हमको प्यार दे रहे हैं हमारी बात मान रहे तो भगवान उन
पर कृपा करें भगवान उनकी बुद्धि शुद्ध करें शरीर स्वस्थ रखें वो समाज सेवी राष्ट्र सेवी परिवार सेवी बने जिससे उनका भी मंगल हो हमारे समाज का मंगल हो महाराज जी आपकी वाणी शुद्ध देसी घी है जिसको सब लोग पान कर रहे हा मतलब हम ज्यादा पढ़े लिखे तो है नहीं गांव में पैदा हुए बचपन से गंगा किनारे रहे पूरा जीवन अब भगवान ने सेवा दी है तो जैसे जो टूटी फूटी बात आती है अनुभव की बात इसमें यह बात खास जो बात है उसमें यह है कि खाई हुई बात है केवल पढ़ी हुई बात नहीं
है कि भाई हमने हां हमने हमने हलुवा का पढ़ा लेकिन कभी चखा नहीं वह बात नहीं है हम पहले हलवा बनाकर पाया है फिर हलवा बनाने का वर्णन किया है तो व यह जो बात जहा कुछ पाई भर रंग ला रही है उसका कारण है कि जो हम आपको कह रहे हैं यह जीवन हमारा पूरा भगवान की कृपा से उसी मार्ग में चला है और उसी मार्ग में चलकर तब वो बात नहीं तो बातें तो यही सब जगह होती है सत्संग में नहीं होती रंग तभी आता है जब भजन हो तो भजन और बात दोनों
मिलकर आपका परिवर्तन कर सकते हैं मैं न्यूजीलैंड से आया हूं सिर्फ एक हफ्ते के लिए सिर्फ आपको देखने आपका चेहरा खींच के लेकर आया व 10 दिन पहले मैं न्यूजीलैंड में घर पर बैठा था और मुझे पता नहीं था कि मैंने आपके पास जिंदगी में पहली बार वृंदावन आया हूं बड़ी कृपा श्री जी की 2018 में मेरा एक्सीडेंट हो गया था जी मेरी रीड की हड्डी आ टुकड़ों में खत्म हो गई थी और मैं दुनिया का तीसरा इंसान हूं जो ड़ केड्डी टूटने के बाद आज आपके सामने खड़ा भी हूं न्यूजीलैंड में एकलौता हूं जी
मुझे ऐसे लगता है मेरा जो ये जीवन है आज आपको मिलने के बाद सफल हो गया य भगवान की बड़ी कृपा है भगवान की नाम जप करना और आनंदित रहना ठीक है हां नाम जप करते रहना आनंद हां बिल्कुल ब नहीं भगवान कर तुम अ कर तुम अन्यथा करतु मैं वो हां वही उनका चमत्कार तो है ना देखो बताया ना मेरुदंड टूटने के बाद हमने भी ऐसा सुना को आदमी किसी काम का नहीं रह जाता और आप कह रहे कई जगह से टूटने के बाद आ टुकड़े हो गए थे हा तो नहीं भगवान की बड़ी
दोनों टांगे टटी हुई हैरी बिल्कुल बिल्कुल ील नहीं खूब नाम जब करो इकलौते नहीं भगवान है आपके साथ ठीक है आप खूब नाम मेरी बिटिया पूछती है कि आप ऐसी कौन सी क्रीम यूज करते हैं कि सूर्य से अधिक तेज क्रीम तो नहीं यूज कर कोई भी आपको लगता है कोई क्रीम लगी है क्या रज जरूर लगी आप देख लीजिए रज क रही है क्या पूछ के आएगा दूसरा वो मेरे को कहते है एक बार अपना वो ठका मार के हस दीजिए उसके लिए तो प्रसंग होना चाहिए उस प्रसंग में ब अब ऐसे ऐसे जैसे
बलाव हसे तो कैसे हसेगा उसमें जब कोई श्री जी की ऐसी बात आती है और हृदय एकदम आदित हो जाता है तब वो एकदम स्वरूप आता ठका और रही क्रीम की बात तो जिंदगी हो गई अब बाबा जी बाबाज के क्रीम कैसे लगाएंगे आपको लगता है कोई क्रीम लगी हां पर यह जरूर है हम जिनका आराधन करते हैं वह बहुत सुंदर है देखो माई सुंदरता की सीवा महारानी जी हा लाडली ज तो जब जिसका चिंतन किया जाता है तो उसकी आभा आती है तो जैसे हम लाडली ज के है ना तो आप अगर थोड़ा भजन
करो तो आप गौर से देखोगे तो आपको लगने लगेगा कि लाडली की है लाडली जू की आभा आने लगेगी आपको दिखाई देगा कुछ दिनों बाद कि यह तो हमें लगता है कि लाडली जू का ही प्रभाव एकदम लाडली जूज ऐसा आने लगेगा लाडली क्योंकि जब भृंगी कीट दूसरे कीट को लाकर अपना चिंतन कराता है तो भृंगी बन जाता है ऐसे ही जब भगवान का चिंतन करते हैं देखो अपने लोग किसी किसी संत को कहते वो संत नहीं वो तो साक्षात भगवान है क्योंकि वास्तविक व भगवान में इतना तन्मय हो गए कि भगवान क्रीम से सुन
सुंदरता नहीं आती क्रीम से सुंदरता नहीं सुंदरता वो जो चित्त को चुरा ले सुंदरता उसे कहते जो चित्त को चुरा ले वोह होता है भागवती वोह बनावटी श्रृंगार से नेत्र लुभ मान कर सकते हो चित्त नहीं चित्त को जो चुराए उसे सुंदरता कहते हैं वह श्री जी और लाल जू की होती है हम उनके गुलाम है हम उनके दास है तो दास पर कहीं ना कहीं तो उनका प्रभाव है ही है ना सरकार जमीन है ये सरकारी कब्जा है या ठाकुर जी का कब्जा है प्रियाज का कब्जा है दैवी संपदा जो होती है ना वो
भगवत भक्त में अपने आप जागृत हो जाती है पर जो एक आकर्षण होता है वो भगवान का आकर्षण होता है देखो हम जब सुबह आते हैं तो इतने लोग होते हैं और वह सब आनंदित होते हैं ऐसा लगता है कि मतलब बूढ़े हैं तो जवान है तो बिटिया है तो माई है तो राधा राधा राधा अच्छा इतनी जोर से चीखते हैं कि हमारी तरफ देख ले और जब हम देखते हैं ना तो एकदम ऐसे हो जाते क्या होता है ऐसा उनके अंदर एक आनंद की उमगया है उसमें और कोई साधना का काम नहीं इसमें अपने
इष्ट की कृपा दिखाई देती है मेरी लाडली ज की कृपा दिखाई देती है सबको अल्लाद होता है भाई ऐसे कि ठीक है खड़े हैं संत जा रहे हैं जय महाराज ऐसे नहीं आप देखो एक भी आदमी ऐसे नहीं होगा कोई या तो कोई रो रहा है और या कोई बहुत आनंद में एकदम देखते एकदम आनंद में यह मेरी लाडली जू का प्रताप य श्री जी का प्रताप है प्रवीण कुमार डोबल जी हे गुरुदेव आपके चरणों में कोटि कोटि नमन महाराज जी गुरु विनु भव निधि तरे ना कोई जो रंच शंकर सम होई हे गुरुदेव जिन
व्यक्तियों को कभी वृंदावन आने व गुरु दीक्षा व सत्संग प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त नहीं होता तो महाराज जी उन व को भगवान मोबाइल मोबाइल से सत्संग सुनो भाव से गुरु मान लो सत्संग में जो आज्ञा है वो पालन करो भगवत प्राप्ति हो जाएगी मानने से ला जब माटी के द्रोणाचार्य बना कर के जबकि असंभव है देखो गुरु जी ने कहा राम राम बोलो कृष्ण कृष्ण बोलो हम जप रहे हैं उनको गुरु मान लिया कितना सह सहज है लेकिन प्रत्यंचा चढ़ा कर के धनुर विद्या में प्रकांड हो जाना बहुत प्रवीण हो जाना यह तो असंभव
बात है ना मिट्टी की मूर्ति गुरु की बना क्योंकि उसके लिए हमको हर चेष्टा का ज्ञान प्रकट में चाहिए ना वह केवल मिट्टी की मूर्ति लेकिन गुरु महिमा अखंड मंडला काम व्याप्तम चरा चरम तो मिट्टी में भी गुरुदेव तो मिट्टी की मूर्ति बनाकर जब गुरुदेव सिखाया नहीं और धनुर विद्या में प्रवीण हो गए कि गुरुदेव को भी पता नहीं तो आप मोबाइल से किसी भी संत को गुरु मानकर उनकी आज्ञा से अगर चले तो क्या आपको भगवत प्राप्ति नहीं हो जाएगी क्यों आप बोलिए किसका प्रश्न है तो हो जाएगी कि नहीं हो जाएगी मेरा कहना
ये जैसे उने कभी ऐसा कभी वृंदावन ना आओ कभी हमसे मत मिलो लेकिन हम बोल रहे राधा राधा जपो अभी अगर अमेरिका में तुम्हें सुनाई दे राधा राधा जपने लगो हमारी आज्ञा से चलने लगो पराई माता बहनों की तरफ विचार दृष्टि मत रखो मांस मदिरा मत पियो सात्विक वृत्ति से र वही भगवत प्राप्ति हो जाएगी अमेरिका में वृंदावन मिल जाएगा महाराज हम क्या कर सकते अयों के लिए ये कह रहे कि आगे लिख रहे हैं कि क्या मैं भी उनके लिए नाम जप कर सकता हूं सबके लिए देखो संत महात्मा तो सबके लिए जप ही
रहे सर्वे भवंति सुखना सर्वे संत निरामया पहले आप छक लो आप भगवत प्राप्ति कर लो आप इतना छक करर नाम जप करो कि आपको भगवत साक्षात्कार हो जाए तो पूरे त्रिभुवन में कहीं कोई और है ही नहीं भगवान के सिवा तो किसका कल्याण करोगे गीता में भगवान जी कह रहे मत्ता प्रतम नानत किंचित दस्ती धनंजय मेरे सिवा और कोई है नहीं तो भ्रम अपना मिटाना है दूसरों का ले भगवत प्राप्ति अपने को करवाली दूसरों को लाई हमारा चश्मा ज ठीक हुआ तो जित देखू तित श्याम मई है गोस्वामी तुलसीदास जी का जब भाव नेत्र खुला
जड़ चेतन जग जीव जत सकल राम में जानी बं सबके पद कमल सदा जोरी जुग पाल सब में भगवान का अब किसका उद्धार करना है उद्धार अपना करना है हमारी दृष्ट बदल जाए तो सृष्टि भगवान ही बने हुए हैं दूसरा कोई नहीं है और जब हम में भगवत प्राप्ति का रंग चढ़ेगा ना तो आपके स्पर्श से आपके दर्शन से आपके संभाषण से आपकी छोटी-छोटी चेष्टा हों से लोगों का कल्याण शुरू हो जाएगा करना नहीं पड़ता अपने आप कल्याण होने लगता है पहले हमको छक के भजन करना है पहले हमको देहा भिमान मिटाना है पहले हमको
नानाव बुद्धि हटानी है सब में ईश्वर दिखाई दे यहां तक हमें चलना है की बात फिर सोचना पहले यहां तक पहुंचो ह तीन महीने में बैटरी डिस्चार्ज हो जाती है फिर आपके कारखाने में आके उसको चार्ज कर लेते हैं तो अच्छा लगता है य तो वहां पर पड़े रहेंगे ठीक है लेकिन यहां पर आपसे दर्शन नहीं इनका प्रश्न था कि जो आ नहीं सकते जो मान लो नहीं आ सकते हैं तो उनके भी कल्याण और जो आ जाए तो अब फेस टू फेस जो बात है अब हां वो कैसे हो है मोबाइल का गुलाब जामुन
और दुकान से अंतर होगा आपको देखना जरूरी है अब जो नहीं आ सकते तो फिर उपाय तो बताया जा सकता है ना उनका कल्याण नहीं रुकना चाहिए कल्याण हो जाएगा संत वचन मानने से कल्याण हो जाएगा आप मान लो तो वृंदावन वहीं पहुंच जाएगा संत वहीं पहुंच जाएंगे मान लो हम नहीं जाते तो कोई ना कोई संत तुमसे मिलेगा तुम्हारा कल्याण करेगा जब कोई जीव व्याकुल होता है अपने कल्याण के लिए तो भगवान उसके अंतर में बैठे हुए हैं व ऐसे ही मिला देते हैं या बुला देते हैं या भिजवा देते हैं वही पहुंचा देते
हैं वो भगवान विधान मनाते हैं पर जीव के अंदर कल्याण की इच्छा जागृत तभी होगी जब सत्संग होगा अगर संत संग ना मिले तो कल्याण की इच्छा ही नहीं हो सकती क्यों आप विचार करो बाबा जी एक ऐसी चीज संत ज्यादातर वृंदावन में मिलते हैं अपने वहां पर संत ढूंढने से नहीं मिल रहे अभी बा आपके कह अनुसार हम गाय की रोटी बना के बाहर जाकर देखते भी है कि कोई है या नहीं कोई नहीं होता सब देखो पहले सब संत सुखी विचर तमई आप संत विचरण करे तो कह रहे बच्चा चोर मार डालते दोदो
तीन-तीन संतों को तो अब संतों को भी तो लगने लगा कि भाई अब जाएंगे हम रोटी मांगने कहेंगे बच्चा चुराने आए तो मार डाला जाएगा जो बच्चा चुराने वाले होंगे उनका अलग तुम पकड़ ही नहीं पाओगे उनको वो तो अलग उनका होता है अच्छा मान लो हम कह रहे हैं अगर हमें शंका है कि बच्चा चुराने वाले हैं उनको कैद कर लो कमरे में बंद कर लो पुलिस को बुलाओ जानकारी कर लो कहां से आए कैसे आए और फिर कानून हमारा उनको दंड देगा अब ऐसे घेर के मार लाठी मार लाठी मार डाला वो कौन
सा पालघर नहीं अब जैसे नौजवान बच्चे हैं अभी गांव में जाए अन्यत्र ब्रज में तो मांगने में अभी मर्यादा है बाहर अगर घरों में मांगने जाए तो लोग मतलब उपहास करेंगे लोग मार देंगे नहीं पहले संत गांव-गांव विचरण करते थे बहुत से महात्माओं जो गांव में आते कुछ ऐसे स्थान होते जिनमें रुकते प्रवचन करते अब तो हां अब तो अब तो बड़ा मतलब विचित्र खेल है तपसी धनवंत और दरिद्र ग्रही कलि कौतुक तात लजा अब तो भैया मतलब बड़ी विचित्र व्यवस्था है हा बहुत कलयुग का बड़ा भजन करके निकल जाओ यही खास बात है ले
तो फसाओ फसाओ हर गली में फसाओ है हर कदम में फसाओ है भगवान की प्राप्ति बड़ी कठिन है आपके आदेश अनुसार रोज घर के बाहर जाकर देखते हैं कोई संत कोई संत कोई संत समय हो गया ना अब नहीं अब नहीं मिले हा अब नहीं मिले अब ऐसे नहीं मिले बहुत कठिन हो गया अब जो संत जन है व अपनी अपनी गुफा अपने अपने मकान बना कर के चुपचाप भजन कर रहे हैं क्योंकि कलिकाल का ऐसा प्रभाव है अ काशी है हरिद्वार है वृंदावन है अयोध्या है अब हां अब ऐसे संत जन पाए जाएंगे अब
भ्रमण इसीलिए यहीं पर आने का दिल करता है बाबाज हां नहीं तो आओ जिन को नहीं आने का मिलता व मोबाइल से सुन ले लेकिन जिनको आने का मिलता है सौभाग्य तो धन्य भाग है आना चाहिए महीने दो महीने में जिनको सुविधा है एक बार जरूर आ जाना चाहिए दर्शन संभाषण बिहारी जी राधा वल्लभ जी से आंख मिला ले यह सौभाग्य मोबाइल से थोड़ी मिलेगा अब जैसे ऐसे आप जो आनंद ले रहे हैं वो मोबाइल से थोड़ी मिलेगा आनंद तीन महीने तक चलेगा बाबाजी ऐसे ही सोच मन में सबसे सोचते सोचते बाबाजी से बात राधा
राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा राधा राधारा [संगीत] राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा रा राधा