नमस्कार दोस्तों, ओशियन नेटवर्क में आपका स्वागत है। मैं हूं ओमकार चौधरी। आज बात करेंगे डोनाल्ड ट्रंप साहब की, अमेरिका की आक्रामकता की और जिस तरीके से किसी को भी बखश नहीं रहे हैं डोनाल्ड ट्रंप मैक्रो हो या जिनको उठवा के न्यूयॉर्क मंगवा लिया। उनकी मिमिक्री या नकल करना हो। किसी के बारे में कुछ भी कह रहे हैं। कुछ ज्यादा ही कॉन्फिडेंस दिखा रहे हैं या ओवर कॉन्फिडेंस हो रहे कॉन्फिडेंट हो रहे हैं। भारत को लेकर के एक टसलबाजी चल ही रही है उनकी। सामान्य दिखने की कोशिश भी कर रहे हैं। लेकिन उनके वाणिज्य मंत्री बहानेबाजी
करते हैं कि ट्रेड डील क्यों नहीं हुई? मोदी जी ने एक कॉल नहीं किया इसलिए ट्रेड डील नहीं हुई। अंतर विरोधी बातें अमेरिकी प्रशासन के भीतर से ही ट्रंप अभी हाल में कह चुके कि मोदी जी से मेरी बात होती रहती है। जब बात होती रहती है तो आपका वाणिज्य मंत्री यह बहाने क्यों कर रहा है कि मोदी जी ने फोन नहीं किया इसलिए डील लटकी हुई है और यह जो एक्चुअल में ध्रुवीकरण चल रहा है जो अभी एक गोलार्ध की बात की है डोनाल्ड ट्रंप ने कि यह हमारा एरिया है यहां के गुंडे या
महागुंडे हम हैं। यहां हम किसी को घुसने नहीं देंगे। ना रूस को, ना चीन को, ना किसी और को। तो जरा इस पर बात करते हैं आज और मेरे साथ बहुत खास मेहमान जुड़ रहे हैं। मेरे चैनल पर पहली बार आ रहे हैं लेकिन आप अपरिचित बिल्कुल नहीं है बल्कि आप उनको बहुत अच्छी तरीके से जानते हैं। आप उनके प्रशंसक हैं। मैं निजी तौर पर उनके प्रोग्राम सुनता हूं। डॉक्टर अंकित शाह जुड़ रहे हैं जियोपॉलिटिकल मामलों के जानकार और आर्थिक मामलों के जानकार भी। अंकित जी बहुत नमस्कार। जय श्री राम। जी। तो अंकित जी अंकित
जी अब माइक्रोफोन आपके पास है। थोड़ा बताइए, समझाइए कि एक्चुअल में ये चल क्या रहा है इस समय और क्या करके मानेंगे? जी। तो इसमें थोड़ा हमें थोड़ा हिस्ट्री में पीछे जाना पड़ेगा। बात ये है कि 202122 के आसपास मिड 2021 के आसपास पुतिन जो है प्रेसिडेंट पुतिन उन्होंने जो मैं कैश फ्लोस देख के प्रेडिक्शनंस देता हूं। तो मिड 21 के आसपास उन्होंने डॉलर एसेट्स में से डायवर्सिफिकेशन करना शुरू कर दिया था। मिड 2021 की बात कर रहा हूं। तो जितने भी रशियन रिजर्व्स में जो डॉलर्स पड़े थे जिनको बाद में सीज किया गया उससे
पहले जो लेवल पर उनके एसेट्स थे डॉलर एसेट्स उसमें से डवर्सिफिकेशन उन्होंने धीरे-धीरे करना शुरू कर दिया था। नवंबर 2021 दिसंबर 2021 आते-आते उनकी मीटिंग हुई सबसे पहले प्रधानमंत्री मोदी जी के साथ। मोदी जी के साथ जो उनकी मीटिंग हुई उस मीटिंग के बाद वो शी जिनपिंग से मीटिंग के लिए चाइना गए और चाइना में प्रेसिडेंट पुतिन का एक स्टेटमेंट आया। उन्होंने बोला कि प्राइम मिनिस्टर मोदी ने प्रेसिडेंट शी जिनपिंग से मिलना चाहिए। और यह जो दो मीटिंग्स कंक्लूड हुई दिसंबर 2021 में उसके बाद अचानक से भारत ने सिल्वर एक्यूमुलेट करना शुरू किया। तो अगर
आप सिल्वर इंपोर्ट्स का भारत का चार्ट उठा के देखोगे पिछले 10 वर्षों का तो 2021 के एंड से आपको पता लगेगा कि एकदम से पीक करना शुरू कर दिया और 2022 में हमने विश्व का जो टोटल सिल्वर प्रोडक्शन है उसका वन थर्ड पूरा अकेला भारत ने परचेस किया वन थर्ड ठीक है तो उस वर्ष जो हमें पता है कि फरवरी में 24 फरवरी यूक्रेन का कॉन्फ्लिक्ट स्टार्ट हुआ और उसके साथ जो यह सिल्वर का एक्यूमुलेशन शुरू हुआ तो दो चीज क्लियर हो गई कि एक गोल्ड का एक्यूमुलेशन जो 2014-15 से ऑलरेडी चल रहा था। 2008
के क्राइसिस से एक्सलरेट हो ही गया था। सारे देशों को पता लग रहा है कि भाई डीडोलराइज करना है तो गोल्ड इकट्ठा करना है। लेकिन ये वाली जो मीटिंग्स हुई उसके बाद सिल्वर का एक्यूमुलेशन भी शुरू हुआ। तो कहीं ना कहीं यह समझ में आया कि वेस्ट जो डॉलर को वेपनाइज करता है तो ईस्ट जो है वो कमोडिटीज को वेपनाइज करना चाह रहा है। एटलीस्ट डायरेक्शन वो दिखाई दी। अब यह मीटिंग्स के बाद जिस प्रकार से सिल्वर का एक्यूमुलेशन हुआ जिसका रिजल्ट आज हमें दिख रहा है सिल्वर के प्राइसेस में तो गोल्ड और सिल्वर ये
दोनों एक तरह से पाइपलाइन बन चुके हैं डॉलर का वैल्यू्यूएशन उस खुद के अंदर खींचने के लिए अब वो पूरी जो रिजर्व करेंसी की बबल है वो बाकी रहेगी डॉलर में रियल वैल्यू गोल्ड और सिल्वर में ट्रांसफर हो रही है और गोल्ड और सिल्वर एशिया और ब्रिक्स प्लस एक्यूमुलेट कर रहे हैं। अब जब पहला ट्रिम आएगा रूपी डॉलर के रेट में तब यह गोल्ड और सिल्वर का वैल्यू्यूएशन जाके रूपी में जाके बैठेगा। तो डॉलर से खींच के पाइपलाइन में आया गोल्ड और सिल्वर में पाइपलाइन से खींच के रूपी में जाएगा। तब हमको पहला ट्रिम डॉलर
के रेट में दिखाई देगा वर्सेस रूपीस। तो यह है डीडॉलराइजेशन का सिंपल सा प्रोसेस। अब जितने भी हॉटस्पॉट्स डॉलर को चालू रखने के लिए क्रिएट किए गए थे। जिसमें से बहुत सारे हमारे व्यूअर्स को नहीं पता होगा। उनको जानना चाहिए कि हमारा पार्टीशन के पीछे भी डॉलर का एक बहुत बड़ा रोल रहा। थोड़ा हम हिस्ट्री में जाएंगे तो स्टेलिंस वॉर्स नाम की किताब है। और इसमें ऑथर जो है वो लिखते हैं कि जब सेकंड वर्ल्ड वॉर कंप्लीट हुआ तो प्रेसिडेंट रूस स्टिन और चर्चिल के बीच मीटिंग होनी थी। और मीटिंग होने से पहले यूएस के
प्रेसिडेंट स्टिन को बोलते हैं लेट्स नॉट डिस्कस विद चर्चिल यू कीप इंडिया। यह लाइन बहुत महत्व रखती है क्योंकि हमारे जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट्स या हिस्टोरियंस यह मानते हैं क्योंकि हमारे पास कोई ऑप्शन ही नहीं था इसलिए हम रशिया के साथ अलाइन कर लिए। उन्हें यह जानना होगा कि हमको ऑलरेडी रशिया को पकड़ा दिया गया था। हमने रशिया को चुना नहीं था। एलाइन हमको पकड़ा दिया गया था और वो अमेरिकी राष्ट्रपति के द्वारा पकड़ा दिया गया था इंडिपेंडेंस से पहले। इंडिपेंडेंस होने से पहले तो जिसे मैं अपनी जिओपॉलिटिक्स की बुक में टू बकेट्स थ्यरी बोलता हूं। हर
एक राष्ट्र को बोला गया कि तुम्हारा बाजू वाला बदमाश है उसको हम सेंशन करने वाले हैं। तो यू कंटिन्यू विद द यूएस डॉलर ट्रेड। इस तरह से यूएस डॉलर रिजर्व करेंसी स्टेटस में इतने वर्षों तक रहा। अब इसमें जैसे हमको समझ में आया कि हमारा एनिमी नहीं था तो पार्टीशन क्रिएट करके एनिमिटी खड़ी की गई। पाकिस्तान को आर्म्स और वेपंस दिए गए अमेरिकी साइड से और हमको रशियन साइड से सपोर्ट मिला। तो दोनों बकेट जब क्लैश करेंगे तो उसमें से जो पीओ ऑब्वियसली हमारे प्रॉब्लम्स तो चल ही रहे थे रेडिकलिज्म और वो सारे शेख अब्दुल्ला
नेहरू सबको हिस्ट्री पता है। लेकिन ये हॉटस्पॉट खड़े करने में डॉलर का कितना बड़ा रोल था कि स्टालिन खुद आश्चर्यचकित हुआ। उसका स्टेटमेंट है उस बुक में कि स्टिन वास शॉक्ड कि ब्रिटिश क्राउन ज्वेल इंडिया उनको दिया जा रहा है। ही वास शॉक्ड तो हमको लगता है कि 1991 रिफॉर्म्स तक जो लाइसेंस राज से ले जो पूरा चला कम्युनिस्ट गवर्नेंस हमको लगता है क्योंकि हम अलायंस में थे। हमको ऑलरेडी पकड़ा दिया गया था। तो इसीलिए यह पूरी पैटर्न आपको पूरे एशिया में दिखाई देती है। यूरोप खड़ा है, रशियन बॉर्डर पे, रशिया खड़ा है, चाइना बॉर्डर
पे, चाइना खड़ा है, इंडिया बॉर्डर पे, इंडिया खड़ा है, पाकिस्तान बॉर्डर पे, पाकिस्तान खड़ा है, अफगानिस्तान बॉर्डर पे, अफगानिस्तान खड़ा है, ईरान बॉर्डर पे, ईरान खड़ा है, इराक बॉर्डर पे। तो हर जगह दो-दो दो-दो बकेट्स खड़े करके नॉर्थ कोरिया, साउथ कोरिया। इनफैक्ट इंक्लूडिंग इजराइल जिस ईयर हमको इंडिपेंडेंस पॉलिटिकली नेगोशिएटेड इंडिपेंडेंस जिस ईयर हमको मिला 1947 में बिल्कुल उसी वर्ष इजराइल और पैलेस्तीन का इशू भी क्रिएट हुआ तो पैलेस्तीन को कैश डॉलर्स मिलता है और इजराइल को वेपन्स मिलते हैं। और इजराइल को तब तक वेपन्स की डिलीवरी नहीं मिलती है जब तक पेलेस्टाइन को कैश नहीं
मिल जाता। यह टू बकेट थ्यरी उन्होंने हर जगह करी। ये सबको जानना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि कुछ लोगों को जो डीप स्टेट का स्ट्रक्चर समझते हैं व्यूअर्स उनको लगता है कि डीप स्टेट जइश डीप स्टेट है। उनको ऐसा लगता है। हां ये बात सच है कि वो जो एरिस्टोक्रेइट फैमिली जो जिसको डीप स्टेट बोलो या एलुमिनाती बोलो या ग्लोबल मार्केट फर्सेस बोलो जो पीछे से सारे कॉल शॉट्स करते हैं। तो उसमें जश ज्यादा है। ये बात सच है। लेकिन ये मानना पड़ेगा कि उन्हीं की स्क्रिप्ट के तहत इतने जस मारे गए होलोकास्ट में। उन्हीं
की स्क्रिप्ट के तहत तो क्योंकि डीप स्टेट में जइश ज्यादा है इसलिए इजराइल को कुछ फायदा हो रहा है। बिल्कुल भी नहीं। इजराइल ने बिल्कुल टू बकेट थ्यरी वैसे ही सहा है जिस प्रकार से हमने टेररिज्म सहा है इतने सालों तक। तो जानने वाली बात यहां पे ये है कि सारे हॉटस्पॉट्स यूक्रेन ताइवान, पीओके, ईरान, इजराइल और नॉर्थ कोरिया, साउथ कोरिया यह सारे बकेट्स जो हैं अब क्योंकि डॉलर की रिक्वायरमेंट नहीं है तो ये सारे के सारे रिवर्स होने के प्रोसेस में है। और क्योंकि ये रिवर्स होंगे तो अमेरिका का जो एक यूनपोलर वर्ल्ड जो
उन्होंने सेट किया था अपनी हैजीमोनी चलाने के लिए जहां पर पड़ोस में उनको पूरी शांति मिली। पूरा जीवन उन्होंने शांति में गुजारा। ना कनाडा से कोई टेरर ग्रुप आता ना मेक्सिको से कोई टेरर ग्रुप आता या कोई उनका ऑनगोइंग कॉन्फ्लिक्ट चल रहा है। तो वो जो सुख शांति की जीवन उन्होंने जिया उसमें बाकी पूरे विश्व में उन्होंने तबाही मचाई हॉटस्पॉट्स खड़े करके। अब वो रिवर्स होने जा रहा है। तो जो यह पूरी मैसिव मिलिट्री माइट है और कोवर्ट ऑपरेशंस करने की उसकी ताकत है वो अब नेबर्स को परेशान करने वाली है क्योंकि ग्लोबल रोल गया।
डॉलर के साथ-साथ अब उनका ग्लोबल रोल भी चला गया पॉलिसिंग का। इसीलिए आश्चर्यचकित होने वाली कोई बात नहीं है कि प्रेसिडेंट ट्रंप यह बोल रहे हैं कि यह मेरा इलाका है। इसका सिंपल अर्थ यह होता है कि प्रेसिडेंट ट्रंप तय करेंगे कि वेनेजुएला ऑयल बेचेगा या नहीं बेचेगा वेस्टर्न हेमिस्फयर के बाहर। इसका सिंपल ट्रांसलेशन यह होता है कि श्रीलंका अमेरिका को कुछ गुड्स बेचेगा नहीं बेचेगा वो दिल्ली को तय करने मिलेगा। भविष्य में सब अपने अपने इलाके में अपने अपने स्फीयर ऑफ इनफ्लुएंस में अपना पॉलिसी एग्जर्ट करेंगे। असर्टिव पॉलिसीज इंपोज करेंगे छोटे-छोटे देशों के ऊपर।
तो अब ये पूरा वेस्टर्न हेमिस्फयर का जो ट्रेड है जिसको हम इंटरनेशनल ट्रेड एक प्रकार का जो ग्लोबलाइजेशन सेट किया हुआ था। अब उस प्रकार से पॉसिबिलिटी नहीं है। इसीलिए मार्को रूबियो का स्टेटमेंट भी आया कि कोई इंटरनेशनल रूल नहीं है। व्हाट इज यूएन? यूएन क्या है? तो ये दिस इज वेयर द वर्ल्ड इज हेडिंग। तो अगले पांच वर्ष पूरा डिसऑर्डर है। सब अपनेप इलाके तय करेंगे। जिसका अर्थ यह होता है कि अगर भारत ने अपना स्फीयर ऑफ इनफ्लुएंस तय करना है तो आपको मारपीट के एग्जांपल सेट करना पड़ेगा। यह ऐसे नहीं हो सकता कि
आप चुप बैठे रहेंगे तो फिर कोई और आपके आपके एरिया को इन्फ्लुएंस कर जाएगा। राइट? तो इट इज वेरीेंट कि मिलिटरीली जिस प्रकार से वेनेजुएला में से इन्होंने तो प्रेसिडेंट और उनके वाइफ को उठा लिया। कुछ लोग जोक कर रहे थे कि ओबामा तो खाली ओसामा बिन लादेन को उठा के ले आया। मैं तो इसके वाइफ को भी उठा के लेके आया। ये ही कैन लिटरली बैग इट। द काइंड ऑफ पर्सनालिटी दैट ही इज ही कैन एक्चुअली से इट। तो ये जो दादागिरी है अब वो मेक्सिको को धमकी दे रहे हैं। कनाडा को तो 51
स्टेट बोल चुके हैं वो। और ग्रीनलैंड को भी बोल रहे हैं कि आप बेचना चाह रहे हो तो बेच दो तो हम पैसे दे देते हैं। अदरवाइज मिलिट्री एक्शन तो सबको धमकी दी जा रही है। और इसका सबसे बड़ा इंपैक्ट ये है कि अब यूरोप के एलआई अब एलआई नहीं रहेंगे। सिंपल बात है। जब आपको डॉलर छापने का और जो बजट स्पोंसर करने का अब आपका कैपेसिटी नहीं बचा है तो कोई आपका मित्र क्यों रहेगा? गरीबों का कोई मित्र नहीं होता है। तो ये जो सारे एलआई बन के घूम रहे थे वेस्टर्न यूरोप के वो
इसीलिए एलआई बन के घूम रहे थे क्योंकि डॉलर छाप छाप के जो सीक्रेट स्वैप लाइन से उनकी करेंसीज को ऊपर रखा जा रहा था एशियन करेंसीज से अब जब वो मुफ्त का कैश मिलना ही नहीं है तो यूरोप भी क्यों इनका एलाइव बन के रहेगा दूसरा अब तो ये खुद थ्रेटन कर रहे हैं यूरोप को मतलब अगर ग्रीनलैंड एज अ नेटो पार्टनर अब उसको खुद को अगर धमकी मिल रही है कि तुम्हारे ऊपर अटैक होगा अमेरिका के द्वारा तो फिर क्या अलायंस बचा? तो यह पूरा जो रिवर्सल है जब से अफगानिस्तान एग्जिट हुई है तब
से नाटो खाली पेपर पे है। नेटो खत्म हो चुका है। इट इज डेड। क्योंकि अफगानिस्तान एग्जिट के बाद यूरोप को समझ में आया कि कोई वॉर ऑन टेरर चल ही नहीं रहा था। ये खाली एक बिल्डिंग में डॉलर छप रहे थे। बाजू की बिल्डिंग में डिफेंस कांट्रेक्टर को मिल रहे थे और रेगिस्तान में मिसाइल फोड़ रहे थे यह लोग 20 साल से। तो जीतने का कोई कांसेप्ट ही नहीं था। एक भी वॉर में वॉर एक्सटेंड करने का ही कांसेप्ट था क्योंकि मनी लॉन्ड्रिंग चल रहा था। तो जब से ये यूरोपियन एलय को पता चला है
कि वी वर ऑल फूल। तो अब अलायंस का कोई बनता ही नहीं है। इसीलिए आपने देखा कि जयशंकर जी बिल्कुल इसी वक्त और वो इस्तेमाल भी हुआ वीमार वीमार फॉर्मेट जो जर्मनी को वीमआर रिपब्लिक बोला जाता था वर्ल्ड वॉर के टाइम्स पे बिल्कुल वैसे वो शब्द का पहली बार मिनिस्ट्री ऑफ एक्सटर्नल अफेयर्स ने इस्तेमाल किया। बड़ा स्ट्राइकिंग है कि यह शब्द इस्तेमाल किया क्योंकि आपको पता है वेस्ट और ईस्ट जर्मनी आपको पता है वो हिस्ट्री में क्या हुआ था? एक तरफ रशियन डोमिनेंस था एक तरफ वेस्टर्न यूएस और यूके का डोमिनेंस था। तो अब वापस
यूरोप उसी पोजीशन में आ चुका है। ईस्टर्न यूरोप की कंट्रीज बोल रही है कि भाई कोई बचाने वाला ही नहीं है। तो अब पुतिन का सुनना ही पड़ेगा। राइट? और वेस्टर्न यूरोप बोल रहा है कि भाई हमको बचाओ तो वी विल अलाइव विद यू अदरवाइज फिर हम हमारे रास्ते तो ये वापस उसी पोजीशन में आ चुका है यूरोप जो हिस्ट्री में भी रहा एक हिस्सा वेस्ट की ओर और एक ईस्ट की ओर तो दिस इज वेयर मल्टीपोलरिटी इज हेडिंग तो अब चाइना को मिल चुका है ग्रीन सिग्नल ताइवान के लिए इवेंचुअली हम हमारा भी बोल
सकते हैं हमको भी मिल चुका है ग्रीन सिग्नल पीओके के लिए और बिल्कुल वैसे आपको पता ही है यूक्रेन का तो चल ही रहा है। नहीं क्या ये ये जो एक चर्चा चल रही है कि अलास्का में जब मिले थे पुतिन और ट्रंप तो तब मोटा-म मोटी तय हो गया दोनों के बीच में कि भाई तुम चाइना जो है वो ताइवान का नाश्ता कर ले और आप जब चाहे तब यूक्रेन का लंच कर ले और हमें हमारी टेरिटरी में जो हमें डिनर में लेना है हम खाएंगे। कोई एक दूसरे को छेड़ेगा नहीं और यह संकेत
भारत के लिए भी है कि भाई आपको भी जो करना है वह करिए। हां ये बिल्कुल 2021 से ये अलायंस बन चुका है जिसको मैं यूआरआईसी बोलता हूं डीडोलराइजेशन वाला अलायंस। तो यूएस, रशिया, इंडिया और चाइना। इसीलिए मैं कहता हूं कि ट्रंप खुद ही ब्रिक्स प्लस के सारे मल्टीपोलरिटी के ऑब्जेक्टिव्स ट्रंप ही अचीव कर लेंगे। तो वही इंटरनेशनल बॉडीज जिसकी हम कंप्लेन करते थे कि भाई रिफॉर्म करो रिफॉर्म करो तुम इरिलवेंट हो गए हो हमको अंदर आने दो हमारा सीट वी डिर्व दैट सीट चिल्ला चिल्ला के हम इतने सालों से समझा रहे थे तो नहीं
समझ आया अब ट्रंप खुद विड्र कर रहे हैं ये इंटरनेशनल बॉडीज में से राइट उसके जितने भी स्ट्रक्चर में बने हुए एक्स्ट्रा जो पार्ट्स उसमें से ट्रंप खुद एग्जिट अनाउंस कर रहे हैं तो अगर मल्टीपोलरिटी सही तरह से आप एक्सेप्ट नहीं कर रहे हो एस अ वेस्टर्न कलेक्टिव तो ट्रंप खुद एग्जिट कर रहा है। सो बेसिकली अब यह सारी बिजी बॉडीज जो बनी थी यूएन, वर्ल्ड बैंक, आईएमएफ ये सारी डॉलर का ट्रेड इंपोज करने के लिए पॉलिसी इंटरवेंशन के लिए पॉलिसी इंपोज करने के लिए तुम्हारे ऊपर क्लाइमेट चेंज के रिपोर्ट्स निकालने के लिए ये सब
जो इंटरनल साबोटाज के टूल्स इंटरनेशनल टूल्स बना दिए गए वेस्टर्न हैमोनी को सपोर्ट करने के लिए। अब यह टूल्स जो है धीरे-धीरे बेकार होते जा रहे हैं। तो आई एम नॉट सरप्राइज्ड के सबको अब फ्रीडम है अपने इलाके में। लेकिन कोई यह ना समझ ले कि स्पून फीड होने वाला है। तो ताइवान जब चाइना कुछ करने जाएगा तो ऑब्वियसली सेंशन भी लगेंगे, टेरिफ भी लग सकता है और हो सकता है चाइना को वॉलस्ट्रीट फाइनेंस से निकाल भी दिया जाए। अमेरिकी स्टॉक एक्सचेंज की लिस्टिंग में से तो बहुत कुछ एकशंस हो सकती हैं सिवाय सारी एक्शन
होगी सिवाय बूट्स ऑन ग्राउंड के इसके सिवाय बाकी सब कुछ होगा तो तभी ईस्ट और वेस्ट का संपर्क टूटेगा इंटरनेशनल ट्रेड का ये करने से ही तो टूटेगा तो बिल्कुल जब हम भी जाएंगे हमारी एक्शन के लिए तो हमारे खिलाफ भी कुछ एकशंस ऐसी बाकी सारी हो सकती है गुड्स ऑन ग्रांट के अलावा बाकी सब कुछ हो सकता है लिप सर्विस बट बट ओवरऑल कोई स्पून फीडिंग नहीं करने वाला। हमारा एफर्ट तो हमको ही डालना पड़ेगा। अब वो चाइना को करना पड़ेगा। ताइवान अगर करना है तो ऐसा नहीं है कि कोई सीधा मान जाएगा बिना
कोई एफर्ट डाले। बिल्कुल। वैसे हमें भी हमारे पीओके के लिए हमें खुद एक्शन करना पड़ेगा। कोई ऐसा नहीं है कि थाली में सजा के हमको दे देगा। ऑब्वियसली नेगोशिएशन में सपोर्ट मिल सकता है। लेकिन बिना एफर्ट के तो नहीं होना। सो एशिया हैस टू प्रूव क्योंकि अमेरिका की माइट तो पूरे वर्ल्ड को राज करने के लिए सेट हुई थी तो उनके लिए बहुत इजी है वेनेजुएला में जो उन्होंने किया उनके लिए बहुत इजी होगा मेक्सिको में अगर कुछ करना है तो लेकिन हम तो कभी कॉन्टिनेंट के उस तरफ गए नहीं किसी दूसरे कॉन्टिनेंट में अटैक
करने को तो हमारे लिए तो वी विल हैव टू प्रूव चाइना भी कहीं कहीं नहीं गया है मिलिट्री अटैक करने कहीं अफ्रीका में फौज ले उतर पड़ा हो ऐसा तो कभी चाइना का भी कोई हिस्ट्री नहीं है। राइट? तो चाइना और भारत दोनों को अपना दमखम दिखाना पड़ेगा। अगर अपना स्फीयर ऑफ इनफ्लुएंस मार्क करना है तो। और हमने देखा कि कैसे श्रीलंका में से डॉलर को हटाने के लिए यूनान और रूपी दोनों साथ में एंटर किए। मालदीव्स में भी डॉलर को हटाने के लिए यूआ और रूपी दोनों साथ में एंटर किए। बांग्लादेश में भी डॉलर
को हटाने के लिए यूआ और रूपी साथ में एंटर किए। बिल्कुल वैसे नेपाल में भी हुआ। तो एक लेवल पर कोऑपरेशन है चाइना के साथ इस इस मामले में के यह यूनपोलर वर्ल्ड खत्म करना है। नहीं एक बात बताइए अंकित जी ये जो कुछ सिनेरियो दिखाई दे रहा है जो आपने बताया है इसमें सबसे बड़ा नुकसान किसको होने वाला है? चाइना को। इसमें सबसे बड़ा नुकसान यूरोप को होने वाला है। तो इसमें यूरोप पीछे छूट जाएगा और बाकी चार पावर्स जो है वो मल्टीपोलरिटी अब डिजाइन करेंगे। मतलब नया यूनाइटेड नेशंस कैसा होगा? अब ये चार
पावर साथ में बैठ के डिसाइड करेंगे। मतलब कुछ सालों बाद नया आप कह रहे हैं कि फ्रांस, ब्रिटेन वगैरह ये सब यूनाइटेड जो आपकी सिक्योरिटी काउंसिल है उससे आउट भी हो सकते हैं। पॉसिबल है। या तो वो काउंसिल उतनी एक्सपैंड हो जाएगी। जैसे 15 नेशन आ गए या 10 आ गए। या तो एक्सपैंड हो जाएगी या तो उनको एग्जिट करना होगा। रिफॉर्म तो होना ही है। यह बात तय है। बिकॉज़ सबको रिप्रेजेंटेशन चाहिए और आपको पता है कि ब्राजील, ब्राजील, जर्मनी, जापान हमारा भी है और अब तो प्रधानमंत्री जी जैसे आप जानते हैं कि G20
में भी अफ्रीका की एंट्री करवाई उन्होंने। उन्होंने ब्रिक्स में भी अफ्रीका की एंट्री करवाई। भारत ने ही करवाई दोनों में। तो अफ्रीका को भी एटलीस्ट एक मेंबर का रिप्रेजेंटेशन तो होना ही चाहिए आइडियली। तो मुझे लगता है कि नया जब रिफॉर्म होगा तो एक्सपंड ही होगा। उसका ज्यादा चांस है। और अभी ब्रिक्स की चेयरमैन भारत को 2026 में इसी तो ये हां इसी और ब्रिक्स से क्या उम्मीदें हैं? वैसे ब्रिक्स से ट्रंप साहब काफी किलसे रहते हैं। काफी परेशान रहते हैं। उनको लगता है कि ये जो वैकल्पिक एक मुद्रा की बात करते हैं। ये हमारे
लिए सबसे बड़ी चुनौती है। नहीं देखिए काफी चीजें जो है मीडिया के लिए हेडलाइंस के रूप में इस्तेमाल होती है। रियलिटी उससे बिल्कुल विपरीत होती है। रियलिटी तो जब आपको आउटकम नजर आता है तब पता लग ही जाता है कि क्या हुआ। तो ब्रिक्स प्लस के जो मल्टीपोलरिटी के ऑब्जेक्टिव्स है वो तो प्रेसिडेंट ट्रंप सारे सपोर्ट करेंगे। जहां तक प्रश्न करेंसी का है तो बहुत ही इंपॉर्टेंट न्यूज़ आया है कि भारत और इजराइल रूपी में अब ट्रेड करने के लिए वो अरेंजमेंट हो रही है। अब इजराइल एक ऐसा राष्ट्र है जो अगर जो जो जिस
प्रकार से वो डीडोलराइजेशन में आगे बढ़ रहा है। कुछ ही साल पहले उन्होंने अपने सेंट्रल बैंक के रिजर्व्स में युवान को लिया डॉलर को हटा के। डॉलर का एक चंक हटा के उसने युवान से रिप्लेस करवाया। बिल्कुल हाईफा प्रोजेक्ट के नजदीक चाइनीस टर्मिनल को दिया गया प्रोजेक्ट भी। तो मल्टीपोलरिटी का और डीडोलराइजेशन का सबसे बड़ा सिग्नल ये है जब इजराइल कोई डायरेक्शन लेता है। तो मुझे नहीं लगता कि अमेरिका को भी कोई प्रॉब्लम है सिवाय ये लिप सर्विस जो भी उनको करना है। मेजरिटी मैं मानता हूं डीप स्टेट 93% अलाइन है डीडोलराइजेशन के प्रोसेस से।
वरना अगर अलाइन नहीं होते तो चार साल में इतना गोल्ड और सिल्वर अमेरिका और वेस्ट से शिप नहीं होता एशिया की ओर। तो यह तो पूरा बेल्ट ट्रांसफर हो रहा था ना पिछले चार सालों में। तो यही अमेरिकी सिटीजंस को सिल्वर पे $10 एक्स्ट्रा प्रीमियम देके उनसे सिल्वर निकलवा के एशिया ट्रांसफर किया गया। यह तो फैक्ट है। तो उनके नाक के नीचे डीडोलराइजेशन हो रहा है। ऐसा तो नहीं हो सकता। उनको पता ही है। जो डीप स्टेट के एलिमेंट्स हैं। तो मुझे लगता है कि ग्रेजुअली जो पूरा डायरेक्शन है डीप स्टेट का कि मल्टीपोलरिटी की
ओर जिसमें बहुत सारी आपको पता है यूके, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा की यूनिवर्सिटीज उनकी रैंकिंग भी गिरा दी गई। वहां अब इंडियन स्टूडेंट्स भी कम हो रहे हैं। जिस प्रकार से ड्रेसेस अटैक्स हो रहे हैं। और धीरे-धीरे हमारे यूनिवर्सिटीज के रैंकिंग ऊपर आ रहे हैं। वही लिस्ट में जो मानी जाती है कि डीप स्टेट की ओर से निकलती है। उनके टूलकिट्स की ओर से। तो रास्ता बहुत साफ है मल्टीपोलरिटी की ओर और इसमें सबसे ज्यादा नुकसान यूरोप का ही है। और आखिर में मैं जानना चाहूंगा भारत और यूएस के बीच में जो ट्रेड डील लगातार चर्चा का
विषय है। मीटिंग्स पर मीटिंग्स हो रही है। बयान पर बयान आ रहे हैं। वहां के वाणिज्य मंत्री का ताजा बयान सुर्खियों में है। जिसमें वह कह रहे हैं कि मोदी जी अगर ट्रंप साहब को एक कॉल कर लेते तो यह हो जाता। तीन सप्ताह तक उन्होंने इंतजार किया। वस्तु स्थिति क्या है? देखिए ओमकार जी जब से प्रेसिडेंट ट्रंप आए हैं पावर में तब से जिस प्रकार से एक उनका ये इनबिल्ट मानना हो गया है कि हम जो इकोनॉमिक परिस्थिति में जिस प्रकार से 50 वर्षों से करेंसी छाप छाप के अब पूरा बर्डन ट्रंप की ओर
डाल दिया गया मतलब जितने भी प्रेसिडेंट्स हैं सबने गड़बड़ी करी लेकिन जिम्मेदार अब अब एक व्यक्ति आ रहा है जो पावर में आया उसको उसको आउटपुट उसके हाथ में आया तो फेयर है कि बहुत ज्यादा फ्रस्ट्रेशन है इस बात का और अगर आप अमेरिका की हिस्ट्री उठाओगे तो टोटल 13 इकोनॉमिक क्राइसिस में से 10 इकोनॉमिक क्राइसिस रिपब्लिकन प्रेसिडेंट्स के हिस्से में आए। तो डीप स्टेट का स्क्रिप्ट कॉमन है कि बकरा जो है वो रिपब्लिकन प्रेसिडेंट को बनाते हैं। तो जब से प्रेसिडेंट ट्रंप आए हैं तब से जो ये उनको समझ में आ रहा है कि
गोल्ड और सिल्वर जा चुका है एशिया की ओर। उनको समझ में आ रहा है कि अब इकोनमी चल नहीं सकती। बर्थ रेट जा चुके हैं। डेप्ट जो है 38 ट्रिलियन क्रॉस कर चुका है। वायलेंस वो ज्यादा करना नहीं चाह रहे। जो हमने वेनेजुएला में देखा ही कि बिना वेनेजुएला को बर्बाद किए उन्होंने कर लिया जो करना था तो वायलेंस वो पर्सनली करना नहीं चाह रहे तो अगर यह सब अचीव करना है उन्होंने वापस पूरा क्राइसिस झेल के रिसेट करवाना है तो उसमें उनका फीलिंग यह है कि मैं जो भी करूं अब आप सहन करो मैं
उस स्थिति में हूं मेरी स्थिति इतनी खराब है कि हम कुछ भी कर सकते हैं आपको बस झेलना है तो वो उस मोड में पहुंच चुके हैं तो दे डोंट फील रिग्रेट अबाउट कि वो क्या कर रहे हैं, क्या बोल रहे हैं, क्या कर रहे हैं। अब उनको कोई वो पड़ी हुई नहीं है। आपको जो सोचना है आप सोचो। सो इस पोजीशन में बहुत नेचुरल सी बात है कि प्रधानमंत्री जी फोन नहीं लेंगे क्योंकि कल को कुछ बात हुआ और आपकी टीम में से फिर टैग करके लिख दिया कि प्रधानमंत्री जी मोदी तो आए थे
ऐसा बोल रहे थे तो एंबरेसिंग सी सिचुएशन है ना क्योंकि टीम मेंबर कुछ भी बोल रहा है उनका। वो भी कुछ भी बोल रहे हैं। यही कह दें कि मोदी जी माफी मांग रहे थे। हां हां तो यह इनका जो बिहेवियर है पर्सनल बिहेवियर इसमें ये प्रधानमंत्री जी को खो चुके हैं। इनफ प्रधानमंत्री जी अब फ्रेंड लिखना बंद कर दिए हैं। जो उनकी हर एक ट्वीट में आता था माय फ्रेंड प्रेसिडेंट ट्रंप उसमें से फ्रेंड निकल चुका है। तो इसके बाद भी इनको समझ में नहीं आता क्योंकि अमेरिका में रिलेशनशिप का कुछ अलग ही मामला
है। हमारे यहां रिलेशनशिप का सीरियसनेस कुछ अलग ही है। राइट? तो उनके तो जिस प्रकार से डिवोर्स रेट है सुबह डिवोर्स करके शाम को शादी में वो पार्टनर आ भी जाता है डिवोर्स वाला गिफ्ट लेके तो ये हमारे वैसा नहीं होता हमारे तो तुरंत इंपैक्ट आता है तो प्रधानमंत्री जी ने फ्रेंड शब्द निकाल दिया अपनी ट्वीट में से तो बहुत जाहिर सी बात है कि वो जो एंबरेसिंग सिचुएशन में वो क्यों पढ़ना चाहेंगे जब दूसरे लेवल पर बात हो सकती है तो सही बात है उस समय भी वैसा था कि उनके सारे टीम मेंबर्स कुछ
ना ओलजोल कुछ भी बोल रहे थे। स्कॉट बेसेंट से ले नरो से ले सारे किट से ले सारे कुछ ना कुछ बकवास कर रहे थे। तो कोई मतलब ही नहीं था फोन उठाने का। दूसरा ये जो पर्सनल ईगो वाला मैटर है कि भाई तुम मेरे को अपीस करो और मैं फिर उसको पब्लिक में डाल दूं कि देखो मुझे अपीस किया गया था। तो दैट इज नॉट फ्रेंडली और दैट इज नॉट हाउ प्राइम मिनिस्टर मोदी ऑपरेट्स। ओके? कोई भी सेल्फ रिस्पेक्ट वाला कोई भी व्यक्ति ऐसे क्यों करेगा? तो ये हम कोई शबाज शरीफ तो है नहीं
कि हमने बुला के एक लताड लगा दी पब्लिक में। ये तो नहीं हो सकता। तो इट मेक्स सेंस। और दूसरा जहां तक इंडिया यूएस डील का प्रश्न है तो रियली कहां अटका हुआ है? यह वहां पर अटका हुआ है कि डायबिटीज की कंपनी वो क्रॉप साइंस की कंपनी के साथ एमओयू कर चुकी है और ट्रंप का कंपेन फंड किया है। ट्रंप ने एक्सचेंज में बोला था कि तुम्हारा जीएमओ वाला क्रॉप्स मैं भारत में डलवा दूंगा एग्रीकल्चर सेक्टर ओपन करवा दूंगा जो हम तैयार नहीं है क्योंकि हम क्यों डायबिटीज के पेशेंट्स बनेंगे उनके जीएमओ क्रॉप्स खा
के तो ये वहां पे अटका हुआ है। मैटर वहां पे अटका हुआ है। तो ईगो की या वो तो उनको जो स्टोरी करनी है करें। तो हमारा रेड लाइन सेट है। हम जीएमओ क्रॉप्स ह्यूमन कंजमशन के लिए नहीं लेने वाले क्योंकि वो लॉन्ग टर्म डायबिटीज और ब्लड प्रेशर के पेशेंट्स का मार्केट खोज रहे हैं जो हमको नहीं बनना है। राइट? और उनके जो डेयरी प्रोडक्ट्स है उसमें जो गाय जो है वो स्लॉटर हाउस का कचरा खाती है वहां की गाय। तो वो डेयरी प्रोडक्ट्स भी हम नहीं ले सकते। दी आर आवर रेड लाइंस। मुझे लगता
क्रॉस होगी। इसका मतलब यह है कि अभी यह चीजें सिरे चढ़ने वाली नहीं है। अच्छा डील हो भी जाए ओमकार जी अगर डील हो भी जाए तो क्या भरोसा है ये टिके रहेंगे अपने टर्म्स पे। आई डोंट ट्रस्ट देम। अभी वो स्थिति में नहीं है। वो मानसिक स्थिति में नहीं है स्टेबिलिटी के। तो डील हो भी जाती तो कोई मतलब नहीं था। अंकित जी बहुत-बहुत धन्यवाद आपका जुड़ने के लिए। इतना समय निकालने के लिए, बहुत महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा करने के लिए। थैंक यू सो मच। दर्शकों से निवेदन है आपको यह वीडियो अगर पसंद आया
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