बुलंदी की उड़ान पर हो तो जरा सब्र रखो परिंदे बताते हैं कि आसमान में ठिकाने नहीं होते दर्द गम या डर जो भी है बस तेरे अंदर है खुद के बनाए पिंजरे से निकल कर देख तू भी एक सिकंदर है यूं जमीन पर बैठकर क्यों आसमान देखता है पंखों को खोल क्योंकि जमाना सिर्फ उड़ान देखता है लहरों की तो फितरत ही है शोर मचाने की लेकिन मंजिल उसी की होती है जो नजरों से तूफान देखता है