रुकिए। अगर आपको लगता है कि आप लोगों के सामने ठीक से बोल नहीं पाते, नए लोगों से बात करते समय घबरा जाते हैं। आपकी बातों को लोग ज्यादाेंस नहीं देते। या आप चाहते हैं कि लोग आपको एक कॉन्फिडेंट, इंटेलिजेंट और इंप्रेसिव इंसान के रूप में देखें तो इस वीडियो को बिल्कुल स्किप मत करना। क्योंकि हो सकता है आपकी समस्या कॉन्फिडेंस की कमी नहीं बल्कि सोशल स्किल्स की कमी हो। और सबसे अच्छी बात यह है कि सोशल स्किल्स कोई जन्मजात टैलेंट नहीं है। इसे सीखा जा सकता है। इसे प्रैक्टिस से मजबूत किया जा सकता है। और
अगर आपने आज से इन छोटी-छोटी चीजों को अपनी जिंदगी में लागू करना शुरू कर दिया तो आने वाले समय में लोगों से बात करने का आपका तरीका, आपका कॉन्फिडेंस और आपके रिलेशनशिप्स पूरी तरह बदल सकते हैं। आज हम एक ऐसी किताब के बारे में बात करने वाले हैं जो आपको सिखाएगी कि किसी भी इंसान से कॉन्फिडेंटली कैसे बात करनी है। सामने वाले को जेनुइनली कैसे सुनना है। नए दोस्त और मजबूत कनेक्शंस कैसे बनाने हैं? बॉडी लैंग्वेज को कैसे इंप्रूव करना है और सबसे जरूरी लोगों के बीच रहते हुए खुद को कंफर्टेबल कैसे महसूस करना है।
तो अगर आप चाहते हैं कि आपकी कम्युनिकेशन स्किल्स इतनी बेहतर हो जाए कि लोग आपकी बात सिर्फ सुने नहीं बल्कि ध्यान से सुने तो इस वीडियो को आखिर तक जरूर देखिए। और याद रखिए आपकी जिंदगी में बदलाव तब शुरू होता है जब आप सिर्फ नॉलेज लेना बंद करके उसे अपनी जिंदगी में अप्लाई करना शुरू करते हैं। नमस्कार दोस्तों क्या आपने कभी महसूस किया है कि जब आप किसी नए इंसान से बातचीत करना चाहते हैं तो आपके अंदर एक हल्की सी झिझक पैदा हो जाती है? क्या आपको लगता है कि अगर आपकी सोशल स्किल्स थोड़ी और
बेहतर होती तो आप किसी से भी आसानी से जुड़ सकते? चाहे वह दोस्त हो, कोई सहकर्मी हो या फिर कोई अनजान व्यक्ति। अगर हां तो यह वीडियो खास आपके लिए है क्योंकि आज हम बात करेंगे एक ऐसी किताब के बारे में जो आपकी कम्युनिकेशन स्किल्स को निखारने में मदद कर सकती है और आपको सिखाती है कि कैसे आप हर तरह की सोशल सिचुएशन में आत्मविश्वास के साथ खड़े हो सकते हैं। इस किताब का नाम है इंप्रूव योर सोशल स्किल्स। और इसके अंदर ऐसे अमूल्य टिप्स और प्रैक्टिकल ट्रिक्स बताए गए हैं जो आपकी पर्सनल और प्रोफेशनल
दोनों तरह की जिंदगी को बदल सकते हैं। इसलिए इस वीडियो को आखिर तक जरूर देखें क्योंकि इसमें हम उन बातों को समझेंगे जो आपके लिए गेम चेंजर साबित हो सकती हैं। आज की दुनिया में सिर्फ डिग्री या टेक्निकल नॉलेज ही सफलता की गारंटी नहीं है। आपके पास चाहे कितनी भी अच्छी पढ़ाई या जानकारी हो, अगर आपके पास मजबूत सोशल स्किल्स नहीं है, तो आप सही मौकों का फायदा उठाने से चूक सकते हैं। सोशल स्किल्स का मतलब सिर्फ बातचीत करना नहीं है। बल्कि यह एक ऐसी कला है जो आपको सिखाती है कि कैसे प्रभावी तरीके से
संवाद करना है, रिश्ते बनाने हैं और दूसरों पर एक सकारात्मक प्रभाव छोड़ना है। यह स्किल्स हर जगह काम आती हैं। चाहे आप किसी जॉब इंटरव्यू में बैठे हो, बिजनेस मीटिंग में हो, किसी सोशल इवेंट में शामिल हो या फिर सिर्फ एक नए दोस्त से पहली बार मिल रहे हो। सोशल स्किल्स जरूरी क्यों है? क्योंकि यह आपकी जिंदगी के चार बड़े हिस्सों को सीधा प्रभावित करती हैं। सबसे पहले कम्युनिकेशन। जब आप साफ और आत्मविश्वास के साथ अपनी बात रखते हैं तो गलतफहमियां कम होती हैं और सामने वाला आपकी सोच को आसानी से समझ लेता है। इससे
आपकी पर्सनल लाइफ में भी रिश्ते बेहतर होते हैं और प्रोफेशनल लाइफ में भी आप एक भरोसेमंद इंसान माने जाते हैं। दूसरा अच्छे रिश्ते और नेटवर्किंग। अगर आप लोगों के साथ जुड़ने और रिश्ते बनाने की क्षमता रखते हैं तो आपको जिंदगी में ज्यादा ओपोरर्चुनिटीज मिलती हैं। यही रिश्ते आपको आगे बढ़ने का रास्ता खोलते हैं। तीसरा आत्मविश्वास। जब आप जानते हैं कि आप किसी भी माहौल में घुल मिल सकते हैं तो आपके अंदर एक अलग ही आत्मनिर्भरता आती है। और चौथा लीडरशिप। अगर आप अपने विचारों को सही तरीके से रख सकते हैं और लोगों की भावनाओं को
समझ सकते हैं तो लोग आपके प्रभाव में आते हैं और आपको एक लीडर के रूप में स्वीकार करते हैं। अब बहुत से लोग यह सोचते हैं कि अच्छे कम्युनिकेटर या सोशल इंसान बनना एक जन्मजात टैलेंट है। यानी कुछ लोग जन्म से ही आत्मविश्वासी होते हैं और बाकी लोग चाहकर भी ऐसा नहीं बन सकते। लेकिन यह सच नहीं है। अच्छी खबर यह है कि सोशल स्किल्स को सीखा जा सकता है और उन्हें अभ्यास से मजबूत किया जा सकता है। अगर आज आप बातचीत करने में झिझकते हैं या आपको लगता है कि लोग आपकी बातों में दिलचस्पी
नहीं लेते तो भी चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। छोटी-छोटी आदतों को अपनाकर और लगातार अभ्यास करके आप भी एक बेहतरीन कम्युनिकेटर बन सकते हैं। एक दिलचस्प बातचीत कैसे करें? यह भी एक कला है। अक्सर जब हम किसी नए व्यक्ति से मिलते हैं तो शुरुआती कुछ मिनटों में ही तय हो जाता है कि वह व्यक्ति हमसे जुड़ाव महसूस करेगा या नहीं। अगर हमारी बातचीत बोरिंग है तो सामने वाला जल्दी ही बात खत्म करना चाहेगा। लेकिन अगर हमारी बातों में आकर्षण है तो वही बातचीत उसके लिए यादगार बन जाती है। एक अच्छी बातचीत को दिलचस्प
बनाने के लिए तीन चीजें बेहद जरूरी हैं। पहली चीज है एक्टिव लिसनिंग यानी सक्रिय रूप से सुनना। सुनने और सिर्फ सुनने का दिखावा करने में बड़ा फर्क होता है। कई बार हम सामने वाले की बात सुनते तो हैं, लेकिन हमारे दिमाग में पहले से ही अगले जवाब की तैयारी चल रही होती है। यह सही तरीका नहीं है। एक्टिव लिसनिंग का मतलब है सामने वाले पर पूरा ध्यान देना। उसके शब्दों और भावनाओं को समझना और बीच-बीच में सही प्रतिक्रिया देना ताकि उसे महसूस हो कि उसकी बात आपके लिए मायने रखती है। एक्टिव लिसनिंग का अभ्यास करने
के लिए आप आंखों में आंखें डालकर बात करें। हल्के हावभाव से यह जताएं कि आप सुन रहे हैं। जैसे सिर हिलाना या छोटे-छोटे शब्द कहना। अच्छा हां समझा। फिर जब कोई आपको अपना एक्सपीरियंस बता रहा हो तो उसमें और गहराई से पूछें। फिर आपने क्या किया? आपको कैसा लगा? लेकिन ध्यान रखें सामने वाले की बात काटना, बीच में अपनी राय थोप देना, बातचीत के दौरान फोन में व्यस्त रहना या अधीर होकर जल्दी-जल्दी जवाब देना, एक्टिव लिसनिंग को बिगाड़ देता है। दूसरी चीज है बॉडी लैंग्वेज। आप क्या बोलते हैं? उससे ज्यादा महत्वपूर्ण कई बार यह होता
है कि आप उसे कैसे बोलते हैं। आपके हावभाव, आपके चेहरे के भाव, आपका बैठने और खड़े होने का तरीका यह सब आपके मैसेज को और ताकतवर बनाते हैं। अच्छी बॉडी लैंग्वेज का मतलब है कि आप रिलैक्स्ड होकर बात करें। हाथों को क्रॉस ना करें। हल्की मुस्कान बनाए रखें और समय-समय पर आई कांटेक्ट करें। लेकिन लगातार घूरना भी ठीक नहीं। इसलिए बीच-बीच में नजरें मिलाना बेहतर है। ध्यान दें कि आपकी बॉडी ज्यादा बेचैन या हिलती डुलती ना हो। वरना सामने वाला असहज महसूस कर सकता है। तीसरी चीज है जिज्ञासा यानी क्यूरियोसिटी। अगर आप चाहते हैं कि
बातचीत स्वाभाविक रूप से आगे बढ़े तो आपको सामने वाले व्यक्ति में ईमानदारी से दिलचस्पी लेनी होगी। कोई भी व्यक्ति तब ज्यादा जुड़ाव महसूस करता है जब उसे लगता है कि आप उसकी बातों को गंभीरता से ले रहे हैं। सवाल पूछना इसका सबसे अच्छा तरीका है। अगर वह आपको अपने शौक या किसी एक्सपीरियंस के बारे में बता रहा है तो उस पर और जानकारी मांगे। जैसे वाह यह तो अच्छा है। आपने यह कब शुरू किया या इसमें आपको सबसे अच्छा क्या लगता है? सामने वाले की पसंद और रुचियों में रुचि दिखाना भी एक बढ़िया आदत है।
और हां, गलती यह ना करें कि सिर्फ अपने बारे में बोलते रहें और दूसरे को मौका ही ना दें। बातचीत हमेशा दो तरफ होनी चाहिए। अगर आप इन तीन बातों पर ध्यान देंगे, सक्रिय रूप से सुनना, अपनी बॉडी लैंग्वेज सुधारना और सामने वाले में सच्ची रुचि दिखाना तो आप किसी भी बातचीत को आकर्षक और यादगार बना सकते हैं। अब आती है आत्मविश्वास की बात। कई लोग सोशल सिचुएशंस में झिझकते हैं। उन्हें लगता है कि लोग उनके बारे में क्या सोचेंगे या कहीं वे कुछ गलत तो नहीं बोल देंगे। लेकिन आत्मविश्वास कोई जादू नहीं है। यह
एक आदत है जिसे धीरे-धीरे मजबूत किया जा सकता है। इसके लिए तीन तरीके बहुत महत्वपूर्ण है। पहला है प्रैक्टिस। जितना ज्यादा आप बातचीत करेंगे उतना बेहतर बनेंगे। कोई भी स्किल बिना अभ्यास के विकसित नहीं होती। चाहे खेल हो, संगीत हो या सोशल स्किल्स। प्रैक्टिस ही कुंजी है। हर दिन किसी नए व्यक्ति से बात करने की कोशिश करें। यह जरूरी नहीं कि वह कोई बड़ा परिचित हो। आप दुकान के सेल्समैन से, कैब ड्राइवर से या ऑफिस के किसी कोलीग से छोटी-छोटी बातें करके शुरुआत कर सकते हैं। आप खुद को छोटे-छोटे चैलेंजेस दें। जैसे किसी अजनबी से
रास्ता पूछना या काउंटर पर आर्डर देते समय मुस्कुराकर बात करना। यहां तक कि आईने के सामने खड़े होकर खुद से बात करना भी आपकी आवाज और हावभाव को सुधार सकता है। शुरुआत में अजीब जरूर लगेगा लेकिन धीरे-धीरे यही प्रैक्टिस आपका कॉन्फिडेंस बढ़ा देगी। दूसरा है सेल्फ टॉक को सुधारना। हमारी सोच हमारे आत्मविश्वास को सीधा प्रभावित करती है। अगर हम खुद से बार-बार यही कहें मैं अच्छा स्पीकर नहीं हूं या लोग मेरी बातों में इंटरेस्ट नहीं लेंगे तो यह नेगेटिव सोच हमारे व्यवहार को प्रभावित कर सकती है। लेकिन अगर हम खुद से सकारात्मक बातें कहें मैं
हर दिन बेहतर हो रहा हूं। मैं लोगों से अच्छी तरह बात कर सकता हूं। मैं आत्मविश्वासी हूं तो हमारा व्यवहार भी उसी दिशा में बदलने लगता है। इसलिए अपने दिमाग को बार-बार पॉजिटिव संकेत दें। जब भी घबराहट हो खुद से कहें मैं कर सकता हूं। तीसरा है छोटी शुरुआत करना। अगर आप बहुत ज्यादा इंट्रोवर्ट हैं और भीड़ के सामने बोलने से डरते हैं तो तुरंत बड़े मंच पर जाने की जरूरत नहीं है। पहले छोटे-छोटे कदम उठाएं जैसे किसी अजनबी से पूछना कैसे हैं आप? या किसी जानकार से पूछना आज का दिन कैसा रहा? अगर आमने-सामने
बातचीत में झिझक है तो पहले ऑनलाइन चैटिंग या मैसेजेस से प्रैक्टिस करें। धीरे-धीरे अपने कंफर्ट ज़ोन से बाहर निकलें। पहले दो-तीन लोगों के सामने बोलें। फिर धीरे-धीरे बड़े ग्रुप में आप दोस्तों के बीच कोई कहानी सुना सकते हैं या ऑफिस मीटिंग में अपने विचार रख सकते हैं। गलती यह होगी कि आप सीधे ही बड़े मंच पर जाने की कोशिश करें और असफल होने पर खुद को दोष दें। याद रखें आत्मविश्वास छोटे कदमों से ही मजबूत होता है। जब आप अपने आत्मविश्वास को छोटे-छोटे कदमों से बढ़ाते हैं तो आप पाएंगे कि धीरे-धीरे आपके अंदर एक अलग
ही एनर्जी आने लगती है। लोग आपकी बातों को ज्यादा ध्यान से सुनने लगते हैं और आपको एक गंभीर और भरोसेमंद इंसान मानने लगते हैं। याद रखिए आत्मविश्वास का मतलब यह नहीं है कि आप हमेशा परफेक्ट तरीके से बोले। आत्मविश्वास का असली मतलब यह है कि आप गलती करने के बाद भी खुद को संभालकर फिर से खड़े हो सकें। यही सोच आपको बाकी लोगों से अलग बनाती है। नए दोस्त और मजबूत कनेक्शंस कैसे बनाएं? क्या आपको भी कभी लगता है कि लोग आपसे ज्यादा जुड़ना नहीं चाहते या फिर जब आप किसी नए व्यक्ति से बातचीत शुरू
करना चाहते हैं तो सामने वाला उतना इंटरेस्टेड नहीं दिखता। अगर हां तो परेशान मत होइए। असल में दोस्ती और नेटवर्किंग एक कला है और यह कला आप आसानी से सीख सकते हैं। लंबे समय तक टिकने वाले रिश्ते बनाने के लिए सबसे जरूरी है एक गिव एंड टेक अप्रोच। यानी अगर आप चाहते हैं कि लोग आपके साथ जुड़े रहे तो आपको भी उन्हें कुछ देना होगा। चाहे वह समय हो, मदद हो, सलाह हो या सिर्फ एक ईमानदार सुनने वाला कान। लोगों के साथ ऐसे रिश्ते बनाइए जहां वे आपको सिर्फ एक इंसान की तरह देखें ना कि
किसी सेल्फिश मकसद के लिए जुड़े हुए व्यक्ति की तरह। जब आप किसी की बिना स्वार्थ मदद करते हैं तो उस रिश्ते की नींव मजबूत हो जाती है और यही रिश्ते लंबे समय तक आपका साथ निभाते हैं। कई बार यह मदद बहुत छोटी हो सकती है। जैसे किसी की बात ध्यान से सुनना, उन्हें कोई जानकारी देना या मुश्किल वक्त में उनका हौसला बढ़ाना। लेकिन सामने वाले के लिए यह छोटी चीजें बहुत बड़ी साबित हो सकती हैं। और अगर आपको लग रहा है कि यह वीडियो आपकी जिंदगी से जुड़ी हुई बातें बता रही है तो वीडियो को
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बनाना चाहते हैं तो इस गलती से बचें। बातचीत हमेशा दो तरफा होनी चाहिए। सामने वाले की पसंद, शौक और सोच को समझने की कोशिश करें। मान लीजिए कोई व्यक्ति म्यूजिक पसंद करता है और आपको उसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। फिर भी आप उससे पूछ सकते हैं आपका फेवरेट सॉन्ग कौन सा है या आपको किस सिंगर की आवाज सबसे ज्यादा पसंद है। इस तरह की बातें सामने वाले को यह महसूस कराती हैं कि आप सच में उसमें इंटरेस्ट ले रहे हैं और यही जुड़ाव धीरे-धीरे गहरी दोस्ती में बदल सकता है। तीसरी चीज है रेगुलर
कम्युनिकेशन। दोस्ती और रिश्ते सिर्फ बनाकर छोड़ देने से नहीं चलते। उन्हें निभाना पड़ता है। अगर आप किसी से लंबे समय तक संपर्क नहीं रखते तो धीरे-धीरे रिश्ता कमजोर हो जाता है। इसलिए छोटे-छोटे मैसेजेस भेजना, फोन करना या किसी खास मौके पर उन्हें याद करना बेहद जरूरी है। यहां तक कि एक छोटा सा मैसेज कैसे हो या आज दिन कैसा रहा? भी सामने वाले को खास महसूस करा सकता है। सोचिए अगर आप सिर्फ तब संपर्क करते हैं जब आपको उनकी जरूरत होती है तो सामने वाला कैसा महसूस करेगा। उसे लगेगा कि आप सिर्फ अपना फायदा देख
रहे हैं। इसलिए रिश्ते बनाने का मतलब सिर्फ जरूरत के वक्त फोन करना नहीं है बल्कि समय-समय पर जुड़ाव बनाए रखना है। यही जुड़ाव आपको एक भरोसेमंद दोस्त और प्रोफेशनल कनेक्टर बनाता है। अब आइए बात करते हैं उस चीज की जो इन सबके पीछे की असली ताकत है। आपका माइंडसेट। क्योंकि अगर आपका माइंडसेट सही नहीं है तो चाहे आपके पास कितनी भी ट्रिक्स और टिप्स क्यों ना हो आप उन्हें लंबे समय तक इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे। माइंडसेट का मतलब है आपका सोचने का तरीका। क्या आप सोचते हैं कि लोग आपसे जुड़ना नहीं चाहते? या फिर क्या
आप यह मानते हैं कि आप कभी अच्छे स्पीकर नहीं बन सकते? अगर हां तो यह सोच ही आपकी सबसे बड़ी रुकावट है। याद रखिए हमारी सोच, हमारे व्यवहार और हमारी दिशा को प्रभावित करती है। अगर आप अपने दिमाग में यह मान लेंगे मैं बदल सकता हूं। मैं सीख सकता हूं। मैं एक बेहतर इंसान बन सकता हूं तो आपका व्यवहार भी उसी हिसाब से बदलने लगेगा। लेकिन अगर आप बार-बार यह सोचते रहेंगे मैं कभी नहीं बदललूंगा तो आप खुद ही अपने रास्ते में दीवार खड़ी कर देंगे। इसीलिए सोशल स्किल्स की नींव सिर्फ प्रैक्टिस या ट्रिक्स नहीं
है बल्कि एक सही माइंडसेट है। दोस्तों क्या आपने गौर किया है कि जो लोग जिंदगी में आगे बढ़ते हैं वे सिर्फ किताबों के टॉपर या डिग्री वाले नहीं होते। असली फर्क कई बार उनकी स्किल्स लाती हैं। खासकर यह कि वे दूसरों के साथ कैसे जुड़ते हैं। आप किसी भी सफल इंसान को देख लीजिए। चाहे वह बिजनेस लीडर हो, पब्लिक फिगर हो या कोई आर्टिस्ट। उनकी ताकत सिर्फ उनका टैलेंट नहीं है बल्कि यह भी है कि वे लोगों से जुड़ना जानते हैं। उन्हें इंस्पायर करना जानते हैं। अब सोचिए अगर यही ताकत आपके पास हो जाए तो
आपकी जिंदगी कैसी होगी? आप जहां भी जाएंगे लोग आपको नोटिस करेंगे। आपकी बातें असर करेंगी। आपके रिश्ते मजबूत होंगे और सबसे बढ़कर आप खुद को और ज्यादा कॉन्फिडेंट और खुश महसूस करेंगे। अब बात करते हैं बॉडी लैंग्वेज की। आपकी बॉडी लैंग्वेज ही असल में सबसे पहले लोगों तक आपका मैसेज पहुंचाती है। आप कुछ बोलने से पहले ही आपका चेहरा, आपकी आंखें और आपके हाथों का इस्तेमाल सामने वाले को बहुत कुछ बता देते हैं। अगर आप झुके हुए खड़े हैं, नजरें नीचे हैं या बार-बार बेचैनी से हिल रहे हैं, तो सामने वाले को यही लग सकता
है कि आप कॉन्फिडेंट नहीं हैं। लेकिन अगर आप सीधा खड़े हैं, आंखों में नजर मिलाकर बात कर रहे हैं और हल्की सी स्माइल रखे हुए हैं, तो यह आपके कॉन्फिडेंस की झलक देता है। इसलिए अगर आप चाहते हैं कि लोग आपको सीरियसली लें, तो आपको अपने वर्ड्स के साथ-साथ अपनी बॉडी लैंग्वेज पर भी ध्यान देना होगा। अब सोचिए अगर आप किसी मीटिंग में गए और हर बार बोलते वक्त नजरें झुका रहे हैं तो लोग आपकी बात पर भरोसा क्यों करेंगे? वहीं अगर आप कॉन्फिडेंस से बोले, नजरें मिलाएं और आवाज साफ रखें तो वही साधारण बातें
भी ज्यादा असरदार लगेंगी। इसके अलावा बातचीत में साइलेंस का इस्तेमाल करना भी बहुत जरूरी है। कई बार लोग जल्दी-जल्दी बोलते जाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि रुकने से सामने वाला अनइंटस्टेड हो जाएगा। लेकिन हकीकत यह है कि सही जगह पर पॉज आपकी बात को और ज्यादा पावरफुल बना सकता है। जब आप थोड़ी देर रुकते हैं तो सामने वाले को आपके शब्दों को समझने का मौका मिलता है और यह पॉज आपके कॉन्फिडेंस की निशानी भी हो सकता है। अब चलते हैं एक और अहम स्किल पर लिसनिंग। सुनने की कला। अक्सर लोग बोलने की प्रैक्टिस करते
हैं, लेकिन सुनने की प्रैक्टिस नहीं करते। जबकि असली कनेक्शन तब बनता है जब आप सच में सामने वाले को सुनते हैं। कई बार हम सिर्फ इस इंतजार में रहते हैं कि सामने वाला कब चुप हो ताकि हम अपनी बात कह सकें। लेकिन ऐसा करने से सामने वाले को लगता है कि हमें उसकी बातों की परवाह ही नहीं। अगर आप सच में स्ट्रांग रिलेशनशिप्स बनाना चाहते हैं, तो एक्टिव लिसनिंग सीखनी होगी। एक्टिव लिसनिंग का मतलब है कि आप सामने वाले की बातों पर ध्यान दें। बीच-बीच में छोटे जेस्चर्स दें। जैसे हां, हम समझ गया या सिर
हिलाना ताकि सामने वाले को लगे कि आप इंगेज्ड हैं। और सबसे जरूरी बात उनकी बातों को अपने शब्दों में दोहराकर कंफर्म करना। जैसे अगर कोई कहता है मुझे काम में बहुत स्ट्रेस हो रहा है तो आप कह सकते हैं तो तुम्हें काम का प्रेशर ज्यादा महसूस हो रहा है। यह छोटी सी चीज सामने वाले को यह एहसास कराती है कि आप उसकी फीलिंग्स समझने की कोशिश कर रहे हैं। यही चीज ट्रस्ट को और गहरा करती है। अब आता है एमैथी यानी संवेदनशीलता। यह स्किल आपकी कम्युनिकेशन को एक नए लेवल पर ले जाती है। एमैथी का
मतलब सिर्फ यह नहीं कि आप किसी की बात सुने बल्कि यह कि आप खुद को उसकी जगह रखकर सोें। जब आप सामने वाले के नजरिए से उसकी परेशानी या खुशी को समझने लगते हैं तो आपका रिश्ता और गहरा हो जाता है। एमथी से भरा हुआ इंसान लोगों को सुरक्षित और समझा हुआ महसूस करा सकता है। आपने गौर किया होगा कि कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनसे मिलकर ही अच्छा लगता है। आपको लगता है कि उनके पास कोई जादुई ताकत है। असल में वह उनकी एमथी होती है। वे सिर्फ आपको सुनते नहीं बल्कि आपकी भावनाओं को
भी समझने की कोशिश करते हैं और यही वजह है कि लोग बार-बार उनकी तरफ खींचे चले आते हैं। अब आइए बात करें एडप्टेबिलिटी की यानी हर सिचुएशन में खुद को ढालने की ताकत। कम्युनिकेशन हमेशा एक जैसी नहीं होती। कभी आपको फॉर्मल सेटिंग में बात करनी होती है और कभी कैजुअल माहौल में। अगर आप हर जगह एक ही तरह का टोन और बिहेवियर रखेंगे तो कई बार लोग आपको गलत समझ सकते हैं। एडप्टेबिलिटी का मतलब है कि आप माहौल के हिसाब से अपनी कम्युनिकेशन स्टाइल को एडजस्ट करें। उदाहरण के लिए अगर आप ऑफिस में हैं तो
वहां प्रोफेशनल लैंग्वेज और रिस्पेक्टफुल टोन जरूरी है। वहीं दोस्तों के बीच आप थोड़ा हल्काफुल्का और फ्रेंडली टोन रख सकते हैं। अगर आप हर जगह रिजिड रहेंगे तो लोग आपको समझने में कठिनाई महसूस कर सकते हैं। लेकिन अगर आप फ्लेक्सिबल रहेंगे तो आप अलग-अलग सिचुएशंस में बेहतर तरीके से कम्युनिकेट कर पाएंगे। यही स्किल आपको भीड़ से अलग बनाती है। और अब आते हैं उस चीज पर जो इन सारी स्किल्स को एक थ्रेड में पिरो देती है। कंसिस्टेंसी। अगर आप सोचते हैं कि एक दिन प्रैक्टिस करके आप मास्टर कम्युनिकेटर बन जाएंगे तो यह गलत है। सोशल स्किल्स
को रोजाना की प्रैक्टिस से ही मजबूत किया जा सकता है। रोज छोटे-छोटे कदम उठाइए। जैसे हर दिन किसी नए व्यक्ति से मुस्कुराकर हेलो कहना, ऑफिस में किसी को लेग से कैजुअली बातचीत करना या घर पर परिवार के साथ दिल से सुनना। यह छोटे-छोटे कदम धीरे-धीरे आपकी आदत बन जाएंगे और आपके अंदर कॉन्फिडेंस और कनेक्शन दोनों को मजबूत करेंगे। दोस्तों अगर आपने यहां तक ध्यान से सुना है तो अब आपको साफ समझ आ गया होगा कि असली ताकत सिर्फ नॉलेज में नहीं है बल्कि इस बात में है कि हम उस नॉलेज को लोगों से जुड़कर कैसे
इस्तेमाल करते हैं। सोशल स्किल्स, कम्युनिकेशन, एमथी और कॉन्फिडेंस यही वह चीजें हैं जो आपकी जिंदगी की दिशा बदल सकती हैं। आज जो बातें आपने सुनी हैं उन्हें अगर आप धीरे-धीरे अपनाना शुरू कर दें तो आने वाले दिनों में आप खुद देखेंगे कि लोग आपके साथ समय बिताना चाहेंगे। आपकी बातें ध्यान से सुनेंगे और आपको एक कॉन्फिडेंट और भरोसेमंद इंसान के रूप में देखेंगे। और अब मैं आपसे दिल से एक सवाल पूछना चाहता हूं। आपको इस पूरी वीडियो में सबसे ज्यादा असर किस हिस्से ने किया? क्या वह पार्ट था जहां हमने कॉन्फिडेंस की बात की या
फिर वह हिस्सा जहां हमने एमथी और रिश्तों को गहराई से समझा। मुझे सच में जानना है कि कौन सा थॉट आपके दिल को सबसे ज्यादा छू गया। इसलिए नीचे कमेंट में जरूर लिखिए। आपका हर कमेंट मुझे और भी बेहतर कंटेंट लाने की ताकत देता है। और हां, अगर आप चाहते हैं कि आपकी जिंदगी में यह पॉजिटिव बदलाव सिर्फ सुनने तक ना रहे बल्कि असल में आपकी रियलिटी बने, तो द माइंड सक्सेस को अभी सब्सक्राइब कर लीजिए क्योंकि आने वाले वीडियोस आपकी सोच को और ऊंचाई देंगे और आपकी इनर स्ट्रेंथ को बाहर लाने में मदद करेंगे।
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