प्रारब्ध बल भी काम करता है बुद्धि बल भी काम करता धन बल जन बल तब लौकिक फायदे होते हैं लेकिन लौकिक फायदे देखते देखते जैसे साबुन के बुलबुले हैं ऐसे बिखर जाते बचपन में कितने कितने फायदे हो गए थे पढ़ाई के दिनों में शादी के दिनों में 10 साल पहले यह फायदा हुआ य फायदा भी देखो तो कुछ नहीं लौकिक फायदे में कर्ता का बल उसका बुद्धि बल धन बल प्रारब्ध बल यह काम करते कर्ता का बल हो और प्रारब्ध ना हो तो थक जाते कता का बल हो धन हो लेकिन अकल नहीं है तो
फस जाते अकल है लेकिन प्रारब्ध उल्टा होता है तो भी फस जाते कितना होशियार करता बहन होशियार अभी फसे फसाए समझ रहे हैं बहन भाई जो भी करता है तो लौकिक कर्म में करता का का बल काम करता [संगीत] है लेकिन उसका फल देखते देख देखते नष्ट हो जाता है या तो फसाने वाला हो जाता है दो ही गति होती [संगीत] है करता ऐसे कर्म करता है कि सीबीआई की जांच हो रही है ये सेट के य ऐसा हो गया फलाने ऑफिसर के यहां ऐसा हो गया तो बुद्धि बल भी था सब बल था फिर
भी देखो फस गए फलाने नेता फलाने सेठ [संगीत] फलाने दूसरा होता है वैदिक [संगीत] कर्म उसमें भी कर्ता का बल होता है लेकिन उसमें श्रद्धा की विशेषता होती है मंत्र की विशेषता होती तो मंत्र श्रद्धा और कर्ता इन तीनों का बल से दैविक जगत की सफलता मिलती [संगीत] है भगवान का नाम मैं कता का बल मुख्य नहीं है भगवान के नाम का बल काम करता है कर्ता का भाव श्रद्धा हो लेकिन बल भगवन नाम का काम करता तो भगवन नाम की विशेषता है कि वहा कर्ता का जितना भी बल है उससे कई गुना बल भगवत
सत्ता का उसकी सहायता में लगता है नाम जपत मंगल दिशा दश भगवन नाम से दसों दिशाओं में मंगल भगवन नाम तो जपते हैं माला तो हाथ में है लेकिन रुची नहीं आंखें इधर घूम रहे सेवा से जी चुराएंगे तो भगवन नाम का उतना प्रभाव फायदा नहीं [संगीत] मिलता तत्परता से सेवा कार्य कर भगवन नाम स्मरण कर तो कर्म योग और भक्ति योग दोनों मिल जाता है जरा सा ज्ञान मिले तो कल्याण हो [संगीत] जाए भगवन नाम भी है थोड़ा बहुत कर्म भी है तो यह साधन है साधन तो होता है लेकिन उस साधन के साथ
[संगीत] असाधारण भी चालू साधन के साथ असा साधन होता [संगीत] है जैसे अशुद्ध आहार अशुद्ध व्यवहार अशुद्ध चिंतन अशुद्ध संप झूठ कपट बेईमानी तो एक तरफ तो उत्तम साधन है भगवान का नाम और दूसरे तरफ एकदम सब साधनों के पुण्य को नाश कर दे ऐसा कड़ कपट बेईमानी तो साधन अस साधन साधन अस साधन इसमें फि असा साधन नहीं भी करें समझो अस साधन कम है साधन है लेकिन साधन की [संगीत] गति पिपली का की है जैसे कीड़ी चलती उसी तो समय लगता है शास्त्र में तीन गति बताई [संगीत] पिपली का गति जैसे कीड़ी चले
दूसरी वानर गति जंप मार के एक डाल तीसरी विहंग गति जैसे पक्षी उड़ान भर लेता है व आध ना करे तो कौन सी गति से चलता है न गति से चलेगा तो एकदम ईश्वर प्राप्ति जल्दी हो जाए वानर गति से चलेगा तो म पीपली का गति से तो ज्यादा [संगीत] समय सब कुछ मिल [संगीत] जाए दुख नहीं मिटेगा भय नहीं मिटेगा चिंता नहीं मिटेगी सब कुछ मिल जाए फिर भी जब तक उस परमात्मा तत्व का ज्ञान गुरु कृपा से व दिया जगमगाया नहीं तब तक सब दुख नहीं मिलते सब मिलने पर भी सब दुख नहीं
मिलते मृत्यु आएगी तो सब तो यही रह जाएगा फ किसी भी गर्भ में जाना पड़े दुख चालू हो [संगीत] गया यह चीजें चली ना जाए इसका भय चालू हो गया तो भय दुख वियोग यह तब तक बना रहेगा जब तक अभय आत्मा को परमात्मा को अपने चैतन्य रूप में नहीं जाना निर् भव जपे सकल भव मिटे संत कृपा ते प्राणी छुटे इसलिए राजे महाराजे राज पाठ छोड़कर संतों के चरणों में जाते उस निर्भय पद को पाने के लिए ना अन्यथा पंथा विद्यते नाय सब दुखों से छूट ने के लिए दूसरा कोई रास्ता [संगीत] नहीं और
केवल सब दुखों से छूटना इतना ही अष्ट नहीं [संगीत] है पिला दी दवाई सो गए छूट गए सब दुखों [संगीत] से शीशी सुंगा द अभी तो दुखों से छूट गए नहीं नहीं य तो मूर्छा है सब दुखों से छूटे और परमानंद की प्राप्ति हो परम तत्व की प्राप्ति ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर कार्य रहे ना शेष मोह कभी ना ठग [संगीत] सके इच्छा नहीं लवलेश अंदर का जो पूर्ण सुख मिला तो बाहर के सुख की इच्छा नहीं [संगीत] रहे पूर्ण सुख मिलने की निशानी है कि बाहर के सुख की लोलुपता मिट जाए जैसे भगवान किसको बोलते
[संगीत] हैं भगवान जो भरण पोषण करे गमना गमन की सत दे वाणी का अधिष्ठान है और सब मिटने के बाद भी जो हमारा साथ ना छोड़े उस चैतन्य आत्म देव को भगवत स्वरूप माना जाता लेकिन लौकिक व्यवहार में भगवान किसको बोलते हैं जो सृष्टि की उत्पत्ति [संगीत] करे पालन करें और संहार करें उसको भगवान [संगीत] बोलते मैं अहो भाव से किसी सेठ को सेठ बोल दिया तो क्या बड़ी बात क्या सेठ को मैं कुबेर बोल दू धनपति बोल द तो मैंने उसका स्वागत किया ऐसे ही संत को संत बोल दिया तो क्या बड़ी बात है
मैंने गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देव महेश्वरा गुरु साक्षात परब्रह्म तस्मी श्री गुरु तो मैंने गुरु का आदर किया मेरे गुरु भगवान है मैंने आदर किया तो इसमें कोई मैं कहता हूं मेरे भगवन लाशा जी [संगीत] महाराज भगवान में टिकाने वाले गुरु तो तो भगवान उनकी महिमा कितनी गाओ तो आप लौकिक कर्म करो चाहे वैदिक कर्म करो लेकिन उसका फल [संगीत] नश्वर भगवत तत्व को जानने पाने के [संगीत] लिए थोड़ा विवेक करो कर्म ईश्वर अर्पण बुद्धि से करें और फिर थोड़ा वि विचार तो ईश्वर प्राप्ति ऐसे हो जाती भगवत प्राप्ति कि फिर उसका फल नाश
नहीं होता भगवत प्राप्ति का फल शाश्वत [संगीत] है अर्थात भगवान वो चैतन्य आत्मा के रूप में मिलता तो सब दुखों की सदा के लिए निवृत्ति और परमानंद की [संगीत] प्राप्ति परम शांति वह परमानंद है वाला नहीं होता व तो उसको तो वही जानते जिन्होंने पाया है शुरू शुरू में तो थोड़ा लगता है फिर पछ जाता है [संगीत] बस ऐसे पुरुष राजा राज भी कर सकते [संगीत] हैं साधारण जीवन भी जी सकते हैं उपदेश भी कर सकते हैं ऐसे पुरुष जीवन मुक्त कह जाते मुक्त [संगीत] आत्मा मुक्त आत्मा होने के लिए ही मनुष्य जन्म और मनुष्य
जन्म की बुद्धि है अगर यह बुद्धि डम डम में लगाई तो फिर उस आत्मा को जानने में क्या लगाओगे राग द्वेष मेरा तेरा अपने वालों में कभी थोड़ी खटपट हो जाए फिर मन बड़ा करके एक दूसरे को समझ लेना चाहिए गांठ नहीं बांधनी चाहिए अपने वालों में सम संवादिया होगा तो विजाती पर विजय मिलेगा विजाती पर भी न्याय युक्त व्यवहार होगा तो प्रकृति पर विजय मिलेगा अष्ट सिद्धि नवनिधि आ जाएगा और उसमें भी नहीं फसें तो परम पद अपना स्वभाव हो जाएगा बहुत ऊंची बात है काय को किसी के लिए राग करना काय को किसी
के लिए द्वेष कर काहे को गांठ मान के अपना दिल खराब करना संकीर्ण क्यों बनना सब तुम्हारे तुम सभी के फासले दिल से हटा दो राग द्वेष रखते तो असान होता है ना सेवा तो साधन है बढ़िया लेकिन राग रख लिया द्वेष रख लिया तो असाधारण हो जाता है और परमात्मा प्राप्ति के लिए इतना दो साल 10 साल 20 साल ऐसा नहीं जितनी तड़फ और जितना साधन विहंग पिपली का साधन है वानर गति का साधन है कि पक्षी गति जैसा साधन और साधन के साथ आ साधन में हो और तड़प तो ईश्वर प्राप्ति हो जाती
ईश्वर प्राप्ति मतलब ऐसा नहीं को बाहर से आते हैं ईश्वर अपना आत्मा परमात्मा भगवान है उसका ठीक से अनुभव हो जाता है फिर शरीर से मन से इंद्रियों से सब व्यवहार होते हुए भी असंग अयं पुरुष केवल निर्गुण बहुत ऊंची स्थिति है और कठिन नहीं है एक तो इसको कठिन कठिन मानकर अपने को धकेल दिया भविष्य में मिलेंगे अरे भविष्य में क्या जो एक सेकंड जिसको आप छोड़ नहीं सकते जो आपको नहीं छोड़ सकता उसका नाम है [संगीत] परमात्मा उसको फिर भविष्य में क्यों रखो कठिन क्यों बोलो दूरी क्यों मानो अस साधन छोड़ दो और
उसको साथ जानने की तत्परता कर दो बस जिसको आप छोड़ नहीं सकते उसका नाम है परमात्मा और जिसको आप सदा रख नहीं सकते उसका नाम है डम डम या रख सकते हैं नहीं रख सकते कितना भी छुपा छुपा के भी ज्यादा दिन नहीं रख सकते मरते समय ममम रमैया भी मरते समय रम रमैया जिसको छोड़ना है उस उसके लिए सब गड़बड़ी कर लेते हैं और अपना दिल खराब कर देते जो कभी ना छूटे उसको पाने के लिए लगते नहीं तो अपने साथ कितना हम जुलम करते ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर तो एक लौकिक कर्म दूसरा वैदिक
कर्म तीसरा न कर्म सिद्धि कर्म तो करें लेकिन कर्म से फल की इच्छा ना रखे ईश्वर प्राप्ति की आपका लौकिक में कितना टाइम जाता है वैदिक में कितना जाता है और नर्म में कितना जाता है लौकिक की तड़फ कितनी वैदिक की कितनी न स्कर्म की कितनी इससे पता चल जाएगा क्या आप अपना भविष्य अंधकारमय बना रहे हैं कि कुछ प्रकाश के आशा है मैं यह बनाऊंगा यह पाऊंगा यह करूंगा यह करूंगा फिर आखिर क्या डॉक्टर बनूंगा इंजीनियर बनूंगा वकील बनूंगा आज मेरे को खबर मिली एक इधर वैद्य आया था एक दो बार आया अच्छा उसका
नाम था मेरे को बोले मैं बड़ी हॉस्पिटल बनाना चाहता हूं आपके हाथ से ईट रक अब उसका स्वपना तो बहुत बड़ा था आज मेरे को किसी दूसरे वैद्य ने बताया वो तो मर गया अरे मैं क्या तो बहुत जवान था अटा कटा अच्छा बड़ा प्रभावशाली नाम भी था थोड़ा बोलो तो मर गया तो लौकिक कर्म कितने भी करो स्वपने के आखिर बात वहीं की वही रह गई कब मृत्यु आ जाए पता नहीं रहता पहले अपना वह काम कर लेना चाहिए ष कर्म सिद्धि कर ले फिर लौकिक काम करो वैदिक काम करो ठीक इससे लों का
भी भला होगा आपको भी टाइम विनोद में जाएगा आनंद अगर हम लौकिक काम धंधे में लगे रहते तो हमारी क्या हालत होती तो यज्ञ याग वैदिक में लगे रहते हमने अपना तात्विक नक में काम कर लिया अब लौकिक काम हो रहे हैं वैदिक काम भी हो रहे हैं आनंद से हो रहे हैं तो मेरे को तो कोई घाटा नहीं पड़ा ना पहले ष कर्म सिद्धि कर लो निष्काम कर्म योग ष कर्म तत्व की प्राप्ति तो उस करने में आा धन ना घुसे लापरवाही ना घुसे राग द्वेष ना घुसे करना तो ष कर्म कर्म है लेकिन
फिर य अपनी पार्टी का वो अपना यह तो असाधारण सबका भला अपनी गाड़ियों पर लिखा होता है सबका भला सबका भला में ऐसा नहीं नहीं के सब आश्रम वासियों का भला अथवा सब दीक्षा वालों का भला अथवा सब हिंदुओं का भला ऐसा नहीं सबका भला तो सबका इसमें हिंदू मुसलमान सब आ गए सब में सब आ ग संकीर्णता भी अाधुनिक की भावना भी सही करो एक खास बात है बहुत ध्यान से जीव में चेतन की विशेषता होती है और दूसरे में जड़ की विशेषता होती है जड़ में भी चेतन है जड़ में चेतन है इसीलिए
तो जड़ अनाज में भी जीव जंतु बन उभर आते हैं आटे में भी कीड़े पड़ जाते हैं वस्तुओ में भी बैक्टीरिया आ जाते हैं जड़ में भी चेतन अंश तो है और जीव में थोड़ी जड़ता है कि शरीर में हूं य वस्तु मेरी है तो जीव की थोड़ी जड़ता निकल जाए और अपने ब्रह्मवर्त काम करती यह फल साधन ते न होई गुरु कृपा ही केवलम शिष्य स्य परम मंगलम तो गुरु कृपा कर देवे अरे गुरु कृपा तो बांट देखती सूर्य का प्रकाश बरसाद ना हो तो किसान क्या करेगा लेकिन सूर्य का प्रकाश है बरसाद और
किसान भवाई नहीं करे तो सूर्य का प्रकाश क्या करेगा सूर्य का प्रकाश तो कृपा करे बरसात भी कृपा करे लेकिन किसान भी थोड़ा बोए ना सीजनली वस्तु बोए ना मुंडो मारवा रखे तो क धरती दोरा रही इसलिए सावधान रहे अपनी कमी काम है क्रोध है लोभ है भय है मोह है निंदा है द्वेष है जो भी है कुछ ना कुछ तो होता ही है सभी का भगवान सबका भला करें मंगल करें किसी व्यक्ति को सदा के लिए बुरा मत मानो बुराई आगंतुक है चैतन्य सदा है वो चैतन्य सदा है क्रोधी सदा नहीं है लोभी सदा
नहीं है झूठा सदा नहीं है मोही सदा नहीं है द्वेष सदा नहीं है ऐसे तो हम भी क्रोध करते हैं खबर वो सदा रहने वाली चीजें नहीं सदा तो चैतन्य तो अपनी नजर सदा रहने वाले पर हो दुश्मन पर नजर नहीं मित्र पर नजर नहीं दुश्मन और मित्र के अधिष्ठान पर आय है ये मेरा य मेरा मूल मंत्र है मतलब वही का मतलब वही अधिष्ठान बीमारी आई त गई तंदुरुस्ती आई म हरि ओम [संगीत] तो इस प्रकार का उच्चारण मनो राज के दोष को हर लेगा असा साधनों को हर लेगा और ईश्वर के और पुस्तक
पढ़े थोड़ा फिर ऐसा किया ऐसे एक घंटा सुबह एक घंटा शाम को करें 40 दिन का अनुष्ठान और 60 60 माला रोज कर ले नहीं तो मैं से मानसिक 6000 जप करें कितना ऊंचा उठ जाए निष्क में कर्म सेवा भी अपने आप में योग है कर्म योग भक्ति योग और ज्ञान योग अगर माला करनी पड़ती है तो माला तो करें लेकिन कर्म योग में अगर रस आता है तो उसका भी अपना महत्व है शबरी भीलन देखो हनुमान जी देखो कैसे कर्म में लगे रहे लक्ष्मण जी नारायण हरि नारायण हरि नारायण हरि फल की इच्छा ना
रखो तो नश कर्म हो गया हो गया नश कर्म कर्म क्या फल की इच्छा कि लौकिक य फिर उसमें असाद ंग तो फस जाएगा कर्मण वा अधिकार अस्तु मा फलेशु कदाचन कर्म करने में अधिकार है तेरा फल की इच्छा छोड़ दो षक में हो जाएगा नारायण नारायण नारायण नारायण लेकिन वहम होता है क्या यह मेरी योग्यता है तो य अस साधन हो जाएगा यह भगवत कृपा से होता है अगर अपनी योग्यता होती तो पहले क्यों नहीं किया अयोग्यता है तो जरा सदा करके दिखाओ सत्ता उसी की है बुद्धि में मन में ज्ञान स्वरूप परमेश्वर है
अपने अहम की योग्यता क्या है हम तो मिसगाइड करता है मोरी हो सो जल जाए थोरी हो सो रह जाए जो मेरी इच्छा और मेरी योग्यता व जल जाए तेरी जो है रह जाए मेरा मुझ में कुछ नहीं जो कुछ है सो तो सत्य शरणम गच्छामि हम सत्य स्वरूप ईश्वर की शरण गोता मारो बला हो [संगीत] ओ ओ [संगीत] यह बोलने पर हंसी आती तो विचार उठता है कोई दूर है क्या जो बुला रहा हूं हमारा तो उनसे कम एकता हो गई तो जरा ऐसे हो जाता है अकेले में थोड़ा जरा सा करूंगा तो फिर
अंदर से क्या हो गया क्या उपकार से क्या बात है क्या दूरी है सो साहिब सद सदा हजूर अंधा जानत ता को दूरे हाजरा हजूर [संगीत] य जो ओमकार उसी का परमेश्वर का पावन नाम है जहां से उठता है ना वही है व और उसी की सत्ता से उच्चारण होता उसी में फिर मन शांत होता है इतना निकट है परमात्मा सबसे ज्यादा में ज्यादा निकट परमेश्वर है और सबसे ज्यादा में ज्यादा ज्ञान स्वरूप और हितेश परमेश्वर है भगवान से बढ़कर किसी के पास ज्ञान हो यह मैं नहीं मानता हूं क्या ख्याल है सारे साइंटिस्ट सारे
मिलकर कुछ नहीं उस ज्ञान स्वरूप के आगे तो परम हितेश अ परम ज्ञान स्वरूप और परम निकट अगर कोई है तो परमेश परम हितेश परम ज्ञान स्वरूप परम निकट अगर है कोई [संगीत] तो और कभी साथ ना छोड़े आय हैय ऐसा कौन है जो आपका साथ नहीं छोड़ेगा बताओ रुपया साथ नहीं छोड़ेगा तुम्हारा रुपया साथ छोड़ेगा कि नहीं छोड़ेगा पत्नी शरीर भी साथ छोड़ देगा लेकिन व साथ नहीं छोड़ेगा उसका नाम है परमा जो कभी साथ ना छोड़े उसको जरा प्रीति पूर्वक पुकार ले ति पूर्वक पाले लाला तेरा काम हो जाए बनत बनत बन जाई
है भैया नया तर गई है हे वासुदेव हे गोविंद हे अच्युत ओ ओ काहे रे बन खोजन जाई सदा निवासी सदा अलेपा तोरे संग [संगीत] साथ सब परिस्थितियों से निर्लेप और तेरे साथ [संगीत] ही हे हरि हे गोविंद हे प्रभु हे गोपाल भगवान के लिए रोने में भी बड़ा शांति बड़ा बड़ा आनंद आता है एक कथा याद आ गई एक बार युधिष्ठिर अर्जुन दूर जंगल में किसी खोजते खोजते महापुरुष के पास पहुंच गए उच कोटि के संत युधिस्टर को कृष्ण ने बताया कि देखो अपने आप में न स्कर्म तत्व में जगे हुए पुरुष युधिष्ठिर ने
दर्शन किया बैठे तो महसूस हु युधिष्ठिर रो पड़े वो महात्मा रो पड़े कृष्ण रो पड़े अर्जुन भी खूब रोए चारों रोए म मा अपने अपना सकम सकाया ईश्वर अनंत है बाकी सब क्रिया का अंत होता है रोने का भी तो अंत होगा ना अपन रो रहे थे कल तो वो भी तो चुप करना ही पड़ा के किसी ने चुप कराया नहीं अपने आप हो गया सब चुप हो गए तो कृष्ण ने पूछा अर्जुन तू क्यों रोया अर्जुन ने कहा महाराज मैं क्या [संगीत] बताऊं मुझे तो यह लगता है कि महाराज क्यों रोए बाबा जी रोतो
रो रहे हैं तो मैं चुप कैसे बैठता और बड़े भाई रो रहे फिर आप भी रो रहे महाराज आप पहले बताओ महात्मा ने कहा कि मैं तो इसलिए रोया कि सब कुछ छोड़ के तू तू मैं में राग द्वेष असा धन वाला माहौल ही छोड़ दिया हमने इधर त में आए जो कुछ गुरु कृपा से मिला था मनन करके ब्रह्मानंद ले रहे कौन से पाप का फल जगा के युधिष्ठिर और कृष्ण इधर आ गए तोब मेरी यह जगह प्रसिद्ध हो जाएगी लोग आके करेंगे मंग बेटा दो ये दो वो दो सिर ख पाएंगे भूत आ
गया किसी को कुछ हो गया किसी को समय ले लेंगे लोग मेरे को तो इसीलिए रोना हुआ कि अब मेरे यह प्रसिद्धि हो जाएगी युधिस्टर महाराज ने कहा मुझे इसलिए रोना आया कि कहां तो हमारा मनुष्य जन्म और महाराज नित्य तत्व जो सदा रहने वाला उसमें रमण हो करते हैं और हम अनित्य शरीर को और संसार को मैं मेरा मानकर इसी में खप रहे हा तो इनका ऊंचा जीवन और कहां हमारा राग द्वेष लड़ाई झगड़े काट मार डम डम या में कहां खपे जा रहे हैं इसीलिए मुझे रोना है कृष्णा ने कहा दोनों का रोना
तो सही है अर्जुन ने बोला फिर प्रभु आप क्यों रोए बोले मुझे इसलिए रोना हुआ कि अब यह कलयुग आ रहा है ऐसे राजा भी नहीं होंगे कि महात्मा को देखकर उनकी एकांत मस्ती देखकर अपने जीवन की तुच्छ महसूस कर ले और महात्मा जैसा जीवन जीने की इच्छा करने वाले राजा नहीं होंगे ऐसा कलयुग और ऐसे महात्मा भी जल्दी से नहीं मिलेंगे मैं इसलिए रोया तू अर्जुन कैसे रोया बोले महाराज जब संत रो रहे हैं आप रो रहे तो मैंने तो ना चाहते हुए भी मेरे तो रोना आ ही गया ऐसे ही भगवान के विरा
में एक भक्त अगर रोता है तो दूसरे को आ जाएगा तीसरे को आ जाएगा कल तो बहुतों को आ गया नहीं आवे तो झूठ मूठ में भी रोए ना तो भी सच्चा रुधन आ जाएगा क्योंकि झूठ मूठ में भी सत्य के लिए रो रहे हैं अपन तो कल बहुत फायदे में ठीक है चलो तो अभी रोए नाटक बाजी होगी फिर ऐसा नहीं सहज में होता है सच्चाई नारायण हरि नारायण ह स्वभाव है सत चि आनंद मतलब तुम्हारा स्वभाव सत उसको बोलते हैं जो सदा रहता है तो मरने के बाद भी तुम रहते हो ठीक है
चेतन उसको बोलते हैं जो जड़ को जानता है हाथ को जानते हो तुम हाथ तुमको नहीं जानता है बाहर की चीजों को तुम जानते हो यह चीजें तुमको नहीं जानती तो तुम चेतन हुए हम तो तुम हुए सत्य तुम हुए चित्त और तुम हो आनंद तो आनंद में जैसे सरोवर में कुछ तकला कुछ कंकड़ डालते तो तरंगित होता है ऐसे आनंद में कोई अनुकूल बात आती है तो प्रसन्नता आती खुशी होती है ना तो आपका स्वभाव है शब्द चित्त और आनंद शरीर का स्वभाव है असत्य जड़ और दुख रूप पहले नहीं था बाद में नहीं
रहेगा और ये जड़ है हाथ को पता नहीं मैं हाथ हूं मुर्दा जड़ हो जाता है फिर काटो जलाओ कोई पीड़ा नहीं होती तो असत जड़ और दुख रूप शरीर को कितना भी खिलाओ घुमाओ फराओ फिर भी कुछ ना कुछ दुख बीमारी फरियाद करता रता तो अपना स्वभाव है सत्य चित्त और आनंद शरीर का स्वभाव है असत्य जड़ और दुख रूप अन्योन्य अध्यास हो गया संसर्ग अध्यास हो गया जैसे अग्नि के संपर्क से लोहा तप गया तो वातावरण से पानी ठंडा हो गया गर्म हो गया ऐसे ही शरीर का अध्यास हो गया अपने में तो
एक बात खास समझनी है इस शरीर के अध्यास को मिटाने के लिए अपना असली स्वभाव जगाने के लिए य तीन बात पक्की मान लो दुखी होना अथवा किसी को दुखी करना यह आपकी जाति में नहीं है ठीक है सत चित आनंद की जाति में यह नहीं है दुख दुखी होना दुखी करना और सत्य के स्वभाव में नहीं है मरना और मारना सत मरता नहीं है तो न किसी को आप दुख दे ना आप फरियाद करके दुख के विचार करके दुखी बने ना दुखी बनावे ना दुखी बने ना बेवकूफ बने ना बेवकूफ बनावे बेवकूफ बनना भी
नहीं बनाना भी नहीं दुखी होना भी नहीं और करना भी नहीं अब मृत्यु के भय से किसी को डराना नहीं और डरना नहीं क्योंकि मृत्यु तो बिल्कुल झूठी चीज की होती है असत जड़ दुख रूप की मृत्यु होती है जन्म भी उसी में होता है प्रकृति में और यह जगत परिवर्तनशील है बदलने वाला है एक जैसा नहीं रहता सब गुजरता है जिसे स्वपना गुजरता है ऐसे ही है ना सब ऐसा चिंतन करने से मन परमात्मा में सच्चिदानंद में टिकाना आसान हो जाएगा जितना जितना परमात्मा में टिको उतना उतना सुखी रहोगे और जितना जितना असत जड़
और दुख रूप में टिको ग उतना उतना खुद भी दुखी बनते हैं दूसरों को भी बात समझ में आ गई बहुत पसारा जिन किया वे भी गए निराश संत लोगों का बहुत पसारा करते नहीं है लेकिन हो जाता है तो जिनके लिए होता है उन्हीं की सेवा में लगता है व अपने लिए नहीं मानते नहीं करते और पसारा भी नहीं माना जाता जब जगत में से सुख लेने की इच्छा से किया जाता है वह पसारा है लेकिन परहित के लिए कुछ भी करते पढ़ो हे भगवन आपने बड़ी कृपा की जो दर्शन दिया आपके दर्शन रूपी
अमृत से हम आनंद से पूर्ण हो रहे हैं हे भगवन हमारे पुण्य इकट्ठे होकर प्रसन्नता के निमित्त आपको प्रेरित करके ले आए हैं हे मुनीश्वर देवता जो पूजने योग्य हैं उनके भी आप पूजनीय हैं आप हमें पवित्र करने आए हैं हे भगवन आप जैसे महात्मा पुरुषों के दर्शन से अपने में जो कुछ भी भी पाप ताप होता है वह निवृत हो जाता है जैसे मेघ के आने पर सूर्य की गर्मी मिट जाती है आपका अंतःकरण प्रसन्न और गंभीर है एवं सुंदर वाणी वक्रता से रहित है आप निर्मल और निर अहंकार सबके सरहद हैं जो पिता
उनको पुत्र की नाई है और जो पुत्र के समान है उनको उपदेश करने के निमित्त आप पिता और गुरु की नाई समर्थ [संगीत] हैं आप सर्वथा सब प्रकार सब समय सब में समर्थ और प्रसन्न महामति सदय और व्यवहार के वेता शिष्य गुरु की महिमा कैसे जानते राम जी कहते कि आप महामती है ब्रह्म परमात्मा में मति टिकाना कोई साधारण बात नहीं है छोटी छोटी चीजों में मति खप जाती है वैद्य आक कोई बैठा हो तो उसकी मति लगेगी कि बापू बोल रहे हैं त प्रधान है कि पत प्रधान है कि कप प्रधान है न की
प्रकृति उधर ही मती जाएगी दूसरे की दूसरे ढंग से जाएगी जैसी जिसकी मति जिसमें रमण करती है वैसे ही देखेगा महा तत्व में जिसकी मति स्थित होती है वो महावती होता है ब्रह्म परमात्मा महा तत्व है अपना तो शरीर में मति गांव में गांव से बड़ा शहर शहर से बड़ा तहसील तहसील से बड़ा जिला जिले से बड़ा राज्य राज्य से बड़ा राष्ट्र लेकिन वोह राष्ट्र भी कितना उस राष्ट्र पृथ्वी पर कई राष्ट्र है तो प पृथ्वी तक की पृथ्वी तत्व से तो पांच भूत और पांच भूत से महा तत्व बड़ा महा तत्व से हिरण गर्भ
रण गर्भ [संगीत] से परब्रह्म परमात्मा अनंत अनंत जिसके एक एक रोम कोप में अनंत अनंत ब्रह्मांड है ऐसे परब्रह्म परमात्मा में मति लगाना तो कितनी महामति हो जाती विशाल हो जाती इसलिए झूठ कपट से मति बहुत कुंठित राग द्वेष से भी मति मारी जाती हर्ष शोक राग द्वेष जूठ कपट मति को छोटा रखता है इसके विपरीत विचार वाले परब्रह्म परमात्मा में मति विशाल हो जा तो मुनीश्वर आप महामति महान परब्रह्म परमात्मा में टिकने वाली मती और व्यवहार के वेता हो समदर्शी हो सुख दुख में सम हो सुख में सुखी दुख में दुखी तो पशु कुत्ता
घोड़ा बधा गधा भी होता है क्या बड़ी बात और प्रसिद्धि तो पशुओं की भी हो जाती जनावर की भी रॉकेट में कुत्ते को भेजा ता इतना कुत प्रसिद्ध हुआ कि इतने लोग बैठे हैं उतना कोई भी प्रसिद्ध नहीं हुआ हम भी उतने प्रसिद्ध नहीं हुए जितना रॉकेट में भेजा हुआ कुत्ता प्रसिद्ध हुआ तो प्रसिद्धि होना कोई बड़ी बात नहीं तो शरीर की प्रसिद्धि को अपनी प्रसिद्धि मानना तो और खतरे की बात है गलत बात महामति लोग यह सब बात जानते हैं कि शरीर की प्रसिद्धि कोई माना नहीं अपने व्यापक ब्रह्म स्वरूप में क्या आगे र
भर के लोग आपको मानते भी हैं तभी भी आपको अहम नहीं होगा आप इतने महान मति हो जाएंगे ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर तो भगवान राम कहते हैं वशिष्ठ जी को आप महामति हो व्यवहार के वेता हो समान हो विचार वान और लोगों का शोक मोह हरने वाले हो अज्ञान हरने वाले ज्ञान के देदीप्यमान सूर्य हो तो इस प्रकार गुरु के दिव्य गुण चिंतन करने से शिष्य का चित्त भी ऐसे ही बनता है अब गुरु को शरीर मेंही मानेंगे य खाते हैं यह पिया इन्होंने यह पहना तो आप फिर शरीर के बाहर कैसे जाएंगे शरीर से
व्यापक महामति कैसे बनोगे महाराज आप कहां से आए बोले हम रशिया से आ रहे हैं अच्छा ठीक है कैसा लगा बोले ठीक दूसरा आदमी आ बोले महाराज आप अभी आए ना थोड़ी देर ई कहां से आया बोले अमेरिका से आया तीसरा आदमी महाराज आप कहां से आए बो मैं मेरठ से आ रहा हूं थे ने पूछ बाबा आप कहां से आए बोले व हरिद्वार से चले थे तो जो पहले का बैठा था उसने बोला बाबा आपने इतना मिथ्या भाषण किया बोले हमने मिथ्या नहीं किया मिथ्या में मिथ्या मिलाया हम तो व्यापक ब्रह्म भूप है और
लोग हमको मिथ्या आरोप करते कि कहां से आए कहां से आए तो यह पांच भूत भी मिथ्या है बदलने वाले और रशिया भी बदलता है हिंदुस्तान भी बदलता है शरीर भी बदलता है जो बदलता है वो मिथ्या मिथ्या में मिथ्या मिला दिया बस मिथ्या में मिथ्या मिला दिया हस्या अमेरिका मेर हरिद्वार हम कहीं से आते नहीं कहीं जाते नहीं आता जाता है मिथ्या शरीर मैं सच्चिदानंद जो सत्य है चित्त है आनंद स्वरूप ये मिथ्या असत्य जड़ दुख रूप को बोलते कहां से आए कहां से गए तो तुम मिथ्या पूछ रहे तो मिथ्या मिला दिया य
महात्माओं की कैसी रीत होती है ऊंची बात समझाने भगवान राम के गुरु जी वशिष्ठ जी को जी जानते हैं कि आप महामती व्यवहार के वेता हो अज्ञान के हरता हो ज्ञान के भरता भरने वाले सुख और शांति के दाता हो समता के सिंहासन पर हो विषम वृति का व्यवहार करते हुए भी भीतर से जू के त समान हो ऐसा गुरु को जानता है तो खुद भी बन जा जाएंगे राम जी थे बन गए हाय सीते हाय लक्ष्मण फिर भी भीतर से जो केते ठीक है ना समझ रहे हैं