आवश्यकता होती है शाश्वत की और इच्छा होती है नश्वर की आवश्यकता पूर्ति में कोई श्रम नहीं है आवश्यकता पूर्ति में किसी की गुलामी नहीं है आवश्यकता पूर्ति में भविष्य का इंतजार नहीं है इच्छा पूर्ति में तो गुलामी भी है इंतजार भी है और अंत में इच्छित वस्तु छोड़ के मरो आवश्यकता है शाश्वत सुख की आवश्यकता है शाश्वत ज्ञान की आवश्यकता है शाश्वत आनंद की और वो अपने पास है [संगीत] अपना इच्छा होती है शरीर और शरीर की सुविधा बढ़ाने में तो वो इच्छाएं कर कर के आदमी थक जाता है सुपात्र मिले तो कु पात्र को
दान दिया न दिया सुपात्र मिले तो कु पात्र को दान दिया न दिया सु शिष्य मिले तो कु शिष्य को ज्ञान दिया ना दिया सु शिष्य कौन है कि गुरु की बात को पकड़ ले सुपात्र मिले तो कु पात्र को दान दिया न दिया सु शिष्य मिले तो कु शिष्य को ज्ञान दिया न दिया कहे कवि गंग सुन शक ब सूरज उदय हुआ तो और दिया किया ना किया अ पूर्ण गुरु मिले तो और जगह प्रणाम किया ना किया तो पूर्ण गुरु मिलने के बाद भी जो दूसरी जगह नाक रगड़ ते व सु शिष्य होने
में उनको बहुत टाइम लग जाता है गुरु पूर्ण मिला है और फिर भी जहां ता भटकते रहते हैं तो उन्होंने अभी गुरु को पहचाना नहीं और वह सु शिष्य नहीं हुए सु शिष्य को ज्ञान पछता है अगर सु शिष्य नहीं तो ज्ञान पचता नहीं पता स्त्री की पहचान अपने पति के सिवाय किसी पुरुष को पुरुष के रूप में देखती नहीं मालक के रूप में देख बच्चे में पति तो मेरा ही ऐसे सु शिष्य को सदगुरु के बिना इधर उधर ऐसे सु शिष्य की आवश्यकता य पूरी होती है और सु शिष्य बनने में इच्छाएं बड़ी बाधा
देती अपनी इच्छा के अनुसार हम गुरु से काम लेते तो सु शिष्य नहीं बनेगा अपनी इच्छा छोड़े अपना राग और द्वेष छोड़े तो यूं हो जाता है ईश्वर प्राप्ति [संगीत] यो जनक ऐसे थे परीक्षित राजा ऐसे थे तो सात दिन में हो गया हमको 40 दिन में हो गया सु शिष्य बनने के बाद अपनी आवश्यकता यूं पूरी होती है लेकिन भटकते रहे कभी जाए केदार कभी जाए मक्के कभी जाए इधर कभी जा इधर खा ले दर दर के धक्के बोलते ना धोबी का कुत्ता ना घर का ना घाट का ऐसे ही जो सु शिष्य नहीं
होते उसका मन ना घर का ना घाट का कभी इधर कभी इधर कभी इधर और पूजा के रूप में भी यह देवता यह देवी यह ठाकुर यह भगवान उसका मन भटका हुआ है इच्छा द्वेष और द्वंद में भटका हुआ है यह देवता बड़ा कि यह बड़ा य स आ तो फायदा मिलेगा इधर जा तो फायदा मिलेगा इधर जा वो बाहर ही ले जाएगा अपने को और बाहर कितना भी भागोगे अंत में थक के मर जाना है जिसको कभी ना छोड़ सके जो हमको कभी ना छोड़ सके जो गहरी नींद में भी हमारे साथ रहता है
वह है हमारा प्रिय गहरी नींद में क्या रहता है हमारे साथ पैसा रहता है क्या पत्नी पति में शरीर हू मैं फलाना हूं कुछ रहता है क्या कुछ नहीं रहता कुछ नहीं रहता फिर भी कुछ नहीं रहने को जानने वाला रहता है चैतन्य वह सत्य स्वरूप है वह चेतन स्वरूप है वह ज्ञान स्वरूप है और उसी की हमको आवश्यकता है आपको आपसे कोई असत बोले तो आपको अच्छा नहीं लगता तो आप सत स्वरूप के चा हक है जड़ता आपको अच्छी नहीं लगती आप चेतन के जा दुख आपको अच्छा नहीं लगता आप आनंद के जाह सभी
मनुष्य सभी की मांग है आनंद दुख की मांग किसी की नहीं ऐसा कोई माई का लाल है जीव जंतु जो दुख चाहता जो सच्चिदानंद है उसी की मांग है वास्तविक लेकिन भटक गए सब कुछ करते हुए भी ठन ठन पाल रह जाते नास्तिक लोग तो बेचारे है नास्तिक लेकिन आस्तिक है ना वो भी जैसे बहु पत्नी वाली बहुपति वाली स्त्री ढेर पति हो तो व स्त्री को स्त्री नहीं कहते सति नहीं कहेंगे उसको उसको वैसा क ऐ ऐसे उद्देश्य एक पूर्ण पक्का कर ले नहीं तो बुद्धि वैशा की नहीं भटकती और भटका देगी अपने को
अपनी बुद्धि वैसा बन जाती बहुत पति कर लेती इसीलिए परमात्मा पति को छोड़ देते और बहुत पति मरने वाले एक पति अमर एक पति अमर है बहुत पति मरने वाले कबीर जी ने कहा कबीरा यह जग आए के बहुत से कीने मत जिन दिल बांधा एक से वे सोए निश्चिंत एक से जिसने दिल बांधा व निश्चिंत सोए और जो तुम्हारी आवश्यकता है बस वही इच्छाओं का तो अंत नहीं आवश्यकता तो आसानी से पूरी होती आवश्यकता वोह नहीं है कि जिसमें किसी की गुलामी की जरूरत पड़े और जो भविष्य में मिले और मिलकर हट जाए आवश्यकता
नहीं है आवश्यकता तो उसको बोलते जिसमें किसी की गुलामी की जरूरत ना पड़े और जिसका फल शाश्वत हो और जो अभी हमारे साथ और कभी हमारा साथ ना छोड़े आप चाहते हैं क्या आप आप सुख आपका साथ छोड़ दे ऐसा चाहता है क्या कोई ज्ञान आपका साथ छोड़ दे ऐसा चाहते क्या नहीं आनंद आपका साथ छोड़ दे ऐसा चाहते क्या नहीं ये तो आपकी आवश्यकता है ना सुख ज्ञान आनंद जीवन जीवन सभी चाहते हैं ज्ञान सभी चाहते हैं आनंद सभी चाहते य सभी की आवश्यकता है समझने की बलिहारी है समझते ऐसी बातें जल्दी सुनने को
नहीं मिलती सुनने को मिले तो समझने की बुद्धि नहीं होती आपकी आवश्यकता क्या है आवश्यकता उसे नहीं कहते जिसको आप पूरी ना कर सको जिसे आप पूरी ना कर सको वह आपकी आवश्यकता नहीं है आवश्यकता वही होती है जिसको आप पूरी कर सके आवश्यकता उसी को बोलते हैं जिसको आप पूरी कर सकते और इच्छा उसको बोलते हैं जिसका पूरी करें तभी भी ठंड ठंड पालो और ना पूरी करे तो दुखी होते र इच्छा उसको कहते आप उसको पूरी करें उसके बाद भी ठंड ठंड पाल और पूरी नहीं करे तो दुखी होते रहे मानो आइसक्रीम खाने
की इच्छा हो गई अ खा लिया फिर क्या चार घंटे के बाद मानो ये प किसी से दोस्ती किसी से काला मुंह करने की इच्छा ई लवर लवरी का मान लो वो कर लिया बाद में क्या ठन ठन पाल खाली हो जाएंगे कि भर जाएंगे खाली इच्छा ऐसी होती है फालतू आवश्यकता ऐसी नहीं होती इच्छाओं को महत्व देते हैं और आवश्यकता रह जाती फिर भी मिटती नहीं इच्छाएं कितनी भी करो फिर भी आदमी को आनंद की आवश्यकता खींच के ले आती है सत्संग में ज्ञान की आवश्यकता बिठा देती है सत्संग नित्य जीवन की आवश्यकता मजबूर
कर देती है विचार करने को विचार करने को मजबूर कर देगी कि आपके आवश्यकता है आपकी आवश्यकता का विचार करने को आप मजबूर हो जाएंगे नहीं चाहते हो भी आपको विचार तो करना पड़ेगा बात तो सच्ची कितना भी मिला कितना भी खाया आखिर यह शरीर तो मरने वाला है तो विचार करने से बुद्धि का विकास होगा चिंता करने से बुद्धि का विनाश होता है तो मेरी आवश्यकता क्या है संदेह रहित जीवन शाश्वत जीवन ज्ञानम जीवन आनंदमय जीवन यह मेरी आवश्यकता है संशय बना रहे अज्ञान बना रहे ऐसा आपकी आवश्यकता है क्या आनंद आनंद की जगह
पर दुख बना रहे आपकी आवश्यकता है क्या अज्ञान बना रहे आपकी आवश्यकता है क्या नहीं सत्संग उसे कहते हैं जो आपकी आवश्यकता की खबर करे खबर दे और आवश्यकता में पूर्ति में सहायक कर कुसंग उसे कहते हैं जो आपकी इच्छाएं भड़का है और आपको गुमराह करते करो रो कर पोप म्यूजिक मास पेशिया य सेक्सुअल केंद्र उत्तेजित हो नौजवान गुमरा हो जाते लेकिन करो मधुर मधुर नाम कीर्तन गुमरा व्यक्ति भी धीरे धीरे राह प आ जाए जैसे दान करने से धन की शुद्धि होती है धन की बढ़ोतरी होती है ऐसे ही अपनी आवश्यकता को ठीक से
जानने से बुद्धि की बढ़ोतरी फिर बाहर से आप खूब पढ़े लिखे नहीं है कोई परवाह नहीं विलक्षण बुद्धि मिल जाएगी विलक्षण ज्ञान मिल जाए खाली अपनी आवश्यकता को जानो और आवश्यकता वह नहीं है कि जो पूर्ति ना हो देखो काम करते करते थक जाते हैं बराबर आपकी आवश्यकता है नींद करने की नींद में आपकी थकान मिटती है आवश्यकता पूर्ति होती कि नहीं होती नींद करने के लिए क्या पैसा देना पड़ता है घूमने फिरने और चटोरे पन के लिए तो पैसे देने पड़ते लेकिन नींद जैसी बढ़कर आवश्यकता और कोई नहीं है शरीर के लिए करने के
लिए क्या देना पड़ता है पानी पीने की आवश्यकता है उतनी दारू या कोल ड्रिंक पीने की इतनी आवश्यकता नहीं जीवन में जितनी पानी की तो आवश्यकता वाली चीजें साहिज में मिलती तो एक होती है इच्छा दूसरी होती है आवश्यकता आवश्यकता सहज में पूर्ति होती है और आवश्यकता शरीर की भी होती है और स्व की भी होती है शरीर की आवश्यकता है रोटी पानी कपड़ा और आवास यह शरीर की आवश्यकता है और अपनी आवश्यकता क्या है य शरीर की आवश्यकता पूरी करो फिर भी शरीर तो मरने वाला है इसकी पूरी हो गई आवश्यकता चलो लेकिन इसकी
आवश्यकता के पीछे पीछे इच्छाएं बढ़ा दी कि मकान तो ऐसा बढ़िया होना चाहिए कपड़े तो ऐसे टिप टाप होने चाहिए रोटी में तो यह चर परा और ऐसा होना चाहिए फिर चाहे बीमारी भी हो पनीर की सब्जी बीमारी करती है बायपास सर्जरी कराना पड़ेगा पनीर खाते रहोगे दूध का बना पनीर मावा रस गुल्ला यह सब चटोरा पन इच्छा का विस्तार है आवश्यकता नहीं है स्वास्थ्य के लिए हानिकारक यह सब इच्छा के कारण आदमी रोग खर्च भी ज्यादा करता है रोग को ता साधे कपड़े से जी सकते यह चाहिए यह चाहिए यह इच्छा है साधे सीधे
मकान में रह सकते लेकिन इतना टप टाप चाहिए तो शोषण करेगा दूसरों का और उसको संभालने में ज्यादा समय लगेगा तो शरीर की आवश्यकता आसानी से पूरी होती है और आपकी आवश्यकता तो सहज में पूरी हो सकती आपकी आवश्यकता क्या है संदेह रहित अपनी अमरता का अनुभव मरने के बाद भी मेरा कुछ नहीं बिगड़ता ऐसा आपका अनुभव होना चाहिए सारी सृष्टि के लोग उल्टे होकर टंग जाए तो भी मेरा बाल बां का नहीं होगा ऐसा संदे रहित ज्ञान आपकी आवश्यकता है और नित्य तृप्ति नित्य आनंद य आपकी आवश्यकता है क्योंकि जीवात्मा नित्य है तो नित्य
जीवात्मा को नित्य परमात्मा का ज्ञान नित्य परमात्मा का आनंद और नित्य परमात्मा तत्व की अपने साथ एकता की अनुभूति चाहिए यह अपनी आवश्यकता है य आवश्यकता छोड़कर कितना भी दूसरा मिला तभी भी अंदर से भूख बनी रहेगी आनंद के लिए फिर धन है सत्ता है व डांस करने जाएगा वाइन पीने जाएगा अपनी पत्नी होते हुए दूसरी पत्नियां बदलेगा इच्छा में इच्छा में इतना उलज जाता है कि अपनी आवश्यकता भूल जाता है इसलिए कितना भी धन मिल गया कितनी भी सफलताएं और आशीर्वाद मिल गए लेकिन इच्छाओं के चक्र में फस गया बचा तो श्री कृष्ण कहते
इच्छा द्वेष सम उथे ना द्वंद मोहे न भारता य द्वंद अब ये करू कि यह करो सत्संग करो की कमाई करो इसको ऐसा करो कि वैसा करो ऐसा वैसा सबका इतना सारा जं जट नंदा नहीं चलता था तो दुखी थे नंदा चल गया तो सब दुख मिट गए क्या इनकम टैक्स का टेंशन आ गया अब धंधा मंदा हुआ तो पहले जैसा धंधा नहीं चलता है फिर दुख घुस गया खोपड़ी में ये सब फालतू बातें हैं समझो पहले 5000 कमाते थे 4000 फि 6 हज कमाई पर गए अब 40 पर आ गए तो बोले मंदी हो
गई मंदी हो गई अरे 4000 में जीते थे अभी 40 कमा रहा है तो रो रहा है क्योंकि 60 कमा के 40 प आया य तो दृष्टांत है 40 60 का ऐसे ही आदमी इच्छाओं में उलझ जाता है दुख बना लेता है दुख ना भगवान ने बनाया है ना माया ने बनाया दुख बनाया अज्ञान अज्ञानता से इच्छाएं पैदा होती तो अब क्या करें कि पहले तो सम रहना सीखो कितनी भी इच्छा पूर्ति हो जाएगी आखिर क्या समझो धंधा अच्छा चल गया फिर क्या हो जाएगा गाड़ी पर गाड़ी आ गई लाड़ी पर लाड़ी आ ग फिर
क्या हो जाएगा भोग भोग के आयुष्य तो नष्ट होगा ना ऐसी फालतू इच्छा करके क्यों मरो का को भांजे बनते मैं कौन हूं धंधा नहीं चलता तब भी भी जो नहीं मरता वह कौन है और धंधा चल जाए फिर भी आखिर में धंधा और हमारा संबंध सदा नहीं रहेगा धंधे के साथ मेरा संबंध नहीं रहेगा लेकिन मेरे साथ मेरा संबंध कभी नहीं टूटता वो मैं कौन हूं ऐसा अगर सोचे ना तो कल्याण हो जाए कल्याण अ संसार तो तुम्हारे पैरों तले आ जाए जैसे मनुष्य के पीछे उसकी छाया आती है इससे संसार तुम्हारे पीछे पीछे
आ जाए य बात बहुत मैंने ऊंची कही आपको सबको भले समझ में नहीं आया फिर भी सुनने का बड़ा भारी पुण्य है अभी सभी को समझ में आए सभी को काम में आए यह बात बोलता हूं चारों तरफ इच्छाओं के कारण तनाव दुख है टेंशन है बीमारिया है अनिद्रा है तोय अनिद्रा के रोगों को दुखों को तनाव को टेंशन को चिंताओं को हरने के लिए एक प्रयोग बता देता हूं एक घंटा रोज योग निद्रा में चले जाओ तो चार घंटा नींद करने का फायदा मिलेगा रोग तनाव विषमता सब शांत हो ऐसा प्रयोग एक घंटे की
योग निद्रा चार घंटे की नींद का काम करेगी और गंदी आदत भी छुड़ा देगी गंदी इच्छाएं भी छुड़ा देगी क्या करना है योग निद्रा को समझना है जैसे जीवन को समझने से आदमी अमृत्व को पा लेता है आप अपने जीवन जीवन यह नहीं है कि जरा जरा बात में दुखी हो गए जरा जरा बात में सुखी हो गए जरा जरा बात में खुशा मत किए जरा जरा बात में डरते गए यह जीवन नहीं है तो तो जरा जरा बात में मर रहे ये क्या जीवन है क्या किस कितनों कितनों को खुशा मत करके य शरीर
को जिला रहा और अंत में मर जाता है यह जीवन है क्या लेकिन सत्संग सुना तभी पता चलता है कि वास्तविक जीवन नहीं है नहीं तो इसी को जीवन मानते थे यवा जीी ने भी समर्थ रामदास को कहा गुरु जी वास्तविक जीवन क्या है तो समर्थ ने ऐ सा प्रकाशम ज्ञान दिया कि शिवाजी सजग हो गए फिर तो लग गए तो साक्षात्कार कर लिया ईश्वर प्राप्ति कर कठिन नहीं है वास्तविक आवश्यकता को समझो और फालतू इच्छाओं को महत्व ना अभी क्या करते कि फालतू इच्छा को इतना महत्व देते कि वास्तविक आवश्यकता समझ में नहीं आती
थोड़े से चस्के चस्के में जीवन पूरा हो जाता जैसे नेताओं को भाषण करने का चस्का होता है ऐसे कई लोग आजकल धर्म का उपदेश देने का भी चस्का लग पड़ा है गुरु होने का भी चस्का चल पड़ा है य चस्का कतरे से खाली नहीं है पहले वास्तविक जीवन को समझ लो बेटे गुरु बनने की कोशिश मत करो पहले सत शिष्य बन जाओ सत शिष्य बनकर सत्य को पाल फिर तुम्हारी इच्छा भी नई भी होगी मधुमक्खियां कहां किसी को चिट्ठी लिखती है क्या आ जाओ चंदा कहां किसी को आमंत्रण भेजता कि मेरी चांदनी लूटने आ जाओ
फिर तो आपके व्यवहार से आपके उठ बैठ से लोक मांगल्य होगा अपने [संगीत] आप इधर उधर से सीख के नोट करके लिख के मसाला बना के इससे मसाले से भोजन नम चर परा होता है ऐसे लोग थोड़ा इधर से थोड़ा इधर से थोड़ा इधर से मसाला तैयार करके फिर भाषण करते सत्संग करते कैसा रहा बोले बड़ा इंप्रेसिव रहा सुनने वालों ने भी ताले बजा लिए सुनाने वाले ने भी दक्षिणा और वा भाई पा ली समय बर्बाद हो गया मेरे को एक जगतगुरु थे नाम नहीं लूंगा उन्होंने मेरे को कहा कि मेरे से बड़ा स्नेह करते
थे बड़ा आदर से मेरे साथ बातचीत करते उनको मैं जगतगुरु हूं ऐसा अभिमान नहीं था ज्यादा तो मैं मेरे को बोले के आजकल कैसा उस समय लोग बापू जी नहीं बोलते थे महाराज महाराज बोलते थे तो ई भी जगतगुरु जीने से बोला महाराज देखो कैसा है आजकल अहो रूपम अहो रूपम अहो ध्वनि अहो ध्वनि बों ने सोचा कि आजकल यूनिटी का जब मान है संगठन का तो चलो अपन संगठन सभा करें तो एक पेड़ के नीचे गधे कट्ठे हुए बंदरों ने सोचा कि पेड़ के नीचे कट्ठे हुए तो अपन पेड़ के ऊपर ही बैठ जाओ
अपन भी करो कुछ हम गधे तो गधे रहे थोड़ी देर हुई तो गंध ने अपना मीटिंग चालू की एक ने भोका फिर दूसरा तीसरा सब साथ में भोके जैसे सब लोग साथ में तालियां बजा देते तो गधे के पास तालियां तो है नहीं बजाने को तो साथ में भोक लिए तो बंदरों ने उनके भोकने की प्रशंसा कर दी कि अहो ध्वनि अहो ध्वनि अहो ध्वनि तो गधों ने देखा कि हमारी प्रशंसा कर रहे तो हम भी इनकी सराना कर रहे अहो रूपम अहो रूपम अहो रूपम बंदरों ने गधों की वाहवाही कर दी और गधों ने
बंदरों की वाहवाही कर दी उनकी मीटिंग पूरी हो गई ऐसे ही आजकल वो उसकी इच्छाएं पूरी करो वो उसकी इच्छा में ताली बजाओ उसकी इच्छा में वाहवाही करो जीवन खत्म हो जाता है मृत्यु आकर रस्तक देती है सब पड़ा धरा रह जाता है ना कोरसी का साथ में कुर्सी नहीं चलती ना पैसा साथ में चलता है ना खिलाया पिलाया य शरीर कम वक्त साथ में चलता जीव बेचारा निराश होकर चला जाता है अपनी आवश्यकता पूर्ति नहीं हो फिर भटकता है फिर किसी के गर्भ में आने को जाता है गर्भ मिलता है नहीं मिलता तो नाली
में बहता फिर गर्भ मिल गया पशु योनि पक्षी योनि का भटकता उसमें तो खबर ही नहीं उसमें तो सत्संग सुनने का अधिकार ही नहीं विचार करने वाली बुद्धि नहीं भगवान वशिष्ठ जी कहते राम जी को कि हे राम जी लोक मुड़ता से दुख को पा रहे मैं लंबी बजाएं करके कह रहा हूं लेकिन मेरी बात कोई मानते नहीं समझते नहीं भागे जा रहे भागे जा रहे ये करू यह करूं वो करू वो करू और कर करा के आखिर थक के मर ही जाते आपकी आवश्यकता है संदेह रहित जीवन आपकी आवश्यकता है नित्य जीवन आपकी आवश्यकता
है आनंदमय जीवन आनंद की एक तरंग सुख पैदा करती सुख तो आता जाता है आनंद नित्य बना देता है जैसे तरंगे बन बन कर मिट्टी पानी गहरे में जो काते रहता ऐसे ज्ञानी नित्य तत्व को आनंद को पाता है संसारी सुख सुख सुख सुख सुख सुख सुख और सुख दुख सुख दुख सुख दुख इच्छा द्वेष बंद मोह सर्ग याति परम तप [संगीत] नाश कबीर जी जैसे अपनी आवश्यकता समझकर बोले उठत बैठ ही उठने कत कबीर हम उसी ठिकाने लिया दिया वो किया लेकिन अपने ठिकाने परि दृत है नानक जी भी वही बात बोलते पूरा प्रभु
पूरा प्रभु आराध्या पू राजा का नाम नानक पूरा पाई पूरे के गुण इस पूरे को पालने संसार में क्या पूर्ण है शरीर पूर्ण नहीं है और संसार भी पूर्ण नहीं तुम्हारा आत्मा पूर्ण है और परमात्मा पूर्ण है तो पूर्ण आत्मा को पूर्ण परमात्मा का ज्ञान मिलेगा उसमें वि शांति मिलेगी तभी पूर्णता आएगी धन के ढेर करने से पूर्ण जीवन नहीं होता है दुनिया में कोई ऐसा दिखाओ मैंने नाम बताया था धना में आजकल की वर्तमान युग में 25 धनाढ्य करोड़पति नहीं और भूपति उसमें भी एक 25 में भी जो अधिक धनहा दिखा बिल गेट्स सॉफ्टवेयर
कंप्यूटर विभाग कंपनी उस बिल गेट्स क्या आपको पूर्ण सुखी दिखेगा पूर्ण निश्चिंत जीवन है क्या बिल गेट्स य अमेरिका का प्रेसिडेंट चलो बड़ा देश है पूर्ण जीवन चार साल पा साल के बाद चुनाव में फिर पराधीनता आवश्यकता यह नहीं कि जिस जो दूसरों के हाथ में दूसरे वोट दे फिर मैं प्रेसिडेंट बनू तो यह मेरी इच्छा है यह मेरी आव अकता नहीं है असली आवश्यकता को ना समझने से इच्छा की गुलामी बढ़ जाती असली सुख ना जानने के कारण नकली सुख में जीवन दबा हो जाता है असली जीवन को जीवन ना मानने से नकली जीवन
को शरीर को ही जीवन मान लेते हैं अरे जो जन्म के पहले आपके साथ नहीं था मरने के बाद आपके साथ नहीं रहेगा यह क्या असली जीवन है जो जन्म के पहले था बाल्यकाल में नाम नहीं रखा था तभी था बचपन मर गया फिर भी नहीं मरा किशोर अवस्था मरी फिर भी नहीं मरा जवानी मरी फिर भी नहीं मरा कई ित पदार्थ आकर सुख दुख देकर मर गए फिर भी जो नहीं मरा वह वास्तविक जीवन को संदेह रहित जान लो तो कितनी तृप्ति है कितनी पूर्णता है कितनी निश्चिंता है महाराज य बात तो बहुत ऊंची
है लेकिन क्या हम लोग पा सकते ऐसी बात बताना बेवकूफ का काम है जो आप पा ना सके कर ना सके जो आपकी आवश्यकता नहीं वोह वह भाषण वह सत्संग करना वह सत्संग नहीं वह भाषण है सत्संग तो वही है आपकी आवश्यकता की आपको खबर बता दे और आपकी आवश्यकता का आपको साधन बता दे और जिसका परिणाम शाश्वत फल हो इसका नाम सत्संग सत्संग का फल क्या है कि आपको किसी वस्तु की किसी व्यक्ति की किसी स्थान की किसी परिस्थिति की गुलामी के बिना सुख मिलता रहे य सत्संग दोस्त मिले तब सुख मिला यह व्यंजन
मिले तब सुख मिला य तो तरंगित इच्छा द्वेष सम मुथन द्वंद मोहे तो द्वंद है मोह है ले बाप तो बहुत ऊंचा है बहुत ऊंचा अरे यह सुनना थोड़ा इसमें टिक गए तो सारे तीर्थों में स्नान कर लिया सारे यज्ञ कर ा सारे दान पुन कर डाले फिर इधर उधर इधर व देवी वो देवता वो मंदिर जाने की कोई जरूरत ही नहीं सारे मंदिरों में जाने का फल मिल गया इसमें अगर दो मिनट भी टिक गया तो भटक मुआ भेद बिना भेद बताने वाले गुरु नहीं मिला तो बेचारा जीव भटकता है भटक मुआ भद बिना
पावे कोन उपाय खोजत खोजत युग गए खोज रहे सदा सुखी रहे खोजते खोजते सारा शरीर पूरा हो जाता मर जाते फिर दूसरा जन्म लेते तीसरा लेते चौथा लेते युग बीत गए खोजत खोजत जुग गए पाव कोस घर आए स्वामी राम तीर्थ को को जब प्राप्ति हुई नित्य जीवन की समझ जगी तो उन्होंने कहा मैंने क्या ऐसा अंधा भी नहीं करता घर में खो बैठा था घर के स्वामी को मेरे गुरुजी खूब हसते थे बगल में बेटा शहर में डंड देरा गले में आर पड़ा जरा पीसते पीसते चक्की हार पीछे चला गया और गांव में खोज
र मेरा हार कहां गया हार कहां गया ऐ सेही वो नित्य जीवन जो जिसके लिए दिन रात बार बटर वो तो साथ में है आप तो आनंद चाहते हैं और क्या चाहते हैं संदेह रहित जीवन चाहते हैं पराधीनता र किसको पराधीनता आप गुलामी चाहते हैं क्या आप मुक्ति चाहते कुत्ते को भी पकड़ के बांध दो तो छट पटाएगा वो भी मुक्ति चाहता है आपको भी कोई अभी अपनी इच्छा से आप बैठे पता चले कि चारों तरफ पुलिस ने कोडन कर दिया हमी आधा घंटा तक उठ नहीं सकते तो चटपट हो आप बंधन नहीं चाहते मुक्ति
आपका जीवन है बेटे आप अपनी इच्छा से कमरे में दरवाजा बंद करके छ घंटे पड़े रहो मौज लेकिन आप अंदर और किसी ने बाहर खूंटी लगा दी कोई अनजान व्यक्ति ने बताओ आप पसंद करेंगे आप अपने आप खूंटी लगा के 6 घंटे 10 घंटे कमरे में पो लेकिन किसी अनजान आदमी ने आपको बाहर से खूंटी लगा दी है तो आप नहीं पसंद करेंगे बंधन नहीं चाहते मुक्ति आपकी आवश्यकता है आनंद आपकी आवश्यकता है संदेह रहित जीवन आपकी आवश्यकता है अमरता आपकी आवश्यकता है इसलिए मरना मरने वाले शरीर को भी अमर बनाने में लगते लगते आखिर
हार के थक के मर जाते पता है कि मर जाने वाला फिर भी इसको ठीक ठाक रख रख के थक के मर ही जाता है क्योंकि अमरता की आवश्यकता है लेकिन मरने वाले को भी बेचारे को अमर बना बना के थक जाता मरने अम अमर जीवन का पता चल जाए तो मरने वाले में ममता नहीं रहेगी आराम से जिएगा जब मृत्यु आई तो तैयार है कबीर जी ने कहा जा मरने ते जग डरे मोरे मन आनंद कब मरिए कब मिलिए पाए पूर्ण परमानंद जिस मौत से दुनिया डर रहे है क्योंकि अनित्य को अनित्य जीवन को
जीवन मान लिया अनित्य शरीर को नित्य रखने में लगे उनको डर लगता है व कबीर जी तो अपने नित्य जीवन का पता है कहे को मौत से डरना संत मरे क्या रोय व जाए अपने घर अपने नित्य जीवन में है उसको का रोना रोना तो उसके लिए जो अपना अनित्य जीवन से वंचित रह गया और अनित्य शरीर और अनित्य संसार में नित्य बुद्धि करके बर्बाद हो गया उसके लिए रो क्या है हाय व्यर्थ गया मनुष्य जीवन मैं राजा भोज के बात बताता हूं कि एक जवेरी पर बहुत खुश हो गया और मंत्री को कहा कि
मन चाहा तुम जैसा चाहे इसको इनाम दे दे मंत्री ने कहा बताओ बोले नहीं जो तेरे को ठीक लगे क्योंकि इसलिए सारे राज्य में बुद्धिमान जवेरी है इसका पार्क की रे पार्क ने की कला में जानकर दंग रह गया मेरे पर दद का हीरा कोई नहीं परक सकता था इसने परक के बता दिया और बिल्कुल सचाई से विधि चंद्रमणि और सूर्य मणि भी कुछ नहीं इसकी परख के आ ग चिंतामणि क्या होता है यह सब ये सब जानते इनको जितना भी नाम देना चाहो तो दो क्योंकि मैंने हीरा पारख होने क्या शौक था तो मैंने
बहुत कुछ जाना लेकिन इनकी जानकारी गजब की मंत्री ने कहा जो बोलो दे दू बोले नहीं जो तुझे ठीक लगे मंत्री बोलता है मुझे तो ठीक लगता है कि इसकी टाल पर सात जूते कस के मार दो एक तो मनुष्य जन्म मिलना दुर्लभ और दूसरा ऐसी बुद्धि मिलना दुर्लभ अब बताओ मरने के बाद यह बुद्धि कंकड़ पथ परखने वाली बुद्धि तेरे परलोक में काम देगी आ जो स से बुद्धि उठती है उधर को बुद्धि को जरा घुमाव डाल के नित्य जीवन का अनुभव कर लेता नित्य आनंद का अनुभव कर लेता संदेह रहित हो जाता कि
मौत मेरी नहीं होती दुख मेरे को नहीं होता बीमारी मुझे नहीं होती बीमारी शरीर को होती मौत शरीर की होती दुख मन को होता है राग द्वेष बुद्धि में रहता है मैं इनसे असंग हूं मैं चेतन अमर शाश्वत हूं यह संदेह रहित ज्ञान पाल सकता था यह संदेह रहित ज्ञान होता तो नित्य आनंद आता है इसका दर्शन करके दूसरे लोग सज्जन बन जाते इसकी वाणी सुनकर दूसरे लोगों को सत्संग सुनने का लाभ हो जाता पुण्य हो जाता जबरी के दर्शन से क्या पुण्य होता है संत के दर्शन से जो पुण्य माना गया वो किसी सेठ
या नेता या जवेरी के दर्शन से माना गया क्या और कुछ भी कोई लोग बोलेंगे तो भाषण माना जाएगा लेकिन जिसने नित्य जीवन में गोता मारा है वो जब महापुरुष बोलते तो सत्संग माना जाता है सत्य का संग आपकी आवश्यकता है सच्चा सदा सुख रहे सुखी रहना य आपकी आवश्यकता है तो बापू जी यह बात तो बहुत ऊंची है बापरे क्या हम कर सकते जो तुम नहीं कर सकते जो तुम्हारी आवश्यकता नहीं है वह बात में बोलू तो मैं मूर्ख हूं और जो तुम नहीं कर सकते वो मैं बोलू तो मैं मूर्ख हू तुम कर
सकते बापू जी क्या करें कि सुखद अवस्था आए तो आप प्रश्न रखो कि य अवस्था कब तक दुख दए तो समझो कब तक सुख और दुख में समरो सुख और दुख में मूर्ख बच्चा जैसे चार आने के लाली पाप चॉकलेट में बह जाता है अपन भी बहते थे लेकिन अभी चार रुप की चीज आई गई तो सुख नहीं होता ऐसे संसार का जो भी उतार चढ़ाव आता है वो समझो के गुजर जाएगा इसमें क्या है यह सब अनित्य है इसको जानने वाला मैं नित्य हूं ऐसा आप सम र रहने का अभ्यास कर सकते कि नहीं
कर सकते और दिन भर आपको सुख दुख सफलता विफलता मिलती रहती खाली आप उनसे जुड़ जुड़ने की गलती बढ़ाओ मत थोड़ा सावधान रहो य आप कर सक नहीं कर सकते बोलो कर सकते तो इसको बड़ा भारी योग कहा है श्री कृष्ण ने सुखम वा यद वा दुखम स योगी परमो मता मेरे मत में वह श्रेष्ठ योगी सुख और दुख से विचलित नहीं होता सम समत्व योग उते अगर समता आने लगी तो आपकी इच्छा द्वेष और मोह क्षीण होने ल अनावश्यक इच्छाएं शांत होने ल और अपनी आवश्यकता का जीवन का पता चलने लगेगा बुद्धि में समता
आने से क्या होगा पता है आप विवेक सजा रखो सत्संग से विवेक मिलता है बिनु सत्संग विवेक न हो गई राम कृपा बिन सुलभ न सु भगवान की कृपा है जो ऐसा सत्संग मिल रहा है ये विवेक जागृत होता है तो विवेक से क्या होता है कि आप सावधान रहो सावधान रहोगे तो आप में क्षता आएगी समता आने से मन में निर्विकल्प विकल्प जाए निर्विकल्प आपकी मांग है समता से मन में निर्विकल्प आएगी और निर्विकल्प से बुरे संकल्प और बुरी वासना शांत हो जाए एकदम रॉकेट मार्ग है ये ईश्वर प्राप्ति का एकदम सर सराट दूसरे
कई मार्ग जानते हैं कुंडली योग की साधना हमने किया हुआ है भक्ति योग भी अपनी जगह पर बहुत अच्छा है सुंदर है लेकिन यह तो महाराज तत्व ज्ञान तो यू सीधा एकदम रॉकेट जैसे सीधा जाता है य ऐसा ईश्वर प्राप्ति का साधन है खाली सम रहना है उत्तरा कीना श्री कृष्ण की नहीं राम जी की नहीं हाय सीते हाय सीते करते लेकिन दिल में देखते झुकाते मर्यादा निवार रंग मंच पर आप अपने मरे हुए पति के लिए रोते हैं और आप अपने को पत्नी जाहिर करते हैं तो आप भी पुरुष तो जिस समय अपना मरा
हुआ पति रंग मंच पर आप रुदन करते तो क्या आपको रोने की पीड़ा होती है क्या दर्शक तो पीड़ा देख के रोने लग जाते कि बेचारी का पति मर गया बिचारी रण छोड़ी बाई का पति मर गया अरे माई बिचारी नन म मा रण छोड़ी भाई रण छोड़ी बहन भगवान दया करेगा क्या करें पति के पीछे अपना अब उसकी सद्गति हो ऐसा बच्चों को सिखा आप समझो रण छोड़ भाई है और रंग मंच प रण छोड़ी बाई बन गए और आपका पति मर गया है और आपने स्यापा ऐसा किया कि दर्शक और दूसरे लोग आपको
शांतना दे रहे तो आपके सपे का आपको दुख होगा क्या और आप चक्रवर्ती सम्राट राजा हरिश्चंद्र बन गए तो क्या आप भूल जाएंगे कि मैं फलाना धंधे वाला हूं अभी हरिश्चंद्र क्या सदा पक्का रहेगा आप पाट अदा करें ऐसे हीय संसार का आप संसार का व्यवहार ऐसे समझो पाठ अदा कर रहे पुत्र के आगे पिता बन गए पति के आगे पत्नी बन गए पत्नी के आगे पति बन गए अंदर से समझो उठत बैठ तो वही उठाने का कभीर हम उसी ठिकाने पत्नी हूं तो ये शरीर पत्नी मैं य की पत्नी मैं तो हमारा आत्मा हूं
ये आप सोच सकते कि नहीं सोच सकते पति है तो शरीर है मैं तो वो चैतन्य ठीक है और मेरे को बोलते साई है साई है गुरु जीी गुरुजी आपको तो 10 पा 50 100 दो आपके संबंधी हु हमारे तो करोड़ों संबंधी है तो मेरे को तो पागल बना दे अगर मैं सच्चा मान लू क्या इ मेरे चेले हैं मैं इतनो का गुरुजी हूं ठीक है जो गुरुजी है गुरुजी है चेला जी चेला जी सब चलने दे हम है अपने आप हर परिस्थिति के बाप कौन गुरु कौन चेला सब चला चली का मेला मैं अच्छी
तरह से जानता हूं नहीं तो अहंकार की ऐसी आंधी में उड़ जाऊ कि पता भी ना चले कितने शिष्य और कैसे समर्पित शिष्य है ऐसी ऐसी ऊंचाई वाले चेले बैठे हैं कि उनका वर्णन करूं तो कथा का वर्णन फिर कौन करेगा एक दो नहीं हजारों हजारों ऐसे माई के लाल बैठे खाली बापू आवाज कर दे बस कैसा मा बाप सांगला बस फिर भी मैं यह नहीं मानता हूं कि स चेले मेरे हैं और मैं गुरु जी हूं और ये चेला जी सच्चा गुरु हमको गुलाम बनाने के लिए शिष्य नहीं बनाता सारी गुलामिया छोड़कर गुरु बनाने
के लिए हमको शिष्य बनाता है ये असली बात है सच्चा गुरु और भगवान हमको दास बनाने के लिए भगवान ने हमको दास बनाने के लिए पैदा नहीं किया दोस्त बनाने के लिए पैदा किया सखा भले फिर पहले दोस्त बनते बनते फिर दोस्त बन जहां भगवान अपने को जैसे जानते ऐसे आप भी जानो ऐसा शराबी आपको शराबी बनाना चाहता है जुवारी आपको जुवारी बनाना चाहता है तो ज्ञानी गुरु क्या आपको अज्ञानी रखना चाहे क्या नित्य जीवन में जगा हुआ आपको अनित्य की थप्पड़ खाने देगा क्या इसलिए ऐसी ऐसी बातें ढूंढ ढूंढ के तुमको कैसे व्यवहार में
आए बताना होता है नहीं तो क्या लेना है कोई तुम्हारे से कोई रुपया पैसा दक्षिणा अथवा तुम्हारी तालियां सुनने को आया हूं क्या जो मेरे को मिला है वो तुम लोग पा लो बस और वो तुम्हारे पास है ही जो तुमको चाहिए वो तुम्हारे पास पूर्ण है और जो शरीर को चाहिए उसके प्रारब्ध में लिखा है झख मार के आएगा क को चिंता करते [संगीत]