आपको लगेगा नहीं कि क्या हुआ मैं कहां भ्रष्ट हुआ ऐसी जगह खड़े हो जाओगे कि जान भी नहीं पाओगे कि मैं कहां चढ़ रहा था दोबारा उत्साह भी नहीं आ पाएगा अभी बच्चा ना तो लोक को जानता है ना परलोक को जानता है ना हित को जानता है ना अहित को जानता है अभी उसका ब्रह्मचर्य किसी काम लायक नहीं हुआ और व उतर गया व्यभिचार में क्या होगा उसका जीवन अगर आप वाणी में संयम में रहते हैं ना और भजन करते हैं और सत्य बोलते हैं तो आप जो बोलेंगे वही होगा श्रवण इद्री से गंदी
बातें सुने वाणी से गंदी बातें बोले रसेंद्र से गंदा भोजन करें और सोचे ब्रह्मचर्य रह जाएंगे तो बिल्कुल नहीं कदापि नहीं ब्रह्मचर्य कोई खिलवाड़ नहीं [संगीत] है अब जो इस मार्ग पर अध्यात्म मार्ग पर आनंद मार्ग पर चलना चाहते हैं तो उनको एक इंद्री के सयम के लिए पांचों इंद्रियों पर संयम करना होगा ज्ञान इंद्रियों पर एक बात सुधारने के लिए ब्रह्मचर्य का रक्षा तभी व उपासक कर सकता है जब सर्वतो भाविन ब्रह्मचर्य होगा एक जने द्र के ब्रह्मचर्य की पुष्ट का जब आप लक्ष्य कर लोगे तो उसकी पुष्ट के लिए आपको सर्वतो भावे ब्रह्मचर्य
धारण करना पड़ेगा सर्वतो भावे नेत्र का ब्रह्मचर्य जो नेत्र किसी को भी देखकर भोग कामना कर लेते हैं भोग बुद्धि से देखते हैं वस्तु को व्यक्ति को किसी को भी य नेत्र से ब विचार हो रहा है इसीलिए सावधान रहना चाहिए जैसे नाटक सिनेमा आदि है वहा तो जान रहे हो चित्र है पर उनमें जो अभिनय करने वाले जन है वह तो संसारी जनही है ना उनका पहनावा उड़वा हाव भाव अंग प्र अगर आप भगवत भाव से युक्त है तो संपूर्ण सृष्टि में कहीं भी दृष्टि जाए अपने प्रभु की भावना होती है पर वहां तक
पहुंचने के लिए आपको य त्यागना होगा ना आप किसी का अनुकरण ना करें आप अपनी स्थिति को देखें अगर आप किसी का अनुकरण करते हैं कि हमने उनको देखा है वह टीवी देख रहे हैं तो टीवी में क्या देख रहे हैं कहां स्थिति है हमें क्या पता हमको जहां पहुंचना उसके लिए हमारे लिए बाधक है हमें नहीं देखना है अग अगर आप माना कि कोई नाटक ही देख रहे हैं कोई ऐसे सीरियल ही देख रहे हैं पर उसमें अभिनय करने वाले तो संसारी भोगी पुरुष है ना आप कोई त्यागी जितेंद्रीय महात्मा को थोड़ी देख रहे
हैं तो उस देखने में तन्मयता आती है जिसको हम देखते हैं उस परे हम आसक्त होते हैं तभी तो उसका सुख दुख अनुभव होता है देखो कोई ऐसी रोने वाली सीन आए तो रोना जाएगा हंसने वाली आ जाए तो हसना आ जाएगा ऐसे तो उसका प्रभाव हम पर पड़ रहा है ना तो हम किसी के अभिनय करने वाले के अंग प्रत्यंग को देख रहे हैं और कामुख होकर कोई काम चेष्टा कर रहा है या कोई ऐसा वह सारा का सारा मन कवर कर रहा है आपका और एकांत होते ही फिर जो मन अपना मनमानी करवाएगा
आप नहीं सह पाएंगे इसलिए नेत्र का ब्रह्मचर्य सबसे पहले शुरू कीजिए आपको वह चीज नहीं देखनी वो बात नहीं पढ़नी वो दृश्य नहीं श्रीमद् भागवत में वर्णन है कोई पशु पक्षी भी मैथुन कर रहा हो अचानक दृष्टि गई तो मानसिक प्रणाम करके दोबारा दृष्टि नहीं जानी चाहिए इसीलिए लिखा है कि आप एक धनुष भूमि को देखकर एक धनुष इसमें किसी की हानि नहीं होगी आपकी भी हानि नहीं होगी आप एक धनुष भूमि देख कर के ही चलिए मतलब बहुत लंबी दूरी देखने की जरूरत नहीं है बहुत दृष्टि उठा कर के इधर-उधर गर्दन हिलाने की जरूरत
नहीं है और जैसे कि कोई टक्कर मार सकता है तो देखो जिनको प्रारब्ध अनुसार टक्कर लगनी होती है ना वह चाहे जितनी सावधानी से चलो वह प्रारब्ध आ करके दंड देता है अन्यथा सीम की चाप सके को तासु बड़ रखवा रमा पति जासु आप जा रहे हो भगवत चिंतन करते हुए तो प्रभु का नाम आपका पहरेदार अंग रक्षक है कोई बाल भी बाका नहीं कर सकता आपका प्रारब्ध यदि आया है प्रभु से पास हो गया है कि आपको ये दंड मिलना चाहिए फिर मिलेगा आप निश्चिंत रहिए रही है प्रभु का जो विधान है व मंगल
करने वाला है देखो इतने बड़े महापुरुष पूज्य श्री राधा बाबा श्री आद्या शक्ति भगवती की प्रसन्नता की आराधना कर रहे हैं क्योंकि श्री कृष्ण हमारे पति हो इस सिद्धांत की पुष्ट के लिए और पैर फिसल जाता है स्नान करने जाते हैं खड़ाऊ पहने हुए थे टूट जा अंग टूट जाता है दवा नहीं लेते बास की खि चाल बांधकर अनुष्ठान में बैठते हैं बलिहारी ऐसी सामर्थ्य की यह भागवत प्रारब्ध ऐसे महापुरुषों को भी दंड दे देता है देखो ना ऐसे महापुरुष जो ऐसी ऊंचाई पर पहुंचे हैं और इतने भागवत भजन में नियम निष्ठ है उनको भी
प्रारब्ध दंड दे रहा है शरीर को तो अपने को इससे निश्चिंत हो जाना है जो होना है उसे रोक नहीं सकते जो नहीं होना उसे कोई कर नहीं सकता अपने आराध्य देव के चिंतन में ज्यादा नेत्रों को इधर उधर दौड़ाने की जरू नहीं है नेत्र का ब्रह्मचर्य फिर वाणी का ब्रह्मचर्य बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है इससे यदि आप जबान से अश्लील बातें गंदी बातें कामुक बातें करेंगे तो आप ब्रह्मचर्य रह ही नहीं सकते अगर आप वाणी से परस्पर शरीर आकर्षण वाली बातें करेंगे ब उसको देखा तुमने क्या बस आप गए चाहे वो स्त्री शरीर धारी
साधक हो या पुरुष शरीर धारी परस्पर आकर्षण संबंधी यदि वाणी खुली आपकी तो वाणी के व विचार से आपका जन इंद्री का व्यभिचार प्रारंभ हो जाएगा आप रोक नहीं सकते नहीं रोक सकते इसलिए वाणी से भी कोई ऐसी वार्ता ना कीजिए जिससे आपके अंदर काम वेदना बढ़े श्रवण इद्र का कान से गंदी बातें व्यभिचार की बातें कामुक बातें सुनना जिससे हमारे हृदय में कामना जग जाए बिल्कुल नहीं भले वो किसी को लेकर टीका टिप्पणी की जा रही हो देखो वह साधक है उसको हमने देखा वहां ऐसे देख रहा था वैसे कर रहा था वो तो
आपको समझ में आ रहा है कि किसी साधक की बात करें वो तुम्हारे नाश के लिए उपाय कर रहे हैं जो आपको ऐसी बात बता रहे हैं क्यों क्योंकि आप भी तो साधक हैं श्रवण इद्री का व्य विचार हो रहा है आराध्य देव के सिवा और कोई बात कान से सुनना से वे विचार कहते हैं इसलिए महाप्रभु कहते श्रवण फूटो जो अन सुनो ऐसा हमारा अगर कान कुछ और सुने तो फूट जाए नेत्र कुछ और देखें तो ये नेत्र नष्ट हो जाए वाणी कुछ और बोले तो मुख हो जाए हमारी श्रवण इद्री का व्य विचार
नहीं होना चाहिए धर्म की बात अपने आराध्य देव की बात शास्त्र सम्मत बात हम श्रवण करें अन्यथा अगर कोई ऐसा मित्र है या हमारा साथ में रहने वाला है कोई किसी भी साधक की को लेकर बात कर रहा है तो भी हमें कान में अंगुली डाए नहीं हम कोई ईश्वर थोड़ी कि हम किसी को संभाल लेंगे हम अपने को नहीं संभाल पा रहे हमारे सामने किसी की बात मत करो ऐसी करना है तो प्रभु की चर्चा करो अन्यथा मत करो तो अगर आप श्रवण इद्री का ब्रह्मचर्य वाक इद्री का ब्रह्मचर्य नेत्र इद्री का ब्रह्मचर्य और
त्व गेंद्र का ब्रह्मचर्य अनावश्यक किसी को स्पर्श मत करो परस्पर विरोधी शरीर को तो भूलकर मत करो विरोधी शरीर जैसे हमारा पुरुष शरीर है सामने स्त्री शरीर है तो किसी भी तरह से सेवा के लिए संकेत करना या किसी भी सेवा के लेनदेन में बचाव पक्ष में रहो यहां रख दीजिए सामान फिर आप उठा लीजिए सीधे हाथ में सामान लेना नहीं सीधे हाथ में सामान देना नहीं जमीन में रख दीजिए बहुत पवित्र है तो आप कुर्सी पर जो भी आसन उसका हाथ में लेने का नहीं परस्पर विरोधी भाव वाले शरीरों का स्पर्श बिल्कुल निषेध है
किसी भी कारण से ना किया जाए मान लीजिएगा य बहुत मतलब आवश्यक है यदि आप इसमें चूक कर गए तो धीरे-धीरे आप फिसल के वही खड़े हो जाएंगे जहां से चढ़ना मुश्किल है किसी भी शादि का को किसी भी साधक को परस्पर लेनदेन हाथ में नहीं करना चाहिए मानो हमारी बात आपको माला देनी है चौकी पर विराजमान करो हम उठा लेंगे हमें कोई सामग्री यह सामान रखिए आप उठा लीजिएगा कभी भी कोई भी परस्पर मुस्कुराहट बातचीत ऐसे कोई इशारे यदि दिखाई दे तो आप बचो और उसको बचाओ साधक है साधिका है उससे गलती हो सकती
है आपसे भी गलती हो सकती है आप सत्संग सुनते हैं आपको लगा कि इसकी मुस्कुराहट इसकी कुछ चेष्टा ऐसी दिखाई दे रही है जो हमारे अंदर कामुकता पैदा कर सकती है उसको भी बचाओ और स्वयं बचो तो भगवान आप पर प्रसन्न हो जाएंगे वो देख रहे हैं अंदर की बात साधक को बहुत सावधान रहने की आवश्य ये इसको खिलवाड़ मत समझो इसीलिए कह रहे हैं यह अध्यात्म है यह परमार्थ है आपको लगेगा नहीं कि क्या हुआ मैं कहां भ्रष्ट हुआ ऐसी जगह खड़े हो जाओगे कि जान भी नहीं पाओगे कि मैं कहां चढ़ रहा था
दोबारा उत्साह भी नहीं आ पाएगा बात अच्छे से समझ लीजिए तो हमारी त्व गेंद्र का य विचार ना होने पावे सहसा किसी का स्प किसी की भी अगर सेवा करने का सौभाग्य मिले फिर उसमें ये प्रश्न नहीं उठता अगर कोई गिरा पड़ा है भला ऐसी स्थिति में कि मुझे अत्यंत आवश्यक उसे उठाना अगर नहीं उठाते तो कष्ट पा रहा अचानक कोई गिर जाए फिर हम ये नहीं देखेंगे फिर यह हम सूत्र नहीं स्वीकार करेंगे कि अब हम तो ब्रह्मचारी हैं अब हम खड़े खड़े देख नहीं उसको अत्यंत आवश्यकता है हमारी अब उस समय भूल गए
अपने आप को और उसको उठा कर के अगर हमें अस्पताल ले जाना अस्पताल ले जाएंगे जरूरत है हम उसकी सेवा करेंगे सावधान वो भगवत भाव से की हुई सेवा तुम्हारे अंदर अध्यात्म शक्ति पैदा करेगी काम भावना नहीं पैदा करेगी हमारी मां बीमार हो और हमें उसे पता चला कि सोच कर दिया है हमें सोचा पड़े हमें उसका मल धोना पड़े तो क्या हमें काम जागृत हो जाएगा क्या मेरी मां है हमारी बुद्धि कभी ऐसी नहीं होगी आपका पिता है आप लड़की हो कोई दूसरा रह नहीं गया और व बीमार है आपको ऐसी क्या काम जागृत
हो जाएगा क्या अगर ऐसी सेवा में काम जागृत होता तो कोई नर्स ही अस्पताल में नहीं होती हर सेवा उसको करनी होती है नर्स को चाहे वो स्त्री शरीर हो चाहे पुरुष शरीर हो परस्पर विरोधी शरीरों की सेवा पर कहीं काम थोड़ी जागृत होता है क्योंकि उसको अपने सेवा धर्म से मतलब है यह सेवा के समय सूत्र को ना देखा जाए पर ध्यान रखें अत्यंत आवश्यक जहां आपके सिवा नहीं हो सकता वहां अगर हमें ऐसा अवसर मिलता है कि सेवा उसे हो सकती है तो हम पहले उसे प्रेरित करेंगे मर ऐसा है कि अब कोई
नहीं है फिर हमारा परम धर्म जागृत हो जाता है परहित का अगर हमारा कोई निंदा भी करें कोई शरीर की भी हानि हो जाए अब हम परवाह नहीं करते परहित सरिस धर्म नहीं भाई इससे बड़ा कोई धर्म नहीं है पर ध्यान रखें भगवान को साक्षी करके य उस समय की बात है जहां बिल्कुल कोई अब गुंजा नहीं रह गई है त्व गेंद्र का त्व गेंद्र ऐसे ससा किसी आप पुरुष शरीर धारी पुरुष को वि ससा इससे आप में शक्ति जागृत होगी यदि आप वाणी को मौन रखते हैं भगवन नाम जप करते हैं और सत्य बोलते
हैं तो आप जब कभी जो कुछ भी बोलेंगे वैसा ही सत्य होगा गांधारी जी ने कोई तप नहीं किया था जब सुना कि मेरा ब्याह धृतराष्ट्र से हो रहा है जो बाह नेत्र रहित है उसी समय पट्टी बांध ली कि जब मेरा पति संसार को नहीं देख सकता तो मैं भी संसार को नहीं देखू जब मेरा पति मेरे रूप को नहीं देख सकता तो मैं भी किसी के रूप को नहीं देख पट्टी बांध ली थी जब महाभारत का युद्ध चल रहा था बड़े-बड़े वीरों को मार गिराया जा रहा था गांधारी ने दुर्योधन से कहा सुन
मुझे पता है कि भीम की गधा को तू झेल नहीं पाएगा क्योंकि सबसे बड़ी बात भगवान का वरद हस्तु उनके ऊपर है दूसरी बात वो पवन पुत्र है व जब अपने आवेश में आ जाएगा तो तेरी सामर्थ्य नहीं कि उसकी गधा के प्रहार को तू सह सके पर मैं तुझे शक्ति प्रदान करूंगी मैं एक पतिव्रता हूं आज तक कभी पति का वर्ण करने के बाद कुछ देखा नहीं है मैं अपने नेत्रों की पट्टी खोलूंगी तू नंग होकर मेरे सामने आ जाना मेरी दृष्टि पढ़ते ही बज्र का शरीर तेरा हो जाएगा किसी के सामर्थ्य नहीं कि
तेरे उस अंगों को तोड़ सके भगवान सब कुछ जानने वाले हैं भगवान भक्त पक्षपाती होते भगवान का स्वभाव भ भक्त का पक्षपात ले रहा होता है वह अपने महल से कोरिडोर से जा रहा था गांधारी जी के पास भगवान आ गए चट से तुरंत उसने हाथ ऐसे लगा लिया शर्म आनी चाहिए या तो हस्तिनापुर के सम्राट पद पर अभिषिक्त होने के लिए तैयारी कर रहा है नंगे घूम र है गली में उसने कहा गली में नहीं मां के सामने जा मां के सामने जा रहा है अरे कोई बच्चा है ऐसे जाया जाता है मा के
साम उसने क मां ने कहा है कि हम पट्टी खोलकर तुम्हें देख लेंगे तो तुम्हारा शरीर बज का चलो माना मां की आज्ञा का पालन करो थोड़ा इन अंगों को तो ढक लो तुम तो बड़े हो कोई बच्चे थोड़ी मा के सामने ऐसे चले जाओगे ढकना चाहिए तुम्हें वापस कर दिया वो यहां ऐसे पत्तों से ढका वस्त्र नहीं पहना मा की आज्ञा से ऐसे पत्ते से ऐसे कमर से ऐसे ढक लिया पीछे आगे ऐसे गांधारी जी ने पट्टी खोली और जे देखा पूरा शरीर बज्र का हो ये क्या किया तूने कमर में क्यों बांध लिया
बोले शर्म लगती थी कैसे आपके बोले यहीं से मारा जाएगा भीम की गदा का प्रहार तेरी सी जंघा और कमर को तोड़ देगा तेरी मृत्यु मान गई प्रभु के विधान के आगे किसी का बल काम नहीं करता गांध यह केवल आंख में पट्टी बांधने की सामर्थ्य थी कि मेरा पति यदि अंधा है तो मैं भी किसी रूप को नहीं देखूंगी अगर आप वाणी में संयम में रहते हैं ना और और भजन करते हैं और सत्य बोलते हैं तो आप जो बोलेंगे वही होगा पर ऐसा कुछ अनर्थ व बोलता ही नहीं क्योंकि ऐसा संयमी जान जाता
है कि इन सबका फल भगवत प्राप्ति है किसी को कष्ट देना नहीं है एक एक इंद्र का जब आप ब्रह्मचर्य संयम करोगे तब आपका वीर संयम होगा ध्यान रखना आप नेत्र इद्र से गंदे चित्र देखें श्रवण इद्री से गंदी बातें सुने वाणी से गंदी बातें बोले रसेंद्र से गंदा भोजन करें और सोचे ब्रह्मचर्य रह जाएंगे तो बिल्कुल नहीं कदापि नहीं ब्रह्मचर्य कोई खिलवाड़ नहीं है जो ये तो हुआ इंद्रियों का फिर आता है अंतःकरण का ब्रह्मचर्य हमारा मन काम की तरफ तभी जाता है जब उसको निज सुख नहीं मिलता ध्यान रखना सृष्टि में जितने भी
दुर्गुण दुराचार होते हैं उनमें दो प्रधान होते हैं एक काम भोग और एक धन और सब छोटी मोटी बातें हैं प्राय जितने भी हिंसा होंगी जितनी भी भयानक घटनाएं होंगी भयानक युद्ध होगा उन दो में अंतर्गत ही होगा दो के अंतर्गत ही होगा या उसका कहीं न कहीं काम से संबंध स्त्री संबंध से या धन संबंध से है चाहे जो भी घटना हो उसको देख लेना प्रधानता दो में ही होगा कंचन और कामिनी कीर्ति में कीर्तिमान तो कोई कोई विरले ही होते हैं तोव तो बहुत आगे की बातें हैं पर प्राय जितने भी युद्ध है
जितनी भी हिंसा है जितना भी भयानक कुकृत्य है इन दो में ही होता है उपासक को यह बात समझनी चाहिए मन को समझाना चाहिए सच्ची मानी मब वाणी में शब्द नहीं होता इन बातों को बताने का यदि कहीं मन को समझाना चाहिए देखो अपने लोग उपासक है हम जहां जहां आसक्त हो रहे हैं उसमें हमारे मन का केवल है शरीर के द्वारों में कहीं सुख है घृणित द्वारों में कहीं सुख है अगर सुख होता तो इनके भोगने के बाद हृदय कह देता कि अब कछु नाथ न चाहि मोरे शांत हो जाता फिर ऐसा क्यों होता
है कि उसको एक जगह तृप्ति नहीं होती क्योंकि वहां सुख है नहीं फिर सोचता है शायद उसमें हो उसमें हो उसम हो पूरे के पूरे युग के युग व्यतीत हो गए कल्प के कल्प व्यतीत हो गए भोगते हुए क्या सुख मिला क्या स्त्री शरीर सोचता है पुरुष शरीर में सुख है पुरुष शरीर सोचता है स्त्री शरीर में सुख है या आदि आदि अगर सुख होता तो पूरे ब्रह्मांड में पशु पक्षी कीड़ा मकड़ा सब मैथुन धर्म से युक्त है यह सब सुखी हो जाते हैं ना जो जितना भोगा सकते उतने दुखी देख लो अशांत क्लिष्ट परेशान
और पापा आचरण युक्त ये क्या है मन को समझाइए वैरागी भगवत मार्ग का पथिक मन के द्वारा ऑपरेशन करता है हर वस्तु का यह सब इसको ऐसा ना समझे कि बड़ी गुप्त बातें हैं गुप्त बातें प्रिया प्रीतम के दिव्य चिदानंद में रहस्य की यह गुप्त बातें नहीं इनको समझो खोल कर के यदि आप किसी भी तरह से हस्तमैथुन आदि के द्वारा गंदे दृश्य देख कर के गंदी क्रियाओं के द्वारा आप अपना नाश करते रहेंगे तो ना आप इस लोक में सुखी रहेंगे ना परलोक में मान लीजिएगा यह बातें ना तो कही जाती है और ना
सुनी जाती है और ना समझी जाती है इसीलिए हमारा बहुत ही आगे की पीढ़ी जो सनातन धर्मावलंबी जो भागवत हर देश से महान भारत देश को क्यों कहा गया ऐसा भी है कि अन्य देश स्वीकार किया जाता है कि हमसे धनी है स्वीकार किया जाता है कि वैज्ञानिक तत्वों में हमसे आगे हैं पर भारत को महान धर्म शाली देश कहा गया है कोई भी किसी भी देश का धर्म गुरु हो हमारे देश में आएगा हमारी ऋषियों के सूत्रों से ही अपने धर्म को पुष्ट करेगा सबका मूल जड़ भारत धर्म का है कहीं भी हो कहीं
भी देख लो चाहे जिस देश का नाम लो कहीं ना कहीं किसी भारत के ब्रह्म ऋषि की छाप लेकर के डोल रहा है भारत भोग प्रधान देश नहीं है भारत धर्म प्रधान देश है यहां धर्म गुरुओं के द्वारा धर्म स्थापना करके चलाया जाता है यहां आज जो हम समझ रहे हैं कि बाहरी परिपाटी हमारे भारत में आ जाए तो भारत आधुनिक और सर्वश्रेष्ठ देश माना जाएगा कभी नहीं भारत अपनी परिपाटी से चलता है तब सब देशों के ऊपर राज्य करता है किसी भी देश में ना पतिव्रता मिलेगी ना यति मिलेगा ब्रह्मचर्य का कहीं नाम नामो
निशान नहीं मिलेगा यह भारत देश में ही मिलेगा यहां ब्रह्मचारी मिलेंगे यहां सती मिलेंगे यहां प्राण पन से धर्म का पालन करने वाले मिलेंगे अब हमारे जो नई पीढ़ी है वह आधुनिकता को स्वीकार कर रही गर्ल फ्रेंड बॉय फ्रेंड कौन सा रिलेशन है लिविन रिलेशन यह हमारे कहीं किसी भी धर्म ग्रंथ में लिखा हो तो आप बता दीजिए बाल्यावस्था से आज तक जितने भी धर्म ग्रंथों का स्वाध्याय हुआ कहीं भी लिखा हो तो यह बोलो सर्वनाश का स्वरूप है कि नहीं है अभी बच्चा ना तो लोक को जानता है ना परलोक को जानता है ना
हित को जानता है ना अहित को जानता है अभी उसका ब्रह्मचर्य किसी काम लायक नहीं हुआ और वो उतर गया व्यभिचार में क्या होगा उसका जीवन क्या होगा जीवन चाहे वो स्त्री स्वरूप में चाहे पुरुष स्वरूप में हो क्या बिना संयम के यह पशुता के व्यवहार से किसी की ना लौकिक उन्नति होती है ना परमार्थिक उन्नति होती है पर कौन सुनेगा यही कहा जाएगा पुराने जमाने के शास्त्रों को केवल वर्णन कर रहे हैं ये क्या जाने आधुनिक जमाने को तो आधुनिक जमाने की दशा क्या हो रही आ खोल कर के देखो कोई बात नहीं दोस्त
बनाना कोई बुरी बात नहीं इस बात को हम मानते हैं स्त्री शरीर धारी पुरुष शरीर को मित्र बना सकता है कोई दोष नहीं पुरुष शरीर धारी स्त्री को मित्र बना सकता कोई दोस्त नहीं लेकिन मित्र का क्या कर्तव्य होता है कुपथ निवार सुपंथ चलावा कुमार्ग से हटा कर के सुपंथ में चलाना उसकी समस्याओं को दूर करके उसको आनंद में से युक्त करना उसको सहयोग करना ना कि शोषण करना दोस्ती कहते हैं उसके दुखों को मिटा कर के उसको शांति और सुख के मार्ग में ले जाना इसीलिए यह जो आधुनिकता बढ़ रही है ये जो खानपान
गलत हो रहा है यह जो दर्शन गलत हो रहा है तो इस जमाने में ब्रह्मचर्य यह केवल शब्द ही लिखा मिलेगा जीवन में नहीं मिलेगा नए नए बच्चे व्यसन कर रहे हैं नशा कर रहे हैं गंदे आचरण कर रहे हैं क्या होगा कैसे आगे कोई समझेगा शास्त्र क्या है धर्म क्या है बल क्या है आज नौ युवक 16 से 28 के बीच में कोई ऐसा नहीं दिखाई देता है जिसमें आध्यात्मिक थोड़ा भी बल हो काम क्रोध आदि सहने की सामर्थ्य हो अपने बूढ़े माता-पिता को थप्पड़ मार रहे हैं बूढ़े माता-पिता को गाली दे रहे हैं
बूढ़े माता-पिता जिन्होंने खवा पिला के इतना बड़ा उन्हें अनाथा हाले भिजवाया जा रहा है उनको छोड़ दिया जा रहा है आप विदेश घूम रहे हो उनके खाने की व्यवस्था घर में नहीं क्या है यह आज आधुनिक विद्या का यह प्रभाव है विद्या विनयम ददाति जो अपने वयो वृद्धों की सेवा नहीं कर सकता व क्या विद्या पढ़ा जो दूसरों की रक्षा नहीं कर सकता क्या विद्या पढ़ा क्या विद्या का यही स्वरूप है दूसरे का शोषण करना क्या विद्या का यही स्वरूप है कि शराब पीना ड्रग का ये नशा करना यह क्या विद्या सिखाती है और कहा
जाता है आज तो आधुनिक विद्या बढ़ रही मुझे लगता है संयम में रहना ही विद्या का वास्तविक स्वरूप है अपने इंद्रियों को संयम में रखना अपने को संयम में रखना बुजुर्गों का गुरुजनों का शस्त्र का भगवान का भय रखना हृदय में ऐसा नहीं आप तभी निर्भय हो पाओगे यदि शास्त्र का भय नहीं भगवान का भय नहीं धर्म का भय नहीं तो फिर आप वहां पहुंच जाओगे जहां भय ही भय