हम लोगों ने कल सुना था कि परमात्मा जो अकाल पुरुष है हर जाति के व्यक्ति के अंदर वही एक चैतन्य है एक नूर ते सब जग उपजा कौन भले कौन मंदे उसका स्वाभाविक ध्वनि ओमकार है जैसे बर्फ का स्वाभाविक वस ठंडे होते हैं अग्नि के स्वाभाविक उष्णता आदि के तरंग होते हैं वस होते हैं ऐसे ही परब्रह्म परमात्मा का स्वाभाविक ओमकार ध्वनि है इसलिए बच्चा किसी भी जाति में पैदा हो बच्चे का रुदन उसी प्रकार का होता है वा वा वा वो बच्चा जब बड़ा हो जा ता है बुढ़ा होता है हकीम डॉक्टर का इलाज
भी जहां फेल हो जाता है बूढा चदरिया तानकर सोता रहता है तो कर रहता है उसको रिलीफ मिलता है उसी शब्द से चाहे किसी जाति का हो उससे उसको थोड़ी सांत्वना मिलती है अच्छा लगता है भगवान शंकर ने पार्वती को कहा और और कृष्ण ने अर्जुन को कहा पतंजलि महाराज ने अपने शिष्यों को कहा नानक जी ने अपने पहरे प्यारे सिखों को कहा कबीर जी ने सलका मलका को कहा एकनाथ जी महाराज ने अपने सत्संगी को कहा तोतापुरी गुरु ने राम कृष्ण को कहा लीला सा बापू ने मुझे कहा और मैं तुमको वही सनातन सत्य
सुना रहा हूं जय राम जी बोलना प कल मैंने कहा था कि मोहम्मद पैगंबर साहब जब पैगंबर नहीं बने थे तब की बात है 26 साल की उम्र में प्रार्थना करते-करते किसी पर्वत पर ईगो लेस हो गए और वो कुंडलिनी शक्ति जागृत हुई आवाज आया कि मोहम्मद कुछ लिख मुले मेरे मालिक में क्या लिखूं मोहम्मद कुछ बोल मैं क्या बोलूं मैं ना आदान ना समझ ऐसे करते खो गए बाद में शरीर में कंपन हुआ और फिर जो बोले हैं वह ग्रंथ बन गया है ऐसे राम कृष्ण जो बोले हैं ग्रंथ बन गया है नानक जी
जो बोले हैं ग्रंथ बन गया है कबीर जी जो बोले हैं ग्रंथ बन गया है ऋषियों ने जो कहा है वह ग्रंथ बन गया है मीरा जो बोले वह पद ग्रंथम हो गए तो वह सनातन सत्य की शक्ति सबके अंदर बीज रूप में पड़ी है बालक जब पैदा होता है तब से लेकर सात वर्ष तक उसका एक मूलाधार केंद्र फाउंडेशन मजबूत होता है सात वर्ष की उम्र तक बालक की अगर तंदुरुस्ती का ठीक ख्याल रखा जाए तो वह 50 साल तक निरोग जी सकता है क्लाइमेट का प्रभाव नहीं पड़ेगा 50 साल की उम्र तक जल्दी
से बीमार नहीं पड़ेगा अगर इन सात वर्षों में बच्चा कमजोर होता है या उसका कुछ ख्याल नहीं रखा जाता है उसे ठीक स्वास्थ्य के नियम नहीं जानने वाले लोगों के बीच रखा जाता है तो फिर हकीम का यार सदा बीमार बना रहता है तो जन्म से लेकर सात वर्ष तक हम लोगों का पहला फाउंडेशन कह दो मूलाधार केंद्र बनता है दूसरे सात वर्ष हमारा दूसरा केंद्र विकसित होता है जिसे कहते हैं स्वाधिष्ठान केंद्र जिसमें भावनाएं होती है तीसरे सात वर्ष में हमारा मणिपुर केंद्र विकसित होता है चौथे सात वर्ष में हमारा अनहद केंद्र विकसित होता
है अगर से ठीक से विकसित हो गया तो अनहद नाद का अनुभव हो जाएगा अनहद सुनो वडभाग आ सकल मनोरथ पूरे पांच में सात वर्ष विशुद्ध आख्या चक केंद्र का विकास उठ छठे सात वर्ष आज्ञा केंद्र का आज्ञा चक्र का विकास होता है तीसरे नेत्र का साथ में सात वर्ष सहस्त्र सार का विकास होता है फिर 2 प्रतिशत हो चार हो तीन हो पांच हो 15 हो 25 हो आप कैसे माहौल में जीते हैं कैसा आपका खानपान है कैसा आपका संग है और कैसा आपका गुरु है जय राम जी की जय राम जी उस पर
यह सारा आधारित रहता है पहला केंद्र मूलाधार केंद्र कहा जाता है साधारण आदमी के वे पहला केंद्र बहुत कम विकसित होता है लेकिन पशु की अपेक्षा ज्यादा विकसित मनुष्य का होता है पशु में और मनुष्य में यही मूल फर्क है मौलिक फर्क है पशु में ताकत ज्यादा होती है लेकिन बुद्धि कम होती है एक छोटा सा लड़का पा प गाय भैंस को कंट्रोल कर लेता है हालांकि एक भैंस की ताकत नहीं रखता वो लड़का गवार लड़का एक भैंस की ताकत नहीं रखता एक बैल की ताकत नहीं रखता लेकिन 500 बैलों को नियंत्रित करता है तो
महाराज पहला केंद्र विकसित हो कितना भी लेकिन दूसरा केंद्र या तीसरा केंद्र न विकसित हो तो आदमी की कीमत बहुत कम होती है जैसे बिल्डिंग काम करने वाले मजदूर को इंडिया में 202 मिलते हैं लेकिन कारीगर को 0 मिलते हैं कारीगर पतला डुब हो सकता है और लेबर मोटा होता है फिर भी लेबर की कीमत उतनी नहीं होती जितनी कारीगर की होती है उसका कारण है कि उसके दूसरा और तीसरा केंद्र कुछ अंश में ज्यादा विकसित है उस कारीगर की अपेक्षा इंजीनियर या आर्किटेक्ट की मेहनत परिश्रम कम होता है मजदूरी कम होती वो तो एससी
में बैठा बैठा प्लान बनाता है इंडिया हो चाहे दुबई हो लेकिन धूप में जो काम करते उनसे ज्यादा उसको नफा मिल जाता है क्योंकि कारीगर से लेबर से भी ज्यादा वो तीसरा केंद्र विकसित उस आर्किटेक्ट का है पढ़ाई के समय वह एकाग्र हुआ है आईएएस ऑफिसर है या व्यापारी है सुबह या खरीदी में या व्यापार में कभी-कभी जाने अनजाने पढ़ाई के समय वो एकाग्र हुआ है इसलिए उसका तीसरा केंद्र उच्च परसेंटेज विकसित इसलिए उनकी कुछ ऊंचाई होती है दुकान पर जो नौकर लोग काम करते हैं वह कई जगह पर तो शेठ से ज्यादा मेहनत करते
फिर भी सेठ को मलाई मलाई मिलती है उनको छास छास मिलती है क्योंकि सेठ का तीसरा केंद्र मलाई खाने की अटकल वाला हो जाता है जय राम जी बोलना पड़ेगा नारायण नारायण इसीलिए कहा गया है कि मनुष्य अपने भाग्य का आप विधाता है को काह को ई सुख दुख करि दाता निज कृत कर्म भोग तही भ्राता बचपन में एक लड़का है जो संयत रहता है नियमित पढ़ता है या कुछ ऐसा कुछ सोचता है या पढ़ता है जो उस समय उसकी तपस्या हो जाती है और वही लड़का जवानी में आईएस हो जाता है चीफ जस्टिस हो
जाता है सचिव हो जाता है दूसरा लड़का बचपन में लापरवाही करता है उसकी पढ़ने लिखने की तपस्या नहीं होती तो फिर लेबर लेबर लाइफ हो जाती तो तप के बिना भोग नहीं मिलता तप के बिना ऊंचाई नहीं मिलती तो तप का फल दो प्रकार का होता है एक तप का फल है हिक सुविधा हिक भोग हमारे शरीर की तंदुरुस्ती हमारे शरीर की सुविधाएं दे दे हमारी मेहनत का फल य उसको बोलते हैं नश्वर फल दूसरा अगर कोई बुद्धिमान है तो नश्वर वस्तुओं का ठीक उपयोग थोड़ा सा करके बाकी का तप अपने परमात्मा को पाने के
रास्ते लगाता तो उसको संसार का भोग भी मिलता है और परमात्मा का योग भी मिल जाता है दोनों दोनों हाथ में लड्डू हो जाते हैं जैसे राजा जनक गुरु नानक अंगद देव हर राय तेग बहादुर आदि लोगों ने भी तो संसार का खाया पिया भोजन आदि तो करते थे हमारे तुम्हारे जैसा ही तो जीवन था लेकिन फिर भी अंदर से वो प्रसाद भी पा लिया तो बुद्धिमान आदमी वह है कि भोग के पीछे ही अपना पूरा समय शक्ति लगाकर जीवन नष्ट ना करें भोग के साथ योग का प्रसाद पाकर अपने योगेश्वर तत्व आत्मा का साक्षात्कार
कर ले अगर तीसरा केंद्र विकसित हुआ है तीन चार प्रतिशत तो समाज का वह साधारण नागरिक माना जाएगा पाछ प्रतिशत अगर तीसरा केंद्र विकसित हुआ तो कुछ छोटा मोटा नेता हो जाएगा छो छोटा मोटा राजा हो जाएगा छोटा मोटा ऑफिसर हो जाएगा अगर सात आठ प्रतिशत केंद्र विकसित हुआ तो उसकी कुछ प्रसिद्धि आदि विशेष होगी रिसर्च की दुनिया में सुप्रसिद्ध मिस्टर आइंस्टाइन आइंस्टाइन से जमुनादास बजाज के जमाई श्रीमन नारायण गुजरात के राज्यपाल ने पूछा कि तुम इतने प्रसिद्ध कैसे हुए रिसर्च की दुनिया में इतने सफल प्रयोग तुम्हारे कैसे हुए एडिस तो कई बार असफल भी
गया लेकिन उसका उत्साह भंग नहीं हुआ था तो बाद में तो उसकी भी सफलता तो करता रहा खोज करते करते भी तो एकाग्रता हुई अनजाने में ध्यान हो गया अनजाने में तीसरा केंद्र विकसित हुआ तो यह केंद्र विकसित होने में तीन बातें चाहिए एक तो सत चरित्र दूसरा सत्पुरुष की थोड़ी कृपा हो और तीसरा अपना पुरुषार्थ हो एक केंद्र विकसित होते हैं पूर्व का प्रारब्ध कैसा भी हो पहले कैसा और अगर अभी पुरुषार्थ करें तो देर से अपना मुकद्दर बदल जाता है जो होगा भाग्य में वही मिलेगा यह बात ठीक है लेकिन इसको समझने की
जरूरत है भाग्य माना प्रारब्ध प्रारब्ध माना आज का किया हुआ कल मिले और कल का किया हुआ परसों मिले मैंने आज ज्यादा खर्चा कर दिया कर्जा चढ़ गया कल मैं ज्यादा कमाकर कर्जा उतार भी सकता हूं और बेवकूफी करके ज्यादा खर्च करके कर्जे से दब भी सकता हूं मैंने आज गलत व्यवहार किया और कल समाज के साथ अच्छा व्यवहार करके आज की गलती को मिटा भी सकता हूं गलती को बढ़ा भी सकता हूं इसको बोलते हैं कर्म का कर्म करते समय पुरुषार्थ होता है पौरुष होता है और उस पुरुषार्थ में अगर विवेक होता है तो
कर्म उच्चे होते हैं अच्छे होते हैं और फल अच्छा आता है विवेक नहीं होता है और शैतान होता है तो कर्म का फल गलता है मानो रावण ने तपस्या किया है कंस ने तप किया है उसको अधिकार सत्ता आदि मिली है तीसरा केंद्र विकसित हुआ है लेकिन बाद में संग हीन पुरुषों का संग किया है विकारों का संग किया है शराबी कबाबी जीवन बिताया है तो वही रावण जिससे देवता लोग कांपते हैं जिससे यक्ष गंधर्व किन्नर डरते हैं ऐसा रावण जब सीता हरण का काम करता है साधु वेष धारण करके तो पत्तों की खड़खड़ से
रावण कांपता है क्योंकि गलत काम करने से कोई ना देखे फिर भी वह अंतर्यामी चैतन्य साक्षी देखता है और आदमी नीचे के केंद्र में चला जाता है तो नीचे के केंद्र में भय घृणा ईर्षा और स्पर्धा रहती है अगर कोई संत मिल जाए और साधना की कुंजी बता दे तो भय की जगह पर निर्भयता आ जाएगी ईर्षा की जगह पर प्रेम आ जाएगा स्पर्धा की जगह पर समता आ जाएगी अशांति की जगह पर शांति का प्राग होने लगेगा किसी राजकुमार को दो गाली दे दो राजा को दो गाली दे दो तो सामने वाले का खैर
नहीं लेकिन बुद्ध ने जब बुद्धत्व को पाया पुरुषार्थ करके भीतर का केंद्र बदला तो बुद्ध इतने इतने शांत हो गए इतने अपने आप में खुश हो गए कि बाहर सताने वाले दुखी करने वाले लोग असफल होने लगे बुद्ध की खूब निंदा होने लगी नानक जी की भी खूब निंदा हुई वशिष्ठ महाराज की भी निंदा होती लेकिन साधारण आदमी निंदा से जितना घबराता है ऐसा उन पुरुषों को घबराहट नहीं होती बुद्ध एक जगह पर बैठे थे कु प्रचार का शिकार बना हुआ कोई उद्दंड आदमी ने कहा कि अरे राजकुमार अपनी पत्नी छोड़कर बच्चा छोड़कर कमाने के
या मेहनत करने के भय से साधु बन ग शर्म नहीं आती बदतमीज बेश क्रम अपना ग्रामर उसने चालू कर दिया बाकी का हम जानते नहीं तुम अनुमान कर लेना जय राम जी जय राम जितना उसके पास शब्दकोश था गालियों का भंडार था वह सारा का सारा भंडारा कर दिया बोलते बोलते उसका ग्रामर खत्म हो गया फिर बुद्ध शांत सुन रहे हैं आखिर उस आदमी ने थूकना चालू किया थूकते थूकते 25 50 ग्राम 100 ग्राम 200 ग्राम 250 ग्राम जो भी को होगा तू वो भी खत्म हो गए गला सूखने लगा वो आदमी आखर गुर राता
हुआ गया तो बुद्ध ने मीठी निगाह डालते हुए पूछा कि बस मित्र थक गए अब उसके पास बोलने का शब्द नहीं है और गला सुख रहा है इतना गालियां बका इतना थूका लेकिन बुद्ध को अपसेट नहीं कर सका बलवान कौन है गाली बकने वाला कि गाली सुनने के बाद भी दुखी ना होने वाला बलवान है जय राम जी जय दुख देने वाला बलवान नहीं लेकिन दुख देने वाले का दुख चित्त पर चोट ना करे वो आदमी बलवान होता है निर्बल आदमी जरा जरा बात में खिन्न हो जाता है चड़ जाता है जितना आदमी बलिष्ट होता
है उतनी ही परिस्थितियां उसके चरणों तले आ जाती है योग का मतलब है कि तुम्हारा व्यावहारिक जीवन शरीर तंदुरुस्त मन प्रसन्न और बुद्धि आत्म में स्थिति हो सत्संग का मतलब है कि तुम्हारा सर्वांगी विकास हो सत्संग का मतलब ये नहीं कि टले टपके कर लिए अथवा ये वो कर दिया विष बना दिया हम भगत हो गए यह तो ठीक है यूनिफॉर्म मान लो थोड़ी देर के लिए सच्चा अर्थ तो यह है कि तुम्हारी अंदर की सुषुप्त शक्तियों का विकास हो और जितने अंश में विकास होगा उतने ही आप सुख दुख के समय में सम रहेंगे
और परिस्थितियां आपको नहीं सकेगी परिस्थितियां आपका गला नहीं घंट सकेगी जीवन में कई परिस्थितियां इधर उधर होती है उस उस पर भी आपकी कमांड रहेगी और आखिरी जो खतरनाक परिस्थिति आती है मृत्यु उस समय भी आपको भय नहीं होगा क्योंकि आपको आंतरिक विकास यह बता देगा कि मृत्यु तुम्हारी नहीं पंच भौतिक शरीर की मृत्यु है तुम अमर आत्मा हो यह आखिरी विकास है ब्रह्म ज्ञान करा देता है सत्संग बड़े में बड़ी सहायता पानी हो तो आत्मज्ञान है धन की सहायता शारीरिक सहायता यह सब छोटी-छोटी चीजें हैं अपने आत्म परमात्मा के साथ नाता जोड़ने की सहायता
जो पुरुष लेते हैं वे समाज के परम हितेश है वे चीर आदरणीय होते हैं वेदांत आदमी के हृदय को विशाल बना देता है चौथा केंद्र विकसित कर देता है विचार वान का मनुष्य मनुष्य के बीच की दूरी कम हटा देता है हृदय को विशाल उदार शांत प्रसन्न समता के सिंहासन पर बिठा देता है सत्संग बुद्ध ने सह लिया लाचार होकर नहीं सहा मजबूरी का नाम महात्मा गांधी नहीं क्यों चोट ही नहीं लगी बुद्ध ने कहा बस मित्र थक गए वह आदमी को दो शब्द ने बदल दिया घर गया कि कैसा आदमी इतना बोले फिर भी
इसको कैसा आदमी कैसा आदमी िकार भी आमंत्रण देता है आदमी प्रेम से भी चिंतन करता है और द्वेष से भी चिंतन होता है रात भर चिंतन हुआ करवट लेता रहा व आदमी सुबह होते होते उसका मन बदल गया पश्चाताप की आग ने उसके पाप जला दिए आंसू बहाता बहाता व बुद्ध के चरणों में आया के भंते मुझे माफ कर दो मैंने कल तुमको बहुत सारी गालियां दी और जितना कुछ शरीर में थकती थूक दिया मुझे माफ करो बुद्ध बोलता है मित्र कब की बात कर रहे हो बोले कल मैंने थूका था गालिया दी थी बोले
कल चला गया थूकने वाला व्यक्ति भी चला गया थूकने वाला जो आवेश था वह चला गया और जिस पर थू वह कण भी बदल गए माफी किस बात की मांगता है साधारण आदमी तो एक छोटी मोटी बात को गांठ बांध कर रखता है लेकिन दिव्य पुरुष जिन्होंने विकास कर दिया चौथे केंद्र का उन पर इन चीजों की असर नहीं होती कभी थूके होंगे अदला बदला हो गया चुकते हो गया हिसाब क्लियर हो गया तो अच्छा ही है इसमें माफी क्या मांगता है जो बीत गई सो बीत गई तकदीर का शिकवा कौन करे जो तीर कमान
से निकल गई उस तीर का पीछा कौन करे क्यों करे और कब तक करेगा भाई मौज कर यार जिनका यह चौथा केंद्र विकसित होता है वे अनूठे आदमी होते हैं उनका चित्त प्रसाद से पावन हो जाता है फिर चाहे राजा जनक हो चाहे गर्गी हो चाहे मदालसा हो चाहे मीरा हो मीरा के लिए कितने लांछन मीरा की ननन उदा न जाने क्या-क्या बातें बनाक उड़ाती थी लेकिन मीरा के चित्त में कभी शोभ नहीं हुआ तो तीसरा केंद्र विकसित हुआ तब तक बुद्धि में योग्यताएं बढ़ी वो 10 प्र विकसित होता है और जगत में लगता है
तो जगत में सफल होता है धंधे में लगता है रिसर्च में लगता है अगर उस केंद्र की सफलता में आदमी रुक जाए तो संसारी चीजों में उलझ जाएगा संसारी चीजें चाहे 15 दुकान हो 25 दुकान हो हजार दुकान हो फिर भी अंदर एक प्यास बनी रहेगी सुख की आनंद की प्यास बनी रहेगी अगर चौथे केंद्र में आदमी नहीं आता उसको ले जाने वाला सत्संग या सतगुरु या नामदान नहीं मिलता है या अभिमान के कारण धन के कारण सत्ता के कारण वो उधर को देखता ही नहीं तो ऐसा आदमी रावण का रास्ता लेगा मिनी रावण हो
सकता है मिनी कुंभकरण हो सकता है उसका स्वभाव ऐसा होगा कि मां मां मां मां मां आई एम समथिंग फिर उसके आई एम समथिंग से कभी पत्नी पर अन्याय हो जाएगा तो कभी पति पर हो जाएगा तो कभी नौकर पर हो जाएगा और बार-बार अपने पर होगा तीसरा केंद्र तो विकसित हुआ है लेकिन जीवन में जो रस चाहिए जो आनंद चाहिए वो आनंद वाला विकसित नहीं किया तो शराब की शरण लेगा नीट की चिकन की शरण लेगा डिस्को की शरण लेगा न जाने कितनी कितनी चीजों की गुलामी करेगा अगर चौथे केंद्र का अंदर का रस
नहीं आया तो आदमी विलासी बन जाएगा और जो विलास में गिरा तो धीरे धीरे फिर नीचे के केंद्र में जीवन रहेगा सेक्सी हो जाएगा क्रोधी हो जाएगा चिड़चिड़ा हो जाएगा अगर तीसरा ्र उसका विकसित हुआ है और बुद्धिमान है राजा है या सेठ है या कहीं भी पहुंचा वो समझता कि कुछ यार है सितारों से जहां कुछ और भी है इश्क के इतिहा कुछ और भी है आगे बढ़ना चाहिए यह धन माल खजाना आखिर कब तक यह वस्तुएं सुविधाएं कब तक कुछ बुद्धिमान लोग तो महसूस करते कि जब थोड़ा मकान छोटा आदि दो चार कमरे
थे और थोड़ा सा कुछ था और बड़े खुश रहते थे बढ़ गया तो और मगज मारी बढ़ गई लेकिन क्या करें सब मगजमारी बढ़ा रहे तो एक फैशन हो गया मगजमारी बढ़ाने की सोफा और कमरा और घर ही साफ करते रहे या साफ करने वाले नौकरों को ही संभालते रहे लेकिन अपने को कब संभालेंगे बहुत पसारा मत करो कर थोड़े की आश बहुत पसारा जिन किया वे भी गए निराश सुकरात को कुछ सेठ लोग बहुत प्यार करते थे श्रद्धा भक्ति रखते थे एक बार सेठों ने कहा कि हमारे साथ घूमने चलिए बड़े-बड़े सुपर मार्केट बड़े
ज्वेलरी के स्टोर आदि दिखाए बोले जो कुछ बाय करना हो करिए जो कुछ खरीदना चाहे हम पेमेंट कर देंगे सुकरात सुबह से शाम तक सब स्टोरों में घूमा कुछ खरीदा नहीं और बाहर जब निकला घर जाने को तो खूब सड़क पर नाचा है सुकरात लोगों ने देखा कि शायद क्रैक हो गया क्या हुआ क्यों हंस रहे बोले तुम कमाने में परिश्रम करते हो संभालने में परिश्रम करते हो बाय करने में खरीदने में भटक फिर जो चीजें लाते हो उससे जो भोग भोगते हो उस भोग से वह सुख नहीं और मैं उस बात पर राजी हुआ
हूं कि इतनी सारी मजदूरी करने के बाद भी तुम उतने सुखी नहीं मैं तो इससे भी ज्यादा सुखी हूं इन चीजों के बिना भी मैं ज्यादा सुखी रह सकता तो ज्यादा सुखी कौन है ज्यादा शहनशा कौन है कि पन कम वस्तुओं के बिना भी वह अंदर ज्यादा खुश रह सके महात्मा गांधी से पूछा गया गा आश्रम में बैठे थे साबरमती कई करोड़पति कई अरबपति कई लोग प्रार्थना में बैठे थे प्रार्थना पूरी हुई सत्संग हुआ तो गांधी जी से पूछा कि बापू आपके पास तो बहुत बड़े बड़े लोग आते हैं इन सब में ज्यादा से ज्यादा
धनवान कौन है गांधी जी ने एक मिल मजदूर के तरफ इशारा करके उंगली कि के ज्यादा य सुखी है धनवान बोले बापू यह तो रप कमाता है साल खाते में जाता है उस समय पगार था अभी 1500 है बोले इसकी कम से कम शता ज्यादा प्रसन्न रहता है टेंशन इसको नहीं है दूसरों को टेंशन है वह दुखी है तो जीवन में अगर सुविधाएं बहुत आ गई दूसरे और तीसरे केंद्र में रहे अकल से कुछ संसार की चीजें पा ली और अंदर का रस नहीं आया तो बाहर से भले ही मैम साहब को कह दो कि
बड़ी सुखी है साहब सुखी है सेठ सुखी है फलाना लेकिन अंदर से वो बेचारे सचमुच दया के पात्र होते हैं श्री राम श्रीराम और जितना भीतर से आदमी होता है उतना ही बाहर से उसको बहुत बहुत वस्तुओं की आवश्यकता पड़ती है जितना भीतर से सहंशा होता है उतना बाहर की वस्तुओं की बेपरवाह हो कुछ चाहिए तो कम चाहिए तो कुछ चाहिए तो गदाई है कम चाहिए तो खुदाई है और कुछ नहीं चाहिए तो शहंशाई है बलिराम नाम का एक सिंधी मंत्री औरंगजेब के पास काम करता था वह अकाउंट संभालता था वर्ष की एंडिंग हुई वो
फाइल आया औरंगजेब के दरबार में यह नियम था कि मंत्री हो चाहे कोई भी मिलना चाहे तो अभिवादन करें सलाम वालेकुम आदी जो कुछ नियम करे और औरंगजेब इशारा करे तब वह बैठे उसके बिना व बैठेगा नहीं खड़ा रहेगा फिर फिर से अभिवादन करेगा बलीराम बुद्धिमान था लेकिन फिर भीतर में तो बुद्धिमान को भी होता नहीं अच्छा हो अच्छी क्रेडिट हो अच्छा मंत्री बना था औरंगजेब का व फाइल आदि ले आया फाइल क दो चौपड़ को पहले बंद बंद बंदिया ले आया अभिवादन क्या औरंगजेब कहीं आकाश की तरफ नहीं हार रहा था औरंगजेब ने ध्यान
नहीं दिया उसने दूसरी बार अभिवादन किया औरंगजेब ने ध्यान नहीं दिया बलिराम कोआ कि यह भी एक बंदा हम भी बंदे और इस बंदे की इतनी खुशा आमत करते और आंख उठा के कम भक्त देख इससे तो जो सबको नचा रहा जो सबका स्वामी है उसकी गुलामी करते उसका अभिवादन करते तो यार बेड़ा पार हो जाता प्रज्ञा का प्रकाश हो गया तीसरे केंद्र से कुछ ऊपर उठ गई प्रज्ञा बलिराम धीरे से चल दिया जाकर घोषणा कर दी सर्व त्याग यज्ञ करता हूं जिसको जो चाहिए मेरे घर से उठाकर ले जाओ जब था तब तो उन
वस्तु को भोगने से जरा हर्ष मिलता था जब लुटाया तो अंदर से त्याग का आनंद औदार्य का आनंद हम किसी से चीज लेते ना तो अंतःकरण दबता है जब देते हैं तो हृदय खुश होता है श्री राम श्रीराम इसलिए दान की महिमा है मुंजी आदमी धन का फायदा नहीं ले सकता है संभाल संभाल के मर जाता है मोरा पिया कटे है ये नहीं सोचता कि मेरा आत्मा कहां है मेरा परमात्मा कहां है मेरा मुक्ति का द्वार कौन सा है मोरा पिया कटे है मुझा पैसा कते मुझ घोट कि मु ध कि मु पु कि आ
मु मामू अरे तु प कि भगवान कि वो तो पूछ यार मोरा पिया कटे है मेरे पैसे का है सोचते सोचते व मर गया लेकिन बलिराम ने ऐसी बेवकूफी नहीं कि बलीराम ने सर्व त्याग यज्ञ किया और घड़ी भर में जिंदगी भर कमाओ लेकिन छोड़ने में देर नहीं लगती मृत्यु तो सब छुड़ा देता है झटके में जिंदगी भर जो एकत्रित किया कमाया आज त हम लोगों ने जो कमाया और आज के बाद जो भी कमाएंगे छोड़ने में इतनी देर लगेगी चिंता मत करना कि कैसे छोड़ेंगे गया आख बोलो आरती जाओ श्री राम इंसान की बदबख्त
अंदाज से बाहर है किसी सूफी फकीर ने कहा मुसलमान फकीर बड़े ऊंचे फकीर ने कहा इंसान की बदबख्त अंदाज से बाहर है कम वक्त खुदा होकर बंदा नजर आता है जो खुद ही रम रहा है वह चैतन्य उसका संबंध जोड़ दे तो वह खुदा से अभिन्न हो जाए लेकिन यह खपे वो खपे खपे खपे में अपने को खपा देता है बलीराम की आंख खुल गई प्रज्ञा का प्रकाश हो गया बलीराम चले गए यमुना किनारे दिल्ली के तख्त की बात है यमुना किनारे चले गए आकाश की तरफ निहार रहे और अपनी वीणा आला प्रे भगवान के
गीत औरंगजेब ने पूछा कि बलिराम नहीं आ बोले हजूर व आया अभिवादन किया दो बार आपने देखा नहीं वह जरा नाराज होकर चला गया बोले शाही फरमान है बलिराम जल्दी लाया जाए अनुचर ने बताया कि वह तो फकीर हो गया है फिर बोले फकीर पर फरमान शाही फरमान नहीं चलता जय राम जी की बोलना पड़ेगा ज राम जी की फकीरों पर शाही फरमान नहीं चलता अब तो हमें जाना चाहिए अच्छी सलाह देने वाले लोग भी तो होते हैं रावण की सभा में थे तो औरंगजेब की सभा में क्यों नहीं होंगे फिर क्या किया जाए बोले
वो तो यमुना किनारे बैठे औरंगजेब गए देखा तो एकदम एक धोती के दो टुकड़े ड़ लिया एक ऊपर उड़ लिया बस य हकड़ बैठा पैर पसार हुए आकाश की तरफ निहा रहा गीत गा रहा औरंगजेब जाकर खड़ा हुआ मली राम ने देखा तक नहीं आखर औरंगजेब कहता कि राम आखिर मैं तेरा मालिक हूं मैं तेरा दाता हूं मैं तेरा मालिक हूं और आया हूं तो उठकर अभिवादन नहीं करता क्या बात बलीराम ने कहा इस पागलपन को छोड़ देना तुम मेरे मालिक नहीं थे और मैं तुम्हारा गुलाम नहीं था मैं तो अपनी आवश्यकताओं का गुलाम था
अपनी वासनाओं का गुलाम था ना समझी के कारण में तुम्हारा गुलाम था यह खपे यह खपे इसलिए मैं गुलामी कर रहा था अब खपे खपे को मैंने फाड़कर उस पोथी को फेंक दिया अब मैं गुलाम नहीं अब मैं स्वयं से तुम राजा हो हम महाराज है दास कबीर चढ़ गढ ऊपर राज्य मिल अविनाशी अविनाशी राज्य है मेरा तुम्हारा नाशवान राज्य है औरंगजेब बोलता है कुछ भी हो लेकिन तुमने मेरा निमक खाया है तुम मेरे गुलाम थे मेरे नौकर थे बोले मैं तुम्हारा नौकर नहीं था और दूसरे भी तुम्हारे नौकर नहीं अपनी वासना के नौकर है
अपनी आवश्यकता के नौकर है अपनी डिमांड के नौकर है जिसकी जितनी डिमांड उतना वो संसार का ज्यादा गुलाम लोग बोलते हैं कि फलाना सेठ और छह नौकर है लेकिन यह भ्रांति में लोग है नौकर अगर सेठ से स्वार्थ नहीं और सेवा भाव से सेवा करता है तो सेठ को नौकर बना लेता कि वो जुगनू चला गया यार जुगनू चला गया आज तो हमारे को खाना अच्छा नहीं लगता बड़ी सेवा करता था और कभी कुछ मांगता नहीं था मांग नौकर की कम होती तो सेठ के ऊपर नौकर का राज्य चलता है जय राम जी तो बोलना
पड़ेगा जय राम जी बमबे में अहमदाबाद में जब वो रामा या नौकरानी चली जाती और बहुत काम करने वाली नौकरानी होती और चली जाती है तो सेठा नियों को नौकरानी का चिंतन होता है प हुई तो मली सु मली मलीन करतो के कुछ ख कभी कुछ मांगा नहीं और जब दिया तो लौटा के दिया मूली राज्य कर कर रही है किस पर सेठानी पर क्यों राज्य कर र कि चा नहीं है श्री राम फकीर हम लोगों की दिल पर राज्य करते हैं चाहा नहीं है अगर हम कुछ देते तो वो भी जाकर समाज को अच्छे
उन्नति करते हैं तो उनका भी भला देने वाले का भला फकीर तो फिर भी बादशाह उनके चरणों में हम रखते हैं सेल्समैन खुशामद करता है माल देता है तभी भी पेमेंट देने की इच्छा नहीं होती और फकीर को सा साही भला है अरे नहीं करना चाह चमारी चहरी अति नीच की नीच तू तो पूर्ण ब्रह्म था जो चाहन होती बीच तो जब आदमी का चौथा केंद्र विकसित होता है तो संसार की चीजें वस्तुओं की गुलामी नहीं होती चाह नहीं होती वह अपने आप आकर गिरती है फिर थोड़ा शरीर की तंदुरुस्ती के लिए उसका उपयोग कर
लिया लेकिन उसका उपभोग करके अपने को आदमी बर्बाद नहीं करता है एक होता है उपयोग दूसरा होता है उपभोग उपयोग होता है शरीर का स्वास्थ्य मन का स्वास्थ्य और बुद्धि के विकास के लिए और जीवन में सचमुच उन्नति करने के लिए वस्तुओं का उपयोग होता है और उपभोग होता है उन चीजों से मजा लेने के लिए जो जो उन चीजों से मजा लेने के लिए स्पीड से आदमी जाता है त्यों त्यों वो ज्यादा जल्दी परेशान होता है भोजन बढ़िया है मनपसंद भोजन है लेकिन उसका उपयोग किया तंदुरुस्ती का ख्याल रखकर ठीक नाप तोल के खाया
चबा चबा के तो ठीक है स्वादिष्ट है धमाधम खाया जल्दी जल्दी खाया चबा या नहीं तो दांतों की जो चबाने की शक्ति उसका उपयोग नहीं हुआ आदमी क्रोधी हो जाएगा जो जल्दी जल्दी खाता है ना जरूर चिड़चिड़ा स्वभाव होगा क्रोधी होगा होगा होगा और होगा वस्तु सुंदर है चबा चबा कर खाई जितनी जरूरत है उतना खाया उपयोग हो गया स्वादिष्ट है दो ज्यादा रग दिया आलस हो गया जड़ता आ जाएगी दो चार और ग्रास धर दिए तो खाने की रुचि टूट जाएगी अब तुमने खाना नहीं खाया खाना तुमको खाना शुरू कर रहा है ऐसी दूसरी
गाड़ी मोटर वस्तु पैसा इनका उपयोग हो जाए तो ठीक है लेकिन उपभोग करा तो मोरा पिया कटे है रुपयों का उपभोग कर रहा है मरण बिगड़ गया तो 30 पहला दूसरा तीसरा केंद्र अगर दो पा प्रतिशत विकसित है तो साधारण आदमी अगर उसको ध्यान मिल जाता है मंत्र मिल जाता है मंत्र का अपना प्रभाव होता है जैसे आप बटन पुश करते हैं ना तो 91 करिए तो इंडिया है 90 करी तो और कंट्री है एक नंबर हेरफेर में पूरा राष्ट्र बदल जाता है तो ऐसे ही मंत्र के एक आद मोड़ तोड़ में तुम्हारे केंद्रों की
विकास की सिस्टम बदल जाती यह सिस्टम जानने वाले हजारों हजारों साधु में कोई एक आद मिलता है जैसे नारद जी जानते थे नानक जी जानते थे कबीर जी जानते थे राम कृष्ण जानते थे तोतापुरी गुरु जानते थे मीरा जानती थी ऐसे पुरुष अगर मिल जाए और वो मंत्र दीक्षा दे कैसा भी आदमी उसकी यात्रा शुरू हो जाती है भाग्य होया गुरु संत मिलाया प्रभ अविनाशी घर में पाया हमारे पिता नगर सेठ थे सुख सुविधाएं तो बहुत थी लेकिन देखा कि आखिर जिंदगी बर्बाद फिर हम घूमे कई साधु संतो में मत मजहब में पंथ में गए
जब ऐसा गुरु मिले तब हमारा सिर झुक गया महाराज 40 दिन में अपना काम बन गया न साल से लेकर 22 साल की उम्र तक हमने अलग-अलग साधना की काली की उपासना की शिव की की योग किया भक्ति की ना जाने क्याक किया मुझे तो कभी-कभी आश्चर्य होता है कि हम लोगों ने जो परिम करके जो चीज पाया उसको आपको वह चीज आपको ऐसे ही मिल रही है जैसे गाय सुबह से शाम तक बिचारी इधर उधर भटकती कहीं हरा खाती कहीं सूखा खाती कहीं डंडा खाती कहीं पानी पीती है कहीं गर्म कहीं ठंडा ऐसा करते
करते दिन भर की मेहनत के बाद उसके शरीर में दूध बनता है और बछड़े के पास जाती तो शरीर का पूरा दूध उतर आता है और बछड़े को तैयार माल मिलता है ऐसे ही संतों ने अपने गुरु से गिरी गुफाओं से उपनिषदों की परतों से वेद से शास्त्र से योग से भक्ति से लय योग से हठ योग से नादानुसंधान योग से ना जाने क्या-क्या प्रयोग करके जो जो जो जो पाया जैसे मधुमक्खी अलग-अलग पुष्पों से लेकर आई और शहद बना दी शहद वाले को तो यूं तैयार माल मिलता है ऐसे ब्रह्म ज्ञान और सत्संग आत्म
रस जिन महापुरुषों ने पाया है ऐसे पुरुषों का संग जिनको मिल गया उनको यह माल मुफत में मिल जाता है टनाटन माल मिल जाता है बिल्कुल बोलना पड़ेगा जय राम जी और मजे की बात है कि सत्संग करने वाला तो बंधन में अपने को डालता है प्रोग्राम दे दिया फलानी फलानी तारीख तो फलानी फलानी जगह पर हाजिर होना पड़ता है हांगकांग सिंगापुर वाले रोज दो पांच फोन करते हैं अगर एक बार हां बोल देता हूं तो बंद जाता हूं और बंद गया उसमें वो लोग आए तो आए और चले जाए तो चले जाए मेरे को
तो हां कह दिया तो जाना पड़ेगा अब यहां जो डेट दिया है 17 तारीख या 16 तारीख तक तो मेरे को तो रहना ही है आप आए ना आए उसमें चार आदमी कम भी आए तो क्या 10 कम भी आए क्या 25 हर रोज तुम नहीं भी आओ तो चले लेकिन मेरे को तो रोज आना पड़े जय राम जी तुम सुनकर अगर अकल किसी की कम है और चालू कथा में पीठ देकर चल जाता है पुण्य बिखेर देता है तो भी उसको घाटा तो नहीं पड़ता हदय तो धुल जाता है तो किसी की अकल कम
है और चालू कथा में उठकर चला जाता है तो जा सकता मैं तो आधे में नहीं जा सकता जा सकता हूं क्या अभी आप कोई भी जा सकते मैं जा सकता हूं क्या सत्संग सुनने वाले की सुनाने वाले की अपेक्षा सुनने वाला ज्यादा स्वतंत्र है मैं जब गुरु के चरणों में सुनता था तब ज्यादा मजा आता था अभी दिखती बाहर से गा दी लेकिन मजा पहले ज्यादा था जय राम जी की जय राम जी चग कंजूस कंजूस जाओ श्री राम श्रीराम तो मलाधारणम तो आदमी का जीवन तेजस्वी होता है और रूपांतरित केंद्र के बाद अगर
गर्भाधान हो जाए तो बच्चा तेजस्वी होगा स्वाधिष्ठान केंद्र अगर मंत्र से जब तब से रूपांतरित हो जाए तेजस्वी जीवन होगा तीसरा केंद्र अगर विकसित हुआ बाप तेवा बेटा ने वड़ तेवा टेटा गुजराती में जवा तो अगर आपको ईश्वर चाहिए तो बड़े सौभाग्य की बात है कम से कम आप तंदुरुस्त रहे और आपकी तेजस्वी संतान हो इसलिए भी आपको थोड़ा बहुत तो ध्यान की टेक्निक सीखनी चाहिए जितना आदमी ऊपर के केंद्र में होता है और जितनी ज्यादा स्थिति होती है उतना उसका व्यक्तित्व प्रभावशाली होता है और कम मेहनत में संसार की चीजें उसके ज्यादा सेवा में
हाजिर हो जाती है आप यह ना सोच कि हाहा हाहा देखिए अभी इतना सुविधा य है वो जमाना था लोग सोने के बर्तनों में खाते थे देना चाहो तो टूटे फूटे सोने के बर्तन युधिष्ठिर ने यज्ञ किया एक लाख आदमी भोजन करते थे 100 हज आदमियों को तो सोने के बर्तन में भोजन देकर ब्राह्मणों साधुओं को युधिस्टर बोलते थे कि यह बर्तन आप दक्षिणा में ले जाए कुछ लोग ले जाते थे और किनको जो ऊंचे केंद्रों में पहुंच गए बोले इन ठीक को कौन संभाले मर के छोड़ना अभी से छोड़ो टाइम बचाओ युधिस्टर तुम ही
संभालते रहो ऐसे लोग भी थे फिर अफगानिस्तान वाले आए ये वो हुआ धीरे-धीरे भारत की संपत्ति वो तो चढ़ाव उतार होता रहता है हर राष्ट्र में फिर आवाज बदली देना चाहो तो सोने चांदी के टूटे फूटे बर्तन बाद में गोरे आए अंग्रेज आए कोहिनूर मणि जो लंडन में पड़ाया अभी वह अपना भारत का था ऐसे दूसरी भी सारी संपत्ति खींच कर चले गए तो आवाज बदला दे देना चाहो तो तांबे पित्तल के जूने पुराने बर्तन आपवा होई तो तांबा पितर ना जूना पुराना वासन ये तो हम लोग ने सुना जब 10 12 15 साल के
थे लेकिन अभी हमारे बच्चे क्या सुनना सुनते हैं आप होए तो प्लास्टिक ना फाटेला टूटेला चंपल पस्ती नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण ना खुश जड़ी खोराक का गती जड़ मरका चाहे कुछ भी हो गया सही चाहे बगाड़ कपड़ा बगाड़ मु इत बगाड़ इतना बाहर का बिगड़ा फिर तू अपना हृदय क्यों बिगाड़ है बेवकूफ हदय को तो खुश रख कम से कम कि साई मेरे को तुकारा कर दिया मेरी इज्जत बिगाड़ दी मुई बिगड़ी तो बाहर की इज्जत बिगड़ी अंदर की इज्जत तो मत बिगाड़ तू हम लोग इतने बहिर्मुखी ज बिगड़ती तो शाश्वत सिंहासन भी बिगाड़
देते हैं और समझते हैं अपने को अक्कल वाले मत कर रे गरव गुमान गुलाबी रंग उड़ी जावे ग उड़ी जावे गो रे फीको पड़ी जावे गो माटी में मली जा पाछो नहीं आवेग इस नश्वर को संभालने संभालने और ठाट माठ करने करने में अपना हृदय क्यों बिगड़ता है यार चाय बिगड़ जाए तो फिक्र नहीं कपड़ा बिगड़ जाए तो फिकर नहीं डॉलर बिगड़ जाए रुपया बिगड़ जाए तो फिक्र नहीं अपना दिल मत बिगाड़ना क्योंकि दिल में दिल भर खुदा खुद रहता है उसकी रक्षा करना रक्षत रक्षत कोष नाम को संरक्षित न रक्षित सर्वम रक्षित उसकी रक्षा
किया तो सबकी रक्षा हो गई और उसको बर्बाद कर दिया तो बाकी बचा ही क्या अपने हृदय को कभी मलिन मत करो भाई संसार है कभी पति छु कोई प्रॉब्लम आएगा कभी कुछ आएगा कभी कुछ आएगा लेकिन इन सबके सिर पर पैर रखते रख दो आगे बढ़ता जा जब विघ्न और बाधा आ जाए तो उसको धन्यवाद देना कि विघ्न और बाधा देकर तू जगा रहा है कि संसार आखिर ऐसा है वैराग दिलाने के लिए अपनी भक्ति की प्रसादी देने के लिए तूने यह प्रॉब्लम जी वाह प्रभु तेरा पाना मीठा लागे तेरे बाप का जाता क्या
है भक्ति हो जाएगी सह तो रहे हो रो रो के सहग तो दुख होगा और हसते हसते रहो तो भक्ति हो जाएगी घाटा क्यों अगर सुख और सुविधा मिले तो तू कितना दयालु है सुदामा गया है श्री कृष्ण के पास सुशीला ने कहा कि एक ही साड़ी में रहती हूं नहाती हूं और वही साड़ी पहनकर घर में रहती हूं इतना अभाव है जाओ जरा द्वारकाधीश के पास कुछ तो कह दो वो मालामाल कर देंगे कृष्ण के पास गया वह सुदामा और कृष्ण ने सुदामा को आते ही उसके चरण धोए सुदामा के पैर में कांटा लगा
था रुक्मिणी को बोला जरा सुई ले आओ सुई लाने में देर हुई कृष्ण ने अपने दांतों से खींच लिया कितनी ऊंचाई पर है फिर भी कितनी सरलता है सरल स्वभाव न मन कट लाई यथा लाभ संतोष सदा पूरे सब केंद्र विकसित है पूर्णता है जो अधूरा आदमी होता है ना वो जरा भर जाता है खाली चनो वजे घणो रूप डिसी मगरूर नथी एडो हुसन ते नाज न कर रूप सभ रावल जाथ राम लजाने रंग घना जे तो वट धन दौलता दौलत सब दाता जिया तोव जीी अमानता त ट्रस्टी नी टको को राम राम संग ऐसा
नहीं बोलेंगे क्या इतने दाम संग है इतने र पड़ा रहेगा माल खजाना छोड़ त्रिया सुत जाना है कर सत्संग अभी से प्यारे नहीं तो फिर पछताना है खिला पिला के देह बढ़ाई वो भी अग्नि में जलाने के सा आई एम वेरी हैप्पी देखो हमारा बॉडी देखो ठीक है पहले हम ऐसे थे अब देखो हां तो उठाने वाले को जरा वजन ज्यादा हो जाएगा लोड ज्यादा हो जाएगा और क्या किया तूने टांग पर राख ज्यादा हो जाएगी और तूने क्या किया कोई बड़ा काम नहीं किया शरीर बड़ा बना दिया तो कोई बड़ी बात नहीं बड़े में
बड़ा जो आत्मा है उसका साक्षात्कार करने के लिए अपनी समझ को बढ़ा दे अपनी एकाग्रता को बढ़ा दे अपनी क्षमता को बढ़ा दे अपने सत्संग और सत कृतियों को बढ़ा दे जब तू आया जगत में जग हसे तू रोए बाकर कोट क तुम जब पैदा हुए थे तो रो रहे थे और माता पिता और कुटुंबी पिता माता तो क्या बिचारे पिता और कुटुंबी लोग मिठाई खा रहे थे छोक जा छोक जा वो मीठा मु कर रहे तुम रो रहे थे थाना ऐसा दिन जब तुम आए जगत में जग हसे त रोए ऐसी करनी कर चलो
कि तुम हंसे और जग रोए के अरे यार बहुत अच्छा आदमी था अरे सज्जन आदमी थरे यारसा ऐसा जीवन चार दिन की जिंदगी जी लेकिन ऐसा जी के संसार को याद करे और दिल भर परमात्मा भी याद कर के मेरा आ रहा है सनातन सत्य स्वरूप मेरा पुत्र महाराज अगर चौथा केंद्र विकसित होता है तो आदमी को अंदर से रस मिलता है तृप्ति मिलती है उपनिषद कहती है सततो भवति अमृतो भवति सतर लोकांता अगर चौथा केंद्र विकसित हुआ तो वह तृप्त रहता है अमृतम होता है वह तरता है दूसरों को तारता है तीसरा केंद्र विकसित
हो गया तो हिक दुनिया में चाहे कितना भी ऊंचा हो जाए सिकंदर जैसा हो जाए हिटलर जैसा रावण कंस जैसा हो सकता है लेकिन चौथा केंद्र विकसित नहीं हुआ तो अंदर के सुख से वह कंगाल रहेगा ऐसे कई कंगालोङू खाने में तत्पर हो जाते रामचंद्र भगवान कीय सरोवर काठे सबरी बैठी सरोवर काठे ओली भीलन बैठी धरेरा मनु ध्यान राम राम रटता सबरी बैठा हैय राखी हाम गुरु ना वचनों माथे राखी ऋषि ना वचनों माथे राखी हैय रट राम राम राम रटता शबरी बैठा है ये राखी हा शबरी जब राम को देखती व अपने जूठे बैर
आंखों से दिखता नहीं 80 साल की उम्र है चक चक कर बैर रखती राम जी आए बैर खिलाए कंदमूल खिलाए चबरा शबरी भी करती जाती है परोस भी जाती है उत्तम स्त्री के लक्षण है कार्यशु मंत्री कामकाज में मंत्री जैसी बातचीत में निगाह रखने यह उत्तम स्त्री के लक्षण कार्य सु मंत्री गृह सु लक्ष्मी घर में पकाई से करक सर से युक्ति से घर को स्वर्ग बना दे भोजन सुमाता भोजन कराने में मां जैसा हृदय है थोड़ा खिला दे वो तंदुरुस्ती का ख्याल रख भोगे शु रंभा ये उत्तम स्त्री के लक्षण है और उत्तम सेविका
के लक्षण उत्तम मंत्री उत्तम सेविका और उत्तम माता के लक्षण शबरी में है शबरी जब राम को प्रसाद खिला केर आश्रम की शोभा दिखाती है तो कहीं शेर धाड़ रहे हैं तो कहीं मोर नाच रहे हैं और मोरों के पंखों में सांप खिलवाड़ कर रहे हैं लक्ष्मण को आश्चर्य हुआ कि शबरी ऐसी भयानक जगह में तू अकेली कैसे रहती शबरी बोलती मैं अकेली कहां हूं देखो यह भी मैं हूं यह भी मैं हूं यह भी मैं हूं बोले तेरे भय नहीं लगता शेरों का बोले भय किसका लगे सब में मेरा राम है और अंतर का
राम भी प्रकट हुआ और बाहर के राम भी आ गए भय किस बात का तो स्त्री जात डरती नहीं बोले लक्ष्मण भैया स्त्री और पुरुष तो शरीर का ढांचा होता है शरीर के ढांचे में रम रम रमने वाला राम तो एक होता है कौन स्त्री और कौन पुरुष इतने में किसी पुरुष के कपड़े सख रहे थे गीले मानो अभी नहाकर उसने सुखाए हैं साधु के कपड़े थे कोपन लंगोटी आदि जब लक्ष्मण देखा कि शबरी अकेली रहती है फिर भी शबरी के प्रांगण में यह गीले कपड़े सख सूख रहे हैं क्या बात राम जी कहते कि
मैं बताता हूं मतंग ऋषि स्नान करके आए थे और शबरी को कहा था कि बेटा मेरा आखिरी प्रयाण है यह पंच भौतिक शरीर तो छोड़ दूंगा लेकिन आत्मा पर मिलीन होगा मेरी हाजरी यहां रहेगी सब जगह रहेगी व्यापक हो गए तो शबरी ने श्रद्धा की गुरु जी ने कहा कि मैं यही हूं तो सबरी रोज ऐसा सोच कि मेरे गुरु जी अभी आए यही है शबरी की श्रद्धा से सूर्य के किरणों ने और हवाओं ने कपड़ों को सुखाना रोक दिया है शबरी के भाव बल चौथा केंद्र इतना विकसित है कि सबरी के संकल्प ने ऐसा
तो कपड़ों को रखा है कि अभी तक मानो अभी गुरुजी गए चौथा केंद्र विकसित हो जाए आदमी जैसी भावना करे ऐसा तत्काल हो सकता है अरे कैदी आदमी के भी चौथे केंद्र में फिट कर दो कि यह विष है तो आदमी दृढ़ता से माने विष तो विष हो जाता है मैं बीमार हूं बीमार हूं अल्लाह बीमार हूं बीमार हूं तो बीमारी पकड़ लेती दवाइयां कम काम करती आपका चौथा केंद्र वहां काम करता है तंदुरुस्त होने में भी राम जी के साथ सत्संग हो रहा है बातचीत हुई इतने में शबरी को हुआ कि अब तो गुरु
जी ने कहा था राम तेरे द्वार आए आ गए बस शबरी का संकल्प वहां से हटा हवाओं ने कपड़ों को सुखाना शुरू किया सूर्य के किरणों ने अपना काम किया घड़ी भर में कपड़े सूखे और रस्सी से नीचे गरे शबरी ने देखा कि अरे गुरु जी तो चले गए बहुत दिन हो गए अब मैं क्या रहू मेरे को जो गुरु तत्व पाना था गुरु गुरु जैसे ब्रह्मलीन हो गए सम भी कपड़े धरती पर गिरे और शबरी का सिर राम के चरणों में गिरा है और ने शबरी की अंत की है रामायण का भगवान कैसा है
भीलन के झूठे बैर खाता है कैसा भगवान है भीलन को मा करके उसकी अंत करता है कैसा भगवान देखो गीता का भगवान कैसा है कि जीव को ऊपर बिठा है खुद नीचे बैठता है जीव तो रथी है अर्जुन रथी और कृष्ण सार्थी कैसा है गीता का भगवान रामचंद्र जी कभी बोलते हैं तो सारगर्भित बोलते हैं अमृत मय वचन बोलते हैं सांत्वना प्रद बोलते हैं कोई मिलने आता है तो रामचंद्र जी जो वचन बोलते हैं तो सामने वाला बोले उसको संकोच उसके पहले अपनी और से बोलते हैं कोई हजार हजार गलतियां कर ले तो राम जी
उसकी गलती याद करके ना अशांत होते ना अशांति देते लेकिन अच्छा काम करता है तो रामचंद्र जी उसका अच्छा उपकार कभी भूलते नहीं राम जी के में कभी महलो में रहना होता है तो कभी झोपड़ी में रहने का अवसर आता है कभी मोहन भोग पाते हैं तो कभी कंदमूल खाते हैं कभी सज्जनों से पूजे जाते तो कभी दर्जनों से अपमानित होते हैं फिर भी रामचंद्र जी अपने अंतःकरण को जयो का त्यों रखते ऐसा तो तुम्हारा इट सारगर्भित बोलते मधुर बोलते हैं और कर बोलते हैं व्रत ले लो हित कर बोलेंगे मधुर बोलेंगे आप हित कर
और मधुर बोलेंगे सामने वाले का तो जो कल्याण होगा होगा उसके पहले आपका हृदय बनेगा आपका अंतक बनेगा जो तो को काटा बए वा को बो त फूल तो को फूल के फूल है व को है त्रिशूल हरि जन तो हारा भला जीतन दे संसार हारा तो हरि को मिले जीता जम के द्वार गुरु नानक का वचन है अपने हृदय की रक्षा करोगे चौथा केंद्र विकसित होगा कोई संत मिल जाए मंत्र दीक्षा दे दे पहुंचा हुआ संत जैसे राम कृष्ण ने नरेंद्र को दे दिया मंत्र दीक्षा नरेंद्र लग पड़े तो अनुभव हो गए तो वो
आपकी कुंडलिनी शक्ति जब जागृत होगी तो आपको ध्यान नहीं करना पड़ेगा ध्यान अपने आप होगा और वो केंद्र विकसित होंगे अ भी दो पाच प्रतिशत विकसित है बाकी 95 पर 96 अथवा 94 पर बंद पड़ वो विकसित होते हैं जैसे तुम प्राणायाम करो इस एटमॉस्फेयर में तुमको प्राणायाम बहुत हितकर होगा सुबह का कोहरा मिट जाए उसके बाद अथवा तो अपना एसी के कमरे में थोड़ा सा गुगल ज तिल का थोड़ा धूप कर दो क्लाइमेट अच्छी हो जाएगी धूप करना इधर के क्लाइमेट के लिए बहुत हितकर होगा हो सके तो थोड़ा सा कु सेवल से लेकर
किसी में थोड़ा धूप करो फिर लंबा श्वास लो घड़ियाल सामने रखो पेट अंदर रखो आधा मिनट श्वास को रोको और जो भगवान को जिसको मानते हो राम रहीम जिसको शवास रोको और चप फिर धीरे-धीरे श्वास छोड़ो फिर आधा मिनट श्वास बाहर रहे 25 सेकंड 30 सेकंड तो 30 40 सेकंड श्वास अंदर रहे 30 40 सेकंड शवास बाहर रहे ऐसा अगर आप पाच से 10 बार कर सकते हो तो तो आपको स्वास्थ्य में एकदम चमत्कार मालूम होगा उसके साथ-साथ आपका मन भी ज्यादा प्रसन्न रहेगा और आपके अंदर के केंद्र भी थोड़े विशेष विकसित होंगे खुशी बढ़ेगी
स्वास्थ्य बढ़ेगा सुबह उठते समय शरीर को खींचो सीधा लेटक थोड़ा व्यायाम करो उसी समय उठते समय बाद में जोर से हंसो ब्लड सर्कुलेशन घूमे का घर वालों को बोल दो दो मिनट के लिए हम पागल हो जाए तो फिक्र मत करना जन्म जन्म का पागल कल्पन मिटाए वो दो मिनट का सुबह का हास्य और प्रसन्नता दिन भर तुम्हें स्मरण करते करते मदद मिलेगी एक आध घंटा काम करते एक मिनट रेस्ट ले लो काम हुआ शरीर से मन से इंद्रियों से इसको करने की सत्ता जिसने दी है उस रब का में ध्यान करता हूं वो मेरे
हैं मैं उसका हूं वाह प्रभु हरि ओम तत्सत और सब क सब लाभ हुआ तो क्या हानि हुई तो क्या सब स्वपने में बीत गया बस तू एक सार स गोता मारो जीवन की उन्नति होगी उजाले अपनी राहों के हमारे साथ रहने दो न जाने जीवन की किस गली में शाम हो जाए उजाले अपनी राहों के हे गुरुदेव आपने जो ज्ञान का उजाला दिया है जो रब को राह पाने की रब की राह दी है ऐसा उजाला हमारे हृदय में रहे उजाले अपनी राहों के हमारे पास रहने दो न जाने जीवन की किस गली में
शाम हो जाए देखते देख देखते चल पड़े देखने की गली में शाम हो जाए सुनने की गली में शाम हो जाए खाने की गली में शाम हो जाए सूंघने की गली में शाम हो जाए अथवा हाट की गली में शाम हो जाए कोई पता नहीं उजाले अपनी राहों के हमारे पास रहने दो न जाने जीवन की किस गली में शाम हो जाए जीवन की शाम हो जाए उसके पहले जीवन दाता में आराम आ जाए तो कितना अच्छा होगा भगवान शिव जी पार्वती को कहते हैं नास्ति ध्यानम समम तीर्थम हे उमा ध्यान के समान कोई तीर्थ
नहीं तीर्थ में तुम्हारा शरीर नहाता है ध्यान में तुम स्वयं नहाते हो परमात्मा रब में खुदा में खुद तुम नहाते हो नास्ति ध्यानम समम यज्ञम यज्ञ में तुम वस्तुओ की आहुति करते हो पुण्य होता है भविष्य में स्वर्ग मिलता है लेकिन ध्यान करते तो अभी भगवान की शांति रब की शांति खुद ही जो है उस खुदा ताला की शांति मिल नास्ति ध्यानम समम तीर्थम नास्ति ध्यानम समम यज्ञम नास्ति ध्यानम समम दानम तस्मा ध्यानम समाचर और कृष्ण अर्जुन को कहते हैं तपस्वी भ अधि को योगी श्री राम श्रीम