मनुष्य जीवन में और प्राणियों की अपेक्षा जिम्मेदारियां बहुत है फिर भी मनुष्य जीवन श्रेष्ठ माना जाता है क्यों कि इसमें सत्संग का सु अवसर है छोटे से छोटा मनुष्य अगर सत्संग मिले तो इतना ऊंचा हो जाता इतना ऊंचा हो जाता है कि जो भगवान के अनुभव है वोह अनुभव उसके हो जाते हैं जो भगवान की महिमा है वही महिमा उसकी भी होने लगती गीता में भगवान को कोई कर्तव्य नहीं तो ब्रह्म ज्ञानी के लिए भी कोई कर्तव्य नहीं और भगवान सबके हितेश तो बोले ब्र ज्ञानी भी सर्व भूता हीते र रता इस प्रकार मनुष्य इतना
ऊंचा उठ सकता है कि भगवान जिससे भगवान है उस आत्मा को ब्रह्म रूप में ब्रह्म को आत्मा रूप में जानकर मुक्त आत्मा हो सकता है महान आत्मा हो सकता ये सत्संग की बलिहारी सारी धरती का राज मिल जाए शरीर स्वस्थ हो कोई हरीफ ना हो 5 साल में वोट ना लेना पड़ता हो यह मनुष्य जीवन के सुख की पराकाष्ठा है इससे स गुना सुविधाएं और योग्यताएं गंधर्व की है मनुष्य किसी जगह पर जाएगा तो धरती के गुरुत्व आकर्षण नियम के अनुसार ही जाएगा लेकिन गंधर्व तो स्वर्ग में भी आएंगे इधर भी आएंगे वेश भी बदलेंगे
मेरे मित्र संत लाल जी महाराज को पांच गंधर्व मिले थे य अक्षों के पास भी बहुत सारी सिद्धियां शक्तियां होती उनसे भी कई गुना ज्यादा सुख सुविधाएं कर्मज देवताओं को होता है कर्मज देवताओं से स गुना सुख सुविधा आजान देवताओं को होती है आजान देवताओं से स गुना सुख सुविधा देवों के राजा इंद्र के पास होती और इंद्र से भी कई गुना ज्यादा सुंदर व्यवस्था इंद्र के गुरुदेव बृहस्पति को प्राप्त है जैसे अपने घर गुरु आ जाए तो अपन जिस कमरे में रहते उससे बढ़िया कमरा गुरु जी के लिए अपन जो भी लेते हैं भोगते
हैं खाते हैं उससे भी बढ़िया बढ़िया गुरु को प्रसाद रखेंगे ऐसे ही देवताओं से भी देवेंद्र के पास भी और उससे भी कई गुना ज्यादा भगवान ब्रह्मा जी के पास है सुविधा [संगीत] सामर्थ्य ऐसे ब्रह्मा जी का पुत्र [संगीत] अथर्व एक बार ऐसी सुंदर सेवा में सफल हुआ कि ब्रह्मा जी राजी हो गए और ब्रह्मा जी जी ने कहा पुत्र तू जो मांगे मैं दे दूं तूने पिता का कार्य किया है पिता की आज्ञा का पालन किया है अपने सदगुण का परिचय दिया है बेटा तू जो चाहता है मैं तुझे तुरंत दे सकता हूं तो
ब्रह्मा जी के बेटे अथर्व ने कहा कि पिताजी मैं जो कुछ भी मांगूंगा अपनी मति अपनी अकल से मांगूंगा जैसे बच्चा अपनी अकल से लॉलीपॉप चॉकलेट खिलौने मांग लेगा ऐसे में संसारी कोई खिलौने मांग लूंगा जिसमें मेरा भला हो जिसमें जो सर्वोपरि हो सबसे श्रेष्ठ हो जिसको पाने के बाद कभी छूटे नहीं और बिछड़े नहीं और कुछ पाना ना पड़े जिसको जानने के बाद और कुछ जानना ना पड़े जहां पहुंचने के बाद कहीं पहुंचने का आपाधापी ना हो पिता श्री आप वही दीजिए जो आप सबसे ज्यादा हित कर समझते हैं सार समझते हैं नारायण नारायण
नारायण हरि [संगीत] ओ ओम ब्रह्मा देवा नाम प्रथमा ओम ब्रह्मा विश्वस्य कर्ता विश्वस्य करता भुवन गुप्ता भस गुप्ता स ब्रह्म विद्या सर्व विद्याम [संगीत] प्रतिष्ठा अथर वाय प्रति प्रह ब्रह्मा देवताओं से पहले हैं सृष्टि के करने वाले भवनों के गोपनीय रहस्य और सामर्थ्य जानने वाले उन्होंने अपने बेटे को सबसे ऊंचे में ऊंची चीज क्या दी ब्रह्म विद्या ब्रह्म परमात्मा जो आत्मा होकर बैठे हैं उसको जानने वाली विद्या दिया जिसको जानने से मनुष्य शोक से पार हो जाता है कर्म बंधन से पार हो जाता है चिंताओं से पार हो जाता है दुखों से पार हो जाता
है कर्तृत्व भाव भोग तत्व भाव से पार हो जाता है और नित्य नवीन सुख नित्य नवीन ज्ञान नित्य नवीन रस उसके अंदर में प्रकट होता रहता है सामान्य आदमी पोथया पढ़कर ज्ञान कट्ठा करता है सूचनाएं लेकिन जो ब्रह्म को जानता है वो पोथया पढ़कर सूचना ठीक नहीं करता लेकिन वह जो बोलता है वह शास्त्र बन जाता है नित्य नवीन ज्ञान उसके हृदय से निकलता है सामान्य आदमी शक्ति की दवाइया और टोनिक खाकर स्वस्थ बनने की कोशिश में थक के मर जाता है लेकिन उसको टोनि कों के बिना ही नित्य भगवत शक्ति भगवत रस मिलता रहता
है जिससे स्वस्थ रहता है सामान्य मनुष्य रोक पोप और दूसरे म्यूजिक लेकर सुख के लिए आपद आपी करता लेता व महापुरुष अकेले में बैठा होता है तभी भी सुख और जहां नजर डाली तो सत्संग के हृदय में भी सुख और शांति का संचार कर दे इंद्र तो अपसरा बुलाए अप्सराएं नाचे गंधर्व गाए तब इंद्र समझता के मैं सुखी हुआ लेकिन मेरे से ज्यादा सुखी वह ब्रह्म ज्ञानी संत है जो बिना अपसरा के बिना नाच गान के अपने आप में ही तृप्त रहते हैं पासा पकड़ा कबीर जी ने कहा है आप बोलना पासा पकड़ा प्रेम का
पासा पकड़ा प्रेम का वो रब से प्रीति हो गई आत्मा से प्रीति किया पासा पकड़ा प्रेम का पासा पकड़ा प्रेम का सारी किया शरीर सारी किया शरीर सतगुरु दाव बताया सतगुरु दाव बताया खेले दास कबीर खेले दास कबी भगवान को अपना और अपने को भगवान का मानकर और वोह भगवान सो साहिब सद सदा हजूर अंधा जानत ता को दूरे हाजरा हजूर जागी जोत आदि सत जु काद सत है भी सत नानक हो से भी सत उस सत स्वरूप आत्म देव से प्रीति करने का गुरु ने कला सिखा दी पासा पकड़ा प्रेम का सारी किया शरीर
शरीर को मैं नहीं मानता शरीर एक साधन है जैसे मोटर साइकिल का उपयोग करते हैं गाड़ी में बैठते तो मैं गाड़ी हूं ऐसा नहीं बोलते घर में रहते तो मैं घर हूं ऐसा थोड़ी है घर में रहने से आप घर नहीं बन जाते गाड़ी में बैठने से आप गाड़ी नहीं बन जाते साइकिल पर बैठने से आप साइकिल नहीं बन जाते ऐसे शरीर में बैठकर आप कामकाज कर को आए यह शरीर तो छोड़ दोगे लेकिन अज्ञानी लोग शरीर को मैं बोलते गाड़ी में बैठे तो मैं गाड़ी हूं मैं खो गया गाड़ी में खुद को खो जाते
लेकिन सतगुरु ने पासा पकड़ा प्रेम का सारी किया शरीर सतगुरु दाव बताया शरीर का उपयोग करो शरीर को मैं मत मानो दुख को स मानकर उसमें डूबो मत सुख को सच्चा मानकर उसमें उलझो मत यह तो आने जाने वाले लोफर है बाबा सुख और दुख दोनों लोफर है क्या दोनों लोफर है दुख रूपी लोभ पर जलाता है जलाता तपता है दुख देता और सुख रुख भी लोप परर आसक्ति करके सता सता के दुख देता है सुख और दुख मित्र और शत्रु शत्रु सामने सीधा जलाता है और मित्र ममता से रुलाता है मित्र बीमार पड़ गया
तो दुख दिया दिया कि नहीं दिया मित्र का एक्सीडेंट हो गया तो दुख दिया मित्र रूठ गया तो दुख दिया अमित्र शत्रु हो गया तो दुख दिया अमित्र मर गया तो रुलाया उसने हाय रे मेरे यार चले गए तेरे बिना भी क्या जीना तो मित्र भी तो दुख दे हैं शत्रु तपा के दुख देता है तो मित्र मोह ममता में दुख देते हैं न गुरु जी कहते हैं कि बेटा मित्र से साथ मित्रता का व्यवहार निभा लो शत्रु से जरा सावधान रहो लेकिन य मित्र भी स्वपना शत्रु भी स्वपना लेकिन जिससे मित्र शत्रु का ज्ञान
होता है वह मन और मन का ज्ञान होता है व बुद्धि और इन सबका ज्ञानदाता जो रब है वह परमात्मा अपना है उससे प्रीति कर लो पासा पकड़ा प्रेम का उस रब का अकाल पुरुष का पाका पासा पकड़ो शरीर को मैं मत मानो सारी किया शरीर सतगुरु दाव बताया खेले दास कभी तो ब्रह्मा जी ने क्या किया ब्रह्मा जी ने अथर्व को सब विद्याओं में श्रेष्ठ ब्रह्म ज्ञान की विद्या दिया जो देवताओं से अक्षों से गंधर्व से कई गुना ज्यादा सुख इंद्र को है और इंद्र भी गुरु जी के आगे बबलू है ऐसे गुरु ने
अपने बेटे को ब्रह्म ज्ञान दिया और आज वह ब्रह्म ज्ञान का सत्संग आपको सहज में इधर मिलने का अवसर मिल रहा है अगर अपना कल्याण चाहते हो तो ब्रह्म ज्ञान के सत्संग को खूब आदर से सुनो और सुने हुए ज्ञान को व्यवहार में सावधानी से अपना बनाओ कई लोग सोचते कि मेरे को क्या रब मिल सकते मैं तो बड़ा पापी हूं मैं तो बड़ा कमी हूं मैं तो बड़ा क्रोधी हूं मैं तो बड़ा लोभी हूं मैं तो बड़ा अनपढ हूं मैं तो बड़ा ऐसा हूं तुम पंजाबी हो यह झूठी बात है गुर्जर हो यह झूठी
बात है तुम फलाने हो ये झूठी बात है यह तो तुम रा शरीर है सतगुरु दाव बता रहे कि तुम यह नहीं हो लाला लालिया यह तो तुम्हारी गाड़िया है जय राम जी बोलना पड़ेगा पासा पकड़ा प्रेम का जो आदि सत्य है जगात सत्य है अभी सत्य है बाद में सत्य रहेगा उस रब का पासा पकड़ो मन तू ज्योति स्वरूप अपना मूल पछा ऐसे रब का पासा पकड़ो प्रेम का रब को अपना और अपने को रब का मानो सारी किया शरीर सतगुरु दाव बताया खेले दास कबीर तोय सतगुरु दाव बताते कि मन तू ज्योति स्वरूप
अपना मूल पिछा चानना कुल जहान का तू तेरे आश्रय होए व्यवहार सारा तू सब दी आंख में चमकता हैय चांदना तुझे सूझता अंधियारा जागना सोना नित खाब तीनो होवे तेरे आगे कई बारा बुला श प्रकाश स्वरूप है एक तेरा घट वध ना होवे यारा मन घट होता है वध होता है बुद्धि घट होती है वध होती है शरीर भी घट वध होता है मित्र की मित्रता भी घट वध होती है शत्रु की शत्रुता भी घट वद होती है व एक रस अकाल पुरुष घट वद नहीं होता वो तेरा है प्यारे और मैं सरदार ऊपर ऊपर
से व्यवहार करने को बोल दे मैं सरदार ह अंदर से समझ लो य सरदार में नहीं हा ते शरीर है तेते छना स मैं ये नहीं हा मैं सिंधी हां मैं बापू जी हां मैं बेटा जी हां य सब शरीर के नाम है मैं तेरा तु मेरा और बिन फिरे हम तेरे और रब और अकाल पुरुष व आजरा हजूर और जाग जत बिन फेरे हम तेरे दुनिया की ज्योतियां बुझ जाती है चांद दिखता है तो कभी सूरज नहीं दिखता सूरज दिखता है तो कभी चांद नहीं दिखता अमावस्या को कुछ हो जाता है पम को कुछ
हो जाता है लेकिन चांदना कुल जहान का तो ये चांद है कि नहीं सूरज दिख रहा है कि नहीं वो आंख से पता चलेगा आंख ठीक देखती है कि नहीं वह मन से पता चलेगा मन हमारा ठीक बोलता है कि देखता है कि नहीं वो बुद्धि से पता चलेगा बुद्धि हमारी ठीक है कि नहीं यह जीवात्मा से पता चलेगा लेकिन जीवात्मा मेरा बेचैन है कि चैन है उसको पता चलाने वाला रब परमात्मा है भाई वही हाजरा हजूर है सो साहिब सद सदा हजूर इतना नेण है जिसको आप छोड़ नहीं सकते उसका नाम रब है जिसको
आप कभी छोड़ नहीं सकते एक सेकंड के लिए उसका नाम रब है उसका नाम परमात्मा है उसका नाम सुहृद है उसका नाम भगवान है कृष्ण वादी उसे कृष्ण कहो रामवादी उसे राम कहो अल्ल्ला वादी उसे अल्लाह कहो अकाल वादी सिख धर्म को जानने मानने वाले उसको अकाल पुरुष कहो लेकिन है वही का तुम ठाकुर तुम पैर दस जीव पिंड सब तेरी रास तुम मात पिता हम बालक तेरे तुम्हारी कृपा में सुख गने कोई न जाने तुम्हारा अंत भगवान को माना जाता है जगत को जाना जाता है दुनिया को जान लोगे नहीं तो दुनिया की पोल
खुल जाएगी और भगवान को मान लोगे तो निहाल हो जाए और मानते मानते भगवान में शांत हो जाओगे तो भगवान अपना स्वभाव जता देंगे शिव जी पार्वती को कहते हैं उमा राम स्वभाव जही जाना उमा राम स्वभाव जही जाना ताही भजन तजी भावना आना ताही भजन तजी भावना आना भगवान को मानते मानते आपका मैं भगवान में शांत होने लगेगा आपका मैं भगवान के ज्ञान से संपन्न होने लगेगा जैसे लोहा अग्नि में डालोगे तो लोहा अग्नि में होगा ऐसे भगवान में मन लगाओगे भगवान के ज्ञान में बुद्धि लगाओगे अपने मैं को भगवान के वास्तविक स्वभाव में
लगाओगे तो आपके मैं में भगवान का प्रकाश तेज बल आ जाएगा अपनी मैं में चिंता डाल दिया अपनी मैं में शत्रु डाल दिया और शत्रु की याद आ रही तप रहे हैं मित्र की याद आ रही है उलझ रहे मित्र चला गया फिल्म देखा और कोई नर्तकी दिखी और आंख बंद कर बैठे वही नरत की दिख रही है नैन का चैन चुरा कर ले गई अब रो फिर उसके पीछे व तो कभी मिलेगी कभी बिछड़े गी और मिली भी रही तो आखिर क्या दे देगी इतना सौंदर्य दिखता है नाक ऊपर करके देखो तो लिट भरी
है जगत को जानो तो तोवा है कान से खुरे निकलती रहती है मुंह से थूक और मरे हुए बैक्ट की बदबू निकलती रहती आंख से कीचड़ निकलती रहती और नीचे के अंगों से कितनी गंदगी निकलती व बोलने की जरूरत ही नहीं मनी मन लेड और लेडी एक दूसरे का चमड़ा हटाकर देखे तो कैसा कुछ चल रहा है बाहर चखी मक्खी अंदर दख जगत को जरा जानो तो उसका पोल खुल जाता है वो पतंगिया दिए को सुंदर सुहावना मानकर जाता है मजा लेने को तड़प तड़प के मरता है मछली कुंडे में खाना देखकर धड़क से लेती
और गले में फस के मरती है भमरा सुगंध के स्वाद में ही मर जाता है फस के ऐसे जगत आसक्ति वाले को फंसा देता है जैसे जलेबी की चाशनी की कढ़ाई है स्यानी मक्खी है तो कढ़ाई के किनारे बैठ के अपना काम बना के उड़ जाती है और मूर्ख मक्खी और मकोड़े हैं तो उसी चासनी में डूब मारते ऐसे यह दुनिया की चाशनी ऐसी है जितना खाना है जरूरत पड़े उतना खा लो ज्यादा ठासोर बच्चे को जन्म देना है संयम से रह लो पति-पत्नी ज्यादा पति-पत्नी के व्यवहार में अपने को तबा मत करो ऐसे काम
धंधे से जो कमाना है ठीक है खपे खपे खपे खप खपे और और उसमें खप मत अपना काम बना के संसार का जैसे मक्खी कढ़ाई के किनारे काम बना के उड़ जाती है डूब मरती बुर्क होती है ऐसे संसार डूबने के लिए नहीं है संसार तो काम बनाकर रब को पा लेने के लिए है मैं फलाना ऑफिसर हूं लेकिन कब तक भैया मैं फलाना मंत्री हूं मैं प्रधानमंत्री हूं पड़ा रहेगा माल खजाना छोड़ त्रिया सुत जाना है कर सत्संग अभी से प्यारे नहीं तो फिर पछताना खिला पिला के देह बढ़ाई वह भी अग्नि में जलाना
सी तो इस देह को मैं मत मानो पासा पकड़ो प्रेम का रब मेरा में रब दाहा कभी ये ना सोचो कि रब दूर है हाजरा हजूर ग जोत आदि सत जगात सत्य है भी सत्य नानक हो से भी सत जो सत होता है वह सदा होता है और जो सदा होता है वह सर्वत्र भी होता है तो जो सदा है तो अभी भी है सर्वत्र है तो हम में भी है है कि नहीं अगर हमारे बिना वह सत रहा तो सत पूर्ण नहीं रहेगा हमको छोड़कर सत रहा तो सत्य पूर्ण नहीं और हम सत्य को
छोड़कर रहे तो हम हम ही नहीं रहेंगे इस प्रकार का सतगुरु का ज्ञान समझ में आ जाए ना तो कई मेहनत कई जन्मों की मुसाफ कट जागी नहीं तो शरीर कटावेज प मन का मैल न जाएगा शरीर के टुकड़े टुकड़े करके हवन कर दे तब भी ये रहेगा कि मैंने शरीर के टुकड़े टुकड़े करके हवन कर दिया अब मैं ऐसा बना तो मैं तो बना रहेगा होमी रोग और मैं उस रब की सत्ता के बिना मैं हो ही नहीं सकता जैसे पानी के बिना तरंग का मैं नहीं हो सकता सोने के बिना गहने का मैं
नहीं हो सकता मिट्टी के बिना गढ़ा द मैं नहीं हो सकता ऐसे रब दे बिना डा मेरा मैं नहीं हो सकता मैं जब बोलते हो तो किसकी सत्ता से बोलते हो मैं देखता हूं तो किसकी सत्ता से मैं देखता है मैं सोचता हूं तो किसकी सत्ता से मैं खाता हूं मैं जाता हूं मैं आता हूं मैं बच्चा हूं मैं जवान हूं मैं बुड्ढा हूं मैं बीमार हूं मैं तंदुरुस्त हूं मैं वहीदा वही कवर बदलते हैं मैं वही का वही उस मैं की गहराई में जाओ उथ तो रब है व पास पकड़ो प्रेम का ऐसा नहीं
तीन जन्म दो जन्म 10 जन्म 15 साल के बाद मिलेगा इतना दूरी क्यों मेरे अहमदाबाद आश्रम में एक थोड़ा सा खेत खली का इलाका है वहां ध्यान भजन करने के लिए कुटिया बनी साधक तो कोई ऑफिसर रिटायरमेंट लेकर अनुष्ठान कर रहा था तो मैं सस करते कराते अहमदाबाद जाता हूं तो उस इलाके में उसने दंडवत प्रणाम किया टक लंबा चौड़ा था मैंने कहा कौन कहां से तो उसने बताया अपना परिचय मैं कहा अब क्या इच्छा है तुम्हारी बोले बाबा बहुत अच्छा लगता है मैं 12 साल यहां अनुष्ठान करना चाहता हूं कितने 12 साल वो समझा
बापू जी खुश हो जाएंगे मैं क्या मुसीबत मोल क्यों ले रहे 12 साल यही रहोगे अब 12 साल अनुष्ठान करोगे फिर भगवान मिलेगा य यह शर्त डाल दिया ना अपने दिमाग में 12 साल भक्ति करूंगा फिर मिलेगा ऐसा नहीं है परीक्षित को तो सात दिन में मिल गया था सुखदेव जी के सत्संग से राजा जनक को रकाब में पैर डालते डालते मिल ग किसी को 40 दि तो किसी को 40 महीने में अपने 12 साल का फंगा डाल के में क्या करना है अनुष्ठान का ईश्वर के लिए तड़प हो जाए दिलने तस्वीरें हैं यार जबक
गर्दन झुका ली मुलाकात कर ली वह थे ना मुझसे दूर ना मैं उनसे दूर था आता ना था नजर तो नजर का कसूर था अभी नजर मोड़ दे अभ भी मुलाकात उसका रस ले [प्रशंसा] ले वो कोई दूर है क्या पराया है क्या 12 साल अनुष्ठान करूं तीन जन के बाद मिलेगा इस जन्म में मैं पापी हूं अरे बच्चे का नाक बहता है और शरीर गंदा है और मां को पुकारे सच्चे दिल से मां को पुकारे मां ना आए तो उस मां को मर जाना चाहिए बच्चा चाहे नाक बहती हो चाहे मुंह से थूक बहती
हो और कपड़े गंदे हो काला कल उठ हो अथवा शरीर से गंदगी निकली हो फिर भी तड़ ता है बेटा मां के लिए तो मां ऐसा नहीं सोचती कि ना धो के स्वच्छ होकर बड़ा होकर आएगा तभी गोद में लूंगी ऐसा बोलती है क्या मां नाक बाग ठीक कर दे ना धो के अच्छा होकर आ जाएगा जरा ठीक से बापू जीी बन के आएगा तभी मैं गोद में बिठाऊ फिर क्या जरूरत है व तो बेटे जी थे तभी गोद में बिठाते थ अभी बापू जी को काहे को बिठाए अभी तो बापू जी के गोद में
अपना सिर रख के निश्चिंत होकर रब भक्ति करती तो मां यह शर्त नहीं लगाती कि बेटा ऐसा हो जाए ऐसा हो जाए तब मैं उसको गोद में लूंगी ऐसे ही रब जो है वह शर्त नहीं रखते कि तुम नेक हो जाओ अच्छे हो जाओ फिर मैं तुम्हें तुम्हारा हूं अरे हम जैसे तैसे हैं रब के हैं चाहे मंदे हैं चंग आया मंद जो भी है है रब के जिनको चंगे होने का अभिमान है वो गलती में ऐसे जो मंदे होने की बात पकड़ के दुखी हो रहे हैं और रब से अपने को दूर मानते हैं
वो भी गलती में चंगा और मंदा मन होता है हम तो भगवान के हैं मन है माया का मन तो बदलता रहता है पशु के शरीर में मन पशु जैसा हो जाता है बदमाशों के संग में मन बदमाश हो जाता है भक्तों के संग में मन भक्त हो जाता है दीवानों के संग में मन दीवाना हो जाता है बेगानों के संग में मन बेगाना हो जाता है तो जैसा मन का संग ऐसा रंग लेकिन मन अच्छा हुआ बुरा हुआ उसको जानने वाला तो अलग हुआ कि नहीं हुआ तो ब्रह्मा जी ने अपने बेटे को य
दिव्य ब्रह्म ज्ञान दिया जिस ज्ञान से सर्व मुक्त आत्मा हो गया महान आत्मा हो गया पूर्ण आत्मा हो गया पूर्ण गुरु कृपा मिली पूर्ण गुरु का ज्ञान गुरुवर पूर्ण गुरु का ज्ञान आंसु मल से हो गए साई आशारा थे गदाधर महाराज को काली माता प्रकट होकर कहा कि तोतापुरी गुरु से दीक्षा ले लो ज्ञान ले लो बोले मां तुम मूर्ति से प्रकट होकर मेरे साथ बातचीत करती हो मेरे हाथ का भोजन लेती हो मेरे हाथ के पुष्प गजरा लेती हो फिर मुझे गुरु करने की क्या जरूरत है मां ने कहा देखो मां मा करके एकदम
भाव में आते हो मुझे तरफ के पुकारते तो मैं आ जाती हूं लेकिन मां जिससे मां है और बेटा जैसे बेटा है उन दोनों का अकाल पुरुष रब आत्मा उसको बेटे जानोगे नहीं तब तक तो यह साधना अधूरी रहे इसलिए जाओ गुरु तोतापुरी से दीक्षा लो गुरु तोतापुरी से काली माता ने आज्ञा दिया तब दीक्षा ली और तोतापुरी गुरु ने गदाधर को राम कृष्ण परमहंस बना दिया और राम कृष्ण ने नरेंद्र को विवेकानंद बना दिया ऐसे लीलाशाह भगवान ने आसुमल को आशाराम मना तुम्हारे सामने रख दिया ये गुरुओं की कृपा ब्रह्म ज्ञानी की मक्त कौन
बखान नानक ब्रह्म ज्ञानी की गत ब्रह्म ज्ञानी जाने ब्रह्म ज्ञानी द दर्शन वड भागी पावई ब्रह्म ज्ञानी को बल बल जावई ब्रह्म ज्ञानी मुक्त जुगत का दाता तो ऐसा ब्रह्म ज्ञान ब्रह्मा जी ने अथर्व को दिया और उस ब्रह्म ज्ञान में स्थिति पाने के लिए भगवत ध्यान है ब्रह्मज्ञान की तो महिमा सुनी लेकिन आप चलने भी लग जाओ वह बात भी सुनो आसमान को अथवा स्वस्तिक को यह स्वस्तिक है अथवा ओमकार को या गुरुजी को देखते रहे आंख की पुतली सीधी रहे इधर उधर दाए बाहे और लंबा श्वास भरा और ओमकार का उच्चारण किया तो
ओमकार का अथवा हरिओम का ह और म हरि ओम का म उसके बीच मन शांत हो जाएगा जो शांत होता उस उस वक्त अकाल पुरुष की सत्ता में एकाकार होती इतना नेणे है चलो कमर सीधी गर्दन सीधी ऐसा अभ्यास आधा आधा घंटा सुबह दोपहर शाम करो 40 दिन का अनुष्ठान में तो आपका कितना कितना परिवर्तन हो जाएगा कितने सारे फायदे होने लगेंगे आधा घंटा सुबह आधा घंटा दोपहर आधा घंटा शाम इसमें 15 मिनट उच्चारण होगा 15 मिनट जप में जाएंगे बुद्धि में फर्क पड़ेगा मन में फर्क पड़ेगा सात केंद्रों में फर्क पड़ेगा 84 नाड़ियों में
फर्क पड़ेगा 26 उपत काओ में फर्क पड़ेगा भाग्य की रेखाए बदलने लग जाएगी एक लड़का था बाप मर गए थे स्कूल में मास्ट ने कहा मार कच्छे नहीं लाता तुम्हारे भाई को हम निकाल देंगे उसके भाई को बुला के 4 जनवरी 1990 हमने मंत्र दिया पढ़ने में ऐसा तेज हुआ कि अभी 30 लाख रुपए की सर्विस है उसकी नोकिया कंपनी अजय मिश्रा दूसरा कोई भैंस चराने वाला कोई कुछ कोई कुछ आपके पुरुषार्थ से सब बदलाव हो जाती है एक बार राजा विक्रमादित्य के राज्य दरबार में सामुद्रिक लक्षणों को और ज्योतिष विद्या को चाट गया हुआ
बड़ा ज्योतिषी पहुंचा देखते ही धर धर धर धर बोल दे के आदमी ऐसा ऐसा ऐसा ऐसा ऐसा होता है राजा विक्रमादित्य को देखकर वो ज्योतिषी दंग रह गया सामुद्रिक लक्षण और एकाएक चिल्लाकर बोला हद हो गई जीवन भर का मेरा ज्योतिष जीवन भर का मेरा हस्तगत ज्योतिष हार गया यहां विक्रम ने कहा क्यों ज्योतिषी महाराज क्या हो गया क्या बात है बोले महाराज मेरा ज्योतिष क्या बताऊं आपको मैं सामुद्रिक लक्षणों से ज्योतिष देखता हूं जिस आदमी की आंख ऐसी हो वह आदमी कंगाल होना चाहिए और आप राजा हो जिस आदमी का नाक ऐसा हो उस
आदमी के कोई पड़ोसी और कोई मित्र नहीं होना चाहिए सब आप के आगे पीछे खिदमत करते हैं जिस आदमी के ललाट की ऐसी रेखा हो उसका भाग्य मंद होता है बुद्धि मंद होती है और आप राजा विक्रमा दत हो आपकी बुद्धि और आपके राज्य की महिमा अपरंपार है जिस आदमी के हाथ की उंगली फलानी होर रेखा ऐसी होती है वो आदमी डरपोक होता है आप बड़े बहादुर हो मेरा सारा ज्योतिष इथे झूठा पया है सारी जिंदगी की कमाई को महाराज आपके दर्शन ने चौपट कर दिया य क्या मैं देख रहा हूं क्या मेरा ज्योतिष झूठा
हो सकता है कभी नहीं तो क्या आप सामने हैं तो आप झूठ है कभी नहीं इसीलिए मैं चिल्ला रहा हूं विक्रमादित्य ने कहा फिक्र मत कर ज्योतिषी मैं तुम्हारा ज्योतिष सच्चा हो जाए ऐसा उपाय बताता हूं तो अपना जो कुछ पहना था थोड़ा हटाया और बयान में से तलवार खींची और तलवार की नोक रख दी हृदय पर बोले महाराज इधर चिरा लगा देता हूं गहराई से देखो बोले मैं समझ गया समझ गया समझ गया समझ गया जहां पुरुषार्थ है वहां ज्योतिष और भाग्य बदलने को तैयार हो जाता है महाराज मैं समझ गया समझ गया ट्राई
एंड ट्राई विल बी सक्सेस यह कौन सा उकता जो हो नहीं सकता तेरा जीना चाहे तो हो नहीं सकता छोटा सा कीड़ा पत्थर में घर करे इंसान क्या दिले दिलवर में घर ना करे नेपोलियन बोनापार्ट छोटा सा विद्यार्थी विद्यार्थी जीवन पूरा करके पहुंचा फौज में बॉस ने कहा कि शत्रु के सेना में जाना है अंधेरी रात है बारिश है पगडंडी गायब हो गई होगी लेकिन यह यह काम करने को क्या तुम जा सकते हो बोले यस जरूर बोले रास्ता मिलेगा ले हां हां क्यों नहीं मिलेगा लेकिन पगडंडी है रास्ता नहीं मिले तो बोले रास्ता नहीं
कैसे मिलेगा जरूर मिलेगा नहीं मिलेगा धुल गया हो तो मैं रास्ता बना लूंगा आई विल डू इट मैं ये करके आऊंगा नथिंग इज पॉसिबल सर ये शिकागो अमेरिका में कैसे बना पता है जंगली प्याज शिका और जंगली प्याज का खेत था और किसी ने ठान लिया कि इसको शहर बनाऊंगा पूछा गया कि इतना शिकागो प्रसिद्ध कैसे हो बस बोले यही मंत्र था हमारा य विल डू इट आई डू इट हमय बनाएंगे ये करेंगे ऐसी आप ठान लो कि हम भगवान का पाला पकड़ लेंगे तो उन्होंने तो शिकागो बनाया और शिकागो छोड़ छोड़ के मर गया
कौन से शरीर में भटक रहे भगवान जाने आप तो अपने रब का पाला पकड़ने की बात कर [प्रशंसा] लो ऐसे दिन कब आएंगे कि प्रभु की प्राप्ति हमको भी हो जाएगी ऐसे दिन कब आएंगे कि संसार स्वपना लगेगा और सच्चिदानंद पर मात्मा अपना लगेगा ऐसे दिन कब आएंगे कि हमें भी मुक्तता का अनुभव हो जाएगा ऐसे दिन कब आएंगे कि हम जन्म मरण जरा व्याधि वाले शरीर से पार होकर अजन्मा अमर आत्मा को म रूप में जान लेंगे मान लेंगे त प्रहलाद को मिला तू ध्रु को मिला तू कबीर जी को मिला लीला सा बापू
को मिला राम कृष्ण देव को मिला रमण मह ऋषि को मिला और भी कई नामी अनामी महापुरुषों को मिला हे मेरे दिलभर [संगीत] देवता तू मेरे दिल में छुपा है और मैं तुझसे अलग होकर भटक रहा हूं कृपा कर तेरी प्रीति दे तेरा ज्ञान दे [संगीत] देव ऐसी कोई चीज नहीं जो छूटे नहीं और तुम्हारा मेरा वियोग नहीं है संसार का मेरा सहयोग शाश्वत नहीं और तेरा मेरा वियोग संभव आत्मा परमात्मा का वियोग संभव नहीं और जीवात्मा का संसार से संयोग संभव नहीं बचपन के खिलौनों का संयोग कहां रहा बचपन के शरीर का संयोग कहां
[संगीत] रहा जो भी संयोग है वह सब टूट जाता है लेकिन परमात्मा के साथ नित्य योग है संसार के साथ संयोग और वियोग है ईश्वर के साथ नित्य योग है हमारा ईश्वर के साथ नित्य योग है संसार के साथ संयोग और वियोग जहां संयोग होगा वहां वियोग होगा अभी रोटी के साथ सहयोग करोगे कल इस समय तो उस रोटी से वियोग वो कहीं की कहीं पहुंच जाएगी लेकिन रोटी जिसकी सत्ता से स्वाद का पता चलता और पचती है उसका वियोग हुआ क्या नहीं होगा है वाह प्रभु है [प्रशंसा] दीन दयाल बरद संभारी हर नाथ मम
संकट भारी संकट यही है नहीं ऐसा नहीं बोलो नारेबाजी छोड़ो बात समझो मेरी जय बोलते तो मुझे अच्छा नहीं लगता मैं आपकी जय देखना चाहता हूं मुझे अपना काम करने में विघ्न मत डालो क हनुमंत बिपति प्रभु सोई जब तब भजन सुमर न होई पति की वही वेला वही काला समय कि तेरे शाश्वत की स्मृति छोड़कर अनश्वर को चाहने लगे तो वही विपत्ति [संगीत] है अनश्वर हूं जानता सत चित आनंद स्थिति में जीने लगू होए परमानंद अपने आत्म स्थिति में जीने लगे बस जिसको छोड़ नहीं सकते उस स्थिति में जीने लगे जिसको रख नहीं सकते
उसका परहित के लिए उपयोग कर ले बस हो गया कोई कठिन है क्या जिस शरीर को धन को रख नहीं सकते उसको ठीक जगह पर धर्म अनुकूल यथा योग्य सेवा में लगा डॉक्टर की डॉक्टरी अपने लिए नहीं होती मरीजों के लिए होती है मास्टर की मास्टरी अपने लिए नहीं होती विद्यार्थी के लिए होती है सेठ का सेठ पना अपने लिए नहीं होता समाज के लिए परिवार के लिए होता है नेता का अपने लिए नहीं होता लोगों के लिए होता तो शरीर तो संसार से मिला संसार के हित में लगा दे और अपने शरीर से गलती
से कुकर्म से बचा दे अपने को और भगवान का स्मरण प्रीति कर बस हो जाएगा काम एक घड़ी आधी घड़ी वो वेला अमृत वेला है जिस समय हम सत्य स्वरूप ईश्वर के बारे सुनते हैं सोचते चार अमृत वेला होती है सूर्योदय से सवा दो घंटे पहले से एक अमृत वेला शुरू होती है डेढ़ मरत डेढ़ घंटे का एक मरत सवा दो घंटे दूसरी अमृत वेला होती है जब आप भगवान का चिंतन ध्यान करते तीसरी अमृतवेला होती कि अमर स्वरूप ईश्वर को पाए हुए महापुरुष के दर्शन हो वह घड़ी अमृतवेला मानी जाती और चौथी के उनके
अनुभव के वचन जब सुनते तो वह अमृत वेला होती है अभी चार अमृत वेला नहीं तो तीन अमृत वेला एक साथ मिली ध्यान भजन भी हो रहा है सुमर भी हो रहा है सत्संग भी हो रहा है दीदार बाजी हरि रा जी नारायण नारायण नारायण वृंदावन में हरि बाबा उड़िया बाबा आनंदमय मां इंद्रा की गुरु हाथी बाबा यह समकालीन संत थे उन बाबाओं के चरणों में भक्त बैठे थे बाबा भगवान के लिए तड़फ नहीं होती तो क्या करें बाबा ने कहा भगवान के लिए तड़फ नहीं होती तो रो कि भगवान आपके लिए तड़फ नहीं होती
नश्वर रुपए पैसों के लिए तड़पता है लोभी और अहंकारी कुर्सी के लिए तड़पता है मोही परिवार के लिए तड़पता है चटोरा व्यंजन के लिए तड़पता है कामी कामिनी के लिए तड़पता है तो तुम भगवान के लिए तड़प अगर तड़प नहीं होती तो यह नीच अंगों के साथ एकता वाली तड़प तो तुमको कई जन्मों तक तड़पाएगी ये मैंने मिलाया शब्द उन बाबाओं की वाणी में मुझे मिलाने का अधिकार है आपकी सूझबूझ और भूख बढ़ाने के लिए तो बोले फिर बाबा तड़प होती नहीं बोले तड़प नहीं होती तो रो बोले बाबा रोना भी नहीं आता अरे रोना
नहीं आता तो इसलिए रो के रोना भी नहीं आता बोले बाबा इसलिए भी रोना अरे बोले चलो झूठ मूठ में रोते हैं बाबा भी तैयार हो गए रोने को हे ईश्वर अभी तक तू नहीं मिला इतना खाया इतना घूमे बचपन में इतना रोए लेकिन तेरे लिए रोना नहीं आता ऐसा करके रो बाबा रोना नहीं आता बोले चलो झूठ मूठ में रोते हैं तो साने चालू कर दिया झूठ मुठ में तो आज कलयुग में सब आसान है झूठ मूठ में रोने लगे तो एक को सचमुच में रोना आ गया और एक का संक्रामक भगवान की तड़फ
का रोना जैसे संक्रामक रोग पकड़ लेते हैं ऐसे ही एक आधे व्यक्ति की तड़प वातावरण में दूसरे को भी भगवान के तरफ बढ़ाने में सहायक हो जाती है इसीलिए कहा होगा नानक जी ने कि साद जना मिल हर जस गाइए संत के साथ मिलकर हरि का जस गाइए ताकि वह अनुभव को छूकर आती तड़फ तड़पाई वाणी का धन जिस हृदय में छुपाए वहां से कभी छूकर आएगी तड़फ तो आपको भी कुछ अंश में मिल जाएगी और बढ़ाते रहिए जब ही नाम हृदय धरयो भयो पाप को नाश जैसे चिन गीर आग की पड़े पुराने गास भगवान
का नाम और तड़फ की चिनगारी मिले और आप थोड़ा फकते रहिए घास चाहे 10 किलो हो 100 हज टन हो जल जाएगा वासना और कर्म चाहे कितने भी गंदे हो क्या हो बस आप भगवान को पाने का इरादा बना लीजिए नहीं बनता है तो झूठ मूठ में कि हमें तो शाश्वत सुख चाहिए हमें तो शाश्वत ज्ञान चाहिए और हमें तो ऐसा मित्र चा कि मरने के बाद भी हमारा साथ ना छोड़े और जब चाहे जब पुकारे तो हमारी सहायता करें ऐसा मित्र चाहिए और सहायता करने को फिर हमने तुझे बचाया और सहायता की ऐसा कभी
हमको हीन ग्रंथि में धके ले नहीं संसार के मित्र तो कहेंगे कि अबे मैंने यह यह किया लेकिन वह परम मित्र सुदम सर्व भूता नाम प्राणी मात्र का में सुहृद हू ऐसे सुद वास्तव में आपके परम मित्र हैं मैं नहीं कहूं तभी भी वे आपके हमारे भगवान ही परम मित्र है भगवान ही परम हितेश है अगर उनकी सत्ता स्पूर्ति ना हो तो आपके मित्र आपको मुर्दा समझ के जला डालेंगे आपके पति-पत्नी आपके काबिल नहीं रहेंगे उस परम मित्र की चेतना से ही आप देखते बोलते सुनते हो और यह सब साधन नष्ट हो जाने के बाद
भी परम मित्र और आपका जैसे बाग और कांटे का योग नहीं होता सिक्के के दो पहलुओं का वियोग नहीं होता ऐसे जीवात्मा परमात्मा का वियोग नहीं होता नुक्ते की हेर फेर में खुदा से जुदा हुआ नुक्ता अगर ऊपर रख दे तो जुदा से खुदा हुआ सिंधी बोली लिपि में और उर्दू लिपि में आप जुदा लिखो तो नुक्ता नीचे लगेगा अक्षर वही के वही अगर खुदा लिखते हो तो वो नीचे वाला नुक्ता हटाकर ऊपर रख दिया तो खुदा हो जाएगा ऐसे जब हम शरीर को मैं मानते हैं और संसार से सुखी होने की बेवकूफी करते हैं
तो हम जुदा हो गए तुच्छ जीव हो गए शरीर मैं नहीं और संसार मेरा नहीं लेकिन जिसकी सत्ता से चल रहा है वही चैतन्य मैं हूं और वही चैतन्य व्यापक ब्रह्म मेरा है तो आपका नुक्ता ऊपर आ गया बस इतना ही साक्षात्कार है आसुध सुद दो विवस संवत वि स कीस मध्यान ढाई मिला ई से फिर जागृत आया गया सुसुप्त गहरी नींद आई गई और स्वपना आया गया लेकिन उसको जानने वाला कभी गया क्या मैं बचपन की जागृत स्वप्ना सुषुप्ति आया गया जवानी की जागृत स्वप्न सुषुप्ति आया गया अभी की जागृत स्वप्न सुषुप्ति आया गया
उसको जानने वाला जो नहीं गया वो मैं कौन हूं बस उसको पहचान ले तो हो गया साक्षात्कार और इतना आनंद इतनी व्यापकता इतनी अनुभूति और इतनी दिव्यता कि इंद्र का पद भी बोना हो जाता है तो बचपन में कफ की प्रधानता जवानी में पित्त की और बुढ़ापे में वायु की ऐसे सुबह कफ दोपहर को पित्त और शाम को वायु रात को शुरुआत में कफ मध्यरात्रि को पित्त और प्रभात में वाय भोजन के पहले कफ की प्रधानता होती है भोजन के मध्य में पित्त जोर मारता है और भोजन के अंत में वायु अपना रंग जमाता ओ
डकार आती कितना थोड़े शब्दों में सुंदर कह दिया उसी प्रकार सृष्टि के जो मूल तत्त्वों को जिन्होंने जाना है उन्होंने जो आयुर्वेदिक खोज की वो अभी दुनिया में अपना शुभ संकल्प फैलाकर सज्जनों को निरोग और भक्ति के तरफ लगाने का उस का संकल्प कैसा व्याप्त हो रहा है भारतवासियों का यह सौभाग्य है कि वे अवतार हिंदुस्तान में हुए चाहे धनवंतरी महाराज हो चाहे सुश्रुत हो चाहे और कई महापुरुष यह भारत भूमि भोग भोग कर नरक या स्वर्ग में भटकाने के लिए नहीं है इस भोग का उपयोग करके परमात्मा को पाने में है परमात्मा से प्रेम
करने का नाम भक्ति है परमात्मा को जानने का नाम ज्ञान है जय राम जी और परमात्मा के निमित्त सेवा करने का नाम कर्मयोग है राजे महाराजे राज पाठ छोड़कर राजा भरत ऋ उज्जैनी का गोरखनाथ के सत्संग में गए और गोरखनाथ ने परम सुख की युक्ति बता दी और भरतरी ने व पा लिया तो भरतरी ने फिर लेख लिखा जब स्वच्छ सत्संग किनो तभी कछु चन क्या नयो बोले मुड जान आपको मैं बेवकूफ था मैं बड़ा राजा हूं भीड़ भर में नहीं जाता हूं मेरे को च डुलाने वाले इधर आते हैं मेरा क्या किसी से लेना
देना यह मेरी बेवकूफी थी जब स्वच्छ सत्संग मिला तभी कुछ कुछ जाना कि मैं बेवकूफ था मुड जानो आपको हरयो भरम ताप को सच्चा सुख तो अभी मिला है सच्चे जीवन की खबर तो अभी पड़ी मरने के बाद भी हम रहते हैं और वह ज्ञान स्वरूप है चेतन स्वरूप है अमर है और उसी के सत्ता से सारी सृष्टि का व्यवहार होता है और सृष्टि नाश हो जाती फिर भी वह अविनाशी भरपूर है सृष्टि प्रलय हो जाती तो परमात्मा रहता और शरीर मर जाता है तो आत्मा रहता है तो आत्मा परमात्मा सजाती हैं एक जात के
और शरीर और संसार सजाती है शरीर भी बदलता है मरता है संसार की चीज भी नष्ट होती बदलती तो यह सब सत्संग से दिव्य विचार मिलते हैं दिव्य सूझबूझ मिलती है और दिव्य सुख के द्वार खुलते हैं इसीलिए भैया शास्त्र कहते हैं शतम वि आय कर्म कर लो कोटि तक्वा हरि भजे करोड़ काम छोड़कर हरि का ज्ञान भर ले हरि का ध्यान धर ले तो वास्तविक आत्मा का अमर उजाला पाकर मुक्त आत्मा हो जाओगे महान आत्मा हो जाओगे तृप्त आत्मा हो जाओगे सततो भवती स अमृतो भवती सती लोकांता आपकी समस्याएं तो छू हो जाएगी दूसरों
की समस्या छू करने की तुम्हारी ईश्वरी शक्ति जागृत हो जाएगी और जगत में कैसे रहना और निप रहना यह सत्संग के बिना नहीं मिलता भगवान कृष्ण जिसका रथ खींच रहे हैं वह अर्जुन सत्संग के बिना किम कर्तव्य मूड होकर दुखी हो रहा है नास्ति बुद्धि आयुक्त स्य नाच अयु क्त भावना नच भाव यात शांति अशांत स्य कुत सुखम जिसके मन इंद्रिया संयमित नहीं है और ऐसे मनुष्य ही व्यवसाय आत्मिका बुद्धि नहीं है अव्व आत्मिका बुद्धि है तो व अशांत रहता है जिसकी व्यवसाय आत्मिका बुद्धि हो गई ठीक निर्णय और ठीक समझ हो गई उसको परम
शांति मिलती है और उसको शाश्वत सुख की प्राप्ति होती है नहीं तो यह मिले तो सुखी ऐसा करूं तो सुखी ऐसा करू तो सुखी आखिर सब छोड़कर मर जाते बोले संसार में कोई सुख नहीं सुख था लेकिन लाला जहां था वो सत्संग में तुम गए नहीं सत्संग मिला तो व साधन में तुमने किया नहीं साधन किया तो दृढ़ इच्छा शक्ति से लगे नहीं इसलिए बीच में झोके खा रहे हो सत्संगी से तो वह लोग घाटे में जो सत्संग में नहीं आते और सत्संगी भी कुछ तो ऊंचे उठते हैं लेन इच्छा शक्ति कमजोर होने के कारण
फिर उनकी अधूरी यात्रा दूसरे जन्म में पूरी हो जाती है और स्वर्ग आदि सुख उनको मुफत में सहज में मिलता [प्रशंसा] [संगीत] है जय सियाराम जयराम [संगीत] जय जय सियाराम जय सियाराम जय जय सियाराम हरि हरि ओ ह ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम मुनि मनोरंजन भव भय भंजन हरि हरि ओम कलि मलरण भव जगतारण हरि हरि ह ओम ओम प्रेम से बोलो प्यारा नाम हरि हरि ओम ओ दिल से बोलो दुल्हारा नाम हरि हरि ओम ओम कली का किनारा नाम हरि हरि ओम ओ पतित पावन नाम हरि हरि ओम ओम ब्रह्मा धय नारद
गाए ह हरि ओ ओ मेवाड़ में भीरा बोले ह ओ हरि ओ हरि ओम हरि ओम हरि [संगीत] ओम बंड बज रही है अ शादी हो रही जीवात्मा परमात्मा की बैंड बजा रहे बैंड बज रही [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [संगीत] बैंड शादी मना शादा बा वित राग भया शोका राग व्यतीत हो गया भय व्यतीत हो गया शोक व्यतीत हो [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] गया ओ हरि ओम हरि ओम हरि ओम मंगल मंगल ना हरि हरि ओम मधुर मधुर नाम हरि हरि ओम ओम पतित पावन नाम हरि हरि ओम दिलो का द रा
नाम हरि हरि ओ काली का किनारा नाम हरि हरि ओम ओम भारत भर में गुंजा न हरि हरि ओम विश्व भर में साधक गाए हरि हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरियो [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] आनंद है माधुर्य [प्रशंसा] [संगीत] है हरे हरे [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] आज रे आनंद भयो मारा प्रभु जी आया पाना [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] हरि बोल [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] प्रभु तेरी जय हो गुरुदेव तुम्हारी जय हो आत्मदेव तुम्हारी जय हो हरि ओम ओ ओ ओ आगे नहीं आना
ओओ ओ ओ ओ ओ आनंद ओम ओम ओम ओ ओम आरोग्य ओम ओम ओम ओ ओ ओ बैठ [प्रशंसा] जा शक्ति हरि ओम ओम ओम भक्ति हरि ओम ओम ओम विकारों से मुक्ति हरि ओम ओम प्रभु से प्रीति ओम ओम [प्रशंसा] ओम आ