इंडिया में हर रोज सुबह लाखों शटर उठते हैं। ग्वालियर से लेकर मुंबई तक हर दुकान, हर फैक्ट्री एक इंसान बैठा है जो पूरी जिंदगी सर्वाइवल की जंग लड़ रहा है। सुबह खरीदो, शाम को बेचो, बीच का मार्जिन बस वही जिंदगी। इसी भीड़ में से कुछ लोग ऐसे निकले जिनके 12th में सिर्फ 55% मार्क्स आए थे। जिनको लोग बोलते थे, "बेटा मामा की दुकान पर बैठना पड़ेगा।" और उन्होंने Fogg बनाया, Moov बनाया, हजारों करोड़ का एंपायर खड़ा कर दिया। आज की वीडियो कोई मोटिवेशन नहीं है। बिजनेस का ऑडिट है। आज हम बात करेंगे डेटा की, कैलकुलेशंस
की। हम डिकोड करेंगे कि कैसे एक ₹40 की दही का डब्बा 10,000 करोड़ का धंधा बन सकता है। हम देखेंगे कैसे एक ब्रोकन हील, फटी एड़ी की प्रॉब्लम सॉल्व करके Paras Pharmaceuticals ने मार्केट पर कब्जा कर लिया था। अगर आप चाहते हो कि आपका धंधा आपके बिना चले, अगर आप चाहते हो कि आपका प्रोडक्ट कमोडिटी से बनके ब्रांड बन जाए, तो यह मास्टर क्लास आप ही के लिए है। अगर आप स्टार्टअप हैं और एसएमई हैं जो 10,000 करोड़ का सपना देख रहे हो, तो सेवन स्टेप फ्रेमवर्क और मैसिव एक्शन प्लान बताऊंगा जो कोई भी ब्रांडिंग
एजेंसी 1 करोड़ से ऊपर लेकर बताती है भाई। इसलिए नोटबुक ले आओ, कैलकुलेटर निकाल लो क्योंकि आज हम धंधे के डीएनए को बदलने वाले हैं। [संगीत] देखिए, शुरुआत करते हैं फाउंडेशन से। नाम। बहुत लोग सोचते हैं, "नाम में क्या रखा है भाई?" "प्रोडक्ट अच्छा है तो बिक ही जाएगा।" गलत। यहां पर ब्रांडिंग एक्सपर्ट्स कहते हैं कि अगर आपका नाम कंज्यूमर के दिमाग में रजिस्टर नहीं हुआ ना, तो आप मार्केटिंग पर 10 गुना ज्यादा खर्च करोगे सेम रिजल्ट लाने के लिए। यहां चार साइंटिफिक फ्रेमवर्क्स हैं नाम रखने के लिए। सबसे पहला फ्रेमवर्क है द कॉमन यूसेज
कॉम्बो। सबसे आसान तरीका क्या है? ऐसे शब्दों को उठाओ जो आपका कस्टमर ऑलरेडी रोजाना बोलता है। उन्हें कंबाइन कर दो। जब आप नए वर्ड्स इन्वेंट कर रहे हो, तो कस्टमर का दिमाग प्रोसेस करने में एनर्जी लगाता है। पर जब आप कॉमन वर्ड्स यूज करते हो, तो ट्रस्ट इंस्टेंटली बन जाता है। कुछ एग्जांपल्स देता हूं। अगर आपको ट्रिप प्लान करना है तो मेक माय ट्रिप। तीन कॉमन वर्ड्स, क्लियर मीनिंग। शो देखना है? बुक माय शो। पॉलिसी लेनी है? पॉलिसी का बाजार, पॉलिसी बाजार। अब आते हैं सेकंड फ्रेमवर्क पे, द कैटेगरी ओनर। ऐसा नाम रखो कि कैटेगरी
ही आपकी हो जाए। बताता हूं, shaadi.com। इससे क्लियर कुछ हो सकता है क्या? डॉट कॉम बूम के टाइम जब लोग अजीब नाम रख रहे थे, अनुपम मित्तल ने सीधा कैटेगरी का नाम पकड़ लिया और वही नाम से कंपनी बना ली। Housing.com। यह नाम सुनते ही दिमाग में सवाल नहीं आता कि भाई यहां पे होगा क्या? मैं क्या ढूंढूंगा? सीधा धंधा समझ आ जाता है। ऐसे ही और भी नाम है। BharatPe, यानी कि भारत जो है वह पे करेगा। PhonePe, फोन से पे करोगे। Paytm, यानी कि पे थ्रू मोबाइल। तो यह भी एक फ्रेमवर्क है। फ्रेमवर्क,
द फॉरेन इमोशन। देसी फीलिंग, देसी नाम। कभी-कभी ना हमारे इमोशंस हमारे लोकल लैंग्वेज में प्रीमियम नहीं लगते। इसीलिए राज समानी ने अपना ब्रांड बनाया किचन अप्लायंसेज का। तो प्रॉब्लम क्या थी? वह चाहते थे कि कस्टमर्स फील करें कि हम आपकी केयर करते हैं। अब अगर ब्रांड नेम का नाम देखभाल रख देते, तो भाई किचन में प्रीमियमनेस नहीं आती ना। और केयर वर्ड तो मिलना इंपॉसिबल है। तो सॉल्यूशन क्या है? उन्होंने लैटिन डिक्शनरी खोली और लैटिन में केयर को बोलते हैं क्यूरा। तो ब्रांड नेम क्या बन गया? क्यूरा। सुनने में प्रीमियम भी लगता है और मीनिंग
में केयर भी आता है। यह है स्मार्ट नेमिंग। क्लासिक एग्जांपल देता हूं, Nike। Nike क्या है? ग्रीक गॉडेस ऑफ विक्ट्री। सेकंड नाम है Amazon, दुनिया की सबसे बड़ी रिवर, यानी कि दुनिया की सबसे बड़ी दुकान बन जाती। तो यह फ्रेमवर्क यूज होता है जब आप नाम को इंटरनैशनलाइज कर देते हो। अब अगला फोर्थ फ्रेमवर्क बताता हूं, कॉइन वर्ड्स, यानी कि नए-नए वर्ड प्ले करिए। अगर आपको वर्ड नहीं मिल रहा है ना, तो वर्ड को थोड़ा सा ट्विस्ट कर सकते हो। Zomato, Tomato, टी को जेड से रिप्लेस कर दिया। साउंड वही है, वर्ड नया बन गया।
लिशियस, डिलीशियस में से डी हटा दिया, लिशियस बन गया। अब एक मजेदार कहानी बताता हूं। द आईपॉड इंटर्न स्ट्रेटजी। आपको लगता है BookMyShow का नाम किसी बड़ी एजेंसी ने रखा होगा ना? की फीस लगी होगी। नहीं, एक इंजीनियरिंग इंटर्न ने रखा था। कंपनी ने एक इंटरनल कॉन्टेस्ट चलाया। जो नाम लाएगा, उसको ना आईपॉड शफल मिल जाएगा। कहा, BookMyShow। फाउंडर को पसंद आ गया। हजारों करोड़ की ब्रांड का नाम एक आईपॉड की कॉन्टेस्ट पर मिला। आइडिया सिर्फ बोर्ड रूम की जागीर नहीं है। कहीं से भी आ सकते हैं। लोएस्ट लेवल से लेके हाईएस्ट लेवल तक। तो
गाइस, अब आते हैं सबसे क्रिटिकल पार्ट पर। पैसा, ग्रोथ, मार्केट साइज। बहुत एंटरप्रेन्योर्स गलती करते हैं। वो सोचते हैं, मैं दूध बेचूंगा क्योंकि दूध सब पीते हैं। ये एक बहुत बड़ा ट्रैप बन जाता है। है, वहां मार्जिन भी नहीं मिलेगा। जैसे कि Amul, Mother Dairy, आपको कुचल देंगे। हमें सीखना होगा Epigamia से। के नाक के नीचे से मार्केट कैसे बनाया, ये एक अपने आप में केस स्टडी है। सबसे पहले Epigamia ने द नो कंपटीशन ज़ोन ढूंढा। Epigamia दही बेचती तो फेल हो जाती। उन्होंने लॉन्च किया ग्रीक योगर्ट। 2015 से पहले इंडिया में ये कैटेगरी थी
ही नहीं। उन्होंने फर्स्ट मूवर एडवांटेज यहां पे ले लिया। क्या किया? उन्होंने इनसाइट समझा स्मॉल हंगर का। उन्होंने डेटा देखा। इंसान को दिन में छोटी भूख लगती है 4:00 बजे से लेके 6:00 बजे तक। अब ऑप्शंस क्या है? ऑयली है। बिस्किट्स, जिसमें शुगर है। चिप्स, जो अनहेल्दी है। उन्होंने पोजीशन किया हेल्दी स्नैक फॉर 4:00 पीएम हंगर। आहा, क्या डायरेक्ट इंपैक्ट है। थ्री, द 10,000 करोड़ कैलकुलेशन टोटल एड्रेसेबल मार्केट का। ध्यान से देखना ये कैलकुलेशन को। लोग कहते हैं, इंडिया बहुत प्राइस सेंसिटिव है। ₹40 की दही कौन खरीदेगा भाई? पे अगर आप मैथ लगाओ तो मजा
आ जाएगा। इंडिया की पॉपुलेशन कितनी है? 140 करोड़। हमें सब नहीं चाहिए। हमें सिर्फ टॉप 5% चाहिए। वो भी मेट्रो सिटीज में जो हेल्थ कॉन्शियस है। यानी आपकी ऑडियंस कितनी हो गई? 70 लाख लोग, 7 मिलियन। अगर ये 70 लाख लोग रोज एक कप लेने लग गए ₹40 का, तो इसको जरा मल्टीप्लाई करो। ये बन जाता है 28 करोड़ रुपीस पर डे। जी हां। और अगर आप इसको 365 से मल्टीप्लाई कर दो, तो बन जाता है 10,220 करोड़ का रेवेन्यू पोटेंशियल। स्टेटमेंट याद रखना। आपको 10,000 करोड़ की कंपनी बनाने के लिए पूरा इंडिया नहीं चाहिए।
आपको बस 5% लॉयल कस्टमर्स चाहिए जो आपका प्रोडक्ट रोज यूज करें। पे आता है स्टेप फोर, द ग्रोथ पिवट। जब ग्रीक योगर्ट चल गया, तो एक प्रॉब्लम आई। लोग जिम से निकलते थे, पर चम्मच नहीं होता था। कन्वीनियंस का इशू था। उन्होंने लॉन्च किए स्मूदीज, यानी कि ड्रिंकेबल योगर्ट। प्रॉब्लम सॉल्व हो गई। फिर उन्होंने देखा, ग्रीक [गला साफ़ करने की आवाज़] योगर्ट अभी भी नया है। लोग डरते हैं ट्राई करने से। पर मिल्कशेक ना सबको पता है। तो वो मिल्कशेक कैटेगरी में भी आ गए। ये एंट्री पॉइंट था ताकि लोग ब्रांड पर ट्रस्ट करें और
फिर योगर्ट ट्राई करें। अब इसमें आपके लिए क्या लेसन है? स्टार्ट विद अ नीश। से स्टार्ट करिए, ट्रस्ट को बिल्ड करिए और धीरे-धीरे मासी प्रोडक्ट्स पे पहुंचिए। जैसे एपिगामिया ने किया, पहले ग्रीक योगर्ट पे थे, उसके बाद चले गए मिल्कशेक पे। पहले उन्होंने नीश को आइडेंटिफाई किया और वहां से ट्रांसफर लेके चले गए एक मास प्रोडक्ट पे। तो दोस्तों, अगर अभी तक पसंद आ रही हो वीडियो तो लाइक जरूर करना। ऐसी केस स्टडीज ढूंढने में मेहनत बहुत लगती है। लेकिन अगर आप मास मार्केट में हो, कंपटीशन यूनिलीवर या प्रॉक्टर एंड गैंबल है, तब कैसे जीतोगे
भाई? यहां हम यूज करेंगे द इनएफिशिएंसी इनसाइट। इसमें सबसे पहली केस स्टडी है फॉग वर्सेस एक्स। आहा सबको याद आ गया। मार्केट में एक्स का राज था भाई राज। नैरेटिव था सेडक्शन। डियो लगाओ, लड़कियां खींची हुई चली आएंगी। [संगीत] याद तो होंगी ना वो सारी एडवरटाइजमेंट्स? पे आते हैं विनी कॉस्मेटिक्स के दर्शन भाई पटेल जिन्होंने ग्राउंड लेवल पे जा के रिसर्च करी। उन्होंने देखा कस्टमर खुश नहीं था। क्यों? ऐसा नहीं था कि लड़कियां नहीं आ रही थी। क्या थी कि बोतल बड़ी तो दिखती थी पर उसमें से गैस निकलती थी। जल्दी खत्म हो जाता था।
प्रॉब्लम स्मेल की नहीं थी, प्रॉब्लम वेस्टेज की थी। क्या थी? उन्होंने सेडक्शन को डिच किया और यूटिलिटी को पकड़ लिया। नो गैस, ओनली लिक्विड, 800 स्प्रेज गारंटीड। और एग्जीक्यूशन आहा एक टीवी ऐड चला। दो ग्लास लिए, कंपटीटर का स्प्रे किया, ग्लास आधा भरा। फॉग का स्प्रे किया, ग्लास पूरा भर गया। विजुअल प्रूफ दे दिया। और टैगलाइन क्या था? क्या चल रहा है जी? फॉग चल रहा है। भाई क्या चल रहा है? फॉग चल रहा है। क्या हुआ? आज फॉग मार्केट लीडर है क्योंकि उन्होंने साइकोलॉजिकल गैप नहीं, फंक्शनल गैप को भरा। अब यहीं आती है सेकंड
केस स्टडी, मूव वर्सेस आयोडेक्स। आयोडेक्स हर घर में था। आयोडेक्स का पोजीशन था सब दर्द का इलाज। हेडेक, बैक एक, स्प्रेन। पैकेजिंग ब्लैक और डार्क ब्लू थी। ग्रीसी, चिपचिपा था। दाग लग जाते थे। पे पारस फार्मा ने देखा कि सबसे बड़ा मार्केट का जो प्रॉब्लम है वो कमर दर्द है, बैक पेन है। ऑफिस वर्कर्स, हाउसवाइफ सबकी कमर दुखती है। उन्होंने मूव को पोजीशन किया। बैक पेन का स्पेशलिस्ट। अब लोगों की साइकोलॉजी, अगर मुझे कमर दर्द है ना तो मैं जनरल डॉक्टर यानी कि आयोडेक्स के पास क्यों जाऊं भाई? के पास जाऊंगा, मूव के पास जाऊंगा।
पैकेजिंग में उन्होंने गजब इनोवेशन करी। आयोडेक्स जो थी वो ग्लास की बोतल में थी, टूटने का डर था। मूव को उन्होंने ट्यूब में डाल दिया, मॉडर्न और ईजी। आयोडेक्स काले कलर का था, दाग लगता था। मूव उन्होंने व्हाइट कलर का क्रीम क्लीन कर दिया। रिजल्ट क्या हुआ? मूव ने आयोडेक्स की मोनोपोली को तोड़ दिया। ये था कि आप पैकेजिंग से और हाइपर नीश में जा के भी कैसे मार्केट को कैप्चर कर सकते हैं। और तीसरी मजेदार केस स्टडी है क्रैक क्रीम की। यह तो माइक्रो नीचे है। इनसाइड क्या था कि इंडिया एक चप्पल वेयरिंग नेशन
है। धूल मिट्टी लगती है। हिल्स फट जाती है। लोग बॉडी लोशन लगाते थे पर वह काम ही नहीं करता था क्योंकि वह एड़ियां फटने के लिए थोड़ी था। लोगों ने कहा फटी एड़ी के लिए अलग क्रीम कौन खरीदेगा भाई? पर दर्शन भाई ने कहा मार्केट छोटा लग रहा है पर प्रॉब्लम बहुत बड़ी। उन्होंने लॉन्च किया क्रैक के आर ए सी के। आज वह एक मोनोपोली प्रोडक्ट। स्टेटमेंट समझ लीजिए। 100 लोग सेम प्रॉब्लम देखते हैं। जो इंसान उस प्रॉब्लम के पीछे का क्यों पूछता है वही ब्रांड बनता है। दोस्तों अब हम बात करेंगे मॉडर्न टेक ब्रांड्स
की। ओला, उबर, जेप्टो, ब्लिंकिट। इनकी ग्रोथ का राज ना टेक्नोलॉजी नहीं है। इनका राज है इन्होंने फ्रिक्शन को रिड्यूस किया है। हैसल को खत्म किया है और इस बात का इन्हें हैसल प्रीमियम मिला। अब समझते हैं उबर ओला ने क्या किया है। सेलिंग सर्टेनिटी। टैक्सी बुलानी पड़ती थी। पता नहीं था कब आएगी। बार-बार वॉच देखते रहते थे। एंजाइटी होती थी। उबर ने क्या किया मैप पर गाड़ी दिखा दी। अराइविंग इन 4 मिनट्स बता दिया। वेट टाइम कम नहीं हुआ पर एंजाइटी खत्म हो गई। यह साइकोलॉजिकल ट्रिगर है। आपने अनसर्टेनिटी को सर्टेनिटी में बदल दिया। अब
आते हैं रैपिडो में। रैपिडो ने एक स्टेप और आगे लिया। उन्होंने ओटीपी प्रॉब्लम को सॉल्व किया। ओला और उबर में हर बार नया ओटीपी बताना पड़ता है। फोन निकालो, अनलॉक करो, फिर इरिटेट होता है आदमी। अब इसका फिक्स क्या है? रैपिडो ने स्टैटिक ओटीपी कर दिया। कभी चेंज ही नहीं होगा और आप कभी भूलोगे ही नहीं। फंक्शनल बेनिफिट है। फोन नहीं निकालना पड़ता अब जेब से। इमोशनल बेनिफिट क्या है? पीस ऑफ माइंड मिलता है। इतनी छोटी चीज कस्टमर रिटेंशन बढ़ा सकती है। अब आते हैं जेप्टो पे। डिफाइनिंग स्पीड। जेप्टो का नाम कहां से आया पता
है? जेप्टो सेकंड से। टाइम का सबसे छोटा यूनिट। फाउंडर ने सोचा मुझे स्पीड का सिनोनिम बनना है। उन्होंने ब्रांड एंबेसडर किसको लिया? जसप्रीत बुमराह को। मैसेज क्या था? बुमराह की बॉल की स्पीड जेप्टो की डिलीवरी स्पीड की तरह होगी। उन्होंने क्विक कॉमर्स कैटेगरी क्रिएट की। पहले हम हफ्ते की ग्रोसरी प्लान करते थे। जेप्टो ने हमें इंपल्स बाइंग सिखा दी। अभी चाय पीनी है? दूध खत्म है? 10 मिनट में ले लो। भाई, अभी बिस्किट खाने का मन कर रहा है? 10 मिनट में ले लो। अरे भाई, 8:00 बज गए हैं। सोडा भूल गए हो? 10 मिनट
में बुला लो। सारी प्रॉब्लम को सॉल्व कर दिया। हैं जोमैटो पे। द इकोसिस्टम मोट। जोमैटो सिर्फ डिलीवरी ऐप नहीं है भाई। उन्होंने हाइपरप्योर बनाया जो बी टू बी वर्टिकल है। वो रेस्टोरेंट्स को सब्जी और रॉ मटेरियल बेचते हैं। वही सप्लाई चेन ब्लिंकिट यूज करता है ग्रोसरीज के लिए। इन्होंने डेटा और सप्लाई चेन का ऐसा जाल बनाया है कि कोई नया प्लेयर इसमें इजीली घुस ही नहीं सकता। ये जो टेक्नोलॉजी कंपनीज हैं ना, इन्होंने इस तरीके से हमारी लाइफ में से हैसल निकाला है कि आज हम इनके बिना जी नहीं सकते। अब आते हैं पैसे की
खनखन पे। जी हां, जिंगल्स। जिंगल्स एक बहुत इंपॉर्टेंट पार्ट रहा है हमारी ओल्ड टेलीविजन एड्स का। Parle G इंडिया का सबसे बड़ा बिस्किट ब्रांड है। पिलर्स पर अपना एंपायर बनाया था। अफोर्डेबिलिटी। टियर वन सिटी से लेके टियर थ्री के गांव तक प्राइस सेम, टेस्ट सेम। था डिस्ट्रीब्यूशन। Parle का पैकेट वहां मिलता था जहां शायद सड़क भी नहीं होती थी। और तीसरा था साउंड की ब्रांडिंग। सबसे पावरफुल। टेक्स्ट नहीं, ट्यून्स बेची है। अब एक-एक ट्यून मैं आपके साथ शेयर करूंगा। आपको कमेंट सेक्शन में उसको कंप्लीट करना है। मैंगो फ्रूटी। [संगीत] मेलोडी इतनी चॉकलेटी क्यों है सर?
स्वाद भरे, शक्ति भरे Parle G सारे और भी ब्रांड्स ने यूज किया है। वो भी आपको एग्जांपल्स देता हूं। अटर्ली बटर्ली ऑलवेज लवली। कौन सा ब्रांड है? [संगीत] डिलीशियस। अमूल। हो जाए, हर पल मुस्कुराए। [संगीत] कुछ मीठा हो जाए। कैडबरी डेयरी मिल्क। जया और सुषमा। सबकी पसंद निरमा। जोड़ है। नहीं। हर समय, हर जगह आपके साथ। [संगीत] कर्रम कुर्रम कुर्रम कर्रम मजेदार, लज्जतदार, [गाना गाने की आवाज़] स्वाद स्वाद में लज्जत लज्जत पापड़। विक्स की गोली लो। करो। [गहरी सांस लेने की आवाज़] अरे यह तो है देश की धड़कन। देश की धड़कन। मैन रेमंड, द कंप्लीट
मैन। अरे भाई, आपने तो सारे ब्रांड्स राइट आईडेंटिफाई करें। यह लाइंस 20 साल पुरानी जरूर है, पर आज भी हमारे मन के अंदर ताजा है। क्यों? क्योंकि म्यूजिक को याद रखना टेक्स्ट को याद रखने से बहुत आसान होता है। पार्ले ने कैटेगरी को ब्रांड से रिप्लेस कर दिया। लोग दुकान पर जाकर पानी नहीं मांगते हैं, बिसलेरी मांगते हैं। अगर आप चाहते हो आपका ब्रांड अमर हो जाए, तो उसको एक साउंड की तरह बना दो। पर आज की मॉडर्न डे का क्या? चलते हैं क्रिएटर ब्रांड्स। आइए उनके बारे में समझते हैं। में फेसलेस कंपनीज नहीं चलती।
लोग टेस्ला नहीं खरीदते, वह इलोन मस्क पर बेट लगाते हैं। लोग लेंसकार्ट पर ट्रस्ट करते हैं क्योंकि पीयूष बंसल ने अपनी स्टोरी सुनाई। अगर आप भुवन बाम की बात करें, तो कॉमेडी मार्केट बहुत क्राउडेड था, जसपाल भट्टी के टाइम से। भुवन ने क्या किया? सिर्फ एक फोन और 19 कैरेक्टर्स। खुद ही बाप, खुद ही बेटा, खुद ही टीटू मामा। उन्होंने कंटेंट नहीं बनाया, उन्होंने यूनिवर्स बना दिया। यह थी उनकी डिफरेंशिएशन। अब हम बात करें अंडर नीट की, कुशा कपिला। उन्होंने अभी रिसेंटली ₹54 करोड़ रेस किए हैं और उनका ब्रांड ऑलरेडी एक साल के अंदर ₹150
करोड़ एनुअल सेल्स की रन रेट पर आ चुका है। कैसे? पावर ऑफ पर्सनल ब्रांडिंग। और यह होती है द कैटरपिलर वर्सेस बटरफ्लाई थ्योरी। लोग आपकी सक्सेस यानी बटरफ्लाई को तो देखते हैं, पर कनेक्ट आपकी स्ट्रगल से करते हैं, आपके कैटरपिलर से करते हैं। अगर आप बिजनेसमैन हो, तो अपनी फैक्ट्री दिखाओ कि वह कैसे चलती है, बिहाइंड द सीन्स दिखाओ। दिखाओ जब आपका पहला ऑर्डर रिजेक्ट हुआ था, तो आपको कैसा फील हुआ था। अपनी वल्नरेबिलिटी को दुनिया के साथ शेयर करो क्योंकि सब ऐसी स्टोरीज के साथ कनेक्ट करते हैं। और फाइनली जब आप कंटेंट प्लान बना
रहे हो तो 10 साल का माइंडसेट रखना होता है। तब आप सोचते हो मुझे फर्क नहीं पड़ता आज 100 व्यू मिले या 1 मिलियन व्यू मिले। मैं 10 साल के लिए ये गेम खेल रहा हूं। अगर आप सोशल मीडिया पर वायरल होने के लिए आए हो तो कल ही गायब हो जाओगे। और अगर आप वैल्यू रिपोजिटरी बनने आए हो तो अगले 10 साल तक राज करोगे। तो गाइस फाइनली ये था जीरो से 10,000 करोड़ का रोड मैप। अब बारी है एग्जीक्यूशन की। था मैं आपको सेवन स्टेप एक्शन प्लान दूंगा। तो सबसे पहला स्टेप है ऑडिट
योर नेम। क्या ये कॉमन वर्ड्स का कॉम्बो है? मेक माय ट्रिप स्टाइल का? या ये एक फॉरेन इमोशन है क्यूरा स्टाइल का? अगर नहीं तो रीब्रांड करने से डरिए मत। कोई प्रॉब्लम नहीं है। बहुत सारे कंपनीज ने अपने आप को बीच-बीच में रीब्रांड किया है। सेकंड, फाइंड द वाय। सिर्फ पैसा मत सोचो। दर्शन भाई का पर्पस था अफोर्डेबल प्रोडक्ट्स। एपिगामिया का था हेल्दी स्नैकिंग। आपका क्या है? मुझे कमेंट सेक्शन में बताना। स्पॉट द गैप। क्या कहीं मार्केट में गैप तो नहीं भरी हुई पुराने डियोज के जैसे? क्या लोगों की एड़ियां फट तो नहीं रही हैं?
ऑब्जर्वेशन को बढ़ाओ। छोटी-छोटी चीजों को नोटिस करो। अगली चीज है कैलकुलेट टोटल एड्रेसेबल मार्केट साइज। डरो मत अगर मार्केट छोटा लगे तो। सिर्फ 5% लॉयल लोग भी आपको 10,000 करोड़ रुपए दे सकते हैं। जैसे एपिगामिया के केस में था। अगला पॉइंट है फ्रिक्शन को हटा दो कस्टमर की लाइफ से। जिंदगी से वेट और प्रोसेस को हटा दो। हैसल्स को निकाल दो जैसे Uber और Rapido ने किया है। आप उनके पसंदीदा ब्रांड बन जाओगे। क्रिएट अ साउंड। अपने ब्रांड की जिंगल या टैगलाइन आज ही सोच लो। अगर सोच ली है तो मुझे कमेंट सेक्शन में बता
दो। और फाइनली नहीं पर्सनल ब्रांड बन जाओ। कैमरा उठाओ। अपनी कहानी सुनाओ। लोगों तक पहुंचाओ ताकि लोग सिर्फ आपके प्रोडक्ट के साथ नहीं आपकी स्टोरी के साथ भी रिलेट करें। ये थी एक कंप्लीट केस स्टडी कि किस तरीके से आप हमारा भारतीय स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइज और एक एंटरप्रेन्योर एक 10,000 करोड़ का मल्टी बिलियन डॉलर ब्रांड क्रिएट कर सकता है। आपको कौन सी छोटी सी प्रॉब्लम सॉल्व कर रहे हो, मुझे कमेंट सेक्शन में जरूर बताना। वीडियो कैसी लगी हो, उसके बारे में मुझे कमेंट करना। पसंद आई है तो लाइक करना। सारे व्यापारियों के साथ, एंटरप्रेन्योरस
के साथ, वो एंटरप्रेन्योर के साथ, जो भी बिजनेस कर रहा है, उसके साथ शेयर जरूर करना। आई एम श्योर एट लीस्ट एक चीज उनके लाइफ में बहुत काम आएगी। आपके लिए सबसे इंपॉर्टेंट लर्निंग क्या थी? कमेंट सेक्शन में बताना। दिस इज संजय कथूरिया साइनिंग ऑफ टिल द नेक्स्ट वीडियो। भारत।