हेलो दोस्तों, स्वागत है आपका बुक लिसनर्स पर। आज की वीडियो में हम जानेंगे उस किताब के बारे में जो आपको सिखाएगी कि करोड़पति नहीं अरबपति की तरह कैसे सोचा जाता है। जी हां, हम बात कर रहे हैं थिंक लाइक अ बिलियनियर की। इस किताब में आपको सीखने को मिलेगा अरबपति बनने के पीछे की सोच, रियलस्टेट में स्मार्ट इन्वेस्टमेंट के तरीके, टाइम और अटेंशन को पैसे से ज्यादा वैलुएबल मानने का नजरिया और वो बिलियनियर हैबिट्स जो आपकी जिंदगी की डायरेक्शन बदल सकती हैं। तो चलिए शुरू करते हैं और जानते हैं कि एक बिलिनेयर आखिर सोचता कैसे
है। चैप्टर वन थिंक लाइक अ बिलियनियर। जरा एक पल के लिए अपनी आंखें बंद करो और सोचो कि अगर तुम्हारे पास करोड़ों नहीं अरबों रुपए होते तो तुम क्या करते? शायद एक बड़ा सा बंगला, एक चमचमाती गाड़ी या फिर दुनिया की सैर है ना? लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जो असली अरबपति होते हैं, वह इन चीजों से पहले कैसे सोचते हैं? सच्चाई यह है कि अरबों की संपत्ति बनाने से पहले उन्हें अरबपति सोचना आता है। यही पहला कदम है। माइंडसेट इमेजिन करो दो लोग हैं। दोनों ही एक जैसे परिवार से, एक जैसे शहर
से और लगभग एक जैसे हालात से आते हैं। एक आज भी किराए के घर में रहता है और दूसरा अपनी खुद की कई बिल्डिंग्स का मालिक बन चुका है। फर्क सिर्फ एक चीज का है सोच का। जब कोई बिलियनियर बनने की सोच रखता है तो वह चीजों को आम नजरिए से नहीं देखता। वो रिस्क को डर की तरह नहीं ओपोरर्चुनिटी की तरह देखता है। जब पूरी दुनिया कहती है यह नामुमकिन है तब वह खुद से कहता है लेट मी फाइंड आउट हाउ टू मेक इट पॉसिबल। आपने कभी नोटिस किया है कि जब भी हम किसी
अरबपति को देखते हैं तो हमें सिर्फ उसका लाइफस्टाइल दिखता है। उसकी कार, उसकी लग्जरी, उसका फेम। लेकिन जो नहीं दिखता वह है उसकी सोच जो हर कदम पर उसे दूसरों से अलग बनाती है और यहीं से असली गेम शुरू होता है। एक आम आदमी जब जिंदगी की प्रॉब्लम्स देखता है तो कहता है काश मैं भी अमीर होता। लेकिन एक बिलिनियर माइंडसेट वाला इंसान उन्हीं प्रॉब्लम्स को सशंस में बदलने के बारे में सोचता है। वो सवाल करता है इस चैलेंज में हिडन ओपोरर्चुनिटी क्या है? और फिर वहीं से एक आईडिया निकलता है जो उसे आगे बढ़ाता
है। मान लो तुम्हारे पास सिर्फ ₹100 हैं। एक आम इंसान उसे खर्च करने का सोचता है। लेकिन एक बिलिनेियर माइंडसेट वाला सोचता है। क्या मैं इन ₹100 से कुछ ऐसा कर सकता हूं जिससे यह 1000 बन जाए? कहानी सिर्फ पैसों की नहीं है। यह कहानी है एक नजरिए की। वो नजरिया जो कहता है टाइम इज मोर वैल्यूुएबल देन मनी जो हर दिन को कैलकुलेट करता है जो यह डिसाइड करता है कि उसे कहां पर अपना अटेंशन देना है और किस चीज से खुद को दूर रखना है और यही फोकस यही डिसिप्लिन उसे एक बिलियर बनाता
है सोचो जब स्टीव जॉब्स ने एप्पल की शुरुआत की उसके पास लग्जरी नहीं थी लेकिन उसकी सोच थी कि दुनिया की टेक्नोलॉजी को रिीडफाइन किया जा सकता है। जब ईलॉन मस्क ने टेस्ला और स्पेस एक्स की शुरुआत की, लोग उसे पागल समझते थे। लेकिन उसके दिमाग में एक ब्लूप्रिंट था। ऐसा फ्यूचर जो औरों को दिख ही नहीं रहा था। यह लोग किसी और ग्रह से नहीं आए थे। लेकिन उनकी एक चीज ने उन्हें सबसे अलग बनाया। उनकी सोच, उनकी एबिलिटी टू थिंक बिय्ड लिमिट्स। अब सवाल यह नहीं है कि आप बिलनेियर बनोगे या नहीं? असली
सवाल यह है क्या आप आज से वैसे सोचना शुरू कर सकते हो? हर सुबह जब आप उठते हो, क्या आप उसी रूटीन में खो जाते हो या फिर खुद से यह सवाल करते हो? आज मैं ऐसा क्या कर सकता हूं जिससे मैं अपने गोल्स के एक कदम और करीब पहुंच जाऊं। एक बिलिनेयर की तरह सोचने का मतलब यह नहीं कि आपको अभी करोड़ों कमाने हैं। इसका मतलब है आपको अपनी जिंदगी को उसी सीरियसनेस से लेना है जैसे कि आप एक अरबों की कंपनी चला रहे हो। हर डिसीजन, हर रिलेशनशिप, हर हैबिट केयरफुली सोचना है। बिना
एक्सक्यूसेस, बिना डिस्ट्रैक्शंस। और सबसे खास बात बिलियनियर माइंडसेट वाले कभी कंफर्ट जोन में नहीं रहते। उन्हें ग्रोथ की भूख होती है। उन्हें नए आइडियाज एक्साइट करते हैं और जब उन्हें कोई कहता है कि तुम यह नहीं कर सकते, वहीं से उनका मोटिवेशन शुरू होता है। अब आप खुद से पूछो। क्या आप तैयार हो उस सोच को अपनाने के लिए? क्या आप हर दिन को ऐसे जीने के लिए तैयार हो जैसे कि आपका टाइम प्राइसलेस है? जैसे कि आपके डिसीजंस किसी एंपायर को बना सकते हैं? अगर हां, तो आप ऑलरेडी उस रास्ते पर हो जहां अरबों
की वेल्थ एक पॉसिबिलिटी है। याद रखो बिलिनेयर बनना पैसों से शुरू नहीं होता। यह सोच से शुरू होता है। तो आज से खुद से एक वादा करो कि अब आप सोचोगे ऑर्डिनरी नहीं बिलियनियर की तरह। चैप्टर टू योर पर्सनल अप्रेंटिस। तुम्हारी जिंदगी में कभी कोई ऐसा इंसान आया है जिससे तुमने बिना किताबों के, बिना लेक्चर्स के कुछ ऐसा सीखा जो तुम्हें पूरी उम्र याद रहा। कभी किसी ने तुम्हें सिर्फ देखकर, अपने डिसीजंस से, अपने काम के अंदाज से इनडायरेक्टली कुछ ऐसा सिखा दिया जो क्लासरूम्स में नहीं सिखाया जा सकता। यही होता है असली अप्रेंटिस बनना
और बनाना। अब सोचो अगर तुम्हें बिलिनेियर बनना है क्या तुम अकेले ही सब कुछ सीख सकते हो? नहीं। हर बड़े इंसान के पीछे कोई ना कोई ऐसा होता है जिससे उसने सीखा होता है। चाहे वह किसी की सोच हो, किसी का डिसिप्लिन या फिर उसका एग्जीक्यूशन का तरीका। एक समय की बात है। न्यूयॉर्क की ठंडी सड़कों पर एक यंग लड़का रोज सुबह जल्दी उठकर न्यूज़पेपर बेचा करता था। लेकिन उसका ध्यान उस काम में नहीं था। उसका ध्यान उन बिल्डिंग्स पर था जिनके बाहर वो अखबार देता था। एक दिन उसने हिम्मत करके एक टॉल सूटेड आदमी
से पूछ लिया। एक्सक्यूज मी सर कैन आई आस्क हाउ यू बिकम दिस सक्सेसफुल? वो आदमी मुस्कुराया और सिर्फ इतना कहा ऑब्जर्व लर्न बी यूज़फुल एंड मोस्टेंटली स्टे क्लोज टू पीपल हु हैव ऑलरेडी डन व्हाट यू ड्रीम ऑफ डूइंग वहीं से उस लड़के ने अपने लिए एक नया रास्ता चुन लिया। वो अब सिर्फ पैसे कमाने के लिए काम नहीं कर रहा था। वह सीखने के लिए काम कर रहा था। हर इंटरेक्शन, हर छोटा काम उसके लिए एक लेसन बन गया। जब आप किसी सक्सेसफुल इंसान के पास काम करते हो तो सिर्फ पैसे नहीं मिलते। वहां आपको
वह देखने और समझने को मिलता है जो कोई किताब नहीं सिखा सकती। कैसे वह डिसीजंस लेते हैं, कैसे वह डील्स करते हैं, कैसे वह छोटी-छोटी चीजों में भी परफेक्शन लाते हैं। और सबसे खास कैसे वह फेलियर्स से बाहर आते हैं। एक बिलियर माइंडसेट वाला इंसान हमेशा अपने आसपास ऐसे लोगों को रखता है जो या तो उससे बेहतर हो या सीखने के लिए तैयार हो। और अगर तुम सच में कुछ बड़ा करना चाहते हो तो तुम्हें चाहिए कि तुम किसी ऐसे के नीचे काम करो जिसे देखकर तुम्हें लगे यस आई वांट टू बी लाइक हिम और
बेटर देन हिम सम डे। अप्रेंटिस बनने का मतलब सिर्फ काम सीखना नहीं है। इसका मतलब है खुद को उस माहौल में डाल देना जहां हर पल तुम्हारे दिमाग को चैलेंज मिले। जहां तुम्हें कंफर्ट ज़ोन से बाहर निकलना पड़े। जहां तुम्हारा हर दिन हर मिनट एक नई रियलिटी को टच करता हो। दिक्कत तब होती है जब लोग ईगो के चक्कर में सीखना छोड़ देते हैं। वह सोचते हैं कि मैं तो ऑलरेडी बहुत कुछ जानता हूं। लेकिन सच्चाई यह है कि बिलिनेियर बनने वाले लोग हमेशा एक चीज पर बिलीव करते हैं। बी अ स्टूडेंट फॉर एवर। उन्होंने
यह बात समझ ली होती है कि हर इंसान कुछ ना कुछ सिखा सकता है। चाहे वह उनका असिस्टेंट हो या उनका कंपैटिट। अब एक और जरूरी सवाल। क्या आप अपनी जिंदगी में किसी ऐसे इंसान को देखते हो जिससे आप कुछ सीख सकते हो? अगर हां, तो क्या आपने उसके पास जाकर काम करने की कोशिश की है? क्या आप उसके आसपास रहने की, ऑब्जर्व करने की, उसकी लैंग्वेज और बॉडी लैंग्वेज को समझने की कोशिश कर रहे हो। क्योंकि कभी-कभी नॉलेज किताबों में नहीं मिलती। वह किसी के प्रेजेंस में मिलती है। एक रियल लाइफ एग्जांपल एक लड़का
था जो कॉलेज ड्रॉप आउट था। उसने एक सक्सेसफुल बिजनेसमैन से पूछा सर कैन आई वर्क फॉर यू फॉर फ्री? पहले तो लोग हंसे लेकिन वो बिजनेसमैन मुस्कुराया और बोला शो अप टुमारो। वो लड़का 2 साल तक उस आदमी के साथ काम करता रहा। उसने कोई सैलरी नहीं ली। लेकिन 2 साल बाद जब वह बाहर निकला तो उसके पास वो स्किल्स थी जो 10 साल की नौकरी में भी नहीं मिलती। कुछ ही सालों में वह खुद एक सक्सेसफुल एंटरप्रेन्योर बन गया और वो बिजनेसमैन आज भी प्राउडली कहता है दैट किड वास माय बेस्ट अप्रेंटिस। अब डिसीजन
तुम्हारे हाथ में है। क्या तुम भी उस माइंडसेट को अपनाने के लिए तैयार हो? क्या तुम अपने ईगो को साइड में रखकर किसी से सीखने के लिए अपने कंफर्ट को छोड़ सकते हो? क्योंकि बिलियर बनने की जर्नी अकेले तय नहीं होती। वह शुरू होती है उस दिन से जब तुम खुद को किसी और से बेटर वर्जन बनाने के लिए तैयार करते हो। जब तुम कहते हो आई डोंट जस्ट वांट टू वर्क। आई वांट टू ग्रो। आई वांट टू लर्न, आई वांट टू बी एक्स्ट्राऑर्डिनरी। यही अप्रेंटिस माइंडसेट तुम्हें आम लोगों की भीड़ से अलग करता है।
चैप्टर थ्री रियलस्टेट 101 लोकेशन लोकेशन लोकेशन। कभी सोचा है कि एक सी दिखने वाली दो बिल्डिंग्स में एक की कीमत आसमान छूती है और दूसरी को कोई पूछता भी नहीं। दोनों में चार दीवारें हैं, दरवाजा है, खिड़की है, छत है। फिर ऐसा क्या है जो एक प्रॉपर्टी को गोल्ड बना देता है और दूसरी को बस ईंट पत्थर जवाब है लोकेशन। रियलस्टेट की दुनिया में यह तीन वर्ड सबसे ज्यादा दोहराए जाते हैं। लोकेशन, लोकेशन, लोकेशन। यह सिर्फ एक लाइन नहीं है। यह एक रूल है। एक ऐसा प्रिंसिपल जो अरबों की संपत्तियों का फाउंडेशन बनाता है। अब
मान लो कि तुम्हारे पास ₹1 करोड़ हैं। एक जगह है जहां फ्लैट मिल रहा है ₹90 लाख में और दूसरी जगह जहां वही फ्लैट सिर्फ ₹ लाख का है। अक्सर लोग सस्ता देखकर तुरंत डील पकड़ लेते हैं। लेकिन यही सबसे बड़ी गलती होती है। क्योंकि एक इंटेलिजेंट इन्वेस्टर प्राइस नहीं देखता। पोटेंशियल देखता है। इमेजिन करो मुंबई की एक पुरानी गली में एक छोटा सा वन बीएचके फ्लैट है जिसकी खिड़की से सी फेसिंग व्यू दिखता है। वही फ्लैट अगर किसी भीड़भाड़ वाले इंडस्ट्रियल एरिया में हो जहां आसपास शोर और ट्रैफिक ही ट्रैफिक है तो क्या उसकी
वैल्यू वही रहेगी? नहीं। क्यों? क्योंकि लोकेशन सिर्फ जगह नहीं होती। वह एक लाइफ स्टाइल होती है। एक अच्छा लोकेशन वह होता है जहां लोग रहना चाहते हैं। जहां लोग पैसा खर्च करना चाहते हैं। जहां स्कूल्स, हॉस्पिटल्स, ट्रांसपोर्ट, पीस सब कुछ एक्सेसिबल हो। और इसी वजह से वहां की जमीन, वहां का मकान एक दिन सोने से भी ज्यादा कीमती हो जाता है। एक बार एक लड़का था जो अपनी पहली प्रॉपर्टी खरीदने जा रहा था। उसके पास बस थोड़े पैसे थे और वह किसी ऐसी जगह इन्वेस्ट करना चाहता था जहां उसे जल्दी रिटर्न मिले। लोगों ने कहा
जहां सस्ता मिल रहा है वहीं ले लो। लेकिन उसने अलग सोचा। उसने मेट्रो एक्सपेंशन मैप देखा। उसने देखा कि 2 साल बाद एक नया स्टेशन बन रहा है। और वहां अभी बहुत कम कीमत में लैंड अवेलेबल है। उसने वहीं एक छोटा सा प्लॉट खरीद लिया। लोग हंसे। यहां तो अभी कुछ भी नहीं है। लेकिन 3 साल बाद जब मेट्रो स्टेशन ऑपरेशनल हुआ तो उसी एरिया में प्राइसेस पांच गुना बढ़ गए। वो लड़का आज एक सक्सेसफुल रियलस्टेट इन्वेस्टर है। सिर्फ इसलिए क्योंकि उसने प्राइस नहीं लोकेशन की फ्यूचर वैल्यू देखी। यही फर्क है एक आम खरीदार और
एक बिलिनेयर माइंडसेट वाले इन्वेस्टर में। एक और सच्चाई। हर सिटी में दो जगह होती हैं। एक जहां लोग अभी रहना चाहते हैं और एक जहां लोग 3 साल बाद रहना चाहेंगे। जो पहले वाली जगह को टारगेट करता है वो सेफ प्लेयर है। लेकिन जो दूसरी वाली जगह को पहचान लेता है वो विज़नरी है। अब एक सवाल तुमसे क्या तुम भी अपनी पहली प्रॉपर्टी लेने की सोच रहे हो? तो सोचो क्या तुम उस जगह में इन्वेस्ट कर रहे हो जहां तुम बस खुद को एडजस्ट कर सको या उस जगह में जहां फ्यूचर में लोग इन्वेस्ट करने
को लालायित होंगे। लोकेशन का मतलब सिर्फ फिजिकल एरिया नहीं है। यह एक कंप्लीट इकोसिस्टम है। सेफ्टी, ट्रांसपोर्ट, डिमांड, डेवलपमेंट प्लांस, नेबरहुड क्वालिटी इन सबका मिक्स। और सबसे जरूरी बात जब तुम लोकेशन चूज़ करते हो तो तुम सिर्फ एक मकान नहीं खरीदते। तुम एक माइंडसेट, एक डायरेक्शन, एक पॉसिबिलिटी खरीदते हो। एक बिलियनियर माइंडसेट कहता है, बाय वेयर द वर्ल्ड इज गोइंग, नॉट वेयर द क्राउड इज ऑलरेडी स्टैंडिंग। और हां, यह सिर्फ रियलस्टेट की बात नहीं है। यह जिंदगी के हर फैसले पर लागू होता है। कहां रहना है, किस एनवायरमेंट में काम करना है, किस माइंडसेट वालों
के बीच उठना बैठना है, यह सब भी एक तरह का लोकेशन ही है। तो अगली बार जब तुम किसी जगह को देखो, सिर्फ प्राइस टैग मत देखना। उस जगह की स्टोरी देखो। उसका फ्यूचर देखो। क्योंकि बिलियर बनने के रास्ते की सबसे पहली सीढ़ी तुम्हारी लोकेशन ऑफ विज़ होती है। चैप्टर फोर रियलस्टेट 301 हाउ टू पिक रियलस्टेट एस एन इन्वेस्टमेंट? कभी सोचा है कि कुछ लोग एक छोटी सी जमीन से करोड़ों कमा लेते हैं और कुछ पूरी जिंदगी ईएमआई चुकाते रहते हैं। लेकिन फिर भी वह एक अच्छी इन्वेस्टमेंट नहीं कहला पाती? रियलस्टेट में पैसा बनता है।
लेकिन सोच से, रिसर्च से और सही जगह पर लगाए गए भरोसे से। यह चैप्टर उस पल की शुरुआत है जहां डिसीजन मेकिंग सिर्फ गट फीलिंग से नहीं होती बल्कि एक इन्वेस्टर की नजर से होती है। अब इमेजिन करो तुम्हारे सामने दो प्रॉपर्टीज हैं। एक की दीवारें फ्रेशली पेंटेड हैं। टाइल्स चमचमा रही हैं और दूसरी थोड़ी पुरानी सी लगती है। एकदम साधारण। लेकिन जब एक एक्सपीरियंस्ड इन्वेस्टर उन्हें देखता है। वह ना दीवारें देखता है ना पेंट। वह देखता है नंबर्स। वो देखता है लोकेशन ट्रेंड्स। वो पढ़ता है फ्यूचर डिमांड। और सबसे बड़ी बात वो पूछता है
इस डील के पीछे रियल स्टोरी क्या है? असली खेल वहीं से शुरू होता है। रियलस्टेट खरीदना लॉटरी नहीं है। यह एक कैलकुलेटेड मूव है जो तब काम करता है जब तुम वो देखते हो जो औरों की नजर से छूट जाता है। एक बार की बात है। एक 28 साल का लड़का जिसकी पहली नौकरी थी। उसने एक छोटी सी वन बीएचके फ्लैट पर नजर डाली। उसकी सैलरी बहुत ज्यादा नहीं थी। लेकिन उसके दिमाग में एक सवाल घूमता रहता था। कैसे मैं अपनी इनकम को एसेट्स में बदल सकता हूं? उसने उस एरिया की पपुलेशन ग्रोथ देखी। नियर
बाय कॉलेजेस, आने वाली मेट्रो लाइन और रेंटल डिमांड को एनालाइज किया। लोगों ने कहा, इतनी छोटी जगह में इन्वेस्ट क्यों कर रहा है? लेकिन उसने ध्यान नहीं दिया। 5 साल बाद वो फ्लैट ना सिर्फ दुगने प्राइस पर बिका बल्कि उसने 5 साल तक रेंट भी कमाया और यहीं से उसकी इन्वेस्टमेंट जर्नी शुरू हुई। वो लड़का जानता था कि सबसे अच्छा प्रॉपर्टी वो नहीं जो दिखने में सुंदर हो। सबसे अच्छा वह होता है जो पैसा बना सके। तो असली सवाल यह है कैसे चुने सही प्रॉपर्टी? सबसे पहले अपनी नजरों को ग्लैमर से हटा दो। इन्वेस्टमेंट का
मतलब है पैसा लगाना वहांजहां रिटर्न मिले। प्रॉपर्टी इन्वेस्टमेंट इमोशन से नहीं लॉजिक से होती है। जब किसी प्लॉट या फ्लैट को देखो खुद से पूछो। क्या यह जगह ऐसी है जहां लोग रहना चाहेंगे? क्या यहां रेंटल डिमांड है? क्या गवर्नमेंट की कोई योजना है इस एरिया को डेवलप करने की? क्या यहां जॉब, हब्स, कॉलेजेस या हॉस्पिटल्स पास में हैं? क्या पिछले 5 साल में यहां रेट्स बढ़े हैं? और आने वाले 5 साल में क्या बढ़ सकते हैं? इन सवालों का जवाब अगर तुम्हें सही दिशा में मिलता है तो समझो वह प्रॉपर्टी सिर्फ जमीन नहीं वह
एक फ्यूचर मनी मशीन है। एक इन्वेस्टर के पास एक मैजिक टूल होता है। उसका रिसर्च करने का तरीका वो जमीन की कीमत से ज्यादा उसकी ग्रोथ पोटेंशियल को देखता है। वो उस एरिया की ट्रैफिक, सीवेज, स्कूल्स सब कुछ असेस करता है। और सबसे जरूरी वह खुद से यह नहीं पूछता कि क्या मैं अफोर्ड कर सकता हूं। वह पूछता है क्या यह डील मेरी स्ट्रेटजी से मैच करती है? रियलस्टेट एक मैराथॉन है। स्प्रिंट नहीं। कई बार सबसे बेहतरीन डील्स दिखने में डल होती हैं। लेकिन वही डील्स लॉन्ग टर्म वेल्थ बनाती हैं। सोचो क्या एक 15 साल
पुरानी बिल्डिंग जहां ऑलरेडी टेनेंट्स हैं और मंथली रेंटल फ्लो है। ज्यादा फायदेमंद नहीं होगी बनिस्बत। एक नई बिल्डिंग के जो अभी खाली पड़ी है। प्रॉब्लम यह है कि हम अक्सर इमोशनल हो जाते हैं। हमें वह घर चाहिए जो हमें फील गुड दे। लेकिन एक बिलियर माइंडसेट कहता है फीलिंग्स नहीं फिगर्स देखो। इन्वेस्ट करने से पहले हमेशा एग्जिट स्ट्रेटजी सोचो। क्या मैं इसे रिसेल कर पाऊंगा? क्या इसका रेंट कंसिस्टेंट रहेगा? क्या मेंटेनेंस मैनेजेबल है? और हां एक और बड़ी बात लीगल वेरिफिकेशन कोई प्रॉपर्टी कितनी भी अच्छी दिखे अगर उसके डॉक्यूमेंट्स क्लियर नहीं है तो वह एक
ट्रैप बन सकती है। तो जब अगली बार किसी एजेंट के फ्लैशी ऑफर पर टेंपटिंग फील हो एक बार आंखें बंद करो और खुद से पूछो। क्या मैं इस प्रॉपर्टी को एक बिजनेसमैन की तरह देख रहा हूं या एक इमोशनल बायर की तरह। क्योंकि प्रॉपर्टी वह सीढ़ी है जो तुम्हें फाइनेंशियल फ्रीडम की छत तक ले जा सकती है। लेकिन वह तभी जब हर स्टेप सोच समझ कर रखा जाए। तो अगली बार जब तुम इन्वेस्टमेंट की दुनिया में कदम रखो। याद रखना आप एक मकान नहीं एक फ्यूचर खरीद रहे हो। चैप्टर फाइव रियलस्टेट चोरों वन फाइनेंसिंग योर
इन्वेस्टमेंट। क्या आप जानते हो कि दुनिया के सबसे अमीर लोगों में से ज्यादातर ने अपने एंपायर की शुरुआत अपने पैसों से नहीं बल्कि दूसरों के पैसों से की थी? सुनने में अजीब लगता है ना? लेकिन यही सबसे बड़ा ट्रुथ है रियलस्टेट इन्वेस्टमेंट का। पैसा आपका नहीं भी हो तो भी आप मालिक बन सकते हैं। अब जरा सोचिए अगर आपके पास सिर्फ 5 लाख हैं, लेकिन 1 50 लाख की प्रॉपर्टी आपकी नजर में है, तो क्या आप वहीं रुक जाएंगे? यह सोचकर कि मेरे पास पैसे नहीं है या आप उस माइंडसेट से सोचेंगे जो पूछता है
मुझे यह पैसे अरेंज कैसे करने हैं? यही सोच एक आम आदमी को एक विज़नरी इन्वेस्टर से अलग करती है। रियलस्टेट का असली जादू लेवरेजिंग में छुपा है। यानी अपनी कमाई से ज्यादा वैल्यू कंट्रोल करना, सही तरीके से फाइनेंस करना और दूसरे रिसोर्सेज को इस्तेमाल करके ओनरशिप लेना। कई लोग सोचते हैं कि लोन लेना एक बोझ है। लेकिन स्मार्ट इन्वेस्टर्स जानते हैं कि सही तरीके से लिया गया लोन एक एसेट को मल्टीप्लायर बना सकता है। मान लो एक लड़का है जो नौकरी करता है और हर महीने ₹00 बचाता है। वह सालों तक सेविंग करता है ताकि
एक घर खरीद सके। लेकिन वहीं दूसरा लड़का वही सैलरी में अपनी प्रोफाइल, सिविल स्कोर और डॉक्यूमेंटेशन सही रखता है और बैंक से लोन लेकर अपनी पहली प्रॉपर्टी ले लेता है। अब फर्क देखो। पहला लड़का 5 साल बाद शायद पहला घर खरीदेगा और दूसरा लड़का 5 साल तक रेंट कमाता रहेगा और उसी रेंट से ईएमआई भरता रहेगा। स्मार्ट फाइनेंसिंग का मतलब यह नहीं कि बस लोन लेना है। इसका मतलब है अपने पास जो अवेलेबल है उसका बेस्ट इस्तेमाल करना। लोन लेते वक्त कुछ चीजें क्रिटिकल होती हैं? कितना डाउन पेमेंट देना है? ईएमआई आपकी मंथली इनकम का
कितना हिस्सा है? क्या आपके पास इमरजेंसी के लिए बैकअप है? क्या उस प्रॉपर्टी से रेंटल इनकम आ सकती है? जो आपकी ईएमआई को कवर करे? एक रियल इन्वेस्टर कभी लोन को डर की नजर से नहीं देखता। वो उसे एक टूल की तरह यूज करता है। एक ऐसा टूल जो उसे वेल्थ की ओर ले जाता है। एक और कहानी सुनो। एक महिला थी जो टीचिंग जॉब करती थी। उसने एक अंडर कंस्ट्रक्शन फ्लैट बुक कराया 10% बुकिंग अमाउंट पर। बाकी पेमेंट कंस्ट्रक्शन स्टेजेस के हिसाब से करना था। उसने ईएमआई तभी शुरू की जब पजेशन मिला। तब तक
फ्लैट की कीमत 40% बढ़ चुकी थी। उसने वही फ्लैट बेचकर दूसरा बड़ा इन्वेस्टमेंट किया। सिर्फ एक चीज ने उसे बाकी लोगों से अलग किया। उसने फाइनेंस को डर की तरह नहीं मौका की तरह देखा। रियलस्टेट फाइनेंसिंग का असली खेल तब शुरू होता है जब आप सिर्फ बैंक पर डिपेंड नहीं करते। आप एक्सप्लोर करते हो प्राइवेट लेंडर्स, जॉइंट वेंचर्स, सेलर फाइनेंसिंग, रेंट टू ओन मॉडल्स। और तब समझ आता है कि दुनिया में पैसा हर तरफ है। बस उसे स्मार्टली हैंडल करने वाले कम है। आज की दुनिया में बैंक लोनस लेना पहले से आसान है। लेकिन स्मार्ट
बोरोअ वही है जो अपनी क्रेडिट हिस्ट्री क्लियर रखता है। लोन से पहले प्रॉपर्टी की लीगल चेक करता है। प्रोसेसिंग फीस, हिडन चार्जेस, इंटरेस्ट टाइप, फिक्स्ड या फ्लोटिंग सब क्लियरली समझता है। और सबसे जरूरी लोन ईएमआई कभी अपनी कैपेसिटी से ज्यादा नहीं लेता क्योंकि अगर आप लोन से फास्ट ग्रो करना चाहते हो तो आपको डिसिप्लिन भी उतना ही रखना होगा और हां कभी-कभी सबसे अच्छा फाइनेंसिंग तरीका वो होता है जहां आप डील नेगोशिएटर बन जाते हो। कुछ सेलर्स खुद पेमेंट टर्म्स में फ्लेक्सिबिलिटी दे देते हैं। अगर उन्हें लगे कि आप जेन्युइन बायर हो। कुछ प्रॉपर्टीज ऐसी
होती हैं जहां बिल्डर प्रीईएमआई या जीरो इंटरेस्ट स्कीम्स ऑफर करता है। सवाल यह नहीं कि पैसा कहां से आएगा? सवाल यह है क्या आपने ऑप्शंस एक्सप्लोर किए? तो अगली बार जब आप यह सोचो कि मेरे पास पैसे नहीं है? एक बार खुद से पूछना क्या मेरे पास माइंडसेट है? क्योंकि बिलियर माइंडसेट पैसों से नहीं बनता। प्लानिंग से बनता है और फाइनेंस उस प्लानिंग का सबसे मजबूत बेस होता है। जब आप पैसे को हैंडल करना सीख जाते हैं तब पैसा आपके लिए काम करने लगता है और रियलस्टेट उस पैसे को मल्टीप्लाई करने का सबसे टेस्टेड तरीका
है तो रेडी हो जाइए अपनी पहली या अगली प्रॉपर्टी खरीदने के लिए। लेकिन इस बार डर के साथ नहीं स्ट्रेटजी के साथ। क्योंकि जब आप फाइनेंस को समझते हैं तब आप सिर्फ एक इन्वेस्टर नहीं रहते तब आप एक क्रिएटर ऑफ वेल्थ बन जाते हैं। चैप्टर सिक्स द बिलियर्स रूल्स क्या आपने कभी किसी बिलियर को गौर से देखा है? उनकी चाल, उनकी बातों का वजन, उनका डिसीजन लेने का तरीका हर चीज में एक अलग ही डेप्थ होती है। ऐसा लगता है जैसे उनके पास कोई खास मैजिक फार्मूला है जो उन्हें हर बार विनर बना देता है।
लेकिन सच्चाई यह है कि उनके पास कोई जादू नहीं होता। उनके पास होते हैं कुछ ऐसे अनदेखे अनकहे रूल्स जो उन्हें दुनिया की भीड़ से अलग करते हैं। और आज हम उन्हीं बिलियनियर रूल्स की उस दुनिया में घुसने जा रहे हैं जहां सक्सेस सिर्फ सपना नहीं एक स्ट्रेटजी बन जाती है। जरा सोचो। एक ही मार्केट में कुछ लोग रो रहे हैं कि बाजार गिर रहा है। वहीं कुछ लोग उसी गिरते बाजार में करोड़ों बना रहे हैं। फर्क क्या है? रूल्स। रूल्स जो जिंदगी के हर फैसले में गाइड करते हैं। रूल्स जो बताते हैं कि कब
बोलना है, कब सुनना है, कब रुकना है और कब दौड़ लगानी है। सबसे पहला रूल जो हर बिलियर के डीएनए में छुपा होता है। टाइम इज एवरीथिंग। उनके लिए टाइम सिर्फ घड़ी की सुई नहीं एक करेंसी है और शायद सबसे कीमती। वह कभी अपना टाइम वहां खर्च नहीं करते जहां रिटर्न नहीं मिलेगा। वह हर दिन को प्लान करते हैं। प्रायोरिटी सेट करते हैं और खुद से हर सुबह यह सवाल पूछते हैं। इज टुडे गोइंग टू बी अ स्टेप फॉरवर्ड और जस्ट अनदर लूप? अब इमेजिन करो एक बिजनेसमैन जो रोज सुबह 6:00 बजे उठता है, वर्कआउट
करता है। अपने पूरे दिन की माइक्रो प्लानिंग करता है। जबकि दूसरा बिजनेसमैन बिना प्लानिंग के रैंडम कॉल्स और ईमेल्स में उलझा रहता है। दोनों के पास 24 घंटे हैं। लेकिन एक की जिंदगी देन एक्स तेजी से आगे बढ़ती है। क्यों? क्योंकि वह रूल्स फॉलो करता है। दूसरा रूल नेवर मेक डिसीजंस इमोशनली। जब दुनिया पैनिकिक में होती है, बिलियनियर काल होता है। जब सब डरते हैं, वह ऑब्जर्व करता है। वो जानता है कि इमोशनल डिसीजन शॉर्ट टर्म कंफर्ट देते हैं, लेकिन लॉन्ग टर्म डैमेज करते हैं। एक बार की बात है एक रियलस्टेट डील में कुछ इन्वेस्टर्स
ने डर की वजह से अपनी प्रॉपर्टीज लॉस में बेच दी। लेकिन एक आदमी था जिसने सिर्फ इतना कहा लेट्स वेट मार्केट डजंट फॉल फॉर एवर 6 महीने बाद वही प्रॉपर्टीज दुगनी कीमत पर बिकी उसने कोई जादू नहीं किया बस एक रूल फॉलो किया स्टे काम व्हेन अदर्स लूज देर माइंड तीसरा रूल ऑलवेज नो मोर देन यू नीड एक बिलियर कभी सिर्फ जितना जरूरी है उतना नहीं सीखता वो एक्स्ट्रा पढ़ता है एक्स्ट्रा रिसर्च करता है ट्रेंड्स को समझता है। वो उस जगह की भी नॉलेज रखता है जहां वह अभी नहीं है लेकिन पहुंच सकता है। कभी
किसी बिलियनेयर से मिलना हो तो उनकी किताबों की शेलफ देखना। फाइनेंस से लेकर फिलॉसफी तक हर सब्जेक्ट की किताबें होंगी। क्योंकि वह जानते हैं जब नॉलेज आता है तब डर भागता है और जब डर नहीं होता तब डिसीजंस शार्प होते हैं। अगला रूल प्रोटेक्ट योर एनर्जी। हर बिलिनेयर जानता है कि एनर्जी एक लिमिटेड रिसोर्स है। वह हर चीज, हर इंसान, हर काम को अलऊ नहीं करते अपने जोन में आने के लिए। उनके पास एक रेडर होता है जो इंस्टेंटली उन्हें सिग्नल देता है कि कौन उनका टाइम और एनर्जी खा रहा है। कई बार आप खुद
सोचते हो मैं दिन भर बिजी रहता हूं। फिर भी रिजल्ट क्यों नहीं आता? क्योंकि आप बिजी हैं। प्रोडक्टिव नहीं। बिलियनर्स बिजी नहीं रहते। वो इंटेंशनल रहते हैं। और अब सबसे जरूरी रूल थिंक लॉन्ग टर्म। जब आम लोग आज की सैलरी पर खुश होते हैं। बिलियर आने वाले 10 साल की पैसिव इनकम का ब्लूप्रिंट बना रहा होता है। वो खुद से हर बार पूछता है विल दिस डिसीजन कंपाउंड ओवर टाइम? अगर आंसर यस है तो वह उस पर कमिटमेंट करता है। एक आदमी ने एक बार डेजर्ट में जमीन खरीदी। सब ने कहा पागल हो गया है।
लेकिन उसे पता था कि वहां एक एयरपोर्ट बनने वाला है। 10 साल बाद वो जमीन गोल्ड बन गई क्योंकि उसने शॉर्ट टर्म व्यूज को इग्नोर किया और लॉन्ग टर्म पोटेंशियल को चुना। बिलियनर्स के रूल्स फ्लैशी नहीं होते। वो Instagram कैप्शंस नहीं एक्शन प्लांस होते हैं। वो कहने के लिए नहीं होते। जीने के लिए होते हैं। अब सवाल यह नहीं है कि क्या आपके पास करोड़ों हैं या नहीं? सवाल यह है क्या आप वैसे सोचते हो? वैसे डिसीजंस लेते हो, वैसे रूल्स फॉलो करते हो जैसे वह करते हैं। क्योंकि बिलियर बनना बैंक बैलेंस से नहीं माइंडसेट
से शुरू होता है। कंक्लूजन तो अब जब यह सफर अपने आखिरी मोड़ पर है। एक सवाल उठता है क्या तुम तैयार हो? अब उस सोच के साथ बाहर निकलने के लिए जो दुनिया को बदल सकती है। तुमने अब तक जाना कि बिलिनेियर बनने का रास्ता पैसों से नहीं सोच से शुरू होता है। वो सोच जो हर फेलियर में फ्यूचर देखती है। वो नजर जो प्रॉब्लम्स में प्रॉफिट्स तलाशती है। वो डिसिप्लिन जो हर दिन को गोल्ड की तरह ट्रीट करती है। अब तुम्हें यह किताब बंद नहीं करनी। तुम्हें खुद से एक दरवाजा खोलना है। एक नई
माइंडसेट का, एक नई जर्नी का। बिलियनर्स कोई जादू से नहीं बनते। वह भी इंसान ही होते हैं। दो आंखें, एक दिल, दो हाथ। लेकिन जो चीज उन्हें भीड़ से अलग करती है, वह है उनका सोचने का तरीका। जब दुनिया सिर्फ कंफर्ट ढूंढ रही होती है, वह डिसकंफर्ट में ग्रोथ ढूंढते हैं। जब लोग वीकेंड का इंतजार करते हैं, वह मंडे को मिशन समझते हैं। जब सब कंपैरिजन में उलझे होते हैं, वह अपने विज़न में डूबे होते हैं। अब तुमसे कोई यह नहीं पूछेगा कि तुम्हारे पास कितना पैसा है? सवाल यह होगा क्या तुम्हारे पास वह सोच
है जो एक एंपायर खड़ा कर सके? क्या तुम टाइम को एक इन्वेस्टर की तरह ट्रीट कर रहे हो? क्या तुम अपनी एनर्जी उन जगहों पर खर्च कर रहे हो जो तुम्हें 10 एक्स रिटर्न दे सकती हैं? क्या तुम ऐसे डिसीजंस ले रहे हो जो आने वाले 5 सालों में कंपाउंडिंग रिजल्ट्स देंगे? क्योंकि बिलियनियर माइंडसेट सिर्फ बिल्डिंग्स, बैंक्स और बिग डील्स तक सीमित नहीं है। यह एक एटीट्यूड है जो हर छोटे काम को बड़ी सीरियसनेस से करता है। यह एक बिलीफ है जो कहता है मैं बॉन्ड रिच नहीं था। लेकिन मैं डाई रिच जरूर बनूंगा। सोच
से, मेहनत से और स्ट्रेटजी से। इस किताब का अंत तुम्हारे अंदर की बिलिनेियर थिंकिंग का शुरुआत है। अब तुम्हें प्लान बनाना है, एक्शन स्टेप्स तय करने हैं। डिस्ट्रैक्शंस को काटना है और उस आवाज को सुनना है जो रोज अंदर से कहती है। तू इससे कहीं ज्यादा कर सकता है। गो आउट, फेस द वर्ल्ड। एंड दिस टाइम नॉट लाइक अ स्ट्रगलर नॉट लाइक अ सर्वाइवर बट लाइक अ बिलियनियर इन द मेकिंग बिकॉज़ अब तुम जान चुके हो सोचना अगर है तो एक बिलियनेर की तरह सोचो और अब अगर तुम यहां तक पहुंचे हो तो एक बात
साफ है तुम सिर्फ सुनने नहीं कुछ बड़ा करने आए हो तुम उन लोगों में से हो जो भीड़ में नहीं खोना चाहते बल्कि अपनी पहचान बनाना चाहते हैं। इस वीडियो का हर लफ्ज, हर लाइन तुम्हें उसी सोच के करीब ले जाने के लिए थी जिस सोच ने दुनिया के सबसे ऑर्डिनरी लोगों को एक्स्ट्राऑर्डिनरी बिलियनियर बना दिया। अगर आपको यह वीडियो पसंद आया कुछ नया सोचने को मिला तो लाइक जरूर करना। कमेंट में बताना कि कौन सी लाइन ने आपको सबसे ज्यादा झकझोरा और ऐसे ही दमदार कंटेंट के लिए बुक लिसनर्स को सब्सक्राइब करना मत भूलना।
मिलते हैं अगले वीडियो में एक और जबरदस्त सोच, एक और इंस्पायरिंग किताब के साथ।